Showing posts with label ज़िन्दगानी. Show all posts
Showing posts with label ज़िन्दगानी. Show all posts

Saturday, June 29, 2019

शमशानघाट से विदा

पंडित जी ने अपना कमन्डल उठाया और शमशानघाट से विदा लेने के लिए तैयार हो गए। बहुत ही नराज़ थे दिल्ली की सरकार से। अब शमशान घाट नये तरीके बनाया जा रहा है। जिसमे उसको बैठने के लायक बनाया जाएगा। जहाँ पर गन्दगी और कोई जानवर ना तो आएगा और ना ही दिखाई देगा। इसलिए पंडित जी की भी विदाई कर दी गई है। सबसे ज़्यादा जानवर पालने वाले ये ही शख़्स थे। जो अपना काम जानवरों से कराते आए है। चाहें वो अन्य जानवरों को भगाना हो या फालतू बच्चों को जो वहाँ से चीजों को बीन कर ले जाया करते थे। जिनके लिए यहाँ की कोई भी चीज भूत-प्रेत की नहीं थी। किसी की साड़ी या किसी का कोई भी कपड़ा हो फिर कोई खिलौना वो सब इनके लिए खेलने के ही आभूषण बन जाते। जिनसे अपने खेलो को सजाया और नाम दिया जाता। वो भी अब नज़र नहीं आएगे। धीरे-धीरे वहाँ कि सफ़ाई भी होने लगी है। वहाँ के पैशाब घर से लेकर लकड़ी की दूकान तक। शमशान घर की बाऊंडरी की दीवार में जितने आने-जाने के अनचाहें द्वार बने हुए थे। जो ज़्यादातर सुअर अपना आने-जाने के रास्ते बनाये हुए थे उसको भी बन्द कर दिया गया है।


ये काम पिछले 3 महिनो से चल रहा है। एमसीडी के कुछ काम करने वाले लोग वहाँ पर हर रोज आते है और सफ़ाई शुरु कर देते है। पंडित जी जिस कोने में अपना आसरा बनाया हुआ था उस जगह की भी सफ़ाई कर दी गई है। पंडित जी ने अपने घर के सामने एक दीवार बनाई हुई थी। अर्थी में आई लकड़ियों से और वहाँ पर पड़ी रहती चीजों से। वो भी वहाँ से हटा देने से इतना खुला-खुला लगता है की शमशान घाट लगता ही नहीं की किसी कालोनी के किनारे का हिस्सा है। वो दीवार ना होने से कालोनी के पार्क का एक छोर शमशानघाट से मिल जाता है और शमशान घाट बहुत बड़ा नज़र आता है।

पंडित जी पूरी सरकार को गालियाँ देते हुए अब अपना बोरिया-बिस्तरा समेट चुके थे। बस, रजिस्टरों पर उनके हस्ताक्षर लेने बाकि थे। मगर वो तो मदिरा में इतने धुत थे कि उनके हस्ताक्षर कैसे कराये जाए ये सोचना पहले जरूरी था। उनको शिवराम जी ने और उनकी घरवाली ने पकड़ा हुआ था वो बहुत नशे में थे।


सफ़ाई हो जाने के बाद भी वहाँ पर एक ही आदमी ने अपना दब-दबा बनाया हुआ था। वो था लकड़ी वाला। लकड़ियों का काम इतना बड़ गया है कि अब शमशान घाट मे लकड़ियाँ ही लकड़ियाँ नज़र आती है। अब वहाँ पर लकड़ी नहीं बल्की अर्थियाँ बिकती है। वो अब लकड़ियों को पहले से ही मोक्षस्थल पर अर्थियाँ बनाकर तैयार रखते है और वही बिकता है। शमशान घाट के गेट के ऊपर एक लाइन जो लिखी है की 'बाहर की कोई भी चीज को अन्दर नहीं लिया जाएगा। कृप्या लकड़ी व क्रियाक्रम का सारा समान अन्दर से ही ले।' हर मोक्षस्थल पर पहले ही अर्थी का सारा समान तैयार होता है तो मुर्दा आता है और उन लकड़ियों पर लेटा दिया जाता है बस, मुखागनी दे जाती है और कार्य समपन्न।


एक-एक अर्थी की कीमत लगा दी जाती है। कीमत होती है 1200, 1500, 2000, 3000 रुपये तक लगा दी जाती है बस, उसी का सौदा किया जाता है। 1200 रुपये में लकड़ियाँ कम और बचा-कुचा माल ज़्यादा होता है। जिसमे चलने के बाद में मुर्दे के खिसकने का डर ज़्यादा रहता है। कई बार तो गीली-गीली लकड़ियाँ रख दी जाती है। जिन्हे जलाने में कई किलो देशी घी लग जाता है तो लोग ऐसा काम ही नहीं करते। वो तो चाहते है की मरने के बाद तो उसे कोई दुख ना हो और मिट्टी का तेल डाला नहीं जा सकता। बस, 2000 रुपये तक में सौदा करने के लिए तैयार हो जाते हैं लोग।

लकड़ी वाले ने कई टन लकड़ियाँ मंगाई हुई है और शमशान घाट मे चारों तरफ़ में अपनी लकड़ियों को फैला हुआ है। देखने मे तो शमशान घाट किसी पार्क से कम नहीं लगता। अब देखा जाए तो डर जैसी हवा दूर तक नहीं भटकती। शाम मे तो शायद वहाँ कई तरह की रोनक बन जाती होगीं। हर वक़्त वहाँ पर लाउडस्पीकर मे गायत्री मन्त्र की कैसेट चलती रहती है और वहाँ आए अर्थी के साथ में लोग उस मन्त्र का आन्नद लेते हैं।


शिवराम जी भी उन्ही पंडित जी के साथ मे शमशान घाट से जाने की कह रहे थे। शायद आगे बनने वाले शमशान घाट मे किसी शिवराम जी की जरूरत नहीं होगी। जो अपनी मर्जी से किसी भी अर्थी के साथ मे लग जाया करते। जो उसे पहले पुन्य का काम मानते और उसके बाद मे कुछ पाने की तमन्ना रखते। अब तो वहाँ पर कोई सरकारी नौकरी करने वाला आएगा जो सारे काम सरकारी नियमों के अनुसार करेगा। शायद अर्थी में होने वाले कामो को भी और रिवाज़ो को भी वो नौकरी मान कर ही करेगा। अब तो सारे काम नियम अनुसार ही होगें। कब क्या करना है वो सब अब कागज़ो में लिखा-पढ़ी के बाद ही आगे बढ़ाया जाएगा।


इन शब्दों में पंडित जी के बोल ज़्यादा थे। शिवराम जी तो बस उन्हे सम्भाले हुए थे और उलटे पाँव जाते-जाते शमशान घाट को ताक रहे थे।

शायद ये उनका आखिरी दिन था।

लख्मी 

Monday, July 16, 2012

काग़जात बक्से मे रखकर जमीन को खोदा जाता है



मैं मानता हूँ, “कितनी ही जिद् और टेंशनें हैं - किसी जगह में आने की, जाने की, कुछ बनाने की और साथ ही साथ टूटने की। मगर असल में ये सब की सब मेरे अन्दर हैं वो शहर में और न ही मेरे आसपास नज़र आती। मैं ही अपने अन्दर खुद का टूटना और बिखरना लिये चलता रहा और बाहर को रूखा - रूखा मानकर भी। क्या मैं अपने अन्दर ही दबकर रह गया हूँ? क्या वहीं से सब कुछ उभरता रहा?”

            *****************************************
कौन है जो पूरी जगह की तरफ से बोल सकता है?
कौन है जो पूरी जगह को बता सकता है?
कौन है जो पूरी जगह का चेहरा है?
कौन है?
                 ***********************************************
पहला शख़्स– क्या वो है जो अपने साथ 100 लोगों को लिये चलता है?
दूसरा शख़्स - क्या वो है जिसने लोगों के सरकारी दस्तावेज़ बनाये है?
फिर से पहला शख़्स - शायद वो है जिसने यहाँ पर लोगों को राशन दिलवाया है!
तीसरा शख़्स – यहाँ के प्रधान है - जो रात में कोई न कोई बुरी ख़बर सुनाते हैं।
***************************************************

"खुदी हुई जगह को रोज़ - रोज़ देखकर मैं हैरान था। इसको दोहराने के लिये शब्द आ कहाँ से जाते थे सबके पास। जबकी मैं शब्दों और बोलो से कमजोर पड़ रहा था। एक शाम मेरे साथी ने कहा, “बाहर जाओ और जगहों, लोगों को देखकर आओ उसके बाद में खुद से हर रोज़ एक सवाल पूछों।"

वो कौन – कौन से लोग होते हैं जो शहर की कल्पना और गढ़ना मे नहीं आते?
लेकिन किसी जगह के टूटने के वक़्त उससे जुड़ जाते हैं।
 
20 घरों की गली मे से दस घर टूटे पड़े थे।
  •     वहाँ से गुज़रने का मतलब क्या है?
जिसकी गली में कभी गाड़ी नहीं घुसती थी
वहाँ पर घूसने वाली पहली गाड़ी थी बुलडोज़र।
  • ये नज़ारा मैं कैसे देखूँ?
एक आदमी अपने टूटते हुए घर से दस कदम की दूरी पर बैठा
अपने घर को देख रहा है।
  • उसके सामने दस मिनट खड़े रहने का मतलब क्या है?
4 लड़कियाँ अपने रंगीन घर के तोड़े जाने पर ही रो पड़ी
जिससे पूरी गली आँसूओ से तर हो गई। वहाँ पर खड़ी
पुलिसकर्मी भी।
  • मैं वहाँ से भाग आया - क्यों?
जब उस डायरी पर लिखे सवालों को मैं देखता तो बनने और टूटने के बीच में खड़ा मैं एकमात्र शख़्स था जो खुद से लड़ रहा था। उस डायरी ने एक अपार दुनिया मेरे सामने खोल दी थी।

लख्मी

Thursday, January 19, 2012

गुमनाम खत - पेज 02

अब तक इस ख़त की लाइनों में जीवित सांसो को महसूस करने की भूख मेरे शरीर को हिलाने लगी थी। जैसे आर्लम लगाये समय सांसो के साथ डांस कर रहा हो। मन हुआ इसे यहीं बन्द करदूं, फिर सोचा की मैं क्यों ना पढूँ इसे? इसलिये की मैं इसमे डूबना नहीं चाहता था या इसलिये की मैं किसी के इतने निजी मे आज तक गया नहीं था या फिर मुझे निजी होने मे घबराहटें थी।

कितने झोल मे जिन्दगी बसर करती है अपने उन सभी रिद्दमों से जो उसे हर भाव से रूबरू करवाते हैं। झोल जिन्दगी के नमूने हैं जिनसे रात और दिन के खेल का अंत होता है। झोल – किसी को वो नहीं रहने देते जैसा वो दिखता है या उसे कोई जैसे देखना चाहता है। ये उसके होने मे बसा है। एक पल को तो लगा की ये दास्तान या बोल मेरे ही घर के किसी छुपे कोने से है। लेकिन एक पल मे जब मेरे झोल खुलने लगे तो मैंने इससे दूरी बना ली और कट्टर बन उसे कोसने लगा जिसे मैं जानता ही नहीं हूँ। मैं ही क्या ऐसा कोई भी करता। अकेले मे नजदीक और भीड़ में सामुहिक हो जाने के खेल आसान और समझदारी वाला है इसे कौन नहीं खेलना जानता?

एक पूरी रात तुम्हारी हर बात को याद करके मैं खूब हसं रही थी। तुम्हारे उस कुएँ वाले किस्से को याद करके जब तुम अपने घर से साबून की छोटी सी टिकिया चुराकर नहाने गई थी और अपनी सारी सहेलियों से तुमने उस साबून को छुपाया हुआ था। तुम्हारे लिये वो बहुत महंगा साबून जो था। तुम्हारी बहन ने वो खुद के लिये खरीदा था। मगर तुम्हे उसके सफेद रंग से प्यार हो गया था। तुम भी ना अम्मा! पागल ही थी। कुएँ का पानी बहुत ठंडा था और तुम्हे नहाने की जल्दी थी। जल्दी जल्दी के चक्कर मे तुमसे वो साबून फिसलकर कुएँ के किनारे बनी एक पोखर मे गिर गया था। एक पल को वो तुम्हारे परेशान होना और एक पल के लिये तुम्हारा वो खुश होना दोनों मेरे समझ से बाहर था। लेकिन मुझे हंसी ही आए चली जा रही थी। उस पोखर मे तुम उतरी और उस साबून को निकालने लगी, बहुत ढूंढा था तुमने लेकिन वो मिला नही। तकरीबन 2 घंडा ढूंढने के बाद भी वो जब नहीं मिला तो तुम चुपचाप चली आई। घर मे ऐसे रही जैसे तुमने कुछ किया ही नहीं। ये सब तो ठीक था मगर तुम तो दूसरे दिन भी उस पोखर मे घूस गई थी उसे ढूंढने के लिये। क्या अम्मा तुम ना सच ही में पागल ही थी। भला वो मिलता तुम्हे? गल नहीं गया होगा, ये भी नहीं सोचा था तुमने।

उस लोटे पर किसी का नाम लिखा था क्या अम्मा जिसे तुम रोज देखती थी? मैं पूछ नहीं रही बस, ऐसे ही जानना चाहती हूँ।

तुम्हारा वो कमरा जिसकी दिवारों पर बस तुम्हारे लिखे कुछ अक्षर ही दिखाई देते थे। आड़े तेड़े, अधूरे, मिटाये हुए, एक के ऊपर दूसरे को चड़ाये हुए सारे शब्द ही थे। मगर किसी का नाम नहीं था। वो शब्द मुझे कभी समझ मे नहीं आये थे। वो क्या तुम्हे पसंद नहीं थे, पसंद थे, सुने थे, तुम्हे चिड़ाते थे, डराते थे या तुमने अपने कमरे को अपने लिये एक किताब बनाया हुआ था जिसे तुम ही लिखती थी और तुम ही पढ़ती थी। इतना शौर था तुम्हारे उस कमरे में आज भी है, बस दिवारें सपाट रही है, मुझे पता है क्यों - मगर उन सफेद पुती दिवारों के पीछे वो शब्द चिल्लाते हैं मैंने उनकी आवाज सुनी है। मैंने अपने कमरे को, वो आवाज सुनने वाला बनाने की बहुत कोशिश की लेकिन बना नहीं पाई। मैंने भी अपने कमरे को बोलने वाला बना दिया था। तुम एक पल भी उस कमरे मे रुक नहीं पाई थी। लगता था जैसे तुमने उसे अपना लिया है। तभी दूरी बना ली थी। मैं तुममे खुद को देख रही थी। शायद ये मेरी गलती है।

मैंने अपने दोस्तो के बीच में एक बार इस कमरे का जिक्र किया था। वो आपको प्यार मे डूबी और दुखी होने के ही बारे मे कहते रहे, शायद इससे ज्यादा वो समझ नहीं सकते थे। दोस्ती, प्यार और अफ्येर के बीच के फासले को वो शायद कभी समझ नहीं सकते थे। तीनों मे होती बातें, हरकतें, आदतें, डूबना एक ही तरह से होता है मगर अहसास का फासला इसमे महीन सी दूरी बनाता है वो शायद इनसे अंजान है।

मैं तुम तक पहुँचना चाहती थी, इसलिये इन सब को समझने की कोशिश मे थी। बैचेनी, तड़प, लरक इनका वास्ता जब जीवन से पड़ता है तब ये बदलती है, नहीं तो समझने का फासला बन नहीं पाता। ये मेरे दोस्तों के पास मे नहीं था। सच कहूँ, मेरे किसी दोस्त ने मुझे तुम तक पहुँचाने का रास्ता नहीं दिखाया था। ये मैंने खुद चुना।


लख्मी

Monday, September 12, 2011

वो हर वक़्त कुछ कुरेदते रहे हैं।

शिवराम जी, शमसानघाट से बाहर निकलते समय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते लेकिन जब शमसानघाट मे दाखिल होते हैं तो पीछे मुड़कर जरूर देखते हैं। वे कहते थे कि मैं जब यहाँ पर आता हूँ तो उसे जरूर देखता हूँ की मेरे पीछे कोन आ रहा है लेकिन जब यहाँ से बाहर जाता हूँ तो पीछे मुड़कर नहीं देखता क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे साथ बहुत सारे लोग चलकर आये हैं।

उनका दिन यहाँ पर किसी ऐसी रात से कम नहीं था जिसे वे जीना चाहते हैं। जो बिना दायरे के और बिना समाजिकता के चल सकता है। जब हम उनसे कोई पूछता था की तुम ये काम क्यों करते हो?, ये तो हमारे खानदान मे किसी ने नहीं किया और जो समाज नहीं चाहता, उसे कोई नहीं कर सकता। तो वे अच्छी तरह से समझते थे कि उनसे क्या पूछा जा रहा है। मगर वे कहते थे कि बिना समाज के और बिना रिश्तेदारी के भी एक जगह है जो चल सकती है, जिन्दा रह सकती है। वे ये है।

इसलिये वे यहाँ से पीछे मुड़कर नहीं देख सकते थे और जब घर से यहाँ आते तो देखते थे।

उनके साथ बातचीत :

राजन ने पूछा, "आप अपनी थकान कैसे चुनते हैं? वो जो जिसे आप कोसना नहीं चाहते।”
शिवराम जी शमसानघाट में अस्थी की राख के ढेर में कुछ कुरेदते हुए बोले, “मैं पूरा दिन यहाँ आती भीड़ के भीतर अकेले महसूस होते हुए नहीं थकना चाहता।, राख मे कुछ कुरेदते हुये नहीं थकना चाहता, लोग आते हैं, कुछ देर बैठते और फिर चले जाते हैं ये मुझे बेहद अच्छा लगता है। मैं उनका फिर देखने के इंतजार मे नहीं थकना चाहता। मैं अखबार पढ़ते हुये और नये काम की सोचने मे नहीं थकना चाहता। यहाँ पर जब लोग आते हैं तो लगता है कि सारा रोना - धोना घर छोड़ आये हैं या वो जो जा रहा है वो इन सबके आंसू अपने साथ लेकर जा रहा है। मैं इन बातों मे रहकर मस्त रहता हूँ। इन्ही में रहना चाहता हूँ, इनको रात मे याद करते हुये कभी जिन्दगी मे थकना नहीं चाहता।"

राजन ने पूछा, “कब लगता है - मुझे अब अपने जीने के तरीके पर सोचना होगा?”
शिवराम जी अब भी उसी राख में से कुछ निकाल रहे थे - कुछ चुनते हुये बोले, “कई बार लगता है कि अपने आप को बदल लो, मगर वो सब नुकशान या मुनाफे के भीतर होता है। पर मुझे यहाँ पर आने के बाद मे लगा की ये जगह हमें ये सोचने के लिये नहीं कहती। लगता है कि यहाँ पर जीवन बहुत बदल गया है। खासकर उस जीवन से जो मुनाफे और नुकशान के जवाब मांगता है। मैं कहता हूँ की अगर मुनाफा और नुकशान से डरकर अगर आप अपने जीने के तरीके को बदलोगे तो ये तुमने थोड़ी बदला। ये बदलना पड़ा। मजा तो तब है जब बिना वज़ह के जीने का तरीका बदलना हो। जिसमें हमें जीने का जो तरीका है उसके बदलाव का पता हो ना कि उसके कारण का।"

राजन ने पूछा, “जीवन के वो कौन से पल या दर्शन हैं जो आपको अपनी छवि यानि जो अब हम हैं उससे खिसका देते हैं?”

शिवराम जी बोले, “मैं क्या हूँ और मैं क्या था, दिन में ज्यादा बार सोचा नहीं जा सकता। मैं इस जगह में जो करता हूँ उसे करते समय मैं खुद से पूछूँ की मैं तो ये पहले कभी नहीं करता था तो ये सब कुछ मेरी बेबसी की कहानी बन जायेगी। तब लगता है कि सारी खाल उतार दूं जो मैंने पहन रखी है। बहुत कुछ होता है एक ही दिन में जो पूछता है कि "तू कौन है"

राजन ने पूछा, “जीवन में कब "कहाँ" का ख्याल आता है?”
शिवराम जी अस्थियों वाले कमरे मे घुसते हुए बोले, “यहाँ पर आने के बाद मे लगता है कि "अब कहाँ" मैं यहाँ पर काफी काफी देर तक खड़ा रहता हूँ। कभी-कभी तो बातें तक करता हूँ यहाँ पर बैठकर। खुद को सोचता हूँ की मैं भी यहीं इन्ही के बीच मे कहीं पर लटका हूँ और कभी लगता है कि ये मेरे बस का नहीं है। मैं तो ये कगरा कितना शांत है, लगता है कि यहाँ पर लटकी हर थैली बात करती है। मैं कहाँ जा सकता हूँ यहाँ से? इन सबके अब ना तो कोई रिश्ते है और ना ही कोई काम, ये तो अपने कहाँ पर पहुँच गये हैं लेकिन मुझसे कह रहे हैं कि शिवराम तू आपको नहीं लगता ऐसा?“

राजन ने पूछा, “ये लौटना क्या है? हम कब "वापसी" को सोचते हैं?“
शिवराम जी बोले, “लौटना वो है जब आपके हाथ मे कुछ हो। लेकिन वापसी वो है जब आपके हाथ मे कुछ ना हो लेकिन आपके साथ कोई हो। मैं जब कुछ समान नहीं लेकर घर जाता था तो मेरी बीवी बहुत बातें मुझे सुनाती थी। लेकिन जब मैं कुछ समान अपने साथ लेकर जाने लगा तो वो उस समान को अन्दर ही नहीं लेती। मगर मैं दोनों हालात में घर के अन्दर दाखिल हो जाता था। मैं ये सोचता था कि मेरी बीवी को चाहिये क्या? वापसी क्या इनकी तरह नहीं हो सकती। जैसे यहाँ पर कोई वापसी नहीं करता। लेकिन यहाँ से वापसी करता है। मैं भी यहीं से वापसी करता हूँ।"

"वापसी" भीतर से सोचते हुये महसूस हुआ की जीवन में वापसी का अहसास अपने से बाहर लेकर जाने की कोशिश है ना की अपने भीतर ही लौटना है। शिवराम जी के साथ बातचीत में लगा की उनका घर लौटना और शमसान के मे वापस आना ही उनका जीवन के "कहाँ" के सवाल यहाँ आकर एक ठहराव लगा। मेरे उनसे बातें करने की कोशिश में। और बेकारगी के बिना जीवन की कल्पना करने की इच्छा उन्हे इस जगह से जोड़े रहती है। हमें “मेरी जिन्दगी में सब बदला कैसे मैं नहीं जानता लेकिन मैं बदलाव में कैसे बदला को मैं कई बार सोचा हूँ"

लख्मी

Monday, September 20, 2010

हवादार दर



कोई जा रहा है।
कोई मगन है।
कोई टहल रहा है।
कोई खो रहा है।
को झूम रहा है।
कोई झांक रहा है।
कोई बदमाशी कर रहा है।
कोई उदास है।
कोई मना रहा है।
कोई रोमांश में है।
कोई गा रहा है।
कोई सुन रहा है।

इस "कोई" की कोई सीमा नहीं -

लख्मी

Sunday, August 22, 2010

मस्तकलंदर

समय ,11:40 pm
दैनिक सूपर हिरों ,जिन्दगी भी हमें कुछ न कुछ जरूर देती है ।
हम खूद भी अपने लियें कारवां चूनते है। मस्तकलंदर की तरह ।





राकेश

Wednesday, April 14, 2010

कोई परछाई हमें देखती है ,सूनती है।

इस मे हम कहाँ है।



कोई है जो हमेशा साथ है और होकर भी अद्विश्य है।



आवाज देती परछाई।



हमें सूनती और देखती है।



साथ रहती है ।



सामने तो कभी पिछे ।



हर वक़्त



किसी जगह में



अपने साथ भी


कभी दिख जाती है और कभी हाथ ही नही आती है।



राकेश

Tuesday, January 26, 2010

फुटपाथ का द्वश्य

सड़क पर भारी-भरकम वाहनों की गिच-पिच से भरा शोर-गुल का माहौल। धूएँ की गंद और कानों के पर्दे को तकलीफ पहुँचाती। तिपहिया स्कूटर और कार इत्यादि के हॉर्न की आवाजें जो पल भर को झजोड़ के रख देती है।

अर्चना रेड लाईट के पास बने कॉरिडोर में बड़ी बसों आना-जाना लगा रहता है। जहाँ लगता है की किसी के लिये यहाँ ठहरने का वक़्त नहीं। सब किसी न किसी धुन में चले जा रहे है। रोज का एक मक्सद और रोज की कोई कोशिश जिससे माध्यम बनाकर ज़िन्दगी की किन्ही प्रतिक्रियाओं को अपने व्यक्तिव में गेरतें हैं।

वर्तमान जो कोई सांप बनकर जगह के सूनेपन को डस जाता है फिर कोई परी की कहानी माँ की ममता की गोद में सून्ने को मिलती है। बाप का साया सिर पर है तो जीवन की कोई भी कसौटी हो। अपनी परम्पराओं का पालन कर सब अपने लिये कुछ न कुछ बना ही लेते हैं।

आज सच के सामने खडे होकर जीना साधारण बात नहीं है। अनिश्चिता उस दलदल में ले जाती है जिसका कोई तल मालूम नहीं पड़ता। मन के तारों को जनह देने वाली उस छवि ने चंद पलों को जैसे बीतने से पहले ही रोक लिया हो। कुछ देर ठहरने का जो अनूभव के बाद जो ख्यालगोहि मैंने अपने आपसे की उसमे मुझे अपने सामने बनी छवि के प्रती मेरे मन वात्सल्याता का अंकुर फूटने लगा।

श्याम ढले जब रेड लाईट ने चलती गाड़ियों को लगाम देने का इशारा किया तो जैसे आस-पास रोशनी कोई गोला सड़क के उपर गिर गया हो। सारी गाड़िया रूक गये और हफ्ते इंजन गर्र-गड़ाने लगे। फुटपाथ पर एक 3 साल का बच्चा अपनी आँखों से सिस्क-सिस्ककर रो रहा था। चारों तरफ चौराहा और शोर-शराबे का माहौल जिसमें उस रोने वाले बच्चे का होसला अपना नियंत्रण खो रहा था। यातायात के सारे फंग्सन बने हुए थे। उस बच्चे का रोना किसी को सुनाई नहीं आ रहा था पर सब अपनी गाड़ियों में बैठे बाहर खड़े उस बच्चे की हालत पर तरस खा रहे थे। उसके करीब उस की शायद बहन थी जो उसके रोने को बार-बार नज़रअन्दज कर रही थी। वो अपने पास रखी स्टील की थाली को तडा-तड बजाये जा रही थी पर उसे जरा भी नहीं चूभ रहा था। जिसे देखकर शायद किसी का भी कलेजा मुँह को आ जाये।

इतनी संवेदना थी उसके मासूम से चेहरे में और सिस्कियों में जिसे महसूस करके मन व्याकुल हो उठा। मेरी व्याकुलता उसकी समस्या का समाधान नहीं थी। पता नहीं उसके इस हाल का जिम्मेदार कोन है और किसी जिम्मेदार ठहरा सकते है? मगर कम्बखत ये मेरे वहाँ होने पर लानत थी की क्यों न उस रोते बच्चे को गोद में उठा कर ममता दिखाई। खैर, समय निकल जाने के बाद खुद को कोसने का क्या फायदा। जरा उस लड़की को तो देखो जो बालपन में ही अपनी मेहनत का वो नजारा दिखाती जिसे देखकर हर आँखें हैरान हो जाती और कुछ उस नजारें को देखने के रोज आदी हो जाते वो भी हर बार की तरह उसके करतब देखकर चन्द शब्द जूबाँ पर लाकर खूद को तसल्ली देकर इस जगह से निकल जाते। वहाँ रह जाता तो सिर्फ उस फुटपाथ पर उन बच्चों की जिन्दगी का अंश। जो समय की कग़ार पर कभी उभरता और कभी अद्वश्य हो जाता।

वो लडकी सारी विपदाओं से अन्जान बनकर अपने रोज़ के रूटीन का अनुसरण कर खुद की कोई छवि बनाती जिसकी शायद ज़िन्दगी को भी जरूरत नहीं है। किसी को भला समझने के लिये 3-4 मिनट काफी होते हैं। हर रोज अगर यही द्वश्य आँखों को प्रभावित करता है तो वो कहीं न कहीं जीवन का हिस्सा बन जाता है। जो आप के हाजिर होने का संकेत देता है।

मेरे ठीक सामने खम्बे के पीछे खडे उस बच्चे का रोना अभी जारी था। उसकी बहन अपने शरीर का अंग-अग बांँस की लकड़ी की तरह मोड़ देती । यातायात के चंद लम्हात रोकते ही उसका जीवन का प्रक्रिया शुरू हो जाती। वो लगातार कलाइयों और बदन को मोड़ देने वाली क्रिया करने में व्यस्त हो जाती। सड़क पर खड़ी गाड़ियों में बैठे शख़्स आँखें फाड़े उसी ओर देखने लगते जहाँ उसके घायल हाथ-पाँव अपने दर्द का अहसास किये बिना मस्कत करने लग जाते। रोजाना के अभ्यास ने उसका शरीर लचीला बना दिया था। वो अपने हाथों को जमीन पर रखकर कला-बाजियाँ दिखाने लग जाती। एक बार फिर दो बार, इस तरह वो कई कलाबाज़ी एक साथ कर जाती। उसे देखकर लगता की अगर यही लड़की किसी जिमनास्टिक या किसी इंस्टीट्यूट में होती तो उसकी इस काबीलियत की तारीफें गढ़तें पर उस सड़क पर आए दिन बने माहौल की विवश्ता यही थी। वहाँ जो भी इस तरह का कुछ घटता उसे कोई बदल नहीं सकता था। जब वो लड़की दस कदम तक कलाबाजी करती हुई चली जाती। बच्चा वहाँ खड़ा हुआ रो रहा था। जैसे ही उसकी कलाबाजी खत्म हुई वो सड़क के पास बनी पटरी पर बिछाए जाल को उलांग कर स्कूटर, कार, मोटरसाइकिल वालों के पास चली जाती।

गोरे रंग और मासूम शक्ल वाला वो बच्चा उसे दूर जाता देख अजनबियों जैसा महसूस करता। वो लड़की उसे अपनी तरफ बुलाती जाल के इस पार पर वो सिर हिलाकर मना कर देता और वही कुदाकादी मचाने लगता। वो जाल के पास आता फिर जाल को छूता शायद वो कुछ समझने की कोई कर रहा था। मगर उसका बचपन उस पर लादे बोझ से छूटकारा दिला देता। वो जाल को छूता हुआ धीरे-धीरे दिवार की ओर चला जाता अपनी बहन के बूलाने पर भी वो वापस नहीं आता।

तभी सड़क की ग्रीन लाईट हो जाती और गाड़ियाँ रेस के मैदान में दौड़ने को अपनी जगह छोड देती। वो लड़की सब से पैसा मांगकर वापस उसी वहाँ से हट जाती और फि वो रेड लाईट होने का इंतजार करने लग जाती।

राकेश

Friday, January 22, 2010

हर समय हमारे साथ हमारी यद्दश्तौर और कल्पना

हम जो जीवन मे सोच रहे है उसका एक उदहारण, चित्र उभारना चाहिये। जो हमारी अवधारणाओं और विशेष विषय के उदाहरण पर विचार विमर्श उनको बाँटने से ही उनके जीवन बुनियाद मजबूत हो जाती है। जीवन के सभी तत्वों को गम्भीरता से लेना चाहिये जिससे ऐसा न हो की आप का लाइव दूसरों के पहलू से बहुत दूर हो जाये। यदी ऐसा होगा तो खुद में एक धूंधलापन पैदा हो जाने का डर आ जाता है। अपने जीवन को विशेष रूप से सोचने की कोशिश न छोड़ें।

अपने आपको हर किमत मे पकड़े रहे तभी बौद्दिकी ज़िन्दगी को हर्ष और उल्लास से जी सकेंगे। जीवन के संचार, संकेतों और प्रतिकों का अध्ययन है और आमतौर पर तीन शाखाओं में विभाजित है। शब्दों, लक्ष्ण और बातें जो वे उल्लेख के बीच सम्बंध, उनका औपचारिक संरचनाओं में संकेत के बीच सम्बंध लक्षण और उन लोगों पर न के प्रभाव के बीच सम्बंध जो है उन्हें उपयोग करें।

सकेतिकता अक्सर महत्वपूर्ण मानवविज्ञान आयाम होने के रूप में देखा है, उदाहरण के लिए का प्रस्ताव है कि हर संस्कृतिक, जीवन, समय को घटना संचार के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि विज्ञान के तार्किक आयामों पर ध्यान केंद्रित कुछ वे ऐसे कैसे जीवों के पूर्वानुमान के बारे में और अनुकूलन के लिए, अपनी दुनिया में जगह बनाने के लक्षणिक रूप में प्राकृतिक विज्ञान के लिए और जीवन के कर्मकांडो में भी सम्बंधित क्षेत्र लाक्षणिक सिद्धांतों अध्यन कर सकते हैं। हम अपने किसी उद्देश्य के रूप में संकेतो या अपनी जीवन प्रणालियों को समझने का एक
ग्रह बना सकते है।

जो हर समय हमारे साथ हमारी याद्दाश्त में स्थिर होगा और जिसका रूप की कल्पना का ढ़ाँचा जगह में बखूबी दिखेगा। जहाँ पर रहने वाले जीवों में सूचना का संचार रचनात्मक माहौल में शामिल किया है। दिमाग की एक उपज है जो समूहों और आर्कषण देने वाले माहौलों से उभरी एक कल्पना है।


राकेश

Tuesday, July 7, 2009

आटो रिक्शा - जगह की जिन्दगी

वर्तमान इस बात का गवाह है की आज दिल्ली की सड़कों पर यातायात के सुलभ प्रयोजन हैं पर वक़्त के नये और कारगर योजनाओं की चपेट में आकर यातायात के कई साधनों के लुप्त होने के बिन्दू दिख रहे हैं। ये देखने में आता है की शहर आदमी की ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा ही नहीं बल्की आज शहर की आबों-हवा के बिना आदमी की कल्पना करना नामुम्मकिन सा लगता है।

शहर में सत्ता का सिक्का चलता है इसमें कोई शक़ नहीं है। वो कानूनी दाव-पेच के जरिये अपने लोकतंत्र में जीने वाले प्रत्येक व्यक़्ति से राज्य का नुकसान और मुनाफा करने के लिये सार्वजनिक सम्पदाओं में जीते लोगों पर टेक्स जैसे भुगतानों से अपनी जड़ों को सींचती है और बदले में देती है एक तराजू-बट्टे से नपा-तुला शरीर कि चक्की में पिसा वो हिस्सा जो संतुष्ट ही करता है। सपने पूरे नहीं करता। सपनों को जन्म ही लेने नहीं देता। बल्की आप किसी के सपने के लिये जी रहे हो ये समझ कर खुद को मारकर भी ज़िन्दा रखा जाता है। ये ज़्यादा दिखाई देगा उस निराकार उद्देश्यहीन और भौतिक दूनिया में एहतियात बरती विवेकशील इच्छाओं में। असुविधाओं में एक सच्चा जीवन अपनाकर जीने वाले मजदूर आदमी में। इंसान ने शरीर की अनेक क्षमताओं के बारे में शायद जान लिया है।

तभी वो खुद को किसी के सपने के लिये ज़िन्दा रखकर उसके साथ अपना सपना भी देखना शुरू कर देता है। इसलिये अपना एक क्षेत्र मानकर आदमी किसी न किसी विभाजन के बीच रहकर अपने आराम और काम से अलग बनी रचना में भी जीने लगता है।

ये चाहत उस नियम को तोड़ती है जो किसी के जन्म से पहले बन जाता है। जो समाज में आने वाले के आगमन के होते ही उसकी छवि को समाज में प्रचलित कर देता है। लेकिन असल में जब बनाने वाले के हाथ ही ये भूल जाये की मैंने इस नेन-नक्श से सोभित रूप - आकार को बनाया किस लिये है? और वो करना क्या चाहता है? तब वक़्त की भविष्य वाणियाँ भी झूठी पड़ जाती है फिर काल्पनिकता इतनी गाढ़ी हो जाती है की सपना भी हक़ीकत में बदल जाता है या सब सच हो रहा होता है। यानी इंसान को जब मौत के लिये बनाया है तो अपने लिये जीने की वज़ाहें तलाश लेता है और फिर जीना चाहता है तो फिर इंसान को बनाने वाला भी अपना ईरादा बदल देता है और हमारी तलाश की ज़िन्दगी मे ईजाफा कर देता है।

ऐसा ही तेवर मैंने आटो रिक्शा बनाने वालो के जीवन में देखा। एक चलता-फिरता भौतिक जीवन का ढ़ाँचा। जिसका शायद भाविष्य है। ये एक साधन और ज़रिया तो है ही, पर किसी को कहीं से कहीं तक छोड़ने के अलावा इसके साथ रोजमर्रा की सच्चाई और काल्पनिलताएँ जुड़ी है। ये एक जगह में गढ़ा जीवन बनाये हुए है। जिसके साथ कई लोग, कई घर की कशमकश से भरी इच्छाएँ उज़ागर हो रही है। इन सारी भावनाओं और ज़िन्दगी इमारतें को खड़ा रखने वाली जगह है। जो ये एक आटो रिक्शा रिपेयर मार्किट है। जिसके साथ यहाँ पर भारी संख्या में लोग जुड़े हैं। इस समूदाय में हर कोई किसी न किसी का उस्ताद और शार्गीद है पर किसी को भी इस बात का जरा भी अभिमान नहीं है। सब का कार्य करने का अपना अन्दाज है अपना तरीका है। सब एक - दूसरे के स्वभाव से सुसोभित रहते हैं। दिन भर में न जाने कितनी बार किसी न किसी से मिलते-जुलते नज़र डाल जाते हैं और मज़ाक के अन्दाज में कोई भी बात कह जाते हैं। सब का आपस में बड़ा अच्छा ताल-मेल का रिश्ता है। जो उदारता और करूणा अहसास देता है पर जब उस मार्किट से बाहर निकलते हैं तो अजीब सी ताकतें इस अहसास को जख़्मी करने की कोशिश करती है। जो मार्किट से बनकर बाहर आता है उसे इस्तेमाल के नज़रिये से ज़्यादा नहीं समझा जाता है।

आज कल ऐसी ही कुख़्यात नीती के शिकार जो शहर के जागने से सोने तक में अपनी एहम भूमिका निभाते हैं। वो जैसे मानो सूरज की तरह कभी डूबते ही नहीं चाँद की तरह कभी छिपते ही नहीं। दूनिया के चौबीस घंटे घूमते रहने के बावज़ूद प्रत्येक व्यक़्ति को अस्थिर अहसास ही मालूम होता है। जब की वो अपनी जगह को बहुत कम छोड़ते हैं।

दूनिया में जीने रहने वाले इंसान को अपनी अनेक भूमिकाएँ बनाकर रहना पड़ता है। बस, वो जहाँ है अपनी जगह को मजबूती से पकड़े रहे तभी उसके जीवन के कठोर से कठोर हालातों का सामना करने की ताकत आती है। जो जड़ो में निरंतर पुर्नमिश्रण करते रहने से होता है।

अब मैं सोच रहा हुँ की में एक ऐसी खोज के लिये चला था जिसका छोर अभी मैंने ठीक से समझा ही नहीं। लेकिन उसमें भटक जरूर गया हुँ। जब मेरे सामने मेरी अपनी खोज को सबसे पहले चुनौती देनी बाली बात थी की मैं दूनिया के एक छोटे से भूआकार मे बनी लम्भ-सम्भ पचास मीटर से अधिक जगह में जाकर शामिल हो रहा हुँ। उस जगह में जीतने भी लोग मुझे देखते हैं वो बेहद संकोच मे पड़े होकर भी मुझे आसानी से अपने बीच से गुजर देना चाहते हैं फिर मैं कैसे और किन सवालों को चीज़ों को लेकर उनके बीच जा बैठूँ। जिससे मुझे उनकी ज़िन्दगी का हर क्षण को जीना और स्वतंत्रता के साथ एक-दूजे से मेल-मिलाप बनाये रखने की मोज़ूदगी मिली। मैं ये कहकर अपनी तलाश को कमजोर नहीं करना चाहुँगा की मेरे चन्द सवालो के जवाब पाना और किसी चीज को खोज पाने की मुझे इच्छा रही है। ये मान लेना मेरे लिये और मेरे बेमतलब मक्सद के साथ सरासर नाइंसाफी होगी।

बात चाहें जहाँ से भी शुरु हुई हो तलाश का मुद्दा चाहें कुछ और दिखा रहा हो। जरूरी तो ये बन पड़ता है की आपने उस तलाश में जारी रहे वक़्त के लम्हात में जीवन की रचनात्मकता और अनेक भूमिकाओं की नाट्कियता को कैसे अपने अदान-प्रदानों में लिया?

अपना एक अदभूत कुटुम्भ सा बनाये "ये इंद्रिरा विराट" मार्किट की ये जगह दक्षिणपुरी के साथ ही जन्म ले चुकी थी। शुरू में इस जगह मे चाय, खाना, पर्चुने की दूकान चलाने वाले ही आये थे। तेजी से बनते घरों और एक जगह से दूसरी जगह जाने के उम्दा साधनों के न होते हुए आटो रिक्शा ही रह जाता था जिसमें लोग अपने सामान को लाया और ले जाया करते थे। आटो आने की वजह अभी ओझल है मैं इस पर से पर्दा नहीं उठा चाहता। मगर आज जो पूरी मार्किट में घूसते ही सुनने को मिलता है जो हो रहा होता है। उसे पचाने के लिये अजगर के माफिक शरीर चाहिये।

मुझे ये जानने की एक हुड़क सी लगी की इस जगह में पहले कौन आया होगा।? मैं जगह से हर बार इतना प्रभावित रहता हुँ की मुझे जगह में अपने खुद के होने का पता ही नहीं होता। कि मैं कौन हुँ और कहाँ से आया हुँ? जगह के (अवतरन) वज़ूद में मैं अपने पूरी तरह से खो बैठता हुँ। आप यकिन ये सोचे की ऐसा बेडोल बन्दा कैसे किसी तलाश को ज़िन्दा रख पाता होगा? आप मेरे ओधड़ स्वभाव को काश समझ पाते तो मुझे शुकून मिलता। आप इस बात पर भी हंस रहे होगें की बहकी और भटकते विचार वाला कोई कैसे हमारे बीच आ सकता है। तो मैं आप को विश्वास दिलाता हुँ की मैं आप के ही बीच में हुँ और जो बात कर रहा हुँ जिस ज़िन्दगी को आपके नज़दीक ला रहा हुँ। वो भी आपके ही बीच से निकला समाज है। बल्की मैं तो ये कहता हूँ की ये तो आप ही का हम शक़्ल है। जो कहीं भीड़ में खो गया है। आप जिसे मानो कुम्भ के मेले में खोज रहे हैं और मिलने के उपरान्त भी आप उसके रूप और रचनाशीलता को पहचान नहीं पा रहे हैं पर कोई चिन्ता की बात नहीं ज़िन्दगी में ऐसा अक्सर होता है। चीज़ों को देखने की हमारी एक नपी-तुली दूरी होती है जिसके ज़रा भी कम या ज़्यादा होने से हम ठीक से अपने सम्मुख देख नहीं पाते हैं।

शहर हर शख़्स की जेब में इजाफा करता है, जो आज के युग में उपभोगता और उत्पादनकर्ता की बीच के तार को जोड़े रखता है।

भाग दुसरा.........

मैं सोच रहा हूँ की लिखकर इस ज़िन्दगी को महसूस किया जा सकता है तो मेरा अपना भौतिक विकास होना जरूरी है। लिखना क्या है और कैसे ये आगे बड़ता और गाढ़ा होता है? ये मैंने अपने और दूसरों से लिये अनूभव को लेकर समझ पाया हूँ। मैं जब भी सोच रहा होता हूँ तो मेरे ख़्याल से या ख़्यालों के सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक सुचनाएँ जो मेरे चारों ओर कोई वर्ग न बना कर कोई अदृश्य रेखाओं खींचा नक्शा महसूस होता है। जिसमे छूअन और टकराने का सकेंत मिलते हैं जिसमें बने बन रहे दृष्टिकोणों के ठण्डे-गर्म स्पर्शो को हम लेते रहते हैं। इस लिये मुझे लिखने जैसी रचनात्मकता में यानी इस शैली में मानवियता के गुणों के साथ जीवन के फलसफाएँ जानने को भी मिलते हैं। किसी भी प्रथमिकता को पाने के लिये हमारा चेतन्य या जिज्ञासू होना जरूरी है। इस आटो रिक्शा मार्किट में मैंने वो सारी सम-विषम भावनाएँ और क्षमताएँ देखी जो हर क्षण को अंनदमय बनाती है जीवन की दिर्गता को पारिस्थितियों को नये- नये सिरों से शुरू करती है। यही तो यथार्थ का स्वरूप है।


आज मैं एक आटो रिक्शा रिपेयर करने वाले से मिला। जो दक्षिणपुरी मे विराट सिनेमा के पास बनी मार्किट की एक दुकान में काम करता है। अजय कुमार, इस मार्किट में पिछले सोलहा साल से काम कर रहे हैं। वो आटो रिक्शा की बॉडी का डेंट निकालते हैं और कटे - पुराने लोहे की वेल्डिंग भी करते हैं। अजय से जब मैं मिला तो उस के सारे कपड़े तेल और ग्रीस से सने हुए थे। वो मुझसे हाथ मिलाने मे झिज़क रहा था।

आटो रिक्शा को रिपेयर करने काम यहाँ बड़े पैमाने पर होता है। रोज़ 500 से ज़्यादा आटो रिक्शा यहाँ रिपेयर होते हैं। अजय - सुबह 9 बजे से रात को 9 बजे तक काम करता है। उसके ही जैसे लगभग यहाँ सभी लोग आटो की रूप-सज्जा और रिपेयरिंग करते हैं। मैनें एक आटो बनते हुए देखा जिसकी लोहे की हड्डियों पर रेक्सिन चढ़ाई जा रही थी। दूसरा आदमी उसके पीछे एक आर्कशित पेंटिंग बना रहा था। एक शख़्स आटो की हैड लाईट लगा रहा था। एक उसके सामने नम्बर लिख रहा था, फिर शीशा, एफ.एम. सैट करना - अन्दर की गद्दियाँ लगाना। देखते ही देखते चन्द घन्टो में आटो बनकर तैयार हो गया। अजय से इस बारे में बात हुई है। वो इस पर अपनी कई तरह की दृष्टि डालता है। इस काम को अपने जीवन का एक महत्वपुर्ण हिस्सा मानता है।
एक ख़ास बात ये है की सब यहाँ आटो रिपेयर करवाने आते हैं और बदले में अपने और काम करने वालों के बीच में अलग-अलग तरह के माहौल बना कर चले जाते हैं। एक छोटी सी जगह में लोगों का अदभुत मिल होता है जिसमें सब की अपनी एक तलाश होती है और उस तलाश के जरिये कुछ पाने की जिज्ञासा होती है जिसमें बड़े हर्ष और उल्लास के साथ जिया जाता है। यहाँ दुख और निराशा के लिये NO Entry है। सब मस्ती में जीते हैं।

राकेश

Tuesday, February 10, 2009

सच मे अंधेरा ही था

एक गहरा अंधेरा था वहाँ पर। अन्दर घुसने को कोई मनाही नहीं थी पर कदम अपना साथ दे तो हिम्मत हो। दरवाजे के सामने खड़े होकर ही पूरे कमरे का ज़ायज़ा ले जाते होगें लोग। शायद ही कोई उस कमरे के उस कोने में जाता होगा जहाँ पर ये कमरा ख़त्म होता है मगर दरवाजे के किनारे पर खड़े होकर देखने की नज़र कभी उस कमरे का अन्त देख ही नहीं सकती थी।

कमरा धुँए की परत और छोटे-छोटे रूई जैसे फोहें, मिट्टी और कालस की शक़्ल में पूरे कमरे की दरारियों में हवा से लहरा रहे थे। अगर दिवारों पर उगंलियों को फिराया जाये तो किसी ना किसी ईंट पर अपनी छाप छोड़ने से कम नहीं होगा। लकड़ी के लटके से दरवाजे वाला ये कमरा, पूरे शमशाम घाट में दूर से ही नज़र आता है बिना किसी रंग-रोगन और सजावट के। सजावट हो भी क्यों भला सोने वाले तो उस कमरे में आराम से सो रहे हैं। अपनी उन चीजों के साथ जो अब इस कमरे की रखवाली करती हैं और कमरे में एक बेधड़कपन को ठहराती है।

खौफ़ की चादर ओड़े ये कमरा चीजों से अपने अन्दर आने की हौसला-अफ़ज़ाई देता है। चीजों के अपने नज़रों में भरते हुए अन्दर जाने में कदम नहीं काँपते। चीजें जो ख़ामोश हो जाने के बाद भी कोई ऐसी चमक लिए है कि उसमे नज़रें घुमाने पर एक ही पल में लगता है की कई डरावनी छवियाँ जो अपनी आँखों में रखली जाती हैं वो महज़ अपनी ही आँखों पर लटकी तख़्ती की तरह होती हैं। उसका इन चीजों और कमरे से कोई लेना-देना नहीं होता। चीजें जो अब किसी के काम की नहीं है पर फिर भी वो रखी हैं इस कमरे में लोगों का अहसास कराने के लिए। जो इस कमरे के प्रति बनती कई अवधारणाओं को अपने में समेट लेती हैं।

दिवारों में बनते ईंटो के बीच कि दूरी और दरारियों में से रोशनी अन्दर घुसने का रास्ता खोज़ निकालती है। जो जिसकी अस्थियों की लटकी थैली पर पड़ती है वो थैली कोई रंग लेकर अपने पर गुदी तारीख़ को सामने लाकर खड़ा कर देती है और जो शरीर इस थैली की शक़्ल में यहाँ पर टंगा है उसे भी ऊपरवाले की रोशनी प्राप्त हो जाती।

रोशनी के कई तार धीरे-धीरे दिन चड़ते उस कमरे में खिंच जाते। आमने-सामने की दरारियों में रोशनी के तार किसी चमकती लकीर की भांति उन टंगी थैलियों को नया रंग दे देती। आर-पार होती रोशनी कमरे में जाल की भान्ति पड़ने लगती और रेडियम की लाइट की तरह कमरे को साफ़ करने में कामयाब हो जाती।

रोशनी के तार खिंचने से पूरे कमरे का गहरा अन्धेरा छट जाता और कमरा लगता जैसे बिना दिवारों के जमीन से कोसो ऊपर हो गया है और हवा में झूल रहा है उन लकीरों पर जो उस रोशनी से बनी हैं।

कमरे में दाखिल होने का पहला कदम ही वहाँ रहने वाले अदृश्य लोगों को महसूस करने में मजबूर करता है। ऐसा लगता है की अपने अन्दर बसे डर से कभी भागा ही नहीं जा सकता। राख की महक अन्दर तक भर जाती और नज़र कहीं रूकती ही नहीं। कुछ भी तो ऐसा नहीं था वहाँ पर जो नज़रों को रोकने के लिए मजबूर करे अगर कहीं ठहराव नज़र आता तो वो उन चीजों में जिनमे अब भी वो अहसास छूपा था जो किसी के होने का दम भरता है।

कई चीजों को तो देखकर लगता है कि जैसे कोई तो है जो यहाँ पर रात गुजारता है। जिसमे उन काली पोटलियों में कुछ याद रखने या किसी खास चीज को सम्भाल कर रखने के लिए टांगा हो। कई कपड़े जो थैलियों में बंधे रखे हैं और खाट जो बिछी हुई है मगर वो शायद कोई भ्रम भी हो सकता है।

शमशाम घाट में बैठा लकड़ी वाला भी इस कमरे में कभी नहीं जाता। कितनी बार तो शिवराम जी ही उसे खींचकर लेकर जाते हैं तो अगला अगर एक कदम भी उस कमरे की दहलीज़ पर रख दे तो तुरन्त ही जाकर नहा लेता है और फिर शुरू हो जाती है शिवराम जी के साथ उसकी अनबन। मगर वो भी ज़्यादा देर तक नहीं रहती बस, उसके नहाने तक ही रहती है। ज़्यादा देर तक अनबन का कोई फ़ायदा भी तो नहीं है क्योंकि शमशाम घाट मे दो-चार ही तो लोग होते हैं। एक-दूसरे से बातें करने के लिए और जोर आज़माने के लिए। वहाँ अर्थी को लाने वाले लोग तो आपके साथ मे गप्पे-वप्पे नहीं करेगें। तो दिन कैसे कटेगा ? फिर दोनों का काम भी तो एक ही जैसा है। एक अर्थी के लिए लकड़ियाँ बैकता है और दूसरा उन लकड़ियों के बिना अर्थी का क्रियाक्रम कैसे करेगा तो ये जोर आज़माइस एक-दूसरे के बीच में चलती रहती है।

न जाने कितनी दुआयें और बलायें अपने मे समायें ये कमरा इन चीजों और अस्थियों को सम्भाले रखता है।

अब तो शिवराम जी मन्दिर की मुंडेरी पर बैठे-बैठे बस इन्तजार करते रहते है अर्थियों का। जोर-ज़बरदस्ती करने के लिए वो लकड़ी वाला और कूड़ा बिनने वाले ही रह गए हैं। जिनके कारण मुँह में से आवाज़ निकलती है उनकी। नहीं तो पूरा दिन बिना बोले ही कट जाये तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तो देखा जाये शिवराम जी का तो पूरा हुलिया ही चैन्ज हो गया है। पैन्ट और कमीज़ छोड़कर कुर्ता-पज़ामा पहनने लगे हैं और कांधो पर एक गमछा भी डाले रखते हैं। शरीर में बहुत तेजी आ गई है फौरन इधर से उधर चले जाते हैं। बिलकुल भी टाइम नहीं लगाते वो किसी भी अर्थी को मोक्षस्थल दिखाने में और उसका क्रियाक्रम कराने में। कभी चीजों को देखते रहते है और कभी वहाँ की सफ़ाई करने में लग जाते हैं। अब तो शमशाम घाट मे भी गेट लग गया है। उसका भी मैनगेट बना दिया गया है। सरकार को लगता है की जैसे यहाँ से भी कुछ चोरी होने के चान्स ज़्यादा है। जो लोग रात मे आकर वहाँ आग जला कर सो जाया करते थे उनका आना बन्द हो गया है और शमशाम घाट अब पूरा शमशाम घाट बन गया है।

शिवराम जी दिन में पूरा गेट खुला रखते हैं कहते है कि अगर कोई यहाँ पर कुछ चुनने आया चुन तो सकता है। कुड़ा बिनने वाले भी यहाँ पर रहते है। सारे में घूम कर जब आते हैं तो कोई-कोई खाना भी यहाँ पर खाता है। इन दिनों तो अस्थियाँ ले जाने वालो की भी कतार लगी हुई थी। दिन में लगभग दो परिवार तो आ ही जाते हैं उन अस्थियों को ले जाने के लिए। लोग बेधड़क शमशाम घाट में चले तो आते है मगर उस कमरे मे बिना पंडित जी की इज़ाज़त लिए कोई नहीं जाता। अपने हाथों में मर जाने वाले के नाम का पर्चा लिए वो चले आते और पंडित जी के पास में जाकर उस थैली का ज़ायज़ा लेते की इस तारीख़ वाली थैली कौन सी है और कहाँ पर लटकी है।

आज भी कोई आया अपने किसी रिश्ते की थैली लेने। वो चार लोग थे। पहले वो शमशाम घाट मे बने मन्दिर में आये और पंडित जी के पास गए। अपनी पर्ची दिखाई। पंडित जी ने अपना पत्रा खोला और उसे मरने वाले का नाम बताया उसके बाद उसे तारीख़ बताई और कहा की तुम शिवराम के पास में चले जाओ वो तुम्हे अस्थियों के फूल दे देगा। इतना सुनकर वो चारों शिवराम जी के पास चले गए। शिवराम जी वहीं कमरे के बाहर बनी मुंडेरी के ऊपर बैठे थे। उन चारों में से एक आदमी आया जिसके हाथ मे वो पर्ची थी। उसमे वो पर्ची शिवराम जी को दिखाई।
शिवराम जी ने उन्हैं कहा, "तुम अन्दर जाईये और अन्दर सामने की दिवार पर ये थैली टगीं है। उसे ले लिजिये पर क्या आप कोई समान लाये थे जिसे उनके ऊपर चड़ाया गया था?”
तो उनमे से एक बोला, "नहीं हम कुछ नहीं लाये थे।"
शिवराम जी ने कहा कि आप अन्दर चले जाओ और तारीख़ देखकर अपनी अस्थियाँ ले लो। वहीं सामने वाले दिवार कर टंगी है।

ये सुनकर वो अन्दर जाने लगे और दरवाजे पर खड़े होकर ये देखने लगे की कौन सी सामने वाली दिवार है? चारों ही लोग दरवाजे के सामने खड़े हो गए और पहले जाने वाले के मुँह की तरफ देखने लगे। शिवराम जी ने उनकी तरफ देखा तो वो खुद ही उनके साथ में चले जाने के लिए खड़े हो गए। वो अन्दर गए और सीधा सामने वाली दिवार पर चले गए और वो चारों आये लोग ये देखने लगे की यहाँ तो पहले से ही इतनी अस्थियाँ टंगी है और ये आदमी सीधा सामने वाली दिवार पर चला गया। वैसे देखा जाये तो शिवराम जी को भी नहीं मालूम था की इस तारीख़ की थैली कहाँ पर टंगी है? वो तो महज़ अन्दाजा भरते हुए सामने चले गए थे। तारीख़ थी 2005 की।

शिवराम जी वहाँ पर लटकी सारी थैलियों को अपने हाथों से साफ़ करते और उन्हैं घुमा-घुमाकर देखते कि उनकी तारीख़ कौन सी है। हर थैली को बहुत ही नज़दीक से देखना पड़ता और उस पर पड़ी धूल को साफ़ करना होता। शिवराम जी वहाँ पर सारी थैलियों को देख रहे थे और वो चारों आये लोग वहाँ चुपचाप खड़े थे। बस, चारों दिवारों पर नज़र घुमाते हुए कमरे की बनावट को देख रहे थे। एक कौने मे गड़ी कील पर तीन थैलियाँ टंगी थी तो उन पर शिवराम जी ने अपनी ऊंगलियाँ फैरी और देखा की कौन सी तारीख़,लिंग और किस मोक्षस्थल की ये थैली है। उनमे से एक वही थी जिसे वो ढूँढ रहे थे। काले रंग और धूल की परत ने उसे इतना कठोर बना दिया था कि उसमे किसी के होने का अन्दाजा ख़त्म ही हो गया था समझों। आज पूरे तीन साल जो हो गए थे उन अस्थियों को वहाँ पर टंगे हुए।

शिवराम जी ने उस थैली की गाँठ को खोला और उसे वहाँ से उतारा। अपने हाथों मे लेकर उस पर पड़ी धूल को साफ़ करते हुए उन्होनें वो थैली उन चारों के हाथ में देनी चाही मगर वो चारों में एक आदमी का हाथ आगे बड़ा। उसने अपने दोनों हाथों कि अन्जली बनाई और उस थैली को बड़े प्यार और श्रद्धा से अपने हाथों में ले लिया। उस थैली को वो इस तरह से लेकर आ रहे थे कि जैसे उसमे वो रिश्ता अभी भी जिन्दा है जिसे मुखागनी दे दी गई थी। वो इतने अहिस्ता-अहिस्ता उसे लेकर चले रहे थे के कहीं उस थैली को हिलने से कोई चोट ना लग जाये। एक आदमी के हाथों में वो थी तो दूसरे आदमी ने उसके हाथों के नीचे अपने हाथों को भी रखा हुआ था। लगता था की जैसे वो दोनों का कोई लगता था। अब रिश्ता समझना जरूरी नहीं था। मगर आज कोई विदा हो रहा था इस अन्धेरे और खौफ़नाक कमरे से।

वो चारों लोग अब फिर से पंडित जी के पास में गए और उस थैली को अपने हाथों मे पकड़े पूछने लगे की पंडित जी इसको हम किस तरह से गंगा मे विसर्जन करे और कब करें?

पंडित जी ने उनके आगे सारे पत्रे खोले और कुछ पन्नों पर नक्शे बनाने लगे। थोडी ही देर मे कहने लगे, "इसको गंगा मे विसर्जन करते समय ये देखना की ये किनारे पर ना लगे। इसे बीच में जाकर विसर्जन करना और दोनों हाथों उसे बहाना।"

ये कहकर उन्होनें एक मिट्टी का करवा निकाला और उसमे कुछ फूल और लोंग के दाने डालकर उस थैली मे से अस्थियों को निकाल उस करवे मे डाल दिया। फिर उस ही काले रंग के कपड़े से उस करवे का मुँह बन्द कर दिया और कहा दक्षिंणा दे जाओ और इसे दो दिन से ज़्यादा अपने घर में मत रखना। जल्द से जल्द विसर्जन कर देना। वो चारों लोग उस करवे को लेकर चले गए और शिवराम जी उस काले रंग के कपड़े पर लिखी तारीख़ को मन्दिर में रखे रजिस्टर में से काटने लगे।

अब धीरे-धीर करके कमरा सारी थैलियों से खाली हो जायेगा और डर जैसी चीज वहाँ पर नहीं रहेगी। वो उन लोगों को देखते रहे। कुछ पूजा-पाठ हुआ। उस थैली को लिया और चले गए। एक शख़्स यहाँ इस कमरे से भी विदा हो गया अब पता नहीं कहाँ पर रहेगा?

लख्मी

एक ख़त खुद के नाम

सन 2005
दिल्ली, 110062

इस ख़त की शुरूआत सन 2005 में हो चुकी थी मगर इसमे आने वाले हर अल्फ़ाजों को बाहर आने का रास्ता आज मिल पाया था। इसमे मौज़ूद हर अल्फ़ाज मेरी बेबेसी की कहानी कहते हैं जिसे और अब अपने अन्दर रखने की हिम्मत नहीं है मुझमें।

मैं इस ख़त की शुरूआत कर रहा हूँ। अपनी उस ज़िन्दगी से जो मैं कभी अपने से बाहर नहीं निकाल पाया। एक डर रहा और एक आस।

कुछ भी पहले जैसा नहीं है। सब कुछ बदलता जा रहा है। ये जो आज मेरे साथ हुआ वो पहली बार होने वाला वाक्या नहीं है। जैसे-जैसे वक़्त बितता जा रहा है मैं अपने दिमाग मे कई यादें जमा करता जा रहा हूँ। जिनसे भी मैं मिल रहा हूँ या जिससे भी मैं बातें कर रहा हूँ वो किसी न किसी कारण मेरी यादों में जमा होते जा रहे हैं। हर दिन मेरे साथ में कोई न कोई नया रिश्ता अपने कदम बढ़ा लेता रहा है। इस बात का तो बिलकुल भी अफ़सोस नहीं है और न कोई गिला है मुझे। ये तो बहुत ही खुशी की बात है। तन्हाइयों को बाँटने में और अपनी पहचान बनाने में जीवन के कई साल लग जाते हैं पर फिर भी हम कभी रिश्तों में मुक्म्मलित तरह से परिचित नहीं हो पाते। ये उसके लिए मेरे जीवन में बहुत अनमोल था। लेकिन फिर भी मुझे डर क्यों है? एक ऐसा डर जिसके होने या न होने कोई फ़र्क तो नहीं पड़ने वाला था मुझपर या मेरे जीवित शरीर पर मगर फिर भी धड़कन कभी-कभी अपनी रिद्दम से तेज भागने लगती है।

आज जब मैं अपनी ज़िन्दगी को पलट कर देखता हूँ तो कई लोग मुझे अपने आसपास नज़र आते हैं जिनसे मैं अपनी यादें और अतीत बना पाया हूँ। जो सब मुझे साफ़-साफ़ नजर भी आते हैं पर जो नज़र नहीं आते वो कहाँ है? जो दिखता है उसी को मैं अपनी खुशी ज़ाहिर कर लेता हूँ पर जब मैं वापस पलट के देखता हूँ अपने आज के समय में तो भी कोई नहीं दिखता। क्या यहाँ पर मुझे दोबारा से रिश्ते बनाने होगें? क्या हर बार हम दिमाग को साफ़ कर देते हैं?

इसके बारे में मुझे हाल ही में मालूम हुआ। ये तो एक खेल है। इस खेल को रितियों का नाम देकर मजबूरन करना पड़ता है। जिसमे जीवित या मृत्य दोनों ही भागीदार बनते हैं। बाकि तो सब यहाँ पर चूसा हुआ माल है। जिसमे दोबारा रस़ भरने की उम्मीद तो नहीं मगर आस पर उसे छोड़ दिया गया है।

दिन के पोने बारह बज़ रहे थे। आज के दिन धूप बिलकुल नहीं थी। दोस्त की लाश घर के आगे रखी थी। ये कोई पहली बार देखने वाला नज़ारा तो नहीं था। उसकी लाश पर रोने वालों की कमी नहीं थी। उसके पाँव पकड़कर रोने वाले आज उसको छ़ोडना ही नहीं चाहते थे। किसी अपने नज़दीकी की ज़ुदाई बहुत ही बैरन होती है। रह-रहकर खाती है। उसी को आज सभी महसूस कर रहे थे। पहली नज़र में उसी देख भी नहीं पाया था मैं। सोच रहा था की उसके पास जाकर बैठू तो कहाँ? अगर उसके सिरहाने पर बैठूगाँ तो वो मुझे देख नहीं पायेगा और अगर उसके पाँव की तरफ मे बैठूगाँ तो उसको बूरा लेगा। बस, उसी को खड़े-खड़े मैं देखे जा रहा था। वक़्त इस तरह से सुलघ रहा था उसके सिरहाने में रखी अगरबत्ती हो जो धीमे-धीमे मिट रही थी। मुझमे और मेरी यादों में वो खुशबू नहीं थी की आज उसतक पहुँचा सकूँ। मैं रो नहीं रहा और न ही इतनी ताकत थी मुझमे की किसी रोने वाले को चुप भी करा सकूँ।

अब उसे उठाने का वक़्त आ गया था। इस बार मैंने सबसे पहले अपने कदम बड़ा दिए। जब मैं उसे उठा रहा था तो इक पल के लिए भी मेरे हाथ नहीं कांपे थे। उसके सिरहाने वाला डंडा मैंने अपने काँधो पर उठाया हुआ था। हम उसके घर से आधा किलोमीटर दूर चले आये थे। शमशानघाट सामने ही था। मैं चलता जा रहा था और जब सामने वाली सड़क को देखता तो लोग हमें देखकर अपने हाथ जोड़ लेते और दो-दो कदम हमारे साथ में चल पड़ते। शमशानघाट के कुएँ की एक चौकी पर उसे उतार दिया गया। उसके शव को वहाँ पर रखकर सभी उससे तीन-तीन कदम दूर हो गए। उसके नज़दीक अब सिर्फ उसके पिता जी ही रह थे और बाकि तो उसके लिए वहाँ आई किसी भीड़ से कम न थे। उसे अभी भी वैसा का वैसा ही वहाँ रख हुआ था। एक पंडित वहाँ पर कुछ बोलता तो वहाँ आये उसके घर के कुछ बुर्ज़ुग अपना कुछ कहते। इसी बातों में वो वहाँ पर वैसा ही
8लेटा हुआ था जैसे किसी को जानता ही नहीं है।

अब उसको अपने से कहीं दूर भेजने की क्रिया शुरू हो गई थी। उसके पिता जी ने एक मटके में पानी लिया और उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगे। मटके को अपने काँधो पर उठाये वो उसके चक्कर लगाने लगे और थोड़ा-थोड़ा पानी जमीन पर गिराते भी रहे। ये उसको मोक्ष के लिए तैयार किया जा रहा था। ताकि वो अपने साथ मे किसी भी रिश्ते कि महक भी लेकर ना जाये। जो उसने यहाँ पर लिया वो चाहें किसी की खुशबू हो या महक वो सब यहीं पर उसे धो दिया जायेगा। पंडित जी हर चक्कर के नाम का मंत्र पढ़ते और कहते की "जो पाया वो यहीं पर रह जाये। सारे रिश्ते-नाते और सारे नियम वो सभी तुम्हारे लिए छोड़कर जा रहा हूँ मैं।"

ये उसके शब्द थे जो पंडित जी के मुँह से निकल रहे थे। अब उसे उठाकर अन्दर ले जाया जा रहा था। शमशानघाट के नियम के अनुसार उसे मोक्षस्थल पर लिटा दिया गया। लोग अब भी रो रहे थे। लेकिन अब क्यों जब की अपने रिश्तों और नातों को तो वापस लौटा चुका था। अब 'राम नाम सत्य' की आ‌वाज़ें लगनी बन्द हो गई थी। 'राम नाम' का जाप अब बिलकुल बन्द था शायद राम का नाम लेना अब यहाँ किसी के बस का नहीं था। उसके वहाँ पर कदम रख दिया था। मोक्षस्थल को साफ़ किया जा रहा था। उसके पिता जी लकड़ियों का एक बंडल बना रहे थे और उसके भाई वहाँ मोक्षस्थल की जमीन को साफ़ कर रहे थे।

लकड़ियों पर उसे लिटाया हुआ था। घी, कपूर, समाग्री, कलावे, लकड़ियों का चूरा, सिन्दूर व हल्दी सभी निकाल कर रख दी गई थी। धीरे-धीरे करके पंडित जी जैसा-जैसा कहते जाते उसके पिता जी वैसा ही करते। एक थाली में कपूर की ज्योती जलाई गई। थाली में पड़े सिन्दूर और हल्दी को घोल कर टीका बनाया गया जिसे उसकी अर्थी की लकड़ियों पर लगया जा रहा था। उसके पिता जी बिलकुल शान्त से वो सब करते जा रहे थे। थाली को लेकर एक चक्कर लगाते और उस लकड़ियो के बन्डल में आग लगाते। आखिरी सफ़र शुरू था। सभी उसके नज़दीक आ गए थे। सभी को मालूम था की आखिरी में क्या होता है? मैं भी उसी की तरफ़ में बड़ा। पंडित जी एक तसले में काफ़ी सारे लकड़ियों के छोटे-छोटे टुकडे लेकर आए और सभी ने एक-एक लकड़ी का टुकडा अपने हाथों में उठा लिया था। मैं भी उसी के साथ में वो सब करता जा रहा था। अपने हाथों में लकड़ी का टुकडा लिए खड़ा हो गया। अर्थी में मुखागनी देने से पहले सभी उसकी तरफ़ में बढ़ते और उन लकड़ियों को उसकी अर्थी पर डाल देते और हाथ जोड़कर पीछे की तरफ़ में हो जाते। मंत्रो का जाप चालू ही था। जिसमे होता की हम आज भी तुम्हारे अपने है और हमारा ये प्यार रखले। अपने हिस्से का प्यार और रिश्ता सभी उसके ऊपर से वार रहे थे। ये आखिरी था रिश्ते का वारना उसके बाद तुम हमारी ज़िन्दगी में एक याद बनकर ही रहोगे। जो हमेशा ताज़ा रहेगी।

सभी ने अपने हिस्से का प्यार और सौगात उसके सपूत कर दी थी। जैसे किसी मेहमान के विदा होने पर उसके हाथों में कुछ रख दिया जाता है। अपनी याद को ताज़ा रखने के लिए। मगर शायद ये ज़्यादा दिन तक ज़िन्दा नहीं रहता। उसके किसी और दौर में जाने के बाद में वो भूली-बिसरी कहानी हो जाती है। जिनको गढ़े मुर्दे कहा जाता है। बहुत ही दूर चले गए थे सभी। बस, दूर से ही उसके जलते शरीर को देख रहे थे। लकड़ियों से निकलती आग की लपटों में वो नज़र भी नहीं आ रहा था। इतनी तेज भाप थी की आग सभी को पीछे धकेल रही थी। उसके जलने के बाद जैसे सारे नाते अब ख़त्म हो चुके थे। पंडित जी अब भी वहीं पर खड़े थे। वो जिस अर्थी में उसको लाया गया था उसमे से किसी मजबूत डंडे को निकाल रहे थे। थोड़ी देर के बाद में उन्होंने एक लम्बा और बहुत ही मजबूत डंडा निकाला और उस जलती आग में दे दिया। वो शायद कुछ निकाल रहे थे। डंडा मारते और लकड़ियों को खिसकाते हुए उन्होंने उसके सिर को निकाल दिया था। फिर उन्होंने बहुत ही जोर से उसके जलते सिर में उस डंडे को घूसा दिया था। वो सिर टूट गया था उसका एक हिस्सा तो बाहर की तरफ भी निकल आया था तो उन्होंने उसे उसी डंडे से अन्दर की तरफ में खिसका दिया और यहाँ बाकि लोगों के पास में आकर खड़े हो गए।

मेरे साथ मे खड़े लोग उसे देखकर हाथ जोड़ रहे थे। कोई कह रहा था की वैसे तो सिर किसी-किसी का अपने आप ही चटक जाता है मगर इसका नहीं चटका। बहुत प्यार करता था ये अपने परिवार को जो उसकी यादों को अपने साथ मे ले जाना चाहता था। मगर ऐसा हो नहीं सकता इसे जाना तो बिना यादों की है। नहीं तो पिछले जन्म की यादों मे ये ठीक-ठाक दिमाग नहीं ले पायेगा। उसके सिर को टूटते ही सभी उसकी तरफ में आगे बढ़े और अपने हाथों मे एक-एक पत्थर उठाया और उस जलती चिता की तरफ में अपनी पीठ करके उस पत्थर को अपने सिर से पीछे की तरफ में फैंक देते।

ऐसा सभी कर रहे थे। उसके घर वाले भी। मेरे हाथों मे एक नहीं कई पत्थर थे। क्योंकि मेरे साथ उसकी एक याद नहीं थी। काफ़ी सारी यादें तो ऐसी थी जिसे घंटो बैठकर बातों में दोहराया था हमने। पंडित जी ने उसके सिर पर तो डंडा मार कर उसे यादों से और चेहरो से मुक़्त कर दिया था मगर हमारे सिरो में डंडा कौन मारेगा? ये चेहरा जो हमारे दिमाग मे बसा है और यादें जो दिल मे समाई है उसे कौन मुक़्त करेगा? क्या कोई उपाए है हमारे लिए। कितने पत्थर फैंकता मैं? वहाँ पर ऐसा कोई भी नहीं था जिसमे ये रितियाँ न की हो और न ही कोई ऐसा था की जिसने ये पत्थर न फैंका हो। वो अब भी जल रहा था। वो किसी के साथ न आ जाए इसका डर था यहाँ पर हर किसी को। ये क्या नितियाँ थी। मरने के बाद में सभी अच्छे हो जाए है ये उसके घर के सामने गाया जा रहा था। मगर यहाँ पर ये डर था कि कहीं वो पीछे न चले आये।

उसके पिता जी पत्थर फैंक नहीं पा रहे थे। वो पत्थर को उठा नहीं पा रहे थे। अब आकर रोये थे वो। एक ग्राम का वो पत्थर उनके लिए कई किलो के बराबर था। उस पत्थर को अपने ऊपर से वारना आसान नहीं था। उसका भाई बहुत रो रहा था। "पिता जी हमारा भईया गया हमें छोड़कर अब वो नहीं आयेगा" कहता हुआ बहुत जोर से रो रहा था। उसके पिता जी वो पत्थर फैंक नहीं पाये थे। सभी चले गए थे वहाँ से अब तक। खाली पंडित जी उसके पिता जी को समझाने में लगे थे।

मेरे हाथों के पत्थर मेरे पास ही थे। आज कोई भी ऐसा काम नहीं था जो मैं बहुत विश्वास से कर पाया था। ये खेल था जिसमे मैं अकेला ही खेल रहा था। मगर इसमे भी मैं हारा ही था। खूद से।

तुम्हारा...

लख्मी

Wednesday, January 21, 2009

जाने के हर रास्ते बन्द...

पंडित जी ने अपना कमन्डल उठाया और शमशानघाट से विदा लेने के लिए तैयार हो गए। बहुत ही नराज़ थे दिल्ली की सरकार से। अब शमशान घाट नये तरीके बनाया जा रहा है। जिसमे उसको बैठने के लायक बनाया जाएगा। जहाँ पर गन्दगी और कोई जानवर ना तो आएगा और ना ही दिखाई देगा। इसलिए पंडित जी की भी विदाई कर दी गई है। सबसे ज़्यादा जानवर पालने वाले ये ही शख़्स थे। जो अपना काम जानवरों से कराते आए है। चाहें वो अन्य जानवरों को भगाना हो या फालतू बच्चों को जो वहाँ से चीजों को बीन कर ले जाया करते थे। जिनके लिए यहाँ की कोई भी चीज भूत-प्रेत की नहीं थी। किसी की साड़ी या किसी का कोई भी कपड़ा हो फिर कोई खिलौना वो सब इनके लिए खेलने के ही आभूषण बन जाते। जिनसे अपने खेलो को सजाया और नाम दिया जाता। वो भी अब नज़र नहीं आएगे। धीरे-धीरे वहाँ कि सफ़ाई भी होने लगी है। वहाँ के पैशाब घर से लेकर लकड़ी की दूकान तक। शमशान घर की बाऊंडरी की दीवार में जितने आने-जाने के अनचाहें द्वार बने हुए थे। जो ज़्यादातर सुअर अपना आने-जाने के रास्ते बनाये हुए थे उसको भी बन्द कर दिया गया है।


ये काम पिछले 3 महिनो से चल रहा है। MCD के कुछ काम करने वाले लोग वहाँ पर हर रोज आते है और सफ़ाई शुरु कर देते है। पंडित जी जिस कोने में अपना आसरा बनाया हुआ था उस जगह की भी सफ़ाई कर दी गई है। पंडित जी ने अपने घर के सामने एक दीवार बनाई हुई थी। अर्थी में आई लकड़ियों से और वहाँ पर पड़ी रहती चीजों से। वो भी वहाँ से हटा देने से इतना खुला-खुला लगता है की शमशान घाट लगता ही नहीं की किसी कालोनी के किनारे का हिस्सा है। वो दीवार ना होने से कालोनी के पार्क का एक छोर शमशानघाट से मिल जाता है और शमशान घाट बहुत बड़ा नज़र आता है।

पंडित जी पूरी सरकार को गालियाँ देते हुए अब अपना बोरिया-बिस्तरा समेट चुके थे। बस, रजिस्टरों पर उनके हस्ताक्षर लेने बाकि थे। मगर वो तो मदिरा में इतने धुत थे कि उनके हस्ताक्षर कैसे कराये जाए ये सोचना पहले जरूरी था। उनको शिवराम जी ने और उनकी घरवाली ने पकड़ा हुआ था वो बहुत नशे में थे।


सफ़ाई हो जाने के बाद भी वहाँ पर एक ही आदमी ने अपना दब-दबा बनाया हुआ था। वो था लकड़ी वाला। लकड़ियों का काम इतना बड़ गया है कि अब शमशान घाट मे लकड़ियाँ ही लकड़ियाँ नज़र आती है। अब वहाँ पर लकड़ी नहीं बल्की अर्थियाँ बिकती है। वो अब लकड़ियों को पहले से ही मोक्षस्थल पर अर्थियाँ बनाकर तैयार रखते है और वही बिकता है। शमशान घाट के गेट के ऊपर एक लाइन जो लिखी है की 'बाहर की कोई भी चीज को अन्दर नहीं लिया जाएगा। कृप्या लकड़ी व क्रियाक्रम का सारा समान अन्दर से ही ले।' हर मोक्षस्थल पर पहले ही अर्थी का सारा समान तैयार होता है तो मुर्दा आता है और उन लकड़ियों पर लेटा दिया जाता है बस, मुखागनी दे जाती है और कार्य समपन्न।


एक-एक अर्थी की कीमत लगा दी जाती है। कीमत होती है 1200, 1500, 2000, 3000 रुपये तक लगा दी जाती है बस, उसी का सौदा किया जाता है। 1200 रुपये में लकड़ियाँ कम और बचा-कुचा माल ज़्यादा होता है। जिसमे चलने के बाद में मुर्दे के खिसकने का डर ज़्यादा रहता है। कई बार तो गीली-गीली लकड़ियाँ रख दी जाती है। जिन्हे जलाने में कई किलो देशी घी लग जाता है तो लोग ऐसा काम ही नहीं करते। वो तो चाहते है की मरने के बाद तो उसे कोई दुख ना हो और मिट्टी का तेल डाला नहीं जा सकता। बस, 2000 रुपये तक में सौदा करने के लिए तैयार हो जाते हैं लोग।

लकड़ी वाले ने कई टन लकड़ियाँ मंगाई हुई है और शमशान घाट मे चारों तरफ़ में अपनी लकड़ियों को फैला हुआ है। देखने मे तो शमशान घाट किसी पार्क से कम नहीं लगता। अब देखा जाए तो डर जैसी हवा दूर तक नहीं भटकती। शाम मे तो शायद वहाँ कई तरह की रोनक बन जाती होगीं। हर वक़्त वहाँ पर लाउडस्पीकर मे गायत्री मन्त्र की कैसेट चलती रहती है और वहाँ आए अर्थी के साथ में लोग उस मन्त्र का आन्नद लेते हैं।


शिवराम जी भी उन्ही पंडित जी के साथ मे शमशान घाट से जाने की कह रहे थे। शायद आगे बनने वाले शमशान घाट मे किसी शिवराम जी की जरूरत नहीं होगी। जो अपनी मर्जी से किसी भी अर्थी के साथ मे लग जाया करते। जो उसे पहले पुन्य का काम मानते और उसके बाद मे कुछ पाने की तमन्ना रखते। अब तो वहाँ पर कोई सरकारी नौकरी करने वाला आएगा जो सारे काम सरकारी नियमों के अनुसार करेगा। शायद अर्थी में होने वाले कामो को भी और रिवाज़ो को भी वो नौकरी मान कर ही करेगा। अब तो सारे काम नियम अनुसार ही होगें। कब क्या करना है वो सब अब कागज़ो में लिखा-पढ़ी के बाद ही आगे बढ़ाया जाएगा।


इन शब्दों में पंडित जी के बोल ज़्यादा थे। शिवराम जी तो बस उन्हे सम्भाले हुए थे और उलटे पाँव जाते-जाते शमशान घाट को ताक रहे थे। शायद ये उनका आखिरी दिन था।


लकड़ी वाले ने सारी लकड़ियों को उस अस्थियों वाले कमरे में लाद दिया था। जहाँ पर अब किसी आदमी का जाना न मुमकिन था। कई अस्थियों की थैलियाँ ज्यों की त्यों लटक रही थी। मगर अब वहाँ तक किसी का हाथ नहीं पँहुच सकता था। कोई अगर आ गया अपने किसी को लेने के लिए तो वो इन्हे कैसे लेकर जाएग? ये तो यहीं पर रह जाएगी।


शिवराम जी उसी कमरे के सामने खड़े बस, वहाँ पर टंगी उन थैलियों को देख रहे थे। सोच रहे थे की उन लकड़ियों को कैसे हटाया जाए जो वहाँ पर टंगी कई थैलियों को फाड़ रही थी। कई लकड़ियों के ताज (अर्थी के ऊपर झंडियों और गुब्बारों से सजाया हुआ) भी उन लकड़ियों मे फंस कर महज लकडी ही बन गए थे। आज से पहले वो अर्थियों के ताज हुआ करते थे। ये ताज़ उन पर चढ़ाया जाता था जो मरने से पहले अपनी तीन या चार पीढ़ी को देख जाया करते थे। यानि जो अपना पोता और पोते की भी औलाद देख लेता है। जिसको बैण्ड-बाजे के साथ में लाया जाता है और उसे इस कमरे की रौनक बना दिया जाता है। सारी रंगीन झंडियाँ तो अब उनमे नहीं नज़र आ रही थी बस, बाँस के डंडे ही दिखाई दे रहे थे।


लकड़ी वाला शिवराम जी जो अपने यहाँ पर नौकरी रखने के लिए कह रहा था। 2500 रुपये महिना दे देगा। बस, मोक्षस्थल पर 1500 रुपये वाली में जो लकड़ियाँ रखी जाती है उनमे से वो लकड़ियाँ कम लगे और पैसा भी पूरा मिले। लकड़ियाँ भी कम लगाई जाए और वो ऊंची भी नज़र आए। लगे की जैसे 1500 की अर्थी है मगर वो बनी हो 1200 मे लगी लकड़ियों से। ये काम खाली वहाँ पर शिवराम जी के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता था। वो इतनी ठोस अर्थी लगाते थे की लकड़ियाँ भी कम लगती थी और वो कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ती। मुर्दे का भी खिसकने का कोई डर नहीं होता था। बहुत मजबूत बनाते थे शिवराम जी अर्थी।


लकड़ी वाला ऐसे आदमी को क्यों हाथ से जाने देखा?


शिवराम जी का दिमाग अभी दो भागों में बट गया था। जिस काम को वो गालियाँ देते आए थे वो ही काम उन्हे अपनी तरफ़ में खींच रहा था जिससे वो अपना परिवार भी चला सकते थे और जिसे वो पुन्य का काम मानते थे वो भी उनके करीब ही रहता। जिस काम को करना चाहते है या करते आए है वो अब किसी सरकारी नौकरी मे तबदील हो गया है। अब तो जैसे कोई ऐसा काम ही नहीं बचा की जिसको अपनी मर्जी से किया जाए और वहाँ से कोई सौगात मिल जाए। एक ये ही काम था पर ये भी अब सरकारी नौकरी बन गया है। बस, यहीं पर उनका दिमाग उलझा हुआ था।


वो उस कमरे में से सारी चीजों को खींच रहे थे। आज से पहले कभी इतना गौर से नहीं देखा था उन चीजों को उन्होनें। कई तो बीढ़ी-माचिस, हुक्के की चिल्म, बक्से (गल्ले के जैसे) और कुछ बर्तन थे। बर्तनो पर तो तारीख़ें भी लिखी हुई थी जिन्हे गुदवा कर लिखा गया था। किसी पर 1981 कि तारीख़ थी तो किसी 1990 कि। ये तारीख़ें सन के हिसाब से 1980से शुरू होती और 1999 तक जाती थी। बर्तनो पर ज़ंग लग गई थी। कई पोटलियाँ निकली जिनमे कई पुराने कपड़े बन्धे हुए थे। जिनकी गिनती करना आसान नहीं था।


वो लकड़ियों पर खड़े हुए थे और अपना संतुलन बनाकर सारे सामानों को एक जगह पर लेकर खड़े थे। अभी तो कई समान और था जिस तक हाथ नहीं पँहुच रहा था।

यहाँ पर कोई भी ऐसा नहीं था जिसे इन चीजों का आसरा भी हो। लकड़ी वाले के लिए ये जगह कोई शमशानघाट नहीं थी। ये जगह तो एक ऐसा कार्यस्थल थी की जहाँ पर आने वाला ग्राहक कहीं और से कुछ ले ही नहीं सकता। यहाँ पर आने वाला यहीं से ही चीजों को खरीद सकता है और कोई है भी नहीं यहाँ पर उसके आलावा। पंडित जी के लिए ये जगह एक बसेरा थी जिसको छोड़ने पर अपनी सारी पहचान की पत्रियों को बदलना होगा और लोगों से दोबारा से एक और नये रिश्ते की बुनियाद रखनी होगी।

आज कई और अन्य भागों में बट गया था ये शमशान घाट।


शिवराम जी अगर अब यहाँ से गए तो क्या करेगें और अब इस उम्र में कौन नौकरी देगा इस पर ही वो अपना सारा दिमाग ख़र्च करने मे लगे थे। अब तो सारे शमशान घाट में ये काम ख़त्म हो गया होगा।

लख्मी

दरवाजा खुला था

घर में हर एक चीज़ का अपना एक स्थान होता है पर आज को देखकर तो लग रहा जैसे कि कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जो सज़ाई नहीं जा सकती हों।

दरवाजा खुला था। दरवाजे की साँकर हमेशा हिलती रहती है उनकी। कोई भी अन्दर आये दरवाजे की वही साँकर हिलकर बता देती है की कोई आया है। शिवराम जी जब भी गली मे कदम रखते तो गली वालों की नज़रें हमेशा उन्ही पर रहती थी। ये तो कम ही होता था की वो घर आ रहे है मगर ये ज़्यादा होता था की वो आज क्या ला रहे है। यही देखने के लिए निगाहें अक्सर उनपर चली जाती थी।

आज तो उनके काधों पर कुर्सी रखी थी मस्त गद्देदार और आराम दायक। वो उसे उठाये चले आ रहे थे और उनके हाथों मे एक भी पॉलिथीन थी। वो जैसे-जैसे अपने कदम अन्दर रखते जाते औरतें उनके आगे से अपने बच्चो को हटा लेती। पता नहीं किस सायें से बचना चाहती थी वो? शिवराम जी को ये सोचना ज़्यादा अनिवार्य नहीं होता था बस, आँखें यही देखती थी की जो आज तक मैं शमशाम घाट में रहकर नहीं देख पाया था वो इनको कैसे दिखता था? मुझे क्या? वो तनकर चले आते। उनका घर गली के बीच में था और गली भी इतनी चौड़ी नहीं थी की चार-पाँच आदमी उसमे से एक साथ निकल सकें। पतली गली में वो सभी के आँगनो में पाँव रखकर वो चले-चले जाते।
उनकी नज़र जब भी किसी पर पड़ती तो वो ये साफ़ देख लिया करते थे कि उनको कोई नहीं देख रहा होता सबकी नज़रें उस पर होती जो कभी काधों पर तो कभी हाथों में होता। वो ये देखकर हमेशा मुस्कुरा देते। इसलिए नहीं की ये गली वाले उन्हे ऐसे देख रहे है या आज के जमाने मे भी ये सब सोचा जाता है मगर इसलिए की अभी वो घर में घुसेगें और उनकी बीवी भी कुछ इसी नज़र से देखेगी और पता नहीं क्या-क्या पूछेगी? उन गली वालो की नज़र से ये उनको ये समझ में आने लगा था की वो जब भी घर वापस लौटते है तो वो अकेले नहीं होते उनके साथ मे कई ऐसे लोग होते थे जिनको शिवराम जी ने तो आज तक नहीं देखा था मगर उनके अलावा कई आँखों ने उन्हें देख लिया था। जिनको देखना आसान बात नहीं थी। सब के सब इस तरह से रास्ता छोड़ते जैसे शिवराम जी किसी को काँधों पर उठाकर ला रहे हो।

शिवराम जी ने अन्दर आकर कुर्सी को पहले तो अपने काँधों पर से उतारा और पॉलिथीन में रखी जूतियों को उन्होनें वहीं दरवाजे के पीछे रख दिया। ज़्यादा बड़ा कमरा नहीं है उनका। उनके सोने-बैठने की जगह बाहर वाले कमरे मे ही बनाई हुई है। वो कब आयेगें या कितने बख़्त में आयेगें? कुछ पता नहीं होता उनके घरवालों को। इसलिए वो एक खाट-बिस्तर वहीं एक कोने में दीवार से सटाकर हमेशा तय लगाकर रखते है।

अब शुरूआत हुई उस कुर्सी की जगह बनाने की। शिवराम जी उस कुर्सी की जगह अपने उसी छोटे से कमरे में बनाने लगे। कभी तो वो उस कुर्सी को अपनी खाट कर सिरहाने रखते तो कभी पातियाने पर। मन नहीं मानता था उनका। वो कुर्सी को उठाकर दूसरी दीवार की खिड़की के पास ले गए बिलकुल खिड़की के पास ही उन्होनें वो रखदी और बैठकर खिड़की के बाहर देखने लगें। उसकी ऊँचाई इतनी थी की रोज़ाना गली दिखाने वाली खिड़की आज तो कुछ और ही दिखा रही थी। खिड़की के बाहर देखने पर सामने वाले घर के अन्दर देखा जा सकता था मगर वो तो मोहम्मद भाई के घर का बाथरूम था। उन्होनें वहाँ से कुर्सी उठाई और वापस अपनी खाट के पास ले गए।

अभी के लिए उन्होने कुर्सी को ठीक खाट के बगल में ही रख दिया था। अब वो पॉलिथीन मे से जूतियाँ निकाल कर उसमे अपने पाँव घुसाने लगे। तीन जोड़ी जो पुरानी थी वो तो उनके बिलकुल ठीक ही आई थी। वो भी कैसे ना कैसे उन्होनें उसमे अपने पाँव डाल ही लिए थे मगर वो नई वाली जिसके बिनाह पर वो सारी उठा लाये थे वही नहीं आ रही थी। पूरा एक नम्बर बड़ी थी उनके वो। "शायद ये उसी दिन खरीदी होगी जिस दिन ये साहब स्वर्ग सिधारे थे। चड़ाने वाले को उनके पाँव का अन्दाजा नहीं होगा और क्यों हो भला ये अब चड़ाने के लिए ही तो थी कौन सा इनको अब पहननी थी।"

वो उन गोल्डन रंग की नई जूतियों को अपने हाथों में लेकर उसके ड़िज़ाइन को देखते रहे। कुछ खाट के जैसी बुनाई का ड़िज़ाइन था उसपर पर वो आई नहीं थी उनके। उन्होनें सारी जूतियों को खाट के नीचे सरकाया और वहीं एक-दम धड़ाम सें लेट गए। थोड़ी हो देर में वो वापस उठे और अपने तकीये में कुछ कतरन निकाली और उन्ही नई गोल्डन जूतियों को उठाया और उसके अन्दर वो कतरन फँसा कर उसे पहनने लगे। अभी भी नहीं आई थी तो उन्होनें दोबारा से और कतरन निकाली और अबकी ठीक तरह से उसमे फँसाई और पहनी। वाह!

चेहरा खिल गया था उनका वो आ गई थी। पर पाँव चैन से नहीं बैठ पा रहे थे शायद काट रही थी अभी वो नई जूतियाँ उन्हे? बड़े खुश से हुए थे कुछ पल के लिए वो और अपनी बनियान से उस जूती को साफ़ करते हुए वो वहीं लेट गए थोड़ा सुस्ताना जरूरी समझा था इतना सब कुछ हो जाने के बाद में उन्होनें।

अब उनके उस कमरे मे चार-पाँच चीजें तो ऐसी हो गई थी जिनका ठिकाना उनके घर के किसी और कमरे में तो नहीं था और कभी लड़-झगड़ के वो ठिकाना बनाना भी चाहें तो उनकी धर्मपत्नी ये काम तो कभी करने ही नहीं देगी उनकों और ना ही ये दौर कभी चलता फिर। उनकी बीवी के दिमाग पर तो बस एक ही भूत सवार रहता है कि ये एक मरे हुए आदमी का है वो भी चला आयेगा अन्दर। शिवराम जी को इस मरे हुए या समान का खौफ़, डर या ख़्याल हटने में ज़्यादा टाइम नहीं लगा था।

वो एक ऐसी जगह में काम करते थे की जहाँ पर अपना कुछ टाइम बिता दो तो सारे डर और अवधारणाओ की जगह बदल जाती है। वो किसी कि अर्थी के पीछे-पीछे दो कदम चलना या वहाँ से वापस आकर स्नान करना सब का सब बे-माइने लगने लगता है। बस, ये सब इतना ज्ञात कराता है की हम अपने ऊपर से या तो किसी डर को निलम्बित कर रहे है या उस दुनिया में अपना सदेंशा भेज रहे हैं जो अभी तक किसी ने नहीं देखी। हम बस, इतना मानते हैं की जो मर कर जा रहा है वो देखेगा।

ये सब की सब बातें तो पूरी दुनिया सोचती तो खाली "मैं ही क्यों सोंचू" शिवराम जी ये सोच कर हमेशा अपने आपको हल्का करते। "ये सोच कर क्या फ़ायदा" कहकर अपनी छत की ओर देखकर वो घंटो ये ही सोचते रहते थे की मैं जो समान लेकर आ रहा हूँ वो क्या दूसित है? ऐसा क्या चिपक गया इसमे की ये किसी और के घर में नहीं जा सकती?

हर चीज के साथ में किसी का प्यार होता है तो किसी का रिवाज़ मगर इससे उसका मतलब ये तो नहीं है कि वो अब वहाँ पर पड़ी सुखती रहेगी या वो किस के लिए बन जाती है फिर? कई सारी चीजें वहाँ पर ऐसी पड़ी हुई है कि जिन्हें छूना और उन्हें वहीं पर पड़े रहने देने से एक एकांत का ज्ञात होता है कि जिनके नाम की वो चड़ाई गई है वो उसके साथ में अपनी आत्मा से जुड़ गई है। चलो कोई दे गया कुछ वो उसके लिए था जो उसे अब इस्तमाल नहीं कर पायेगा और जो इस्तमाल कर सकते हैं वो भी इस्तमाल नहीं करेगें। तो उन चीजों का होना या ना होना किस दुनिया से जुड़ जाता है। ये भयभीत है और अदृश्य दूनिया है।

शिवराम जी उन चीजों को देखकर बस, इसी धून में घूमने लगते की जैसे अभी उन चीजों मे बसे उस शख़्स से बातें कर रहे हो। बस, क्या था दूसरी तरफ से आवाज़ नहीं आ रही थी। वो उन चीजों को देखकर ये सोचने लगे की। वो कहाँ सोता होगा तो कोई चादर दे गया और खाट भी। वो कहाँ बैठता होगा तो कुर्सी दे गया। कपड़े से लेकर कोई नंगे पाँव मे जूतियाँ भी दे गया होगा ये सब क्या है? ये प्यार ही तो है ना! ये सब की सब जैसे बस, सतकार के लिए ही रह गई है। "अगर मैं मरूगाँ तो मेरी मईयत पर क्या चड़ाया जायेगा?” ये सोच कर वो हँसने लगे।

अब तो सपने भी शिवराम जी को कुछ ऐसे ही दिखाई देने लगे थे। वो रात भी इन्ही बातों के साथ में अपनी नींद पूरी कर लिया करते थे। अब तो वो गहरी नींद में सो गए थे। जब भी वो सोने के लिए लेटते तो वो अपने सारे कपड़ों को उतार कर वहीं खाट के नीचे में सरका दिया करते थे। उनके कपड़ों में एक ऐसी महक भर गई थी जिससे उनको हमेशा एक उलझन रहती थी। वो महक जो जलती हुई लकड़ियों कि थी कुछ सामाग्री जैसी। वो तो पज़ामा भी उतार दिया करते थे और गहरी नींद में इस तरह से खो जाते की कोई भी आवाज उनके कानों में कोई करकस नहीं पैदा नहीं कर सकती थी। महिने में चार ही बार उनके कपड़े धुलते और बदलते थे और उनके कपड़े धोने वाली एक ही औरत थी उनके घर में वो भी उनकी धर्मपत्नी।

ऐसा कोई भी दिन नहीं होता था जब उनकी झपड़ नहीं होती अपनी बीवी से। उनके थोड़ी देर सो जाने के बाद में उनके घर का अन्दर का दरवाजा खूलता और उनकी बीवी अपने में बड़बड़ाती हुई बाहर आती। उनके कपड़ों को उठाकर अपने कपड़ों से बचाती हुई उन्हें दूर से पकड़ती हुई घुसलखाने में डाल देती। हर बार उनके साथ मे रखी कोई ना कोई नई चीज़ नज़र आती।

हमेशा उनके एक ही तरह के बोल सुनने को मिलते थे वो हमेशा ही बड़बड़ाती हुई जब भी बाहर में आती तो उनको ही कोसती। "पता नहीं क्या अला-बला उठा लाते हैं। ये तो पूरे घर को शमशाम बना कर ही दम लेगें। खुद को तो देखो ज़रा एक दम मुर्दे की तरह हालत हो गई है। आज देखो क्या उठा लाये? अपने कपड़ों को भी घुसलखाने में भी नहीं डालते। कैसी बदबू आती है कपड़ों में से जैसे किसी की चिता जल रही हो।"

अब तो कोई असर नहीं पड़ता था शिवराम जी को। वो यूहीं बोलती-बोलती कपड़े धोने के लिए बैठ जाती। वो कपड़े धोने के बाद मे उठी और उनकी खाट के नीचे रखी उस पीली पॉलिथीन को खखोरने लगी। उसमे वही जूतियाँ थी। उन्होनें चारों जूतियों को देखा उन तीनों पुरानी जूतियों को उन्होनें बाहर दहलीज़ पर रख दिया और उन नई जूतियों को उठाकर घुसलखाने में ले गई। जिस पानी से वो कपड़े धो रही थी उसी पानी मे से हल्का सा छिड़काव उन्होनें उन जूतियों पर किया और साफ़ कपड़े से पौंछकर उन्होनें वहीं पर खाट के नीचे ऐसे रख दिया जैसे वो अभी जागेगें और उसमे पाँव डालकर बाहर चले जायेगें और कपड़ों को उठाकर वो छत पर चली गई।

लख्मी

Friday, January 2, 2009

चीजों का एकान्त

ऑटो का काम ख़त्म होने के बाद क्या करते कोई काम शायद बचा ही नहीं था। 35-40 की उम्र ऐसी होती है जिसमें शहर में कोई नौकरी नहीं होती तो क्या करते?

शिवराम जी की भी कुछ यही दिक्कत थी। अक्सर अपना ऑटो वो शमशान घाट के नल से आते पानी से धोया करते थे। सुबह 7 बजे से 8 बजे तक उनका यही काम रहता। इस दौरान शमशान घाट में भी बहुत शांती रहती। बहुत कम बार हुआ था कि इस वक़्त में कोई अर्थी आए। जब भी कभी आती तो वो अपनी सफ़ाई छोड़कर दो कदम उनके कदमों से मिला लेते और दूर से ही नमस्कार कर अपने काम मे वापस लग जाते।

शमशान घाट के पंडितजी के साथ में अच्छी जान-पहचान थी इनकी। शाम में काफी बार 4-5 घंटे साथ बिताए थे। अक्सर शाम में वो वापस आकर अपना ऑटो उसी नल के साथ खड़ा करते और ताला चैन के साथ उसी से बाँध देते। कोई भी शाम ऐसी ना थी जिसमें उन्होंने शमशान घाट में आग ना देखी हो। कभी कोई आग सुलघ रही होती तो कभी बहुत तेज़ उठ रही होती। कभी कोई उस आग के सामने खड़ा दिखता तो कभी वो अपने में एकान्त सुलघती रहती और किसी और के चले जाने का ज्ञात हो जाता।

सुबह और शाम का देखना अब बड़ा हो गया था। ऑटो का सी.एन.जी में तब्दील होना शिवराम जी के लिए तो छोटा ना था। चाहते ना चाहते उनको अपने ऑटो का काम बंद ही करना पड़ा। पूरा दिन बिताना अब आसान नहीं था। 35-40 की उम्र थी और शहर की गुंजाइशें ख़त्म पर थी। वो अपना पूरा दिन शमशान घाट में ही बिताने लगे। कुछ दिन तक वहाँ आते चढ़ावे में उनका हिस्सा रहता। वहाँ पर आए आटा, दाल, चावल, चीनी, और कपड़े और कई वो चीजें जो लोग अपने मर जाने वाले के नाम पर दे जाया करते थे उनको पंडितजी अपने घर में इस्तमाल कर लेते। बस, दोपहर का खाना तो शिवराम जी का वहीं से आ जाता। इस दोपहर के खाने के लिए उनको ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता बस, आती हुई अर्थी को खाली जगह दिखाते और शमशान घाट के बनते पर्चे पर पंडितजी के साईन करवाते। यही काम था उनका यहाँ पर जिसकी उन्हे कोई तन्ख्या नहीं मिलती थी।

उनका अभी के दौर में तो घर से मेल-मिलाप नहीं था। वो रात में अक्सर वहीं सो जाया करते। घर के साथ में एक तन्ख्या का रिश्ता था जो अभी टूटा हुआ था। वो वहाँ अगर जाए तो क्या लेकर हाथ तो खाली थे उनके।

बस, अपना दिन बिताने के लिए वहीं मंदिर के पेड़ के नीचे बैठे शमशान घाट में अपनी नज़रे घुमाते रहते। दोपहर में कई लोग वहाँ आकार बैठते और सोते भी थे। अक्सर कूड़ा बिनने वाले बच्चे वहाँ कोनों में लगे रहते और कुछ लोग वहाँ किसी भी समाधी के ऊपर अपने पैर तानकर सो जाते। पेड़ की छाँव के नीचे बहुत शांति मिलती थी यहाँ लोगों को। वैसे यह जगह मशहूर भी शांति के लिए होती है। तो पूरा दिन उन्ही को देखकर उनका टाइम बितता रहा।

काफी टाइम से चल रहा है यह सब। अब तो जिनका कोई मर जाता वो इन्हे जगह दिखाने और चिता जलाने में मदद का कुछ दे भी जाते। वो अपने साथ से अलग से कुछ नहीं लाते हो भले ही पर जो अर्थी पर आता वो तो दिया ही जा सकता था।

एक औरत की अर्थी। बहुत लोग थे। लगता था जैसे कोई जवान और शादीशुदा औरत थी। कई साड़ियाँ चढ़ी थी उसपर। चूड़ियाँ, साड़ियाँ , सैंडिल, मेकप बोक्स, सारी दुल्हन का सामान चढ़ा था उस पर। काफी रोना धोना भी हुआ था। वो लकड़ियाँ अपने साथ ही लाए थे। यहाँ अंदर से कोई नहीं खरीदता और कोई क्यों खरीदे भला इतनी मंहगी जो देता है। मरने वाली औरत बहुत गोरी थी। उसका एक बच्चा भी था वो भी गोद का। एक आदमी जिसके हाथ में बच्चा था वो शायद उसका शोहर था। 9 नम्बर वाले मोक्षस्थल पर जलाने के लिए उसे रखा गया था। उनका अपना क्रियाक्रम का काम चलता रहा और उन्होंने सारे कपड़े और सामान एक तरफ पटक दिया और मृतक को लकड़ियों पर रख दिया गया। अपना सारा काम-वाम निबटाकर वो कुछ देर तो वहीं पर खड़े रहे और थोड़ी देर बाद वहाँ अस्थियों के कमरे के साथ आकर सीटों पर बैठ गए। लगभग दो घंटे वो बैठे रहे फिर एक-एक दो-दो करके वो चले गए मगर वो चिता जलती रही। सब कुछ ठंडा हो जाने की राह देखी जा रही थी जब राख मे से धुआँ और गर्मभाप निकलने लगी तो सारे कपड़े और गहने और सामान उठाने के लिए वहाँ कूड़ा उठाने वाले भागे। शिवराम जी ने उन्हे डाँटा और कहा, "ख़बरदार अगर किसी भी चीज को हाथ लगाया तो ?”

वो उन्हे देखकर पीछे हो गए। पहली बार उनकी आवाज़ निकली थी किसी को रोकने के लिए शायद ये आ गया था उनमे की अब मैं भी इस जगह को सम्भालता हूँ पंडित जी के साथ। शिवराम जी सारा समान उठाकर पंडित जी के घर ले गए। पंडित जी की पत्नी ने देखा और धोती-धोती उठाते हुए कहा, “ये मेरे काम कि है बाकी तू ले जा अपने घर।" हाथों में बाकि सारे कपड़े लेकर वो खड़े रहे और यही सोचते रहे की लेकर जाऊँ या नहीं। कहीं कोई 'हाये' तो साथ मे नहीं चली जायेगी? कोई परेशानी ना बढ़ जाये? नहीं-नहीं क्या करूँ का जाप उनके अन्दर मे घूमने लगा था। फिर भी समानों और चीजों को देखकर सोचा क्यों ना लेकर ही जाया जाये। सारी साड़ियों की तय लगाकर वो एक साफ़ पॉलिथीन में डालकर और मेकपबोक्स अपने हाथों में पकड़े वो अपने घर लेकर चल गए और एक रात के लिए शामशान घाट से गायब हो गए।

अगले दिन पंडिताई ने पहली ही नज़र में उन्हे देख कर कहा, “शिवराम क्या हुआ कैसी लगी साड़ियाँ तेरी औरत को?”
"अरे कहाँ पंडिताई जी सुसरी ने पूरी रात उन साड़ियों को बाहर उसी पॉलिथीन मे दरवाजे के बाहर ही पड़ा रखा कह रही थी की किसी माँगने वाली को दे देगी।"

कहते-कहते वो उसी 9 नम्बर के मोक्षस्थल पर जाकर अस्थियाँ को काले कपड़े मे भरने लगे। ये भरना वैसे हर किसी का नहीं होता पूरे एक दिन तक मरने वाले घरवालों का इन्तजार किया जाता है और जब वो नहीं आते तो खुद ही काले रंग के कपड़े में अस्थियों के फूलों को चूनकर भर लेते हैं और उसपर मोक्षस्थल, टाइम, लिंग लिखकर वहाँ पर अस्थियों के कमरे में टाँग देते हैं। जहाँ पर कई और अस्थियाँ पहले दे ही टगीं हुई हैं थैलियों की शक़्ल में और उनके साथ-साथ में कई कपड़े भी पड़े हैं।

पूरा कमरा काले रंग से भरा हुआ था। बिना पलस्तर के वो ख़ुर्दरी दिवारें बहुत डरावनी लग रही थी। कुछ भी नया नहीं था। कोनों में कई समान भरा और ख़ामोश पड़ा कई आग की भाप निकाल रहा था। लाल चूड़ियाँ, साड़ियाँ, जुतियाँ, मटके, हुक्के के ऊपर का कटोरा, छोटी चारपाइयाँ सभी की सभी कोनों में भरी हुई थी। किसी भी सामान को छूने का मन भी हो तो हाथ नहीं उठते थे। शिवराम जी वहाँ पर कोई खूटीं ढूँढ रहे थे एक और थैली टाँगने के लिए। काले धूँए की आड़ मे गहरा अंधेरा एक जगह की चूप्पी के सन्नाटे को और भी गहरा कर रहा था। कभी तो ये समानों का कमरा लगता तो कभी कई लोगों के शांत रहने का ठिकाना।

सभी सुबह के 11 ही बजे थे तब भी इसका एकान्त कठोर था। जैसे-जैसे रात गहरायेगी तो क्या होगा? शिवराम जी ने वहाँ पर चार और थैलियों के साथ मे उसे टाँगने के लिए जैसे ही डोरी निकाली तो उनकी नज़र उन थैलियों की तारीखों पर गई। चार मे से तीन थैलियाँ 2004 के सितम्बर के महिने की थी और उनके हाथ में लगी थैली 2007 की। वो यही सोचने लगे की यहाँ टाँगने के बाद में भूल गया था तो? यहाँ पर तो धूँए और मिट्टी में सारी थैलियों को सदियों पुराना कर दिया था।

अब वो देखने लगे लगभग सन 2000 और 2007 के मरने वालों की थैलियों को। वो उस कमरे के और अन्दर चले गए। अन्दर कोने की दीवार के साथ मे कई थैलियाँ टँगी थी। ऐसे जैसे किसी ने अपना कोई अनमोल समान याद रखने के लिए टाँगा हो या ऐसे जैसे भूत-प्रेत से बचने के लिए भवूती टाँगी हो।

उन्होंने अंदर की सभी थैलियों को देखा, तारीखें भी छुप गई थी। अपनी उंगलियों से उन्होंने सबकी तारीखें देखी उनपर 1998 , 1999, 1995, 1996, और 2001 लिखा था। देखकर वो वापस आने को हुए और जहाँ तक धूप आ रही थी वहाँ आकर एक लकड़ी ईंटो की दरारी मे फँसाई और अपने हाथ की थैली को वहाँ टाँग दिया। वहाँ खड़े वो पूरे कमरे को देखने लगे उनकी नज़र कमरे में ऐसे घूम रही थी जैसे हर चीज को पढ़ रही हो कोई और रंग ही नहीं था। बस, एक ही या दो ही अंतर थे सभी मे। कोई थैली साड़ी, धोती, या चाकू के साथ टंगी होती तो कोई मोटी या पतली और वो अंदाजा लगाते कि कौन औरत है और कौन मर्द और कौन पतला था और कौन मोटा। पहली बार था कि वो अपने कमरे में।

"कोने में रखी चीजों की कोई ज़रूरत नहीं है वैसे उस कमरे मे। वो तो किसी ना किसी काम भी आ सकती है और इतना तो पता है कि सन 2000 मे कोई नहीं मरा। अगर कोई मरा है तो कोई यहाँ थैलियों में अकेला टंगा नहीं है। अपना मोक्ष पाने के लिए इतना इंतज़ार कैसे सहेगा कोई ? क्या रिवाज और क्या तारीख? मरने के बाद भी यहाँ अकेला होना क्या फायदा?” वो अपने मे बड़बड़ाते रहे।

जल्दी से जल्दी वो उस थैली को वहाँ टाँग कर बाहर आ गए और पंडित जी के पास जाकर बैठ गए। बहुत बार आऐ हैं यहाँ बल्कि यहाँ पर वो रहे भी हैं। कई लोगों के मरने पर वो इन कुर्सियों पर बैठे भी रहे हैं। सामने रखी ये वही कुर्सी है जो रमेश ने अपने पिता रामचरण के नाम पर यहाँ रखवाई थी। वो 1938 मे पैदा हुए थे और 1992 मे मरे थे। उनके नाम की यहाँ पता है सोने की सीढ़ी भी चड़ाई गई थी क्योंकि वो परदादा से भी ऊपर होकर स्वर्ग सिधारे थे। 3 पीढ़ियाँ देख ली थी उन्होंने। क्या बाजे- गाजे के साथ आए थे। यहाँ पर बैठकर उन चीजों को देखकर यही सब याद आ रहा था उन्हे। पर आज उन कमरे मे रखे सामान को देखकर कुछ भी याद नहीं आ रहा था बस, इतना ही दिमाग मे रहता कि मरने की तारीखों में कोई ना कोई टँगा है। वो पैदा कब हुआ कितनी पीढ़ियाँ देखी होंगी उसने वो कुछ नहीं था। आँखों के आगे वो चीजें ख़ामोश पड़ी थी जो रंगीन तो थी पर किसी की अपनी चीज। गठरियों मे बंधे कपड़े वहाँ पड़े थे और एक टूटी सी चारपाई जो शायद उसी की होगी जो मरा था।

दोपहर का खाना भी आ गया था। पंडिताई जी चावल-भात प्लेट में डाल लाई थी। शिवराम जी अपनी पाँचो उंगलियों को उसमे मिलाते हुए एक गस्सा जैसे ही खाते तो उन्हे उन्ही थैलियों की महक अपनी उंगलियों में महसूस होती। ज़रा सी भी हवा चलती तो पूरे शमशान घाट मे राख ही राख उड़ती नज़र आती और वो उंगलियों को घुमाते-घुमाते चावलों के गस्से पर गस्से खा रहे थे।

इतने में आवाज़ों का काफ़िला अंदर आने लगा। राम नाम सत्य है , सत्य बोलो गद्य है। इसी को दोहराते हुए काफी सारे लोग अंदर आते गए। पहले गाड़ियाँ आई और फिर अर्थी एकदम शांत। आवाज़ें लगाने वाले आगे निकल गए थे। वो आते ही बाहर वहीं कोने पर पानी के नाँद पर रुक गए। दो आदमी अंदर आए और जगह की पूछने लगे।

शिवराम जी प्लेट को नीचे रखते हुए बाहर की तरफ आए और 7 नम्बर वाले मोक्ष स्थल पर ले गए। वहाँ सुबह ही सफ़ाई की गई थी। उन्होंने वहीं अपने क्रियाक्रम का काम शुरू कर दिया और मरने वाले को विदाई देने लगे। मगर यहाँ पर कोई रोने की आवाज़ें नहीं थी। उसके साथ आया सामान जिसपर हमेशा पंडिताई की नज़र रहती थी जैसे नई दुल्हन क्या लाई है उसे देखने की चाह हो।

कोई आदमी था शायद। वहीं गठरी मे कपड़े थे, 4 जोड़ी जयपुरी जूतियाँ थी, आँखों के चश्मे थे और एक कुर्सी भी थी। वो अपने साथ ही लाए थे। सभी लोगों की तरह थोड़ा टाइम देना था और सामानों को वहीं छोड़ जाना था। लोग जब तक आग रहती तब तक वहाँ बनी समाधियों के नाम और तारीखें पढ़ने में लगे रहते और अपना टाइम बिताते। यहाँ पंडिताई और कूड़ा बिनने वालों की निगाह सामानों पर रहती और वहाँ खेलते बच्चों की लुटते खील-बताशो और पैसो पर। यहाँ पर खील-बताशे तो नहीं थे पर अर्थी पर गुब्बारे लगे थे और बैंड वाले भी थे। बच्चे तो गुब्बारों में लग गए और कूड़ा बिनने वाले उन गठरों में बंधे कपड़ो में।

शिवराम जी ने सारा काम करवाया अर्थी के बाँस को ज़मीन मे मारा और खेल ख़त्म। आज पहली बार वो अपने लिए यहाँ से चारों जोड़ी जूतियाँ और कुर्सी लेकर गए थे।

लख्मी

बस, वक़्त मरहम है

कितनी जल्दी चीजें हमसे छूटती जाती हैं और हम उन चीजों को पल भर भी अपने से दूर जाने का वियोग नहीं करते। कुछ वियोग दिल को तस्ल्ली नहीं दे पाते हैं तो उनको ज़ुबान पर लाने का कोई मतलब ही नहीं बनता। शायद यही बात है। वक़्त को हम इस तरह से जीते आए हैं कि वो कोई मरहम है। जो हमारी छूटी गई चीजों या बुनियादों के घावों को भर देगा। बस, कदमों को खिसकाते चलते हैं। आखिरकार कुछ पा ही जायेंगे।

जीवन को जिन कल्पनाओं और रचनाओं से बनाया था। जिस वक़्त की वो रहनवाज़ बनी उसमे वो रचनाओं भरा जीवन कई नये पैमानों का हकदार बनता है। अपने उसी वक़्त को एक खुशी में महसूस किया जाता रहा है। मगर डर रहता है उस खुशी के किनारों से। जिसमे उस खुशी के जाहिर होने की छवि कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा बिलकुल नहीं है की उसका दम नहीं है उसके किनारों पर, बहुत दम है। जो खेल और नाच के कोनों पर खड़े उसे हर पैतरें को या नाच के हर स्टैप को देखकर कोई बात अपने से मुँह से निकालते आए हैं। अगर वो ही कहीं खो जाये तो भी गम नहीं देता। बस, वो वक़्त के चकक्कर मे कहीं ठहर जाता है। क्यों वो कल्पनाये कोई वज़न नहीं ले पाती उस दौर मे जब हम अपने परिवार और पहचान के दस्तावेज़ बना रहे होते हैं? क्यों वो रचनाये कोई आकार नहीं ले पाती उस वक़्त के पन्नों मे? इतना आसान क्यों होता है उनका लुप्त जो जाना और वो एक दम से ही किसी ख़ास दिनचर्या में अपना अक्श क्यों नहीं दिखा पाती?

बस वक़्त मरहम है।

वक़्त जिसमें हमारी पहचान अलग-अलग तरह से ही उभर आई है। कभी वो हमारी अन्दर की कल्पनाओं से अपनी तस्वीर बनाती है तो कभी अपने से जुड़े रिस्तों से। वक़्त जिसमे उभरना, भूलना, पाना और जूझना हर पैमाने में पर चलता है। कभी हमें देखकर हमें दर्शाया गया है तो कभी हमें सुनकर। इन दोनों परिस्थितियों मे हमारी कोई ना कोई छवि तैयार ही हो रही होती है। जो कभी अपनी कल्पनाओं से जाने जाते थे वो आज अपने काम और रिस्तों से अपनी तस्वीरें बनाते हैं।

ये एक बदलाव है - एक गहरा बदलाव।

इसमे परिवर्तित होना किसी आम शख़्स की किस ओर की दुनिया को बनाने की कोशिश में है? क्या घवराहट नहीं होती इस बदलाव को जानकर? उस आम शख़्स को उसकी कल्पनाओं को शहर मे किस छवि के जरिये उतारा जायेगा?

"वक़्त कैसे बदला वो हमें मालूम नहीं मगर इतना मालूम है की लोगों की और परिवार की नज़रों ने हमें बदलने पर मजबूर कर दिया।"

ये कहकर वो अपनी चूप्पी को साध गए। कहीं और के हो गए।

"एक वक़्त था जब झूमकर नाचने पर इतनी वाह-वाही मिलती थी कि उन्हे समेटना मुश्किल होता था और आज वो जो भी समेट पाये थे उसे भी खर्च करने मे डर लगता है।"

उन्हे देखकर कोई ये अन्दाजा भी नहीं लगा सकेगा की ये वो शख़्स हैं जो कभी महफ़िलों की शान हुआ करते थे। जिसके एक गीत की लाइन कई लोगों को गीतों के अन्तरे के शब्द दे दिया करती थी। जिसमें लोग रात-रात भर महफ़िलों में मदहोस होकर अपने मे और धूनों में डूब जाया करते थे। बस, एक ही आलम हुआ करता था नशे का। जिसमे ढोलक पर पहली बार चल रहे हाथ भी ऐसे लगते थे की जैसे कई पैरों में मैखाने का नशा भर देते होगें। कोई ना नाचने वाला भी अपने पैरों को उठाने लगता होगा और जोश ही जोश में झूम भी जाया करता होगा।

आज भी उनके होठों से निकलने वाली बातों मे इन्ही महफ़िलों की चाँदनियों को अपने इर्द-गिर्द महसूस किया जा सकता है। मन मे बस, एक इच्छा सी जाग उठती थी कि काश मैं भी होता उन महफ़िलों में और झूम रहा होता। हर सुनने वाले की ज़ूबान पर ये आ ही जाता था की क्या वो महफ़िलें दोबारा नहीं आ सकती?

तो वो बस, उसकी तरफ में देखकर हँस जाया करते और इस कदर बेगाने हो जाते है उस बात से की वो कोई किसी ख़त्म होती नाटकिये लीला का गिरा हुआ परदा हो। बस, ये ही अदा उनकी उन्हे वो सारी चाँदनियाँ भूल जाने में सहयोग देती थी। जो वो अक्सर वहाँ उन सवालों या बातों से हट जाने में सफ़ल हो जाया करते।

लम्बे-तगड़े और शॉल औड़े वो गली के कोने पर खड़े आती जाती सड़क को ताकते रहते हैं और कोई ना कोई उनकी बातों मे लीन जरूर होता है। ज़्यादातर उनके छोटे भाई पिछली रात मे गाए गए गीत या किसी थाप की कसे होने को लेकर बात कर रहे होते।

ये ही अकेले हैं इनके हमसफ़र जिनके साथ मे कई रातों मे बिताए वो पल याद हैं। जिनको ये आज भी गीतों के ज़रिये दोहराते रहते हैं। बस, शाम चलते ही ये दूनिया अपने इशारे लिए अपनी चाँदनियों भरी दूनिया ने चले जाते। कोई भी रात ऐसी नहीं गुज़रती जिसमें ये फ़नकर अपना फ़न ना दिखाए सोते भी हो। बस, अब जगह तलाश्नी नहीं पड़ती वो तो चुनली गई है। मगर इस चुनी हुई जगह में वो बात कहाँ? वो रस़ कहाँ? जो अंधेरा होते ही आँखों पर छा जाया करता था। जिसके एक-एक घूँट में कई गीतों की मदहोसी बयाँ होती।

अब तो ये दूनिया एक कोने में खिलते उस रात की रानी के उस फूल की तरह हो गई है। जो रात मे खिलता है, महकता है, हवा में झूमता है, चाँदनी को ताकता है और सुबह का सूरज देखते ही अपना दम तोड़ देता है। इसके बावज़ूद भी इसमे जीने की उम्मीद कम नहीं होती। वो और, और, और भी गहरी होती जाती है।

काश की इन महफ़िलों में जीने वालों की उम्र कभी बढ़ती ही नहीं। वो रात की रानी के फूल की ही तरह से हर रात मे खिलते, महकते, हवा में झूमते, चाँदनी को ताकते और सुबह होते ही वापस डूब जाते और दूसरी रात फिर से एक और ताज़ी महक लिए खिलते। काश के ऐसा होता हो कितना मज़ा आता।

ये काश के सपने दिखाती दूनिया अब कब अपनी रोनक दिखायेगी वो तो तय नहीं किया गया है और कौन तय करेगा ये भी जाहिर नहीं हुआ है। इसी दूनिया के है वो "सज्जन जी" जो तैर रहे हैं।

"सज्जन जी" की दूनिया भी इसी काश की ओड़नी ओड़ चूकी है। अपनी जगह भी चून चूकी है। जगह है अपनी ही गली के किनारे के मकान की सातवीं मन्जिल। जहाँ तक किसी की आँख नहीं पँहुचती और फ़नकार के खिलते फूल को कोई भी नज़र नहीं लगा सकता। वहाँ पर "सज्जन जी" अपने अन्दर दबी कला को अपने से बाहर लाते हैं। एक ऐसी दूनिया में खो जाते हैं जहाँ पर सारे रिश्ते-नाते अपनी ज़िन्दगी के सारे पल्लुयों को छोड़ देते हैं। आदमी को कहीं उड़ने के लिए।

"सज्जन जी" के भाई ढोलक की थाप पर थाप पिटते जाते हैं और ये मदहोसी के सारे नियमों को तोड़ जाते हैं। नियमों में पड़ी अपनी उम्र को जो आज पचास से पच्पन साल की सीढ़ी चड़ चूकी है उसे पायदान पर ले आते हैं। अपने नृत्य के हर स्टैप को जीते हैं। जिसमें लगने वाला हर ठुमका आदमी या औरत की पुष्टी नहीं करता बस, किसी भी फ़नकार के शरीर मे थिरकन ले आता है जिससे वो झूमने लगता है।

"सज्जन जी" की ज़िन्दगी मे बदलाव कोई झटके से नहीं आया। ये बदलाव हल्के-हल्के वक़्त मे जमा। आज वो अपनी उम्र को अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा और गहरा बदलाव का ज़रिया मानते हैं। जो अलग-अलग तरह की ज़ुबानों में प्रस्तृत होता आया है। जिसमें उनकी कला और अपनी मदहोसी सब इस बदलाव मे सबसे ज़्यादा शतिग्रहस्त होने वाली दूनिया थी।

कुछ ऐसे नाम थे जो इस शतिग्रहस्त बदलाव मे उभर गए। 'नचकईया, गवईया, मशख़रा जैसे। ये वो पहचान बने जिनको साथ मे लेकर चलना इनके परिवार के बस मे नहीं था। ये नाम ही कलाओं के लिए एक अभिशाप की भांति पैदा हुए। शायद इन अभिशापो से आने वाली दूनिया 'काश' जैसे परदो मे रची जायेगी।
ये कुछ अन्दाजन नहीं था। मगर "सज्जन जी" का अन्दाजा इसी से विरोध मे रहा। जहाँ पर रची जाने वाली दूनिया अपने कोने में ही इतनी गतिशील थी के वो उस सातवीं मन्जिल को हमारे और आपके सामने किन्ही शब्दों में उभार देती है।

ये जगहे हमारे लिए कुछ गहरे सवाल छोड़ती है और उन्ही सवालों में जीती भी है। जहाँ पर गीत और मदहोसी एक-दूसरे को बिना किसी बटन के सर्च करते है और वो सामने हाज़िर हो जाती है। वो सातवीं मन्जिल आज भी तैयार है।

लख्मी