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Wednesday, July 3, 2019

खत से ज़ुदा पन्ने


मेरे दरवाजे पर पड़ा था एक खत, शायद रात भर पड़ा होगा। मुझे सुबह मिला था। रात कितनी तेज बारिश पड़ी थी, ये उस खत से जाना जा सकता था। घर के छज्जे के नीचे होने के बाद भी वो पूरा पानी से तर था। अगर उसे उसी वक़्त खोला जाता तो उसके टूकड़े हो जाते। वैसे तो जमीन पर पड़े हर कागज़ को उठाया नहीं जाता या हर पन्ने पर ध्यान नहीं जाता। मगर उसे इस तरह से मोड़ा और लपेटा गया था की दिमाग उसे उठाने और सुखाने की ओर एक दम चला गया। खत के अन्दर लिखे गये शब्दों के अक्श बाहर उभर आये थे। सभी पन्ने नीली स्याही से रंग गये थे।


मैं कभी भूलूंगी नहीं वो सब

प्यारी अम्मा -

ये ख़त मैं तुम्हे जहर खाने से एक घंटा पहले लिख रही हूँ। अगर जहर नहीं खा पाई तो घर से भाग जाऊंगी, मुझे पता है, अगर मैं घर से भाग गई तो मेरे घरवालों को बहुत ज़लालत झेलनी पड़ेगी मगर, अगर मैं एक दिन और इस घर में रही तो मैं मर जाऊँगी, मेरे हाथ में एक समय ज़हर की एक छोटी सी शीशी है जिसमें मेरे बाइस सालों का अंत दिखाई दे रहा है।

मैं मानती हूँ, मैंने सबको बहुत दुख दिये हैं बस, अब बहुत हो गया। अब मैं और दुख देना नहीं चाहती किसी को। चार दिन के बाद में मेरी शादी है और वो रिश्ता भले ही जबरन रहा है लेकिन "हाँ" कहने की गलती मैंने ही की है।

अम्मा मा कर देना मुझे मैं जा रही हूँ, शायद फिर कभी लौटकर ना आऊँ

मुझे अच्छी तरह से याद है वो पहला ख़त जो मैंने उस रात में अपने घरवालों को लिखा था। उसका एक एक शब्द मेरे दिमाग पर छपा हुआ है। उसमे समाया डर और दूर निकल जाने कि खुशी दोनों बहुत ज्यादा थी। मैं कभी डर को आने वाली खुशियों से दूर करती तो कभी आगे कुछ है भी ये सोच ही नहीं पाती। वो डर फिर अकेला मुझपर चड़ जाता।

अम्मा तुमने मुझे अपने जीवन की जो भी बातें बताई वो मेरे दिल को कसोटती जाती रही है। मैं तुम जैसी नहीं बन सकती। और ना ही बनना चाहती। अम्मा तुमने एक ही टाइम मे वो सब कैसे पी लिया जो इस छोटी सी जहर की शीशी से भी ज्यादा जहरीला था। मगर वो सारी बातें जो जब तुम सुनाती थी तो मेरे सामने धूंधली ही सही मगर कुछ तस्वीरें बना डालती थी। और उमने तुम जवान दिखती थी लेकिन सही बताऊँ तो तुम्हारी जवानी की शक्ल में मैं होती थी। तुम जो जो बताती जाती लगता जाता की वो सब मैं कर रही हूँ या मेरे साथ ही हो रहा है। मैं तुम्हारी कही हर बात मे, रात मे, कहानी मे सब कुछ करती जाती थी। क्या जब मैंने तुम्हे अपनी बातें बताई तो क्या तुम्हे भी मुझमे तुम दिखाई देती थी? मुझे लगा था की मेरे अब की बातों में छुपी लड़की तुम्हे जवानी की अपनी शक़्ल याद आती होगी। आखिर हमारे बीच में तीस साल का गेप मिंटो मे भर जाने का एक यही तो रास्ता था।

इतना समय बहीत गया है लेकिन उस खत का एक एक शब्द कभी बी मेरी आंखो के सामने नाचता है और मैं सहम जाती हूँ। मैं अगर जरा सा भी सोचू उस वक़्त को जब मेरे उस खत को पढ़ा गया होगा तो क्या हुआ होगा? उसको सपने मे भी देखूगीं तो मुझे ज़हर की भी जरूरत नहीं पड़ेगी बिना हिचकी लिये ही मैं मर जाऊंगी।

हमारे दो पड़ोसी दस साल के बाद मे मुझे मिले जिन्होने उस दिन के बारे मे मुझे बताया, जिन सालो को मैं अपनी जिन्दगी का हिस्सा ही नही मानती थी वही मेरी जिन्दगी की देन थे। अम्मा, एक दिन तुम बहुत ग़ोर से एक लोटे को देखे जा रही थी। झाडू लगाते लगाते तुम उस बक्से की तरफ चली गई जो हमारे घर का एक मात्र तिजोरी बना रहा है। उस लोटे मे क्या था? तुमने कभी नहीं बताया। मगर जब तुम उसे देख रही थी तो मैंने पहली बार ये महसूस किया था की तुम मेरी अम्मा नहीं हो। वो तो नहीं हो जिसे मैं रोज देखती हूँ॥ कई बार सोचा था की उसके बारे मे मैं तुमसे कुछ पूँछू मगर मन नहीं होता था। इसलिये नहीं की तुम बताओगी नही या मेरे पूछने पर तुम्हे बुरा लगेगा। मगर इसलिये की उस तस्वीर को मैं भूलना नहीं चाहती थी जो मैंने एक पल के लिये देखी थी।

अम्मा मेरा सच मे मन नहीं है इस जगह से जाने का - लेकिन........

मैं फिर से बोलूँगी


अब तक इस ख़त की लाइनों में जीवित सांसो को महसूस करने की भूख मेरे शरीर को हिलाने लगी थी। जैसे आर्लम लगाये समय सांसो के साथ डांस कर रहा हो। 

Thursday, July 3, 2014

मौस्की के आलम

मौस्की के आलम यह सिलसिला है उन तमाम लोगों के संजोग और विलाप का जो किसी को बुलाने और भागने मे भरोसा नहीं रखते। उनके लिये खुद को नज़रों मे लाने के समान जीते हैं। बेनज़र और बेइफ्तियार बनकर जीना इनके लिये मौकों के पैमाने जैसा है।

यहीं - कहीं इनकी इतनी महक है कि जीवन की सभी धाराओं में हम जाये भी नहीं तो भी उनके चित्र बना सकते हैं जैसे - समंदर मे उतरे बिना उसकी गहराई का पता कर लिया हो। उसे भाप कर, उसका एहसास करके, उसके छु कर, उसे सुनकर और उसे महसूस कर के।

जिंदगी कि किताब

Friday, December 27, 2013

कुछ हल्का सा दिखा

दूर से ही देख रही थी वो बांस की मजबूत कुर्सी और उसके बगल मे रखी वो टेबल जिसके ऊपर अगर हाथ रखकर कोई खड़ा भी हो जाये तो टूटकर नीचे ही गिर जायेगी। लेकिन अभी कुछ देर के बाद मे वहाँ पर भीड़ ऐसे टूट कर पड़ेगी के उसको रोकना यहाँ किसी के बस का नहीं होगा।

वो वहीं पर उस टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठे थे। ये उनका काम नहीं था लेकिन उनके पास इस काम के अलावा इस समय कुछ और करने को ही नहीं था इसलिये रोज़ सुबह निकल पड़ते और कईओ की दुआये लेते हुये उस जगह पर बैठ जाते। उनके हाथ दुख जाते मगर यहाँ पर बोल खत्म होने का नाम ही नहीं लेते थे और उनका काम था उन बोलों को शब्दों मे उतारना। कुछ इस तरह उतारना की पढ़ने वाले को उनके अन्दर दबे दर्द का बखूबी अहसास हो जाये और जिसके लिये उन बोलों को शब्दों के जरिये शहर में उतारा जा रहा है वो नंगे पाँव बस होता चला जाये।

उनके नाम के बिना ही उनको लोग जानने लगे थे और वो भी नाम के साथ किसी को नहीं जानते थे। ये इस वक़्त मे बनने वाले ऐसे रिश्ते थे जो लम्बे बहुत रहेगें लेकिन कभी एक - दूसरे पर जोर नहीं डालेगें। एक - दूसरे को खोजेगें जरूर लेकिन खोने से घबरायेगें भी नहीं। दूर हो जाने से उदास जरूर होगें लेकिन हताश नहीं हो जायेगें। यहाँ चेहरे की पहचान बिना नाम जाने थी और नाम की पहचान बिना चेहरे के। फिर भी इनकी उम्र इतनी थी के जगह को अपनी उम्र देकर उसकी जिन्दगी बड़ा देती।

रिश्ते, कितने मीठे और सूईदार होते हैं? ये हम वियोग या योग मे कह भी दे तो उसमें बहस करने की कोई बात नहीं है। ये तो सम्पर्ण करने के सामन होता है। जिसके करीब उतना ही मीठा और जिसके बहुत करीब उतना ही सूईदार। जिससे दूर जाना उतना ही मीठेपन का अहसास कराता और उससे बेहद दूर जाना उतना ही सूईदार। कोई अगर ये कह दे तो क्या उससे लड़ने  जाया जा सकता है? ये तो वे अहसास से जो बिना माने या मानने से इंकार भी किये सफ़र कर ही जाता है। इसमे "मेरी" "तेरी" की भी लड़ाई हो सकती है और लड़ाई हो भी क्यों भला? ये जीवन की वे लाइने हैं जिसमें दोनों ओर से न्यौता खुला होता है। बिलकुल फिल्मों के उन गानों की तरह जो न तो किसी हिरोइन के लिये गाये जाते हैं और न ही किसी हीरो के लिये। मतलब वे गाने फिल्म के किसी क़िरदार के लिये नहीं होते। वे तो जीवन का कोई हिस्सा पकड़कर उसके मर्म के लिये गाये जाते हैं। उसका अहसास गाने वाले के लिये भी होता है, गाने पर अदाकारी करने वाले के लिये भी, गाना लिखने वाले के लिये भी और गाना सुनने वालों के लिये भी।

Friday, September 20, 2013

कम आमदनी में जीना

हफ्ते में शायद ही कोई ऐसा दिन होता होगा जिस दिन बिमला जी घर में कुछ खोज ना रही हो। अक्सर पलंग के अंदर से चावलो के कट्टे में रखे बर्तनो को निकालकर वे घण्टा भर उन्हे देखती व खकोकरती रहती हैं। कटोरियां अलग, गिलास अगल, चम्मचे अलग, थालियां, लोटे सब अलग। सा‌थ ही पीतल, सिलवर और स्टील अलग। उनके थैले में बर्तनों के साथ साथ चुम्मबकों के कई छोटे छोटे पीस पड़े रहते हैं। वे सबके अलग अलग चिट्ठे बनाकर उन्हे गिनती रहती है। अपने कोई हिसाब लगाकर उसे वापस उसी बोरी मे बड़ी सहजता से रख देती है। मगर यह देखा और खकोरना यहीं पर नहीं थमता। यहां से शुरू होता है। हर वक़्त उनके कान उस आवाज़ को सुनने की लालसा करते हैं जिसमें कुछ अदला-बदली के ओफर हो। कुछ लिया जाये और कुछ दिया जाये। वो इस बात पर हमेशा कहती है, “यह सारे बर्त बेटी की शादी में काम आयेगें। उसके कन्यादान देने के लिये।" उनके घर मे सारे बर्तन ऐसे ही किन्ही नाम से रखे गये हैं। सबके घरों मे गुल्लके होती है मगर बिमला जी के घर मे यह चावलों के कट्टे ही उनकी गुल्लके थी। जिसमें पैसे नहीं बर्तन थे।

आज बी कुछ ऐसा ही दिन था। होली चली गई है। पर कई ऐसी चीजें छोड़ गई है जिनका उपयोग किया जा सकता है। उनके घर मे कुछ भी बेकार नहीं है। डिब्बे, प्लास्टिक, लोहा और यहां तक की कपड़े। एक भी होली खेला कपड़ा ऐसा नहीं था जो बेकार हो। सुबह ही उन्होने एक एक कपड़ा एक कोने मे जमा कर दिया था। कमीज़, पेन्ट, सूट, साड़ी, टीशर्ट, पजामा, बनियान, कच्छे और टोपिया यहां तक की जूते भी। अलमारी खोलकर सारे कपड़ो को बाहर निकाल कर उनमे कुछ तलाश रही है। तलाशते तलाशते बात भी ऐसी कहति है कि किसी को बुना ना लगे। "चलो भई आज अलमारी मे से गर्म कपड़े बाहर निकाल दिये जाये और पतले कपड़ों की जगह बनाई जाये।"

Saturday, August 17, 2013

मिट्टी के निशान

कौन कहता है की वक़्त चुटकी बजाते ही गुज़र जाता है? वक़्त कभी गुज़रता नहीं है। वो जमा रहा है कई अनगिनत चीज़ों मे और जरूरत की हर एक तस्वीर में। यहाँ इस घर मे भी वक़्त  जाने कितने समय से कहीं छुपा बैठा था। सबको दिखता था लेकिन शायद ही किसी की हिम्मत होती की उसको जाकर छेड़ा जाये। हर कोई उस वक़्त को हर रोज़ सलाम करता हुआ दरवाजे के बाहर हो जाता और शाम को उसी के कहे नक्शेकदम पर चलने की कोशिश करता। खाली यही नहीं था जो किया जाता। इस वक़्त को मौज़ूद रखने के लिये वक़्त को जिन्दा कहा जाता। उसके पीछे न जाने कितनो से लड़ना पड़ता। ऐसे ही दोहराने में क्या नहीं दोहराया जा सकता? वो भी दोहराया जा सकता है जिसकी कोई पहचान नहीं है और वो भी दोहराया जा सकता है जिसकी कोई याद नहीं है। हर चीज़ आज बिना कुछ बोले ही दोहराये जाने के लिये तैयार खड़ी थी।

गुज़रे दिन पुरानी तस्वीरों को देखकर ऐसा लगा जैसे इसमें छुपा और पीछे नज़र आता घर फिर कभी नहीं देख पायेगें। खुशी के साथ एक डर भी था। न जाने क्यों था? होना तो नहीं चाहिये था। घर का बनाना किसी के लिये कितना मायने रखता है? और अपने घर को बनते देखना शायद इस दुनिया का सबसे अनमोल तोहफा है।

Thursday, July 4, 2013

आसपास से साधन



आसपास अनेकों रंगबिरंगी जीवन की घटनाओं का एक जत्था किसी एक शख्स की जिन्दगी की कहानी कहता है। कभी सौगातें, कभी मुश्किलें, कभी फैसले तो कभी चाहतों के गट्ठर बनकर। हर शख्स और रिश्तों के भीतर कई ऐसे कारणपस्त दृश्य छिपे हैं जो उदाहरण बने कईयो के जीवन में दखलअंदाजी करते हैं। एक दूसरे में ट्रांसफर होतेये दृश्य बनते एक जिन्दगी से हैं लेकिन फिर सबके हो जाते हैं। किताबें इन सबके हो जाने से पिरोये जाती हैं। जिनमें हंसी, खुशी, चुनौतियाँ, परेशानियां और उनके निवारण, कामयाबी के चरण को बखूबी बुनियादी शब्दों में बांधकर एक पुल बनाया जाता है। किताब उस पुल को ध्यानपूर्वकता से पढ़ने और भविष्य की तस्वीर को गाढ़ा कर देने की फोर्स का एक नाम भी हो सकता है।

स्कूली किताब के पाठ, आकार और पाठ के ज्ञान को उसके वज़न द्वारा किताबों में भरा जाता है। लेकिन इतने बेजोड़ जोड़ के बावजूद भी जब एक क्लास इनके बीच घूम रही होती है तब वे सभी वज़न आम जीवन की जमीन पर बिखर जाते हैं। जैसे किसी पाठ के किरदारों, जगहों, भाषाओं, महोलों से भरी लदी गाड़ी का जोरदार एक्सीडेंट जीवन के तरल पहाड़ से हो गया हो। उस पाठ के कई हिस्से आम जीवन की जमीन को छूने लगते हैं

किताबें अणुओं की भांति रेंगती हैं। एक से दूसरे को धकेलतीं हैं। फिर मिलना व चिपकना शुरू होता है। जिसमें कई ऐसी जीवनिए घटनायें, शख्स, भीड़, रिश्ते, कहानियां भी खिंच आती हैं जिनका भाषा और जमीन से चिपकने की कोई जरूरत नहीं।



लख्मी
 

Monday, May 6, 2013

कुछ काले घेरे


हर वक्त कुछ काले घेरे आसपास ही रहते हैं। 


राकेश
 

Thursday, May 2, 2013

बचपना अब बाकी नहीं रह गया था।

वही जानी पहचानी आवाजें कानों में पड़ती जिनके लिये पीछे मुड़ना शायद जरुरी नहीं था और ना ही उन्हे सुनना। आज फूलजहान से छोटी उसकी बहन नूरी का भी रिश्ता तय होने वाला था। मगर उसके चेहरे पर खूशी ही नहीं बल्की खूब खिलखिलाती हसीं थी। जिसको देखकर उसके सारे रिश्तेदार उसकी बलाईयां ले लेते और शायद यही एक काम रह गया था उनके पास। फूलों सुबह से अपनी अम्मी के ट्रंक में से उनकी नई साड़ी पहनने की बात भी कर चूकी थी और "पूरा शिगांर करुगीं...पूरा शिगांर करुगी" की रट भी लगा चूकी थी।

एक तरफ घर में पुलाव की महक घूम रही थी लगभग पच्चीस-तीस आदमियों का खाना तो बनाना पड़ेगा "ये ले आओ...ये ले आओ" के नारे फैले थे। आज तो वैसे भी किसी के पास वक़्त नहीं था शाम की तैयारी थी। उसमें फूलों भी सुबह से चार बार साड़ी पहनती और खोलती लगा रही थी। खिलखिलाई सी वो आज सबसे खूबसूरत बनने की तैयारी में थी। बड़ी बहन की शादी में तो सुध ही नहीं थी तैयार होने की तो अब अपनी छोटी बहन कि शादी में क्यों कसर छोड़े? "अरी फूलों कहां है किसी को खबर है?” ( नीचे से किसी ने आवाज लगाई)

"अरे वो रही ऊपर साडी बाधं रही है। आज तो सजकर ही नीचे उतरेगी ये।" ( किसी में ताना कसते हुये कहा)
क्यों ना सजे मेरी बच्ची उसकी छोटी बहन की रिश्तेदारी हो रही है। मैं बधंवाऊगी मेरी बच्ची की साड़ी।"

कुछ देर के बाद फूलो रेशमी सतंरगी साड़ी में बाहर आई एक लम्बा सा घूघंट और अम्मी साथ में। सीढियां थोड़ी छोटी थी तो अम्मी उसे सम्भाल कर नीचे ला रही थी।

"बेटा घूंघट तो ऊपर कर ले गिर जायेगी।" पर हमारी फूलों अपनी बातों में किसी को जगह देती ही कहां थी। पता है वो क्या बोली?

"नहीं-नहीं अम्मी में घूंघट में ही जांऊगी बडीं बहन ने भी तो किया था शादी में "मैं भी करुगीं" और फिर हसंती हुई नीचे उतरती। अम्मी का ध्यान उसके पैरों पर ही था की कहीं ये फिसलकर गिर ना जाये तो उसको एक-एक सीढ़ी बोल-बोलकर उतार रही थी। अम्मी ने उसे नीचे उतारते हुए कहा था। हर कोई वैसे उसको ना जाने किनकिन बातों से खुश रखने की ही सोचता रहता था। वो बोली थी, "देखा कितनी खूबसूरत लग रही है हमारी फूलो। हटो मैं अपनी बच्ची की नज़र तो उतार लूं जरा।"

सारे के सारे आये रिश्तेदार उसकी तरफ में एक टक लगाये देख रहे थे। घूंघट में जो है वो क्या फूलो ही है या कोई और सीधी खड़ी है। ना कोइ का जोश, ना कपड़ों का चबाना!!!

उनमे से एक ने प्यार भरे स्वर में कहा, “अरे ये घूंघट में हमारी गिट्टी है क्या?”

इस आवाज़ में वो लहज़ा नहीं था जो वो अक्सर गली में सुना करती थी। उसने फौरन अपना घूंघट ऊपर किया आखों में सुरमा, गालों पर लाली और होठों पर लिपिस्टीक!

वो तुरन्त बोली, “मामू जान! मामू मैं कैसी लग रही हूँ लग रही हूं ना! बिलकुल बड़ी दीदी जैसी?”

उनके पास में "हां" के अलावा कोई और शब्द ही नहीं था। अब वो भी बाकी के लोगों के साथ में बैठ गई। जानती हो आसपास में बैठे सभी गली के लोग का तो जैसे ध्यान ही बट गया था। कभी तो वो रिश्तेदारों के ऊपर देखते तो कभी साड़ी में बैठी उस लडकी को। ना जाने क्या देख रहे थे जैसे सब कुछ गुम सा हो गया था। अब मुझे सगाई के लिये जाना था तो मुझे सभी अपने साथ में बैठाकर सारे इन्तजाम कराने के लिये कह दिया। अब सगाई की रसमें पूरी
करानी थी तो सभी ने कह दिया था की हम सारी रसमें फूलो से ही पूरी करायेगें। मैं रिश्तेदारों के बीच में बैठी थी। फूलों को कह दिया था की वो सारे समानों को मेरे हाथ में रखती जाये। तो वो एक-एक समान को देखती रही और मेरे हाथों में रखती गई। वो एक-एक समान को ऐसे देख रही थी की जैसे वो ना जाने क्या हो? पर उसका मन लग गया था उन रसमों में और अपनी कभी ना रुकने वाली नज़रों को घूमाती वो खिलखिलाती उन रसमों को निभाती गई। वो खूब जोर-जोर से हसनें लगी थी।

"मैं तो सब कबूल कर लूँ बस। मेरी फूलो का कहीं कुछ हो जाये। पता नहीं क्या होगा इसका?”

अम्मी उसको देख-देखकर बोले जा रही थी। बस, वो तो चारों तरफ में देखकर हँसे चले जा रही थी। ये नया काम लग रहा था। उसको जो वो किये जा रही थी। वो आज बहुत खुश थी। अपने नये रूप में बस अपनी साड़ी और कंगना को देखती फिर उसे घुमाती। बड़ी झूम रही थी। बस, जब सब कुछ हो गया तो वो सारे लोगों से दूर अपनी उसी खाट पर जाकर बैठ गई जिसपर वो हमेशा बैठकर सबके साथ में खेलती और बातें बनाती थी। उस दिन वो इतना अलग लग रही थी। ना के सभी उसको देखकर वो रोज का उसका थूकना और उसकी चिपचिपाहट को जैसे भूल चूके थे। भाभी भले ही आज बहुत सारे कामों को करते हुए। अपने ये दिन दोहरा रही थी पर आज तो उनके कामों पर कुछ भी ध्यान नहीं जा रहा था। बस, उबकी बातों के ऊपर ही सब कुछ था। वो तो बिलकुल खो ही गई थी। आज ऐसा लग रहा था जैसे की वो आज अपने रिश्ते को बड़े नजदीक से देखकर बता रही हो। वो अपनी बहन के बारे में नहीं पर अपनी गली में बैठी उस लड़की के बारे में बता रही थी जो खाट पर बैठी सब पर थूकती थी। या सबको टोकती थी। पर आज उसी खाट पर वो कुछ और ही थी। उसे कैसे यादों में दोहरा रही थी? नूरी!!

नूरी ने इस रिश्ते की गांठ में फूलो का बचपना भी बांध दिया था।

लख्मी

Wednesday, April 3, 2013

उफ, ये बारिश भी

बारिश का मौसम हो चला था। सखी अभी अभी ही घर में आई है। अपने नई नवेली दुल्हन के रूप से निकलने में सखी को ज्यादा समय नहीं लगा। पूरी गली में तो रिश्ते ही रिश्ते रहते हैं। कहीं बाजी, कहीं चाची, कहीं अम्मी तो कहीं मामी।

रोज दिन के चार घन्टे तो इनके साथ बतियाते में ही गुज़र जाते हैं। बस सखी अपने मियां के आने से बीस या पच्चीस मिनट पहले ही घर में मुहं उठाये सिधा दोड़ी चली आई है। घर में फर्स नहीं है तो नंगे पाव में मिट्टी लगी है। तलवे रोजाना काली राख में रंग जाते हैं। उनके मियां अक्सर कहते हैं की "सखी मेरी जान नंगे पावँ मत रहा कर मिट्टी से नुक्सान होता है। तेरे पाँव फट जायेंगे और गोरे-गोरे पाँव काले पड़ जायेगें।"

मगर सखी के पाँव अपने घर में चप्पल पहनकर नहीं उतरते बस, रोजाना की तरह उनके मियां के आने से पहले ही सखी अपने सजो-श्रंगार में लग जाती है।

आज भी बैठ गई हैं एक हाथ में शीसा पकड़े और दूसरे से लिपिस्टिक का रंग देख रही हैं। उनके साथ वाली अम्मा अक्सर कहती हैं, "अरी सखी अपने आपको श्रंगार में रखा कर नई नवेली है। श्रंगार में नहीं रहेगी तो लोग खूब बातें बनाने लगेंगे।"

सखी अब बिलकुल तैयार है। खुद को सजाने में कुछ गुन-गुनाती हुई शायद वो सोच रही हो कि कल की ही तरह अगर आज भी उन्होनें आते ही गले से लगा लिया तो। यह सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट की लहर से दौड़ जाती है। इसलिये अपने हाथों को पाउडर से मलते हुए उसने हल्का-हल्का अपने चेहरे पर भी लगा लिया है कि कहीं अगर उन्होनें आज भी चेहरा छू लिया तो। साथ ही इस सोच में वक़्त लगा रही है कि कल तो महरुम रंग की लिपिस्टिक लगाई थी। आज कौन सी लगाऊ। लिपिस्टिक लगाई, काजल लगाया, हलकी सी चोटी की और चूड़ी तो उन्ही कि लाई पहनी है। अपने आपको पूरा श्रंगार करने के बाद भी आईने में बार-बार देख रही है की कहीं कुछ कम तो नहीं रह गया। बस, उनके आने का इन्तजार है।

उनके मियां के आने का वक़्त हो गया था। इतने में दरवाजे की जोर से आवाज़ आई। वो एक बार फिर से शीसे को देखती हुई और अपने कपड़ों को संभालती हुई दरवाजे की तरफ गई। चेहरे पर मुस्कुराहट भरते हुए दरवाजा एक झटके में खोल दिया। मगर बाहर काफी तेज आन्धी चल रही थी। उसकी की तेजी से दरवाजें पर जोरदार दस्तक हुई थी। अपने मियां को देखने की चाहत जैसे उनकी पल भर में गायब हो गई।

सखी ने इधर उधर देखा और सीधा अपने ऊपर वाले कमरे जो की बांस की पतली डंडियों से बना है। जिसपर छप्पर है या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो वहां पर तेजी से गई और रात के सुखाये कपड़े उतार लाई। इतने में तो बारिश भी शुरू हो गई। मगर उनके मियां अभी भी नहीं आये थे।

हल्की हवा और तेज बारिश सखी के लिए किसी तूफान से कम नहीं थी। आँखे दरवाजे पर ही टिकी थी। बारिश में भीगते हुए उनमे मियां दरवाजे पर दाखिल हुए।

वो उनकी तरफ गई। ना जाने क्या-क्या सोचते हुए। अपने रूप से, अदा से, श्रंगार से उनको रिझाती। बातों में नटखटपन भरते हुए बोलीं, "क्यों जी आज खूब भीगे हो। ठन्ड तो नहीं लग रही? आओ कपड़े बदल लो। आपके हाथ मसल दूँ।"

इतना कह कर वो चुप हो गई। उनके मियां भीगे हुए थे। वो उनकी तरफ में मुस्कान भरते हुये बोले, "आज तो बड़ी प्यारी लग रही है। क्या बात है?”

वो कुछ ना बोली और अन्दर की तरफ चली गई। अपनी मुस्कुराहट से अपने प्यार को उभारने लगी। मोटी-मोटी बूँदे तड़तड़ पड़ रही थी। इतने में उनके छप्पर से बनी छत का एक कोना भारी बारिश के मार से नीचे गिर गया और पूरे घर में पानी ही पानी भर गया। उनके मियां यूंही बाँस से बनी फिसलती छत पर नगें पैर ही चड़ गये और छत को ठीक करने लगे गये। मगर लग रहा था की जैसे बारिश रुकने वाली नहीं है। सखी वहीं कोने में से पानी से बची खड़ी खड़ी अपने मियां को देखती रही और बस,  देखती ही रही।

लख्मी