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Saturday, June 7, 2014
Wednesday, February 5, 2014
असाधारण लालसाएँ
जीवन
में आकर्षण भर उजालों के बादल
अधेरों के दरवाजों पर ठक-ठक
करते हैं फिर इन गहरे अन्धेरों
में हाथ पकड़ कर भटकाने वाली
लालसायें कौन हैं? जिनके
साथ भटकने के बाद अपना पता
मिलना मुश्किल होता है।
इंसान
अपने आसपास फैली संसार की
भावूकता और मार्मिकता के कई
रूपो, मुखोटों
की अस्लियतों को एक आकार देते
हुएँ अपने पीछे इफैक्ट छोड़ते
जाते हैं जीवन के रसों को
तरह-तरह
से बनाने के लिये है।
राकेश
Friday, April 26, 2013
एक अवैध जगह
शहर में एक अवैध जगह में अपना घर जब कोई शख़्स बना लेता है तो उसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा मान लेता है।उस हिस्से को अपना सहारा समझने लगता है। अगर इसे सत्ता स्वीकारती नहीं, कुछ कानुनों के आधार पर नजायज ठहराती है। तब लोग सत्ता को दोषी करार करते हैं, गालियां देते हैं। लेकिन उनका जगह के साथ क्या रिश्ता है उसे समझाने का तरीका नहीं मिलता और शख़्स उस चीज के लिये रोता और बिलखता है। जो उनकी अपनी है ही नहीं।
शायद जो अपने कब्जे की या कन्ट्रोल की पकड़ नहीं है तो उसे क्यों चुनते हैं लोग? क्या ऐसी जगह या सपनों की दुनिया सजाने का कोई खासा परमीट हमारे पास होता है?
एक जगह यानी जमीन का टुकड़ा जिसे सत्ता माप डण्डों के जरिये देखती है। या तो सब से नीचे का करार करती है या सबसे ऊपर का लेकिन बीच का कहां है ये ही सब की नज़र से औझल रहता है या रखा जाता है। वो उसे ही पता होता है जो उस जमीन के टुकड़े पर समय का एक लम्बा आकार तैय्यार कर देता है। हर तरह का जोखिम और कठिनाइयां को हर हाल में अपनाता है।
जब हमारे आगे कोई प्रहार होता है तो हम उस प्रहार के आसपास से ही उससे लड़ने का औजार ढूंढ लेते हैं। ताकी जो भाषा हम से लड़ रही है उस से टकराने के लिये लोहा ले सके। क्योंकि समाजिक ज़िन्दगी कहती है कि लोहा ही लोहे को काटता है। अगर मैं कहना चाहूं की तोड़ने वाली भाषा को तोड़ने वाली भाषा ही टक्कर दे सकती है तो इस लाईन के विरुध आप की क्या सलाह होगी?
समाज जिससे अलग हुये शख़्स जो अपना कोना बना कर खुद अपने जीने की वजहों को बना रहे हैं। जिनका समाज में आने से पहले कोई गणित नहीं बनता और ना ही कोई कल्पना बनती। इसके बावजुद भी एक परिक्रिया बनी एक अजब कल्पना जन्म लेती है। जो समाज अपने बहिखातों में तब ही दर्ज करता है जब उस शख़्स की आधी ज़िन्दगी ये बताते बताते बीत जाती है की उसकी सोच और विचारों कि भी दुनिया है। जिसका आधार वो खुद है। जो अपने वज़ूद से ताल्लुक रखता है। मौज़ूदगी को बयां करता है। इन्सान क्या है? जीवन और जड़ में इन के बीच जीने का वर्णन देना और बदलावों की परिभाषायों को तलाशते और बनाते है हमारी उम्र ही हमारा अनुभव सुनाती है। कहानियां गढ़ती हैं मगर कैसे?
इन बीच की धाराओं में जीवन की किन झलकियों को मान्य रखा जायेगा के दरमियां ही जीवन झूलता है। क्या बोले और क्या बोलने से पहले रूके की परतों में वज़न बड़ता जाता है।
राकेश
शायद जो अपने कब्जे की या कन्ट्रोल की पकड़ नहीं है तो उसे क्यों चुनते हैं लोग? क्या ऐसी जगह या सपनों की दुनिया सजाने का कोई खासा परमीट हमारे पास होता है?
एक जगह यानी जमीन का टुकड़ा जिसे सत्ता माप डण्डों के जरिये देखती है। या तो सब से नीचे का करार करती है या सबसे ऊपर का लेकिन बीच का कहां है ये ही सब की नज़र से औझल रहता है या रखा जाता है। वो उसे ही पता होता है जो उस जमीन के टुकड़े पर समय का एक लम्बा आकार तैय्यार कर देता है। हर तरह का जोखिम और कठिनाइयां को हर हाल में अपनाता है।
जब हमारे आगे कोई प्रहार होता है तो हम उस प्रहार के आसपास से ही उससे लड़ने का औजार ढूंढ लेते हैं। ताकी जो भाषा हम से लड़ रही है उस से टकराने के लिये लोहा ले सके। क्योंकि समाजिक ज़िन्दगी कहती है कि लोहा ही लोहे को काटता है। अगर मैं कहना चाहूं की तोड़ने वाली भाषा को तोड़ने वाली भाषा ही टक्कर दे सकती है तो इस लाईन के विरुध आप की क्या सलाह होगी?
समाज जिससे अलग हुये शख़्स जो अपना कोना बना कर खुद अपने जीने की वजहों को बना रहे हैं। जिनका समाज में आने से पहले कोई गणित नहीं बनता और ना ही कोई कल्पना बनती। इसके बावजुद भी एक परिक्रिया बनी एक अजब कल्पना जन्म लेती है। जो समाज अपने बहिखातों में तब ही दर्ज करता है जब उस शख़्स की आधी ज़िन्दगी ये बताते बताते बीत जाती है की उसकी सोच और विचारों कि भी दुनिया है। जिसका आधार वो खुद है। जो अपने वज़ूद से ताल्लुक रखता है। मौज़ूदगी को बयां करता है। इन्सान क्या है? जीवन और जड़ में इन के बीच जीने का वर्णन देना और बदलावों की परिभाषायों को तलाशते और बनाते है हमारी उम्र ही हमारा अनुभव सुनाती है। कहानियां गढ़ती हैं मगर कैसे?
इन बीच की धाराओं में जीवन की किन झलकियों को मान्य रखा जायेगा के दरमियां ही जीवन झूलता है। क्या बोले और क्या बोलने से पहले रूके की परतों में वज़न बड़ता जाता है।
राकेश
Wednesday, December 19, 2012
बहुत समय लगता है
कहीं का हो जाना कैसे जीने की कोशिश करता है। ऐसा जैसे किसी भूमण्डलिये अंधी फोर्स के सामने खड़े हैं और वे जितना अपनी और खींचती है उतना ही पीछे की ओर धकेलती है। उसके सामने खड़े रहने पर कुछ नहीं दिखता। बस, कुछ आकृतियां बनती है और झट से गायब हो जा रही है। कोई धूंधली परत उन्हे अपने कब्जे मे ले रही है। मैं उसके सामने से रोज़ निकल जाता रहा हूँ। कोई डर मुझे उसके अन्दर दाखिल नहीं होने देता। ये डर उसके भीतर घूसने का नहीं है। किसी ने जैसे मेरे पांव पकड़े हुए हैं। रोज वहां से गुजरता, लोगों को उसके अन्दर खोते हुये देखता। पहचानने की कोशिश करता। कोई पहचान में नहीं आता।
मैं उसके अन्दर दाखिल हो गया। मेरे आसपास एक भीड़ की गरमाहट महसूस हो रही थी। कोई नहीं दिख रहा था अब भी। मगर गरमाहट इतनी थी के उसको अहसास किया जा सकता था। जब बाहर निकला तो कई लोग उसके अन्दर दाखिल होने को तैयार खड़े थे। मुझे देख रहे थे। वैसे ही जैसे मैं देखता था। मेरा रंग बदल गया था। मुझपर कुछ और चड़ा था। मैं जैसे खुद को पहचान नहीं पा रहा था। कुछ समय लगा मुझे उसमे से बाहर निकलने मे। मगर बहुत समय लगा मुझे वापस "मैं" बनने में। मैं कुछ समय के लिये कुछ और बन गया पर वो कुछ और मैं कभी नहीं बन पाया।
रास्तों की बुनाई मे सफ़रों को याद रखने की खुटियां नहीं गड़ी होती। वे बह जाने के लिये बनते हैं। कोई उनपर कैसे चल रहा है या कोई उनपर कहां है का रहस्य निरंतर बना रहता है। कभी किसी को मुड़ने पर विवश करते हैं तो कभी किसी को उड़ान में ले जाने को।
यहां कौन क्या है और कौन, कौन है के सवाल बेमायने रूप मे हैं। बस, मैं किसे अपने करीब खींच रहा है और किसके करीब खिंच रहा हूँ का जादू बेमिशाल होकर चलता है। ये अस्पष्टता जीवन को उन रास्तों सा बना देती है जो अपने हर कटाव पर एक दुनिया की झलक देता है। जहां पर रहस्य, अपरिचित, बेचिंहित जीवन की उपाधि पाने की कोशिशों के बाहर होने की फिराक में चलते हैं। उस बहकने के साथ जिनका मानना है कि घेरो के बाहर का जीवन जिन्दगी को उत्पन्नित बनाता है।
हर कोई ये कोशिकाएँ उधार ले रहा हो जैसे। वो अनोखी दुनिया इन टूटी हुई जीवित कोशिकाओं से भरी हुई हैं। वे जो हर वक़्त सक्रिये है - एक दूसरे को इज़ात कर रही है। बिना याद्दास्त के बन रही है। जन्म, मौत फिर से जन्म लेना और फिर से मौत – इस साइकिल से वे दूर हो जाती जा रही है।
रास्ते वे नहीं है जो कहीं ले जाते हैं, वे नहीं है जो बाहर हैं, वे नहीं है जो दिखते हैं, वे नहीं है जो मंजिल के लिये बने हैं, वे नहीं है जो नक्शे मे कनेक्शन से दिखते हैं, वे नहीं है जो जुडाव के लिये बने है। वे इनविज़िवल लाइनें है। रंग, लिबास, कहानियां जो अनुभव जाल से बाहर की है, अभिव्यक़्तियां और इशारें। सब कुछ पल भर के अहसास मे जीते हैं और फिर रंग बदल लेते हैं। जीवन की कल्पना इनसे उधार ली गई रंगत है। इसका कोई ठिकाना नहीं है, जैसे हवा के झोकों मे ये मिक्स होकर चलती है। इस हवा के झोकों के साथ जाना जीवंत रहता है।
लख्मी
मैं उसके अन्दर दाखिल हो गया। मेरे आसपास एक भीड़ की गरमाहट महसूस हो रही थी। कोई नहीं दिख रहा था अब भी। मगर गरमाहट इतनी थी के उसको अहसास किया जा सकता था। जब बाहर निकला तो कई लोग उसके अन्दर दाखिल होने को तैयार खड़े थे। मुझे देख रहे थे। वैसे ही जैसे मैं देखता था। मेरा रंग बदल गया था। मुझपर कुछ और चड़ा था। मैं जैसे खुद को पहचान नहीं पा रहा था। कुछ समय लगा मुझे उसमे से बाहर निकलने मे। मगर बहुत समय लगा मुझे वापस "मैं" बनने में। मैं कुछ समय के लिये कुछ और बन गया पर वो कुछ और मैं कभी नहीं बन पाया।
रास्तों की बुनाई मे सफ़रों को याद रखने की खुटियां नहीं गड़ी होती। वे बह जाने के लिये बनते हैं। कोई उनपर कैसे चल रहा है या कोई उनपर कहां है का रहस्य निरंतर बना रहता है। कभी किसी को मुड़ने पर विवश करते हैं तो कभी किसी को उड़ान में ले जाने को।
यहां कौन क्या है और कौन, कौन है के सवाल बेमायने रूप मे हैं। बस, मैं किसे अपने करीब खींच रहा है और किसके करीब खिंच रहा हूँ का जादू बेमिशाल होकर चलता है। ये अस्पष्टता जीवन को उन रास्तों सा बना देती है जो अपने हर कटाव पर एक दुनिया की झलक देता है। जहां पर रहस्य, अपरिचित, बेचिंहित जीवन की उपाधि पाने की कोशिशों के बाहर होने की फिराक में चलते हैं। उस बहकने के साथ जिनका मानना है कि घेरो के बाहर का जीवन जिन्दगी को उत्पन्नित बनाता है।
हर कोई ये कोशिकाएँ उधार ले रहा हो जैसे। वो अनोखी दुनिया इन टूटी हुई जीवित कोशिकाओं से भरी हुई हैं। वे जो हर वक़्त सक्रिये है - एक दूसरे को इज़ात कर रही है। बिना याद्दास्त के बन रही है। जन्म, मौत फिर से जन्म लेना और फिर से मौत – इस साइकिल से वे दूर हो जाती जा रही है।
रास्ते वे नहीं है जो कहीं ले जाते हैं, वे नहीं है जो बाहर हैं, वे नहीं है जो दिखते हैं, वे नहीं है जो मंजिल के लिये बने हैं, वे नहीं है जो नक्शे मे कनेक्शन से दिखते हैं, वे नहीं है जो जुडाव के लिये बने है। वे इनविज़िवल लाइनें है। रंग, लिबास, कहानियां जो अनुभव जाल से बाहर की है, अभिव्यक़्तियां और इशारें। सब कुछ पल भर के अहसास मे जीते हैं और फिर रंग बदल लेते हैं। जीवन की कल्पना इनसे उधार ली गई रंगत है। इसका कोई ठिकाना नहीं है, जैसे हवा के झोकों मे ये मिक्स होकर चलती है। इस हवा के झोकों के साथ जाना जीवंत रहता है।
लख्मी
Thursday, September 27, 2012
Wednesday, May 23, 2012
छत पर सोया एक रात
आज तुम लोगों के साथ साझा करने के लिए एक अजीब कहानी बता रहा हूँ।
वह एक घटना है जिसें मैं वास्तव में किसी समय इस बारे में नहीं सोच पाया था। लेकिन मेरा पहला असाधारण अनूभव की छाया में कई व्यक्ति शामिल हैं। छाया जिसे लोग एक रूप में व आमतौर पर जानते हैं। जो इन पारदर्शी अंधेरे के प्राणियों ( यह शब्द मैं इसलिये इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि मैं सिर्फ इंसानों की ही बातें नहीं करना चाहता) यानि सभी में दिखाई देते हैं और अनेक ढंग से गायब होने के लिए इसे छाया कहा जाता है।
चेहरे चाहे ताबें के हो या मास के वो असल में सुविधाओं के अभाव के जरिये, ज्यादातर लोगों एक दूसरे से परिचित करवाते हैं। व्यक्तिगत रूप से मेरे एक या दो दोस्त है। मेरी रोजमर्रा मे मिले इन लोगों को किसी भी कारण इस बारे में नहीं पता की मुझसे सच –झूठ तकाजा नहीं किया जाता। उन्होंने एक बार मुझे बताया है। इन छाया प्राणियों द्वारा सजाया जा रहा माहौल, कभी कभी घर से बाहर प्रकाश को स्वीकार करने को कहता है।
एक कोने में एक दूसरे विभाजन के लिए दिखाई देती लाइनें है। काफी सारी, आड़ी तेड़ी, कुछ दीवार पर गड़ी हुई है तो कुछ खुरचने से बनी है। घर की दूसरी मंजिल पर सोने के लिए दीवार का इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह मंजिल छत के आँगन और एक बाथरूम के लिए उपयोग की जाती है। हम सभी फर्श पर गद्दे पर सोए हुए थे। हमें पूरे फर्श की जमीन आँख के स्तर के मुताबित दृश्य दे रही थी। बाथरूम शायद बहुत छोटा है। पानी का गिलास रखा दिखाई दिया। गिलास मे एक दाग दिखाई दे रहा है। साथ ही एक खिड़की या अंदर यह सूर्य के प्रकाश की चांदनी है। जिसका कोई एक दरवाजा नहीं था। इसलिए हम अपनी गोपनियता को छुपाने की कोशिश में एक पर्दा चौखट मे डाल दिया करते थे।
एक रात वहाँ लग रहा था कि सोना मुश्किल हो सकता है। बाकी सब सो रहे थे और केवल चांद का प्रकाश गिर रहा है। मुझे याद है शहर का प्रकाश और चांदनी यह वास्तव में एक किसी के लिये बैक लाइट की तरह है। उसके प्रभाव के कारण होता है। जैसे चांदनीरात .... "दरवाजा" एक प्रोजेक्शन स्क्रीन के रूप में अभिनय करता है। दीवार पर फोकस बनाता है। किसी छाया को वो चांदनी की वजह छत की दीवारों पर बिखेर देता है। और फिर सपाट पर्दे पर वे झलक नाचने लगती है। वास्तव में सुबह जल्दी से या देर रात में सोया था। मैं वहाँ बैठा हूँ।| आँखों में आश्चर्य है। फिर अचानक किसी बहस ने ध्यान को पकड़ा। गली के अंदर से किसी के तेज चिल्लाने की आवाजों ने रात को परेशान कर दिया था। शायद यही आवाज़ दिन मे अगर होती तो कभी अपनी ओर ध्यान नहीं खींचती। नीचे गहमागहमी और ऊपर छाया का आंदोलन जारी था। ध्यान अगर उसपर से हट जाये तो वे जैसे कि बदल गया हो, जो पहले था वो सब कुछ अब नहीं था।
मैं गिरती छाया को देखे जा रहा हूँ। वो क्या है उसे सोचे जा रहा हूँ। कुछ देर तो समझ मे नहीं आया की क्यों। वो कभी कोई लड़की सी बन जाती तो कभी किसी जानवर की तरह। मगर ऐसा लगता जैसे वो नाच रही है। हवा के संगीत पत झूम रही है और अचानक ही गायब हो जाती है। मैं उसे देख सोच रहा हूँ "ठीक है, यह शायद सिर्फ परछाई बन चलती हवा के साथ कहीं उड़ जायेगी।
इस बिंदु पर अपनी आँखें बंद सोने की कोशिश करता तो अचानक फिर से इसी नाच के आंदोलन मे फंस जाता। इस समय कोई पर्दा नहीं, मैं ये खुद को मनाने लगता हूँ। छाया चलती है तो मैं स्थिर रहता हूँ। मैं पर्दे कि ओर देख रहा रहा हूँ तो कुछ ही सेकंड के भीतर मुझे कुछ भी पर्याप्त नहीं होता। यकीनन मेरी दृष्टि पर मेरा खुद का ध्यान केंद्रित नहीं है।
कुछ ही समय के बाद में पूर्णरूप से ये अहसास होने लगा था की छत पर सोना नामुमकिन है मेरे लिये।
राकेश
वह एक घटना है जिसें मैं वास्तव में किसी समय इस बारे में नहीं सोच पाया था। लेकिन मेरा पहला असाधारण अनूभव की छाया में कई व्यक्ति शामिल हैं। छाया जिसे लोग एक रूप में व आमतौर पर जानते हैं। जो इन पारदर्शी अंधेरे के प्राणियों ( यह शब्द मैं इसलिये इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि मैं सिर्फ इंसानों की ही बातें नहीं करना चाहता) यानि सभी में दिखाई देते हैं और अनेक ढंग से गायब होने के लिए इसे छाया कहा जाता है।
चेहरे चाहे ताबें के हो या मास के वो असल में सुविधाओं के अभाव के जरिये, ज्यादातर लोगों एक दूसरे से परिचित करवाते हैं। व्यक्तिगत रूप से मेरे एक या दो दोस्त है। मेरी रोजमर्रा मे मिले इन लोगों को किसी भी कारण इस बारे में नहीं पता की मुझसे सच –झूठ तकाजा नहीं किया जाता। उन्होंने एक बार मुझे बताया है। इन छाया प्राणियों द्वारा सजाया जा रहा माहौल, कभी कभी घर से बाहर प्रकाश को स्वीकार करने को कहता है।
एक कोने में एक दूसरे विभाजन के लिए दिखाई देती लाइनें है। काफी सारी, आड़ी तेड़ी, कुछ दीवार पर गड़ी हुई है तो कुछ खुरचने से बनी है। घर की दूसरी मंजिल पर सोने के लिए दीवार का इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह मंजिल छत के आँगन और एक बाथरूम के लिए उपयोग की जाती है। हम सभी फर्श पर गद्दे पर सोए हुए थे। हमें पूरे फर्श की जमीन आँख के स्तर के मुताबित दृश्य दे रही थी। बाथरूम शायद बहुत छोटा है। पानी का गिलास रखा दिखाई दिया। गिलास मे एक दाग दिखाई दे रहा है। साथ ही एक खिड़की या अंदर यह सूर्य के प्रकाश की चांदनी है। जिसका कोई एक दरवाजा नहीं था। इसलिए हम अपनी गोपनियता को छुपाने की कोशिश में एक पर्दा चौखट मे डाल दिया करते थे।
एक रात वहाँ लग रहा था कि सोना मुश्किल हो सकता है। बाकी सब सो रहे थे और केवल चांद का प्रकाश गिर रहा है। मुझे याद है शहर का प्रकाश और चांदनी यह वास्तव में एक किसी के लिये बैक लाइट की तरह है। उसके प्रभाव के कारण होता है। जैसे चांदनीरात .... "दरवाजा" एक प्रोजेक्शन स्क्रीन के रूप में अभिनय करता है। दीवार पर फोकस बनाता है। किसी छाया को वो चांदनी की वजह छत की दीवारों पर बिखेर देता है। और फिर सपाट पर्दे पर वे झलक नाचने लगती है। वास्तव में सुबह जल्दी से या देर रात में सोया था। मैं वहाँ बैठा हूँ।| आँखों में आश्चर्य है। फिर अचानक किसी बहस ने ध्यान को पकड़ा। गली के अंदर से किसी के तेज चिल्लाने की आवाजों ने रात को परेशान कर दिया था। शायद यही आवाज़ दिन मे अगर होती तो कभी अपनी ओर ध्यान नहीं खींचती। नीचे गहमागहमी और ऊपर छाया का आंदोलन जारी था। ध्यान अगर उसपर से हट जाये तो वे जैसे कि बदल गया हो, जो पहले था वो सब कुछ अब नहीं था।
मैं गिरती छाया को देखे जा रहा हूँ। वो क्या है उसे सोचे जा रहा हूँ। कुछ देर तो समझ मे नहीं आया की क्यों। वो कभी कोई लड़की सी बन जाती तो कभी किसी जानवर की तरह। मगर ऐसा लगता जैसे वो नाच रही है। हवा के संगीत पत झूम रही है और अचानक ही गायब हो जाती है। मैं उसे देख सोच रहा हूँ "ठीक है, यह शायद सिर्फ परछाई बन चलती हवा के साथ कहीं उड़ जायेगी।
इस बिंदु पर अपनी आँखें बंद सोने की कोशिश करता तो अचानक फिर से इसी नाच के आंदोलन मे फंस जाता। इस समय कोई पर्दा नहीं, मैं ये खुद को मनाने लगता हूँ। छाया चलती है तो मैं स्थिर रहता हूँ। मैं पर्दे कि ओर देख रहा रहा हूँ तो कुछ ही सेकंड के भीतर मुझे कुछ भी पर्याप्त नहीं होता। यकीनन मेरी दृष्टि पर मेरा खुद का ध्यान केंद्रित नहीं है।
कुछ ही समय के बाद में पूर्णरूप से ये अहसास होने लगा था की छत पर सोना नामुमकिन है मेरे लिये।
राकेश
Wednesday, April 4, 2012
सम्मुखत्ता की विरूधत्ता
01
कल्पना की दुनिया में जाने की राह मचलते दृश्य के सामने खड़े होने के समान है। जो उन्माद मे है, उसके सम्मुख खड़े होना - विचारने और ठहराव की प्रत्येक चौहदियों के विरूध हो जाना है। लकीरों के बिना मगर कुछ परछाइयां बनाते हुये। भटके हुए राहगीर की तरह जो रेगिस्तान में कुछ देर खड़ा हो उसके सपाट होने में अपने मन को जीने के ठिकाने बनाने लगा है। जिसका मानना है कि यहीं पर वो है जिसे वे देख सकता है। किसी नई दुनिया की नीव पर सारी धाराएं वापस लौटने को तैयार हो जैसे। उन तरंगो की भांति जिसका किनारा तय है लेकिन उस बीच उसके मचलने की कोई सीमा नहीं।
02
तरंगे किसी जाल की तरह असंख्यता मे हैं, छोटी व अधूरी- एक दूसरे मे गुथी, पानी को लहरिया बनाने मे सक्षम होने को भूखी रहती हो जैसे। असंख्य इनके भीतर है, मगर अंत तक जाने की चेष्ठा के बिना। एकल होना सिमटे हुए से बाहर है। एकांत और असंख्य के बीच खड़े किसी बिम्ब की भांति। ध्वनियां उसके भीतर से निकलती हैं, निरंतर और चीखती हुई - उसे बिखेर देने के लिये।
03
सरफस के नामौजूद होने की बैचेनी हवा के किसी झोंके पर ले जाती हो जैसे। जिसका छोर वहां पहुँच जाने वाले के लिये भी शायद किसी बेतालादर की तरह हो। कौन निकला था घर से, कौन था रास्ते में और कौन पहूँच पाया वहां- ये किसी एक से रूबरू होने जैसा नहीं है शायद। किसी पके पत्ता के उस हिचकोले खाते समय को बोलने जैसा जो इस नामौजूद सरफस पर झूल रहा है।
04
किसी भीड़ के भीतर खड़ा होना, और उसपर अपनी निगाह को बार – बार लाना जो असपष्ट है मगर शायद इसलिये क्योंकि कोई निगाह उस तक नहीं पहुंच सकती। जैसे कोई अपने अनुमान को अपने भ्रम में से जोड़ जीने के लिये निकला हो। किसी तह की गई चीज़ की तरह – जिसकी हर तह के खुलने और बंद होने की चाहत पर एक अस्पष्टता की गहनता का अहसास होता है। स्वयं के दाव पर लगाने के चैलेंज से समय के टूकड़ों को जीवंत्ता में बदल रहा हो। उस शरीर को कैसे पकड़कर पायेगे जो किसी झूले की तरह है, जो हर चक्कर में वापस आता है मगर किसी नई रफ्तार और फोर्स के साथ। स्वयं से समझोता, स्वय के साथ डिमांड़ मे रहने की ज़द्दोज़हाद है। ये कैसे जान पाओगें की बराबर मे चलना और साथ में चलने मे क्या फर्क है?
05
गहराई से आती सांसे कभी जोश मे उठ पड़ रही है तो कभी आसमान से गिरती ओस पानी की सतह पर अपनी छाया की परत से उसे शंक्खिये बना रही है।
उन्होनें आखिरी पन्ने पर लिखा था। जिसे सबने तकरीबन एक बार तो पढ़ा ही होगा। पढ़ने वाला एक बार तो उसे शंक्ख की तरह उसे अपने होठों तक लाया होगा। कई आड़ी तेड़ी लकीरों के बीच में मुड़ी पड़ी ये दुनिया, दास्तान, ज़ज्बात, बात या कल्पना की ये बिखेरी हुई दुनिया का कोई किनारा नहीं। शायद डायरी को पढ़ते रहने वाले इसके आगे के पन्नों को पढ़ने के लिये एक तस्वीर तो बनाई होगी की शायद, इसका किनारा जरूर होगा। शायद, ये बंदा कुछ गा रहा होगा। शायद, इसमे दिल मे कुछ रहा होगा। शायद, इसके पास से कोई होकर गया होगा।
लख्मी
कल्पना की दुनिया में जाने की राह मचलते दृश्य के सामने खड़े होने के समान है। जो उन्माद मे है, उसके सम्मुख खड़े होना - विचारने और ठहराव की प्रत्येक चौहदियों के विरूध हो जाना है। लकीरों के बिना मगर कुछ परछाइयां बनाते हुये। भटके हुए राहगीर की तरह जो रेगिस्तान में कुछ देर खड़ा हो उसके सपाट होने में अपने मन को जीने के ठिकाने बनाने लगा है। जिसका मानना है कि यहीं पर वो है जिसे वे देख सकता है। किसी नई दुनिया की नीव पर सारी धाराएं वापस लौटने को तैयार हो जैसे। उन तरंगो की भांति जिसका किनारा तय है लेकिन उस बीच उसके मचलने की कोई सीमा नहीं।
02
तरंगे किसी जाल की तरह असंख्यता मे हैं, छोटी व अधूरी- एक दूसरे मे गुथी, पानी को लहरिया बनाने मे सक्षम होने को भूखी रहती हो जैसे। असंख्य इनके भीतर है, मगर अंत तक जाने की चेष्ठा के बिना। एकल होना सिमटे हुए से बाहर है। एकांत और असंख्य के बीच खड़े किसी बिम्ब की भांति। ध्वनियां उसके भीतर से निकलती हैं, निरंतर और चीखती हुई - उसे बिखेर देने के लिये।
03
सरफस के नामौजूद होने की बैचेनी हवा के किसी झोंके पर ले जाती हो जैसे। जिसका छोर वहां पहुँच जाने वाले के लिये भी शायद किसी बेतालादर की तरह हो। कौन निकला था घर से, कौन था रास्ते में और कौन पहूँच पाया वहां- ये किसी एक से रूबरू होने जैसा नहीं है शायद। किसी पके पत्ता के उस हिचकोले खाते समय को बोलने जैसा जो इस नामौजूद सरफस पर झूल रहा है।
04
किसी भीड़ के भीतर खड़ा होना, और उसपर अपनी निगाह को बार – बार लाना जो असपष्ट है मगर शायद इसलिये क्योंकि कोई निगाह उस तक नहीं पहुंच सकती। जैसे कोई अपने अनुमान को अपने भ्रम में से जोड़ जीने के लिये निकला हो। किसी तह की गई चीज़ की तरह – जिसकी हर तह के खुलने और बंद होने की चाहत पर एक अस्पष्टता की गहनता का अहसास होता है। स्वयं के दाव पर लगाने के चैलेंज से समय के टूकड़ों को जीवंत्ता में बदल रहा हो। उस शरीर को कैसे पकड़कर पायेगे जो किसी झूले की तरह है, जो हर चक्कर में वापस आता है मगर किसी नई रफ्तार और फोर्स के साथ। स्वयं से समझोता, स्वय के साथ डिमांड़ मे रहने की ज़द्दोज़हाद है। ये कैसे जान पाओगें की बराबर मे चलना और साथ में चलने मे क्या फर्क है?
05
गहराई से आती सांसे कभी जोश मे उठ पड़ रही है तो कभी आसमान से गिरती ओस पानी की सतह पर अपनी छाया की परत से उसे शंक्खिये बना रही है।
उन्होनें आखिरी पन्ने पर लिखा था। जिसे सबने तकरीबन एक बार तो पढ़ा ही होगा। पढ़ने वाला एक बार तो उसे शंक्ख की तरह उसे अपने होठों तक लाया होगा। कई आड़ी तेड़ी लकीरों के बीच में मुड़ी पड़ी ये दुनिया, दास्तान, ज़ज्बात, बात या कल्पना की ये बिखेरी हुई दुनिया का कोई किनारा नहीं। शायद डायरी को पढ़ते रहने वाले इसके आगे के पन्नों को पढ़ने के लिये एक तस्वीर तो बनाई होगी की शायद, इसका किनारा जरूर होगा। शायद, ये बंदा कुछ गा रहा होगा। शायद, इसमे दिल मे कुछ रहा होगा। शायद, इसके पास से कोई होकर गया होगा।
लख्मी
Thursday, March 29, 2012
Friday, March 16, 2012
Thursday, January 19, 2012
गुमनाम खत - पेज 02
अब तक इस ख़त की लाइनों में जीवित सांसो को महसूस करने की भूख मेरे शरीर को हिलाने लगी थी। जैसे आर्लम लगाये समय सांसो के साथ डांस कर रहा हो। मन हुआ इसे यहीं बन्द करदूं, फिर सोचा की मैं क्यों ना पढूँ इसे? इसलिये की मैं इसमे डूबना नहीं चाहता था या इसलिये की मैं किसी के इतने निजी मे आज तक गया नहीं था या फिर मुझे निजी होने मे घबराहटें थी।
कितने झोल मे जिन्दगी बसर करती है अपने उन सभी रिद्दमों से जो उसे हर भाव से रूबरू करवाते हैं। झोल जिन्दगी के नमूने हैं जिनसे रात और दिन के खेल का अंत होता है। झोल – किसी को वो नहीं रहने देते जैसा वो दिखता है या उसे कोई जैसे देखना चाहता है। ये उसके होने मे बसा है। एक पल को तो लगा की ये दास्तान या बोल मेरे ही घर के किसी छुपे कोने से है। लेकिन एक पल मे जब मेरे झोल खुलने लगे तो मैंने इससे दूरी बना ली और कट्टर बन उसे कोसने लगा जिसे मैं जानता ही नहीं हूँ। मैं ही क्या ऐसा कोई भी करता। अकेले मे नजदीक और भीड़ में सामुहिक हो जाने के खेल आसान और समझदारी वाला है इसे कौन नहीं खेलना जानता?
एक पूरी रात तुम्हारी हर बात को याद करके मैं खूब हसं रही थी। तुम्हारे उस कुएँ वाले किस्से को याद करके जब तुम अपने घर से साबून की छोटी सी टिकिया चुराकर नहाने गई थी और अपनी सारी सहेलियों से तुमने उस साबून को छुपाया हुआ था। तुम्हारे लिये वो बहुत महंगा साबून जो था। तुम्हारी बहन ने वो खुद के लिये खरीदा था। मगर तुम्हे उसके सफेद रंग से प्यार हो गया था। तुम भी ना अम्मा! पागल ही थी। कुएँ का पानी बहुत ठंडा था और तुम्हे नहाने की जल्दी थी। जल्दी जल्दी के चक्कर मे तुमसे वो साबून फिसलकर कुएँ के किनारे बनी एक पोखर मे गिर गया था। एक पल को वो तुम्हारे परेशान होना और एक पल के लिये तुम्हारा वो खुश होना दोनों मेरे समझ से बाहर था। लेकिन मुझे हंसी ही आए चली जा रही थी। उस पोखर मे तुम उतरी और उस साबून को निकालने लगी, बहुत ढूंढा था तुमने लेकिन वो मिला नही। तकरीबन 2 घंडा ढूंढने के बाद भी वो जब नहीं मिला तो तुम चुपचाप चली आई। घर मे ऐसे रही जैसे तुमने कुछ किया ही नहीं। ये सब तो ठीक था मगर तुम तो दूसरे दिन भी उस पोखर मे घूस गई थी उसे ढूंढने के लिये। क्या अम्मा तुम ना सच ही में पागल ही थी। भला वो मिलता तुम्हे? गल नहीं गया होगा, ये भी नहीं सोचा था तुमने।
उस लोटे पर किसी का नाम लिखा था क्या अम्मा जिसे तुम रोज देखती थी? मैं पूछ नहीं रही बस, ऐसे ही जानना चाहती हूँ।
तुम्हारा वो कमरा जिसकी दिवारों पर बस तुम्हारे लिखे कुछ अक्षर ही दिखाई देते थे। आड़े तेड़े, अधूरे, मिटाये हुए, एक के ऊपर दूसरे को चड़ाये हुए सारे शब्द ही थे। मगर किसी का नाम नहीं था। वो शब्द मुझे कभी समझ मे नहीं आये थे। वो क्या तुम्हे पसंद नहीं थे, पसंद थे, सुने थे, तुम्हे चिड़ाते थे, डराते थे या तुमने अपने कमरे को अपने लिये एक किताब बनाया हुआ था जिसे तुम ही लिखती थी और तुम ही पढ़ती थी। इतना शौर था तुम्हारे उस कमरे में आज भी है, बस दिवारें सपाट रही है, मुझे पता है क्यों - मगर उन सफेद पुती दिवारों के पीछे वो शब्द चिल्लाते हैं मैंने उनकी आवाज सुनी है। मैंने अपने कमरे को, वो आवाज सुनने वाला बनाने की बहुत कोशिश की लेकिन बना नहीं पाई। मैंने भी अपने कमरे को बोलने वाला बना दिया था। तुम एक पल भी उस कमरे मे रुक नहीं पाई थी। लगता था जैसे तुमने उसे अपना लिया है। तभी दूरी बना ली थी। मैं तुममे खुद को देख रही थी। शायद ये मेरी गलती है।
मैंने अपने दोस्तो के बीच में एक बार इस कमरे का जिक्र किया था। वो आपको प्यार मे डूबी और दुखी होने के ही बारे मे कहते रहे, शायद इससे ज्यादा वो समझ नहीं सकते थे। दोस्ती, प्यार और अफ्येर के बीच के फासले को वो शायद कभी समझ नहीं सकते थे। तीनों मे होती बातें, हरकतें, आदतें, डूबना एक ही तरह से होता है मगर अहसास का फासला इसमे महीन सी दूरी बनाता है वो शायद इनसे अंजान है।
मैं तुम तक पहुँचना चाहती थी, इसलिये इन सब को समझने की कोशिश मे थी। बैचेनी, तड़प, लरक इनका वास्ता जब जीवन से पड़ता है तब ये बदलती है, नहीं तो समझने का फासला बन नहीं पाता। ये मेरे दोस्तों के पास मे नहीं था। सच कहूँ, मेरे किसी दोस्त ने मुझे तुम तक पहुँचाने का रास्ता नहीं दिखाया था। ये मैंने खुद चुना।
लख्मी
कितने झोल मे जिन्दगी बसर करती है अपने उन सभी रिद्दमों से जो उसे हर भाव से रूबरू करवाते हैं। झोल जिन्दगी के नमूने हैं जिनसे रात और दिन के खेल का अंत होता है। झोल – किसी को वो नहीं रहने देते जैसा वो दिखता है या उसे कोई जैसे देखना चाहता है। ये उसके होने मे बसा है। एक पल को तो लगा की ये दास्तान या बोल मेरे ही घर के किसी छुपे कोने से है। लेकिन एक पल मे जब मेरे झोल खुलने लगे तो मैंने इससे दूरी बना ली और कट्टर बन उसे कोसने लगा जिसे मैं जानता ही नहीं हूँ। मैं ही क्या ऐसा कोई भी करता। अकेले मे नजदीक और भीड़ में सामुहिक हो जाने के खेल आसान और समझदारी वाला है इसे कौन नहीं खेलना जानता?
एक पूरी रात तुम्हारी हर बात को याद करके मैं खूब हसं रही थी। तुम्हारे उस कुएँ वाले किस्से को याद करके जब तुम अपने घर से साबून की छोटी सी टिकिया चुराकर नहाने गई थी और अपनी सारी सहेलियों से तुमने उस साबून को छुपाया हुआ था। तुम्हारे लिये वो बहुत महंगा साबून जो था। तुम्हारी बहन ने वो खुद के लिये खरीदा था। मगर तुम्हे उसके सफेद रंग से प्यार हो गया था। तुम भी ना अम्मा! पागल ही थी। कुएँ का पानी बहुत ठंडा था और तुम्हे नहाने की जल्दी थी। जल्दी जल्दी के चक्कर मे तुमसे वो साबून फिसलकर कुएँ के किनारे बनी एक पोखर मे गिर गया था। एक पल को वो तुम्हारे परेशान होना और एक पल के लिये तुम्हारा वो खुश होना दोनों मेरे समझ से बाहर था। लेकिन मुझे हंसी ही आए चली जा रही थी। उस पोखर मे तुम उतरी और उस साबून को निकालने लगी, बहुत ढूंढा था तुमने लेकिन वो मिला नही। तकरीबन 2 घंडा ढूंढने के बाद भी वो जब नहीं मिला तो तुम चुपचाप चली आई। घर मे ऐसे रही जैसे तुमने कुछ किया ही नहीं। ये सब तो ठीक था मगर तुम तो दूसरे दिन भी उस पोखर मे घूस गई थी उसे ढूंढने के लिये। क्या अम्मा तुम ना सच ही में पागल ही थी। भला वो मिलता तुम्हे? गल नहीं गया होगा, ये भी नहीं सोचा था तुमने।
उस लोटे पर किसी का नाम लिखा था क्या अम्मा जिसे तुम रोज देखती थी? मैं पूछ नहीं रही बस, ऐसे ही जानना चाहती हूँ।
तुम्हारा वो कमरा जिसकी दिवारों पर बस तुम्हारे लिखे कुछ अक्षर ही दिखाई देते थे। आड़े तेड़े, अधूरे, मिटाये हुए, एक के ऊपर दूसरे को चड़ाये हुए सारे शब्द ही थे। मगर किसी का नाम नहीं था। वो शब्द मुझे कभी समझ मे नहीं आये थे। वो क्या तुम्हे पसंद नहीं थे, पसंद थे, सुने थे, तुम्हे चिड़ाते थे, डराते थे या तुमने अपने कमरे को अपने लिये एक किताब बनाया हुआ था जिसे तुम ही लिखती थी और तुम ही पढ़ती थी। इतना शौर था तुम्हारे उस कमरे में आज भी है, बस दिवारें सपाट रही है, मुझे पता है क्यों - मगर उन सफेद पुती दिवारों के पीछे वो शब्द चिल्लाते हैं मैंने उनकी आवाज सुनी है। मैंने अपने कमरे को, वो आवाज सुनने वाला बनाने की बहुत कोशिश की लेकिन बना नहीं पाई। मैंने भी अपने कमरे को बोलने वाला बना दिया था। तुम एक पल भी उस कमरे मे रुक नहीं पाई थी। लगता था जैसे तुमने उसे अपना लिया है। तभी दूरी बना ली थी। मैं तुममे खुद को देख रही थी। शायद ये मेरी गलती है।
मैंने अपने दोस्तो के बीच में एक बार इस कमरे का जिक्र किया था। वो आपको प्यार मे डूबी और दुखी होने के ही बारे मे कहते रहे, शायद इससे ज्यादा वो समझ नहीं सकते थे। दोस्ती, प्यार और अफ्येर के बीच के फासले को वो शायद कभी समझ नहीं सकते थे। तीनों मे होती बातें, हरकतें, आदतें, डूबना एक ही तरह से होता है मगर अहसास का फासला इसमे महीन सी दूरी बनाता है वो शायद इनसे अंजान है।
मैं तुम तक पहुँचना चाहती थी, इसलिये इन सब को समझने की कोशिश मे थी। बैचेनी, तड़प, लरक इनका वास्ता जब जीवन से पड़ता है तब ये बदलती है, नहीं तो समझने का फासला बन नहीं पाता। ये मेरे दोस्तों के पास मे नहीं था। सच कहूँ, मेरे किसी दोस्त ने मुझे तुम तक पहुँचाने का रास्ता नहीं दिखाया था। ये मैंने खुद चुना।
लख्मी
Tuesday, January 17, 2012
रिजर्व और स्ट्रीट
हम "आरक्षित" को कैसे देखते व पढ़ते हैं – कोर्नर, बस की सीट, नोकरी, जगह यहाँ तक की खाने की टेबल तक। ये किसी ऐसी अवस्था मे जाने के समान है जो अपने चिंह छोड़ने के जैसा नहीं है बल्कि चिंह गायब करने के समान है। "आरक्षित" का होना एक बहस को उत्पन करता है। एक उदाहरण देना चाहता हूँ - अगर कोई दो लोग ये जिद् करले की वो खोना चाहते हैं एक – दूसरे से तो ये कैसे साबित होगा की पहले कोन खोया? एक शख्स सड़क के किनारे मे नाई दुकान चलाते हैं। हर रोज़ वो अपने कांधे पर अपनी कुर्सी और नाई का समान लेकर आते हैं और शाम तक रहते हैं फिर चले जाते। वे अपने सामने वाली सड़क पर कभी किसी को रोजाना नहीं देखते। ऐसा कोई भी चेहरा नहीं होता जो रोज़ दिखता हो। यहाँ तक की उनकी दुकान पर भी हर रोज़ वो बन्दे नहीं आते जिन्हे उन्होनें पहले भी देखा हो। लेकिन इस पढ़ाई में वो ये भूल जाते हैं की वो कितनों को इस सड़क पर रोज़ दिखते होगें। इस गिनती मे वे हमेशा गायब होते हैं।
शहर को सोचते हुए ये तस्वीर हमेशा खुलती है कि शहर को सोचने वाला या रचते हुए देखने वाला खुद कहाँ होता है? मैं कई दिनों से बाहर घूम रहा हूँ। ये बाहर मेरे दायरे मे नहीं आता तो बाहर लगता है। सब कुछ ठहराव मे लगता है, ऐसा लगता है जैसे मैं खुद को ठहराव मे देखना चाहता हूँ। लेकिन क्यों? अपने को कोई जगह दिलानी है तो पूरे इलाके को सोचने से पहले लोगों को अपनी धारणा मे क्यों बसा लेता हूँ? इलाका, घर, काम और वो स्पेश जिसकी तलाश है वो सब 'मुताबिक' क्यों? सड़क का किनारा जहाँ पर मैं पढ़ रहा हूँ किसी को, कोई मुझे भी पढ़ रहा है।
"दृढ़ होना" मगर इसके विरूध में "लचीला होना" ) शहर इन दोनों के बिना जीता है। शहर असल में कुछ भी नहीं है। वे महज़ एक परछाई है जिस पर पड़ जाती है वैसा रंग ले लेती। शहर किसी का दिया हुआ नाम है?, लिबास हैं?, आधार हैं?, पता है? या शब्द हैं? ये शब्द कहाँ से आते हैं?
रफ्तार, रूकना, खड़ा रहना, स्टाफ, चुप्पी, मंच, बिका, निजी, शिफ्ट, होर्न, सावधानी, चेतावनी ये शब्द किसके हैं, किसके लिये, इनमें कोन हैं, किसकी आवाज़ में है?, किसके चेहरे हैं?, कोनसी जगहें हैं और क्या कल्पनाएँ हैं?
मैंने शहर को सोचने की कोशिश की "Reserve or Street” से। ये किस तरह से भिड़ंत में हैं? जहाँ शहर अनबेलेंस और अननोन बना रहता हैं वहीं पर "आरक्षित" का एक खेल है और पुख्ता है। लेकिन शहर जब हम बोलते हैं, सुनते हैं या देखते हैं तो कोई भी जगह जो खुद से रखी या बनाई जा रही है। वो स्थिर तो होती है लेकिन स्थित नहीं होती और शायद ये परत ही इसकी असली तस्वीर हैं। जैसे - आज जो है वे कल नहीं होगी ये तय नहीं होता? आज हो बना है कल वो ताज़ा होगा ये भी पक्का नहीं होता। इस रिदम में शहर के भीतर जीना और शहर के साथ जीना जीने लायक समा बाँधता चलता है। ये शायद शुरूआत है -
खुद के सन्नाटे को शोर मे बदलने की कोशिश की है। जब हम सन्नाटे को सोचते हैं तब 'Reserve' समझ मे आने लगता है। ये मांग मे क्यों हैं?, बहस मे क्यों है?, लड़ाई मे क्यों है? असल में ये खुद को दिखाने के समान है। लिबास को शख़्सियत बनाने की लड़ाई है।
एक मात्र अगर देखा जाये तो सिर्फ सड़क का किनारे शहर के बीच मे बेसहारा रहता है। ये किसी का नहीं है। वैसे हर किसी का है। यहाँ पर कुछ "आरक्षित" नहीं है। ये शोर में इजाफा करने के लिये भी है और शोर से लड़ने के लिये भी। मैंने "आरक्षित" को सोचते हुए खुद को रखा है। ये खेल भी हो सकता है और अपना आपा रख पाने के जैसा भी। एक सवाल दिमाग मे आया - क्या सड़क का किनारा हमको इतना उक्सा सकता है कि हम उसे अपनी कल्पना मे ले ले?
बोर्ड कोर्नर - शहर को पढ़ना ये कहाँ और कैसे उभरता है? अगर हम शहर के उन जगहों पर जहाँ बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते हैं वहाँ पर और किसी एक इलाके के मोड़ पर एक छाता और बुक सेल्फ लगा दिया जाये तो?
बस के अन्दर - सीटें हर रोज़ उठने - बैठने, नातों के कनेक्शन, छोटी मुलाकातों के अहसास और अजनबी कहानियों के जुड़ावों से भरी होती। बस जिनती भरी होगी उतनी वो सक्रिये होती है और सबसे नजदीक होती है उसकी सीट। लेकिन सबसे ज्यादा "आरक्षित" का अहसास उसी मे जुड़ा होता है। काश एक शहर ऐसा होता की घर से बाहर निकलते ही वे रिश्तों, कामो और अपने से दूर हो जाता। खो जाता। सीटों को अजनबियों के हवाले कर दिया जाये और एक इलैक्ट्रनिक बोर्ड ऐसा हो जो किसी रिड़िंग को सुना या पढ़वा रहा हो। एक कल्पना सफ़र की, मूव की और किसी के होने की।
कूड़े का खत्ता - सड़क का कोना जहाँ एक मात्र कहे तो जो दिखता है। वो है कूड़े का खत्ता। मेरे एक ने एक बार मुझे इवाइट किया था की अपने आफिस मे चाय पीने को। मैं जब उसके आफिस गया तो उसने और उसके कुछ साथियों के अपना आफिर बनाया था कूड़े के खत्ते के साथ मे एक किसी कमरे को साफ करके। ये देखकर मैं अटपटाया। हँसी भी आई लेकिन ये उस ओर ले जाने की कोशिश थी जो जगह को उसके भार से उतार देती है। एक ऐसी कल्पना मे ले जाती है जो उसको किन्ही और संभावनाओं मे ले जाये। ये एक ऐसा स्पेश है जो अवशेषों से बनता है। इस भार की भिड़ंत मे इसे कैसे सोचे? इसकी छत को ऐसी कल्पना में ले जाया जाये जो एक टेलीकास्ट और पेंटिंग की जगह बने। उस दूरी को नजदीकी लाने की कोशिश नहीं जो जगह से बल्कि उसे चूनौती देने के समान होगी।
स्ट्रीट बोर्ड - अगर कोई बीच सड़क पर जहाँ पर कोई किसी को नहीं सुनना चाहता या न कोई रूकना चाहता। वहाँ पर अगर कोई सुनाने का किनारा बना ले तो? ऐसा किनारा जो पारदर्शी नहीं है और न ही परदेदार है। उस स्पीड से टकराने के समान है जो रूकना नहीं जानती। खोये हुए को सुनना नहीं चाहती और खो जाने पा लुफ्त नहीं लेना जानती।
बिजली का खम्बा - दो अलग-अलग दूरी। गली, सड़क या किसी पार्क मे। खम्बों के बीच की जगह क्या करती है? खम्बा जो अपने नीचे मानले की अलग कहानी गढ़ता है। हर कहानी मे किरदार अलग-अलग होते हैं। उनकी दिनचर्या भिन्न होती है। लेकिन ये शहर की क्या तस्वीर है? क्या इसका कोई नाता है। मैं खुद को कई लोगों के बीच मे पाता हूँ। लेकिन भिन्न मगर जब किसी के सामने पाता हूँ तब लगता है की एक कोई महीम तार है जो खींचा है बीच मे। पर उसकी कोई निशानी नहीं है, आवाज नहीं है और न ही शायद उसका कोई जीवन है। मैंने सोचा की शहर के किन्ही दो खम्बों के बीच मे घंटियों की एक डोरी बांध दूँ। ये शोर जो दो अलग धाराओं को जोड़ता है। तब मेरी दोस्त ने कहा, “तुम सड़क के शोर में और इजाफा कर रहे हो या कुछ टकराव दे रहे हो?”
रेड लाइट - खाली रूकना ही नहीं है इसकी तस्वीर जाना भी है। लेकिन फिर भी इसे ठहराव के नाम से जाना और पहचान मे लाया जाता है। क्यों? जीवन रूकने और खुद को सुनने के लिये भी है लेकिन स्पीड को नवाजा जाता है। वक़्त के साथ चलो। ये चलना क्या है?
इनको कल्पना मे लेने की कोशिश है। शहर यहाँ से किस तरह अपनी उड़ान को लेता है और हम किस उड़ान की तरफ ले जा सकते हैं? उसको धाराणा मे लेकर कुछ स्टूमेंट रखने की कोशिश से समझने की भूमिका अदा की है।
लख्मी
शहर को सोचते हुए ये तस्वीर हमेशा खुलती है कि शहर को सोचने वाला या रचते हुए देखने वाला खुद कहाँ होता है? मैं कई दिनों से बाहर घूम रहा हूँ। ये बाहर मेरे दायरे मे नहीं आता तो बाहर लगता है। सब कुछ ठहराव मे लगता है, ऐसा लगता है जैसे मैं खुद को ठहराव मे देखना चाहता हूँ। लेकिन क्यों? अपने को कोई जगह दिलानी है तो पूरे इलाके को सोचने से पहले लोगों को अपनी धारणा मे क्यों बसा लेता हूँ? इलाका, घर, काम और वो स्पेश जिसकी तलाश है वो सब 'मुताबिक' क्यों? सड़क का किनारा जहाँ पर मैं पढ़ रहा हूँ किसी को, कोई मुझे भी पढ़ रहा है।
"दृढ़ होना" मगर इसके विरूध में "लचीला होना" ) शहर इन दोनों के बिना जीता है। शहर असल में कुछ भी नहीं है। वे महज़ एक परछाई है जिस पर पड़ जाती है वैसा रंग ले लेती। शहर किसी का दिया हुआ नाम है?, लिबास हैं?, आधार हैं?, पता है? या शब्द हैं? ये शब्द कहाँ से आते हैं?
रफ्तार, रूकना, खड़ा रहना, स्टाफ, चुप्पी, मंच, बिका, निजी, शिफ्ट, होर्न, सावधानी, चेतावनी ये शब्द किसके हैं, किसके लिये, इनमें कोन हैं, किसकी आवाज़ में है?, किसके चेहरे हैं?, कोनसी जगहें हैं और क्या कल्पनाएँ हैं?
मैंने शहर को सोचने की कोशिश की "Reserve or Street” से। ये किस तरह से भिड़ंत में हैं? जहाँ शहर अनबेलेंस और अननोन बना रहता हैं वहीं पर "आरक्षित" का एक खेल है और पुख्ता है। लेकिन शहर जब हम बोलते हैं, सुनते हैं या देखते हैं तो कोई भी जगह जो खुद से रखी या बनाई जा रही है। वो स्थिर तो होती है लेकिन स्थित नहीं होती और शायद ये परत ही इसकी असली तस्वीर हैं। जैसे - आज जो है वे कल नहीं होगी ये तय नहीं होता? आज हो बना है कल वो ताज़ा होगा ये भी पक्का नहीं होता। इस रिदम में शहर के भीतर जीना और शहर के साथ जीना जीने लायक समा बाँधता चलता है। ये शायद शुरूआत है -
खुद के सन्नाटे को शोर मे बदलने की कोशिश की है। जब हम सन्नाटे को सोचते हैं तब 'Reserve' समझ मे आने लगता है। ये मांग मे क्यों हैं?, बहस मे क्यों है?, लड़ाई मे क्यों है? असल में ये खुद को दिखाने के समान है। लिबास को शख़्सियत बनाने की लड़ाई है।
एक मात्र अगर देखा जाये तो सिर्फ सड़क का किनारे शहर के बीच मे बेसहारा रहता है। ये किसी का नहीं है। वैसे हर किसी का है। यहाँ पर कुछ "आरक्षित" नहीं है। ये शोर में इजाफा करने के लिये भी है और शोर से लड़ने के लिये भी। मैंने "आरक्षित" को सोचते हुए खुद को रखा है। ये खेल भी हो सकता है और अपना आपा रख पाने के जैसा भी। एक सवाल दिमाग मे आया - क्या सड़क का किनारा हमको इतना उक्सा सकता है कि हम उसे अपनी कल्पना मे ले ले?
बोर्ड कोर्नर - शहर को पढ़ना ये कहाँ और कैसे उभरता है? अगर हम शहर के उन जगहों पर जहाँ बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते हैं वहाँ पर और किसी एक इलाके के मोड़ पर एक छाता और बुक सेल्फ लगा दिया जाये तो?
बस के अन्दर - सीटें हर रोज़ उठने - बैठने, नातों के कनेक्शन, छोटी मुलाकातों के अहसास और अजनबी कहानियों के जुड़ावों से भरी होती। बस जिनती भरी होगी उतनी वो सक्रिये होती है और सबसे नजदीक होती है उसकी सीट। लेकिन सबसे ज्यादा "आरक्षित" का अहसास उसी मे जुड़ा होता है। काश एक शहर ऐसा होता की घर से बाहर निकलते ही वे रिश्तों, कामो और अपने से दूर हो जाता। खो जाता। सीटों को अजनबियों के हवाले कर दिया जाये और एक इलैक्ट्रनिक बोर्ड ऐसा हो जो किसी रिड़िंग को सुना या पढ़वा रहा हो। एक कल्पना सफ़र की, मूव की और किसी के होने की।
कूड़े का खत्ता - सड़क का कोना जहाँ एक मात्र कहे तो जो दिखता है। वो है कूड़े का खत्ता। मेरे एक ने एक बार मुझे इवाइट किया था की अपने आफिस मे चाय पीने को। मैं जब उसके आफिस गया तो उसने और उसके कुछ साथियों के अपना आफिर बनाया था कूड़े के खत्ते के साथ मे एक किसी कमरे को साफ करके। ये देखकर मैं अटपटाया। हँसी भी आई लेकिन ये उस ओर ले जाने की कोशिश थी जो जगह को उसके भार से उतार देती है। एक ऐसी कल्पना मे ले जाती है जो उसको किन्ही और संभावनाओं मे ले जाये। ये एक ऐसा स्पेश है जो अवशेषों से बनता है। इस भार की भिड़ंत मे इसे कैसे सोचे? इसकी छत को ऐसी कल्पना में ले जाया जाये जो एक टेलीकास्ट और पेंटिंग की जगह बने। उस दूरी को नजदीकी लाने की कोशिश नहीं जो जगह से बल्कि उसे चूनौती देने के समान होगी।
स्ट्रीट बोर्ड - अगर कोई बीच सड़क पर जहाँ पर कोई किसी को नहीं सुनना चाहता या न कोई रूकना चाहता। वहाँ पर अगर कोई सुनाने का किनारा बना ले तो? ऐसा किनारा जो पारदर्शी नहीं है और न ही परदेदार है। उस स्पीड से टकराने के समान है जो रूकना नहीं जानती। खोये हुए को सुनना नहीं चाहती और खो जाने पा लुफ्त नहीं लेना जानती।
बिजली का खम्बा - दो अलग-अलग दूरी। गली, सड़क या किसी पार्क मे। खम्बों के बीच की जगह क्या करती है? खम्बा जो अपने नीचे मानले की अलग कहानी गढ़ता है। हर कहानी मे किरदार अलग-अलग होते हैं। उनकी दिनचर्या भिन्न होती है। लेकिन ये शहर की क्या तस्वीर है? क्या इसका कोई नाता है। मैं खुद को कई लोगों के बीच मे पाता हूँ। लेकिन भिन्न मगर जब किसी के सामने पाता हूँ तब लगता है की एक कोई महीम तार है जो खींचा है बीच मे। पर उसकी कोई निशानी नहीं है, आवाज नहीं है और न ही शायद उसका कोई जीवन है। मैंने सोचा की शहर के किन्ही दो खम्बों के बीच मे घंटियों की एक डोरी बांध दूँ। ये शोर जो दो अलग धाराओं को जोड़ता है। तब मेरी दोस्त ने कहा, “तुम सड़क के शोर में और इजाफा कर रहे हो या कुछ टकराव दे रहे हो?”
रेड लाइट - खाली रूकना ही नहीं है इसकी तस्वीर जाना भी है। लेकिन फिर भी इसे ठहराव के नाम से जाना और पहचान मे लाया जाता है। क्यों? जीवन रूकने और खुद को सुनने के लिये भी है लेकिन स्पीड को नवाजा जाता है। वक़्त के साथ चलो। ये चलना क्या है?
इनको कल्पना मे लेने की कोशिश है। शहर यहाँ से किस तरह अपनी उड़ान को लेता है और हम किस उड़ान की तरफ ले जा सकते हैं? उसको धाराणा मे लेकर कुछ स्टूमेंट रखने की कोशिश से समझने की भूमिका अदा की है।
लख्मी
Wednesday, January 11, 2012
Tuesday, January 10, 2012
Friday, December 16, 2011
लिखने की जूस्तजू
- खुद के बाहर जाकर लिखना
- खुद को छोड़कर लिखना
- खुद को तोड़कर लिखना।
- खुद को किनारे पर खड़ा करके लिखना
- खुद से लड़ते हुये लिखना
- अपने को भावनात्मकता से बारह ले जाकर लिखना
- नैतिक और पहचान से बाहर होकर लिखना
- “मन" के वश मे आये हुए लिखना
- नियमित्ता से टकराते हुये लिखना
- खुद को भीड़ मे रखकर लिखना
- अपने को एंकात मे महसूस करके लिखना
- हकीकी जीवन ब्योरे से बाहर होकर लिखना
- लाइव टेलिकास्ट होकर लिखना
- अंजान और परिचय से बाहर होकर लिखना
- "कारण" के बिना लिखना
- सवालों से लिखना
- बिना सवालों के लिखना
- खोज़ करते हुये लिखना
- बिना सवाल जवाब के बातचीत लिखना
- खुद को सवाल करते हुये लिखना
- खुद को गायब करके लिखना
- खुद को छुपा कर लिखना
- किसी मे दाखिल होकर लिखना
- बिना सहमति के लिखना
- खुद को और आसपास सुनकर लिखना
- जीवन कोमेंट्री करते हुये लिखना
- बिना कहानी के लिखना
- अपने को समझाते हुये लिखना
- “कहाँ" की कल्पना करते हुये लिखना
- काल्पनिक किरदार को बनाते हुये लिखना
- अतीत और याद के बाहर होकर लिखना
- जगह को पहेली की तरह महसूस करते हुये लिखना
- चीज़ों से लिखना
- बेजान चीज़ों के बीच मे बातचीत कराते हुए लिखना
- दृश्य को दर्शन बनाकर लिखना
- बिना किसी निर्णय के लिखना
- खुद को चोट पहुँचाकर लिखना
- खुद के दायरे से टकराते हुये लिखना
- अपने मे किसी और के अहसास से लिखना
- अपने से अजनबी बनकर लिखना
- बिना पारिवारिक और काम के घेरे मे जाये लिखना
- बिना किसी स्टॉप के लिखना
- खुद को लिखना, बिना कोई परिचय दिये
- स्वयं के साथ बातचीत करके लिखना
- काम और रिश्तों के बाहर जाकर बातचीत करके लिखना
- खुद को वास्तविक्ता से बाहर ले जाकर लिखना
- खुद की उम्र कम करके लिखना।
- खुद के बने - बनाये तरीके से हट कर लिखना
- नये ढाँचे बनाते हुये लिखना
- जगह को रहस्य बनाकर लिखना
- खुद को छोड़कर लिखना
- खुद को तोड़कर लिखना।
- खुद को किनारे पर खड़ा करके लिखना
- खुद से लड़ते हुये लिखना
- अपने को भावनात्मकता से बारह ले जाकर लिखना
- नैतिक और पहचान से बाहर होकर लिखना
- “मन" के वश मे आये हुए लिखना
- नियमित्ता से टकराते हुये लिखना
- खुद को भीड़ मे रखकर लिखना
- अपने को एंकात मे महसूस करके लिखना
- हकीकी जीवन ब्योरे से बाहर होकर लिखना
- लाइव टेलिकास्ट होकर लिखना
- अंजान और परिचय से बाहर होकर लिखना
- "कारण" के बिना लिखना
- सवालों से लिखना
- बिना सवालों के लिखना
- खोज़ करते हुये लिखना
- बिना सवाल जवाब के बातचीत लिखना
- खुद को सवाल करते हुये लिखना
- खुद को गायब करके लिखना
- खुद को छुपा कर लिखना
- किसी मे दाखिल होकर लिखना
- बिना सहमति के लिखना
- खुद को और आसपास सुनकर लिखना
- जीवन कोमेंट्री करते हुये लिखना
- बिना कहानी के लिखना
- अपने को समझाते हुये लिखना
- “कहाँ" की कल्पना करते हुये लिखना
- काल्पनिक किरदार को बनाते हुये लिखना
- अतीत और याद के बाहर होकर लिखना
- जगह को पहेली की तरह महसूस करते हुये लिखना
- चीज़ों से लिखना
- बेजान चीज़ों के बीच मे बातचीत कराते हुए लिखना
- दृश्य को दर्शन बनाकर लिखना
- बिना किसी निर्णय के लिखना
- खुद को चोट पहुँचाकर लिखना
- खुद के दायरे से टकराते हुये लिखना
- अपने मे किसी और के अहसास से लिखना
- अपने से अजनबी बनकर लिखना
- बिना पारिवारिक और काम के घेरे मे जाये लिखना
- बिना किसी स्टॉप के लिखना
- खुद को लिखना, बिना कोई परिचय दिये
- स्वयं के साथ बातचीत करके लिखना
- काम और रिश्तों के बाहर जाकर बातचीत करके लिखना
- खुद को वास्तविक्ता से बाहर ले जाकर लिखना
- खुद की उम्र कम करके लिखना।
- खुद के बने - बनाये तरीके से हट कर लिखना
- नये ढाँचे बनाते हुये लिखना
- जगह को रहस्य बनाकर लिखना
Saturday, November 5, 2011
Wednesday, October 19, 2011
उल्टी पड़ती लहरें

कुछ आवाज़ें उन चेहरों की तरह होती है जिन्हे याद रखने के लिये कभी ख्यालों मे नहीं रखा जाता।
भिन्न होती आवाजें उस ओर जाने के लिये तैयार थी जहां का उन्हे रास्ता नहीं पता था
मेरी उलझने मुझे उन रास्तों का कहती है।
मेरे हर पल जो बितते हुए पलों से टकराते चलते थे
वो उन चेहरों मे बदलने लगे जिन्होनें उन रास्तों का कभी खुद को माना नहीं।
छोटे कागजों के टुकड़े इधर से उधर हवा मे तैर रहे हैं
कभी हवा उन्हे एक ही जगह पर रोक लेती है और कभी अपनी पूरी ताकत के साथ किसी और दिशा मे फैंक देती है।
मैं उन सभी कागज़ों को बीच मे खड़ा हूँ
ये देखने की कोशिश मे की, वे कब तक किसी एक ही जगह पर टिके रहते हैं।
राकेश
मेरी थकान
एक दिन मेरी थकान मुझसे बोली, तू मुझे लेकर जायेगा कहां?
मैं थोड़ा हिचकिचाया, थोड़ा हैरान हुआ - मेरी थकान मुझसे बात कैसे कर सकती है। क्या वो भी बोल सकती है। कुछ पल की शांति ने शायद ये किया होगा? शायद मेरे कान बज रहे होगें। वो तो मुझे मारती है, मेरे शरीर से उसकी दुश्मनी है, उससे मेरी रोज लड़ाई होती है। पर मैंने कभी उसे जीतने नहीं दिया। और अंत में मैं उसका कातिल बन गया।
पर वो तो मरती ही नहीं, बस शांत हो जाती है। आज वो बोली, "तू मुझसे जीतने का घमंड करता है। फिर भी तू रोज डरता है। तु सिर्फ इतना बता की क्या तू अपनी थकान को खुद चुनता है?"
मैं कहां सुस्ताऊंगा को चुनता हूँ,
मैं कहां ताजा होऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां खो जाऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां मिल पाऊंगा वो चुनता हूँ।
ऐसा क्या है जो मैंने छोड़ दिया, इस सवाल ने इन सबका रास्ता मोड़ दिया,
लख्मी
मैं थोड़ा हिचकिचाया, थोड़ा हैरान हुआ - मेरी थकान मुझसे बात कैसे कर सकती है। क्या वो भी बोल सकती है। कुछ पल की शांति ने शायद ये किया होगा? शायद मेरे कान बज रहे होगें। वो तो मुझे मारती है, मेरे शरीर से उसकी दुश्मनी है, उससे मेरी रोज लड़ाई होती है। पर मैंने कभी उसे जीतने नहीं दिया। और अंत में मैं उसका कातिल बन गया।
पर वो तो मरती ही नहीं, बस शांत हो जाती है। आज वो बोली, "तू मुझसे जीतने का घमंड करता है। फिर भी तू रोज डरता है। तु सिर्फ इतना बता की क्या तू अपनी थकान को खुद चुनता है?"
मैं कहां सुस्ताऊंगा को चुनता हूँ,
मैं कहां ताजा होऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां खो जाऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां मिल पाऊंगा वो चुनता हूँ।
ऐसा क्या है जो मैंने छोड़ दिया, इस सवाल ने इन सबका रास्ता मोड़ दिया,
लख्मी
Wednesday, October 12, 2011
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