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Monday, February 2, 2015

टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी


दूर से ही देख रही थी वो बांस की मजबूत कुर्सी और उसके बगल मे रखी वो टेबल जिसके ऊपर अगर हाथ रखकर कोई खड़ा भी हो जाये तो टूटकर नीचे ही गिर जायेगी। लेकिन अभी कुछ देर के बाद मे वहाँ पर भीड़ ऐसे टूट कर पड़ेगी के उसको रोकना यहाँ किसी के बस का नहीं होगा।

वो वहीं पर उस टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठे थे। ये उनका काम नहीं था लेकिन उनके पास इस काम के अलावा इस समय कुछ और करने को ही नहीं था इसलिये रोज़ सुबह निकल पड़ते और कईओ की दुआये लेते हुये उस जगह पर बैठ जाते। उनके हाथ दुख जाते मगर यहाँ पर बोल खत्म होने का नाम ही नहीं लेते थे और उनका काम था उन बोलों को शब्दों मे उतारना। कुछ इस तरह उतारना की पढ़ने वाले को उनके अन्दर दबे दर्द का बखूबी अहसास हो जाये और जिसके लिये उन बोलों को शब्दों के जरिये शहर में उतारा जा रहा है वो नंगे पाँव बस होता चला जाये।

उनके नाम के बिना ही उनको लोग जानने लगे थे और वो भी नाम के साथ किसी को नहीं जानते थे। ये इस वक़्त मे बनने वाले ऐसे रिश्ते थे जो लम्बे बहुत रहेगें लेकिन कभी एक - दूसरे पर जोर नहीं डालेगें। एक - दूसरे को खोजेगें जरूर लेकिन खोने से घबरायेगें भी नहीं। दूर हो जाने से उदास जरूर होगें लेकिन हताश नहीं हो जायेगें। यहाँ चेहरे की पहचान बिना नाम जाने थी और नाम की पहचान बिना चेहरे के। फिर भी इनकी उम्र इतनी थी के जगह को अपनी उम्र देकर उसकी जिन्दगी बड़ा देती।

रिश्ते, कितने मीठे और सूईदार होते हैं? ये हम वियोग या योग मे कह भी दे तो उसमें बहस करने की कोई बात नहीं है। ये तो सम्पर्ण करने के सामन होता है। जिसके करीब उतना ही मीठा और जिसके बहुत करीब उतना ही सूईदार। जिससे दूर जाना उतना ही मीठेपन का अहसास कराता और उससे बेहद दूर जाना उतना ही सूईदार। कोई अगर ये कह दे तो क्या उससे लड़ने जाया जा सकता है? ये तो वे अहसास से जो बिना माने या मानने से इंकार भी किये सफ़र कर ही जाता है। इसमे "मेरी" "तेरी" की भी लड़ाई हो सकती है और लड़ाई हो भी क्यों भला? ये जीवन की वे लाइने हैं जिसमें दोनों ओर से न्यौता खुला होता है। बिलकुल फिल्मों के उन गानों की तरह जो न तो किसी हिरोइन के लिये गाये जाते हैं और न ही किसी हीरो के लिये। मतलब वे गाने फिल्म के किसी क़िरदार के लिये नहीं होते। वे तो जीवन का कोई हिस्सा पकड़कर उसके मर्म के लिये गाये जाते हैं। उसका अहसास गाने वाले के लिये भी होता है, गाने पर अदाकारी करने वाले के लिये भी, गाना लिखने वाले के लिये भी और गाना सुनने वालों के लिये भी।

उनके पास इतने पेपर पड़े होते जितने की उस टेबल पर नहीं होते थे। वे लगातार लिख रहे थे। क्या लिख रहे थे उन्हे ये मालुम था लेकिन सो मे से कितने अलग है वे नहीं। विषय एक जैसा होता, मगर उसके नीचे बनी वे चार लाइने कहीं भी ले जाने का दम भरती थी। इन कागजो को भरने की कोई किमत नहीं थी और न ही कोई ये किमत अदा कर सकता था। वे कागज और उनपर लिखी वे चार लाइनें उन भेदों को भी खुलेआम खोलकर रख देती जो कई समय से दिल के अंदर बसी मीलों का सफर कर रही थी। कई जगहें बदलकर यहाँ तक आई थी और न जाने कितनी और आगे जायेगीं। कोन कहाँ से क्या लाया है और कोन किसके साथ क्यों आया है? कोन कैसे यहाँ आया है और कोन किसको कहाँ लेकर जायेगा? ये सब भरा हुआ था। इसको अगर यहाँ आज खोल दिया तो इसकी मौत निश्चित है फिर मरे हुए के सामने हम रोने के अलावा क्या कर सकते हैं? या उसे कुछ देर दोहराकर भूल जाने के लिये तैयार हो जाते हैं और अगर दोहराकर भूलकर जाने के लिये ये सब दोहराया जायेगा तो इसका जिन्दा रहना जरूरी है। इसलिये इसको इतना ही गाया जाये तो ठीक है नहीं तो मिलने की मिठास खत्म हो जायेगी।

पुछताछ की मार से सभी यहाँ अच्छी तरह से वाकिफ हो गये थे। सबको अंदाजा हो गया था की यहाँ कोन कब आकर क्या पूछेगा? और हमें किन बातों और जवाबों के लिये तैयार रहना है। इसी को यहाँ पर सभी ने खेल बना लिया था। हर कोई जैसे मसखरी करने के लिये कोई रूप धारण करना चाहता था। जहाँ पर सभी किसी मोहर के नीचे दब जाने का खौफ पालते थे वहीं पर वो सभी मे उसका लुफ्त बाँट रही थी। वे अपनी गली की सबसे मसखरी औरत थी। मजा तो जैसे उनके शरीर का ही हिस्सा था। हर कोई उनको जानता था मगर कोई ये नहीं जानता था की आज और कल के बीच मे उनके खुरापाती दिमाग मे कोनसी छेड़खानी जन्म ले लेगी और वो उस दिमाग को हमेशा खाली और शांत रखती जिससे उनको खेलना है। सारे कागजात लेकर जब सारे मर्द लोग जमीन और जगह के लिये निकल जाते तो उनका खेल शुरू होता।

Friday, November 14, 2014

मीठे इंजेक्शन

खुश रहने के लिये क्या चाहिये होता है भला। बस, अपनी तकलीफो को नज़रअंदाज करों, बिमारियों को छुपाओ और बीते हुये सुखों को याद करो। बस मिल गया जिंदा रहने का आसरा। कहते हुये एक परिवार अपने दुखों का मजाक नहीं बनायेगा तो जियेगा कैसे? वैसा ही ये सरकारी जगहों और अपने बनाये घरों के बीच का रिश्ता। अनेकों नराजगियों के बीच, तानेबाने की खींचातानी के चलते इनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ता। बस, चुइगम की तरह खिंचता जाता है।

आज महीने का दूसरा मंगलवार है। सुबह से ही भीड़ लगनी शुरू हो चुकी है। पिछले हफ्ते ही ये कह कर दिया था की आज ही के दिन बच्चों के रूटीनी इंजेक्शन लगाये जायेगें। इसलिये यहां सभी को इतनी जल्दी है की डिस्पेंशरी खुलने के समय से लगभग 2 घंटा पहले ही लाइन लगना शुरू हो चुका है।

आज लोगों की भीड़ है। बच्चे तैयार है। बिना निलाहे - दुलाये मांओ ने उन्हे इंजेक्शन के लिये तैयार कर लिया है।

एक बच्चे ने अपनी मां से पूछा, “मम्मी हम यहां पर क्यों आये है?”
तो मां कहती है, “बेटा यहां पर डॉक्टर आंटी सब बच्चों को टॉफियां बांट रही है तभी तो आज देखों कितने सारे बच्चे आये हुये।"
"मम्मी क्या डॉक्टर आंटी सबको टॉफी देगी?” बच्चे ने पूछा।
हां बेटा।"
फ्री में?”
हां बेटा।"
उनके पास इतनी सारी टॉफी होगीं?”
हां बेटा।"
जितनी मांगेगे उनती देगी?”
हां बेटा।"

"फिर तो मैं दो लूंगा।" उसने खुश होते हुये कहा।
बेटा वो उनको दो देगी तो चुपचाप बैठेगें छांव में। नहीं तो वो नहीं देगीं।" मां ने जैसे ही उससे ये बात कही वो भागकर गया और दीवार से लगी कुर्सियों पर बैठ गया।

मीठी गोली, मीठी दवाई, फ्रुर्टी का इंजेक्शन ना जाने किस किस चीज से सभी ने अपने बच्चों को बहकाया हुआ है।

मम्मी कब मिलेगी हमें टॉफियां?” एक बच्चे ने जोर से पूछा।
बस, बेटा थोड़ी देर और फिर अंदर चलेगें।" मम्मी ने फिर से बहलाते हुये उसे वापस जाने पर मजबूर कर दिया।

इतने एक बड़ी सी वेन डिस्पेंशरी के गेट के सामने रूकी। गेट पूरा खोल दिया गया। उसमें से दो लड़के छोटे छोटे कार्टन बॉक्स उतार कर अंदर ले जा रहे हैं। लाइन में खलबली शुरू हुई। सभी बैठे लोग खड़े हो गये। दूर खड़े अपने नम्बरों में आ गये। बच्चे अपने अपने मम्मी और पापा के पास में खड़े हो गये। लगता है खिड़की खुलने वाली है।

वहां पर खड़े बच्चों ने उन दोनों लड़को से पूछा, “अंकल इसमें हमारे लिये मीठी टॉफियां है?”
उसमें से एक लड़का बोला, “नहीं, इसमें तो इंजेक्शन हैं तो जो आपके लगेगें।"

उस लड़के बड़ी जोरों से हंसे और वहां खड़े बच्चों ने रोना शुरू किया। 

लख्मी 

Friday, August 8, 2014

अपना बिस्तर अपना बेड

कोई एम्बूलेंस की आवाज़ नहीं। धूप के साथ जैसे इंतजार करते बिमारों के रिश्तेदार अब खुद भी सुस्ताने लगे हैं। छुट्टी का दिन है। बड़े डाक्टरों के बिना चलते अस्पताल का इंतजारिया कमरा भी बिना किसी रोकटोक के सुस्ता रहा है। छोटे डाक्टर भी दिखना बंद है। अस्पताल के कर्मचारी ही यहां से वहां भागते दौड़ते दिख रहे हैं। कम्बर, शॉल, पतली रजाइयां व पतली चादरों से देखती आंखे उन्हे ही निहार रही हैं। शायद जैसे कोई खबर उन्ही के हाथों मिल जाये। कमरे में इतनी कुर्सियां नहीं है जितना की जमीन पर अपने बिस्तर लगाये लोग पड़े हैं। कमरे के बाहर तीन से चार स्ट्रैक्टर खड़े हैं। उनमें से तीन भरे हैं। हाथ में अपना ही गुलूकोस पकड़े कोई लेटा हुआ है। उसके बगल में खड़ी एक औरत उससे कुछ पूछ रही है। बाहर स्ट्रेक्टर हैं और कमरे के अन्दर कई बिमार लोग। कोई कमर में गर्मपट्टी बंधाये कमर की तकलीफ से परेशान है तो कोई पैशाब की जगह एक नली पकड़े लेटा है। कोई मुंह को कपड़े से धका हुआ है तो कोई आंख के दर्द से परेशान है। ये वेटिंगरूम ही इनका अपना वार्ड है और बिस्तर अपना बेड। बस, यहां पर कोई बेड नम्बर नहीं है। बस, अपने पर्चे अपने सिरहाने पर लेटे है। खुद से अपना बेड तलाशते व बनाये ये लोग डाक्टर का इंतजार करते हैं और यह भी मालूम यहां कब तक रहना है। हां, मगर यह जरूर पता है कि यहां कबसे है। बस, खूश हैं कि इलाज हो रहा है। पैसा बच रहा है। यहां पर कोई मिलने का टाइम नहीं है। जब मर्जी रिश्तेदार आ जा सकते हैं। अस्पताल के कर्मचारी भी इससे संतुष्ट दिख रहे हैं।



यह वेटिंगरूम दिल्ली से बाहर से आये लोगों से भरा है। गुड़गांव, फरिदाबाद, दादरी, बलम्भगड़, गाजियाबाद लोगों से तो बाहर एमरजेंसी के सामने की खाली जगह में दिल्ली में ही रहने वालों की भीड़ जमा है। पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, बेग़मपुर, कटवारिया सराय और खानपुर। यहां पर एक जन से जब यह मालुम किया तो वह बोला कि पुरानी दिल्ली वालो का तो यह अपना अस्पताल है। वे तो यहां पर बुखार, पेट दर्द, कब्ज़ और तो और एसीडिटी की दवाई भी लेने आ जाते हैं। यह बात उन्होने बोली और जोर जोर से हंसने लगे। शायद यहां पर उनका अपना कोई नहीं था। अभी फिलहाल धूप इस जगह में चली रही है। खत्म होने के साथ आगे की ओर बड रही है और लोग उसके साथ साथ अपना बैठने का ठिकाना तलाशते व बनाते लोग आराम कर रहे हैं। यह जगह बिमारों से भरी हुई है। एम्बूलेंस, चौकीदार की सीटी, भारी स्ट्रेक्टर खींचने आवाज़ जैसे यहां के लिये आम सी आवाज़ है और उसके साथ साथ किसी के रोने, दर्द में चिल्लाने की भी। लेकिन फिर भी इस आवाज़ के होते ही सभी उसी ओर देखने लगते हैं। वेटिंगरूम में एक दूसरे से अपनी बिमारी / तकलीफ बांटते लोग इसी में संतुष्ट दिखे की उनके जैसे यहां कई हैं। एक दूसरे की छुट्टी की खबर सुनते ही उनको यह लगता दिखता की अब उनको भी जल्दी ही छुट्टी मिल जायेगी।

लेकिन आज सरकारी छुट्टी होने से कईओ की जैसे छुट्टी केंसल हो गई। 

लख्मी