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Tuesday, March 4, 2014

जबरन कोशिशें

हमे भूलने की आजादी नहीं है बस, याद रखने का आदेश मानना होता है। इसके विपरित अगर कोई भूलता है तो ये समझ जाना चाहिये की हमारी ज़िन्दगी में क्या गिर गया व क्या छूट गया।

लगातार घोसला बनाने वाली जीवन की संभावनाएँ अपने आसपास को सुनने के लिये इशारा करती हैं। जैसे जीवन के सभी नकाबपोश चेहरे किसी अंजान वस्तु की तरह आसमान के नीचे अपना तमाशा स्वयं ही देख रही हो।

हम अगर अपने दिमाग के कोनों को कुछ समय के लिये भूलकर अगर देखें तो टूटे -फूटे खंडहरनूमा आकर और तरह-तरह की सतह नज़र आयेगीं जिनके ऊपर बुलबुलों सी अनगिनत झलकियां फैली हैं। उनके मद्देनजर किसी बड़े व ठोस आकार को सोचा जाये जिससे अपनी वापसी के मायने बनाये जा सकें। हम इंसान सिर्फ उन ठोस आकारों को बनाने की कोशिश में जुटे हैं।

Wednesday, April 17, 2013

सरल मोबाइल संदेश

घर में आज फिर से पन्नों ने बिखरना शुरु किया।
आज फिर से नाम उन्हीं कागजों में कहीं गुम गया॥
जिस ज़िन्दगी को इनमें ढूढंते हैं बस वही कहीं डूब जाती है।
और पन्नों के मुड़े-कुतरे निशानो में घूमती यादें अपनी ही धून बजाती हैं॥

आज फिर से घर के किसी कोने में यादों की बरसात है।
आज एक बार फिर मेरी उनसे पहली मुलाकात है॥

लख्मी

Friday, January 11, 2013

एक और आंख चाहिये

शहर और उसकी घनत्वत्ता
शहर और उसकी बैचेनी
शहर और उसकी तड़प
शहर और उसकी उत्तेजना
शहर और उसकी हैरानी
शहर और उसकी हैवानी

इनको देखने के लिये एक और आंख चाहिये।

राकेश

Tuesday, January 17, 2012

रिजर्व और स्ट्रीट

हम "आरक्षित" को कैसे देखते व पढ़ते हैं – कोर्नर, बस की सीट, नोकरी, जगह यहाँ तक की खाने की टेबल तक। ये किसी ऐसी अवस्था मे जाने के समान है जो अपने चिंह छोड़ने के जैसा नहीं है बल्कि चिंह गायब करने के समान है। "आरक्षित" का होना एक बहस को उत्पन करता है। एक उदाहरण देना चाहता हूँ - अगर कोई दो लोग ये जिद् करले की वो खोना चाहते हैं एक – दूसरे से तो ये कैसे साबित होगा की पहले कोन खोया? एक शख्स सड़क के किनारे मे नाई दुकान चलाते हैं। हर रोज़ वो अपने कांधे पर अपनी कुर्सी और नाई का समान लेकर आते हैं और शाम तक रहते हैं फिर चले जाते। वे अपने सामने वाली सड़क पर कभी किसी को रोजाना नहीं देखते। ऐसा कोई भी चेहरा नहीं होता जो रोज़ दिखता हो। यहाँ तक की उनकी दुकान पर भी हर रोज़ वो बन्दे नहीं आते जिन्हे उन्होनें पहले भी देखा हो। लेकिन इस पढ़ाई में वो ये भूल जाते हैं की वो कितनों को इस सड़क पर रोज़ दिखते होगें। इस गिनती मे वे हमेशा गायब होते हैं।

शहर को सोचते हुए ये तस्वीर हमेशा खुलती है कि शहर को सोचने वाला या रचते हुए देखने वाला खुद कहाँ होता है? मैं कई दिनों से बाहर घूम रहा हूँ। ये बाहर मेरे दायरे मे नहीं आता तो बाहर लगता है। सब कुछ ठहराव मे लगता है, ऐसा लगता है जैसे मैं खुद को ठहराव मे देखना चाहता हूँ। लेकिन क्यों? अपने को कोई जगह दिलानी है तो पूरे इलाके को सोचने से पहले लोगों को अपनी धारणा मे क्यों बसा लेता हूँ? इलाका, घर, काम और वो स्पेश जिसकी तलाश है वो सब 'मुताबिक' क्यों? सड़क का किनारा जहाँ पर मैं पढ़ रहा हूँ किसी को, कोई मुझे भी पढ़ रहा है।

"दृढ़ होना" मगर इसके विरूध में "लचीला होना" ) शहर इन दोनों के बिना जीता है। शहर असल में कुछ भी नहीं है। वे महज़ एक परछाई है जिस पर पड़ जाती है वैसा रंग ले लेती। शहर किसी का दिया हुआ नाम है?, लिबास हैं?, आधार हैं?, पता है? या शब्द हैं? ये शब्द कहाँ से आते हैं?
रफ्तार, रूकना, खड़ा रहना, स्टाफ, चुप्पी, मंच, बिका, निजी, शिफ्ट, होर्न, सावधानी, चेतावनी ये शब्द किसके हैं, किसके लिये, इनमें कोन हैं, किसकी आवाज़ में है?, किसके चेहरे हैं?, कोनसी जगहें हैं और क्या कल्पनाएँ हैं?

मैंने शहर को सोचने की कोशिश की "Reserve or Street” से। ये किस तरह से भिड़ंत में हैं? जहाँ शहर अनबेलेंस और अननोन बना रहता हैं वहीं पर "आरक्षित" का एक खेल है और पुख्ता है। लेकिन शहर जब हम बोलते हैं, सुनते हैं या देखते हैं तो कोई भी जगह जो खुद से रखी या बनाई जा रही है। वो स्थिर तो होती है लेकिन स्थित नहीं होती और शायद ये परत ही इसकी असली तस्वीर हैं। जैसे - आज जो है वे कल नहीं होगी ये तय नहीं होता? आज हो बना है कल वो ताज़ा होगा ये भी पक्का नहीं होता। इस रिदम में शहर के भीतर जीना और शहर के साथ जीना जीने लायक समा बाँधता चलता है। ये शायद शुरूआत है -


खुद के सन्नाटे को शोर मे बदलने की कोशिश की है। जब हम सन्नाटे को सोचते हैं तब 'Reserve' समझ मे आने लगता है। ये मांग मे क्यों हैं?, बहस मे क्यों है?, लड़ाई मे क्यों है? असल में ये खुद को दिखाने के समान है। लिबास को शख़्सियत बनाने की लड़ाई है।

एक मात्र अगर देखा जाये तो सिर्फ सड़क का किनारे शहर के बीच मे बेसहारा रहता है। ये किसी का नहीं है। वैसे हर किसी का है। यहाँ पर कुछ "आरक्षित" नहीं है। ये शोर में इजाफा करने के लिये भी है और शोर से लड़ने के लिये भी। मैंने "आरक्षित" को सोचते हुए खुद को रखा है। ये खेल भी हो सकता है और अपना आपा रख पाने के जैसा भी। एक सवाल दिमाग मे आया - क्या सड़क का किनारा हमको इतना उक्सा सकता है कि हम उसे अपनी कल्पना मे ले ले?

बोर्ड कोर्नर - शहर को पढ़ना ये कहाँ और कैसे उभरता है? अगर हम शहर के उन जगहों पर जहाँ बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते हैं वहाँ पर और किसी एक इलाके के मोड़ पर एक छाता और बुक सेल्फ लगा दिया जाये तो?


बस के अन्दर - सीटें हर रोज़ उठने - बैठने, नातों के कनेक्शन, छोटी मुलाकातों के अहसास और अजनबी कहानियों के जुड़ावों से भरी होती। बस जिनती भरी होगी उतनी वो सक्रिये होती है और सबसे नजदीक होती है उसकी सीट। लेकिन सबसे ज्यादा "आरक्षित" का अहसास उसी मे जुड़ा होता है। काश एक शहर ऐसा होता की घर से बाहर निकलते ही वे रिश्तों, कामो और अपने से दूर हो जाता। खो जाता। सीटों को अजनबियों के हवाले कर दिया जाये और एक इलैक्ट्रनिक बोर्ड ऐसा हो जो किसी रिड़िंग को सुना या पढ़वा रहा हो। एक कल्पना सफ़र की, मूव की और किसी के होने की।



कूड़े का खत्ता - सड़क का कोना जहाँ एक मात्र कहे तो जो दिखता है। वो है कूड़े का खत्ता। मेरे एक ने एक बार मुझे इवाइट किया था की अपने आफिस मे चाय पीने को। मैं जब उसके आफिस गया तो उसने और उसके कुछ साथियों के अपना आफिर बनाया था कूड़े के खत्ते के साथ मे एक किसी कमरे को साफ करके। ये देखकर मैं अटपटाया। हँसी भी आई लेकिन ये उस ओर ले जाने की कोशिश थी जो जगह को उसके भार से उतार देती है। एक ऐसी कल्पना मे ले जाती है जो उसको किन्ही और संभावनाओं मे ले जाये। ये एक ऐसा स्पेश है जो अवशेषों से बनता है। इस भार की भिड़ंत मे इसे कैसे सोचे? इसकी छत को ऐसी कल्पना में ले जाया जाये जो एक टेलीकास्ट और पेंटिंग की जगह बने। उस दूरी को नजदीकी लाने की कोशिश नहीं जो जगह से बल्कि उसे चूनौती देने के समान होगी।

स्ट्रीट बोर्ड - अगर कोई बीच सड़क पर जहाँ पर कोई किसी को नहीं सुनना चाहता या न कोई रूकना चाहता। वहाँ पर अगर कोई सुनाने का किनारा बना ले तो? ऐसा किनारा जो पारदर्शी नहीं है और न ही परदेदार है। उस स्पीड से टकराने के समान है जो रूकना नहीं जानती। खोये हुए को सुनना नहीं चाहती और खो जाने पा लुफ्त नहीं लेना जानती।

बिजली का खम्बा - दो अलग-अलग दूरी। गली, सड़क या किसी पार्क मे। खम्बों के बीच की जगह क्या करती है? खम्बा जो अपने नीचे मानले की अलग कहानी गढ़ता है। हर कहानी मे किरदार अलग-अलग होते हैं। उनकी दिनचर्या भिन्न होती है। लेकिन ये शहर की क्या तस्वीर है? क्या इसका कोई नाता है। मैं खुद को कई लोगों के बीच मे पाता हूँ। लेकिन भिन्न मगर जब किसी के सामने पाता हूँ तब लगता है की एक कोई महीम तार है जो खींचा है बीच मे। पर उसकी कोई निशानी नहीं है, आवाज नहीं है और न ही शायद उसका कोई जीवन है। मैंने सोचा की शहर के किन्ही दो खम्बों के बीच मे घंटियों की एक डोरी बांध दूँ। ये शोर जो दो अलग धाराओं को जोड़ता है। तब मेरी दोस्त ने कहा, “तुम सड़क के शोर में और इजाफा कर रहे हो या कुछ टकराव दे रहे हो?”

रेड लाइट - खाली रूकना ही नहीं है इसकी तस्वीर जाना भी है। लेकिन फिर भी इसे ठहराव के नाम से जाना और पहचान मे लाया जाता है। क्यों? जीवन रूकने और खुद को सुनने के लिये भी है लेकिन स्पीड को नवाजा जाता है। वक़्त के साथ चलो। ये चलना क्या है?

इनको कल्पना मे लेने की कोशिश है। शहर यहाँ से किस तरह अपनी उड़ान को लेता है और हम किस उड़ान की तरफ ले जा सकते हैं? उसको धाराणा मे लेकर कुछ स्टूमेंट रखने की कोशिश से समझने की भूमिका अदा की है।

लख्मी

Wednesday, July 27, 2011

दो मिनट शहर के

मैं भी :
मैं क्या कर रहा हूँ और मेरे करने में क्या है? मैं जो कर रहा हूँ उसमें कौन है? क्या वे मुझसे ताल्लुक रखता है तो उसमें मेरे इर्द-गिर्द का क्या रोल है और अगर इसमे मेरा इर्द-गिर्द है तो मेरे होने का क्या रोल है। परिवार हमेशा कहता रहा है, “हमारे लिये कुछ मत कर लेकिन खुद के बारे में सोच" मगर ये खुद में कौन-कौन है?

मैं चले जा रहा हूँ किसी तलाश में - रोज निकलता रहा हूँ लेकिन शायद कोई देखे - जाने हुए पते को ढूँढने। ये तरीका मुझे कहाँ ले जायेगा? से मुझे डर रहता है। मैं उसी जगह पर पहुँच जाऊंगा जहाँ के बारे में मेरे पहले कई लोग जानते आये।

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एक शख़्स :
एक बार मैनें अपने एक दोस्त ने पूछा, “तुने कभी अपने को लेकर सोचा है?”
वो बोला था "हाँ" सोचता हूँ लेकिन वैसे नहीं जैसे तुने अपने को लेकर सोचा है। मैं अगर तुझसे ना मिलूँ, तेरे घर ना आऊँ, तेरी बातें ना करूँ और अपने घर पर भी कभी न लौटूँ, दिन को बाहर निकलो और शाम में वापस आ जाओ।क्या ये जिन्दगी होती है? इससे तो अपने को सोचूँ ही नहीं तभी अच्छा है।

जब वे ऐसे बोलता था तो लगता था कि कोई बड़ी कल्पना लेकर जीने की बात करता है। वे अपने बारे में नहीं, उस तरीके के बारे में बोल रहा था जो "मैं" और "वो" साथ और एक तरह से जीते हैं। ये वाक्या मुझे सोचने पर मजबूर किया की मैं अपने शरीर को किस लिबास के थ्रू देखने कि कोशिश में हूँ।

******

कब लगता है हम वापसी पर है? मैं हमेशा सोचता रहा की आखिर में वापसी" के मायने क्या होते हैं? वो वापसी जो काम और रिश्तों से बाहर होती है। जो लौटना नहीं होती। जो समय के गठबंधन से बाहर नहीं होती। 'वापसी' घर आना या सोच मे जाना। अधूरे को पूरा करना या अधूरे से नया बनाना।

दो मिनट शहर के

एक शख़्स :
मेरे पिताजी अक्सर कहते हैं अपने काम करने के समय से, "मैं कभी घर पर बैठूगां नहीं - अगर बैठा तो अपने काम से लेकिन अपनी उम्र से नहीं" आज ये बात सोच पा रहा हूँ। मेरे साथी ने एक बार कामग़ार शख़्स के बारे कहा, “कोई शख़्स अपने काम से वापस लौटता है - थका हुआ लेकिन दूसरे दिन फिर से तैयार हो जाता है उसी शहर में जाने के लिये।"

ये दोनों बाते एक दूसरे के लिये बिलकुल भिन्नता में है। पिताजी जब वापस आने को बोलते हैं तो वापस आना उनके लिये घर लौटना नहीं है। बल्कि वे वापस जाने को भी सोचने की कोशिश करते हैं। और मेरा साथी - वापस जाने को सोचा है आने को नहीं। घर लौटना उसको तैयारी देता है अगले दिन की। उस चिड़िया की तरह है जो उड़ान भरकर टहनी पर बैठी है। सुस्ताने के लिये नहीं बल्कि कहीं जाने के लिये। पर उसका टहनी चुनना, समय चुनना, आसपास चुनना, थकान चुनना उसके वहाँ पर आने मे निहित है। वे लौटती नहीं है -

वापस आने में परिवार उनके लिये बहाना नहीं है। काम उन्हे वहाँ पर फैंकने के लिये नहीं है। शरीर के लिये कोई आरामदायक जगह नहीं है। वापस आना मतलब उनके लिये उस रूप मे आना है जो इन सब बेरिकेडो से बनकर लोहा लेता है जीने का। बहस से बना है, जीने की जिद्द से बना है -

मैं जब ये सोच पाता हूँ तो उनका घर आते ही बाहर निकल जाना समझ मे आता है या कभी ना आना, देर से आना, किसी के साथ आना ये समझ मे आने की कोशिश करता है।

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एक और शख़्स :
मेरे लिये थकना बहुत जल्दी हो जाता है। मगर वो मेरे शरीर का होता है। मैं शरीर से थकने को मेरे थकने का नाम नहीं देना चाहता। जब मैं थकने को सोचता हूँ तो मेरे दिमाग में एक शख़्स का चेहरा आता है। जो मेरे पास साइकिल से 8 किलोमीटर का सफ़र तय करके आते हैं अपना कुछ सुनाने के लिये और जब मैं उनके सुनाने के बाद में उनसे कुछ सवाल करता या चुप भी रहता तो वे मुझे देखते रहते। कभी अगर कुछ लिखने को कहता तो तभी तुंरत लिखने बैठ जाते। तब लगता है थकान शरीर से ही है शायद, लेकिन उसमे रंग किसी और अहसास का भरा जा सकता है।

फिर आना - जाना, रास्ते लम्बे होने के अहसास से भी दूर हो जाता है। मैं सोचता हूँ कि मैं अपने जीवन के किन हिस्सों मे जाऊं जो मुझे इस तरह की थकावट में ले जाये? मगर उसमें मुझे वे नज़र आता है जो मेरे मन लगे काम से जुड़ा है। इससे बाहर नहीं है।

लख्मी

Tuesday, July 26, 2011

दो मिनट शहर के

सबमे कहीं जाने की होड़ सी लगी है। हर कोई किसी न किसी सफ़र में खुद को जबरदस्ती घुसा दे रहा है और कहीं निकल जा रहा है। सब लगते जैसे सबसे दूर और अलग जाना चाह रहे हैं। हर रोज़ एक गाडी आती जो शहर घुमाने के लिये लेकर जाती। सब तैयार होकर उसमे बैठने के लिये मारामारी करते। मगर किसी - किसी को ही उसमे सीट मिलती। मैं भी हर रोज़ उसकी लाइन में खड़ा होता हूँ अपना सबसे अच्छा और खूबसूरत कपड़ा पहनकर। एक दिन उसमें सीट मिल ही गई।


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रंगीन छत के सड़क के बीच में आते ही सबकी नज़र उसके वश में हो गई।
एक शीसे से बना मकान फुटपाथ पर खड़ा है।
बीस हजार पन्नों की किताब बस स्टेंड पर रखी है।
80 मीटर लम्बा पेन रेड लाइट के नीचे पड़ा है।
500 लीटर का मटका सड़क के किनारे रखा है और लोग उसमे से पानी पी रहे हैं।
एक पारदर्शी दिवार है जिसमे अनगिनत किताबें रखी हैं।
200 फिट बड़ा स्पीकर लगा है जिसमें से ढेहरों आवाज़ें लगातार आ रही हैं।
एक हैंड बेग जिसमें 350 जेबें हैं।
एक बस जिसमे दरवाजे ही दरवाजे हैं।
सड़क के किनारे बना शौचालय जो शीसो से बना है।

जो शहर दिख रहा है उसे एक बार और देखने के लिये आंख बनानी होगी।

लख्मी

Monday, July 25, 2011

दो मिनट शहर के - पर किसके लिये?

तेज आंधी थी। कोई भी चीज़ जमीन पर नहीं थी। दीवारों पर चिपके पोस्टर फड़फड़ा रहे थे। कोई उन्हे फिर से चिपकाने वाला नहीं था। लुढ़कती चीजें अपने से भारी सहारे से टकराकर वहीं पर जम जाती। कोई गा रहा है। उसकी तेज आवाज़ आंधी के साथ बह रही है। कभी लगता है जैसे वे बहस कर रही है। आंधी को अपने काबू मे कर रही है। आंधी के बीच से निकलते कई लोग उस आवाज़ तक जाने के लिये भटक रहे हैं। हर किसी को जैसे उसके पास जाने की तलब है। वे कभी अपने अलाप पर होती तो कभी उस नमी मे जैसे वे आंधी को पी गई है। हर कोई उसके साथ अब गाने लगा है। आंधी से लड़ने के बहाने के जैसा। कोई किसी को देख नहीं सकता। सब जहां खड़े हैं वहीं पर रूक गये हैं। वहीं से उस आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ को भिड़ा रहे हैं। कभी कोरस बन जाते हैं तो कभी जुगलबंदक। समा में आवाज़ें नहीं है, किसी एक तार मे खो गई हैं। एक हो गई है। आंधी की धूल छटने लगी है। पूरा शहर एक ही जगह पर खड़ा है। मगर बिना किसी को पहचाने की कोशिश मे।


******

एक हूजूम सड़क से निकल रहा है। किसी मदमस्त हाथियों के झुण्ड की तरह। हर किसी के पास एक तस्वीर है। हर तस्वीर मे कोई नहीं है। जैसे जगह उनके साथ उठकर कहीं जा रही है।

कोई छूट गया मगर लगता नहीं है कि छूटा है। वो यहां रह गया मगर लगता नहीं है कि रह गया।
वे यहां का हो गया मगर लगता नहीं है कि वे यहां का हो गया।
वे यहां कुछ देर रूकेगा मगर लगता नहीं है कि कुछ देर रूकेगा।
वे यहां बसेगा मगर लगता नहीं है कि वे यहां बसेगा।
वे खत्म होगा मगर लगता नहीं है कि वे यहां समाप्त होगा।

वे समाप्ति से बाहर होकर आया है। वे कहीं भी जा सकता है।

हूजूम अपने साथ जो लेकर गया है उसे कहीं ज्यादा वे छोड़कर गया है।


*******

बंद बोरे सड़क के किनारे किसी एक जगह पर पड़े। जिन्हे खोलकर देखना किसी के बस का नहीं है। हर रोज़ वहाँ पर कभी तीन तो कभी दर्जनों के हिसाब से छोटे बड़े बोरे कोई न कोई फैंक ही जातान जा रहा है।

लख्मी

Saturday, July 23, 2011

दो मिनट शहर के - पर किसके लिये?

मीलों का सफ़र करके घर लौटा, मैं जहां लौटा वो घर नहीं था।
वापस उसी रास्ते पर गया, मैं जिस रास्ते को लौटा वो रास्ता नहीं था।

मैं कुछ देर चला, मैं कुछ देर रूका, मैं कुछ देर ठहरा, मैं कुछ देर अटका, मैं कुछ देर भटका
फिर मैं घर को लौटा, मैं जहां लौटा वो घर था

मगर मैं "मैं" नहीं था।

*****

कुछ भगदड़ मची थी। लोग एक दूसरे से टकराने के लिये तैयार थे। हर किसी को टकराने के अहसास था। पर, टकराने वाले से अंजान थे। भीड़ मे होने के बाद भी भीड़ से कोसों दूर थे।

कोई सड़क के बीच मे खड़ा पैगाम बांट रहा था। किसी के पास उसे सुनने के वक़्त नहीं था। मगर पैगामों के मनचले भागमभाग मे वे सब फंसे थे।

वो हर चक्कर पर अपने हाथों से एक पन्ना उड़ा देता। कई पन्ने पूरी सड़क पर बिखर रहे थे। उन पन्नों को पकड़ने की कोई कोशिश भी नहीं कर रहा था पर वे जानता था कि सब अपने नाम का पन्ना तलाश रहे हैं।

कुछ देर वो यूंही पन्ने लुटाता रहा। फिर कई कोरे पन्नें सकड़ पर ही चिपका कर चला गया।

*****

बेइंतिहा धूंआ छाया है। रोशनी कभी उसे छेद देती तो कभी उसके पीछे किसी आशिकी जोड़े की भांति गुपचुप कुछ कहती। अचानक से कोई उसमे से निकल आता। कोई गा रहा है, कौन है ये पता नहीं। मगर उसकी आवाज़ में धूंएँ के पीछे जाने की लरक पैदा की हुई है। हाथ डालकर कुछ निकालने की तड़प ने धूंए को खतरनाक पौशाक से बाहर कर दिया है।

“मैंने अपने जीवन से कुछ नहीं दिया तुम्हे। तुम ही मेरे से हमेशा कुछ मांगते रहे। जब तुम जिद् करते थे तो मैं डर जाया करता था। मैं छोड़े जा रहा हूँ वो सब डर और उनमे छुपे वो तमाम किस्से जो तुम्हे तुम्हारी मांगी हुई चीज ना देकर कोई बात बता दिया करता था। वो तुम्हे फिर से शायद वही दर्द देगीं लेकिन मेरे उस डर का अहसास जरूर करवा पायेगीं जो मैंने हमेशा महसूस किया है।"

धुंआ बहुत बड़ गया है।

लख्मी

Friday, July 15, 2011

दो मिनट शहर के - पर किसके लिये?

****
सड़के किनारे खड़ा वह शख़्स जिसे हर रोज़ वहाँ से गुजरने वाला देखता होगा। मगर शायद ही उसे कोई पहचानता होगा। उससे मुलाकात हर बार पहली बार की ही बनकर रह जाती है और वो मेरी याद में नहीं बनती। मैं उसे देखता हूँ, मैं उससे मिला हूँ मगर पहचान नहीं सकता। कभी सोचता हूँ उसकी तस्वीर खींचलू मगर वो पल में गुम हो जाता है। रेडलाइट की भीड़ में वो गायब हो जाने वाला चेहरा नहीं है मगर फिर भी खो जाता है। चेहरे पर हर मुलाकात मे वे नई दाड़ी मूँछ लगाये घूमता है - नई कोई ड्रेस में, नई किसी टोपी में - हाथों में पन्नी लिये आवाज़ नहीं मारता बस सीटी बजाता है। दाड़ी मूँछ नकली होती है मगर वो असली है। उसके लिये शहर के ये दो मिनट ही उस आठ घंटे की तरह है जिसमें वो उस झलक से कितनों के जहन पर अपनी ओर खींचता है। लेकिन हम दोनों का मिलन शहर मे खो जाने के बाद का है।



***
एक आसान सा रास्ता - मेरा नहीं है मगर मैं उसका जरूर हूँ। वो मेरे वक़्त है मगर मेरे वक़्त का उसके ऊपर कोई जोर नहीं है। कोई खामोश निगाह नियमित घूर रही है। वो किसी की नहीं है। मगर सब उसके घेरे मे है। वे बदलती है और बदल सकती है। किसी खास लिबास मे नहीं है। वे गायब होना भी जानती है। कोई दूर खड़ा सोचता है ये निगाह मेरी है - और मैं पास मे खड़ा कल्पना करता हूँ ये निगाह उसकी है। हर कोई एक दूसरे की निगाह का कर्जदार बना है।



***
रोशनी तीर सी जमीन पर गिर रही है। सब उसमें हैं - कोई बच नहीं सकता। कोई बचना भी नहीं चाहता। हर तीर उन नातों सी बनी है जो किसी को एक दूसरे का नहीं बनाती मगर एक दूसरे को बिना देखे जाने नहीं देती।

रेडलाइट पर गाड़ियाँ - रूकने हैं, ठहराव मे नहीं। समय के भीतर है जो गठ दिया गया है। पर ये कहने वाला कौन है? कहाँ है, किस रूप में है, किस लिबास में है? जो उस जगह को, रूकने को, गाड़ियों को एक साथ देख सकता है। जो शायद उसमें नहीं है - मगर शायद उससे दूर भी नहीं है। वे उसके साथ भी है लेकिन उसके भीतर नहीं है।

सफ़र मे है . . . .

Thursday, June 9, 2011

उस मेरे मैं की मिठास




मैं अधिक रूपों से खेल रहा हूँ। मैं कारणों में खुद को सुनिश्चित नहीं करता हूँ।

5 साल तक केबल लाईन अन्तराल में रहे है। कभी कम्पलेन्ट को कम्पलेन्ट नहीं समझा उसे रिलेश्नसिप समझते हुये सोचा। वो एक रचनात्मक शख़्स को प्राप्त करने की इच्छा से प्रेरित रहते हैं। "मेरे स्वंय के भीतर भी कोई है।"

पैदल घूमने का अनुभव ज़्यादा करता हूँ। जगह के वहां के बदलाव संबद्धित चीजों से परिचित है। "केबल के काम से मुझे बहुत प्रेम है।" तभी अपना हुनर अपने आप से बनाया और आसपास के लोगों से समझा है। फिर उसे सोचा की वो खुद के लिये क्या जगह बनाता है। अपनी तैयारी खुद की, कि किस तरह और किस आधार को लेकर जीवन जीना है। तैयारी जीवन में रफ़्तार लाती है। ठीक उस वक़्त की तरह जो अपनी बटोरी गई ढेरों इंद्रधनूषी रंगो में ढली परछाई को विराजमान देखता है।

ये बात आसानी से मान ली, सोचा चलों इस बहाने बाहर निकल जाने का मौका मिलेगा और अपने से कुछ कर सकुंगा। मुझे पहले केबल के ओफिस में सफाई करने को कहां गया मैंने कमरे की मशीनो की 3-4 महिनों कस के सफाई की।

जहाँ मैं था। उस जगह में मुझे अब नये जीने के मौकों की तलाश थी वो मिलने लगे। वहाँ सीखने को बहुत कम था मगर मेरे पास तो वही एक अधूरी मुर्ती थी जिसे मैं अपनी छवि कह सकता था। जिसपर जीवन उकेरने का मौका मेरे खाली वक़्त में निकलता था। वो खाली वक़्त जो कोरे पन्ने के समान होता..जिसपे अगर ठीक से लिखा नहीं जाता पर कभी पैन की शाही से अद्धबनें शब्दों को देख कागज पर पैन झटकने से शाही की छीटे पड़ जाती और उस पर आकृति का भी मतलब बना होता।


मेरा रूटीन अब बदल गया था एक नया सफर की तरफ। जहां मशीनों के बीच जीवन की शुरूआत होती। वहां से मुश्किलों का संमुद्र भी दिखता था। रूटीन वक़्त के पहिये की तरह चलता रहता...।

सुबह सात बजे भगवान की आरती और फिल्मी गाने। तब से लेकर नौ बजे से नई या पुरानी फिल्में। बारह बजे तक रिमिक्स गाने। उसके बाद, दोपहर के दो बजे से फिल्म 4:30 तक चलती

जहां वक़्त कभी अपने आप ही किसी कमरे में आकर ठहर जाता और कभी कुछ रोशनियों के टूट जाने पर फिर नयी रोशनियों के पैदा हो जाने पर जगह रोमांचक मोड़ ले लेती जिसमें कोई लिमिट नहीं नजर आती वो बस किसी सिरे तक झुका हुआ नक्काशिदार सजना नजर आता फिर कहीं से उपर उठा हुआ दिखता।

ये दो घंटे जो 8:30 से एक नयी रात का कथन कर देते और रात की फिल्म के शुरू होते ही इस बहाने बैठे हम अपने विचारों की गुथ्थम गुथ्था मे लिपट जाते। हम वहां होते भी और वहां कभी खुद को पाना भी कठीन होता कि हम किस बुनाई में हमारे सपनों को बसाने की कोशिश कर रहे है?

वक़्त का घेरा हमें रोक लेता ठहरा देता। लेकिन यहां कभी तो मैं अब मेरे लिए एक मिठास, एक खुशी है और एक प्रकाश है। मैं पहले अनुभवी कभी नहीं था। इसका अनुभव किया? तो जैसे किसी कमरे मे जल रहे मिट्टी के तेल वाले स्टोब में पम्प भरते जाना लगातार। ताकी उसकी बनी भवक मे शरीर से छूटते पसीनों से बनी तराई मालूम होती है।

उस मेरे मैं की मिठास, खूशी ने जन्म लिया। उस वक़्त। मेरा रोजाना का त्याग होता घर से, काम से, समाज के बोझ से तब कहीं मेरे चेहरे पर मुसकुरहाट के दो-चार बल पड़ जाते। असल में अपने आप को जानना वहीं था, जब भीड़ में स्वंय की रचना करके। वहाँ कई-कई बार मैं हुँ। शायद कि मैं नहीं। बल्कि खुद को सुनने के लिए सुन पाने से रिश्ता निभाना भी मेरे लिये जरूरी रहा है। दूसरों के लिये एक द्वार ( दवाजें-खिड़की -निकास ) को बनाया जाना। मेरे लिए एक कल्पना भी है और रोमांचक बात है।


राकेश...

Thursday, January 6, 2011

शरीर तुम हो!




जब कभी उसके बनाये चेहरे होते उसकी बनाई कहानी होती और उसी की सांसो से लिखे शब्द होते। जीवन को दिन प्रतिदिन छिलती जो भौतिक शरीर तुम समझते हो काम-काजी दूनिया में उसका एक महत्वपूर्ण रोल जिसमें कई अनगिनत झांकियाँ प्रवेश कर जाती है।


राकेश

शहर की मशहूर मार्किट का रास्ता




एक दानव जैसी भूख उसे निगलने ही वाली थी। कदमों की आहट ने उसके ध्यान को अपनी तरफ केन्द्रित किया। खूबसूरती उसके चेहरे से
ऐसा बुख़ार चढ़ा चैप्टर समझ नहीं आता था।

वो बे-मौत मारा जाता है। किसी को देखो और फिर कोई देखते-देखते जरा हंस दे या थोडा रहम खाकर ध्यान देने लगे हम समाज से नहीं डरते हिम्मत से काम लो उस रोज एक फ्लैट पहुंचा। दरवाजा बन्द था। दिवार में लगे बटंन को दबाकर उसने अपने आने का संकेत दिया।

रिश्तों को निभाने के लिये जरूरत होती है। आजकल आजमाईशों का तूफान पैदा हो गया। शहर की मशहूर मार्किटों में निकलता रास्ता वो समय महत्वपूर्ण था। दस्तक देते सुना बाकी सबके लिये मुलाकात जरूरी थी। मन के भटकते विचारों का कही ठिकाना न था।

दिमाग में विचार अनेकों मेंढक की तरह जन्म लेने लगे। इन हठ करने वाली कल्पनाओं में वो जैसे कोई प्रेम की मूर्रत बना रहा था। अब उसे याद आया की 2 बजे उसे कुछ और पैकेट लेकर होज़खास जाना था। कुछ शक्लें उसके दिलों-दिमाग को खसोटने लगी।

उसने फोन किया, "हैलो सर"
सर मतलब खाओ, "पहले ये बताओ तुम यहां क्यों नहीं आये 2 बजकर 40 मिनट हो रहे हैं।"
"सर बस मैं रास्ते में हूँ।"
"अच्छा कहाँ पर हो?"
"सर बस पहुंच गया"
"कहाँ पहुँचे?"
"मार्किट।"

धूप के चूंधिया देने वाले माहौल के बीच दिलकश नज़र ही काफी होती थी। अगले दिन फिर सवेरा हुआ। इच्छाएँ जो सिर्फ और सिर्फ चाहत में बदल गयी थी। नि:सकोच होकर।

राकेश