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Tuesday, May 14, 2019

नया शमशानघाट

पंडित जी ने अपना कमन्डल उठाया और शमशानघाट से विदा लेने के लिए तैयार हो गए। बहुत ही नराज़ थे दिल्ली की सरकार से। अब शमशान घाट नये तरीके बनाया जा रहा है। जिसमे उसको बैठने के लायक बनाया जाएगा। जहाँ पर गन्दगी और कोई जानवर ना तो आएगा और ना ही दिखाई देगा। इसलिए पंडित जी की भी विदाई कर दी गई है। सबसे ज़्यादा जानवर पालने वाले ये ही शख़्स थे। जो अपना काम जानवरों से कराते आए है। चाहें वो अन्य जानवरों को भगाना हो या फालतू बच्चों को जो वहाँ से चीजों को बीन कर ले जाया करते थे। जिनके लिए यहाँ की कोई भी चीज भूत-प्रेत की नहीं थी। किसी की साड़ी या किसी का कोई भी कपड़ा हो फिर कोई खिलौना वो सब इनके लिए खेलने के ही आभूषण बन जाते। जिनसे अपने खेलो को सजाया और नाम दिया जाता। वो भी अब नज़र नहीं आएगे। धीरे-धीरे वहाँ कि सफ़ाई भी होने लगी है। वहाँ के पैशाब घर से लेकर लकड़ी की दूकान तक। शमशान घर की बाऊंडरी की दीवार में जितने आने-जाने के अनचाहें द्वार बने हुए थे। जो ज़्यादातर सुअर अपना आने-जाने के रास्ते बनाये हुए थे उसको भी बन्द कर दिया गया है।

ये काम पिछले 3 महिनो से चल रहा है। MCD के कुछ काम करने वाले लोग वहाँ पर हर रोज आते है और सफ़ाई शुरु कर देते है। पंडित जी जिस कोने में अपना आसरा बनाया हुआ था उस जगह की भी सफ़ाई कर दी गई है। पंडित जी ने अपने घर के सामने एक दीवार बनाई हुई थी। अर्थी में आई लकड़ियों से और वहाँ पर पड़ी रहती चीजों से। वो भी वहाँ से हटा देने से इतना खुला-खुला लगता है की शमशान घाट लगता ही नहीं की किसी कालोनी के किनारे का हिस्सा है। वो दीवार ना होने से कालोनी के पार्क का एक छोर शमशानघाट से मिल जाता है और शमशान घाट बहुत बड़ा नज़र आता है।

पंडित जी पूरी सरकार को गालियाँ देते हुए अब अपना बोरिया-बिस्तरा समेट चुके थे। बस, रजिस्टरों पर उनके हस्ताक्षर लेने बाकि थे। मगर वो तो मदिरा में इतने धुत थे कि उनके हस्ताक्षर कैसे कराये जाए ये सोचना पहले जरूरी था। उनको शिवराम जी ने और उनकी घरवाली ने पकड़ा हुआ था वो बहुत नशे में थे।

सफ़ाई हो जाने के बाद भी वहाँ पर एक ही आदमी ने अपना दब-दबा बनाया हुआ था। वो था लकड़ी वाला। लकड़ियों का काम इतना बड़ गया है कि अब शमशान घाट मे लकड़ियाँ ही लकड़ियाँ नज़र आती है। अब वहाँ पर लकड़ी नहीं बल्की अर्थियाँ बिकती है। वो अब लकड़ियों को पहले से ही मोक्षस्थल पर अर्थियाँ बनाकर तैयार रखते है और वही बिकता है। शमशान घाट के गेट के ऊपर एक लाइन जो लिखी है की 'बाहर की कोई भी चीज को अन्दर नहीं लिया जाएगा। कृप्या लकड़ी व क्रियाक्रम का सारा समान अन्दर से ही ले।' हर मोक्षस्थल पर पहले ही अर्थी का सारा समान तैयार होता है तो मुर्दा आता है और उन लकड़ियों पर लेटा दिया जाता है बस, मुखागनी दे जाती है और कार्य समपन्न।

एक-एक अर्थी की कीमत लगा दी जाती है। कीमत होती है 1200, 1500, 2000, 3000 रुपये तक लगा दी जाती है बस, उसी का सौदा किया जाता है। 1200 रुपये में लकड़ियाँ कम और बचा-कुचा माल ज़्यादा होता है। जिसमे चलने के बाद में मुर्दे के खिसकने का डर ज़्यादा रहता है। कई बार तो गीली-गीली लकड़ियाँ रख दी जाती है। जिन्हे जलाने में कई किलो देशी घी लग जाता है तो लोग ऐसा काम ही नहीं करते। वो तो चाहते है की मरने के बाद तो उसे कोई दुख ना हो और मिट्टी का तेल डाला नहीं जा सकता। बस, 2000 रुपये तक में सौदा करने के लिए तैयार हो जाते हैं लोग।

लकड़ी वाले ने कई टन लकड़ियाँ मंगाई हुई है और शमशान घाट मे चारों तरफ़ में अपनी लकड़ियों को फैला हुआ है। देखने मे तो शमशान घाट किसी पार्क से कम नहीं लगता। अब देखा जाए तो डर जैसी हवा दूर तक नहीं भटकती। शाम मे तो शायद वहाँ कई तरह की रोनक बन जाती होगीं। हर वक़्त वहाँ पर लाउडस्पीकर मे गायत्री मन्त्र की कैसेट चलती रहती है और वहाँ आए अर्थी के साथ में लोग उस मन्त्र का आन्नद लेते हैं।

शिवराम जी भी उन्ही पंडित जी के साथ मे शमशान घाट से जाने की कह रहे थे। शायद आगे बनने वाले शमशान घाट मे किसी शिवराम जी की जरूरत नहीं होगी। जो अपनी मर्जी से किसी भी अर्थी के साथ मे लग जाया करते। जो उसे पहले पुन्य का काम मानते और उसके बाद मे कुछ पाने की तमन्ना रखते। अब तो वहाँ पर कोई सरकारी नौकरी करने वाला आएगा जो सारे काम सरकारी नियमों के अनुसार करेगा। शायद अर्थी में होने वाले कामो को भी और रिवाज़ो को भी वो नौकरी मान कर ही करेगा। अब तो सारे काम नियम अनुसार ही होगें। कब क्या करना है वो सब अब कागज़ो में लिखा-पढ़ी के बाद ही आगे बढ़ाया जाएगा।

इन शब्दों में पंडित जी के बोल ज़्यादा थे। शिवराम जी तो बस उन्हे सम्भाले हुए थे और उलटे पाँव जाते-जाते शमशान घाट को ताक रहे थे। शायद ये उनका आखिरी दिन था।

लकड़ी वाले ने सारी लकड़ियों को उस अस्थियों वाले कमरे में लाद दिया था। जहाँ पर अब किसी आदमी का जाना न मुमकिन था। कई अस्थियों की थैलियाँ ज्यों की त्यों लटक रही थी। मगर अब वहाँ तक किसी का हाथ नहीं पँहुच सकता था। कोई अगर आ गया अपने किसी को लेने के लिए तो वो इन्हे कैसे लेकर जाएग? ये तो यहीं पर रह जाएगी। शिवराम जी उसी कमरे के सामने खड़े बस, वहाँ पर टंगी उन थैलियों को देख रहे थे। सोच रहे थे की उन लकड़ियों को कैसे हटाया जाए जो वहाँ पर टंगी कई थैलियों को फाड़ रही थी। कई लकड़ियों के ताज (अर्थी के ऊपर झंडियों और गुब्बारों से सजाया हुआ) भी उन लकड़ियों मे फंस कर महज लकडी ही बन गए थे। आज से पहले वो अर्थियों के ताज हुआ करते थे। ये ताज़ उन पर चढ़ाया जाता था जो मरने से पहले अपनी तीन या चार पीढ़ी को देख जाया करते थे। यानि जो अपना पोता और पोते की भी औलाद देख लेता है। जिसको बैण्ड-बाजे के साथ में लाया जाता है और उसे इस कमरे की रौनक बना दिया जाता है। सारी रंगीन झंडियाँ तो अब उनमे नहीं नज़र आ रही थी बस, बाँस के डंडे ही दिखाई दे रहे थे।

लकड़ी वाला शिवराम जी जो अपने यहाँ पर नौकरी रखने के लिए कह रहा था। 2500 रुपये महिना दे देगा। बस, मोक्षस्थल पर 1500 रुपये वाली में जो लकड़ियाँ रखी जाती है उनमे से वो लकड़ियाँ कम लगे और पैसा भी पूरा मिले। लकड़ियाँ भी कम लगाई जाए और वो ऊंची भी नज़र आए। लगे की जैसे 1500 की अर्थी है मगर वो बनी हो 1200 मे लगी लकड़ियों से। ये काम खाली वहाँ पर शिवराम जी के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता था। वो इतनी ठोस अर्थी लगाते थे की लकड़ियाँ भी कम लगती थी और वो कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ती। मुर्दे का भी खिसकने का कोई डर नहीं होता था। बहुत मजबूत बनाते थे शिवराम जी अर्थी।

लकड़ी वाला ऐसे आदमी को क्यों हाथ से जाने देखा?

शिवराम जी का दिमाग अभी दो भागों में बट गया था। जिस काम को वो गालियाँ देते आए थे वो ही काम उन्हे अपनी तरफ़ में खींच रहा था जिससे वो अपना परिवार भी चला सकते थे और जिसे वो पुन्य का काम मानते थे वो भी उनके करीब ही रहता। जिस काम को करना चाहते है या करते आए है वो अब किसी सरकारी नौकरी मे तबदील हो गया है। अब तो जैसे कोई ऐसा काम ही नहीं बचा की जिसको अपनी मर्जी से किया जाए और वहाँ से कोई सौगात मिल जाए। एक ये ही काम था पर ये भी अब सरकारी नौकरी बन गया है। बस, यहीं पर उनका दिमाग उलझा हुआ था।

वो उस कमरे में से सारी चीजों को खींच रहे थे। आज से पहले कभी इतना गौर से नहीं देखा था उन चीजों को उन्होनें। कई तो बीढ़ी-माचिस, हुक्के की चिल्म, बक्से (गल्ले के जैसे) और कुछ बर्तन थे। बर्तनो पर तो तारीख़ें भी लिखी हुई थी जिन्हे गुदवा कर लिखा गया था। किसी पर 1981 कि तारीख़ थी तो किसी 1990 कि। ये तारीख़ें सन के हिसाब से 1980से शुरू होती और 1999 तक जाती थी। बर्तनो पर ज़ंग लग गई थी। कई पोटलियाँ निकली जिनमे कई पुराने कपड़े बन्धे हुए थे। जिनकी गिनती करना आसान नहीं था।

वो लकड़ियों पर खड़े हुए थे और अपना संतुलन बनाकर सारे सामानों को एक जगह पर लेकर खड़े थे। अभी तो कई समान और था जिस तक हाथ नहीं पँहुच रहा था।

यहाँ पर कोई भी ऐसा नहीं था जिसे इन चीजों का आसरा भी हो। लकड़ी वाले के लिए ये जगह कोई शमशानघाट नहीं थी। ये जगह तो एक ऐसा कार्यस्थल थी की जहाँ पर आने वाला ग्राहक कहीं और से कुछ ले ही नहीं सकता। यहाँ पर आने वाला यहीं से ही चीजों को खरीद सकता है और कोई है भी नहीं यहाँ पर उसके आलावा। पंडित जी के लिए ये जगह एक बसेरा थी जिसको छोड़ने पर अपनी सारी पहचान की पत्रियों को बदलना होगा और लोगों से दोबारा से एक और नये रिश्ते की बुनियाद रखनी होगी।

आज कई और अन्य भागों में बट गया था ये शमशान घाट।

शिवराम जी अगर अब यहाँ से गए तो क्या करेगें और अब इस उम्र में कौन नौकरी देगा इस पर ही वो अपना सारा दिमाग ख़र्च करने मे लगे थे। अब तो सारे शमशान घाट में ये काम ख़त्म हो गया होगा।

लख्मी 

Thursday, May 9, 2019

स्ट्रीट फूड - कहानी भाग तीन


एक दिन मिड्डे-मील थोड़ा देरी से आया। स्कूल में सभी बच्चे अपने बर्तन लेकर यहां से वहां घुम रहे थे। स्कूल में आधे से ज्यादा बच्चे तो इसलिये आधी छुट्टी के बाद टिकते थे क्योंकि खाने को खाना मिलता था। स्कूल का बड़ा गेट खोला गया। एक सफेद रंग का आटो रिक्सा अंदर दाखिल हुआ। सभी बच्चे लाइन लगाकर खड़े हो गये। खाना बांटने वाले टीचर भी आ गये। आटो का दरवाजा खुला और बच्चों में खुद होने की चहलकदमी दिखने लगी। बड़े - बड़े बर्तनों को नीचे रखा गया। जैसे ही उसका ढक्कन खोला गया तो उसमें से गर्म महक बाहर निकली। बच्चों मे और ज्यादा खुशी की लहर दोड़ गई। मोन्टू सबसे पीछे खड़ा था। उस तक जैसे ही वो महक गई तो वो आगे की ओर दौड़ा। इतने में टीचर ने चमचा सब्जी में चला दिया। मोन्टू बहुत तेज दौड़ा और टीचर का हाथ पकड़ लिया। टीचर ने गुस्से में मोन्टू की ओर देखा और जोर से कहा "किस क्लास के हो तुम, अपनी जगह पर जाओ।" मोन्टू ने हाथ नहीं छोड़ा। टीचर ने फिर से गुस्से में पूछा "हाथ छोड़ो, क्या बात है?” मोन्टू ने कहा "सर ये सब्जी बुस गई है, खराब हो गई है। इसे खाया तो सब बिमार हो जायेगे।" टीचर ने भी सूंघा। उन्हे ऐसा कुछ नहीं लगा। उन्होने कहा "तुम्हे कैसे मालूम?” मोन्टू बोला "सर देखिये इसमें झाक हो रहे हैं।" टीचर जी ने उस खाना लाने वाले को बुलाया और पूछा "ये खाना खराब है और तुम बच्चों को यह खिला रहे हो?” खाना लाने वाले ने कहा "हमें नहीं मालूम होता सर। जो हमारी गाड़ी में रख दिया जाता है हम उठा लाते हैं।" टीचर जी ने वो सारा खाना वापस लौटाया और मोन्टू के नाम की पूरे स्कूल में ताली बजवाई। मोन्टू बेहद खुश हुआ। और वो स्कूल से निकलकर फिर से उसी जगह पर जाकर बैठ गया। वहां पर आज का पूरा दिन दोहराने लगा। उन कॉपी को देखता रहता जिसमें उन रेहड़ी वालों ने उसे मसालो व स्वादिस्ट खानों की लिस्ट बनवाई थी। वे उन्हे देखता और पढ़ता रहता।

घर पर भी उसका मन नहीं लगता था। घण्टों खामोश बैठा रहता। एक दिन उसके पिताजी ने उससे पूछा "क्या हुआ मोन्टू तुम इतने चुप चुप क्यों बैठे रहते हो? दोस्तों से झगड़ा हुआ है क्या?” मोन्टू कुछ ना कहता। बस, ना में गर्दन हिला देता। पिताजी ने फिर से पूछा "मुझे नहीं बताओंगे? मैं तो तुम्हारा दोस्त भी हूँ ना!” मोन्टू उनकी गोद में लेट जाता है और पूछता है "पापा जब को हमसे दूर हो जाता है तो हम उसे याद कैसे करते हैं?” उसके पिताजी यह बात कुछ समझ नहीं पाये। वे थोड़ा रुके और सोचे की वो अपनी मम्मी को याद करके दुखी है। उन्होनें उन्ही को सोचते हुए जवाब देना बेहतर समझा और कहा "उनकी कही हुई बातों को दोहराकर और आधी बातों को पूरा करके। मालूम है बेटा तुम्हारी मम्मी हमेशा मुझे आधी बात बताती नहीं थी। हमेशा या तो अपने में ही छुपा लेती तो कभी अपनी डायरी में लिख लेती। मैं आज भी उसकी डायरी को पढ़ता हूँ। ऐसा लगता है जैसे तेरी मां से ही बात कर रहा हूँ।" मोन्टू उन्हे देखकर मुस्कुराने लगा। उसने फिर से पूछा "क्या मम्मी की डायरी भी आपसे बात करती है पापा?” पिताजी बोले "नहीं, वो तो नहीं करती मगर मैं ही कभी तेरी मम्मी बन जाता हूँ तो कभी तेरा पापा।" मोन्टू चौंक कर बोला "अच्छा! कैसे पापा?” पिताजी बोले "मैं तेरी मम्मी का लिखा पढ़ता हूँ और उसे पीछे खाली पेज पर उस बात का जवाब लिख देता हूँ। और कभी इस बात पर तेरी मम्मी क्या कहती ये सोचकर उसका भी जवाब लिख देता हूँ।" मोन्टू हंसने लगा। पिताजी भी हंसने लगे। ऐसा लगा जैसे मोन्टू की मम्मी उन्ही के बीच में बैठी हंस रही है। मोन्टू ये महसूस कर सकता था।

दूसरे दिन मोन्टू एक घण्टा पहले ही स्कूल चल दिया। बसते में कुछ कोरे कागज भी भर लिये। और पहुँच गया उसी जगह पर जहां पर वो रेहड़ियां लगा करती थी। वहां पर बैठ कर उनकी बताई खाने की लिस्ट उन कोरे कागज पर लिखने लगा। साथ ही मसालों की भी। और वहीं पेड़ पर चिपका देता। ऐसा वो रोज करता। वहां पर क्या मिलता था। और वो कैसे बनता था। यह सब लिखकर टांग देता। शुरूआत में तो लोग उसे देखकर बच्चे का खेल समझकर चले जाते। लेकिन जब वो पेड़ उन कोरे कागजों से भरने लगा तो लोगों की भीड़ वहां पर लगने लगी। लोग उन सबको पढ़कर खुश होते, हंसते - खिलखिलाते और वहीं कुछ देर टिक जाते। पेड़ का चबूतरा साफ रहने लगा। जो लोग यहां - वहां दुकानों पर काम करते थे वे वहीं पर आकर अपना टिफिन खाने लगे। धीरे - धीरे लगा की जैसे वही माहौल वापस लौट आया हो। मोन्टू के लिये एक वही जगह उसका स्कूल तो नहीं, ना ही क्लास बनी लेकिन लंच टाइम की जगह जरूर बन गई।

आज स्कूल में 14 नवम्बर मनाया जा रहा था। जिसकी तैयारी काफी दिनों से चल रही थी। वे सभी बच्चे पूरी तरह से तैयार थे जिन्हे टीचरों ने बोल दिया था कि उन्हे क्या सुनाना है। टीचरों ने खुद ही उनकी तैयारी कराई थी। मोन्टू भी इस खास दिन में हिस्सा लेना चाहता था। उसने अपने दोस्तों से, अपनी क्लास टीचर से कहा लेकिन बिना तैयारी के उन्होनें मना कर दिया। क्योंकि इलाके के बड़े नेता आ रहे थे। उनके सामने कोई बिना तैयारी के गया तो पूरे स्कूल का नाम खराब हो जायेगा। मोन्टू ने सबसे पीछे खड़ा हो गया। खाना बांटने वाले टीचर उसके पास गये और कहा "तुम आगे क्यों नहीं जाते?” मोन्टू बोला "मैं कुछ सुनाना चाहता हूँ मगर कोई सुनाने ही नहीं देता।" वो टीचर ने मोन्टू का हाथ पकड़ा और आगे ले जाकर कहा "सुनाओ जो सुनाना है?”

मोन्टू सहमा सा सबके सामने खड़ा हो गया। टीचर की जगह पर खड़ा होकर पूरे स्कूल के बच्चों को देखना उसके लिये पहला अवसर था। जो टीचर उसको हाथ पकड़कर लाये थे उन्होने बिना आवाज़ किये कहा "बोलो।" मोन्टू फिर शुरू हुआ। उसने एक कविता सुनाई जो "खाना" पर लिखी थी। जिसमें स्ट्रीट पर लगने वाले स्वाद का जिक्र था।

स्कूल के बाहर हैं लगती रेहड़ी।
                  नई – पुरानी, लंबी रेहड़ी।

लख्मी 

Wednesday, May 8, 2019

स्ट्रीट फूड-कहानी भाग दो

कहानी भाग दो

अगले दिन दोहपर को जब वो स्कूल पंहुचता है तो देखता है कि जहां पर रेहड़ी लगी होती है वहां पर सब कुछ बिखरा पड़ा है। हर तरफ छोले - कुलचे, कचोडियां, टिक्की - समोसे सब कुछ जमीन पर पड़ा है। मगर किसी की भी रेहड़ी वहां पर नहीं है और ना ही रेहड़ी वाले वहां पर है। बिखरे हुए समानों मे से सड़क पर घूमते बिखारी और कुत्ते चुन चुनकर खा रहे हैं। और कुछ स्कूल के लड़के वहां पर पड़े में से कुछ ऐसा बीन रहे हैं जो उनके काम का हो। भीड़ लगी है। लड़कियों के स्कूल की छुट्टी हो चुकी है। लोग कुछ देर रूकते और फिर बिना कुछ कहे चल देते। वो देखता है कि किसी को कोई फर्क नहीं है। जो लोग यहां इस सड़क के किनारे रोज दिखते थे। अपना काम करते थे। लोगों का पेट भरते थे वो आज सभी गायब है और किसी को कोई फर्क ही नहीं है। मोन्टू यह सब देखकर रूहांसा सा हो गया। वो वहीं पर बैठ गया औ रोने लगा। उसने भी जमीन पर पड़े समानों से कुछ बिनना शुरू किया। मसालो के डिब्बे, अखबारों के टुकड़े जो प्लेट की तरह इस्तमाल होती थी, चाकू, नेपकीन, साबूत नींबू सब कुछ उठाकर उसने वहीं एक पेड़ के नीचे रख दिया और यहां - वहां पर नज़र मारने लगा। लोगों से पूछने लगा की यह सब क्या हुआ और रेहडी वाले कहां गये। कोई बताता कि यहां पर किसी ग्राहक से लड़ाई हो गई वो और लड़के ले आया सब कुछ तोड़ गया। कोई कहता दो सांड आपस में लड़ रहे थे उन्होने किया यह सब। वो सबकी सुनकर यहां वहां देखता तो कहीं पर भी कोई रेहड़ी नहीं दिखी। उसने फिर एक रोते हुए आदमी से पूछा "अंकल क्या हुआ?” वो रोते हुए बोले "अरे बेटा एक गरीब आदमी अपनी मर्जी से कोई काम भी नहीं कर सकता। सरकार नहीं चाहती की हम खाये पिये।" मोन्टू के समझ मे नहीं आया। वो उस रोते हुए आदमी को देखता रहा। वो फिर से बोला "कमेटी आई थी। सब कुछ तोड़ गई और बचा - कुचा ले गई।" वो आदमी फिर से रोने लगा। मोन्टू चुपचाप स्कूल आ गया।

स्कूल में आज 14 नवम्बर मनाये जाने की तैयारी चल रही है। प्रार्थना वाली जगह पर ही सभी टीचर, प्रिंसिपल और बच्चे खड़े हैं। वो भी पीछे से उसमें जुड़ जाता है। प्रिंसिपल सबसे पूछ रहे हैं कि सब क्या बनना चाहते हैं? वो जिसकी तरफ हाथ करते उस बच्चे को बताना होता कि वो क्या बनना चाहता है और क्यों? कईओ की ओर प्रिंसिपल का हाथ गया। सभी बोल रहे हैं "टीचर, डाक्टर, एक्टर, वकील, साइनटिस्ट, पुलीस" ज्यादातर जैसे सभी को पहले से ही मालूम है कि उन्हे क्या बनना है। प्रिंसिपल सबके सपने पर "शबाशी" दे रहे हैं। इस बार उनकी उंगली मोन्टू पर जाती है। मोन्टू सहमा सा खड़ा होता है। सभी विद्यार्थियों की ओर देखता है। सभी मोन्टू को घूर रहे हैं। वो थोड़ा रुकता है फिर बोलता है "मैं रेहड़ी लगाने वाला बनूंगा।" सभी उसकी ओर देखकर बहुत जोरों से हंसते हैं। टीचर जी के चेहरे पर भी मुस्कान आती है। प्रिंसिपल साहब कुछ नहीं बोलते। बस, पुछते हैं "क्यों बेटा?” मोन्टू कहता है "वो जब खाना बनाते हैं तो लोग अपनी यादों मे चले जाते हैं। अपना पेट भरते हैं और कोई ना कोई बात को याद करते हैं। वहां पर वो भी आते हैं जो जानते हैं और वो भी जो नहीं। सब साथ में खाते हैं। मैं भी ऐसी जगह बनाना चाहता हूँ।"

सभी उसको देखते रह जाते हैं। प्रिंसिपल साहब कुछ नहीं कहते। बस, हाथ के इशारे से उसको बैठने को कहते हैं। फिर उनका हाथ किसी और के ऊपर जाता है। वो कहता है "सीआइडी" प्रिंसिपल के मुंह से निकलता है "शबाश" यहीं चलता रहता है। आज का दिन उदासी में बीत जाता है। मोन्टू घर आ जाता है। खमोश और सुस्त। शाम को जब पिताजी आते हैं तो उनसे पूछता है "पापा ये कमेटी क्या होती है?” उसके पिताजी समझ नहीं पाते। वो उसकी ओर देखते है और पूछते हैं "तुम ये क्यों पूछ रहे हो बेटा?” मोन्टू कहता है "आज स्कूल के बाहर कमेटी आई थी और सारे रेहड़ी वालों को ले गई। उनका समान भी तोड़ गई। सब कुछ बिखेर गई।" उसके पिताजी यह सुनकर कहते हैं "बेटा कमेटी सरकार की ऐसी योजना है जो सड़क पर लगने वाले अवैध कार्यों को उठा सकती है। तोड़ सकती है। ताकि उन्हे खाने वाले बिमार ना पड़े। मरे नहीं। स्ट्रीट फूड से कई बिमारियां होती हैं। उन्हे रोका जाता है। ताकी लोग तंदरूस्त रहे।" मोन्टू को यह सब समझ में नहीं आया। वो बोला "मगर पापा मैंने देखा है कि वहां से खाने वाले तो कभी बिमार नहीं पड़ें। वो तो रोज आते थे। फिर क्यों हटाया उन्हे वहां से?” पिताजी बोले "बेटा उन्होनें दुकान लगाने की परमिशन नहीं ली होगी? इसलिये तोड़ दी।" मोन्दू बोला "मगर पापा तोड़ी क्यों? पहले पूछते कि लोग बिमार तो नहीं पड़े। लोगों से पूछती। जब वो कहते तो हटा देती। क्या इसको रोक सकते हैं रेहड़ी वाले?” पिताजी ने कहा "बेटा जो रेहड़ी लगाते हैं वो ना अपने इलाके में लगाने के कुछ पैसे देते हैं। जो अवैध होता है। और जैसे ही पैसा देना बंद कर देते हैं तो ये होता है।" मोन्टू के ये तो समझ में आ गया था की उनके साथ जो हुआ है वो गलत है मगर ये समझ में अभी तक नहीं आया था कि ऐसा हुआ क्यों?

हर दिन अब मोन्टू उसी जगह पर जाकर बैठने लगा। कई दिन यूहीं बीत गये। मोन्टू वहां पर बनते माहौल को देखने रहता। सबकुछ लगभग वैसा का वैसा ही रहता। आवाज़ें, आना-जाना, गाड़ियों का शोर और लोगों का वहां पर रूकना और कुछ समय देना। मगर वो खूशबू गायब हो चुकी थी जो उसे अपनी ओर खींचती थी। मोन्टू का मन अब पढ़ाई में बिलकुल नहीं लगता था। बस, दोस्तों से स्कूल में मिलते मिड्डे-मील के ऊपर वो बातें करता। कहता "मालुम है इस सब्जी को कैसे बनाते हैं? मालूम है इसमें क्या - क्या डालते हैं?” उसके दोस्त उसकी सूरत देखते जाते।

लख्मी 

Tuesday, May 7, 2019

स्ट्रीट फूड

कहानी भाग 01

मोन्टू का कभी मन पढ़ाई में लगा ही नहीं। उसके पिताजी जहां उसे पढाई की ओर धक्का देते वो उतना ही पढाई से दूर होता जाता। मोन्टू के पिताजी अपने ही इलाके में वेल्डिंग की दुकान चलाते थे। मोन्टू अपने घर में अकेला ही था। पिताजी चाहते नहीं थे की उनका लड़का भी उन्ही की तरह ऐसे किसी काम को करे। इसलिये वे उसकी पढ़ाई को लेकर हमेशा चिंचित रहते। लेकिन कभी वो मोन्टू को कुछ करने से मना नहीं करते थे। उन्हे लगता कि मैं ही उसका दोस्त बन सकता हूँ। मोन्टू अभी पांचवी क्लास में पढ़ता है। हमेशा अपनी क्लास में अजनबी की तरह ही वे रहता। जहां बच्चे पिछले दिन पढ़ाये गये को लेकर रट्टे लगाते दिखते या किसी टीचर के खोफ से पढ़ते नजर आते वहीं मोन्टू सिर्फ बैठा दिखता।

मोन्टू का ज्यादा से ज्यादा वक़्त स्कूल में नहीं उसके गेट के सामने बितता। स्कूल में प्रार्थना और हाजरी लगवाकर वे भाग आता। यह उसका रोज का काम बन गया। वह कभी छोले - कुलचे की रेहड़ी पर दिखता तो कभी कोल्ड्रिंग रेहड़ी पर तो कभी टिक्टी - समोसे की तो कभी सब्जी-कचोड़ी की रेहड़ी पर वो बैठा दिखता और वहां पर जमती भीड़ को देखकर खुश होता। साथ ही सभी को खाते हुए देखकर उसे बेहद मज़ा आता। वो रेहड़ी वालों को अपनी रेहडी जमाते, खाना बनाते हुए देखता रहता। जैसे - जैसे रेहड़ी वालो के हाथ चलते तो उनके हाथों की हरकत को देख वह दोहराता। जिस तरह कोई संगीत सिखने वाला हर दम अपनी उंगलियां चलाता रहता है वैसे ही मोन्टू के हाथों में भी वो किसी खेल की तरह जमने लगा। अब तो ज्यादातर रेहड़ी वाले उसको जानने भी लगे। कभी कभी रेहडी वाले उससे पूछते "तू पढ़ता - वढ़ता नहीं है क्या?” तो वो गंभीर होकर कह देता "हमारे स्कूल में खाना बनाने का पीरियढ लगता है मैं उसमें फेल हो जाता हूँ तो मैं यहां से सिख रहा हूँ।" यह सुनकर रेहड़ी वाले खुश हो जाते। वे भी अपने को किसी टीचर से कम नहीं समझते। मोन्टू को अब रेहड़ी पर कितनी भी देर बैठने की इजाजत मिल गई। मोन्टू रेहड़ी वाले की इकलौती कुर्सी पर बैठ जाता और हर रोज़ एक नया सवाल करता। कभी पूछता "आपने ये बनाना कहां से सीखा?” तो कभी "आपने यह ही काम क्यों चुना?” तो कभी "क्या आपके बच्चे भी यह बनाना जानते हैं?”

मोन्टू के हर सवाल का जवाब रेहड़ी वाले बड़े ही प्यार से देते। हर एक चीज के बारे में बताते। बल्कि मोन्टू से लिस्ट बनाने को भी कहते। वे छोलो में क्या डालते हैं, कुलचो में क्या। मोन्टू भी सभी की लिस्ट बनाता।

एक दिन मोन्टू ने बड़े प्यार से छोले कुलचे वाले से एक सवाल किया "अंकल सबसे अच्छे छोले-कुलचे का स्वाद कैसा होता है?” तो रेहड़ी वाला हंसकर मोन्टू कि तरफ देखकर बोला "जिसमें हर मसाला एक दम सही डला हो। हल्की आंच पर पका हो। जिसे खाते ही खाने वाला अपने बीते कल में चला जाये। किसी और स्वाद को याद करने लगे। निवाला मुंह में डालते ही घुल जाये और मुंह से निकले "वाह!” यह सुनकर मोन्टू बहुत खुश हुआ। उसने जैसे आज कोई बेहद बड़ी चीज़ के बारे में जान लिया था। वो स्कूल वापस लौटा। अक्सर आठवें पीरियड में कोई नहीं आता। लेकिन आज उसके क्लास में पहुँचते ही हिन्दी के टीचर आ पहुँचे। पर इस बात से मोन्टू को कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला था। क्लास शुरू हो गई। सभी किताबों में अपना मुंह डाले बैठ गये। चाहे कोई पढ़ रहा हो या नहीं बस, क्लास में शोर नहीं हो चाहिये। टीचर जी ने अपना पूरा टाइम लिया और ऊपर की ओर निगाह करते हुए कहा "बच्चों किसी को किसी पाठ पर कुछ पूछना है या मैं जाऊँ?” कोई नहीं उठा। कोई नहीं चाहता था कि कोई भी टीचर ज्यादा देर क्लास में रूके। टीचर ने एक बार और इसी बात को दोहराया। फिर चलने के लिये खड़े हो गये। मोन्टू ने अपना हाथ उठाया कुछ पूछने के इशारे से। टीचर जी ने चौंकते हुए कहा "अरे मोन्टू भाई भी हैं क्लास में और कुछ पूछना भी चाहते हैं। ठीक है, पूछो।" पूरी क्लास पीछे मुड़कर मोन्टू की तरफ देखने लगी। सुबह जैसा सवाल उसने रेहड़ी वाले से पूछा था वैसा ही कुछ वो टीचर जी से पूछने को चला, और पूछा "सर एक अच्छी कहानी क्या होती है?” टीचर जी निगाह गाड़कर मोन्टू को देखने लगे। मोन्टू भी टीचर जी को देखने लगा। थोड़ी देर के बाद में क्लास गुपचुप हंसने लगी। टीचर जी ने सबको एक जज की तरह टेबल पर हाथ मारकर खामोश किया और कहा "अच्छी कहानी वो होती है जो तुम से को भी समझ में आ जाये, समझे।" मोन्टू यह सुनकर बैठा नहीं। टीचर ने कहा "बैठ जाओ। दे तो दिया उत्तर।" मोन्टू ने कहा "बस सर यह ही।" टीचर ही बोले "हां।" मोन्टू ने फिर से पूछा "बस सर।" टीचर जी ने बोला "अरे हां भई। क्या इसके आगे भी कुछ है?” मोन्टू चुपचाप बैठ गया। और टीचर बिना बॉय किये चले गये।


स्कूल की छुट्टी हो गई। सभी अपना बस्ता उठाकर भागने लगे। मोन्टू का घर स्कूल से दूर था। आज मोन्टू जहां खुश था वहीं वो स्कूल में कुछ उदास हो गया था। वो पूरे रास्ते देखता हुआ चल रहा है। आज पूरा रास्ता उसको अलग ही लग रहा था। हर तरफ कुछ ना कुछ बन रहा था। चारों ओर से खुशबू ही खुशबू उड़ रही थी। लोग रेहड़ियों, साइकिल दुकानों की अंगठियों से निकलते धुंए में खो रहे थे। वो सड़क के एक किनारे पर खड़ा उस खूशबू को खुद में भरने लगा। कभी पर पराठों को हाथों पर नचाते लोग दिखे। कहीं पर बड़े से पतीले में चमचा चलाते लोग। कहीं पर छोटे से तवे पर रोटियां सेकते तो कहीं पर छोटी प्लेटो को परोसते हाथ। वो यह सब देखकर बेहद खुश हुआ। चारों तरफ स्वाद ही स्वाद था। जैसे मोन्टू हर स्वाद को महसूस कर सकता था। वो बहुत तेजी से दौड़ा। पतली गलियों से निकलता हुआ। गलियों में कहीं दरवाजों पर दाल चावल बिनती औरतें बैठी है, कहीं गली में सब्जी बिक रही है, कहीं गली में मसाले की बड़ी सी रेहडी फंसी है तो कही गली में बच्चे आइक्रिम खा रहे हैं। मोन्टू दौड़ता हुआ, सबको पीछे छोड़ता हुआ अपने घर पहुँच गया। पिताजी के घर में आने में अभी काफी वक़्त था। मोन्टू को भूख लगने लगी। वो किचन में गया और कटोरदान खोला और रोटी निकाली। उसपर लाल मिर्च और नमक डाला। उसे थोड़े पानी से मसला और रोटी को गोल करके खाने लगा और खाते खाते सो गया।

शाम को मोन्टू के पिताजी आये। रोजाना की तरह नहाने को गये। उन्होनें खाना बनाया और मोन्टू को साथ में खाने को कहा। मोन्टू आया। आधी सी नींद में। पिताजी ने उसके सिर में हाथ मारा और पूछा "और कैसा रहा आज का स्कूल?” मोन्टू ने मुस्कुराकर पिताजी की ओर देखा और पूछा "पापा एक अच्छा खाना क्या होता है?” पिताजी ने मोन्टू को देखा और कहा "बेटा खाना खा।" और बात को टालने लगे। मोन्टू ने जिद्द की और फिर से "बताओ ना पापा।" पिताजी उनकी ओर देखकर हंसने लगे और मुस्कुराकर बोले "अच्छा खाना वो होता है जिससे पेट तो भर जाये मगर मन नहीं भरे। जिसमें मां की याद बसी हो और मेरे प्यारे से बेटे की सेहत भी।" यह सुनकर मोन्टू के चेहरे पर वो गायब हंसी फिर से लौट आई। आज उसने अपनी प्लेट का सारा खाना भी खत्म कि लिया। अन्दर वाले कमरे में खिड़की के बाहर झांकता रहा। बाहर लगी अण्डे के पराठें की रेहड़ी पर उठते धुंए को देखता रहा। फिर खिड़की पर ही सिर टिका कर सो गया। 

लख्मी

Wednesday, January 29, 2014

इंतजार

जब कमरे में अधेरा नीचे उतर आया था। घर में पलंग पर बिना सलवट की चादर बिछी हुई थी। तकिये को बड़े प्यार से साथ -साथ सिरहाने रखा हुआ था। दिवार पर खुबसुरत पहाड़ो की, झरनों की पेन्टिग टगीं हुई थी। टेबल, फैन, स्टूल, फूलदान और मेरी शादी में मिला आईना भी।

बाहर तो कुछ सन्नाटा सा मालूम हो रहा था। मगर अन्दर कमरें में बिना बल्ब की और ट्यूब लाईट की रोशनी में टीवी पर फिल्म देखकर वक्त काट रही थी। आंखों के आगे टीवी में चलती फिल्म में बदलते अलग-अलग रंग मेरे चेहरे पर दिख रहे थे। फिल्म के डायलॉग के साथ सीन बदलता तो मेरे हाथ – पैरों पर परछाईयां सी बन जाती।

सुशीला का दिल उस वक्त बड़ा बेचैन तो था ही क्योंकी 5 वर्ष पहले सुशीला से शादी होने के बाद उनके पति पैसा कमाने शहर से दूर चले गये थे। बीच-बीच में चिट्ठियां आती रहती थी। एक आखरी चिट्ठी 5वें साल में आई। उसे घर के कोने में छुपा कर सुशीला ने उस चिट्ठी को खोला अपने कांपते हाथो से ...उसने उन्ही कांपते हाथो से चिठ्ठी पकडी हुई थी। उसने चिट्ठी को खोला और पढ़ना शुरू किया।


प्रिय्र सुशीला

     तुम कैसी हो और घर वाले कैसे हैं? सब ठीक तो है। सब को मेरा नमस्ते कहना। मैं राजी खुशी से हूँ। तुम्हारी ख़बर महीनों से नहीं ले पाया। इसलिये ये आखरी चिट्ठी भेज रहा हूँ। इस के बाद तो मैं आ ही जाऊंगा। शादी होने के 10 दिन बाद ही तुम को घर में जाने- अन्जानो के साथ छोड़ आया लेकिन मां-बाबूजी और मेरे भाई बहन तुम्हें बहुत प्यार करते होगें। तुम्हे अकेलापन कभी महसूस नहीं होता होगा। मैं ये यकिन से कहता हूँ। माफ करना, तुमने इन 5 सालो में मेरे इन्तजार मे बहुत तकलीफ उठाई होगी। लेकिन अब मैं चन्द दिनों में ही तुम्हारे करीब होगा। तुम वैसे ही दुल्हन की तरह मेरे सामने आना। तुम्हारा शिंगार किया चेहरा मैं फिर से अपनी आंखों में बसाना चाहता हूँ। अच्छा मैं अगले महीनें की 7 तारीख तक आ जाऊगां मेरा इंतजार करना।

तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा.....

चिट्ठी को मोढ़ कर सुशीला ने अलमारी में रख दिया और तभी से ही वो हफ्तों /दिनो को गिन – गिनकर बिताती। मां बाबूजी और बाकियों को रोज जल्दी खाना खिला कर वो शाम का काम निपटा कर अपने कमरे में आकर उस दिन को याद करती। जब सुशीला ने इस चौखट पर पहला कदम रखा था। वो लम्हा जो उसने उनके साथ बिताया था। अभी दिल में वो लम्हें जिन्दा थे। देर रात तक जगने से सुशीला की आंखें पत्थरा गई थी।

अभी भी वो सुबह होने का इन्तजार करती हुई टीवी के रिर्मोट के बटनों को खामखा बदल हुई दिवार पर लगी घड़ी की सुईयो पर नजरें को ठहर -ठहर कर दौड़ा रही। उनके आने की खुशी में सुशीला ने केसरी रंग की साड़ी पहनी हुई थी। काजल आंखो में मुस्कुरा रहा था। बिंदी आसमान के तारों की तरह टिम - टिमा रही थी। गालों पर सुर्ख रंग चड़ आया था। टीवी से मन भर जाने के बाद उस ने उठ कर रोशनी में आने के लिये ट्युब लाईट जला दी। रोश्नी ने कमरे को उजागर कर दिया वो टीवी को बन्द कर के रिर्मोट को टेबल पर रखकर उस बडे से आईनें मे अपनी सूरत बड़ी ग़ोर से देखने लगी। आईने के सामनें खड़ी वो आईने से ही चीड़ कर कर खिले भाव से बोली ......  “अब तेरी ज़रूरत नहीं होगी मुझे। उन के आने के बाद तू मुझे देखने को तरस जाएगा देख लेना" 

सुशीला की मुस्कान जैसे आईनें को चटका देगी ऐसा लग रहा था। आईना तो मौजूदा वक्त की तस्वीर ही दिखा रहा था। उसे भला बेईमानी करने में क्या मिलता। ट्यूब लाईट की रोश्नी में आईने के आगे बैठे-बैठे उस के चेहरे से खुशी का रंग धीरे-धीरें उतर रहा था। इन्तजार से लड़ती सुशीला की जिज्ञासा उस के दिमाग में कुछ धुंधली तस्वीरें को वो देख रही थी। 5वर्ष की अवधी का समय और आने वाले समय की एक जंग की कोई गूंज सी सुनाई दे रही थी। ख्यालों में खोई सुशीला और उस की आंखे पलंग पर से दरवाजे की तरफ देखते - देखते वही लग गई। 2 घंटे बाद दरवाजें पर कुन्दी को खड़काने की आवाज से उठ कर वो तेजी में भागी। रात से ही सजीं हुई सुशीला के पांव में बंधी पाजैब झन-झनाती हुई बजी।

दरवाजा खोलते ही ढ़ेरो भिन्न भिन्नाती आवाजों का एक गुच्छा सा अन्दर आ गया। चिड़ियों की चहचहाट, गाड़ियों की साँये - साँये, काम पर निकलते लोग। इन सभी की गूंज बनी आवाज़ें सुबह अपने जोर पर आ गई थी। दरवाजा खुलने के बाद सुशीला कच्ची सी नींद से जागी। आंखों के सामने सिर से गम्छा बांधे। वो कुर्ता पजामा पहने उसे दूध वाला अपनी साईकिल को स्टेन्ड पर लगाता दिखा। सुशीला सोच रही थी  "ये कौन आया" के इतने में उसने दूध के डिब्बे में से एक लीटर दूध निकाल कर कहा "बहन जी क्या आज दूध हाथों में लो गी क्या?”

.... दूध वाला सुशीला को देखकर मूह सुकोड़कर और घूरकर देखता रहा .... सुशीला चुपचाप रसोई से भगोना लेकर आई दूध लेकर रसोई मे रखकर बाहर आकर कमरे में ही बैठ गई और उस आईने की तरफ देखने लगी।
वो सोच रही थी की अभी भी वक़्त पूरा नहीं हुआ।

इतने में उसके दरवाजे पर एक जोरदार दस्तक हुई। लगता था की कोई दरवाजा पीट रहा है। साथ ही काफी रोने की आवाज़ होने लगी। मगर इन सभी आवाज़ों को सुशीला सुन नहीं सकती थी। वो सो चुकी थी।

राकेश

Monday, January 6, 2014

आसमान बहुत छोटा है

यहाँ पर कोई नहीं आता। उनमें से तो कोई नहीं आता जो इसे अपना कहकर जब्त कर लेते हैं और उनमे से भी कोई नहीं आता जो इसे अपना बिलकुल भी नहीं कहते। ये खुली है और हमेशा खुली ही रहेगी। ये उनके लिये बनी है जो कभी-कभी यहाँ पर आकर रोज़ के लिये रह जाते हैं उनके लिये हैं जो यहाँ रोज़ आते हैं और कभी-कभी रह जाते हैं। ये कोई कोना या किनारा नहीं है, ये कोई कमरा या धरा नहीं है। ये तो बस, एक खाँचा है।

बहुत तेज बारिश हो रही है। पूरी सड़क पर दूर – दूर तक कोई भी नज़र नहीं आ रहा है। अंधेरा इतना है की कोई अगर झटके से भी यहाँ पर आ जाये तो टकरा ही जाये। ये रात बहुत काली होने वाली है लगता है। किसी को शायद याद नहीं है कि वो तो वहाँ पर आ ही गये होगें जिन्होनें इस जगह से वादा किया हुआ है।

एक बेहद मद्धम सी रोशनी झलक रही थी जिसको देखकर यहाँ के होने का हल्का सा अहसास होता। वे रोशनी इस काली रात मे उस दिए की भांति अपना क़िरदार निभाती जो बीरबल की खिचड़ी कहानी मे दूर रखे अकेले चमक रहा था और कोई उसे देखकर जी रहा था। सड़क के किनारे पर रखी एक टेबल, उसपर रखा एक स्टोप जिसकी जलने की आवाज़ बारिश की तेज और भारी आवाज़ से लड़ रही थी। स्टोप पर रखा बड़ा और मोटा छाता। उसकी के नीचे वे दबी और दुबकी बैठी थीं। स्टोप की बलखाती आवाज़ के साथ साथ उनके भी गीत की बहुत धीमी सी आवाज़ उसी छाते के नीचे खेल रही थी। वे सिकुड़ी बैठी थीं। लगता नहीं था की वे आसानी से उस टेबल पर बैठ जायेगीं लेकिन नीचे के पानी और ऊपर की धरा से बचने के लिये उनका इस तरह लुभावने अंदाज मे बैठना अपनी ओर खींचता था।

Tuesday, July 9, 2013

मेरे पापा की रिपोर्टकार्ड

बड़े भाई काफी दिनो से गाडी लेने की सोच रहे थे। जिसके लिये उन्हे अपनी महिने की तंख्या मे से कुछ-कुछ पैसा जोड़ना पड रहा था। अक्सर वो किसी मिंया-बीवी को मोटर साइकिल पर बैठे देखते तो एक चाहत सी अन्दर उमड़ पड़ती और कई सपने उसकी तरंगो मे पमपने लगते। लेकिन इतना पैसा होना शायद मुमकिन ही लग रहा था तो किसी से बात करके बैंक से लोन उठाने की कशकस मे लगे हुये थे। बड़े भाई साहब अपने सपनो को पालने के साथ-साथ एक अच्छे पिता भी है दो बच्चो के उनके प्रति वो बड़े सर्तक रहते है। अक्सर अपने बच्चो की जब भी रिर्पोटकार्ड हाथो मे आती है तो एक लम्बा भाषण बडे प्यार से दे डालते है। प्यार से भरे इन शब्दो मे इस चिकने लठ की मार शरीर पर तो नही लगती पर जहन मे और जमीर पर तो अपनी छाप जरुर छोड देती है। और लगे हाथ वो अपने बीते स्कूली दिनो की बातों और कहानियो को भी सुना डालते है। जो नसिहत के तौर पर होती है पर सुनने मे पता नही लगता कि आखिर मे क्या कहने की कोशिशे कर रहे है?  

बडे भाई साहब अपनी इन बातो मे बीते दिनो की हल्की हल्की कहानियों को चेहरे पर ला ही देते है। एक दिन बच्चो की रिर्पोट कार्ड हाथो मे लिये खड़े थे। बच्चे अपनी रिर्पोट लार्ड पर उनके हस्ताक्षर कराने के लिये लाये थे। लेकिन इन्हे खाली साइन ही नही करना था। थोडा नजर भी तो डालनी थी। ओर अगर कुछ बोला नही नम्बरो के बारे मे तो फिर पिता का रौब क्या रहा 

नम्बरो को देखते ही बोले, "ये क्या नम्बर है? बेटा अगर यही हाल रहा तो फाइनल पेपरो मे क्या हाल होगा? किसी भी पेपर मे 50 परसेन्ट से भी नम्बर नहीं है। मै क्या देखु इसे, और क्या साइन करु? अपनी मां से ही कराले। मालुम है तुम्हारी उम्र मे हम खेलने के अलावा पढाई पर भी ध्यान देते थे और मेरे नम्बर हमेशा 75 परसेन्ट से भी ज्यादा नम्बर आते थे। मेरा टीचर हमेशा मुझे आगे वाले डेक्स पर ही बिठाता था। और ये क्या है?"


इतना तो वो हमेशा कहते ही थे और हल्की सी झलक अपने बीते दिन की भी रख देते थे। मगर आज तो किसी और ही धून मे थे। जिससे  लोन की बात की थी उसने कल के लिये बुलाया था। शाम से ही अपने डोकोमेन्ट को इकठ्टा करने मे जुटे हुये थे। अपनी अटेची को जमीन पर रखे दोनो हाथो से उसमे कुछ खरोर रहे थे। उनकी बीवी भी अलमारी मे पुराने पर्स और लोकर मे लगी नीले रगं की पन्नी मे से कुछ पेपर निकाल कर देख रही थी।वहीं साथ ही बिखरे पेपरो मे बच्चे भी न जाने क्या क्या उठाकर देख रहे थे? ऐसे मे कुछ जरुरी कागजो मे कुछ वो कागज भी मिल जाते है जिनमे खाली यादें ही नही बल्की एक लम्बी जिन्दगी का हिस्सा बसा हो यानि के दस से पंद्रहा साल। सभी कागजो मे व्यसत हो रहे थे। तभी उनके लडके के हाथ बड़े भाई साहब की रिर्पोट कार्ड लग गई। वो उसे अपने हाथों मे लेकर पढने लगा पढते=पढते वो पुरे कमरे मे घूम रहा था।

हिन्दी मे 34, गाणित मे 2, अग्रेजी मे 23 जब वो इसे पढ रहा था तो सभी की नजर बडे भाई साहब पर थी और सभी हसं भी रहे थे। बड़े चाव से लडका बार-बार नम्बरो को दोहरा रहा था। मगर बड़े भाई साहब जान बूझ कर पेपरो मे खोये का नाटक कर रहे थे। इन नम्बरो और उनके चेहरे को देखकर सब सोच रहे थे कि उन बडी-बडी बातो, कहानियो ओर उन दिनो के पीछे कोन सा शख़्स था? ओर पेपरो मे खोने वाला, बाइक की चाहत रखने वाला, और इस समय रिर्पोट कार्ड के नम्बरो मे कोन सा शख़्स है?

तभी उनके लड़के ने कहा "पापा इतने कम नम्बर ये आपकी रिर्पोट कार्ड है? तो वो उससे छीनते हुये बोले, "अरे ये तो बहुत पुरानी है।।।


लख्मी