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Thursday, September 13, 2012

एक बस ड्राइवर अपने आप में

उंचाई और निचाई से बने रास्तों ने हमेशा सर्तक रहने पर ही जोर दिया। बस, अपने साथ वाले पर नजर रखने की ताक में रखा। रूट तय है और लोगों को गिनकर चलना फिक्स। और बस अगर चलते वक़्त अपने जोश मे कभी आ जाती तो लोगों की गिनती में बड़ा परिवर्तन आ जाता है। ये करना तय नहीं है। मैंने रोज ये घटते बड़ते देखा है। और घटने को बड़ाने मे तब्दील करने का काम करते भी। दिन खत्म होता जाता है। घटने को कम करना और बड़ाने में उसे ले जाना हर रोज़ का बन गया है। जिस रास्ते जा रहे हैं उसी रास्ते वापसी। कहां पर रूकना है, कितना रूकना है मे टाइम की कोई जानकारी नहीं। इस सबके बीच मे मैं दिन को कैसे दोहराऊँ? लोगों की गिनती फटी और बिखर गई टीकट मे भी परिवर्तन मे आ ही जाती है। बस मे जो भी चड़ता या उतरता है उसकी गिनती रोज होती है। मगर चलाने वाले की उस गिनती से कोई लेना देना नहीं। 

पूरा रास्ता नफा कहां है और नुकसान कितना की सोच ने एक दिन मे गुजरे हर रास्तो को उसकी चमक से ही बाहर कर दिया। मेरी समझ में आज तक नही आया की नफा क्या है और नुकसान क्या? लोगों को गिनना या उनकी दूरी को गिनना? दूरी को गिनना बेमाइने है। दूरी जो रोज़ाना की तय होकर रास्तों पर निकलती है और लोगों को गिनना मुश्किल बनता चलता गया है। नफा व नुकसान के बने टोकरे मे दिन को धकेलना लोगों के बीच होने को गायब करता जाता है। हर रोज़ के एक ही रास्ते पर चलते चलते हैं  लगता है कि रास्तो के माहिर तो हो गये लेकिन मंजिल पर उतर जाने के बाद लगता कि रास्तों ने उस रफ्तार और खो जाने को खा लिया जिसमें हमेशा जागते रहने की शर्त छुपी है। मैं तो कभी किसी को लेकर खो ही नहीं पाया। कैसे खो जाऊँ? इस घटते जाने को बड़ाने की लड़ाई से बाहर निकलकर।


सोचता हूँ की रूट को बदल बदल कर चलूँ।
रास्तों मे छुपी ऊंचाई और निचांई के साथ खेल से भरा लुफ्त है। कौन मिला और कौन छूटा को सोचने की जरूरत के बिना सफ़र बहता चलेगा। जैसे रास्तों ने अपने रहस्य को दिखा दिया हो। जिसमे घुसना भी दिलचस्प है और ना घुसना भी। अगर हर रास्ते के बाद कोई मंजिल है तो बीच में तो रहस्य है। मजा होगा। कहां निकल जायेगें की उत्तेजना और ना निकल पाने में राह खोजने की चाहत रूट को भी मजेदार बना देगी। हर दिन सेंकड़ो लोग चड़ते हैं और अपनी अपनी दूरी के समान रहकर उतर जाते हैं। इनकी दूरी के साथ रास्ते के अन्दर के मोड़ ज्ञात होगें।


सोचता हूँ की किसी दिन बिना टीकट के लोगों को आने - जाने दूँ।
हर रोज़ एक ही रूट पर चलना या हर रोज़ एक ही रास्ते पर चलना क्या? रास्ते तो हमेशा ही लम्बे रहे हैं। बस सिर्फ इतना फर्क है कि चलने वाला अपना सफ़र कर रहा है या अपने कदम गिन रहा है। कदम गिनना ही रूट है। रूट रास्ते को भोगते जा रहे हैं और उंचाई - निंचाई उन सपाट रास्तों को जिनपर जागना सिर्फ किसी पर नज़र रखना नहीं है। यहां पर चलने वालों ने ऊंचाई और निंचाई को नफा नुकसान माना है।

रोज कई लोग आगे के गेट से चड़ते हैं। बिना कुछ बोले चुपचाप बोनट पर बैठ जाते हैं। कई लोग फिर वहीं पर जमा होते रहते हैं। ना जाने क्या बातें चलती रहती है। उन्हे कहां उतरना है जैसे कुछ समय के लिये भूल गये हो। उस्ताद जी, कहकर ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि हमारी बहुत पुरानी जान पहचान है। सिर्फ टीकट की गिनती इन मुलाकातो को बता नहीं पाती। किसको कितनी दूर जाना है ये तह होना ठीक होता हो लेकिन मोड़ कभी कभी इसे भी बदलने को उक्सा जाये तो? एक दिन ऐसा हो की जिसको जहां जाना है जा सकता है। जिसको जहां उतरना है उतर सकता है। गिनती से बाहर होते लोग अपनी जगहों से कहां पर जाने के लिये निकलेगे।


सोचता हूँ किसी दिन सवारी बन जाऊ :
देख पाऊँगा की अंधेरे और उजाले दोनो के बीच में सिर्फ समय के फासले का ही खेल नहीं चलता। सवारी कहां है? और कितनी है? को चुनना अंजानी मुलाकातों को भूला देता है जो अपने लिये कुछ बुन के लिये आती है और फिर गायब हो जाती है। अगर दिन के खत्म होते होते उन मुलाकातों को दोहराया जाये तो कैसे?

नफा और नुकसान सफर में रहने को जोर नहीं देता। वे फिर सफ़र ही कहां है। कितना चले को सोचा जाये या कितनो को देखे और मिले को सोचकर अपने रास्ते को बुना जाये। हर रोज एक ही रास्ते पर चलते चले जाना उस बीच के हिस्से को गायब कर दिया है। जहां से गुजरने पर ये ख्याल ही दूर हो जाता है कि कौन कितने समय से मेरे साथ है। बल्कि कौन कहां जा रहा है और उसका इंतजार किसको अपने साथ लेकर जायेगा का भ्रम जिंदा रहता है। ये सफ़र उस भ्रम का सारथी कि तरह है।

ये सारथी कौन है -  चलाने वाला चालक, बैठे रहने वाला सहायक, हर किसी के रास्ते का हमसफ़र, रास्तों को अपनाने वाला कोई पागल, गलती से चड़कर उतरने का ठिकाना तलाशने वाला, चालक के रोल में कोई काम करने वाला या चलने को काम मानने वाला या नये लोगों के साथ मे रहकर जीने वाला, भागकर बस में चड़ने वाला, गेट पर ही रहने वाला, बस की सजावट में उसमें लाइने लिखने वाला, संदेश देने वाला, सड़क पर रहकर बस पर नज़र रखने वाला या रास्ते पर कौन कैसे चलेगा के रूट मेप बनाने वाला।


अभिनय बेशक बहुत छोटा व बनावटी होता है मगर हर बार के रोल में राहों के मेप बदल जाते हैं।


 लख्मी

Saturday, October 23, 2010

ओखला कॉर्पोरेट्स और जनता की पहल

मानवीय नमूना





ओखला के आसपास बहुत से पॉश कॉलोनियों मिल अपने घरेलू सफाई, ड्राइवरों, आदि ।
कॉर्पोरेट्स और जनता की पहल की कमी जैसी मदद करता है ऐसे स्थानों बनाया है।
ये बस्ती में रहने वाले लोगों जिसे हम क्षेत्र के प्रदूषण के लिये जिम्मेदार ठहराजाता है।
वो किसी के लिए घरेलू नौकर का स्रोत बनते है। और फैक्ट्रीयो मे श्रम भी करते है।
उनके घर कैसे है कैसे जीवनयापन करते है।
इस कार्यालो के मलिको को कोई फर्क नही पड़ता ।
उनका मशीन से काम कर के आने बाद वो अपने आम जीवन को किसी कल्पना की तरह सोच कर फेक्ट्रीयो में काम खत्म करने के बाद शूरू होता है।
पहले और बाद के बीच का जो दायरा है वो मशीन को अपनी दुनिया मे कुछ अलग ढंग से ले जाने का है।
जिस मे अगर झाक कर देखेंगे तो दोनो का मिला-जूला एक गठन समझने को मिलेगा।

राकेश

Thursday, June 24, 2010

रोशनियाँ खोने लग जाती है।

नींद से भरा शरीर और रातों से जागी आँखें। उम्मीदों से बड़े सपनें, तन्हाइयों से गहरे लम्हें।

जब कमरे से बाहर देखा की रात अभी बाकी है तो सोचा रात में जो दिखता है उसको सोचना ना मूमकिन सा लगता है पर दूसरे ही पल सब साधारण लगने लग जाता है।

जैसे कुछ कर जाने की ताकत हमारे पास है । रोशनियाँ खोने लग जाती है। जब सुबह का उंजाला खुद को पेश करता है।

हवा जैसे चीजों को कोई नया जूंबा दे जाती है। माहौल अपनी मटरगश्ती में मश्गूल हो जाता है। कहीं दूर से आती कुछ आवाजें किसी जगह में हो रहे कार्यक्रम का अवागमन करती है।
"कौने है वहां?”

किसी ने अपने पड़ोस के मकान से आई अजीब सी आवाज को सुनकर कहा, "शायद कुछ सामन गिर गया था।" "बिल्ली होगी और कौन हो सकता है?” दिपा ने कहा।

दिपा यहां रहती है। उसको पता है की यहाँ सामने वाले मकान में कई दिनों से कोई आया नहीं है।

हाँ उसे ये जरूर पता है की यहां पहले कोई रहता था पर पिछले दस साल से कोई नहीं आया ।
बस आती है ,तो हमेशा कुछ गिरने-पड़ने की आवाजें। अब उस बरामडें मकड़ियों ने अपना कोना बना लिया है कॉकरोच और मच्छर रेस लगाते दिखाई देते हैं।
दिपा का भाई कृष्णा बी.ए. कर रहा है। वो रोजाना अपनी बालकनी में जब भी किताबे लेकर बेठता है ,तो उसे अपने सामने वाले मकान को देखकर दुख भी होता है।
कभी उसे देखने के बाद कई तरह की उल्झने पैदा हो जाती है।

वो सामने वाले मकान में जिसमे कई दिनों से कोई रहने ही नहीं आया।
पहले इस में कुच लोग रहा करते थे ।
पर अब यहा सिर्फ किसी के होने के अवशेष बचें हैं। जो दिखता है वो बाहर रखा बर्तन रखने का टोकरा। दिवार पर टंगी खूटियाँ ऊपर की तरफ लगा बल्ब जिसमें मकड़ी का बड़ा जाला बना है। लाल गेहरू से बने देवी-देवताओ के चित्र ।
जो किसी अपसर के वार्तावरण को ताजा कर देते है। जब ये सब समझ मे आता है, तो उस गुजरें वक़्त के टूकडे फिर से सामने आ जाते है।
जिनसे जीवन के पहलूओ की एक छाप मिलती है।

कृष्णा और दिपा अक्सर अपनी बालकनी में आकार बैठते हैं। उनकी नज़र ज़्यादातर अपने और सामने वाले बालकनी के कमरे के बारे में सोचती है। वो घर बनाने वाली चीजें जो हमेशा किसी के जरूरतमंद होने का अहसास कराती है ।
जिसको पाने की संम्भावता को पूरा करने की हर संम्भव कोशिश करनी होती है।

बाहर के दृश्य जो अपने आप में बहुत बड़े होते हैं जिसमे खुद को समाना मुश्किल होता है। उतना ही जो करीब होता है उससे भिड़ंत में जीत पाना सम्भव नहीं होता तो करीबी अहसास को कैसे सोचे? उस बालकनी के कमरे में जो भी बची चीज़ें नज़र आती थी वो किसी न किसी रूपरेखा को दर्शाती थी।

वैसे जगह की रूपरेखा ही मूश्किल हलात पैदा कर देती है।
जगह मे जब हम देखते है की अभी क्या हे और वो अपने होने के पहले को कैसे सोचता हे । या सोचता भी है क्या ? कही जो वर्नण जो हे वो आने वाले के लिये कोई जीवन की स्थापना तो नही है?


कही कोई शख्स नही बस किसी होने के चिन्ह है जो कभी बने है और जिसे कोई तलाश एक छौर तक बना गई है।
वो वक़्त से कैसा रिश्ता है ?
जिस मे सब दिखता भी है और कभी औझल भी हो जाता है।


अगर इस नज़रीये से देखे तो वो जगह जो अपने भीतर किसी जीवन के पुर्व-अनूमानो को लेकर जी रही है।


राकेश










































Saturday, May 8, 2010

शूरूआत हो जाती है।









राकेश

माहौल को सोचना

घर को किसी सफ़र की तरह देखकर देखे तो हमे क्या नजर आता है?जरा इस घर के ढ़ाँचा से दूरी
बनाकर प्रवृतीयो मे हम जा गीरतें है ।
जो याद और अभी के समय का रिश्ता आने वालें कल सें बनाते हैं।



















राकेश

Sunday, April 25, 2010

जीवन एक है फिर सब बराबर क्यो नही होता ?

ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी की लगे न इसे नज़र। क्या घर को किसी प्रयोग और अभ्यास की जगह बनाया जा सकता है। घर में हम क्यों वो नहीं कर पाते जो बाहर तलाशते हैं। घर क्या है? और हम जहाँ ज़्यादा समय बिताते हैं, वो जगह क्या है?




जीवन एक है फिर सब बराबर क्यों नहीं होता? सब के बीच क्या दूरी है? ये दूरी ये जगह जो अपने किसी संतुलन को बनाये रखने के लिये बनाई जा रही है। इसकी परख क्या होती है?





राकेश...

Friday, April 23, 2010

उजाला , अंधेरा और सभी वस्तूओ का स्पर्श ।

प्रकाश जहाँ होता है। उसके साथ छाँया भी जन्म लेती है। प्रकाश और छाँया जीवन के दो रूप जिनके अनुसार हम किसी अक्स की कल्पना करते हैं। वो अक्स जो हमारी रोजमर्रा को सुनने वाला, देखने वाला एक अवतार है। जो समय के प्रभाव से दिखता और खो जाता है। कोई उसे उभारने की कोशिश करता है। तो वो खुद भी कभी बाहर आ जाता है।

वो कौन सी आँख है जो इसे बना रही है? वो कौन से हाथ है जो इस अक्स को उठा रहे हैं। हम गढ़ने में है इस अक्स के सफ़र को अपने सफ़र में। कुछ हाथों से छूट ना जाये इस लिये सब बटोरने की इच्छा है।





ये अक्स के बीच में जो हमारा जीवन है वो खुद भी अपना चेहरा बनाना है। जिससे की समय के निरंतर बहती धाराओं में हम कहाँ है ये समझ सकें। चीजें, आवाजें, इंसान, माहौल, ढ़ाचाँ जिसमें किसी के होने और न होने के अहसास को ले सकें। रात और दिन के स्रोत अतिव्यापक समय का प्रभाव जिसमें रंग, चीजें, उजाला, अंधेरा सभी वस्तुओं का स्पर्श जो शरीर को कहीं ले जाता है। कभी सुनकर तो कभी देखने से कभी दोनों के गायब हो जाने के बाद भी वास्तविकता से और काल्पनिकता से। किसी चीज से दूरी और किसी चीज से नजदिकी का फांसला जो बीच को फर्क लाता है। वो किसी को दिखने का नजरिया ही एक आँख है और अपने अलावा दूसरे के नजरिये से भी देखने का तरीका है।





राकेश

Tuesday, January 26, 2010

फुटपाथ का द्वश्य

सड़क पर भारी-भरकम वाहनों की गिच-पिच से भरा शोर-गुल का माहौल। धूएँ की गंद और कानों के पर्दे को तकलीफ पहुँचाती। तिपहिया स्कूटर और कार इत्यादि के हॉर्न की आवाजें जो पल भर को झजोड़ के रख देती है।

अर्चना रेड लाईट के पास बने कॉरिडोर में बड़ी बसों आना-जाना लगा रहता है। जहाँ लगता है की किसी के लिये यहाँ ठहरने का वक़्त नहीं। सब किसी न किसी धुन में चले जा रहे है। रोज का एक मक्सद और रोज की कोई कोशिश जिससे माध्यम बनाकर ज़िन्दगी की किन्ही प्रतिक्रियाओं को अपने व्यक्तिव में गेरतें हैं।

वर्तमान जो कोई सांप बनकर जगह के सूनेपन को डस जाता है फिर कोई परी की कहानी माँ की ममता की गोद में सून्ने को मिलती है। बाप का साया सिर पर है तो जीवन की कोई भी कसौटी हो। अपनी परम्पराओं का पालन कर सब अपने लिये कुछ न कुछ बना ही लेते हैं।

आज सच के सामने खडे होकर जीना साधारण बात नहीं है। अनिश्चिता उस दलदल में ले जाती है जिसका कोई तल मालूम नहीं पड़ता। मन के तारों को जनह देने वाली उस छवि ने चंद पलों को जैसे बीतने से पहले ही रोक लिया हो। कुछ देर ठहरने का जो अनूभव के बाद जो ख्यालगोहि मैंने अपने आपसे की उसमे मुझे अपने सामने बनी छवि के प्रती मेरे मन वात्सल्याता का अंकुर फूटने लगा।

श्याम ढले जब रेड लाईट ने चलती गाड़ियों को लगाम देने का इशारा किया तो जैसे आस-पास रोशनी कोई गोला सड़क के उपर गिर गया हो। सारी गाड़िया रूक गये और हफ्ते इंजन गर्र-गड़ाने लगे। फुटपाथ पर एक 3 साल का बच्चा अपनी आँखों से सिस्क-सिस्ककर रो रहा था। चारों तरफ चौराहा और शोर-शराबे का माहौल जिसमें उस रोने वाले बच्चे का होसला अपना नियंत्रण खो रहा था। यातायात के सारे फंग्सन बने हुए थे। उस बच्चे का रोना किसी को सुनाई नहीं आ रहा था पर सब अपनी गाड़ियों में बैठे बाहर खड़े उस बच्चे की हालत पर तरस खा रहे थे। उसके करीब उस की शायद बहन थी जो उसके रोने को बार-बार नज़रअन्दज कर रही थी। वो अपने पास रखी स्टील की थाली को तडा-तड बजाये जा रही थी पर उसे जरा भी नहीं चूभ रहा था। जिसे देखकर शायद किसी का भी कलेजा मुँह को आ जाये।

इतनी संवेदना थी उसके मासूम से चेहरे में और सिस्कियों में जिसे महसूस करके मन व्याकुल हो उठा। मेरी व्याकुलता उसकी समस्या का समाधान नहीं थी। पता नहीं उसके इस हाल का जिम्मेदार कोन है और किसी जिम्मेदार ठहरा सकते है? मगर कम्बखत ये मेरे वहाँ होने पर लानत थी की क्यों न उस रोते बच्चे को गोद में उठा कर ममता दिखाई। खैर, समय निकल जाने के बाद खुद को कोसने का क्या फायदा। जरा उस लड़की को तो देखो जो बालपन में ही अपनी मेहनत का वो नजारा दिखाती जिसे देखकर हर आँखें हैरान हो जाती और कुछ उस नजारें को देखने के रोज आदी हो जाते वो भी हर बार की तरह उसके करतब देखकर चन्द शब्द जूबाँ पर लाकर खूद को तसल्ली देकर इस जगह से निकल जाते। वहाँ रह जाता तो सिर्फ उस फुटपाथ पर उन बच्चों की जिन्दगी का अंश। जो समय की कग़ार पर कभी उभरता और कभी अद्वश्य हो जाता।

वो लडकी सारी विपदाओं से अन्जान बनकर अपने रोज़ के रूटीन का अनुसरण कर खुद की कोई छवि बनाती जिसकी शायद ज़िन्दगी को भी जरूरत नहीं है। किसी को भला समझने के लिये 3-4 मिनट काफी होते हैं। हर रोज अगर यही द्वश्य आँखों को प्रभावित करता है तो वो कहीं न कहीं जीवन का हिस्सा बन जाता है। जो आप के हाजिर होने का संकेत देता है।

मेरे ठीक सामने खम्बे के पीछे खडे उस बच्चे का रोना अभी जारी था। उसकी बहन अपने शरीर का अंग-अग बांँस की लकड़ी की तरह मोड़ देती । यातायात के चंद लम्हात रोकते ही उसका जीवन का प्रक्रिया शुरू हो जाती। वो लगातार कलाइयों और बदन को मोड़ देने वाली क्रिया करने में व्यस्त हो जाती। सड़क पर खड़ी गाड़ियों में बैठे शख़्स आँखें फाड़े उसी ओर देखने लगते जहाँ उसके घायल हाथ-पाँव अपने दर्द का अहसास किये बिना मस्कत करने लग जाते। रोजाना के अभ्यास ने उसका शरीर लचीला बना दिया था। वो अपने हाथों को जमीन पर रखकर कला-बाजियाँ दिखाने लग जाती। एक बार फिर दो बार, इस तरह वो कई कलाबाज़ी एक साथ कर जाती। उसे देखकर लगता की अगर यही लड़की किसी जिमनास्टिक या किसी इंस्टीट्यूट में होती तो उसकी इस काबीलियत की तारीफें गढ़तें पर उस सड़क पर आए दिन बने माहौल की विवश्ता यही थी। वहाँ जो भी इस तरह का कुछ घटता उसे कोई बदल नहीं सकता था। जब वो लड़की दस कदम तक कलाबाजी करती हुई चली जाती। बच्चा वहाँ खड़ा हुआ रो रहा था। जैसे ही उसकी कलाबाजी खत्म हुई वो सड़क के पास बनी पटरी पर बिछाए जाल को उलांग कर स्कूटर, कार, मोटरसाइकिल वालों के पास चली जाती।

गोरे रंग और मासूम शक्ल वाला वो बच्चा उसे दूर जाता देख अजनबियों जैसा महसूस करता। वो लड़की उसे अपनी तरफ बुलाती जाल के इस पार पर वो सिर हिलाकर मना कर देता और वही कुदाकादी मचाने लगता। वो जाल के पास आता फिर जाल को छूता शायद वो कुछ समझने की कोई कर रहा था। मगर उसका बचपन उस पर लादे बोझ से छूटकारा दिला देता। वो जाल को छूता हुआ धीरे-धीरे दिवार की ओर चला जाता अपनी बहन के बूलाने पर भी वो वापस नहीं आता।

तभी सड़क की ग्रीन लाईट हो जाती और गाड़ियाँ रेस के मैदान में दौड़ने को अपनी जगह छोड देती। वो लड़की सब से पैसा मांगकर वापस उसी वहाँ से हट जाती और फि वो रेड लाईट होने का इंतजार करने लग जाती।

राकेश

Friday, January 22, 2010

हू-ब-हू बनी तस्वीर

बात - ओहदे या शरीर को नहीं मानती

SMS – किसी ने आपको कोई बात कही वो बात जो आपकी ज़िन्दगी और फैसलों मे बहुत अहमियत रखती है"

अगर बात कहने वाला इंसान समाज मे बुरा यानी ( गेंगस्टर, वैश्या अथवा पागल ) कहलाया जाता है तो उसने जो बात हमसे कही है उसका महत्व हमारे लिए घट जायेगा? मैंने अपने समाजिक रिश्तो और कुछ दोस्तों से बात पूछी सभी के जवाबों में "हाँ" रहा। मगर इस हाँ के अलावा कुछ और नहीं। मैं थोड़ा परेशान हूँ। ये सवाल परेशानी में नहीं डालता बल्कि ये "हाँ" सोचने पर मजबूर कर देता है। तू कुछ कह सकता है?

SMS - मेरे जवाब में ये कतई "हाँ" नहीं है। अगर कोई गोली आपकी जान लेले तो ये नहीं सोचा जाता खासकर की मरने के बाद या घायल होने के बाद मे की ये गली किस जाती की बंदूक से चली है।

एक शख़्स का अदाहरण देता हूँ, “मजनू जी को अपने घर से बाहर यानी अलग रह रहे कई साल हो गए हैं। वो सड़क के किनारे बिना छत के रहते हैं। उन्हे नजदीक से जानने वाले उन्हे दीवाना कहते हैं और दूर से देखने और जानने वाले पागल कहकर उन्हे नवाज़ते हैं। जगह का मर्म और उसकी ऊपरी सतह को वो अपने पल-पल बनते अनुभव से बताते हैं। उनकी ज़ुबान में नज़र आती जगह किसी किताब के अक्स में भी नहीं होती।

अगर कोई दिवाना या पागल आपको अपनी जगह या घटनाओं से रू-ब-रू करवादे तो उस बात में अहमियत की गोटियाँ नहीं फैंकी जाती।

मजनू जी को लोग बुरा इंसान मानते हैं। अपने बच्चों को बहुत कम उम्र में जो अकेला छोड़ आये थे। मोल, अहमियत और कीमत (वैल्यू ) बात की होती है किस ज़ुबान, ओहदा और शरीर से निकली है ये नहीं देखा जाता। ये एक चश्मा है जिसे उतारा जा सकता है।महाभारत के कर्ण के शरीर से चिपटा कवज़ नहीं जिसे चीरा जा सके।

SMS - हम लोगों को जरा दूसरों के देखने और सुन्ने से हटकर अपने खुद नजरिये से सोचकर समझने की जरूरत है। क्योंकि कानों मे पड़ा हर शब्द सम्पूर्ण नहीं होता। मुँह से निकली हर बात सच नहीं होती। समाज में कई संबन्ध होते है जिनके रिश्तों की कसौटी पर हर किसी को खरा उतरना होता है।

हम एक समाज में रहकर भी अपने लिये अपना बनाया वातार्वण चहाते हैं। जिसके लिये मन मुताबिक करने की ठान लेते हैं। मगर समाज में रिश्तों को बनाये रखने और उनको अपने पास रखने के लिये हर मोड पर दूसरों को अपने काबिल और सब में घूले-मिले रहने के लिये अपने इरादों को भूलना पड़ता है।

हर कोई ये कर ही पाता और जो करता है वो रिश्तों के दायरे से बहार हो जाता है। उसकी गिनती आम आदमी नहीं होती हो दूसरों के जैसे सा नहीं मना जाता कहने को तो वो भी इंसान का ही एक हम शक्ल होता है पर सिर्फ हम शक्ल हू-ब-हू नहीं। उसका जीवन उस हू-ब-हू बनी तस्वीर की तरह होता जो सच और झूठ के प्रतिक से अलग होता है। जिसकी कोई पहचान नहीं होती। हाँ, हम सोच सकते हैं कि इंसान की बनाई इस दूनिया में इंसान की ही बनाई बहुत सी पहचान है। जो इंसान को ही विभाजन करती है। इस लिये शायद आज जिस तरह से जीवन को देखा जाता है वो महज एक धूंधली तस्वीर है या फिर कह सकते है की मानवता पे गिरा वो पर्दा है जिसकी आढ़ में मानव का ही अपमान होता है। इस लिये आज जबकी हमारे सामने हमारे ही जैसा शख़्स खड़ा होता है तो हम उसे कैसे नहीं पहचान पाते। ये तो वो ही बता सकते है जो इंसान का बँटवारा करते है। बोल, शब्द और किसी के उपर कही बात क महत्व की तो आप रोज किसी न किसी से कितनी ही बाते करते है कितने ही सवाल और जबाब करते है।

रास्ता पूछने पर अगर कोई सही या गलत बता दे तो आप घर वापस आना तो नही भूलते। फिर किसी के कुछ बोलने या समझने से आप को क्यों फर्क पड़ता है आप का अपना विश्वास तो अटल है वो ढ़गमगा नहीं सकता फिर क्यों दूसरे की गवाही?


राकेश

Friday, June 26, 2009

कश्ती, भूख बड़ रही है।




आज कोई किनारा नहीं दिखाई देता हर तरफ नज़र भटकाने वाले चेहरे, चिन्ह, रास्ते है, हालात है, अफवाहे हैं। ज़िन्दा रहने कठीन और कठीन बन गए है। कहाँ जाये सफ़र थके इस शरीर को राहत देने के लिए। दुनिया इतनी छोटी क्यों पड़ती जा रही है और लोग बड़ रहे हैं। चीज़ें कम हो रही है और भूख बड़ रही है।

राकेश

बुनाई - सिलाई, बाकि है अभी

बुनाई जिसमे पैबंद जुड़ते चले जाते हैं। किसी भी चीज़ का छोर, किनारा व कगार देखना ना मुमकिन होता है। आजादी भरी ये राहें किसी भी चीज़ को ख़ुद से ज़ुदा मानकर नहीं जीती और न ही चलती। बुनाई आकार को उस सरफस की भांति रखती है जिसे कभी भी महसूस किया जा सकता है। उसके साथ खेला जा सकता है, उसके साथ बदलाव के वार किये जा सकते हैं। लेकिन ये बुनाई अब सिलाई में तबदील हो गई है। जहाँ पर पैबंद को कसा जा रहा है। उसे मजबूत धागों से लपेटा जा रहा है। कहीं से भी कुछ उधड़ा न रह जाये उस नज़र को दिन में कई बार घुमाया जा रहा है। ये नज़र का घुमाना इस कदर छुपा है कि इसके साथ बातचीत करना आसान नहीं है और अगर बातें शुरू भी हो गई तो वे कटुरता निकलेगी जिसे सुनाने वाला और सुनने वाला दोनों ही एक-दूसरे के आमने-सामने बेइज्जत होते नज़र आते रहेगें।

हर जगह की वैसे नीति ही रही है, जो चीज़ें आसानी से दिख जाती है वे उस जगह के दृश्य ही होते हैं। बाकि का सब तो उनके पीछे समाया होता है। इस जगह की भी कुछ नीति है, जो नज़र तो नहीं आने वाली लेकिन उसे महसूस किया जा सकता है। यहाँ पर कैसे कोई चीज़ कितने वक़्त तक रहेगी और वो चीज इस जगह के बाहर यानि शहर में कहाँ तक जा सकती है उसका अभास यहाँ पर छटाई करने वाले को होता है। यहाँ पर सब अभास का ही तो खेल है। भरी-भरी बोरियों मे से कौन सा टुकड़ा कहाँ का है?, कौन सा पीस कितने का है?, कौन सा माल काम का है और कौन सा हिस्सा किसके काम मे आयेगा? ये सब का सब उस अभास से ही होकर निकलता है। जो चीज़ें कभी छटाई मे भी बेकार रह जाती हैं वे दोबारा से फिर किसी बोरी मे लदकर आयेगी ये भी तय है।

हमारे लिए ये जानना कतई कठीन नहीं होगा की इस जगह का चलन कैसे होता है? इस जगह के साथ कितनी और जगहें जुड़ी हुई हैं या फिर इस जगह के हाथ कितने लम्बे हैं? ये सब बातें ये जगह अपने में समाये जीती है। चीज़ों का आवन-जावन, उनका भराव, खरीदी-बैचेगी, और लोगों का इस जगह में काम के सिलसिले घूमते फिरना इस जगह को फैलाव और गहरा करने मे सक्षम हो जाता है। भले ही हम इस जगह मे किसी से वाकिफ हो या न हो, लेकिन किसी न किसी माहौल के पात्र हम बन ही जाते हैं। और कभी-कभी तो ऐसे क़िरदार जो हर किसी की नज़रों के निशाने पर होता है। यही सबसे बड़ी बेरूखी है इस जगह की परतों के साथ।

किसी की केड़ी नज़र पड़ जाने के बाद मे ये जगह का दूसरा महीना शुरू हुआ है। इस नज़रों के घेरे में किसी मे कोई खास बैचेनी नज़र आये ऐसा यहाँ पर कुछ भी महसूस नहीं होता या फिर ये जगह उसका पूर्वभ्यास होने नहीं देती। ऐसा लगता है जैसे किसी कार्यहित जगह को साज़-सज्जा का ठिकाना बनने में देर नहीं लगती। वे ठिकाना जो प्रदर्शन से पहले सजने-सवरने के लिए बनता है। जहाँ किसी कार्यहित जगह के पूर्वनिर्माण करने की चेष्टा दिलों मे समाई रखने की मुहीम हर वक़्त दिमाग पर अपने हथोड़ों से वार करती है।

हर दरवाज़ा खुला है, कहीं से भी किसी भी नज़र का घेरा कहीं तक भी नहीं दिखता। कोई खास तैयारी नहीं है। जगह का पूरा का पूरा उठकर कहीं चले जाना ही मुमकिन लगता है। ये नीतियाँ बनने और उनको चलाये रखने से ज़्यादा मुश्किल होगा। यहाँ के कई बोलों मे आने वाली जगहें अपने साथ आसरे की भूमिका अदा कर रही हैं। कहीं भी जाना हो लेकिन बिना आसरे के वे बेमाइने होगी। ऐसा सब जानते हैं। ये कोई मार्किट नहीं है जिसके खुलने और बन्द होने का वक़्त है। ये कुछ और है।

घुलना-मिलना, मौज़-मस्ती उसके साथ शहरमें अपनी वे ताकत दिखाना जो पिछले कई सालों मे इन बेकार चीज़ों से बनाई है वे सब तो अब बस, लेशमात्र की भांति रह गई है। जिसमे कुछ चिपकनापन है जो हाथों से कुछ इस तरह से चिपक गई है कि छूटने का नाम नहीं पा रही है। ये अहसास इस जगह का क्षणिक पल है। जो कब छूकर निकल जाता है उसका पता भी नहीं चलता।

पिछले दिन मुलाकात में वक़्त कुछ अलग था। ये ऐसा वक़्त था जब न तो कोई चीज़ तेजी मे भी और न ही थकावट में बस, अपनी ही एक खास रफ़्तार थी जो बन गई है। यहाँ पर पैशेबंद माहौलों से तो यहीं उजागर होता नज़र आता। ये मेरे लिए आसान राह थी जो दिखने पर अपने भ्रम को थोड़ा तोड़-मरोड़ देती है। उन्ही दृश्यों से मैं इस फिसलन से भरी जगह मे घूम रहा था। जो बेरूप है, बेमोल है, बेआसरे है और बेइज्जत है। इससे पहले वो सब थी जिसे आज नकारा जा रहा है। ये सारा चक्कर जगह के बदल जाने से है।

खुरदरी दीवार के साथ रखा एक बड़ा और मजबूर शीशे को एक आदमी अपनी कमीज़ से रगड-रगडकर साफ कर रहा था। ये शीशा इतना बड़ा और मोटा था कि किसी अकेले आदमी के बस का नहीं था कि वे इसे इधर से उधर खिसला सके। ये इकलौता था जो उस दरवाज़े के सामने रखा था जो महीनों तक हिलने वाला नहीं था। इसमे छटाई-चुनाई की भी कोई जरूरत नहीं थी और न ही किसी मार की।

सभी के आंकड़े यहाँ पर आकर बिखर गए थे। ये न तो कबाड़ के रूप मे यहाँ मौज़ूद था, न ही खरीदी-बैचेगी मे था और नहीं ये नये माल के आधार पर था। फिर भी इसकी कीमत लगाना किसी को सही मायने मे गवाँरा नहीं था। बोला जाये तो क्या बोला जाये? अगर कोई इसे खरीदने चला आया तो क्या कहेगें? कबाड़ मे इसकी क्या कीमत है वे तो मालुम थी लेकिन जो खरीदने आयेगा उसके जरूरत का हिसाब लगाना किसी को नहीं आयेगा। वे शख़्स उसपर कपड़ा मारकर चमका रहा था। भले ही उसपर अनेकों लकीरें खींची थी, खुरच कर उसपर नम्बर लिखे थे। लकीरों मे कुछ नाम भी छुपे थे। कुछ-कुछ हिस्सो से वे उचला भी हुआ था।

हर वे चीज़ जिसमें कुछ नज़र आता है वे यूहीं रखी रह जाती। वे कहाँ तक जायेगी उसकोप भाँप लिया जाता। किसमे जीवन बाकि है, कौन दोबारा से साँस ले सकती है और कौन दोबारा से वहीं जा सकती है जहाँ से आई है वे समझ लिया जाता। इस सोच मे सब कुशलता लिए हैं।

एक लड़का नीले रंग की थैली मे से कुछ निकाल रहा था। उसमे ढेरों नलियाँ थी। जिनमें से खून भी टपक रहा था। पानी और खून से लथपथ वे नलियाँ बहुत भारी लग रही थी। वे लड़का उन नलियों से साफ़ और मोटी नली निकाल रहा था। ये नलियाँ थोड़ी छोटी थी। किसी मे तो इंजैक्शन भी लगे थे। कुछ में कैप थी। मगर वो खोज रहा था वे नली जो रबड़ की हो। सारी नलियाँ प्लाश्टिक की थी। उसने सारी पन्नी बाहर ही खाली कर दी थी। सबसे आखिर मे से उसने रबड़ वाली नली निकाली और उसको अपने हाथ मे पकड़ी दो लड़कियों मे फँसाकर गुलेल बना लिया। बाकि का सारा माल वापस उसने उसी पन्नी मे लाद दिया था।

एक बन्दा जो एक पंखे मे लगा हुआ था। वे उस पंखे मे से मोटर और पंखुड़ियाँ निकाल रहा था। ताकि गर्मियों का काम चल जाये। वो यहाँ - वहाँ नज़र घुमाता हुआ कहता, "अब पहले जैसा मज़ा नहीं रहा। बस, हम तो मज़ा बना लेते हैं।"

लख्मी

Tuesday, June 23, 2009

उखडते प्रगाढता का चेहरा

रंग बहुत है बस जरूरत है खुद को उन रंगो के पास पहुँचाने की, जब मिलेगा आप को अपना नया रंग।



रोशनी की गुलाम नहीं वो बन्द मुठ्ठी को भी चकमा दे देती है आप किसी भ्रम मे मत रहना वो जागती आँखो को भी धोखा दे देती है।




जमीं पर पड़े निशान मिट जाते हैं अच्छे-अच्छे जख़्म भर जाते हैं,मगर जीवन मे किसी की मौजूदगी का होना नहीं मिट सकता। वो मौजूदगी जो गायब है।ये विवाह की वेदी पर हुआ कैसा गठबंधन है। जो आत्माओ का युगो तक रिश्ता बना देता है।





राकेश

Saturday, June 13, 2009

नाम है चाँद सिनेमा

ज़िन्दगी आज चाँद पर पहुँच गई है। मगर फिर भी हम ज़मीन को भुला नहीं पाये। क्योंकि ज़मी की ये मिट्टी हमें अपनी तरफ खींचती है। कुछ भी हो आज लोगों ने अपने आसपास में ही हर जरूरत और जीने लायक सारे ऐश-आराम तैयार कर लिये हैं। जिने वो कभी कल्पनाओं में ही देखा करते थे। जिस चाँद पर आज जीवन के चिन्ह और नुस्खे खोजे जा रहे हैं। वो कभी एक सपना था। जिसे साकार होने में वक़्त लगेगा। कल का क्या भरोसा कल क्या हो? कल को देखना हमारे बस में नहीं तो क्या हुआ। इस कल के सवाल से तो सिर्फ वक़्त ही पर्दा उठा सकता है।

अपना आज तो हम खुद बना सकते हैं। ये आज को बनाने वाली कोशिश ही शायद हमारे कल की तस्वीर बना दे।

इसलिये सरज़मी पर बने इस चाँद के करीब रह कर हम खुद को तसल्ली दे लेते हैं। जी हाँ, इस चाँद का पूरा नाम है चाँद सिनेमा। जो दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में स्थित है। जहाँ पर त्रिलोकपुरी के ही क्या इस के आजु-बाजू बसे लोग बड़े शौक से यहाँ फिल्मों को देखने आते हैं। हर दिन चार शोह। दिखाकर चाँद सिनेमा बिना थके अगले दिन की तैयारी में जुट जाता है। वो एक सिलसिलेवार पेशकश लोगों के दरमियाँ रखने की कोशिश करता है। चाँद सिनेमा ईंट-पत्थरों से सुन्दर और लुभानी बिल्डिंग ही नहीं है बल्की ये वो जगह है जहाँ नैतिक और अनैतिक परीवेशों का मिलन होता है।

इस जगह में हर कोई एक तलाश लेकर आता है और एक नया आंनद को पाकर फिर अगले ही क्षण किसी और आनंद की तलाश में उतर जाता है। जो शख़्स अपने जीवन के प्रगाढ़ता को बनाये रखने के लिये यहाँ आते हैं। वे ये जानते हैं की महत्वाकांक्षा को अहसास तले ही पाला जा सकता है । बिना अहसास के महत्वाकांक्षा अधूरी है और महत्वाकांक्षा के बिना अहसास अधूरा है। ये वैसा ही है जैसे रेशम का कीड़ा पेड की पत्तियाँ खाकर रेशम उगलता है। वो जगह निरंतर अपने मंथनो में व्यस्त रहती। सिनेमा हॉल के पर्दे पर लोग अपनी काम की ज़िन्दगी मे खोई हुई भूमिकाओं और अदाकारिओ को फिल्मी पर्दे पर पूरा होते देख फूले नहीं समाते थे। लोग दिनभर की अपनी परिवृत्ति को यहाँ लाकर छोड दिया करते थे।

हर आदमी में एक अभिनेता छुपा है बस, जरूरत है तो उसे तलाशने की। जो दैनिक जीवन को एक तरह का सर्जिवन प्रदान करता है। किसी तरह समाज के चंगुलो से बाहर निकलकर अपने शरीर को कुण्ड रूपी माहौल में डुबा देने की इच्छा को पूरा करना होता था।

ये मुकम्बल होता था लोगों के पेचिदा हालातों की जकड़न से। जो निराशावादी प्रेणाओ से जुदा होकर अपने में ज्योतिमान उजाला लिये ज़िन्दगी के अन्धेरों को दूर कर देना चाहती थी। जगह-जगह स्थित सिनेमाघरों की ये पहलकदमी रही की कार्यक्रम के साथ कलाकारों के माध्यम से लोगों के मिलने की वजह बनाई जा सके। वो कोना जो शायद देश , घर , चीजें, परीवार के अन्य विभाजनों से अलग अविभाजित रहा। जिसमें एक-दूसरे को चाहने और पाने की क्षमता बनी रही। वो अभी ज़िन्दा है। सदाबहार है। जिसमें लोगों की महानता उनके बड़कपन मे बदल गई। फिल्मी जगत जो आम जीवन के रू-ब-रू होने का बहुत बड़ा फ्रेम है। जिसमें नायक-नायिका के जरीये कहानी की बहुत सी अभिव्यक्तियों और चरित्रों को उभारा जाता है। जो वास्तविक तौर से समाज का मनोरंजन नहीं बल्की समाज के ही समुहदाय मे जी रहे लोगों का ही एक आईना है जिसमें इंसान की अंनगिनत छवियाँ विराजमान है।

फिल्में लोगों को क्यों भाती है? इस बात का पता उनके विचलित मन की दशा का अन्दाजा लगाने से पता चलता है। जिसमें हर श्रेणी का के लोग आते है। वो फिर चाहे बच्चे हो या जवान और बुर्जुग सब को मन की कामनाओ का आनंद उठाने का अधिकार है।

ज़िन्दगी के असल सत्य से दूर और क्ररू सच्चाइयों से परे रहकर जीवनयापन करने वाले लड़कों का हुज़ुम चौक के नुक्कड़ पर रोज़ाना जुड़ा करता था।

तब कम उर्म के लड़कों को किसी फिल्म या घटना से अपरिचित रखा जाता था। सब अपने बच्चों को अच्छा पढ़ाना और कुछ बनाने कि जिज्ञासा लेकर अपने घर की दहलीज़ पर बैठे ख़्यालों में वक़्त के टुकड़ों को सियां करते थे। पर वो सब लोग इस बात से अन्जान रहते थे की उनके बच्चे भी चाँद सिनेमाघर की चौखट को एक बार तो जरूर चूमना चाहते है। यकिनन ये इरादा बूरा नहीं था पर मुफलसी के रहते हर कोई पैसे ख़र्च करने के बारे मे दस बार सोचता था। आदनी का सब पर एक ही ज़रिया था मजदूरी जो पसीने का मूल तक नहीं उतार पाती थी जिसमें सिर्फ घर का गुजारा ही संम्भव हो पाता था।

करीब बीस साल पहले दिल्ली का कुछ और ही मंजर हुआ करता था। जिसमें शहर, बस्तियाँ, बाज़ारों और खासी जगहों का नक्शा भाविष्ये के मजबूत पैमाने पर आँका गया था। जात-पात और ऊँच-नीच से लैस उस जमाने में कई अजीबो-गरीब धारणाओं में पल रही इच्छाओं को कहीं किसी कोने में अपने से सींचा जा रहा था।

दूसरी तरफ नाबालिक लड़के-लड़कियों को अपनी मन-मर्जी करने का कोई हक नहीं होता था। तब विज्ञापन और कई सूचनाओं के माध्यमों को आम जीवनयापन करने वाले लोगों एक-दूसरे पर प्रतिबन्द लगा कर रखते थे।

जो अपने -अपने बच्चों को अपने रिती-रिवाज़ों में बाँधे रखने की शाजिश जैसा ही था। कोई ये नहीं चाहता था की उसका बच्चा घर से बाहर किसी और जगह में बसी अवधारणाओ का शिकार हो। तब गलियाँ इतनी छोटी नहीं हुआ करती थी जितनी आज है। हर किसी का अपना आंगन हुआ करता था। सब के मुँह पर किसी न किसी फिल्म और नाटक का जिक्र रहता था।

रोजाना काम से भरी थकावट से निज़ात पाकर शरीर को आरामदय बनाकर सिनेमा घरों की चर्चा हुआ करती। दिल्ली के कई बाँटे गए इलाकों में सिनेमाघरों का नशा चढ़ा हुआ था। सब अपने परिजनों को दूर -दूर तक ये संदेशा दे आते थे की बच्चों को सिनेमा घर न भेजें वे बिगड़ जायेगें। माँ-बाप वास्तविक ज़िन्दगी में पल रही कल्पना परीर्चित नहीं थे। फिर भी सब पूरी तरह से एक नई नस्ल पर विरासतों की मोहर लगा दी जा चूकी थी। मगर जुगनूओं की टिम-टिमाती रोशनिओ को भला वो काला अन्धेरा कब तक छुपाये रहता? किसी को क्या मालूम था की वक़्त उनके साथ क्या कारिस्तानी करने वाला है। मौत ने सब के लिये एक लाक्षागृह बना रखा है जिसकी सिमाओं में दाखिल होते ही मन बैचेन हो जाता है। जैसे कोई मशाल लिये हमारी तरफ आ रहा है और हम भाग रहे हैं।

उस जमाने में किसी न किसी बहाने कभी अपने घर में तो कभी किसी और के घर में जाकर केबल टीवी का मज़ा लिया करते थे। तेजी से बदल रहे दौर में केवल टीवी द्वारा फैलाई गई होड़ को लोगों ने गलत साबित करने की कोशिश की थी।

सन, 1980 के अन्तराल में कई अफ़वाहों को इस बदलते जमाने का एक नया आईना बतलाया गया। जिसमें नज़र आने वाला पड़ाव बदनामी के अन्धेरों में छुपा दिया गया। वो समय इतिहास की चट्टानों से टकराने की क्षमता रखता था। मगर समाजवादि परम्पराओं का बीता काल लोगों के दिलो-दिमाग पर हावी था। ज़िन्दगी का उजाला हर किमत पर अन्धेरो की कालकोठरी से बाहर आने को ऊतारू था। अगर आज कहा जाये की फिल्म के आने से पहले कुछ नहीं था जो आज है तो ये जीवन के खिलाफ होगा। फिल्म तो प्रभावशाली और अतिशयोक़्ति लेकर फैलने वाली जिज्ञासा की उपज है। इसे भला हम कैसे नकार सकते हैं। चाँद सिनेमा का भी इसी तरह का सफ़र है जो आम दिनों को रोजाना एक अधभूत अभिव्यक़्तियों में रूपान्तर कर देता है। जो सड़क से गुज़रते शख़्सों के दिलों में आरमान जगा देता है। अपनी ज़िन्दगी के प्रति निष्ठावान लोग जैसे कई दार्शनिक प्रस्तूतियाँ बनाते जा रहे। अनंत संस्कृति में जीते हुए भी हर दिन अपने वज़ूद का नया दिन बनाते जा रहे हैं।

राकेश

Tuesday, May 26, 2009

समय का खुक्ख होना क्या है?

किसी जगह का बनना, उसका चलना और उसका मिटना। इसके अलावा भी किसी जगह को किस वज़ह से अपने में दोहराया जाता है? जगह का चुप होना, उसका फैलाव होना होता है या चुप्पी ठहराव की दास्ताँ बताती है? समय का खुक्ख होना क्या है?

पिछले दिनों जिस जगह से मेरा वास्ता रहा वो जगह किसी भी मायने मे उतरने से कभी नहीं चूकती। वे रहने की जगह भी है, खेलने की भी, कामग़ार समाज के अन्दर जीने वाली थी और एक ऐसी जगह के रूप मे भी वो समा जाती है जहाँ पर रहना, जमना और किसी से नाज़ुक रिश्ते बनाकर चले जाना और फिर दोबारा से नई जगहें तलाशना। ये जगह खुद मे कई ऐसे हमराज़ अपने मे समाये जीती है। वक़्त के बितने और कहीं छुप जाने से क्या होता?, हर रोज़ से आज किसी ग़ेर वक़्त मे इस जगह से मिला।

आज जैसे किसी के पास कुछ बचा ही नहीं है। खाली हो गया है सब। या हमें क्या मालुम कि शायद जिनसे हम मिले हैं, वे इस ख़ुद के खुक्ख होने को जीवन मानते हैं।

आज इस जगह पर लोगों से बात करने के बाद में ऐसा व्यतित हुआ जैसे चाहें किसी भी जगह को बनाने के गुण लिए लोग चले आते हो लेकिन इसके अलावा कुछ और भी है जो बताया जाता है। वे क्या है? उसी की तलाश में रिश्ते भटकते हैं और ठिकाने उजड़ते हैं। पर उस छोर तक पहुँचने मे कुछ कसर बाकि रह ही जाती है हर बार।

यहाँ सवाल का बवाल ये नहीं है कि ये जगह शायद कुछ दिनों के बाद में यहाँ पर रहेगी नहीं। ये बात किसी के मन में हो या न हो, मगर उससे पहले दिमाग में इस जगह के वे पल दोहराने की कोशिश है जो याद रखें जायेगें। वे क्या होगा जिससे ये जगह याद रह जायेगी? वे कौन से दृश्य होगें जिससे यहाँ के हर वक़्त को तस्वीरों में उतारा जायेगा? और सबसे बड़ी बात ये की यहाँ पर ऐसा क्या है जिसे छोड़कर जाया जायेगा? जिससे इस जगह को महीनो तक दिलों में यूहीं का यूही रखा जा सकेगा? ये सब कुछ बेकार की बातें हैं। भला ऐसा भी कभी होता है कि कोई किसी जगह से उठ खड़ा हो जाये तो उसकी महक उस शख़्स मे नहीं रहती? या किसी को उसी की बनाई जगह से उठा दिया जाये तो वे कभी उस तरफ मुड़कर भी नहीं देखेगा? ये कभी नहीं होता। दरअसल बात ये भी नहीं है, सारा माज़रा तो ये ही की इस जगह की महक क्या है जो यहाँ के होने का अहसास भर पायेगी? ये महक यहाँ इस जगह की है या लोगों की है? यहाँ के बासिदों की है जो यहाँ रहते नहीं लेकिन आते-जाते हैं? या उनकी है जो यहाँ पर कुछ बनाते हैं। जगह की भूमिका हो या न हो लेकिन कई हाथ पसारे लोगों ने इसे भूमिकृत बना दिया है। इसलिए ये जगह बोल सकती है, घूम सकती है, भाग सकती है, बस सकती है और बसा भी सकती है। भले ही इसके हाथ-पाँव हो या न हो।

एक शख़्स से बात करने पर लगा जैसे कुछ चीज़ें और बातें फब्ती की भांति होती हैं। जिसे भुलाना पड़ता है। याद रखने की कोई जरूरत नहीं होती। वो ख़ुद से पूछ पाता है कि याद रखने से क्या ज़िन्दगी वैसी नहीं रहेगी जैसी चल रही है? या याद रखने से कुछ नया जुड़ता जायेगा?

ऐसे ही कुछ सवाल रोज़ अपने से पूछ पाते हैं। मैं यहाँ पर कई दिनों से आ-जा रहा हूँ, लेकिन इतने दिनों के बाद भी ये समझना मुश्किल है कि यहाँ के कोन से छोर को लोग अपने नजदीक मानते हैं। इस जगह के कई छोर हैं। जो ख़ुद से बनाये गए हैं। ये वे नहीं है जो दिखते हैं या वे नहीं है जिनसे आया-जाया जाता है। ये वे हैं जिन्हे एक-दूसरे के लिए घोषित किया गया है। जहाँ एक-दूसरे मे शामिल होने की ललक उभरती है। मैंने उनसे कुछ पूछने की कोशिश की, यही के क्या यहाँ पर सबसे पुराने आप हैं? और ये काम यहाँ कितना पुराना है?

वे बोले, "यहाँ पर ये काम या कोई और काम कितना पुराना है वे छोड़ों, पहले ये पूछों की ये जगह है किस की? हमारी सुनो तो हम बस, इतना जानते हैं की ये जगह किसी की थी ही नहीं। न तो उसकी जो हमें यहाँ पर लाया, न उसकी जिसने हमें यहाँ पर बैठाया, न ही उसकी जिसने ये जगह बनाई-बसाई और न ही उसकी होगी जो हमें यहाँ से भगायेगा और तो और ये जगह तो हमारी भी नहीं है। असीलियत बतायें तो ये जगह उनकी हैं जो यहाँ पर बिना बजाये अपनी चीज़ें रख या बैच जाता है। ये जगह उनकी है जो एक-दूसरे के आसरे यहाँ पर रह जाते हैं। हम मानते हैं की हम तो यहाँ इस जगह के उपयोगकर्ता हैं। अब तक इस जगह ने सबको उपयोग करना अच्छे तरह से सिखा दिया हैं।"

गोदाम के बाहर एक शख़्स नींबू पानी की रेहड़ी लगाकर खड़ा था उसने कहा, "भाइए लोग यहाँ कबके भूल चुकें हैं कि इस जगह पर किसका तख़्ता ठुका था। ये भी गवाँ बैठे हैं हमें यहाँ पर ठिकाना किसी ने क्यों दिया। जब तक हम यहाँ पर आवाराओं की तरह नहीं फिरेगें तब तक ये फलेगी भी नहीं। यहीं का यहीं पर रह जायेगा। इस जगह के इस कब्रिस्तान को बड़े होते वक़्त नहीं लगेगा।"

एक शख़्स अपने एक हाथ की उंगलियों में एक छोटा सा गुलाब का फूल फसायें पूरे इलाके में घूम रहा था। कभी-कभी किसी कोने में खड़ा होकर किसी के पास जाकर पूछने लगता तो कभी किसी कोने में अकेला ही खड़ा हो जाता। उससे ये पूछने में डर लग रहा था कि वे यहाँ पर कैसे आया। बड़ा तेज़ था उसके चेहरे में। वे बोला, "हमारी ज़िन्दगी जब गठ्ठरों मे गुज़र गई तब पूछ रहे हो कि यहाँ पर कैसे? हम तो यहीं के हैं। मान लो कि हमारी तो पैदाइश ही यहीं की है। कभी-कभी नराज़गी चलती है यहाँ से लेकिन ज़्यादा दिन तक दूरी रहती नहीं हैं ये खींच ही लाती है मेरे को यहाँ। एक बड़ी गुप बात बताऊँ, ये अन्दर की बात है ये जगह मेरे को साँस देती है। इस जगह में मेरे कई बार जान बचाई है। आज भी बचा रही है। मुझे इतना याद है कि मुझे कोई अपने कांधों पर धर कर लाया था। मैं बहुत नशे में था। आज भी हूँ। बाकि सब भूल गया हूँ।"

मुर्गे का मीठ बैचने वाले एक शख़्स जो साथ वाले अंडे के पराठें बैचने वाले से 19 अंडों की मारामारी के कारण झगड़ रहा था। लगभग 20 मिनट की जबरदस्त चिल्लाचिल्ली के बाद में वो मामला सुलझा। असल में पिछले दिन ये नहीं आया था इसकी जगह पर इसका भांजा आया था। वो लोगों से पिछले माल के बकाया पैसे ले गया था। जिसे भांजा मानने से ये शख़्स इनकार कर रहा था। ये कह रहा था कि मेरा तो कोई भांजा ही नहीं है, अंडे के पराठें वाला कह रहा था कि भईए वे ख़ुद ही कह रहा था तभी तो हमने दिये उसको पैसे।

ये गर्मागर्मी जोरों पर रही। ये कहता, "मुल्ला जी ऐसे कैसे आप किसी को भी पैसे दे दोगें। वे कैसे भांजा हो गया मेरा। क्या सकल-सूरत मिलती थी उससे या वे असल में मेरा नाम ले रिया था?"
मुल्ला जी बोले, "ये कहाँ खड़ा है वे भूल गया है तू? यहाँ कोई किसी की सकल से नहीं मिलता लेकिन सब एक दूसरे के रिश्तेदार हैं। पता लगता है तुझे किसी को देखकर। जब वे आ जायेगा भइए अब तो तभी होगा फैसला।"

ये कुछ कह नहीं पाया। बस, इधर से उधर नज़रें घुमाने लगा। फिर दोबारा आया अपनी साइकिल के पास और जमीन पर टाट बिछाकर मुर्गे काटने लगा।

गोदाम के माल से एक टेम्पों कसाकस भर दिया गया था। उसको बाँधने के बाद में एक बेहद पतला सा लड़का टेम्पों को दूर से देखने लगा। साथ में खड़े नींबू पानी बैचने वाले से दो रुपये का नींबू का पानी लिया और चुश्की मारते हुए ऊपर की ओर देखने लगा। उससे ये सवाल पूछने की हिमाकत कर बैठा मैं। वे जैसे अपने हर कदम को रखने पर बेहद उत्कट था। भरपूर इंद्रइयों से जीने वाला। वे अपने तावनुसार होकर बोला, "क्या बोल रहा है भाई? ये जगह मैंने बनाई है। कौन जानता था इस जगह को बता सकते हो? नहीं, ये कैसे बनी ये बताऊँ? जब तक यहाँ से धड़ाधड़ माल यूहीं हमारे हाथों से भरकर जाता रहेगा तब तक ये जब चलती रहेगी। मैंने इस जगह में अपना बहुत वक़्त दिया है। मेरा भाई भी यहीं का है। यहाँ से सारा माल मेरे ही हाथों की मेहनत का फल है। कैसे भर जाना है माल ये मुझसे बेहतर कौन जानता है। ये मैंने बनाई है जगह। मैं हूँ यहाँ का सबसे पहला आदमी।"


इस जगह का पूर्वाभ्यास लेने के समान यहाँ पर बहुत कुछ था और कुछ भी नहीं था। लेकिन ऐसे कई वाक्या व दृश्य हैं जिनसे ये जान लेना बेहद मुश्किल है कि प्रदर्शन के पहले क्या होने वाला है? इन सभी में भी कोई पूर्वाभ्यास लेने की भी जरूरत नहीं थी और न ही इस जगह के हर पहलू को देखने से पहले का ये ज्ञान था। एक माहौल जैसे हर दूसरे माहौल के आश्रित है। वैसे ही जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। कोई किसी को खोज़ रहा है, जिसे खोज रहा है वे कोई नहीं है लेकिन वो "कोई" सब मे है। यही सबका दक्ष है। जिसे सींच लिया गया है यहाँ।

लख्मी

Thursday, April 30, 2009

सारे आलम को तरोताज़ा कर देती है

उस उपजाऊ रहन-सहन को लेकर किसी की दिनचर्या रास्तों से होकर निकल जाती।

जिसमें लोगों की भागीदारी उनके बसने के बाद के सवालो मे जीती हैं कि जीवन कैसे और कोई भी परिस्थिती में, अपने आपको बनाये रखने की जिद्द को मुस्कुराकर ज़िन्दा रखता है? ये धीरे-धीरे समझ में आने लगता है। कहीं-कहीं पर पानी से भरे गढ्ढो, ऊँची-नीची मिट्टी की सतहों पर जब पाँव पड़ते हैं तो वादिओं का दर्शन हो गया है ऐसा महसूस होता है।

हवा जैसे सारे आलम को तरोताज़ा कर देती है। नीले आसमान के नीचे खुली दरोंदिवारों में मटरगस्ती करते बच्चों का दस्ता मेरी ओर आता है। उनके हाथें में मिट्टी की गाड़ियाँ और मिट्टी के बर्तन हैं। वो उन मिट्टी की सारी चीज़ों को असली का मानकर चलाते हैं। मासूम बच्चों के चेहरे में खुदा की छवि नज़र आती है। इसलिये उनको देख कर बड़ा शुकून सा मिलता है। ऐसा अभी तक न जाने कितने मुँह से मैं सुनता आया हूँ इसलिए वही शुकून मुझे भी मिला।

पानी से भरे चौराहे के गढ्ढों को आने-जाने वाले लोग लाँघ कर जाते। मैं वहीं दोपहर करीब साढ़े तीन बजे तख़्त पर अपने दोस्त सूरज के साथ बैठा बच्चों के खेल देख रहा था। कुछ मिनट ही बीते थे की न जाने पीछे से कोई जनाब आकर मेरे काँधो को जोर से मसककर बोले, "बताओ कौन?”

चौंककर मैं पलटा। ये भी कोई बात हुई आवाज़ की बुनियाद पर भला कौन किसी नहीं पहचान सकता है? आवाज़ तो सब बयाँ कर देती है। तो मुझे क्या तकलीफ़ होती।
"भाई मोहतरम ही होंगे।"

भाई मोहतरम, सुर्ख गालों पर हाथ फिराकर अपने कुरते को झिटक कर बोले, "इस बार फिर पहचान गए तुम को आवाज़ की बड़ी परख है।"

"न ऐसा कुछ नहीं पर तुम्हे पहचान ने का फोर्मुला मेरे पास है। तुम्हारा अंदाज मेरे दिमाग में ज्यों-का-त्यों छप गया है। खैर, छोड़ो ये बेकार की बातें ये बताओ किसी लिए याद किया?”

"ये लो कागज और कलम"
"इसे क्या मेरे सिर पे रखोगें?”

मुस्कुराके मोहतरम भाई ने मेरी तरफ फरमाया, "नहीं जनाब छोटे भाई जो ऐटा में एक यूनिर्वसटी में पढ़ रहे हैं उन्हे मनीऑडर भेजना है।"

"ओह ये काम था।"

सूरज ने तभी न जाने क्यों एक तड़कता-भडकता शेर सुनाया।
"न पूछ के क्या हाल है हमारा,
न पूछ के क्या हाल है हमारा।
तुझे मिला बीच संमदर और हमें मिला किनारा।
तेरे चक्कर में मैं रह गया कवाँरा।"

ये सच मे किसी को नहीं मालुम था कि उसने ये क्यों सुनाया था मगर ये शेर सुनकर हम सब उसपर वाह-वाह करते हुए सवार हो गए। सलीम भाई जो चॉक पर ही अपने हेयर कटींग का खोका लगाते हैं उनका खोका फिल्म के बड़े से बड़े ऐक्टरों के पोस्टरों से सजा पड़ा था। आइने के साथ कागज के फूलों वाला गुलदस्ता भी उनकी दुकान को गुलज़ार कर रहा था।

सलीम भाई भी अपने पज़ामे का नाड़ा कसते हुए शेरो-शायरी के खिचड़ी में छोंका लगाने चले आये। खाली बैठने से कुछ हाथ न लगेगा यहाँ थोड़ा मुफ़्त में मज़ा मिल जायेगा। वक़्त तो काटना ही था।

तपाक से वो आकर बोले, "अर्ज है कि
क्या होगा कल न तुझे पता न मुझे ख़बर है।
क्या होगा कल न तुझे पता न मुझे ख़बर है
तेरे लिए इस दिल में मगर जगह बेश़ूमार है।
मेरी दुकान में भी कभी आ जाना कैटरीना
यहाँ तेरा ही इंतजार है।"


शेर कहकर उन्होनें अपनी बनीयान में हाथ डालकर जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया। तालियाँ बजनी शुरू हुई। सब अपने थे और कोई अपना नहीं था। अपने काम को से कभी मन उब जाने के कारण ये सब इक्ट्टा होकर मंडली सी जोड़ लेते।

चूल्हे का धुँआ आँख में चला आया। पलके झपने लगी तो आँखों को मसलना शुरू कर दिया। दोहपरी मे कौन चूल्हा जला रहा था ये मुझे अटपटा लगा क्योंकि कभी मैनें ऐसा नहीं सोचा था। आँखों एक हाथ से मसलता और उस के साथ खिसियाकर करता ये कोई वक़्त है आग जलाने का सारा धुँआ मेरी आँखों में चला गया।

मुझे तो जरा सा धुँआ ही लगा था जिसपर मुझे गुस्सा आया। जब कभी हालात हमारे मुताबिक नहीं होते तो अक्सर ऐसा ही होता है। मगर जगह की बौद्धिकता वो उस कल्पना को सामने लाकर रख देती है जिसे हमारा मन खोज़ता रहता है। कभी ये खोजना ही हमें हमारी असली छवि से मिलवा देता है।

राकेश

गोदाम में हैंडफोन..

आज समय कल्पनाओ के पंख लगाकर उड़ रहा था। आँख के अंदर हवा में घुले धूल के कण घुस जाते। फेरी मार कर आने वाले सभी लोग अपना माल चुनकर उसे अलग-अलग व्यवस्थित कर रहे थे। निरंतर आवाज़ें बेखौफ उस जगह के चप्पे-चप्पे से उठ कर आ रही थी। किसी ने एक कदम समीप आकर पूछा " आप कौन हो?”

उसके सुर्ख चेहरे पर मटमेले निशान पड़े थे। माथा काले ग्रीस से सना हुआ था। वो आँखों में ढेरों सवाल लेकर खड़ा था। उसके शरीर को देखकर डर सा लग रहा था जैसे अजीब सा किस्सा घट गया हो। वो काली पतलून पहने हुए था और ऊपर के शरीर पर कुछ भी नहीं पहना था। उसकी छाती पर रीछ की तरह बड़े-बड़े बाल उगे हुए थे। हाथों मे सरिये की मुड़ी हुई नौंक वाला कोई औज़ार था। जैसे ही उस की शारीरिक तरंगो ने मुझे अपनी तरफ खिचना शुरू किया कोई अधूरा सा ख़्याल पूरा होने लगा। इस ख़्याल की उर्वकता ने मुझे कई आईनों के आगे लाकर खड़ा कर दिया। उसके देखने को मैं खुदा की बंदगी समझकर मौन अवस्था खड़ा रहा।

उसके सवाल को सवाल ही समझ कर मैंने इस मौन अवस्था से बाहर आकर उसे जबाब देने की कोशिश की पर उससे पहले मेरे मन में फिर से एक ख़्याल करवटें लेने लगा की अगर मैं उसको सच्चाई बता दूँगा तो शायद ये मुझपर भड़क जाये या मुझपर शक़ करने लगे।

हो सकता है कि वो मुझे गोदाम से धक्के देकर निकाल बाहर कर दें या ये भी हो सकता की वो मेरे साथ हाथापाई पर उतर आये। इस तरह से मेरे चारों तरफ उलझन भरे मुस्किलात आने लगे और डर साया बन कर मेरी सोच पर हावी होने लगा।

मैं तसल्ली पूर्वक उस शख़्स को अधूरा सा जबाव देकर आगे बड़ा। मुझे पता था की वो मेरे जबाव से संतुष्ट नहीं हुआ है। मगर फिर भी खुद को वहाँ से ले कर चला आया।
मेरे कुछ कदमों के चलते ही अब वो चेहरा मेरी आँखों से गायब हो चुका था पर उससे मिलने का असर अभी कुछ-कुछ बाकी बचा था। चन्द कदमों को रखने के बाद अपने चेहरे पर थोड़ी खिलखिलाहट लाकर रास्ते पर पड़े कागज़ के खाली पैकेट को देखता चलता गया।

मेरे सामने कुर्सी थी जिसे देखकर लग रहा था कि वो अपने दिनों के अन्तिम पड़ाव में जी रही है। उस पर जो साहब पाल्ती मारकर बैठे थे। उन्हे देखकर लग रहा था की कोई तन्दूर पर बैठा हो। उन साहब के आगे-पीछे हिलने से कुर्सी की चर्माराती आवाज़ आती। जैसे कुर्सी कोई गाना सा गा रही हो। कागजों और प्लासटिक के मोटे-मोटे गठ्ठरों को एक के ऊपर एक करके रखा हुआ था।

गोदाम का तामझाम समेटा जा रहा था। सोचा इस कुर्सी पर बैठे नौजवान से कुछ पूँछू पर हिम्मत नहीं कर पा रहा था। मेरे दिंमाग मे तो पहले सें ही हुए सवालों की मोहर लग चूकी थी। मैं फिर भी खुद को तसल्ली देने लगा। एक कोशिश के बाद खुद को विश्वास के घेरे में लेकर कुर्सी पर बैठे नौजावन से मैनें खड़े-खड़े पूछा, "जरा सुनिये आप का क्या नाम है?”

उसने मेरी परछाई को अपने शरीर पर पड़ता देखकर मेरी तरफ सिर उठाया फिर वापस कर लिया, "जरा सुनिये भाई साहब, मैं आप से ही कुछ पूछ रहा हूँ"
तीसरी बार फिर मैंने उन्हे पुकारा, "जरा सुन लिजिये"

उसके कानों पर जूं तक न रेगीं। कमाल है। जब मैनें गर्दन को जरा घुमाकर नीचे देखा तो। उसने अपनी हथेलियों के बीच में एक वॉल्कमैन दबा रखा था। जिसका हैंडफोन उसके दोंनो कनपट्टियों पर लगा था।

गोदाम मे जहाँ-तहाँ सें दौड़-दौड़ कर आवाजें हम तक आ रही थी जिसकी गूंजों से सारा आलम किसी मेले से क्या कम था जो ये साहब इतनी जगहों से आते फिल्मी गानों और शेहनाइयों के बजते शोर में गोदाम में हैंडफोन लगाकर बैठे थे।

इस शौर ने मुझे अजीब सी दुनिया दे दी जिसमें मुझे लगता की मैं किसी को नहीं दिख रहा किसी ऊँचाई पर कायम हूँ। जहाँ चीजें कभी दूर दिखती तो कभी नज़दीक दिखती है। हवा में उडती टिड्डियों और मक्खियों की भनभनाती आवाज़ भी अब मेरे कान साफ-साफ सुन सकते थे।

सोचा की इन सारी आव़ाज़ों को एक धागे में पीरो लूँ। लेकिन हक़ीकत का बोध बड़ा तकलीफ दह होता है। इस हक़ीकत को क्या समझूँ? जो न मुकम्मल है न अधूरी फिर जो कभी-कभी इतना जोर से चुभती है की दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाता है। गोदाम में जैसे चीजें अपने आपको तैयार कर रही थी। सारी तोड़-मारोड़ के बाद खामोशी से वक़्त की हर चुनौती का जबाब देती। इतनी करूणा बहुत कम देखने को मिलती है। कागजों के चट्टो को वो हाथ कस-कस कर बाँधते फिर दूसरे ही पल बाजू में रखी एक साथ मिली चीजों को छाटने लगतें।

ये देखना बड़ा ही शुकून भरा होता जब टीवी पर चलते फिल्मी डायलॉगबाज़ी और बोलीवुड के सितारों की जायके दार ख़बरो मे जीते हुए वक़्त जैसे पतली गली से होकर निकल जाता पर ऐसे में उन साहब का ध्यान तो अपने वॉकमैन पर चलते गानों में था।दोनो स्पीकरों वो बडे मज़े से सुन रहा था। पास में से आती कोई अज़ीब सी गन्द जो हवा मे अपने साथ मीठा सा स्वाद लेकर आती। बाँस पर पड़ी छन्नीदार चादर से चौखट को ढक रखा था। जो अन्दर-बहार हवा को बेरोक-टोक आने-जाने देता।

आज गोदाम अपने एक और अन्दाज को देखा रहा था जिसमें इश्क नर्म-नर्म अहसासों से गोदाम में सभी काम करने वालों को सींच रहा था। शायद आज इनके लिए बिना इस माहौल के काम करना मुश्किल हो। शरीर और मन को आराम देने वाली महफिलों में मन करता है की यहाँ ठहर जाऊँ। मैं तो यहाँ का रहने वाला नहीं तो भला ठहरने का क्या मतलब पर खानाबदोशो की का तो यही अदा होती है। जहाँ मन किया वहाँ ढेरा डाल लिया और फिर लम्हों को एक नई जगह में डाल कर नया चेहरा बना कर जीना शुरू किया। मगर मैं खानाबदोश भी नहीं हूँ हाँ एक फ़कीर जो जगह-जगह अपने लिए कुछ माँग लेता है और बदले में दूआएँ दे देता है। पिछले जन्मों के कर्मकाण्डो के कारण मैं ये भी न बन सका। पता नहीं किस करनी से मैं सब मिठासो से वंचित रहा।

ये भी नहीं हूँ जो जीवन मे तमाशाही मंज़र बनाकर लोगा मन जीत लेता है। मैं कुछ-कुछ मिला सा हूँ सब में से जरा-जरा सा लेकर बना हूँ। वैसे कुछ मुकम्मल नहीं है। फिर भी मान लेता हूँ की जो हैं वही सब कुछ नहीं हैं मगर फिर भी वही सब कुछ है।

राकेश

लव्ज़ों के अध्याय...

उनकी कही हर बात उनके दिल के बेहद करीब की है। वे उन्हे बताते हुए कभी भी थकते नहीं हैं। उनका हर लव्ज़ सोचा-विचारा महसूस होता है। हाँ कहते-कहते कभी वे इतना खो जाते हैं की वे ये तक भूल जाते हैं की अब वे क्या कहने जा रहे हैं। अपनी बातों के पिंजरे में वो कभी खुद ही फँस जाते हैं तो कभी सुनने वालों को फाँस लेते हैं।

यहाँ पर काफी लोग हैं जो उनके इस दिवानेपन के कायल हैं। तभी तो न दिन, न रात बस उनके सामने धूनीरमाए बैठे रहते हैं। सोचते है कि क्या पता कब वो बात निकल जाए जिनसे उनका कोई न कोई सम्बंध जरूर है। उसी के इंतजार में सभी अपने होठों को दबाये उनके हर लव्ज़ को सुनते हैं।

कोई चाहें जानता हो या न जानता हो कि वे यहाँ पर कैसे आए? खाली यही जानते थे कि वो ज़िन्दगी को और उनकी घटनाओं को बेहद करीब से देख चुके हैं। ये उनकी बातों से पता चलता होगा।

“मुझे थोड़ी नफ़रत है इस जगह से। इसने मुझे इतने सारे रास्ते दिए हैं अन्दर दाखिल होने के कि मैं यहाँ से बाहर का रास्ता भूला चुका हूँ। जब भी सोचता हूँ यहाँ से खिसकने की तभी यहाँ पर ज़्यादा रूकने का मन करता है। एक बार मेरे रिश्तेदार ने यहाँ पर मेरे सामने बैठकर मुझसे पूछा, “खालू तुम ज़िन्दा हो? सच बताना, तुम्हे लगता नहीं है कि तुम यहाँ पर ज़िन्दा नहीं हो? बताओ खालू।"

और वो ये वाहीयात सवाल करके वो हँसने भी लगा। पहले तो मुझे सभी की तरह उसके लव्ज़ बहुत ही बेहुदा लगे। हर शब्द उसकी हँसी की चादर में लिपटकर और भी नौंचने वाला लग रहा था। मैं सोच रहा था कि इस रिश्तेदारी का क्या सारा सिला मेरे ही नसीब के रास्ते होकर गुजरेगा। मैं उसे देखते हुए जब उसकी तरफ में झुका तो तब मुझे अहसास हुआ की ये वो चाहें किसी भी भाव से पूछ रहा हो मगर उसका मतलब मेरा दिल दुखाने का नहीं था। वो तो इस जगह के बारे में मुझसे पूछना चाह रहा था। मगर मैं छोटा सा आदमी इस जगह की क्या बातें बतलाता। मैंने खाली उसके सवाल का जवाब दिया न की उसके सवाल के पीछे छुपे उसके उस अहसास का जो वे यहाँ पर महसूस कर रहा था। वो मुझपर नज़र गढ़ाये था और मैं उसपर। थोड़ी देर तक मैं सोचता रहा की क्या कहूँ? मगर कुछ देर की चुप्पी के बाद में मैंने जवाब दे ही डाला।

मैं ज़िन्दा हूँ या मैं ज़िन्दा कैसे हूँ इसका मुझपर कोई पुख़्ता जवाब तो नहीं है मगर हाँ कभी-कभी मरने का खौफ़ ही मुझे ज़िन्दा रहने का अहसास करवाता है। दिन में हो, हफ़्ते में हो या सालों में मगर जब मरने से डर लगता है तब अहसास होता है कि हाँ भई मैं तो ज़िन्दा हूँ।"

उनकी इन्ही बातों का या छोटी-छोटी कहानियों में बसे चेहरो का ही असर है जो उनके सामने की सीट कभी खाली या खमोश नहीं रहती। इन्ही किस्सों में कुछ न कुछ तलाशने को उनके सामने की जगह हमेशा भरी रहती है। बातों की कसक हो या टकराव की आहुती सभी एक समान होकर अपने पैमाने तैयार करती है। ये कोई सीख या प्रवचन नहीं था। जो लोग उनसे लेकर खुद पर आज़माते होगें। ये वो पहलू था जिसे समझना तो बेहद बाद की बात है मगर उससे पहले था उस पहलू का हिस्सेदार बनना।

उनकी ज़ुबान से अनगिनत वाक्या न जाने कितने वक़्तों में बाहर आकर तैर रहे होगें। लेकिन उनके समंदर में अभी वाक्यों और शख़्सों की कोई कमी नहीं थी। हर वक़्त गोते लगाये जा सकते थे। बिना टोके-टोके।

वो हर शुभा यहाँ पर किसी को तलाशते रहे हैं। मगर वो कभी मिल नहीं पाया। उनका यहाँ पर आना ही उसको तलाशते हुए आना था। लेकिन वो परवान ना चड़ सका। वो काम पर से निकाले गए थे। ये कहके की आपको दिखता है नहीं तो आप ये काम नहीं कर सकते। खाम्खा में कुछ नुक्सान कर दोगे।

ये शब्द उनके कलेजे पर छप गए थे। वो कितनी ही बार उनको भूला देने का नाटक करे मगर ये हैं कि उनके दिलों-दिमाग से हटते ही नहीं। वो नफ़रत करते हैं कभी-कभी अपने दिल और दिमाग दोनों से। बाकि कितने लोग उनके सामने से गुज़रें हैं जिन्हे किसी भी बात का ठेस नहीं पँहुचता। वो वक़्त के फिसलने को उन सभी बातों का सीख का हिस्सा मानते हैं। जो हो गया पानी मारो और कहीं कुछ छोड़कर दोबारा से दौड़ पड़ते हैं किसी नई दौड़ में। वे अभी तक सिक्के की तरह जमीन पर खड़े हैं किसी एक तरफ में पलटते ही नहीं। इसी बात का सदा अफसोस रहेगा उन्हे।

वे कहते हैं, “रास्ते तो आपको हमेशा अपनी ओर खींचते हैं और वादा भी करते हैं कि दूसरी ओर आपकी मंजिल है। मगर जब कभी एक ही रास्ता ज़िन्दगी भर के लिए पैरों में चिपक जाए तो कितना ही जोर लगा लो मगर वो कभी आपको आगे नहीं धकेलता। मेरे पाँव भी किसी एक रास्ते से चिपक गए हैं। जिसके हमराजों ने पाँव की पकड़ को न मंजूर कर दिया है। अब तो मंजूरी पा जाने के बाद ही कहीं चलेगें नहीं तो वो भरोसा नहीं आ पायेगा दौड़ने का।"

वो दरियागंज की किसी सुनार की दुकान में सोने का हार बनाने का काम करते थे। सोने की नक्कासी, उसमे नग जड़ना और खूबसूरत हार के डिजाइन बनाना उनका शौक भी था और पैशा भी। एक बार दिल्ली आते समय एक शख़्स से सफ़र में मुलाकात हुई। पूरी रात के सफ़र में ढेहरों बातें दोनों दरमियाँ हुई। उसी बातों में ये रिश्ता इतना मजबूत हुआ की उन्हे वो शख़्स यहाँ दिरयागंज ले आया। उस शख़्स की यहाँ पर ज्वैलरी की दुकान थी और इन्हे सोने का काम करने का बड़ा शौक था। तो बस, दोनों की खूब बनी और गुज़री।

सालों गुज़र जाने के बाद मे काम और शौक दोनों एक दूसरे के आड़े आ गए। जिससे रिश्ता किसी और चादर में लिपट गया। ये बदलाव तो आना ही था वाज़िब सी बात है। उनका तो यही मानना था। पल दो पल के लिए यहाँ के हिस्सेदार बनने के चश्के ने इन रास्तों का मुसाफिर ही बना दिया और वो बड़े चाव से इन राहों में खो जाने को तैयार हो गए।

इन शब्दों के बाद में उन्होनें अपने शौक को अपने सबसे ज़्यादा नज़दीक किया और काम के पन्नों पर हस्ताक्षर करके उसका अध्याय ख़त्म कर दिया। अब तो वो जैसे सारे काम निबटाकर यहाँ पर मौज़ूद हैं। बस, तलाश है बाहर के रास्ते की लेकिन अगर वो रास्ता मिल भी गया तो ये तय नहीं है कि वे बाहर जायेगे भी या नहीं।

लख्मी

बहुत दिनों से सोच रहा था...

बहुत दिनों से सोच रहा था की बस्ती में जाने के बाद मुझे ऐसा क्यों लगता है की लोग अपनी जगह को बनाते हुए एक तरह का सफ़र बना रहे होते हैं जिसमें तमाम जरूरतें, अपेक्षायें और भरोसे के होते हुए भी कुछ हाथ से फिसल जाने का डर साथ रहता है।

किसी तरह हमारी इच्छा शक़्ती हमें इस फैसलों के दोराहों पर लाकर खड़ा कर देती हैं जिसमें एक झटके का फैसला होता है, आर या पार पर सब कुछ होने के बावज़ूद भी बाकी सब चलता रहता है। किसी के जगह में आने-जाने से किसी को क्या फ़र्क पड़ता है? लेकिन जगह में जब मौज़ूदगी का शौर और सन्नाटा होता है तो वो जगह अपने आपमे गाढ़ी छवि बना लेती है। मौज़ूदगी का ये सन्नाटा कैसा है? जिसकी नज़र समय को पकड़ने के लिए कभी-कभी बेकाबू हो जाती है। चीज़ों और समय के अन्नत दास्तानों से भरी उस जगह के भीतर कितने ही जाने-अन्जाने चेहरों का झुण्ड बसा होता है।

उसने एक लम्हे के लिए मेरे चेहरे की तरफ देखा फिर मुँह पलट लिया। उसकी आँखें मानो मुझे बिना जाने-पहचाने ही अपनी गिरफ्त में लेने को थी। वो गिरफ्त जिससे कभी भी मैं आज़ाद नहीं हो पाता।

आसमान साफ नज़र आ रहा था। धूप की हल्की चमक ठीक उसके गालों और होठों पर पड़ रही थी। मैं उसके चेहरें को अब खुद मे महसूस कर रहा था की उसने फौरन चाय-पानी के लिए गुज़ारिश करनी शुरू कर दी। मैंने तो दोस्त समझकर हाथ मिलाया था पर मुझे क्या मालूम था की दोस्त की शक्ल में हम मेहमान बन जायेगें। वो भी कुछ ही वक़्त के लिए।

वो दीवार लग रही थी जिसमें मैं आगे रास्ता बन्द समझ कर पीछे लौट रहा था। यकायक मेरे साथ चल रहे साथी ने मुझे बताया की वैसा नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो। वहाँ से जाने का रास्ता है- गोदाम जाने का। अपनी आँखों को मिड़कर हम और वो आगे बड़े - बड़े और आगे बड़े। दीवार तक पँहुचने से पहले ही मेरे मन में आशकाएँ उछल-कूद करने लगी। मूंडेरियों के दूसरी तरफ हमारे देखने पर मुझे कुछ हूआ जैसे कोई छू गया हूँ। सवाल या कोई और अजब सा पल।

शायद ये मेरे साथी ने नहीं देखा जो मैंने देखा पर ये कैसे हुआ की मैंने देखा और बाजू में चल रहे मेरे साथी ने नहीं देखा। शायद वो किसी और ख़्याल में डूबा हो। जब मेरी नज़र वहाँ पड़ी तो मूंडेरियों की पीछे की दीवार पर अधबनी कुर्सी पर बैठा वो सिर को धीरे से नीचे जाने देता तो कभी नींद के टूटने पर चौंकर आँखें खोल लेता। उसके चारों तरफ काफी शौर था। मगर फिर भी वो नजाने अपने को कैसे आराम दे लेता। बड़ी बेफिक्री से वो अपने दोनों घूटनों को मौड़कर शरीर को एक विशीष्ट मुद्रा में साधे हुए था।

उसने बड़ा भारी सा मजबूत बोरी का कट्टा अपनी कमर टेड़ी करके डाला हुआ था। लग रहा था की वो जैसे अभी-अभी अपना मुँह धोकर आ रहा हो। काली पन्नी लाल पन्नी में चीज़ों को उसने बड़ी मसक्कत से बाँधा हुआ था। हाथों में मिट्टी के चन्द कण बाकी रह गए थे। उसके चेहरे की मुस्कूराहट किसी अमीबा शैवाल की तरह कभी टूटती तो क्भी खुद ही जुडती नज़र आती।


ये बड़ा तंग रास्ता था....

ये बड़ा तंग रास्ता था जो यूँ समझिये की रास्ते के पास में जितनी भी चीज़ों को चून्ने वाले से लेकर, चीज़ों को यहाँ छाँटने वाले फिर तराजू पर चढ़ाने वाले और गोदाम से टम्पू में सारा माल भेजने वाले मालिको समेत सबके चेहरे ने एक अज़ीब सा नक़ाब पहना हुआ था जिसको कुछ क्षणों में समझने की मुझमें ताकत नहीं थी। ये मेरी अवधारणा थी क्या या मेरे मन का असपष्ट विचार। पता नहीं। सब कुछ जान कर भी मैं अंजानों की तरह वहाँ बैठ गया।


सिर पर मँड़राने वाली मूहार मक्खियों के जैसे अधबने विचारों का भिन-भिनाना अब बंद हो गया। क्योंकि आँखों को अब कुछ और ही भा गया था। गोदाम में आज माल ही माल दिखाई दे रहा था। पहले के दिनों आज कुछ ज़्यादा था।ये हफ़्ते की शुरूआत का दिन था। लोग सुबह से ही तरह-तरह की चीज़ों को ज़्यादा से ज़्यादा लाना शुरू कर देते हैं। वो चीज़ें जो एक या दो बार मे इस्तेमाल करके फैंक दी जाती है।

गोदाम में बच्चे भी खेल रहे थे। उनकी माँए घर की चौखटों पर बैठी अपने पती के काम में हाथ बटा रही थी। बच्चे अपनी प्यारी सी मुस्कान देते हुए बोरे में भरी चीज़ों पर चढ़कर इतने उत्तेजित हो रहे थे। जीवन की असम्भवता से जूझकर मुस्कुराते फिर खेल में लग जाते।

राकेश

गोदाम के अहसासों भरे सफ़र में...

गोदाम से उठकर टेम्पू में चीज़ों को जोर से फैंकने की आवाज़े कानो में लग रही थी। सोनू अपनी कमीज़ की आश्तिनों को ऊपर चढ़ा कर दाये-बाँये जगह को देर तक देखने लगा। सारी चीज़ों और दिवारों को नापते-परखते हुए वो नीचे बैठ गया फिर कुछ पलों के बाद वो सारी चीज़ों पर ऐसे निंगाहे डालने लगा जैसे पूरे गोदाम की शिनाफ्त (जाँच-पडताल) कर रहा हो।

वो अपना नसीब आज़माने के लिए शहर चला आया था। ये सुनकर की शहर में 'रोज़ कुआँ खोदो और रोज़ पानी पियो' वाली नीती चलती है। इस जुमले को वो अपने साथ ज़ुबाँ पर लिख लाया था पर वैसा बिल्कुल भी नहीं था जैसा वो सोचकर आया था। क्या यही सब के साथ होता है?

जनाब दिल्ली की तो दास्तान ही अलग है। यहाँ कभी ऐसा भी होता है की जहाँ हम खोद रहे हैं वहाँ पानी की जगह गैस लाईन, पाईप लाईन और केवल लाईनों का सिमटा हुआ जाल निकल आता हैं। प्रमोद सें बड़ी गुज़ारिश करने के बाद सोनू को गोदाम में काम मिला था। काम का अपनी दुनिया के साथ बड़ा गहरा रिश्ता होता है। जब रहता है आदमी काम करता है पर साथ ही में काम ज़िन्दगी की वो सीडी बन जाती है जिस पर चलकर कोई भी शख़्स ज़िन्दगी की वास्तविक्ता को ऊँचाई से देख सकता है जिसमें उसकी अपनी कल्पना होती है अपनी चाहत होती है।

सोनू ने भी कुछ ऐसा ही चाह था। उसका सपना था की वो यहाँ से पैसे कमाकर अपने जीने का ढ़ंग बदले और अपने जीवन में खुशहाली लाये। यूँ तो ये मुराद सब माँगते हैं लेकिन किसी-किसी की ही मुराद पूरी होती है। जीवन भर क्या पूरा हुआ क्या अधूरा रहा की चिन्ता लगी रहती है। मगर ये भी क्या कम है की काम के साथ सब अपनी एक अदृश्य छवि बना लेते हैं। जिसे हर कोई नहीं देख पाता। बस, वही देखता है जो इसी छवि में जीता है।

गोदाम में मिले काम के मौके को सोनू ऐसे ही कैसे जाने देता? रोज़ाना काम में लग जाता तन-मन एक कर देता। अपने साथ वाले लड़के को देखकर वो भी काम को समझने लगा।

सोनू प्रमोद के साथ काम पर लग गया। गोदाम में किसी की अपनी जगह थी तो कोई किसी के पास काम करता था। अपने घर में भले ही चूल्हा न जले पर दूसरे का पेट तो भर ही दिया करते थे। गोदाम एक परीवार सा दिखता तो कभी मिल कर बाँटने वाली जगह नज़र आती।

सब रोज़ इसी भेषबूसा में अपनी-अपनी कारस्तानियों में लग जाते किसी से कोई मतलब न रखते हूँ। सोनू भी जल्दी ही सब से घुल मिल गया। पूरे दिन बस्ती के कोने-कोने में फेरी मार के आता फिर दिन में तीन-चार बार माल बिनकर ले आता फिर काँटे पर चढ़वाता। अब वो अपना काम बेहतरीन ढ़ंग से करना जान चुका था। उसे किसी की जरूरत नहीं थी।

शहर के हाथों ने और गोदाम से उठने वाली समझ और वहाँ की काम की शिक्षा ने उसे जीना सीखा दिया था। गोदाम में आकर एक और नौजवान ने अपनी ज़िन्दगी की शुरूआत की थी। बाहर से आता रास्ता जो चौराहे से निकाल कर गोदाम में आता था। वो गली इतनी ही चौड़ी थी की बस, टेम्पू के लिए ही जगह बचती थी। जरा सा आगे कदम रखो तो दो-तीन हाथ ही जगह बचती।


रोज़ाना कोई किस्सा सब के पास बतीयाने को होता। तमाम अफ़वाहों के उडने के बाद भी गोदाम में काम करने वाले शख़्सों को जीवन अपनी लय में चलता रहता। शहर में हर बार चूनाव आते और पहले गोदाम और बस्ती तोड़ने की अफ़वाहें उछालती फिर हमर्ददो की तरह आकर बड़ी-बड़ी डीगें मारते की हम आप का घर नहीं टूटने देगें। ये कह कर वो वोट माँग चले जाते।

गोदाम का अपना अस्तित्व है वो बना इस जगह में मिलनसार और अपनी चाहतों पूरा करने का ठिकाना।

जहाँ पर सबने पहली -पहली बार अपने नये जीवन की शुरूआत की और कुछ काम-धँधा न मिलने पर अपने आप जीने की मुहीम को छेड़ा । काम तो तलाश लिया जिससे दो-तीन वक़्त का गुज़ारा हो जाता।

हाथों में न ही कोई हुनर था न ही कोई ज्ञान जिसे अपना मानकर समाज में जगह बना कर जिया जाया। बस, ये ही दो हाथ जो हथेलियों पर पड़ी लकींरे जिनसे कोई काम न चलने वाला था। नसीब को रोकर क्या मिलता खुदा ने अपना काम तो कर दिया हमें इस दुनिया में भेजकर अब अपनी बारी थी। सो अपने जीवन को खुद ही बनाने की जिद्द ठान ली और आगे बढ़ते गए सफ़र काटता गया।

चौराहे पर जो जीवन नित-नयी सम्भावनाएँ दे रहा था। वो अपने को खुद ही बनाता और खुद ही शाम की तैयारी करते हुए सब कुछ समेटता है।

राकेश