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Wednesday, July 3, 2019

खत से ज़ुदा पन्ने


मेरे दरवाजे पर पड़ा था एक खत, शायद रात भर पड़ा होगा। मुझे सुबह मिला था। रात कितनी तेज बारिश पड़ी थी, ये उस खत से जाना जा सकता था। घर के छज्जे के नीचे होने के बाद भी वो पूरा पानी से तर था। अगर उसे उसी वक़्त खोला जाता तो उसके टूकड़े हो जाते। वैसे तो जमीन पर पड़े हर कागज़ को उठाया नहीं जाता या हर पन्ने पर ध्यान नहीं जाता। मगर उसे इस तरह से मोड़ा और लपेटा गया था की दिमाग उसे उठाने और सुखाने की ओर एक दम चला गया। खत के अन्दर लिखे गये शब्दों के अक्श बाहर उभर आये थे। सभी पन्ने नीली स्याही से रंग गये थे।


मैं कभी भूलूंगी नहीं वो सब

प्यारी अम्मा -

ये ख़त मैं तुम्हे जहर खाने से एक घंटा पहले लिख रही हूँ। अगर जहर नहीं खा पाई तो घर से भाग जाऊंगी, मुझे पता है, अगर मैं घर से भाग गई तो मेरे घरवालों को बहुत ज़लालत झेलनी पड़ेगी मगर, अगर मैं एक दिन और इस घर में रही तो मैं मर जाऊँगी, मेरे हाथ में एक समय ज़हर की एक छोटी सी शीशी है जिसमें मेरे बाइस सालों का अंत दिखाई दे रहा है।

मैं मानती हूँ, मैंने सबको बहुत दुख दिये हैं बस, अब बहुत हो गया। अब मैं और दुख देना नहीं चाहती किसी को। चार दिन के बाद में मेरी शादी है और वो रिश्ता भले ही जबरन रहा है लेकिन "हाँ" कहने की गलती मैंने ही की है।

अम्मा मा कर देना मुझे मैं जा रही हूँ, शायद फिर कभी लौटकर ना आऊँ

मुझे अच्छी तरह से याद है वो पहला ख़त जो मैंने उस रात में अपने घरवालों को लिखा था। उसका एक एक शब्द मेरे दिमाग पर छपा हुआ है। उसमे समाया डर और दूर निकल जाने कि खुशी दोनों बहुत ज्यादा थी। मैं कभी डर को आने वाली खुशियों से दूर करती तो कभी आगे कुछ है भी ये सोच ही नहीं पाती। वो डर फिर अकेला मुझपर चड़ जाता।

अम्मा तुमने मुझे अपने जीवन की जो भी बातें बताई वो मेरे दिल को कसोटती जाती रही है। मैं तुम जैसी नहीं बन सकती। और ना ही बनना चाहती। अम्मा तुमने एक ही टाइम मे वो सब कैसे पी लिया जो इस छोटी सी जहर की शीशी से भी ज्यादा जहरीला था। मगर वो सारी बातें जो जब तुम सुनाती थी तो मेरे सामने धूंधली ही सही मगर कुछ तस्वीरें बना डालती थी। और उमने तुम जवान दिखती थी लेकिन सही बताऊँ तो तुम्हारी जवानी की शक्ल में मैं होती थी। तुम जो जो बताती जाती लगता जाता की वो सब मैं कर रही हूँ या मेरे साथ ही हो रहा है। मैं तुम्हारी कही हर बात मे, रात मे, कहानी मे सब कुछ करती जाती थी। क्या जब मैंने तुम्हे अपनी बातें बताई तो क्या तुम्हे भी मुझमे तुम दिखाई देती थी? मुझे लगा था की मेरे अब की बातों में छुपी लड़की तुम्हे जवानी की अपनी शक़्ल याद आती होगी। आखिर हमारे बीच में तीस साल का गेप मिंटो मे भर जाने का एक यही तो रास्ता था।

इतना समय बहीत गया है लेकिन उस खत का एक एक शब्द कभी बी मेरी आंखो के सामने नाचता है और मैं सहम जाती हूँ। मैं अगर जरा सा भी सोचू उस वक़्त को जब मेरे उस खत को पढ़ा गया होगा तो क्या हुआ होगा? उसको सपने मे भी देखूगीं तो मुझे ज़हर की भी जरूरत नहीं पड़ेगी बिना हिचकी लिये ही मैं मर जाऊंगी।

हमारे दो पड़ोसी दस साल के बाद मे मुझे मिले जिन्होने उस दिन के बारे मे मुझे बताया, जिन सालो को मैं अपनी जिन्दगी का हिस्सा ही नही मानती थी वही मेरी जिन्दगी की देन थे। अम्मा, एक दिन तुम बहुत ग़ोर से एक लोटे को देखे जा रही थी। झाडू लगाते लगाते तुम उस बक्से की तरफ चली गई जो हमारे घर का एक मात्र तिजोरी बना रहा है। उस लोटे मे क्या था? तुमने कभी नहीं बताया। मगर जब तुम उसे देख रही थी तो मैंने पहली बार ये महसूस किया था की तुम मेरी अम्मा नहीं हो। वो तो नहीं हो जिसे मैं रोज देखती हूँ॥ कई बार सोचा था की उसके बारे मे मैं तुमसे कुछ पूँछू मगर मन नहीं होता था। इसलिये नहीं की तुम बताओगी नही या मेरे पूछने पर तुम्हे बुरा लगेगा। मगर इसलिये की उस तस्वीर को मैं भूलना नहीं चाहती थी जो मैंने एक पल के लिये देखी थी।

अम्मा मेरा सच मे मन नहीं है इस जगह से जाने का - लेकिन........

मैं फिर से बोलूँगी


अब तक इस ख़त की लाइनों में जीवित सांसो को महसूस करने की भूख मेरे शरीर को हिलाने लगी थी। जैसे आर्लम लगाये समय सांसो के साथ डांस कर रहा हो। 

Saturday, June 29, 2019

शमशानघाट से विदा

पंडित जी ने अपना कमन्डल उठाया और शमशानघाट से विदा लेने के लिए तैयार हो गए। बहुत ही नराज़ थे दिल्ली की सरकार से। अब शमशान घाट नये तरीके बनाया जा रहा है। जिसमे उसको बैठने के लायक बनाया जाएगा। जहाँ पर गन्दगी और कोई जानवर ना तो आएगा और ना ही दिखाई देगा। इसलिए पंडित जी की भी विदाई कर दी गई है। सबसे ज़्यादा जानवर पालने वाले ये ही शख़्स थे। जो अपना काम जानवरों से कराते आए है। चाहें वो अन्य जानवरों को भगाना हो या फालतू बच्चों को जो वहाँ से चीजों को बीन कर ले जाया करते थे। जिनके लिए यहाँ की कोई भी चीज भूत-प्रेत की नहीं थी। किसी की साड़ी या किसी का कोई भी कपड़ा हो फिर कोई खिलौना वो सब इनके लिए खेलने के ही आभूषण बन जाते। जिनसे अपने खेलो को सजाया और नाम दिया जाता। वो भी अब नज़र नहीं आएगे। धीरे-धीरे वहाँ कि सफ़ाई भी होने लगी है। वहाँ के पैशाब घर से लेकर लकड़ी की दूकान तक। शमशान घर की बाऊंडरी की दीवार में जितने आने-जाने के अनचाहें द्वार बने हुए थे। जो ज़्यादातर सुअर अपना आने-जाने के रास्ते बनाये हुए थे उसको भी बन्द कर दिया गया है।


ये काम पिछले 3 महिनो से चल रहा है। एमसीडी के कुछ काम करने वाले लोग वहाँ पर हर रोज आते है और सफ़ाई शुरु कर देते है। पंडित जी जिस कोने में अपना आसरा बनाया हुआ था उस जगह की भी सफ़ाई कर दी गई है। पंडित जी ने अपने घर के सामने एक दीवार बनाई हुई थी। अर्थी में आई लकड़ियों से और वहाँ पर पड़ी रहती चीजों से। वो भी वहाँ से हटा देने से इतना खुला-खुला लगता है की शमशान घाट लगता ही नहीं की किसी कालोनी के किनारे का हिस्सा है। वो दीवार ना होने से कालोनी के पार्क का एक छोर शमशानघाट से मिल जाता है और शमशान घाट बहुत बड़ा नज़र आता है।

पंडित जी पूरी सरकार को गालियाँ देते हुए अब अपना बोरिया-बिस्तरा समेट चुके थे। बस, रजिस्टरों पर उनके हस्ताक्षर लेने बाकि थे। मगर वो तो मदिरा में इतने धुत थे कि उनके हस्ताक्षर कैसे कराये जाए ये सोचना पहले जरूरी था। उनको शिवराम जी ने और उनकी घरवाली ने पकड़ा हुआ था वो बहुत नशे में थे।


सफ़ाई हो जाने के बाद भी वहाँ पर एक ही आदमी ने अपना दब-दबा बनाया हुआ था। वो था लकड़ी वाला। लकड़ियों का काम इतना बड़ गया है कि अब शमशान घाट मे लकड़ियाँ ही लकड़ियाँ नज़र आती है। अब वहाँ पर लकड़ी नहीं बल्की अर्थियाँ बिकती है। वो अब लकड़ियों को पहले से ही मोक्षस्थल पर अर्थियाँ बनाकर तैयार रखते है और वही बिकता है। शमशान घाट के गेट के ऊपर एक लाइन जो लिखी है की 'बाहर की कोई भी चीज को अन्दर नहीं लिया जाएगा। कृप्या लकड़ी व क्रियाक्रम का सारा समान अन्दर से ही ले।' हर मोक्षस्थल पर पहले ही अर्थी का सारा समान तैयार होता है तो मुर्दा आता है और उन लकड़ियों पर लेटा दिया जाता है बस, मुखागनी दे जाती है और कार्य समपन्न।


एक-एक अर्थी की कीमत लगा दी जाती है। कीमत होती है 1200, 1500, 2000, 3000 रुपये तक लगा दी जाती है बस, उसी का सौदा किया जाता है। 1200 रुपये में लकड़ियाँ कम और बचा-कुचा माल ज़्यादा होता है। जिसमे चलने के बाद में मुर्दे के खिसकने का डर ज़्यादा रहता है। कई बार तो गीली-गीली लकड़ियाँ रख दी जाती है। जिन्हे जलाने में कई किलो देशी घी लग जाता है तो लोग ऐसा काम ही नहीं करते। वो तो चाहते है की मरने के बाद तो उसे कोई दुख ना हो और मिट्टी का तेल डाला नहीं जा सकता। बस, 2000 रुपये तक में सौदा करने के लिए तैयार हो जाते हैं लोग।

लकड़ी वाले ने कई टन लकड़ियाँ मंगाई हुई है और शमशान घाट मे चारों तरफ़ में अपनी लकड़ियों को फैला हुआ है। देखने मे तो शमशान घाट किसी पार्क से कम नहीं लगता। अब देखा जाए तो डर जैसी हवा दूर तक नहीं भटकती। शाम मे तो शायद वहाँ कई तरह की रोनक बन जाती होगीं। हर वक़्त वहाँ पर लाउडस्पीकर मे गायत्री मन्त्र की कैसेट चलती रहती है और वहाँ आए अर्थी के साथ में लोग उस मन्त्र का आन्नद लेते हैं।


शिवराम जी भी उन्ही पंडित जी के साथ मे शमशान घाट से जाने की कह रहे थे। शायद आगे बनने वाले शमशान घाट मे किसी शिवराम जी की जरूरत नहीं होगी। जो अपनी मर्जी से किसी भी अर्थी के साथ मे लग जाया करते। जो उसे पहले पुन्य का काम मानते और उसके बाद मे कुछ पाने की तमन्ना रखते। अब तो वहाँ पर कोई सरकारी नौकरी करने वाला आएगा जो सारे काम सरकारी नियमों के अनुसार करेगा। शायद अर्थी में होने वाले कामो को भी और रिवाज़ो को भी वो नौकरी मान कर ही करेगा। अब तो सारे काम नियम अनुसार ही होगें। कब क्या करना है वो सब अब कागज़ो में लिखा-पढ़ी के बाद ही आगे बढ़ाया जाएगा।


इन शब्दों में पंडित जी के बोल ज़्यादा थे। शिवराम जी तो बस उन्हे सम्भाले हुए थे और उलटे पाँव जाते-जाते शमशान घाट को ताक रहे थे।

शायद ये उनका आखिरी दिन था।

लख्मी 

Thursday, June 13, 2019

मोहल्ले का पहला घर


हवा जैसे उनके इस कमरे में बिना किसी बंदिश के सफर करती और धूप कोनों में से आकर उनको चूम जाती। मटको को एक के ऊपर एक रखकर उन्होने एक कमरा बनाया हुआ था। तीन तरफ मटको की दीवार बनाकर उसपर हल्की चटाई के साथ तिरपाल डालकर उसे छत का नाम दे रखा था जिसमें बाहर की हर चीज़ शामिल हो जाती तो दूसरी तरफ कमरे के अन्दर का हर माहौल और समय बाहर की दरो - दीवारों को खुद में मिला लेता। ये ऐसा रोशनदान था जो दीवारें होने के बाद भी दीवारे नहीं थी और रोशनदान होने के बाद भी रोशनदान नहीं था। सभी कुछ एक – दूसरे की तस्वीरों में निगाह जमाने जैसा कोई ख़ास पहलू। दीवारें, सुनते ही जैसे दिमाग में मजबूती और महफूज़ियत का दम भरने लगती हैं। जो अगर बाँटती है किन्ही से तो दूसरी तरफ एक और तरफ बनाने का आसरा देती हैं। मगर यहाँ जैसे दीवारें कम और खिड़कियाँ ज्यादा थी। हर छेद एक झरोखा जो यहाँ के हर हिस्से को एक – दूसरे से जोड़कर एक ही बना देता है। इसका कोई एक तरफ नहीं है। कभी कोई किरदार दरवाजे नहीं बल्कि किसी दीवार से कुछ मांग लेता तो कभी कोई बच्चा वहीं से कोई चीज़ पकड़ा देता। दीवार छूकर पकड़ लेने का खेल खेलती जिसमें उन्हे भी तो मज़ा आता था। जब चाहे वो उन्ही मटको की दूरी से बने छेदों से किसी को आवाज़ लगाकर बुला लेती। वहीं एक अन्दर खड़ी हो जाती और एक बाहर बस, बातें होना शुरू हो जाती। उन्हे बातें करते हुए लगता जैसे न तो यहाँ किसी का अन्दर है और न ही बाहर।

कई पहरेदारों और सरकारी कर्मियों का ये जमावड़ा थी। हर लाइन के बन्दे यहाँ पर आकर टकराते थे। किसी से भी कुछ भी करवालों, हाँ बस, थोड़ा सा खर्चा करना होगा। ये रीत बड़ी दिलचस्प सी बनती जा रही थी। कहीं पर दो लोग रात में अपने आप ही चौकीदारी का काम करने के लिए खड़े हो जाते थे तो कोई दो लोग सबका कूड़ा सकेरने तो कोई दो लोग गलियों की सफाई करने के लिए काम का महीना पूरा होते ही सब पँहुच जाते अपने - अपने हिस्से के पैसे मांगने। कम से कम एक रुपया हर घर से या ज़्यादा से ज़्यादा दो रुपया, अच्छे खासे पैसे उनकी जैबों मे बन जाते।

Tuesday, May 14, 2019

नया शमशानघाट

पंडित जी ने अपना कमन्डल उठाया और शमशानघाट से विदा लेने के लिए तैयार हो गए। बहुत ही नराज़ थे दिल्ली की सरकार से। अब शमशान घाट नये तरीके बनाया जा रहा है। जिसमे उसको बैठने के लायक बनाया जाएगा। जहाँ पर गन्दगी और कोई जानवर ना तो आएगा और ना ही दिखाई देगा। इसलिए पंडित जी की भी विदाई कर दी गई है। सबसे ज़्यादा जानवर पालने वाले ये ही शख़्स थे। जो अपना काम जानवरों से कराते आए है। चाहें वो अन्य जानवरों को भगाना हो या फालतू बच्चों को जो वहाँ से चीजों को बीन कर ले जाया करते थे। जिनके लिए यहाँ की कोई भी चीज भूत-प्रेत की नहीं थी। किसी की साड़ी या किसी का कोई भी कपड़ा हो फिर कोई खिलौना वो सब इनके लिए खेलने के ही आभूषण बन जाते। जिनसे अपने खेलो को सजाया और नाम दिया जाता। वो भी अब नज़र नहीं आएगे। धीरे-धीरे वहाँ कि सफ़ाई भी होने लगी है। वहाँ के पैशाब घर से लेकर लकड़ी की दूकान तक। शमशान घर की बाऊंडरी की दीवार में जितने आने-जाने के अनचाहें द्वार बने हुए थे। जो ज़्यादातर सुअर अपना आने-जाने के रास्ते बनाये हुए थे उसको भी बन्द कर दिया गया है।

ये काम पिछले 3 महिनो से चल रहा है। MCD के कुछ काम करने वाले लोग वहाँ पर हर रोज आते है और सफ़ाई शुरु कर देते है। पंडित जी जिस कोने में अपना आसरा बनाया हुआ था उस जगह की भी सफ़ाई कर दी गई है। पंडित जी ने अपने घर के सामने एक दीवार बनाई हुई थी। अर्थी में आई लकड़ियों से और वहाँ पर पड़ी रहती चीजों से। वो भी वहाँ से हटा देने से इतना खुला-खुला लगता है की शमशान घाट लगता ही नहीं की किसी कालोनी के किनारे का हिस्सा है। वो दीवार ना होने से कालोनी के पार्क का एक छोर शमशानघाट से मिल जाता है और शमशान घाट बहुत बड़ा नज़र आता है।

पंडित जी पूरी सरकार को गालियाँ देते हुए अब अपना बोरिया-बिस्तरा समेट चुके थे। बस, रजिस्टरों पर उनके हस्ताक्षर लेने बाकि थे। मगर वो तो मदिरा में इतने धुत थे कि उनके हस्ताक्षर कैसे कराये जाए ये सोचना पहले जरूरी था। उनको शिवराम जी ने और उनकी घरवाली ने पकड़ा हुआ था वो बहुत नशे में थे।

सफ़ाई हो जाने के बाद भी वहाँ पर एक ही आदमी ने अपना दब-दबा बनाया हुआ था। वो था लकड़ी वाला। लकड़ियों का काम इतना बड़ गया है कि अब शमशान घाट मे लकड़ियाँ ही लकड़ियाँ नज़र आती है। अब वहाँ पर लकड़ी नहीं बल्की अर्थियाँ बिकती है। वो अब लकड़ियों को पहले से ही मोक्षस्थल पर अर्थियाँ बनाकर तैयार रखते है और वही बिकता है। शमशान घाट के गेट के ऊपर एक लाइन जो लिखी है की 'बाहर की कोई भी चीज को अन्दर नहीं लिया जाएगा। कृप्या लकड़ी व क्रियाक्रम का सारा समान अन्दर से ही ले।' हर मोक्षस्थल पर पहले ही अर्थी का सारा समान तैयार होता है तो मुर्दा आता है और उन लकड़ियों पर लेटा दिया जाता है बस, मुखागनी दे जाती है और कार्य समपन्न।

एक-एक अर्थी की कीमत लगा दी जाती है। कीमत होती है 1200, 1500, 2000, 3000 रुपये तक लगा दी जाती है बस, उसी का सौदा किया जाता है। 1200 रुपये में लकड़ियाँ कम और बचा-कुचा माल ज़्यादा होता है। जिसमे चलने के बाद में मुर्दे के खिसकने का डर ज़्यादा रहता है। कई बार तो गीली-गीली लकड़ियाँ रख दी जाती है। जिन्हे जलाने में कई किलो देशी घी लग जाता है तो लोग ऐसा काम ही नहीं करते। वो तो चाहते है की मरने के बाद तो उसे कोई दुख ना हो और मिट्टी का तेल डाला नहीं जा सकता। बस, 2000 रुपये तक में सौदा करने के लिए तैयार हो जाते हैं लोग।

लकड़ी वाले ने कई टन लकड़ियाँ मंगाई हुई है और शमशान घाट मे चारों तरफ़ में अपनी लकड़ियों को फैला हुआ है। देखने मे तो शमशान घाट किसी पार्क से कम नहीं लगता। अब देखा जाए तो डर जैसी हवा दूर तक नहीं भटकती। शाम मे तो शायद वहाँ कई तरह की रोनक बन जाती होगीं। हर वक़्त वहाँ पर लाउडस्पीकर मे गायत्री मन्त्र की कैसेट चलती रहती है और वहाँ आए अर्थी के साथ में लोग उस मन्त्र का आन्नद लेते हैं।

शिवराम जी भी उन्ही पंडित जी के साथ मे शमशान घाट से जाने की कह रहे थे। शायद आगे बनने वाले शमशान घाट मे किसी शिवराम जी की जरूरत नहीं होगी। जो अपनी मर्जी से किसी भी अर्थी के साथ मे लग जाया करते। जो उसे पहले पुन्य का काम मानते और उसके बाद मे कुछ पाने की तमन्ना रखते। अब तो वहाँ पर कोई सरकारी नौकरी करने वाला आएगा जो सारे काम सरकारी नियमों के अनुसार करेगा। शायद अर्थी में होने वाले कामो को भी और रिवाज़ो को भी वो नौकरी मान कर ही करेगा। अब तो सारे काम नियम अनुसार ही होगें। कब क्या करना है वो सब अब कागज़ो में लिखा-पढ़ी के बाद ही आगे बढ़ाया जाएगा।

इन शब्दों में पंडित जी के बोल ज़्यादा थे। शिवराम जी तो बस उन्हे सम्भाले हुए थे और उलटे पाँव जाते-जाते शमशान घाट को ताक रहे थे। शायद ये उनका आखिरी दिन था।

लकड़ी वाले ने सारी लकड़ियों को उस अस्थियों वाले कमरे में लाद दिया था। जहाँ पर अब किसी आदमी का जाना न मुमकिन था। कई अस्थियों की थैलियाँ ज्यों की त्यों लटक रही थी। मगर अब वहाँ तक किसी का हाथ नहीं पँहुच सकता था। कोई अगर आ गया अपने किसी को लेने के लिए तो वो इन्हे कैसे लेकर जाएग? ये तो यहीं पर रह जाएगी। शिवराम जी उसी कमरे के सामने खड़े बस, वहाँ पर टंगी उन थैलियों को देख रहे थे। सोच रहे थे की उन लकड़ियों को कैसे हटाया जाए जो वहाँ पर टंगी कई थैलियों को फाड़ रही थी। कई लकड़ियों के ताज (अर्थी के ऊपर झंडियों और गुब्बारों से सजाया हुआ) भी उन लकड़ियों मे फंस कर महज लकडी ही बन गए थे। आज से पहले वो अर्थियों के ताज हुआ करते थे। ये ताज़ उन पर चढ़ाया जाता था जो मरने से पहले अपनी तीन या चार पीढ़ी को देख जाया करते थे। यानि जो अपना पोता और पोते की भी औलाद देख लेता है। जिसको बैण्ड-बाजे के साथ में लाया जाता है और उसे इस कमरे की रौनक बना दिया जाता है। सारी रंगीन झंडियाँ तो अब उनमे नहीं नज़र आ रही थी बस, बाँस के डंडे ही दिखाई दे रहे थे।

लकड़ी वाला शिवराम जी जो अपने यहाँ पर नौकरी रखने के लिए कह रहा था। 2500 रुपये महिना दे देगा। बस, मोक्षस्थल पर 1500 रुपये वाली में जो लकड़ियाँ रखी जाती है उनमे से वो लकड़ियाँ कम लगे और पैसा भी पूरा मिले। लकड़ियाँ भी कम लगाई जाए और वो ऊंची भी नज़र आए। लगे की जैसे 1500 की अर्थी है मगर वो बनी हो 1200 मे लगी लकड़ियों से। ये काम खाली वहाँ पर शिवराम जी के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता था। वो इतनी ठोस अर्थी लगाते थे की लकड़ियाँ भी कम लगती थी और वो कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ती। मुर्दे का भी खिसकने का कोई डर नहीं होता था। बहुत मजबूत बनाते थे शिवराम जी अर्थी।

लकड़ी वाला ऐसे आदमी को क्यों हाथ से जाने देखा?

शिवराम जी का दिमाग अभी दो भागों में बट गया था। जिस काम को वो गालियाँ देते आए थे वो ही काम उन्हे अपनी तरफ़ में खींच रहा था जिससे वो अपना परिवार भी चला सकते थे और जिसे वो पुन्य का काम मानते थे वो भी उनके करीब ही रहता। जिस काम को करना चाहते है या करते आए है वो अब किसी सरकारी नौकरी मे तबदील हो गया है। अब तो जैसे कोई ऐसा काम ही नहीं बचा की जिसको अपनी मर्जी से किया जाए और वहाँ से कोई सौगात मिल जाए। एक ये ही काम था पर ये भी अब सरकारी नौकरी बन गया है। बस, यहीं पर उनका दिमाग उलझा हुआ था।

वो उस कमरे में से सारी चीजों को खींच रहे थे। आज से पहले कभी इतना गौर से नहीं देखा था उन चीजों को उन्होनें। कई तो बीढ़ी-माचिस, हुक्के की चिल्म, बक्से (गल्ले के जैसे) और कुछ बर्तन थे। बर्तनो पर तो तारीख़ें भी लिखी हुई थी जिन्हे गुदवा कर लिखा गया था। किसी पर 1981 कि तारीख़ थी तो किसी 1990 कि। ये तारीख़ें सन के हिसाब से 1980से शुरू होती और 1999 तक जाती थी। बर्तनो पर ज़ंग लग गई थी। कई पोटलियाँ निकली जिनमे कई पुराने कपड़े बन्धे हुए थे। जिनकी गिनती करना आसान नहीं था।

वो लकड़ियों पर खड़े हुए थे और अपना संतुलन बनाकर सारे सामानों को एक जगह पर लेकर खड़े थे। अभी तो कई समान और था जिस तक हाथ नहीं पँहुच रहा था।

यहाँ पर कोई भी ऐसा नहीं था जिसे इन चीजों का आसरा भी हो। लकड़ी वाले के लिए ये जगह कोई शमशानघाट नहीं थी। ये जगह तो एक ऐसा कार्यस्थल थी की जहाँ पर आने वाला ग्राहक कहीं और से कुछ ले ही नहीं सकता। यहाँ पर आने वाला यहीं से ही चीजों को खरीद सकता है और कोई है भी नहीं यहाँ पर उसके आलावा। पंडित जी के लिए ये जगह एक बसेरा थी जिसको छोड़ने पर अपनी सारी पहचान की पत्रियों को बदलना होगा और लोगों से दोबारा से एक और नये रिश्ते की बुनियाद रखनी होगी।

आज कई और अन्य भागों में बट गया था ये शमशान घाट।

शिवराम जी अगर अब यहाँ से गए तो क्या करेगें और अब इस उम्र में कौन नौकरी देगा इस पर ही वो अपना सारा दिमाग ख़र्च करने मे लगे थे। अब तो सारे शमशान घाट में ये काम ख़त्म हो गया होगा।

लख्मी 

Monday, June 22, 2015

दिल्ली देख ली

“दिल्ली का किला तो नहीं देखा मगर दिल्ली देख ली।“

साहब की बात दिल पे लग गयी। जब वे बेतुकी के इस आलम को आसान सा कातिलाना परिचय दे रहे थे। दरवाजे पे बाहर की रोशनी अब खासी पड़ रही है। हाथ बड़ा कर के उन्होनें आंखो को अपने दांय हाथ में लगी सिगरेट के धुंए को फुंक मरते हुए रूककर कहा, “अजीबो-गरीब है ये दिल्ली?

साहब की बातें मेरे मन को पसंद नहीं आई। मैं तो पास आकर उनकी बात का खुद बहिष्कार करना चाहता था। 

वाब में एक दूसरे के बीच बस हमारी आँखें थी।

“ये शहर इतना बड़ा है बस दो लब्ज ही इनको समझ आये।“
 
“सज्जन रह गये ये!”

खैर, वो इतना कहने के बाद रुक गए। मैंने उत्सुकता से पूछा, “अब इसके बाद क्या सोचा है?

साहब ने मीठी सी मुस्कान बिखेरते हुए, “दिल्ली में आल कैरेक्टर का माहौल है। कलाकार यहाँ तस्वीर हैं, और कई खूबियां हैं। मगर कहानियों में मसहूर जो किरदार हैं, वो कभी चुनौती देने वाले माहिर हुआ करते थे।“


इसके बाद वो वह नाजुक सा मिज़ाज बना कर मुझे देखते रहे

राकेश 

घटना जिसका किस्सा बाकी है

“हाँ शायद, मैं हकीक़त में इस पूरी घटना का वर्जन, मुलाकात के एक सिरे से सुनना चाहता हूँ।“

उनके जवाब में सिर्फ एक मुस्कान काफी नहीं थी। आप को ख़बर है की आज भी ये शहर कितने तरह की घटनाओं और भाषाओं व कारनामो को अपने अनुभव में समेटे हुए है? लोगों की बात छोड़ों अभी जरुरत है महसूस करने की। यकायक,  

“मैंने सुना नहीं जरा फिर से कहो?

इतना कह कर वो बाबू कुर्सी से उठ खड़े हुए। मैंने उनके कंधे को सहलाया, “कल शाम जरूर आना।“

कमरे में ठक टक टक। टूक की आवाज आ रही थी। दीवारें टेलीविजन खिड़कियां और छोटे -बड़े साइज की बनी चीजों का हल्का सा साथ होना मालूम लग रहा था। अन्धेरा पीछे ही था और कहानी अभी शुरू होने को थी। जैसे किसी फ़िल्मी पर्दे पर स्टार्टिंग में धुम्रपान हानिकारक, शराब पीना हानिकारक है। ज़ैसे अन्य विज्ञापन आते हैं और फिल्म का माहौल निमंत्रण दे रहा होता है। आवाजों का गुंबद सा बन कर हमारी ओर बड़ रहा होता है।


वैसे ये बात मैंने भी सोची थी। उनके इन शब्दों के मतलब के लिए मेरे खुरापात दिमाग में सिर्फ एक खालिस्तान ही भर गया था। मैं गहरी सांस लेकर कुर्सी छोड़ कर उठा बात मुश्किल से पांच मिनट की थी और सचमुच एक लम्बा रूप ले गयी।

बात अब भी बाकी है 

राकेश 

कहीं दूर से


अभी सुबह के सवा चार बजे थे। ललीत गहरी नींद से जागा और दोनों हाथो को मरोड़कर उठा। उसे गाड़ी गैराज में भेजनी थी। कल रत उसकी मशीन ने रास्ते में धोखा दे दिया था। 

उसने मेरे चेहरे को देख कर कहा, "क्या रात भर सोया नही?" 

ये सुन कर मेरी आँखें इस कोशिश में लग गयी की एक झपकी मिल जाए। खैर, ललित ने जेब से मोबाइल निकला और हैलो हैलो। मुझे पहचाना? 

गॉव के सुबह सवा चार, किसी रात से कम नही होते यहाँ साँस लेना जितना सरल होता है उतना ही सरल छोड़ना भी होता है। 

"बहुत अच्छा" आवाज आई। 
"चेहरा जरूर याद होगा?" 
"बहुत अच्छा तभी सारी बातें होंगी।" 
"तुम बड़े भाई हो, बस यूं ही थोड़ी जरुरत है।"

कितनी संवेदना थी उसकी बातों में। काम के बाद वो अपने आसपास गर्दन घुमाकर देखता फिर बीच में कोशिश करता की अँधेरे में बहुत दूर देखा जा सके। पंछियों के कंठ से निकलती आवाजें बेहद प्रिय लग रही थी। अब सिर्फ एक बात खाये जा रही थी की घर कैसे पंहुचा जाये? हम लोग वहाँ ठहरने के मूड़ में नही थे। शहर दूर था मगर दिशाएँ दिखाई दे रही थी। मालूम पड़ रहा था की चाय की दुकान पास में है। इसके अलावा अलमारी, दरवाजा मिटटी की चौड़ी दीवारें काफी बड़ी है। 

हम कुछ देर के लिए जैसे रास्ते में ही खो जाने वाले थे। 


राकेश 

Wednesday, April 22, 2015

घर कहाँ है, मालूम नहीं


कूड़ेदान के बिलकुल बगल मे रह रहे अशोक जी का कहना है की उनकी पूरी ज़िंदगी मे इतनी तकलीफ़े नहीं देखी होगी जितनी की उन्होने यहाँ पर पिछले एक महीने मे देख ली हैं। जो उन्हे पूरी ज़िंदगी याद रहेगी। अपने दिहाड़ी मजदूरी के काम मे इतने दर्द बरदस्त नहीं किए थे जो अब करने पड़े है उन्हे।

अपने खाने के समान को एक जगह पर रखते हुये वो दूर देखने की कोशिश कर रहे हैं। शायद भीड़ के भीतर में से कुछ अपने लिए खोज रहे हो। किसी ऐसे रिश्तेदार को देखने की कोशिश कर रहे हैं जो उन्हे इन तकलीफ़ों से दूर ले जाएगा और फिर से हँसना और बोलना सिखाएगा। उनके साथ में बेटी उनकी बीवी कहती है की इनके जैसा कोई गाँव मे बोलने वाला नहीं था, ये हमेशा खुश रहते थे और अब देखो की बस चलती सड़क को देखते रहते है और गुस्सा होते रहते हैं, जैसे किसी ऐसी चीज से नाराज हो गए है जो सिर्फ इन्हे ही मालूम है।

उनको अगर सिर्फ देखते ही रहा जाए तो भी ये एहसास हो जाएगा की ये शक्स कितने टाइम से बीमारी की हड्कन को झेल रहे है और ये भी मालूम हो जाएगा की ये अपने परिवार से कैसे ये दर्द छुपाने मे माहिर हो गए हैं। उनकी पलके जल्दी जल्दी नहीं झपकती बस जैसे किसी चीज पर रुक जाती हैं। फिर अचानक से पलट जाती हैं। अब वो अपनी एक करवट पर लेट गए हैं। हाथो में अस्पताल के पर्चे हैं। जिनहे वे बार बार देख रहे है फिर सामने की और देखते है, कभी वो कागजो मे देखते है तो कभी सड़क पर, कभी खुद की तरफ निगाह कर लेते है तो कभी बीवी की तरफ। बस ये नियमित चलता जा रहा है।

उनसे कुछ बात करने की अगर कोई सोचे भी तो भी उनकी इस रिद्धम को तोड़ना नहीं चाहेगा। अब उन्होने अपनी जेब से कुछ कटे हुये कागज निकाले। उन्हे जमीन पर बिछा कर देख रहे है। कुछ जोड़ने की भी कोशिश कर रहे है तो कभी उन्हे उलट पलट कर देख रहे है। कुछ देर के बाद मे उन कटे हुये कागज को उन्होने हवा मे उड़ने के लिए छोड़ दिया। और खुद अपने पाँव के नाखूनों को देखने लगे। शायद बड़े हो गए है काफी। उन्हे वे बड़ी गौर से दे रहे है। तभी उन्होने अपने सिरहाने रखे कपड़ो ने नीचे से एक आधा ब्लेड निकाला और उस नाखून को काटने लगे। इतने मे उनकी बीवी उन्हे अनदेखा कर रही है। वो अपनी नजर को यहाँ से वहाँ घूमने मे मशरूफ़ है। वो देख रही है उन लोगो को जो अभी तक अपने काम से निबटे नहीं हैं। उनकी गर्दन यहाँ से वहाँ घूम रही है।

एम्स अस्पताल एक इस चबूतरे पर हर रोज लोग एक दूसरे से बाते करते हैं और अपनी तकलीफ़ों को बाँट लेते हैं। यहाँ पर हर दूर दराज से आया हुआ परिवार एक दूसरे का हमराही बना रहता है। किसी के न होने पर उसके समान की देखभाली करता है और होने पर हर दर्द के बारे मे पूछता है। अशोक जी को यहाँ पर जैसे सब देखते रहते है। बातें होती है तो उनकी बीवी से। ये सिकंदराबाद से आए है।

Friday, April 10, 2015

अब नींद कहाँ आने वाली थी

उन्हे बेहद डर लगता था। हर तेज आवाज पर वो चौंक जाते थे। चाहे वो आवाज़ दरवाजा जोर से पिटने की हो या फिर लिफाफे में हवा भर कर उसे फोड़ने की या फिर किसी बम या पटाखे की। वो इन सभी आवाज़ों से खौफ़ खाते थे। जब तक इस तरह की कोई भी आवाज उनके कानों में पड़ती रहती उनकी आँखों में नींद की परत कभी नहीं उतर पाती। अपने कानो को वो जोरो से भीच लिया करते। मगर फिर भी आवाज़ों से उनका पाला कभी नहीं छूट पाता था।

अपने मन को बहलाने के लिए वो पड़ोस के घर में हमेंशा घुसे रहते थे। उनकी सीट जैसे पड़ोसी के घर में पहले से ही बुक रहती थी। कभी - कभी तो वो वहीं पर नींद की झपकियाँ ले लेते थे और जब आँख खुली तो हमेंशा की तरह अपनी माँ की बगल में सोये हुए होते। जिससे उन्हे ये कभी नहीं पता चल पाता था की वो नींद में चलकर आये हैं या उन्हे कोई अपनी गोद में झुलाता हुआ लाया है। हाँ कभी - कभी उनके गालों पर किसी न किसी के निशान छपे रहते थे। कभी कपड़े की सिलवटें जैसे तो कभी कुछ बलखाती डोरियों जैसे। जिन्हे वो जब भी छुते तो उन्हे दर्द तो नहीं होता था लेकिन अपने गालों को छुने में कुछ अलग सा महसूस होता। वो उठने के बाद उन्हे सहलाते ही रहते।

रोजाना की तरह वे अपने घर में सोये हुए थे। उनके कमरे में गोलियाँ चलने की काफी तेज आवाजें आ रही थी। न चाह कर भी वो उन आवाजों को अनसुना नहीं कर सकते थे। धड़ा - धड़ गोलियाँ कहीं दागी जा रही थी और लोगों के करहाने की आवाज़ें उन्ही आवाजों के घोल में मिली थी। लगता था की जैसे किसी बहुत ही बड़े ग्रोह से लड़ाई चल रही है। उनकी नज़र उनके दरवाजें पर दौड़ जाती। मगर ऐसा लगता था की दुनिया में खाली अब वही बचे हैं बाकि तो सब शिकार हो गये हैं। दीवारें आज थर थरा रही थी। बर्तनों के एक दूसरे से टकराने का शौर कमरे की शान्ती को और भी खौफनाक बना देता। अबकी बार तो आवाज़ तो और मजबूत थी। उस एक ही आवाज़ ने बाकी सारी आवाज़ों को दबा दिया था। अब तो छोटे - छोटे पटाखों के जैसे लड़ियों की आवाज़ तेज होने लगी जिसमें लगता था जैसे आदमियों के मरने की गुंजाइशे बड़ रही हो।

Monday, February 2, 2015

टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी


दूर से ही देख रही थी वो बांस की मजबूत कुर्सी और उसके बगल मे रखी वो टेबल जिसके ऊपर अगर हाथ रखकर कोई खड़ा भी हो जाये तो टूटकर नीचे ही गिर जायेगी। लेकिन अभी कुछ देर के बाद मे वहाँ पर भीड़ ऐसे टूट कर पड़ेगी के उसको रोकना यहाँ किसी के बस का नहीं होगा।

वो वहीं पर उस टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठे थे। ये उनका काम नहीं था लेकिन उनके पास इस काम के अलावा इस समय कुछ और करने को ही नहीं था इसलिये रोज़ सुबह निकल पड़ते और कईओ की दुआये लेते हुये उस जगह पर बैठ जाते। उनके हाथ दुख जाते मगर यहाँ पर बोल खत्म होने का नाम ही नहीं लेते थे और उनका काम था उन बोलों को शब्दों मे उतारना। कुछ इस तरह उतारना की पढ़ने वाले को उनके अन्दर दबे दर्द का बखूबी अहसास हो जाये और जिसके लिये उन बोलों को शब्दों के जरिये शहर में उतारा जा रहा है वो नंगे पाँव बस होता चला जाये।

उनके नाम के बिना ही उनको लोग जानने लगे थे और वो भी नाम के साथ किसी को नहीं जानते थे। ये इस वक़्त मे बनने वाले ऐसे रिश्ते थे जो लम्बे बहुत रहेगें लेकिन कभी एक - दूसरे पर जोर नहीं डालेगें। एक - दूसरे को खोजेगें जरूर लेकिन खोने से घबरायेगें भी नहीं। दूर हो जाने से उदास जरूर होगें लेकिन हताश नहीं हो जायेगें। यहाँ चेहरे की पहचान बिना नाम जाने थी और नाम की पहचान बिना चेहरे के। फिर भी इनकी उम्र इतनी थी के जगह को अपनी उम्र देकर उसकी जिन्दगी बड़ा देती।

रिश्ते, कितने मीठे और सूईदार होते हैं? ये हम वियोग या योग मे कह भी दे तो उसमें बहस करने की कोई बात नहीं है। ये तो सम्पर्ण करने के सामन होता है। जिसके करीब उतना ही मीठा और जिसके बहुत करीब उतना ही सूईदार। जिससे दूर जाना उतना ही मीठेपन का अहसास कराता और उससे बेहद दूर जाना उतना ही सूईदार। कोई अगर ये कह दे तो क्या उससे लड़ने जाया जा सकता है? ये तो वे अहसास से जो बिना माने या मानने से इंकार भी किये सफ़र कर ही जाता है। इसमे "मेरी" "तेरी" की भी लड़ाई हो सकती है और लड़ाई हो भी क्यों भला? ये जीवन की वे लाइने हैं जिसमें दोनों ओर से न्यौता खुला होता है। बिलकुल फिल्मों के उन गानों की तरह जो न तो किसी हिरोइन के लिये गाये जाते हैं और न ही किसी हीरो के लिये। मतलब वे गाने फिल्म के किसी क़िरदार के लिये नहीं होते। वे तो जीवन का कोई हिस्सा पकड़कर उसके मर्म के लिये गाये जाते हैं। उसका अहसास गाने वाले के लिये भी होता है, गाने पर अदाकारी करने वाले के लिये भी, गाना लिखने वाले के लिये भी और गाना सुनने वालों के लिये भी।

उनके पास इतने पेपर पड़े होते जितने की उस टेबल पर नहीं होते थे। वे लगातार लिख रहे थे। क्या लिख रहे थे उन्हे ये मालुम था लेकिन सो मे से कितने अलग है वे नहीं। विषय एक जैसा होता, मगर उसके नीचे बनी वे चार लाइने कहीं भी ले जाने का दम भरती थी। इन कागजो को भरने की कोई किमत नहीं थी और न ही कोई ये किमत अदा कर सकता था। वे कागज और उनपर लिखी वे चार लाइनें उन भेदों को भी खुलेआम खोलकर रख देती जो कई समय से दिल के अंदर बसी मीलों का सफर कर रही थी। कई जगहें बदलकर यहाँ तक आई थी और न जाने कितनी और आगे जायेगीं। कोन कहाँ से क्या लाया है और कोन किसके साथ क्यों आया है? कोन कैसे यहाँ आया है और कोन किसको कहाँ लेकर जायेगा? ये सब भरा हुआ था। इसको अगर यहाँ आज खोल दिया तो इसकी मौत निश्चित है फिर मरे हुए के सामने हम रोने के अलावा क्या कर सकते हैं? या उसे कुछ देर दोहराकर भूल जाने के लिये तैयार हो जाते हैं और अगर दोहराकर भूलकर जाने के लिये ये सब दोहराया जायेगा तो इसका जिन्दा रहना जरूरी है। इसलिये इसको इतना ही गाया जाये तो ठीक है नहीं तो मिलने की मिठास खत्म हो जायेगी।

पुछताछ की मार से सभी यहाँ अच्छी तरह से वाकिफ हो गये थे। सबको अंदाजा हो गया था की यहाँ कोन कब आकर क्या पूछेगा? और हमें किन बातों और जवाबों के लिये तैयार रहना है। इसी को यहाँ पर सभी ने खेल बना लिया था। हर कोई जैसे मसखरी करने के लिये कोई रूप धारण करना चाहता था। जहाँ पर सभी किसी मोहर के नीचे दब जाने का खौफ पालते थे वहीं पर वो सभी मे उसका लुफ्त बाँट रही थी। वे अपनी गली की सबसे मसखरी औरत थी। मजा तो जैसे उनके शरीर का ही हिस्सा था। हर कोई उनको जानता था मगर कोई ये नहीं जानता था की आज और कल के बीच मे उनके खुरापाती दिमाग मे कोनसी छेड़खानी जन्म ले लेगी और वो उस दिमाग को हमेशा खाली और शांत रखती जिससे उनको खेलना है। सारे कागजात लेकर जब सारे मर्द लोग जमीन और जगह के लिये निकल जाते तो उनका खेल शुरू होता।