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Friday, April 26, 2013

एक अवैध जगह

शहर में एक अवैध जगह में अपना घर जब कोई शख़्स बना लेता है तो उसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा मान लेता है।उस हिस्से को अपना सहारा समझने लगता है। अगर इसे सत्ता स्वीकारती नहीं, कुछ कानुनों के आधार पर नजायज ठहराती है। तब लोग सत्ता को दोषी करार करते हैं, गालियां देते हैं। लेकिन उनका जगह के साथ क्या रिश्ता है उसे समझाने का तरीका नहीं मिलता और शख़्स उस चीज के लिये रोता और बिलखता है। जो उनकी अपनी है ही नहीं।
शायद जो अपने कब्जे की या कन्ट्रोल की पकड़ नहीं है तो उसे क्यों चुनते हैं लोग? क्या ऐसी जगह या सपनों की दुनिया सजाने का कोई खासा परमीट हमारे पास होता है?

एक जगह यानी जमीन का टुकड़ा जिसे सत्ता माप डण्डों के जरिये देखती है। या तो सब से नीचे का करार करती है या सबसे ऊपर का लेकिन बीच का कहां है ये ही सब की नज़र से औझल रहता है या रखा जाता है। वो उसे ही पता होता है जो उस जमीन के टुकड़े पर समय का एक लम्बा आकार तैय्यार कर देता है। हर तरह का जोखिम और कठिनाइयां को हर हाल में अपनाता है।

जब हमारे आगे कोई प्रहार होता है तो हम उस प्रहार के आसपास से ही उससे लड़ने का औजार ढूंढ लेते हैं। ताकी जो भाषा हम से लड़ रही है उस से टकराने के लिये लोहा ले सके। क्योंकि समाजिक ज़िन्दगी कहती है कि लोहा ही लोहे को काटता है। अगर मैं कहना चाहूं की तोड़ने वाली भाषा को तोड़ने वाली भाषा ही टक्कर दे सकती है तो इस लाईन के विरुध आप की क्या सलाह होगी?

समाज जिससे अलग हुये शख़्स जो अपना कोना बना कर खुद अपने जीने की वजहों को बना रहे हैं। जिनका समाज में आने से पहले कोई गणित नहीं बनता और ना ही कोई कल्पना बनती। इसके बावजुद भी एक परिक्रिया बनी एक अजब कल्पना जन्म लेती है। जो समाज अपने बहिखातों में तब ही दर्ज करता है जब उस शख़्स की आधी ज़िन्दगी ये बताते बताते बीत जाती है की उसकी सोच और विचारों कि भी दुनिया है। जिसका आधार वो खुद है। जो अपने वज़ूद से ताल्लुक रखता है। मौज़ूदगी को बयां करता है। इन्सान क्या है? जीवन और जड़ में इन के बीच जीने का वर्णन देना और बदलावों की परिभाषायों को तलाशते और बनाते है हमारी उम्र ही हमारा अनुभव सुनाती है। कहानियां गढ़ती हैं मगर कैसे? 

इन बीच की धाराओं में जीवन की किन झलकियों को मान्य रखा जायेगा के दरमियां ही जीवन झूलता है। क्या बोले और क्या बोलने से पहले रूके की परतों में वज़न बड़ता जाता है।

राकेश

Tuesday, March 15, 2011

जीवन का अद़्भूत मिश्रण क्या है?

किसी के चले जाने के बाद भी चिन्ह बना रहना ।
अपने बीच वो जगह जो हमारे लिये सदेव नहीं है मगर उसमे जगह बनाने की निरंतर कोशिश जाती है कि हम भीड़ में संतुलन का माहौल ले पाये।

भीड़ जिसमें न सावधान है, न विश्राम बल्कि इन दोनों स्थिती से अलग पांव निकालने की बैचेनी है।
जगह में हर कोई एक तलाश लेकर आता है। जो बदल भी जाती है, गायब भी हो जाती है और एक नया आंनद को पाकर फिर अगले ही दिन किसी और आनंद में रम जाती है।

समय छलिया है जो तरह-तरह की लीलायें रचता और करता है। जिसके प्रभाव से कभी बेकाबू हो जाना है कभी उसे आसमान उँचाइयों पर कदम रखना है। ज़िंदगी कभी मौत से जीत जाती है। कभी मौत ज़िंदगी से, ज़िंदगी के साथ कुछ याद और कुछ कल्पना जुड़ी है। उसे हम छोड़ नहीं सकते। वो हमारा वज़ूद है। जो वर्तमान को जीने की होड़ देता है।

राकेश

अपने से बाहर क्या?

शहर में निकला और खुद के परिवेश का दूसरे से जुड़ाव को समझना जो हो रहा है उसमें मौजूदगी के जरिये वास्तविकता से कल्पना करते हुए। अपने से होने वाले टकराव से उत्पन्न छवि को अपने बीच ले आना, जो कानो से दूर है। मगर सूनाई देती है। वो बीच का गैप जो अपने परिचय और दूसरे के अपने तक आने या जाने से अलग दिखता घेरा क्या है?

अपने से दूर जाने वाली चीजों, जगह, वक़्त की परछाईयाँ जो मौजूदगी को रचती है। उस रचनात्मकता को कैसे सींचा जाये? जिससे सम्पर्क में आने वाले ढ़ाँचे पर पढ़ने वाली स्पर्श रेखाओं का जिन्दापन खुद के होने का अहसास कराता है। अपने से बाहर जो है वो पाठक है। जो सुनना चाहता है, देखना चाहता है। उस के लिये स्वयं के पास क्या है? जिवंतता क्या? श्रम का जिवंतता क्या? अपनी सोच के विरूध? जीवन की कल्पना क्या? जो है उसके बाहर जो दिखता है उसके बाहर? वो तस्वीर जिवंतता पॉवर देती है? उसका नक्शा या स्ट्रचर कैसा होता है? जो संतुलन में असंतुलन दिखाता है।

राकेश