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Thursday, June 13, 2019

मोहल्ले का पहला घर


हवा जैसे उनके इस कमरे में बिना किसी बंदिश के सफर करती और धूप कोनों में से आकर उनको चूम जाती। मटको को एक के ऊपर एक रखकर उन्होने एक कमरा बनाया हुआ था। तीन तरफ मटको की दीवार बनाकर उसपर हल्की चटाई के साथ तिरपाल डालकर उसे छत का नाम दे रखा था जिसमें बाहर की हर चीज़ शामिल हो जाती तो दूसरी तरफ कमरे के अन्दर का हर माहौल और समय बाहर की दरो - दीवारों को खुद में मिला लेता। ये ऐसा रोशनदान था जो दीवारें होने के बाद भी दीवारे नहीं थी और रोशनदान होने के बाद भी रोशनदान नहीं था। सभी कुछ एक – दूसरे की तस्वीरों में निगाह जमाने जैसा कोई ख़ास पहलू। दीवारें, सुनते ही जैसे दिमाग में मजबूती और महफूज़ियत का दम भरने लगती हैं। जो अगर बाँटती है किन्ही से तो दूसरी तरफ एक और तरफ बनाने का आसरा देती हैं। मगर यहाँ जैसे दीवारें कम और खिड़कियाँ ज्यादा थी। हर छेद एक झरोखा जो यहाँ के हर हिस्से को एक – दूसरे से जोड़कर एक ही बना देता है। इसका कोई एक तरफ नहीं है। कभी कोई किरदार दरवाजे नहीं बल्कि किसी दीवार से कुछ मांग लेता तो कभी कोई बच्चा वहीं से कोई चीज़ पकड़ा देता। दीवार छूकर पकड़ लेने का खेल खेलती जिसमें उन्हे भी तो मज़ा आता था। जब चाहे वो उन्ही मटको की दूरी से बने छेदों से किसी को आवाज़ लगाकर बुला लेती। वहीं एक अन्दर खड़ी हो जाती और एक बाहर बस, बातें होना शुरू हो जाती। उन्हे बातें करते हुए लगता जैसे न तो यहाँ किसी का अन्दर है और न ही बाहर।

कई पहरेदारों और सरकारी कर्मियों का ये जमावड़ा थी। हर लाइन के बन्दे यहाँ पर आकर टकराते थे। किसी से भी कुछ भी करवालों, हाँ बस, थोड़ा सा खर्चा करना होगा। ये रीत बड़ी दिलचस्प सी बनती जा रही थी। कहीं पर दो लोग रात में अपने आप ही चौकीदारी का काम करने के लिए खड़े हो जाते थे तो कोई दो लोग सबका कूड़ा सकेरने तो कोई दो लोग गलियों की सफाई करने के लिए काम का महीना पूरा होते ही सब पँहुच जाते अपने - अपने हिस्से के पैसे मांगने। कम से कम एक रुपया हर घर से या ज़्यादा से ज़्यादा दो रुपया, अच्छे खासे पैसे उनकी जैबों मे बन जाते।

Friday, June 7, 2019

थोड़ा और इंतजार



भरी दोपहरी में जैसे सब कुछ शांत पड़ा है। सारी आवाजें जैसे यहां से होकर गुज़र चुकी हैं। लेकिन यहां पर कोई भी नहीं रूकी है। पूरी जगह ने सारी आवाजों को अपने शोख़ लिया है। जहां पर अस्पताल बिमार को सिर्फ बिमारी से जानता है और अस्पताल की कुछ जगहें बिमार को पेपरों से तो कुछ सिर्फ दवाइयों से। वहीं पर कुछ कोने ऐसे भी होते हैं जहां पर बिमार सिर्फ बिमार होता है।

फोटोस्टेट की मशीन सुबह से चल रही है। दुकानवाला कई बार उसे बंद कर चुका है। एमरजेंसी के गेट के साथ ही में इस दुकान से ही मालुम पड़ रहा है की आज कितनी भीड़ है। जितनी बाहर दिखाई दे रही है उससे कई ज़्यादा शायद अंदर होगी। बाहर वाले बाहर ही बैठे सुस्ता रहे हैं और अंदर वाले अंदर ही रूके हैं। ना तो कई समय से, बाहर से अंदर जा रहा है और ना ही कोई बाहर आ रहा है। कई पर्चे दुकान के बाहर ही बिखरे पड़े हैं। हर पर्चा जैसे अपनी अहमियत खो चुका है। दवाइयों के छिले हुए लिफाफे और पत्ते ज़मीन को छुपाये हवा से यहां से वहां नाच रहे हैं। कई गोलियां, केपशूल, इंजेक्शन और बोतलें खाली हो चुकी हैं। कुछ तो ज़मीन पर बिछी चटाई के हवाले हो गई है। इस चटाई का मालिक कौन है, वे कहां गया है, ये उसके काम की थी या गलती से भूल गया है? ये सोचते हुये और उन्हे देखते हुए निकलना कोई बड़ी बात नहीं है।

दोनों हाथों की कलाइयों में गुलुकोश की सुइयां लगाए एक लगभग साठ साल की बुर्जुग औरत उस चटाई पर आकर बैठी। हाथों में दो लीटर की बड़ी पानी की बोतल और उसी हाथ में अपने पेपरों की थैली पकड़े वो वहीं पर आकर बैठ गई। वो बोतल को अपनी पुरी कोशिश से खोल रही है। हाथ कांप रहे हैं। पतले पतले हाथों की नसों को उस जोर से उभरते हुये देखा जा सकता है। धूप की चमक जैसे ही उसके उन हाथों पर पड़ती तो सुई की जगह पर लगा लाल रंग चमक उठता। हल्का-हल्का खून जैसे उस जगह पर जम चुका है। उन्हे कोई नहीं देख रहा बस, एक कुत्ता उनकी ओर पूरी से तरह ध्यान दिये हुए है। लेकिन वो किसी की ओर नहीं देख रही है। बड़ी जोर आजमाइश के साथ उन्होनें अपनी उस बोतल का ढक्कन खोल लिया और दोनों हाथों की पूरी ताकत से उस दो लीटर की बोतल को उठाया। मगर उनकी ये पहली कोशिश पुरी तरह से कारगर नहीं हो पाई। उन्होने फिर से कोशिश की। इस बार मुंह तक बोतल तो गई लेकिन पानी मुंह तक नहीं जा पाया। कुछ बूंदे मुंह में ज़रूर गिरी होगी लेकिन बाकी का सारा पानी उनके कपड़ों पर गिर गया। उनकी प्यास नहीं भुजी। उन्होनें अपनी थैली को खोला और उसमें से एक प्लासटिक का गिलास निकाला। वो शायद गंदा था। उन्होने उस गिलास में थोड़ा सा पानी भरा और उस गिलास को खंगाल कर पानी फेंक दिया। फिर उसमें दोबारा से पानी और उस कुत्ते की ओर खिसका दिया।

कुछ देर के लिये वो उस कुत्ते को देखती रही और वहीं बैठी रही।

दूसरी तरफ से एक औरत अपने तीन छोटे बच्चों के साथ में बैठ गई। एक बड़ी सी पन्नी ज़मीन पर बिछाकर। उसके तीनों बच्चे उसकी ओर देख रहे हैं। इस तरह से जैसे वो अभी ही कुछ ही देर में गिर पड़ेगी। वो अपने दोनों हाथों से ख़ुद को रोके हुए है। ज़मीन पर उसने अपने दोनों हाथों को जमाया हुआ है। कुछ देर तक वो इसी तरह से बैठी रही। उसके तीनों बच्चे उसी की ओर देखते रहे।

"आपने सुना नहीं है क्या आपको एक्शरा करवाकर लाना है।" एक जोर दार आवाज़ उनके कानों में पड़ी। एक आदमी जिसने अपने मुंह को ढक रखा था और हाथों में प्लासटिक के दस्ताने पहने हुए थे। वो एक टक लगाये उस शख़्स को देखती रही। उन्होनें जल्दी से अपने कागज़ों की पन्नी में से एक बड़ा मिटिया रंग का लिफ़ाफ़ा निकाला और उस शख़्स के हाथों में थमा दिया।

ये पुराना है। आपकों समझ में नहीं आता है क्या?” उस लिफ़ाफ़े को बिना खोले ही उस शख़्स नें उस औरत को वापस दे दिया। वो औरत वहीं पर बैठी उन एक्शरों में कुछ झांकने लगी और वो आदमी आगे की ओर बड़ गया। साथ वाली चटाई पर एक पूरा परिवार बैठा है। अपने बीच में अपने पेपरों को बिछाए। उसे नम्बरबारी से लगाते हुये वो उस आदमी को देख रहे हैं।

हां जी आपका क्या है?” वो आदमी उनकी ओर देखते हुए बोला।
उनमें एक शख़्स अपने पेपर उनको पकड़ाते हुये बोला, “जी इनको टीबी की शिकायत बताई है।"
वो आदमी पूरे पेपर देखते हुये बोला, “तुम्हे कैसे पता की इनको टीबी की शिकायत है?”
जी वो हमारे मोहल्ले के डाक्टर ने बोला था।" वो आदमी नज़र चुराते हुये बोला।
वो आदमी इस नज़र को भांपते हुये बोला, “भाई साहब टेस्ट तो इसमे एक भी नहीं है और आप सीधा सीधा टीबी बोल रहे हैं। मैं क्या देखकर समझूं की इनको क्या है? पहले पूरे टेस्ट तो कराइये ना।"

वो आदमी आगे बड़ गया।

जिस-जिस ओर वो आदमी जाता सभी की नज़र उस ओर ही हो जाती। मगर कुछ हिस्सा अब भी अपने में ही लीन था। इस सब क्रिया से अंजान था। पूरी जगह में जैसे गुट बने थे। कोई किसी का इंतज़ार करता दिख रहा था तो कोई पहली बार आया। कोई किसी के साथ आया था तो कोई सिर्फ सुस्ता रहा था। कोई खुद ही मरीज़ था तो कोई मरीज़ के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था। कोई दवाइयां लेने के लिये बैठा था तो कोई फोर्म भरने के लिये। कोई कुछ बेच रहा था तो कोई खुद ही नौकरी पर था। कोई सोने के लिये आया था तो कोई जैसे कई रातों से सोया ही नहीं था। कोई खाना खाने लिये तैयार हो रहा था तो कोई खाना खाकर भागने के लिये तैयार था। कई लोग, कई गुट, कई परिवार, कई मरीज़, कई साथी, कई कामगार सभी एक-दूसरे के करीब आकर दूर हो जाते। कोई जैसे किसी को नहीं जानता था और ना ही जानना चाहता था फिर भी एक ही धूप से बच रहे थे और एक ही छांव में बैठे थे। एक ही हवा खा रहे थे और एक ही ज़मीन के हिस्सेदार थे। हर कोई अपने शरीर में कोई ना कोई बिमारी लिये हुए बस, उसकी समाप्ती के लिये दुआ करने के लिये इस अस्पताल में हाज़री भरने के लिये आया हुआ था।



लख्मी 

Friday, May 31, 2019

इंतज़ार कक्ष


कोई एम्बूलेंस की आवाज़ नहीं। धूप के साथ जैसे इंतज़ार करते बिमारों के रिश्तेदार अब ख़ुद भी सुस्ताने लगे हैं। छुट्टी का दिन है। बड़े डाक्टरों के बिना चलते अस्पताल का इंतज़ारिया कमरा भी बिना किसी रोकटोक के सुस्ता रहा है। छोटे डाक्टर भी दिखना बंद है। अस्पताल के कर्मचारी ही यहां से वहां भागते दौड़ते दिख रहे हैं। कम्बल, शॉल, पतली रजाइयां व पतली चादरों से देखती आंखे उन्हे ही निहार रही हैं। शायद जैसे कोई ख़बर उन्ही के हाथों मिल जाये। कमरे में इतनी कुर्सियां नहीं है जितना की जमीन पर अपने बिस्तर लगाये लोग पड़े हैं। कमरे के बाहर तीन से चार स्ट्रेक्चर खड़े हैं। उनमें से तीन भरे हैं। हाथ में अपना ही गुलूकोस पकड़े कोई लेटा हुआ है। उसके बगल में खड़ी एक औरत उससे कुछ पूछ रही है। बाहर स्ट्रेक्चर हैं और कमरे के अन्दर कई बिमार लोग। कोई कमर में गर्मपट्टी बंधाये कमर की तकलीफ से परेशान है तो कोई पैशाब की जगह एक नली पकड़े लेटा है। कोई मुंह को कपड़े से धका हुआ है तो कोई आंख के दर्द से परेशान है। ये वेटिंगरूम ही इनका अपना वार्ड है और बिस्तर अपना बेड। बस, यहां पर कोई बेड नम्बर नहीं है। बस, अपने पर्चे अपने सिरहाने पर लेटे है। खुद से अपना बेड तलाशते व बनाये ये लोग डाक्टर का इंतजार करते हैं और यह भी मालूम यहां कब तक रहना है। हां, मगर यह जरूर पता है कि यहां कबसे है। बस, ख़ुश हैं कि इलाज हो रहा है। पैसा बच रहा है। यहां पर कोई मिलने का टाइम नहीं है। जब मर्जी रिश्तेदार आ जा सकते हैं। अस्पताल के कर्मचारी भी इससे संतुष्ट दिख रहे हैं।

यह वेटिंगरूम दिल्ली से बाहर से आये लोगों से भरा है। गुड़गांव, फरिदाबाद, दादरी, बलम्भगड़, गाजियाबाद लोगों से तो बाहर एमरजेंसी के सामने की खाली जगह में दिल्ली में ही रहने वालों की भीड़ जमा है। पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, बेग़मपुर, कटवारिया सराय और खानपुर। यहां पर एक जन से जब यह मालुम किया तो वह बोला कि पुरानी दिल्ली वालों का तो यह अपना अस्पताल है। वे तो यहां पर बुखार, पेट दर्द, कब्ज़ और तो और एसीडिटी की दवाई भी लेने आ जाते हैं। यह बात उन्होने बोली और जोर जोर से हंसने लगे। शायद यहां पर उनका अपना कोई नहीं था। अभी फिलहाल धूप इस जगह में चली रही है। ख़त्म होने के साथ आगे की ओर बड रही है और लोग उसके साथ साथ अपना बैठने का ठिकाना तलाशते व बनाते लोग आराम कर रहे हैं। यह जगह बिमारों से भरी हुई है। एम्बूलेंस, चौकीदार की सीटी, भारी स्ट्रेक्चर खींचने आवाज़ जैसे यहां के लिये आम सी आवाज़ है और उसके साथ साथ किसी के रोने, दर्द में चिल्लाने की भी। लेकिन फिर भी इस आवाज़ के होते ही सभी उसी ओर देखने लगते हैं। वेटिंगरूम में एक दूसरे से अपनी बिमारी / तकलीफ बांटते लोग इसी में संतुष्ट दिखे की उनके जैसे यहां कई हैं। एक दूसरे की छुट्टी की खबर सुनते ही उनको यह लगता दिखता की अब उनको भी जल्दी ही छुट्टी मिल जायेगी।

लेकिन आज सरकारी छुट्टी होने से कईओ की जैसे छुट्टी केंसल हो गई।




लख्मी 

Thursday, May 9, 2019

स्ट्रीट फूड - कहानी भाग तीन


एक दिन मिड्डे-मील थोड़ा देरी से आया। स्कूल में सभी बच्चे अपने बर्तन लेकर यहां से वहां घुम रहे थे। स्कूल में आधे से ज्यादा बच्चे तो इसलिये आधी छुट्टी के बाद टिकते थे क्योंकि खाने को खाना मिलता था। स्कूल का बड़ा गेट खोला गया। एक सफेद रंग का आटो रिक्सा अंदर दाखिल हुआ। सभी बच्चे लाइन लगाकर खड़े हो गये। खाना बांटने वाले टीचर भी आ गये। आटो का दरवाजा खुला और बच्चों में खुद होने की चहलकदमी दिखने लगी। बड़े - बड़े बर्तनों को नीचे रखा गया। जैसे ही उसका ढक्कन खोला गया तो उसमें से गर्म महक बाहर निकली। बच्चों मे और ज्यादा खुशी की लहर दोड़ गई। मोन्टू सबसे पीछे खड़ा था। उस तक जैसे ही वो महक गई तो वो आगे की ओर दौड़ा। इतने में टीचर ने चमचा सब्जी में चला दिया। मोन्टू बहुत तेज दौड़ा और टीचर का हाथ पकड़ लिया। टीचर ने गुस्से में मोन्टू की ओर देखा और जोर से कहा "किस क्लास के हो तुम, अपनी जगह पर जाओ।" मोन्टू ने हाथ नहीं छोड़ा। टीचर ने फिर से गुस्से में पूछा "हाथ छोड़ो, क्या बात है?” मोन्टू ने कहा "सर ये सब्जी बुस गई है, खराब हो गई है। इसे खाया तो सब बिमार हो जायेगे।" टीचर ने भी सूंघा। उन्हे ऐसा कुछ नहीं लगा। उन्होने कहा "तुम्हे कैसे मालूम?” मोन्टू बोला "सर देखिये इसमें झाक हो रहे हैं।" टीचर जी ने उस खाना लाने वाले को बुलाया और पूछा "ये खाना खराब है और तुम बच्चों को यह खिला रहे हो?” खाना लाने वाले ने कहा "हमें नहीं मालूम होता सर। जो हमारी गाड़ी में रख दिया जाता है हम उठा लाते हैं।" टीचर जी ने वो सारा खाना वापस लौटाया और मोन्टू के नाम की पूरे स्कूल में ताली बजवाई। मोन्टू बेहद खुश हुआ। और वो स्कूल से निकलकर फिर से उसी जगह पर जाकर बैठ गया। वहां पर आज का पूरा दिन दोहराने लगा। उन कॉपी को देखता रहता जिसमें उन रेहड़ी वालों ने उसे मसालो व स्वादिस्ट खानों की लिस्ट बनवाई थी। वे उन्हे देखता और पढ़ता रहता।

घर पर भी उसका मन नहीं लगता था। घण्टों खामोश बैठा रहता। एक दिन उसके पिताजी ने उससे पूछा "क्या हुआ मोन्टू तुम इतने चुप चुप क्यों बैठे रहते हो? दोस्तों से झगड़ा हुआ है क्या?” मोन्टू कुछ ना कहता। बस, ना में गर्दन हिला देता। पिताजी ने फिर से पूछा "मुझे नहीं बताओंगे? मैं तो तुम्हारा दोस्त भी हूँ ना!” मोन्टू उनकी गोद में लेट जाता है और पूछता है "पापा जब को हमसे दूर हो जाता है तो हम उसे याद कैसे करते हैं?” उसके पिताजी यह बात कुछ समझ नहीं पाये। वे थोड़ा रुके और सोचे की वो अपनी मम्मी को याद करके दुखी है। उन्होनें उन्ही को सोचते हुए जवाब देना बेहतर समझा और कहा "उनकी कही हुई बातों को दोहराकर और आधी बातों को पूरा करके। मालूम है बेटा तुम्हारी मम्मी हमेशा मुझे आधी बात बताती नहीं थी। हमेशा या तो अपने में ही छुपा लेती तो कभी अपनी डायरी में लिख लेती। मैं आज भी उसकी डायरी को पढ़ता हूँ। ऐसा लगता है जैसे तेरी मां से ही बात कर रहा हूँ।" मोन्टू उन्हे देखकर मुस्कुराने लगा। उसने फिर से पूछा "क्या मम्मी की डायरी भी आपसे बात करती है पापा?” पिताजी बोले "नहीं, वो तो नहीं करती मगर मैं ही कभी तेरी मम्मी बन जाता हूँ तो कभी तेरा पापा।" मोन्टू चौंक कर बोला "अच्छा! कैसे पापा?” पिताजी बोले "मैं तेरी मम्मी का लिखा पढ़ता हूँ और उसे पीछे खाली पेज पर उस बात का जवाब लिख देता हूँ। और कभी इस बात पर तेरी मम्मी क्या कहती ये सोचकर उसका भी जवाब लिख देता हूँ।" मोन्टू हंसने लगा। पिताजी भी हंसने लगे। ऐसा लगा जैसे मोन्टू की मम्मी उन्ही के बीच में बैठी हंस रही है। मोन्टू ये महसूस कर सकता था।

दूसरे दिन मोन्टू एक घण्टा पहले ही स्कूल चल दिया। बसते में कुछ कोरे कागज भी भर लिये। और पहुँच गया उसी जगह पर जहां पर वो रेहड़ियां लगा करती थी। वहां पर बैठ कर उनकी बताई खाने की लिस्ट उन कोरे कागज पर लिखने लगा। साथ ही मसालों की भी। और वहीं पेड़ पर चिपका देता। ऐसा वो रोज करता। वहां पर क्या मिलता था। और वो कैसे बनता था। यह सब लिखकर टांग देता। शुरूआत में तो लोग उसे देखकर बच्चे का खेल समझकर चले जाते। लेकिन जब वो पेड़ उन कोरे कागजों से भरने लगा तो लोगों की भीड़ वहां पर लगने लगी। लोग उन सबको पढ़कर खुश होते, हंसते - खिलखिलाते और वहीं कुछ देर टिक जाते। पेड़ का चबूतरा साफ रहने लगा। जो लोग यहां - वहां दुकानों पर काम करते थे वे वहीं पर आकर अपना टिफिन खाने लगे। धीरे - धीरे लगा की जैसे वही माहौल वापस लौट आया हो। मोन्टू के लिये एक वही जगह उसका स्कूल तो नहीं, ना ही क्लास बनी लेकिन लंच टाइम की जगह जरूर बन गई।

आज स्कूल में 14 नवम्बर मनाया जा रहा था। जिसकी तैयारी काफी दिनों से चल रही थी। वे सभी बच्चे पूरी तरह से तैयार थे जिन्हे टीचरों ने बोल दिया था कि उन्हे क्या सुनाना है। टीचरों ने खुद ही उनकी तैयारी कराई थी। मोन्टू भी इस खास दिन में हिस्सा लेना चाहता था। उसने अपने दोस्तों से, अपनी क्लास टीचर से कहा लेकिन बिना तैयारी के उन्होनें मना कर दिया। क्योंकि इलाके के बड़े नेता आ रहे थे। उनके सामने कोई बिना तैयारी के गया तो पूरे स्कूल का नाम खराब हो जायेगा। मोन्टू ने सबसे पीछे खड़ा हो गया। खाना बांटने वाले टीचर उसके पास गये और कहा "तुम आगे क्यों नहीं जाते?” मोन्टू बोला "मैं कुछ सुनाना चाहता हूँ मगर कोई सुनाने ही नहीं देता।" वो टीचर ने मोन्टू का हाथ पकड़ा और आगे ले जाकर कहा "सुनाओ जो सुनाना है?”

मोन्टू सहमा सा सबके सामने खड़ा हो गया। टीचर की जगह पर खड़ा होकर पूरे स्कूल के बच्चों को देखना उसके लिये पहला अवसर था। जो टीचर उसको हाथ पकड़कर लाये थे उन्होने बिना आवाज़ किये कहा "बोलो।" मोन्टू फिर शुरू हुआ। उसने एक कविता सुनाई जो "खाना" पर लिखी थी। जिसमें स्ट्रीट पर लगने वाले स्वाद का जिक्र था।

स्कूल के बाहर हैं लगती रेहड़ी।
                  नई – पुरानी, लंबी रेहड़ी।

लख्मी 

Wednesday, May 8, 2019

स्ट्रीट फूड-कहानी भाग दो

कहानी भाग दो

अगले दिन दोहपर को जब वो स्कूल पंहुचता है तो देखता है कि जहां पर रेहड़ी लगी होती है वहां पर सब कुछ बिखरा पड़ा है। हर तरफ छोले - कुलचे, कचोडियां, टिक्की - समोसे सब कुछ जमीन पर पड़ा है। मगर किसी की भी रेहड़ी वहां पर नहीं है और ना ही रेहड़ी वाले वहां पर है। बिखरे हुए समानों मे से सड़क पर घूमते बिखारी और कुत्ते चुन चुनकर खा रहे हैं। और कुछ स्कूल के लड़के वहां पर पड़े में से कुछ ऐसा बीन रहे हैं जो उनके काम का हो। भीड़ लगी है। लड़कियों के स्कूल की छुट्टी हो चुकी है। लोग कुछ देर रूकते और फिर बिना कुछ कहे चल देते। वो देखता है कि किसी को कोई फर्क नहीं है। जो लोग यहां इस सड़क के किनारे रोज दिखते थे। अपना काम करते थे। लोगों का पेट भरते थे वो आज सभी गायब है और किसी को कोई फर्क ही नहीं है। मोन्टू यह सब देखकर रूहांसा सा हो गया। वो वहीं पर बैठ गया औ रोने लगा। उसने भी जमीन पर पड़े समानों से कुछ बिनना शुरू किया। मसालो के डिब्बे, अखबारों के टुकड़े जो प्लेट की तरह इस्तमाल होती थी, चाकू, नेपकीन, साबूत नींबू सब कुछ उठाकर उसने वहीं एक पेड़ के नीचे रख दिया और यहां - वहां पर नज़र मारने लगा। लोगों से पूछने लगा की यह सब क्या हुआ और रेहडी वाले कहां गये। कोई बताता कि यहां पर किसी ग्राहक से लड़ाई हो गई वो और लड़के ले आया सब कुछ तोड़ गया। कोई कहता दो सांड आपस में लड़ रहे थे उन्होने किया यह सब। वो सबकी सुनकर यहां वहां देखता तो कहीं पर भी कोई रेहड़ी नहीं दिखी। उसने फिर एक रोते हुए आदमी से पूछा "अंकल क्या हुआ?” वो रोते हुए बोले "अरे बेटा एक गरीब आदमी अपनी मर्जी से कोई काम भी नहीं कर सकता। सरकार नहीं चाहती की हम खाये पिये।" मोन्टू के समझ मे नहीं आया। वो उस रोते हुए आदमी को देखता रहा। वो फिर से बोला "कमेटी आई थी। सब कुछ तोड़ गई और बचा - कुचा ले गई।" वो आदमी फिर से रोने लगा। मोन्टू चुपचाप स्कूल आ गया।

स्कूल में आज 14 नवम्बर मनाये जाने की तैयारी चल रही है। प्रार्थना वाली जगह पर ही सभी टीचर, प्रिंसिपल और बच्चे खड़े हैं। वो भी पीछे से उसमें जुड़ जाता है। प्रिंसिपल सबसे पूछ रहे हैं कि सब क्या बनना चाहते हैं? वो जिसकी तरफ हाथ करते उस बच्चे को बताना होता कि वो क्या बनना चाहता है और क्यों? कईओ की ओर प्रिंसिपल का हाथ गया। सभी बोल रहे हैं "टीचर, डाक्टर, एक्टर, वकील, साइनटिस्ट, पुलीस" ज्यादातर जैसे सभी को पहले से ही मालूम है कि उन्हे क्या बनना है। प्रिंसिपल सबके सपने पर "शबाशी" दे रहे हैं। इस बार उनकी उंगली मोन्टू पर जाती है। मोन्टू सहमा सा खड़ा होता है। सभी विद्यार्थियों की ओर देखता है। सभी मोन्टू को घूर रहे हैं। वो थोड़ा रुकता है फिर बोलता है "मैं रेहड़ी लगाने वाला बनूंगा।" सभी उसकी ओर देखकर बहुत जोरों से हंसते हैं। टीचर जी के चेहरे पर भी मुस्कान आती है। प्रिंसिपल साहब कुछ नहीं बोलते। बस, पुछते हैं "क्यों बेटा?” मोन्टू कहता है "वो जब खाना बनाते हैं तो लोग अपनी यादों मे चले जाते हैं। अपना पेट भरते हैं और कोई ना कोई बात को याद करते हैं। वहां पर वो भी आते हैं जो जानते हैं और वो भी जो नहीं। सब साथ में खाते हैं। मैं भी ऐसी जगह बनाना चाहता हूँ।"

सभी उसको देखते रह जाते हैं। प्रिंसिपल साहब कुछ नहीं कहते। बस, हाथ के इशारे से उसको बैठने को कहते हैं। फिर उनका हाथ किसी और के ऊपर जाता है। वो कहता है "सीआइडी" प्रिंसिपल के मुंह से निकलता है "शबाश" यहीं चलता रहता है। आज का दिन उदासी में बीत जाता है। मोन्टू घर आ जाता है। खमोश और सुस्त। शाम को जब पिताजी आते हैं तो उनसे पूछता है "पापा ये कमेटी क्या होती है?” उसके पिताजी समझ नहीं पाते। वो उसकी ओर देखते है और पूछते हैं "तुम ये क्यों पूछ रहे हो बेटा?” मोन्टू कहता है "आज स्कूल के बाहर कमेटी आई थी और सारे रेहड़ी वालों को ले गई। उनका समान भी तोड़ गई। सब कुछ बिखेर गई।" उसके पिताजी यह सुनकर कहते हैं "बेटा कमेटी सरकार की ऐसी योजना है जो सड़क पर लगने वाले अवैध कार्यों को उठा सकती है। तोड़ सकती है। ताकि उन्हे खाने वाले बिमार ना पड़े। मरे नहीं। स्ट्रीट फूड से कई बिमारियां होती हैं। उन्हे रोका जाता है। ताकी लोग तंदरूस्त रहे।" मोन्टू को यह सब समझ में नहीं आया। वो बोला "मगर पापा मैंने देखा है कि वहां से खाने वाले तो कभी बिमार नहीं पड़ें। वो तो रोज आते थे। फिर क्यों हटाया उन्हे वहां से?” पिताजी बोले "बेटा उन्होनें दुकान लगाने की परमिशन नहीं ली होगी? इसलिये तोड़ दी।" मोन्दू बोला "मगर पापा तोड़ी क्यों? पहले पूछते कि लोग बिमार तो नहीं पड़े। लोगों से पूछती। जब वो कहते तो हटा देती। क्या इसको रोक सकते हैं रेहड़ी वाले?” पिताजी ने कहा "बेटा जो रेहड़ी लगाते हैं वो ना अपने इलाके में लगाने के कुछ पैसे देते हैं। जो अवैध होता है। और जैसे ही पैसा देना बंद कर देते हैं तो ये होता है।" मोन्टू के ये तो समझ में आ गया था की उनके साथ जो हुआ है वो गलत है मगर ये समझ में अभी तक नहीं आया था कि ऐसा हुआ क्यों?

हर दिन अब मोन्टू उसी जगह पर जाकर बैठने लगा। कई दिन यूहीं बीत गये। मोन्टू वहां पर बनते माहौल को देखने रहता। सबकुछ लगभग वैसा का वैसा ही रहता। आवाज़ें, आना-जाना, गाड़ियों का शोर और लोगों का वहां पर रूकना और कुछ समय देना। मगर वो खूशबू गायब हो चुकी थी जो उसे अपनी ओर खींचती थी। मोन्टू का मन अब पढ़ाई में बिलकुल नहीं लगता था। बस, दोस्तों से स्कूल में मिलते मिड्डे-मील के ऊपर वो बातें करता। कहता "मालुम है इस सब्जी को कैसे बनाते हैं? मालूम है इसमें क्या - क्या डालते हैं?” उसके दोस्त उसकी सूरत देखते जाते।

लख्मी 

Tuesday, May 7, 2019

स्ट्रीट फूड

कहानी भाग 01

मोन्टू का कभी मन पढ़ाई में लगा ही नहीं। उसके पिताजी जहां उसे पढाई की ओर धक्का देते वो उतना ही पढाई से दूर होता जाता। मोन्टू के पिताजी अपने ही इलाके में वेल्डिंग की दुकान चलाते थे। मोन्टू अपने घर में अकेला ही था। पिताजी चाहते नहीं थे की उनका लड़का भी उन्ही की तरह ऐसे किसी काम को करे। इसलिये वे उसकी पढ़ाई को लेकर हमेशा चिंचित रहते। लेकिन कभी वो मोन्टू को कुछ करने से मना नहीं करते थे। उन्हे लगता कि मैं ही उसका दोस्त बन सकता हूँ। मोन्टू अभी पांचवी क्लास में पढ़ता है। हमेशा अपनी क्लास में अजनबी की तरह ही वे रहता। जहां बच्चे पिछले दिन पढ़ाये गये को लेकर रट्टे लगाते दिखते या किसी टीचर के खोफ से पढ़ते नजर आते वहीं मोन्टू सिर्फ बैठा दिखता।

मोन्टू का ज्यादा से ज्यादा वक़्त स्कूल में नहीं उसके गेट के सामने बितता। स्कूल में प्रार्थना और हाजरी लगवाकर वे भाग आता। यह उसका रोज का काम बन गया। वह कभी छोले - कुलचे की रेहड़ी पर दिखता तो कभी कोल्ड्रिंग रेहड़ी पर तो कभी टिक्टी - समोसे की तो कभी सब्जी-कचोड़ी की रेहड़ी पर वो बैठा दिखता और वहां पर जमती भीड़ को देखकर खुश होता। साथ ही सभी को खाते हुए देखकर उसे बेहद मज़ा आता। वो रेहड़ी वालों को अपनी रेहडी जमाते, खाना बनाते हुए देखता रहता। जैसे - जैसे रेहड़ी वालो के हाथ चलते तो उनके हाथों की हरकत को देख वह दोहराता। जिस तरह कोई संगीत सिखने वाला हर दम अपनी उंगलियां चलाता रहता है वैसे ही मोन्टू के हाथों में भी वो किसी खेल की तरह जमने लगा। अब तो ज्यादातर रेहड़ी वाले उसको जानने भी लगे। कभी कभी रेहडी वाले उससे पूछते "तू पढ़ता - वढ़ता नहीं है क्या?” तो वो गंभीर होकर कह देता "हमारे स्कूल में खाना बनाने का पीरियढ लगता है मैं उसमें फेल हो जाता हूँ तो मैं यहां से सिख रहा हूँ।" यह सुनकर रेहड़ी वाले खुश हो जाते। वे भी अपने को किसी टीचर से कम नहीं समझते। मोन्टू को अब रेहड़ी पर कितनी भी देर बैठने की इजाजत मिल गई। मोन्टू रेहड़ी वाले की इकलौती कुर्सी पर बैठ जाता और हर रोज़ एक नया सवाल करता। कभी पूछता "आपने ये बनाना कहां से सीखा?” तो कभी "आपने यह ही काम क्यों चुना?” तो कभी "क्या आपके बच्चे भी यह बनाना जानते हैं?”

मोन्टू के हर सवाल का जवाब रेहड़ी वाले बड़े ही प्यार से देते। हर एक चीज के बारे में बताते। बल्कि मोन्टू से लिस्ट बनाने को भी कहते। वे छोलो में क्या डालते हैं, कुलचो में क्या। मोन्टू भी सभी की लिस्ट बनाता।

एक दिन मोन्टू ने बड़े प्यार से छोले कुलचे वाले से एक सवाल किया "अंकल सबसे अच्छे छोले-कुलचे का स्वाद कैसा होता है?” तो रेहड़ी वाला हंसकर मोन्टू कि तरफ देखकर बोला "जिसमें हर मसाला एक दम सही डला हो। हल्की आंच पर पका हो। जिसे खाते ही खाने वाला अपने बीते कल में चला जाये। किसी और स्वाद को याद करने लगे। निवाला मुंह में डालते ही घुल जाये और मुंह से निकले "वाह!” यह सुनकर मोन्टू बहुत खुश हुआ। उसने जैसे आज कोई बेहद बड़ी चीज़ के बारे में जान लिया था। वो स्कूल वापस लौटा। अक्सर आठवें पीरियड में कोई नहीं आता। लेकिन आज उसके क्लास में पहुँचते ही हिन्दी के टीचर आ पहुँचे। पर इस बात से मोन्टू को कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला था। क्लास शुरू हो गई। सभी किताबों में अपना मुंह डाले बैठ गये। चाहे कोई पढ़ रहा हो या नहीं बस, क्लास में शोर नहीं हो चाहिये। टीचर जी ने अपना पूरा टाइम लिया और ऊपर की ओर निगाह करते हुए कहा "बच्चों किसी को किसी पाठ पर कुछ पूछना है या मैं जाऊँ?” कोई नहीं उठा। कोई नहीं चाहता था कि कोई भी टीचर ज्यादा देर क्लास में रूके। टीचर ने एक बार और इसी बात को दोहराया। फिर चलने के लिये खड़े हो गये। मोन्टू ने अपना हाथ उठाया कुछ पूछने के इशारे से। टीचर जी ने चौंकते हुए कहा "अरे मोन्टू भाई भी हैं क्लास में और कुछ पूछना भी चाहते हैं। ठीक है, पूछो।" पूरी क्लास पीछे मुड़कर मोन्टू की तरफ देखने लगी। सुबह जैसा सवाल उसने रेहड़ी वाले से पूछा था वैसा ही कुछ वो टीचर जी से पूछने को चला, और पूछा "सर एक अच्छी कहानी क्या होती है?” टीचर जी निगाह गाड़कर मोन्टू को देखने लगे। मोन्टू भी टीचर जी को देखने लगा। थोड़ी देर के बाद में क्लास गुपचुप हंसने लगी। टीचर जी ने सबको एक जज की तरह टेबल पर हाथ मारकर खामोश किया और कहा "अच्छी कहानी वो होती है जो तुम से को भी समझ में आ जाये, समझे।" मोन्टू यह सुनकर बैठा नहीं। टीचर ने कहा "बैठ जाओ। दे तो दिया उत्तर।" मोन्टू ने कहा "बस सर यह ही।" टीचर ही बोले "हां।" मोन्टू ने फिर से पूछा "बस सर।" टीचर जी ने बोला "अरे हां भई। क्या इसके आगे भी कुछ है?” मोन्टू चुपचाप बैठ गया। और टीचर बिना बॉय किये चले गये।


स्कूल की छुट्टी हो गई। सभी अपना बस्ता उठाकर भागने लगे। मोन्टू का घर स्कूल से दूर था। आज मोन्टू जहां खुश था वहीं वो स्कूल में कुछ उदास हो गया था। वो पूरे रास्ते देखता हुआ चल रहा है। आज पूरा रास्ता उसको अलग ही लग रहा था। हर तरफ कुछ ना कुछ बन रहा था। चारों ओर से खुशबू ही खुशबू उड़ रही थी। लोग रेहड़ियों, साइकिल दुकानों की अंगठियों से निकलते धुंए में खो रहे थे। वो सड़क के एक किनारे पर खड़ा उस खूशबू को खुद में भरने लगा। कभी पर पराठों को हाथों पर नचाते लोग दिखे। कहीं पर बड़े से पतीले में चमचा चलाते लोग। कहीं पर छोटे से तवे पर रोटियां सेकते तो कहीं पर छोटी प्लेटो को परोसते हाथ। वो यह सब देखकर बेहद खुश हुआ। चारों तरफ स्वाद ही स्वाद था। जैसे मोन्टू हर स्वाद को महसूस कर सकता था। वो बहुत तेजी से दौड़ा। पतली गलियों से निकलता हुआ। गलियों में कहीं दरवाजों पर दाल चावल बिनती औरतें बैठी है, कहीं गली में सब्जी बिक रही है, कहीं गली में मसाले की बड़ी सी रेहडी फंसी है तो कही गली में बच्चे आइक्रिम खा रहे हैं। मोन्टू दौड़ता हुआ, सबको पीछे छोड़ता हुआ अपने घर पहुँच गया। पिताजी के घर में आने में अभी काफी वक़्त था। मोन्टू को भूख लगने लगी। वो किचन में गया और कटोरदान खोला और रोटी निकाली। उसपर लाल मिर्च और नमक डाला। उसे थोड़े पानी से मसला और रोटी को गोल करके खाने लगा और खाते खाते सो गया।

शाम को मोन्टू के पिताजी आये। रोजाना की तरह नहाने को गये। उन्होनें खाना बनाया और मोन्टू को साथ में खाने को कहा। मोन्टू आया। आधी सी नींद में। पिताजी ने उसके सिर में हाथ मारा और पूछा "और कैसा रहा आज का स्कूल?” मोन्टू ने मुस्कुराकर पिताजी की ओर देखा और पूछा "पापा एक अच्छा खाना क्या होता है?” पिताजी ने मोन्टू को देखा और कहा "बेटा खाना खा।" और बात को टालने लगे। मोन्टू ने जिद्द की और फिर से "बताओ ना पापा।" पिताजी उनकी ओर देखकर हंसने लगे और मुस्कुराकर बोले "अच्छा खाना वो होता है जिससे पेट तो भर जाये मगर मन नहीं भरे। जिसमें मां की याद बसी हो और मेरे प्यारे से बेटे की सेहत भी।" यह सुनकर मोन्टू के चेहरे पर वो गायब हंसी फिर से लौट आई। आज उसने अपनी प्लेट का सारा खाना भी खत्म कि लिया। अन्दर वाले कमरे में खिड़की के बाहर झांकता रहा। बाहर लगी अण्डे के पराठें की रेहड़ी पर उठते धुंए को देखता रहा। फिर खिड़की पर ही सिर टिका कर सो गया। 

लख्मी

Thursday, June 19, 2014

Thursday, December 5, 2013

लाइलाज़ नज़ारें

बारिश अभी रुकी नहीं थी और लगता था की ये पूरे कनागत बरसने वाला है। चार दिन तो हो गये थे बसरते - बरसते। इन दिनों कहानियाँ का बिखरना थोड़ा कम है। एक – दूसर से मिलना जितना दुर्लभ है उतना ही इन मिठी और खमोश कहानियाँ का एक – दूसरे के मुँहजोरी करना भी।

लेकिन क्या सारी कहानियाँ मुलाकात पर निर्भर होती है?, नहीं - हर कहानी नहीं। कहानियों के पर लगे होते हैं जो खुद ही कहीं से भी कहीं उड़कर पहुँच जाती हैं। फिर उनको देखकर मुस्कुराती हैं जो मुलाकातों के ऊपर आर्क्षित होते हैं। कहानियों का एक खास बिछोना भी होता है जिसपर कोई भी कुछ देर सुस्ताकर जा सकता है और तकीये पर अपनी कोई निशानी छोड़ भी सकता है। क्या वो निशानी महज़ निशानी ही बनकर दम तोड़ देती है?

पूरा नाला पानी से भर गया था। काला - काला पानी किचड़ समेत सड़क पर निकलकर आने की कोशिश मे था। कुछ ही देर के बाद मे यहाँ पर जाम बस, लग ही जायेगा। जाम लगने का सबको पता होता लेकिन सरकार को कोसने और गाली देने के अलावा किसी को जरा सी भी फुरसत नहीं थी कि इससे आगे कुछ किया जाये। सबसे पहले तो नाले के गन्दे पानी की महक पूरे मे अपना नाम करती। उसके बाद मे पानी। नाले के साथ मे लगी दुकानों को चाहे इससे कोई फर्क पड़े या न पड़े लेकिन इन दुकानों से समान खरीदने आये ग्राहको को जरूर दिक्कत होने वाली थी। ऊपर से बारिश का पानी और नीचे से काला पानी दोनों रिस रहे थे। नाला टापना बहुत मुश्किल था तो लोगों ने इस पार से उस पार जाने के लिये कई सरकारी खम्बों का पुल बनाया हुआ था। सुबह और शाम मे यहाँ से पूरा का पूरा हुजूम गुज़रता है। इस नाले की कोई दिनचर्या हो या न हो लेकिन ये अनगिनत दिनचर्याओ का हिस्सेदार जरूर है।

सुबह के आठ बजकर तीस मिनट हो चुके हैं। सड़क पूरी लोगों से भरी है। नाले पर बने सारे पुल लोगों से भरे हुए हैं। नाले मे देखने और झाँकने की जिद्द सबकी तारतार है। ऐसा लगता है जैसे किसी मौत के कुएँ मे कोई खरतनाक शोह चल रहा है। जितने झाँकने वाले ज्यादा है उतने ही दूर से देखने वालों की भीड़ भी कम नहीं है। एक नाला आज कई कहानियाँ का बसेरा लगता है। गर्मागर्म नांद की तरह से हर कहानी पककर निकल रही है। दूर से देखने मे बस, एक यही खामी है तो मज़ा भी है। जो भी वहाँ उस भीड़ से बाहर निकलता है उसी के पास एक कहानी होती। न जाने उसमे क्या था और वो क्या बनकर बाहर आ रहा था।

नाले के एक दम साथ मे दीवार के नीचे एक औरत लम्बा सा घूंघट करके रोये चले जा रही थी। कोई भी उसका चेहरा नहीं देख सकता था। वो शायद अकेली भी थी। उसको रोता देखकर लोग उसे कुछ ऐसी निगाहों से देखते जैसे नाले के अन्दर बहती कहानी उसी से जुड़ी है। बारिश काफी तेज हो चुकी थी। वहाँ पर खड़े सभी तितर-बितर होने की कोशिश मे थे लेकिन उस औरत का रोना और वहाँ उस जगह से उठना तय नहीं था। नाले मे भी कुछ लोग कूद गये। कहीं जिसके कारण ये सब घटा है वो ही कहीं बह न जाये। नाले के पानी का बहाव काफी जोरो से था आज। नहीं तो हमेशा ये रूका रहता है। कुछ न कुछ कूड़ा इसमे अटका रहता है लेकिन आज तो इसकी रफ़्तार देखने लायक थी। न जाने किसका साथ दे रहा था।

नाले के चारों तरफ लोग रैलिंगों पर चड़े खड़े थे। ये देखने की कोशिश मे की आखिर मे उसमे से निकलेगा क्या? वो नाले के अन्दर कूदने वालें लोगों के हाथों मे कुछ था। जो बेहद सफेद था। उन्होनें उसको छुपाया हुआ था अपने कपड़ो से लेकिन कुछ भाग अगर दिख जाता तो लोग ऐसे कहानियाँ बुन लेते जैसे हर चीज़ उनके हाथों से होकर निकली है।

कमीज़ के नीचे से कुछ भाग नजर आ रहा था। दिखने वाला हिस्सा किसी गीली और गली हुई रोटी की भांति था। सफेद रंग मे लिपटा वो हिस्सा कितने वक़्त पानी के चपेट मे रहा होगा उसका अन्दाजा कर रहा था। किसी को कुछ कहने या सुनने की जरूरत भी नहीं थी। लगता था जैसे वो हिस्सा खुद से कुछ बयाँ कर रहा है। उन लोगों ने उसे वहीं पर आईस्क्रीम की रेहड़ी पर रख दिया। कमीज़ मे लपेटा हुआ। लोग उसे देखना चाहते थे लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी की उसको पूर्ण रूप से देखा भी जाये। ये कोई दो या तीन महीने का बच्चा था। जो पानी से फूलकर डबल रोटी की तरह से हो गया था। अगर कोई उसको छूता भी तो भी खाली पाँव की उंगलियों पर ही हाथ लगाते बाकि का हिस्सा तो ऐसा लग रहा था जैसे उंगली लगाते ही वो फूट पड़ेगा।

वहाँ कई सारी आवाज़ों के बीच मे उस औरत के रोने की आवाज़ भी सभी के लिये सुनने का एक हिस्सा बनी हुई थी। नज़रें दोनों की तरफ मे कुछ इस तरह से घूमती जैसे गली मे कोई चिड़ी-बल्ले का खेल खेल रहा हो और देखने वालों की भीड़ लगी हो।
रोने की आवाज़ काफी तेज थी और ताना कसने वालो की भी। कोई उसको पाप का लेबल लगाता तो कोई कुर्क्रमो का ताना देता। कोई पूरी औरत कोम पर गाली देता तो कोई रात को काली कहता। मगर इससे क्या फर्क पड़ने वाला था ये किसी को नहीं पता था। सब कुछ वैसे का वैसे ही चलने वाला था। हाँ, कुछ देर तक लोग उसको ताना देगें। फिर घूरेगें उसके बाद मे उसको छोड़ जायेगे वहीं पर बैठे रहने के लिये। रात होने तक तो ये कहानियाँ ऐसे फैल जायेगी जैसे जगंल मे कोई आग फैलती है।

वो वहीं पर रोती रही, उसका रोना यहाँ पर सभी को खल रहा था। उसको इस पाप का भागीदार मान लिया गया था। उसका चेहरा किसी को देखना हो या न देखना हो लेकिन उसको वो कह दिया गया था जो चेहरा देखने के बाद मे थप्पड़ मारने के समान था। रोते - रोते वो औरत वहीं पर गिर गई। नाले के पानी मे पड़ी वो औरत किसी को कोई अहसास नहीं कर पा रही थी। वहाँ पर खड़े सभी ने उस बच्चे को उस औरत के बगल मे रखा और दूर खड़े हो गये। कुछ देर तक वो वहीं पर पड़ी - पड़ी रोती रही लेकिन कुछ समय के बाद मे आवाज़ें आना बन्द हो गया। फिर कुछ नहीं बचा, खाली पड़ी सड़क और कुछ दो - चार गाड़ियाँ, जिनपर लिखा था आपकी अपनी सहूलियत के लिये हमेशा।

लख्मी