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Thursday, July 3, 2014

मौस्की के आलम

मौस्की के आलम यह सिलसिला है उन तमाम लोगों के संजोग और विलाप का जो किसी को बुलाने और भागने मे भरोसा नहीं रखते। उनके लिये खुद को नज़रों मे लाने के समान जीते हैं। बेनज़र और बेइफ्तियार बनकर जीना इनके लिये मौकों के पैमाने जैसा है।

यहीं - कहीं इनकी इतनी महक है कि जीवन की सभी धाराओं में हम जाये भी नहीं तो भी उनके चित्र बना सकते हैं जैसे - समंदर मे उतरे बिना उसकी गहराई का पता कर लिया हो। उसे भाप कर, उसका एहसास करके, उसके छु कर, उसे सुनकर और उसे महसूस कर के।

जिंदगी कि किताब

Monday, June 30, 2014

खामोश पन्ने

हर जगह किसी न किसी कहानी की तरह है। जिसमें कई पन्ने हैं और हर कहानी में कुछ ऐसे भी पन्ने हैं जो किनारों से कुछ इस तरह मुड़े हैं कि अपने साथ या तो कई पन्नों को चिपका ले जाते हैं या फिर उन्हे बोलने का मौका नहीं देते।

जिंदगी की किताब :

Thursday, May 23, 2013

सवाल कहाँ से बनते हैं?

मेरी समझ मे सवालों का सफ़र उस खोज तक होता जो कहने वाले को उसकी उन छवियों तक ले जाये जिससे वे खुद को बोलता है या बोल पाता है, जिसमें जिन्दगी का रस और एक बहाव हो। उसके भीतर जाकर उन कहानियों को सफ़र करवाये जो उससे निकल कर एक माहौल मे फैल जाती हैं। मगर सवालों का सफ़र सिर्फ जीवन की दास्ता को सुनने या उनसे किसी को समझने के लिये नहीं होता।

मेरी मुलाकात किसी ऐसे शख़्स से रोज़ हो रही थी जिनसे बातें करते हुए समय का पता नहीं चलता था। मैं उनके पास मे अपने किन्ही सवालो को ले जाता और उनके जीवन के दृश्य, ज्ञान और कहानियों को पिरोकर उनको समझने की कोशिश करता। पर बातें उनकी जिन्दगी से दृश्य लेकर बाहर चली आती जो याद के अलावा और उनके अतीत के अलावा कुछ और नहीं होती। उनके साथ बातचीत में पूछे जाने वाले सवाल – असल मे सवाल होते ही नहीं थे। वे तो कोई क्लू या कुंदे की भांति होते जो उनके अतीत मे बसी यादों की किसी मछली को फांस कर ले आते।

हर रोज़ ऐसा होता रहा - मुलाकात मे समय छोटा होने लगा।
मैं हर रोज़ किसी एक चीज पर कुछ सवाल बनाकर ले जाता और उनसे कोई दास्ता सुनता। जैसे की काम पर : मैं सोच लेता कि वे किस चीज़ मे अपना शौक रखते हैं जिसमें मेरे सवाल होते -

काम में रहते हुये कुछ अलग कैसे करते हैं?
क्या काम के साथ एक रिश्ते में रहते हुए ये इजाजत मिलती हैं?
अपनी किस को सुनाते हैं?
सुनाने से क्या मिलता है?
कोई ऐसी कोई याद जब मज़ा आया हो?
कोई किस्सा याद है जो काम को हल्का करता है?


बातचीत शुरू होती जितनी उत्तेजना से उतनी ही बुरी तरह से वे जमीन पर गिरती। ऐसा लगता था की कुछ समय के बाद मे कुछ बचेगा नहीं। कभी मैं याद पर, कभी कहानियों पर, कभी सुनाने पर, कभी माहौल पर तो कभी उनके उन्हे एंकात पर सवाल बनाकर ले जाता और उनके सामने बैठ जाता। इसमें मैं सवालों की पोटली बनाने मे बहुत मश्ककत करता और बड़े चाव से जाकर बैठ जाता। एक दिन उन्होनें मेरे पहुँचते ही कहा, “क्या हम आज काम और रिश्तों से बाहर जाकर बात कर सकते हैं?”

मैं सोचने लगा की वे क्या सवाल होगे जो काम और रिश्तों से बाहर के होगे? सवाल यहाँ से आते हैं?

सुनाना हमारी जिन्दगी में महत्वपूर्ण क्यों है और वे सुनाना जिसे मैं खुद रचा है। क्या जिन्दगी में सुनने वाले मिल जाते हैं या सुनने वाले बनाने पड़ते हैं? सवाल महज़ ये नहीं है कि हमने कुछ लिखा है और उसे सुनाया जाये। बल्कि सवाल ये है कि हमारी सुनने वाले की तलाश क्या है?

किसी शख़्स को उसकी "कहाँ" की कल्पना मे ले जाकर सोचा जा सकता है? सवाल महज़ पूछे जाने के लिये नहीं होते। बल्कि कुछ दृश्य और लोग ही उस सवाल की भांति जीवन मे तसरीफ ले आते हैं? जिससे जवाब की गहराई को मापा जा सकता है।

मुकेश जी बतरा अस्पताल मे काम करने वाले एक शख़्स है जो वहाँ की केनटीन सम्भालते हैं। एक दिन वे मुझे ढूंढते हुये मेरे पास आये। पसीने मे तर वे अपनी साइकिल से उतरे। लगभग 6 किलोमीटर की दूरी से वे साइकिल पर आये। आकर बैठे और कहे, “मैंने इस जगह के बारे में अपने दोस्त से सुना था - मैं कुछ सुनाना चाहता हूँ, झट से उन्होने अपनी जैब से एक पन्ना निकाला जो पसीने से भीगा हुआ था। उसे सीधा करते हुये वे सांस को संतुलित करते हुये सुनाने लगे। मैं उन्हे ही देखे जा रहा था। वे अपनी कविता खत्म करने के बाद मुझे बिना कुछ कहे देखते रहे। मेरे पास कोई ऐसा सवाल नहीं था जो मैं उनसे पूछता। मैं उनसे क्या पूछता? वे कोनसा सवाल था जो उनसे पूछा जाता?

सवाल यहाँ से बनते हैं? वे सवाल जो उनके सफर, उनका सुनाना, उनका तलाशना और उनकी वर्दी पर नहीं होते। मैं उन सवालों की खोज मे था। वे सवाल बना सकूँ जो ज्ञान और कहानी से बाहर लेकर कुछ कह सकें। जो किसी एक के लिये ना हो। वे सवाल जो 100 लोगों से पूछा जा सके। मैंने अपने साथी की कॉपी मे से उसके बनाये 250 सवालो को खोजने की कोशिश की, उससे कहा की वे मुझे दिखाये। उनको पड़ते हुये लगा की इन सवालों मे 100 लोग है, लेकिन हर सवाल फिक्स है। वे जिससे पूछा जा सकता है उसी के लिये बना है। जैसे फेरीवाले, ड्राइवर, स्पीड, सड़क के किनारे बैठा शख़्स। इसमें भी किसी कहानी के तहत ही अन्दर जाना हो सकता था।

मैं उन्ही शख़्स के पास गया जिन्होने मुझसे कहा था की "काम और रिश्तों से बाहर होकर बातें करें" उन्होनें मुझे एक शख़्स से मिलवाया उन्होने मुझे अपने बाते में बताया - "जीवन मे सवाल वापस लौटते हैं?”

ये मेरे लिये एक और भिंड़त थी जो किसी को देखने और किसी से मिलने से दूर ले जाती है। मैंने सवाल बनाने शुरू किये - मैंने पहले से ही नक्की कर लिया की इन चीज़ों को नहीं लाऊंगा अपने सवालो में नाम, काम, पहचान, पता, रिश्तेदारी, चाहत, याद, भाव ( दुख-खुशी), प्लान, टारगेट।

मैं अपने बनाये सवालों को लेकर गया एक बच्चों के एक स्कूल में - वहाँ पर बच्चों की भीड़ में एक बच्चा बिना कपड़ों के आकर बैठ गया। वे दूसरे बच्चों की किताब मे झांकर पढ़ने लगा। सब उसको जानते थे। वहाँ बैठी टीचर ने उसको अपने पास बुलाया और कहा, “तुम कपड़े क्यों नहीं पहनकर आये?” तो वे बोला, “मुझे अभी काम पर जाना है, मैं भीख मांगता हूँ तो अभी थोड़ी देर के बाद मे जाऊँगा।" टीचर इसके बाद मे क्या पूछती वे सोच मे पड़ गई – वे उसको देखती हुई बोली, “क्या तुम स्कूल नहीं जाते?” वो बच्चा सहमा सा हो गया फिर उसने अपने परिवार को बोलना शुरू किया।

क्या उससे कुछ और बातचीत नहीं कि जा सकती थी? "स्कूल" के बारे मे पूछकर उसे क्या किया गया। सवाल यहाँ पर आते है। सवाल "कहाँ" की कल्पना देने या लेने के लिये नहीं होते बल्कि "कहाँ" को जीने के लिये होते हैं। मैंने सोचा की क्या मैं सवालों मे इस बच्चे को शहर मे देखकर पूछूंगा या यहाँ से वापस इसे घर लेकर बात करूगां।

तब लगा की जीवन के बारे में दस सवाल : जो पहचान और जीवन के अनुभव को खींचकर ले आने के लिये खाफी होते हैं। इसके बाद आने वाला सवाल इस दायरे के बाहर का होता है। वे किसी एक के लिये नहीं होता। उस सवाल का रूप क्या है वे मैं अब भी सोचने की कोशिश मे हूँ।

लख्मी

Wednesday, May 8, 2013

एक पुराना सवाल और एक नयी कोशिश



एक बार मेरे साथी ने मुझसे एक सवाल किया की लेखन में “अनुभव” और “कल्पना” के बाहर क्या है?

मैंने उसके सवाल का तुरंत तो कोई जवाब नहीं दे पाया मगर उसके इस सवाल ने मुझे कुछ सोचने कहिए या जो भी मैं लिखने की कोशिश करता हूँ उसको दोबारा से देखने का मौका जरूर दिया कि हम किसी के कहे बोलों’, ‘उसकी कहानी’, ‘उसके अनुभवऔर किसी कल्पना में जब जाते हैं तो उससे जुड़ने के या उसमें शामिल होने की हमारी सोच क्या होती है? हमारी भागिदारी और हमारा संवाद क्या होता है उससे?

मैंने ये सवाल जब खुद में महसूस किया तो समझ में आया की मैं जिन यादों और कहानियों में घूम व तैर रहा हूँ असल में वो उस क़िरदार की भी नही है जो मुझे सुना रहा है और उसकी भी नहीं है जो सुन रहा है। तो वो कहानी या बात किसकी है और मैं या वो उन कामनाओ में कैसे उतर रहे हैं? अब तक की बातों और मिलन में ये सवाल बारबार दिमाग में घूम रहा था कि आखिर मैं उन बातों और ज़ज़्बातों को किस तरह से खुद में उतारूँ जो कि मैं खाली उसी को लिखने न लग जाऊँ या फिर कहीं वो बात ही न कह पाऊँ जो कि उस कहानी का सबसे असरदार पहलू बनकर उभरी थी। सुनने वाला और सुनाने वाले के बीच ये रिश्ता कभी बनने लगता है तो कभी टूट जाता रहा लगने लगा। लेकिन ज़ज़्बातों की एक लम्बी सी बिसात चलती रही जो आज़ाद थी हर लिखने और सोचे जाने के रिवाज़ से।

मैं जब भी किसी ऐसे शख़्स से बात करने के लिए बैठा जो बीती हुई बातों को अपने जीवन में हल्के तौर पर लेकर चलता है तो इस सवाल ने ज़्यादा जोर पकड़ा। इस हालात में मैं उस शख़्स के बेरूखेपन और याद रखने के अहसास से बखूबी मिल रहा होता हूँ। जो मैं उसे हल्केपन के हवाले भी नहीं कर सकता था और ना ही उसे उसके जीवन के बोलों उतार व फसा सकता था। इस वक़्त के लिए मुझे किसी तीसरी ज़ुबान की जरूरत पड़ती नज़र आती। जो की मेरे पास में नहीं थी और न ही उसके पास में। कही, सुनी और बोली बातें उस तीसरी ज़ुबान के लिए बनती नहीं है लेकिन कई ज़ज़्बातों और जीवन के भारी वज़नदार रिवाजों के बीच में अपनी जगह बनाने के लिए तीसरी ज़ुबान को उतारा व सोचा जा सकता है। वैसा ही मैं कुछ करने कि कोशिश में जुट जाता।

इस तीसरी ज़ुबान में मैं कुछ समझा या वो कुछ बोला, खाली यही नहीं होता। इसके अलावा कुछ और भी है जिसे सोचना बेहद जरूरी महसूस होने लगता।

सुनने के बाद में जब मैं लिखने पर आता तो कुछ समझ के आकंड़े खुलने लगते। लेकिन साथ ही साथ कुछ बिखरने भी लगता। जिसको मुझे समेटना पड़ता। तब लगता है जैसे - लिखना असल में अपनी ही अभिव्यक्ति तो गढ़ने के समान है। अक्सर जब हम किसी के जीवन में उतरते हैं तो हमारे साथ में अहसास बनकर कोई न कोई जरूर होता है। चाहें वो हमारी स्वयं  ही की छवि हो या फिर खुद के होने का अहसास। वही अहसास हमें या तो उस कहानी के भीतर ले जाने वाला बनता है या फिर वहाँ उस दुनिया के बीच में छोड़ देने वाला, नहीं तो अपने शब्दों - बोलो से हमें उस दुनिया के अन्दर बुलाने वाला। मगर इन सभी सूरतों में वो अहसास हमेशा अदृश्य ही बना रहता है।  

देखकर और सुनकर, इनके बीच की दूरी और अन्तराल में इस अनोखे खेल को महसूस किया जा सकता है। हम और हमारी नज़रों का पलड़ा हमारे स्वयं के शरीर और सोच के पैंबन्दो में  रचा जाने लगता है। जिसमे हम फिर अपने को छोड़ देते हैं। मैं अक्सर ये खुद के साथ में  महसूस करता हूँ।

यहाँ इस लेखन को सोचते हुए दो अलगअलग तरह की धारायें उभरने लगती हैं।

पहली - खुद को छोड़ देना।
दूसरा - अपने से बाहर हो जाना।

“खुद को छोड़ देना” ऐसा महसूस करवाता है जैसे मैं उस दुनिया में बिना अपनी अवधारणाये, अपने वस्त्र, अपने चलन, अपना अनुभव और अतीत और अपने नज़रिये सब कुछ कहीं पीछे छोड़ आया हूँ। अब जो भी कुछ नज़र आ रहा है उससे मैं अवगत तो नहीं हूँ लेकिन उससे मिलने में मुझे मेरे “मैं” का अहसास बखूबी हो रहा है।

“अपने से बाहर हो जाना” स्वयं के स्वरूपों और तमन्नाओ में हर वक़्त गुंदता रहता है और अपने को छोड़ देना, खुद को ही रचने के समान होता जाता है।

कभी - कभी हम ये कहकर उस रचे गये माहौल में खड़े हो जाते है कि "उन्होनें अपने शब्दों से दुनिया बना दी थी।" और कभी - कभी इन कहे गये बोलो में राहें उनके जीवन की ही होती है उनके दाखिल होने की होती है, उनके बहने की होती है पर उनपर गोते हम खाने लगते हैं।

क्या हमें ज्ञात है कि ये दोनों सूरतें अपने में क्या संजो पाती हैं?

वक़्त का फिसलना - किसी समय के चिन्हो को पैदा करना भी होता है।
दृश्य का छूटना - जगह के बनने के अवशेषों को ज़िन्दगी देने के समान होता है।

इन दोनों ही स्थितियों में हम बखूबी खिलते हैं।


लख्मी

Saturday, May 4, 2013

उपस्थितयाँ

उपस्थितयाँ कई तरह के वर्जन के थ्रू है। मान लेते हैं कि ये वर्जन - छवियां है। वे जो हर बार बदलती है - बदलकर हर बार भीड़ में खो रही हैं। सपोज़ - वे जब किसी जगह से गुजरी - तो वे नहीं रही जो बनकर वो किसी कमरे से निकली थी। वे जब किसी चलती गाड़ी के सामने खड़ी हुई तब वे वो भी नहीं जब वो किसी जगह से गुजर कर बनी थी। वे जब किसी शांत शख्स के सामने बैठी थी तब वो कुछ और थी। फिर जब वो किसी पागल शख़्स के सामने रूकी तो वो कुछ और हो गई।

उपस्थितयाँ विभिन्नताओं से सजी बनी है। उनमें अनेकों आवाज़े हैं। उपस्थित की कोई खास व चुनिंदा आवाज़ नहीं है। अगर इन आवाज़ों, रूपों, भावों, रिश्तों, परिवेशों से इसे बाहर कर दिया जाये तो शायद वे पूरी तरह से खुद को हाज़िर होने देगी।


लख्मी

Wednesday, October 31, 2012

नौकरी की अर्जियों की तलाश में

दुनिया में कितनी ही तरह की नौकरियां है। हर कोई अपनी मनपसंद, ज़रूरत की जॉब के लिये खुद को तैयार करता है। नौकरी एक हावी सोच जो अपने में दुनिया की क्षमताओं को लपेटें में है। आप किस चीज़ के लायक हो और किस चीज़ के नहीं का नौकरी से सीधा इशारा मिलता है। दुनिया और दुनिया मैं अनेक जॉब की अपनी दुनिया और हर दुनिया का अपना अलग स्वाद।

क्या है जिसे छोड़कर किसी जॉब के लिये तैयार होना पड़ता है? "नॉनबॉयग्राफिल बायोडाटा" एक ऐसा पत्र जो शरीर की थिरकन से दिमाग की कल्पनाओं को सोच पाने की कोशिश करता है।
वे अनुभव जिसका कोई प्रमाणपत्र नहीं, जिसका कोई सबूत नहीं। जिसकी कहानियां है और ऐसी संभावनाएं जो एकांत को असंख्य बनाती है।

ये एक पत्र है जिसे हम इस माध्यम से बना रहे हैं जो इन अंदरूनी क्षमताओं और संभावनाओं मे गुथे मिले नये आइडियों को ला पाये। बनी बनाई ठोस सोच को तोड़ सके। भरिये और भेजिये। अपने जवाबों मे उन जीवनों को लाने की जिनकी छुअन और कहानी आपके होने को जिंदा करती है।

Monday, October 15, 2012

अधपका सबके बीच

मैं पूर्ण नहीं हूँ, अपूर्ण भी नहीं हूँ, आधा - अधूरा, अधपका सबके बीच हूँ। मेरा रूप कितना विशाल, घना और तरलता में है, ये सफ़र अनिश्चित्त है। समय सदेव उसके साथ बहस में रहता है।

हम इसी समय को रचने के मौके में खुद को उतारते हैं। कब आप बोडी को मौजूद करोगें और कब आप बोडी को छोड़कर ख्यालों मे आसमान को मापोगे? समय इन दोनों रूपो को एक साथ एकत्रित करता है। इस निरंतर व्यवस्थित होने से निकाल के अपने लिए एक अनिश्चितता को तैयार करना, अपने आसपास इसके लिए जगह खुद बनाना। अपने को रचने के लिए बेपरवाह समय को रचना है। रास्ते में जो मिलेगा, उसे भी अपने साथ बहा लेना है।

मेरा शरीर मुझसे अपेक्षा नहीं रखता की मैं उसकी निगरानी करता रहूँ या उसकी निगरानी में रहूँ। उसकी नंगन्ता से मेरे साथ रिश्ता ड़र से ना शुरू हो। मैं जितना पोशाक से बाहर अपने आप को देखने का उनमाद रखता हूँ उतना ही बे-पोशाक होकर भी। ये अस्त्तिव मेरे शरीर को सिर्फ नाम देता है, पहचान देता है पर उसकी बे-परहावा छलांगे मेरे लिये रिक्स भी है। वो रिक्स जो मैने अपने से चुना है जिसमें ध्वस्थ होने का ख़तरा और अवारा होने की गुज़ाइश है पर अपूर्ण मे ही रहना है जिसमे मैं जीता हूँ। वही मेरी रचना और मेरे समय की अनिचता है मेरी टकरार मेरे सध्यात के बनाए ढ़ाचे से है। 

शरीर मुझे कहाँ फैंकता है, समय के दायरों का उल्घन करने की कोशिश करूँ तो कहाँ पहुँचता हूँ किसको रचने मे निकलता हूँ।
अनफिनिश हूँ और अपने आपको अनफिनिश रखने की कोशिश मे हूँ। इस अहसास से निरंतर अपने आपको रिवेंट करने में हूँ। मेरा समय अनिश्चिता मे है। ये कहीं पर टिकने या टिक जाने की बहस मे नही है। वो इस कि एक भाषा ढूंढ रहा है अपने आपको अपूरता मे चुनना वो थकान है जो मुझे तलाशती है, मैं जिसे तलाशता हूँ। मेरे पैर कहीं ले जायेगे और मेरा मूवमेंट उसको छोड़ देगा, मैं उस फलसखे से टकराता है। जो कहता है कि अस्थिर हो जाना समय का अस्थिर होना नहीं है। ये समय, मेरे अपनाये समय से बहस मे है। जो मुझमे फिट नहीं होता मगर मैं इस अनफिट से जीने की लरक मे चला जाता हूँ।

फिट ना होना, उसको लुफ्ट मे रखना नहीं है बल्कि वही जीवन को बना कर रखना है।

लख्मी

Friday, December 16, 2011

"प्रभाव"

हम लिबास, छवि, रूप और नकाब को सोचते हैं। इनसे बहस करते हैं, बदलते हैं, लड़ते हैं और संधि भी करते हैं लेकिन ये क्या है? और इनके बीच में क्या है? पिछली रात – "अंत के बिना" एक प्रफोमेंस देखा। कुछ ऐसा लगा की ये इनके बीच में हैं - ये एक पिरोया हुआ संवाद है जो एक दूसरे के गुथे होने से तैयार होता है।

"अंत के बिना" का एक दृश्य :
एक लड़की अपने चेहरे पर रंग ही रंग चड़ाती है बिना पहले किया हुआ रंग मिटाये बिना। कभी लाल, कभी सफेद, कभी हरा, कभी पीला, कभी नीला तो कभी काला। लगाती जाती है - लगाती जाती है। फिर उन्हे एक सफेद कपड़े से पोंछती है। तो रंग साफ नहीं होते बल्कि एक ऐसा रंग चेहरे पर चड़ जाता है जो उसने मला नहीं था।

प्रफोमेंस :
अपने पूरे शरीर पर काला रंग चड़ाये वे कमरे से बाहर आता है। कई काले रंग के कुर्ते पहने हुए। एक – एक कर वे अपने सभी कुर्ते पब्लिक में बैठे लोगों को पहना देता है। फिर एक शरीर जो अपने रंग से निजी रंग से पुता हुआ था वे भी किन्ही हिस्सों से किसी और रंग मे चला जाता है। जिन लोगों को उसने अपने कुर्ते पहनाये थे बिना उतारे हुए उनके भीतर भी वे उस रंग की कसक डाल देता है।

इनमें हम अभिव्यक़्तियों, नकाब और लिबास को किन सवालों के थ्रू सोच सकते हैं? जबकि ये इस अवधारणा को तोड़ता है की जीवन कई रूप मे जीता है। जो एक से निकलकर दूसरे मे जाना है। शायद एक – दूसरे के बीच में कई सवाल है जो इन्हे जुदा करते हैं। एक दूसरे के विपरित खड़ा करते हैं। हर छवि एक दूसरे से भिन्न होती है लेकिन क्या वे एक दूसरे से बिना है?

लिबास क्या है? किसी को धारण करना है या कुछ और है? "वक़्त" इस सवाल को पूछता है - बेहद गहरी चुप्पी के साथ। मुझे लगा की "चुप्पी" ही इसका जवाब है लेकिन ऐसा नहीं है। "चुप्पी" उस लिबास की वो आवाज़ है जो चीखती है - मौजूद रहती है।

छवि, रूप, लिबास या नकाब – ये "पिछला छोड़ना" और "किसी दूसरे" में जाना नहीं है। वे रीले करता है। किन्ही चेहरों को, सफ़र को - जो जीवनंता के अहसास से बनी होती है। ये लड़ाका नहीं होती - ये रोमांचक है। वे जो अपना रोमांच चुनती नहीं है - खोजती है। ये एक - दूसरे के भीतर से निकलकर जीने वाली आकृतियाँ है। कुछ भी बाहर का नहीं है या ये सब अंदर का नहीं था। ये अंदर बना था बाहर से और बाहर गुथा है अंदर से। "पिछले की कग़ार" जो अगले को बनाती हो।

बेहद रोमांचक है -
बिना रूके उस ओर ले जाता है जिसका छोर नहीं है। गुथा हुआ, पिरोया हुआ और धारण करना के मौलिक ढाँचों से सीधा टकराता है उसे तोड़ता है। फिर बात करता है। बहुत अच्छी रात रही -

लख्मी