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Wednesday, June 19, 2013

अदला-बदली के ओफर

हफ्ते मे शायद ही कोई ऐसा दिन होता होगा जिस दिन बिमला जी घर में कुछ खोज ना रही हो। अक्सर पलंग के अंदर से चावलो के कट्टे में रखे बर्तनो को निकालकर वे घण्टा भर उन्हे देखती व खकोकरती रहती हैं। कटोरियां अलग, गिलास अगल, चम्मचे अलग, थालियां, लोटे सब अलग। सा‌थ ही पीतल, सिलवर और स्टील अलग। उनके थैले में बर्तनों के साथ साथ चुम्मबकों के कई छोटे छोटे पीस पड़े रहते हैं। वे सबके अलग अलग चिट्ठे बनाकर उन्हे गिनती रहती है। अपने कोई हिसाब लगाकर उसे वापस उसी बोरी मे बड़ी सहजता से रख देती है। मगर यह देखा और खकोरना यहीं पर नहीं थमता। यहां से शुरू होता है। हर वक़्त उनके कान उस आवाज़ को सुनने की लालसा करते हैं जिसमें कुछ अदला-बदली के ओफर हो। कुछ लिया जाये और कुछ दिया जाये। वो इस बात पर हमेशा कहती है, “यह सारे बर्त बेटी की शादी में काम आयेगें। उसके कन्यादान देने के लिये।" उनके घर मे सारे बर्तन ऐसे ही किन्ही नाम से रखे गये हैं। सबके घरों मे गुल्लके होती है मगर बिमला जी के घर मे यह चावलों के कट्टे ही उनकी गुल्लके थी। जिसमें पैसे नहीं बर्तन थे।

आज बी कुछ ऐसा ही दिन थास। होली चली गई है। पर कई ऐसी चीजें छोड़ गई है जिनका उपयोग किया जा सकता है। उनके घर मे कुछ भी बेकार नहीं है। डिब्बे, प्लास्टिक, लोहा और यहां तक की कपड़े। एक भी होली खेला कपड़ा ऐसा नहीं था जो बेकार हो। सुबह ही उन्होने एक एक कपड़ा एक कोने मे जमा कर दिया था। कमीज़, पेन्ट, सूट, साड़ी, टीशर्ट, पजामा, बनियान, कच्छे और टोपिया यहां तक की जूते भी। अलमारी खोलकर सारे कपड़ो को बाहर निकाल कर उनमे कुछ तलाश रही है। तलाशते तलाशते बात भी ऐसी कहति है कि किसी को बुना ना लगे। "चलो भई आज अलमारी मे से गर्म कपड़े बाहर निकाल दिये जाये और पतले कपड़ों की जगह बनाई जाये।"

कई तो ऐसे कपड़े है जो पहने नहीं जाते मगर फिर भी रख रखे है। इनका क्या होगा? एक एक कपडा हाथ मे उठाती और कहती, “यह नीली पेन्ट पहनता है कोई?” पहले इस तरह की आवाज़ मारी जाती। एक बार, दो बार, तीन बार और अगर कोई नहीं सुनता तो वो पेन्ट या कपड़ा घर से विदा करने की सूची में डाल दिया जाता।

उन्होनें जैसे ही यह आवाज़ लगाई तो छत पर से उतरते श्याम लाल जी बोले, “उसे रख दे अभी, वो सही है।"
यह सुनकर वे बोली, “पहनते तो कभी देखा आपको मैंने?” क्योंकि कपड़े में वो बात है कि एक पतीला ले सकता है।
यह सुनकर एक दम से श्याम लाल जी बोले, “तेरे को पता है, कुछ कपड़े खास मौके के लिये बने होते हैं। इसका मौका नहीं आया है अभी।"

वे पेंट को उलटते पलटते बोली, “पता नहीं यह खास मौका होता क्या है?”
श्याम लाल जी चहक कर बोले, “तू अपनी साड़ी क्यों नहीं देती?”
गुस्से में उनकी ओर देखती हुई बिमला जी बोली, “बस, जब देखो मेरी साड़ियों के पीछे पड़े रहते हो। साड़ियां तो कभी भी घर की किसी भी लड़की को दी जा सकती है।"

यह कहती हुई बिमला जी किन्ही और कपड़ो को छाटने लगी। यह लडाई तो घर मे अक्सर चलती है। पर जिन कपड़ो को घर से विदा होना होता है वो तो होकर ही रहते हैं। तभी गली में से गिलासों को टकराने की आवाज़ आई। यह वही बर्तन वाले हैं जो आजकल आवाज़ नहीं मारते बस कांच के गिलासों को आपस मे टकराकर आवाज़ करते हैं।

ओ भइया बर्तन वाले रूकयो जरा।" बिमला जी कमरे के अंदर से ही चिल्लाई।
एक आवाज़ दूसरी आवाज़ से चाहे कितना ही शोर क्यों ना हो एक दम से कनेक्ट हो जाती है। सुनना तो आखिरकार सुनना ही है। दरवाजे पर ही उसने अपने कपड़ो से लदी पोटली को कांधो से उतार कर रख दिया। साथ ही सिर पर से बर्तनों कि टोकरी को भी। हाथ मे पकड़े बाल्टी और टब को भी उनके सामने दरवाजे पर ही रख दिया। वहीं उसकी छोटी सी दुकान अब लग चुकी है।

बिमला जी ने कहा, “कितने कपड़ों मे दोगे भइया यह बर्तन?”
बर्तन वाला बोला, “कपड़े तो दिखाईये बहन जी।"
बिमला जी बोली, “पहले बताओ तो सही भइया तभी तो निकालूगी ना कपड़े तो।"
बर्तन वाला बोला, “टब तो 7 कपड़ो मे दूंगा बहन जी, बाल्टी 6 मे, छोटे बर्तन 2 कपड़ो में एक और कढ़ाई 5 कपड़ो में। अगर फटे - वटे ना हो तो।"
बिमला जी अंदर जाते जाते थोड़ा गुस्से के अंदाज मे बोली, “हम क्या पागल है भइया जो आपको फटे कपड़े देगें।"

बस बिमला जी ने सारे होली के कपड़े उसके आगे लाकर पटक कर वहीं बैठ गई। वो अग एक एक कपड़े को उठाता और पूरी नज़र भरता। जेब, जिप, मोहरी, पीछे का भाग, फॉल, बटन, हुक, सिलाई, बाजू, पट्टी, रंग, कपड़ा सब का सब एक एक करके छूकर देखता और पूरी गुंजाइश करके बोला, “सारे होली के कपड़े है बहन जी?”

बिमला जी उसकी तरफ मे नजर गड़ाकर बोली, “हां भइया वो तो है। अब नये तो दे नहीं सकते ना।"

वो फिर से कपड़ों मे हाथ फिराता हुआ बोला, “कोई साफ कपड़ा नहीं होगा बहन जी? इनपर से तो रंग भी नहीं उतरेगा और रंग अंदर तक गया हुआ है। इसे तो उल्टा करके भी नहीं बनाया जा सकता।"

"अब मुझे तो पता नहीं भईया। मेरे जो था वो मैंने दे दिया आपको। जो पहले पुराने कपड़े थे उसकी मैंने दरी बनवाली। अब तो यही है इनमे देना है तो दे दो भइया।" वो बोली।

वो एक बार फिर से कपड़ो मे हाथ घुसाता हुआ बोला, “इनमे टब तो नहीं दूंगा मैं बहन जी गिलास ले लो।"

बिमला जी का मन टब मे ही अटका था वो बोली, “नहीं नहीं भइया चाहिये तो टब ही।"

वो बोला, “तो एक दो कपड़े और हो या कोई साफ एक पेंट ही ले आइये।"

ये सुनकर वो बोली, “अरे भइया 8 कपड़े दे चुकी हूँ तुमको।"

बर्तन वाला बोला, “हां जी पर सारे के सारे रंग मे हो रखे है। एक दो कपड़े तो साफ हो ना।"

बिमला जी बोली, “ठीक है भइया देखती हूँ।"

वो अपने और बाकी के कपडों की गठरी की तरफ चली गई। उन्हे मालूम होता है कि ये बर्तन वाले हमेशा ऐसे ही करते हैं तो वे हमेशा कुछ कपड़ो को पहले ही छुपा देती है। ताकी बाद मे उनमे से ला सके। पहले अगर देगी तो वो उन्हे देखकर और मांगेगे। उन्होने उन्ही कपडो से एक पेंट निकाली और उसे लाकर दी। और सौदा पक्का हुआ। बर्तन वाले ने टब उनकी तरफ खिसकाया और सारे कपड़े बांधने लगा।

तब तक बिमला जी का ध्यान बाकी के बर्तनों पर जम गया। लोहे की कढ़ाई चाहिये उस लड़की के लिये, फ्राइफेन चाहिये इस लड़की के लिये, टीफिन चाहिये लड़के के लिये, बाहरह कटोरियां चाहिये उसके लिये, पतीले चाहिये इस मौके के लिये, पांच बर्तन सेट चाहिये इसके लिये। उनका दिमाग ना जाने कहां कहां घूम रहा था।

उस बर्तन वाले ने जैसे ही अपना टोकरा अपने सिर पर रखा तभी बिमला जी बोली, “भईया यह बाल्टी कितने कपड़ों मे दोगें?”

खेल दोबारा से शुरू हुआ। पोटलियां फिर से खुलने लगी। 

लख्मी 

Friday, February 8, 2013

दो अवशेषों के बीच बातचीत

10 दोस्तों का एक गुट एक पिज़्जा हॉट से खाकर निकला। एक प्लेट में पिज़्जा के कुछ टुकड़े और दूसरी प्लेट में एक सौ का नोट छोड़कर।




टीप में दिये गये 100 रूपये के नोट ने प्लेट में पड़े पिज्ज़ा से पूछा, " तुम बता सकते हो कि आखिर काम क्या है?”
पिज्ज़ा ने उसकी ओर देखते हुये जवाब दिया, "काम भूख को संतुलन में रखने के लिये किया जाता है।"

100 रूपये का नोट, "तो फिर कमाई क्या है?”
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, " कमाई तो भूख को बढ़ाने के लिये होती है।"

100 रूपये का नोट, "एक अच्छे काम में और एक अच्छी कमाई में क्या फर्क है?”
पिज़्ज़ा ने कहा, " जिसमें हर तरह की भूख का निवारण हो। वो सिर्फ शरीर की शक़्ति, दिमागी संतुलन को भी महत्व दिया जाये।"

100 रूपये का नोट, "तुम्हारे इस काम में आराम क्या होता है?”
पिज़्ज़ा ने कहा, "यहां केफे कॉफी शॉप में आकर लगा और जाना भी की आराम यहां पर व्यस्त रूटीन की थकावट को पाना नहीं है। ये बिलकुल ऐसा है जैसे कोई मॉडल के जैसा जिसे हर 2 मीनट के बाद मे कपड़े बदलने है जब वो कपड़े बदलता है तो रिलेक्श नहीं होता बल्कि स्थिर होता है मगर उसका पूरा ध्यान उस रेंप पर होता है जहां से वो आया है और अभी वहीं पर जाना है। हम भी एक कुर्सी पर बैठे उस रेंप के लिये बैठे हैं।"

100 रूपये का नोट, "किसी काम के लिये तैयार होना क्या है? क्योंकि मुझे तैयार नहीं किया जाता। मुझे लाया जाता है। मैं किसी का नहीं हूँ। मैं हाथ का मैल हूँ। ये कहा जाता है और तुम्हारे लिये क्या?”
पिज़्ज़ा ने थोड़ा रूककर जवाब दिया, "तैयारी तो ताजा होना है, लूक बनाना है, इम्प्रेशन लाना है और साथ ही ये तैयारी सिर्फ इसलिये भी नहीं है की तुम कैसे दिख रहे हो। ये उस आंख के लिये है जो दिखाई नहीं दे रही मगर फिर भी तुम्हे देख रही है। वे आंख किसी अकेले की भी नहीं है। किसी भी हो सकती है। हर आंख का अपना ही एक सवाल है उन सभी सवालों का एक बेशब्द जवाब है ये तैयारी। तुम कौन हो, कहां जा रहे हो, तुम्हारा स्टेटश क्या है, किस रूतबे में हो, क्या करने जा रहे हो और साथ ही पहचान के सवाल भी होते होगें। इन सबको बदलती, पलटती और सहराती भी है ये तैयारी। तैयारी खुद के साथ होती जरूर है लेकिन होती अपने से बाहर के लिये हैं। कुछ देर ही होती है फिर समाप्त हो जाती है। मैं इसमे रोज जीता हूँ।"

100 रुपये के नोट ने फिर पुछा, "तैयारी पूरी हो गई क्या तुम्हे इसकी परख हो जाती है?”
पिज़्ज़ा ने कहा, "मुझे बनाने वाले ने जब मुझे फिर से देखा, तभी ये अहसास हो जाता है। हाथ मे लेता है, छूता है, देखता है, रखता है, फिर से देखता है, जैसे वो मेरी तैयारी में खुद तैयार कर रहा हो। वॉमप भी करता है। आसपास से खुद को ट्रेंड करता है। देखकर सीखता है और खुद में धारण कर लेता है। मैं कुछ समय के बाद मे उसका हो जाता हूँ। मैं उसका हुआ और वो मेरा। जैसे वो मेरे अंदर घुस गया हो। हम असल में अपने अंदर मे घुसे हुए उन सभी लोगों की एक्टींग करते हैं। कब कौनसे बंदे की एक्टिंग करनी हैं इसको जान लेते है। तैयारी तो सारी भीड़ मे खोई हुई है। किसी के कंधे पर हाथ रख कर पूछो की 'भाई साहब क्या कर रहे हो?' तो वो बोलेगा कोर्स कर रहा हूँ या कहेगा की जॉब कर रहा हूँ। कोई भी शायद ये कहे की घूम रहा हूँ शहर देख रहा हूँ और अगर ये वो कह भी देगा तो आपको लगेगा की आपका मजाक उड़ा रहा है या तंज मे बोल रहा है। यहां पर एक शख्स रोज़ आता है। वो मेरा फेन है। मुझे बेहद पसंद करता है। मेरी इज़्जत करता है। मैंने उसकी सारी बातें सुनी है। वो कभी अपनी बात नहीं करता और वो कभी अकेला भी नहीं आता। वे अपनी जेब में जैसे शहर की हर तरह की नौकरी लिये चलता है। उसके साथ आये सभी उससे नौकरी ही बात करते हैं। जब भी उससे काम की बात होती है वो तो कहता है की चल चला जा मैं पता देता हूँ मेरा नाम ले दियो बस, नौकरी लग जायेगी।"


100 रुपये के नोट ने चाव दिखाते हुए पूछा, "किसी राह पर कितनी चीजों को हम छोड़ते हुए पहुँचे हैं इसका पता कैसे चलता है?”
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया बिना किसी इमोशन के, "वैसे देखा जाये तो हमने पकड़ा ही क्या है अब तक? हमें एलियंस की फिल्मों की तरह रखा जाता है। हमें देखकर लोग चौंकते हैं, डरते हैं और अपना भी बना लेते हैं। एक डायलॉग है जो मैंने यहां कईओ के मुंह से सुना है कि हम इंसान अपना दिमाग 10 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाते हैं। बाकि का 80 प्रतिशत तो खाने में खत्म कर देते हैं। तभी तो हम जिन्दा होते हैं रोज और हम रोज़ इस्तेमाल में आते हैं। हम 90 प्रतिशत तो छोड़ते और भूलते ही तो जा रहे हैं। इसका अपना दम है।"


100 रूपये के नोट ने गुस्से में पूछा, "तो क्या हमें चुना जा रहा है?” 
पिज़्ज़ा ने कहा बिना किसी इमोशन के, "चुनाव अपने आप में खुद क्या होता है? 1000 लोग रोज आये। आने से पहले कुछ चुनकर आये। कुछ यहां पर आकर चुनाव किये। कुछ अपने से बाहर होकर चुनाव किये तो कुछ किसी का चुनाव देखकर चुने। स्वाद से चुने, जेब देखकर चुने, टेबल देखकर चुने, परिवार देखकर चुने, टाइम देखकर चुने, भीड़ देखकर चुने, भूख सोचकर चुने। खाने के लिये, पैकिंग के लिये, किसी को देने के लिये, किसी को मनाने के लिये, किसी को दूर करने के लिये, प्लेट मे छोड़ देने के लिये। चुनाव है नहीं। चुनाव होता नहीं, चुनाव हो रहा है और होता रहा है।"

100 रूपये का नोट  गुस्सा जारी रखते हुये,  "क्या  इसके लिये भी कुछ सवालों की जरूरत पड़ती है? मुझे प्लेट मे छोड़ दिया गया। मेरी इज्जत बड़ गई किसी के जहन में। मगर मैं तुम्हारे लिये मानयता नहीं रखता। मुझे छोड़ा गया है। मेरा चुनाव किया गया। या मुझे छोड़ दिया गया?” 

पिज़्ज़ा ने कहा  ( बिना किसी इमोशन के), "बहुत तरह के सवालों की जरूरत हो सकती है।


100 रूपये के नोट ने पूछा, “ये सवाल आखिर पूछता कौन है?”
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, “ये सवाल पुछता कोई नहीं है। इन सवालों का अहसास होता रहता है। कभी जब काम में हल्का सा भी मन हटा तब इनका अहसास होगा, कभी जब किसी एक ही काम मे लीन हो गये तब इनका अहसास होगा। मैं जब यहां पर पहली बार आया था तभी इसका अहसास पूरी तरह हो गया था। हर कोई जो यहां पर मेरे से पहले ही काम कर रहा था उसकी तेजी, भागमभागी, बोलचाल सब में इन सवालों का अहसास था। कोई अगर आ गया वो बाहर नहीं जाना चाहिये और अगर कोई नहीं आया तो उसे बुलाकर लाना है। उसे ये अहसास करवाना है कि ये जगह उसी के लिये है और इससे बेहतरीन जगह दुनिया में और कोई नहीं। इतना सोच पाया कि काम की दुनिया में "मोहना" बेहद जरूर है। आसान है लेकिन इसको आज़माना बेहद मुश्किल। जैसे मुझे एक बंदा यहां पर रोज़ यहां से वहां करता है। वो कर क्या रहा है ये तो पता नहीं लेकिन वो हमेशा जैसे बहुत सारे लोगों मे घिर हुआ है। हमेशा फोन पर रहता है। काम जितना आसपास से काटता है उतना ही वो आसपास में ना दिखने वाली भीड़ को तैयार भी कर देता है। हम भी इन सामने दिखती कुर्सियों पर उस भीड़ को हमेशा देखते हैं। हर पांच मिनट के बाद में हममे से कोई ना कोई इन कुर्सियों के पास जाता है और घूमकर आ जाता है। और जब हमारी ट्रेनिंग होती है तो इन्ही खाली कुर्सियों पर ना जाने कितने लोग बैठे होते है। और हर बंदे का एक ऐटीट्यूट होता है। जो हमें अपने अन्दर ले लेगा और उसे हमें काटना होगा। जैसे हम खुद को ही काट रहे हैं और खुद को ही मोहित कर रहे हैं।"

100 रूपये के नोट ने पूछा, "क्या तुम भी कुछ सवाल रखते हो इस सब मे?"
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, “मेरे सवाल तो नहीं मगर शायद तुमने कभी इनको सोचा हो? मैं बस, अपनी बैचेनी को हल करना चाहता हूँ। काम का ताल्लुक अंतिम चीज से है तो उसको रूटीन से क्यों जोड़ा गया। ऐसा क्या है जो काम नहीं है? कमाई, मेहनताना, दिहाड़ी इनके साथ जोड़ दिया जाना वाला काम ही वाज़िब है? सब काम कर रहे है और कोई जगह काम करने के लिये नहीं बनाई जाती तो ये दुनिया कैसी होती? एक चीज और – सोचो की अगर काम का कोई सरकल नहीं होता तो? जैसे हर बंदा इस सरकल में है। आज जो मेरे पास कस्टमर बनकर आया है मैं भी उसके यहां जरूर गया होउंगा या जाऊंगा। बस मे चड़ा कोई कन्डेक्टर से टीकट लेता है तो कन्डेकर भी उसके ओफिस मे किसी ना किसी काम से गया होगा। हर कोई एक दूसरे के पास मे घूम ही तो रहा है मगर फिर भी सिर्फ अपने काम की बात कर रहा है एक दूसरे के काम की नहीं। मैं सोचता हूँ की ऐसे ही कैफेकॉपीशॉप खोलूँ जहां पर लोग अपना काम करने आये। हर कोई ओडर लेने वाला, टेलीफोन ओपरेटर, चित्रकार, कारपेंटर, सभी, एक ऐसी बिल्डिंग जहां काम हो। बिना ओफिस बने और ना ही दुकान।"

100 रूपये का नोट हंसा और बोला, “तुम्हे फिर मेरा साथ जरूर चाहिये होगा। मतलब काम से बाहर की जगह जहां पर लोग एक दूसरे से कुछ बातें करने आये और जो वो कर रहे हैं उसमे उसे जोड़ ले। इस तरह की जगह से तुम संतुष्ट हो जाओगे? और कहां पर बनेगी ये जगह?”

पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, “अभी तो पता नहीं लेकिन बनेगी जरूर।"


लख्मी

Wednesday, March 14, 2012

सवाल के कई जवाब

"आज का सवाल" जब भी स्कूल में इस लाइन को लिखा देखता था तो समझ नहीं पाता था की ये लाइन किसके लिये है? लिखने वाले के लिये, पढ़ने वाले के लिये, देखने वाले के लिये या सिर्फ यूंही है। और उसके नीचे लिखा सवाल तो और भी ज्यादा परेशान करता था की ये सवाल क्या है? क्या इसका जवाब मिल गया है किसी को तब लिखा गया है, अभी तक नहीं मिला है, अब भी ढूंढा जा रहा है, कभी मिल ही नहीं सकता, मिल गया है फिर और ढूंढना है - कुछ समझ नहीं आया। स्कूली दुनिया से बाहर निकल कर जब उन सवालों को दोहराया या समझने की कोशिश कि तो उनके मायने मिले - जवाब तो नहीं।

हम सवालों को किस तरह से सोचते है? क्या वे हमारी दिक्कतों को हल करते हैं?, नई दुनिया मे ले जाते हैं?, आगे का दिखाते हैं?, किसी से मिलवाते हैं?, पीछे का याद दिलाते हैं?, खुद से मिलवाते हैं?, ज्यादातर सवाल - उस असपष्ट दुनिया की ओर इशारा भर है जिसके बाहर खड़े हम उसके अनुमान लगाते हैं। वे हमारी है या हमारी नहीं है - की टाइट उलझनो से बेनज़र होकर। सवाल, पूछे जाते हैं - कहे नहीं, सवाल बताये जाते है- पढ़े नहीं, सवाल गढ़े जाते हैं - दोहराये नहीं। मगर कभी ये समझने की कोशिश मे रहते हैं की सवाल दोबारा जीवन मे लौटते हैं। पर सवाल कभी किसी एक फिक्स जवाब से मरते नहीं।

कुछ सवाल मेरे दिमाग मे रहे हैं - जिन्हे जब बातों मे डालने की कोशिश की तो जीवन की वे झलकियां सामने खुल कर आई जिन्हे मैं कभी अपने खुद के रिश्ते, एकांत, समुह मे नहीं सोच पा सकता था। उसके लिये मुझे इनसे बाहर जाना होता।

ये बातचीते हैं - उन सवालो पर जो मेरे दिमाग मे रूक गये। जिन्हे अपने आसपास में, घूमते शहर मे, सोते शहर मे, खोते शहर मे, इसे पाया।


सवाल , "हमें कब लगता है कि हमें अपने जीने के तरीके पर सोचना होगा?”

सोनम जी, “मैं अपनी जिन्दगी में काफी पीछे रह गई हूँ। सबसे अलग हो गई हूँ। मैनें अपनी पूरी जिन्दगी ऐसे आदमी के साथ बिता दी जिसने मुझे कभी ये सोचने ही नहीं दिया की मैं क्या हूँ। बस, घर और उसको संभालने मे लगी रही। मैं भी चाहती हूँ की बाहर निकलूं, कुछ करूँ, जो मौका मुझे आज मिला है वे पहले कभी नहीं मिला। मैं रोई, अकेली रही, सब कुछ छुपाया, किसी को कभी कुछ अंदेशा नहीं होने दिया कि मैं क्या झेल रही हूँ। लेकिन, अब ऐसा नहीं चाहती। मैं अपने हाथों मे लेना चाहती हूँ सब कुछ, ताकी मेरे बच्चे मेरे आने वाले टाइम को लेकर डरे ना। अब सोचने को मिला है। मुझे सबने खींचने की कोशिश की, मगर मैं वावली सी बनी रही। जैसे मुझे कुछ समझ ही नहीं है दुनियादारी की। बस, उसके और परिवार-परिवार करते हुए पूरा जीवन ही चला गया। मैं अब अगर किसी को बताऊँगी तो क्या। मैं याद ही नहीं करना चाहती वो 20 साल जिन्दगी के जो मैनें परिवार नाम से और मेरे हाथ पर जिसका नाम लिखा है उसके हाथ के नीचे बिताये है। मुझमे अब जैसे ताकत आ गई है। मैं बस, 2 साल ही तो दूर रही हूँ अपने उस नर्क से और इसी टाइम ने मुझमे जान डालदी। मैं बहुत खुश हूँ।"


शामू चाचा, “मुझे रोटी की चिंता नहीं है और न ही तेरा चाचा परिवार की चाहत रखता। मैं तो मस्तमौला हूँ। जब भजन था तब तक तो कभी खुद को सोचा ही नहीं था। उसके साथ रहना और चलना मुझे लगता था की तुझे और चाहिये क्या। पर अब वो नहीं है तो लगता है कि जो वो मुझे अकेला छोड़ गया है तो मैं अकेला होकर क्या करूगां। दारू पीकर जीवन खत्म नहीं करना चाहता मैं। मैं भी चाहता हूँ कि कोई शामू मुझे भी मिले और मेरे साथ रहे। उसके जाते ही सब कुछ मिटने लगा है अब मैं सोचता हूं की यार, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, परिवार मे गया तो मुझे बाप बना लेगें और मैं बाप नहीं बनना चाहता। बाप बनना होता तो शादी कर लेता। जिन्दगी बीत गई अब नहीं होता ये सब। पर कुछ करूंगा, अकेला नहीं रहूँगा। ज्यादा कुछ दिल में आया तो पहुँच जाऊंगा भजन के पास। उसकी छत पर।"


राजू भाई, “एक ही तरह से जीते - जीते जब लगता है ना की कुछ बन नहीं रहा तो तरीका बदलना होता है। वैसे तो घर ऐसी चीज़ है कि ज्यादा समय तो आप एक ही तरीके से जी नहीं सकते। वो अपने आप बदलवा देता है। शादी हुई नहीं कि आपको सोचना होता है कि अब कैसे जिया जाये। क्योंकि आपका जीने का तरीका आपके अकेले का नहीं है, उसके साथ अगर कोई और भी जुड़ा है तो तरीके को बदलना ही पड़ता है। नहीं तो रहो जीवन मे उसी बासी रोटी की तरह जो ना फेंकी जाती और न खाई जाती।"

बाला जी, “जब बहुत हो जाये ना, तो बदलना पड़ता ही है। वैसे तो कोई बदलना चाहता नहीं है, मगर जब लगे की पानी सिर से ऊपर बहने लगा है तो बदलना पड़ता है। नही तो लोग तुम्हे पागल समझकर तुम पर चड़ जाते हैं और तुम चुपचाप रहते हुये सब कुछ करते हो। अगर भइया चुपचाप ही जीना है तो मत बदलों।

मैं घर से ज्यादा काम पर अच्छी थी, काम पर जाते हुए लगता था की कब तक कमाऊंगी और सबको खिलाऊंगी। तो घर पर बैठ गई। लेकिन घर तो चूस लेता है। बाहर जाती थी तो इतने लोग जानते थे मुझे की क्या बताऊं। 427 बस वाले, दूर से देखते ही बस रोक लिया करते थे की अंटी आ गई। मगर अब तो मुझे खुद नहीं पता की 427 बस चलती भी है या नहीं। स्टाफकैलाश में दुकान वाले, किस्त पर मेरे नाम से समान दे दिया करते थे। अब तो पता नहीं है की और कोन-कोनसे नये समान आ गये है। घर अपनी तरफ बुलाता है, मगर यहाँ पर बैठ जाना हमेशा के लिये ये बहुत बुरा साबित होता है। मैं समझा है, अब तो मैं कहीं जाने की ही नहीं रही। लेकिन ज्यादा दिन तक ऐसा चलने नहीं दूंगी।"

लख्मी

Tuesday, October 4, 2011

उनको पकी नज़रों से नहीं देखा जा सकता

15 ब्लॉक मार्किट – एक कमरा जहाँ पर सितारे बिखरे पड़े थे और कोई नहीं था। आशा वेदप्रकाश जिनसे मैं मिला। ये अभी बीए पास कोर्स कर रही हैं। उम्र ज्यादा नहीं है, मगर हर बार पढ़ाई छूट जाती है लेकिन इस बार इन्होने छूटने नहीं दिया। पीस बनाती हैं, घर-घर देकर आती है, काम के लिये औरतों को कनवेंश करती है और उनके साथ काम करती है। हर रोज़ पीस लेने ये सुबह निकलती है और साथ ही जो हर दिन के हिसाब से काम करते हैं उनका पैसा लाती है और जो महीने के हिसास से काम करती है उनका हिसास लिखवाकर लाती है। हर रोज़ सबके कहने के अनुसार ये काम लाती है।

पूछने वाला, "हमें कब लगता है कि अपने समय को अब हमें खुद से बांधना होगा?”
आशा वेदप्रकाश, “ जब लग रहा हो की अपने लिये कुछ भी निकालना नहीं हो पा रहा है। कितना भी कोशिश करलो लेकिन निकालना मुश्किल हो रहा हो तब मन किलसता है- गुस्सा भी आता है मगर इसी के अन्दर कोई काम अच्छा हो रहा हो तो लगता है कि अपने लिये टाइम क्यों चाहिये? पर हर वक़्त तो नहीं ऐसा नहीं चाहिये। कुछ पाने की खुशी ही सब कुछ नहीं होती है ना! अगर यूंही समय को नहीं खुद से बांधा गया तो एक ही चीज़ को करने में रह जायेगें आगे कुछ नहीं होगा।"

पूछने वाला, "समय के बंधन के बाद मे खुद की कल्पना किस रूप या प्रकार मे करने की कोशिश उभरती है?”
आशा वेदप्रकाश, “मैं ये सोचती हूँ की मेरी क्या पहचान होगी? मुझे लोग कैसे जान पायेगें? मैं चाहती हूँ कुछ करूँ, कुछ ऐसा जो मैंने किया हो। मेरे परिवार मे किसी ने ना किया हो। अभी मालूम नहीं है मगर करना चाहती हूँ। जब हम समय के बंधन से बाहर है या समय को खुद बांध रहे हैं तो ख्याल उड़ने लगते हैं। तब तो आप कहीं भी जा सकते हो। इन्ही के बीच में मैं कल्पना करती हूँ कि लोग मेरे पास आये मुझसे बात करने और मैं लोगों के पास जाऊँ। बस मेरे आसपास माजमा जमा हो।"

पूछने वाला, "कब हम किन स्थितियों से अपने आपको एकांत और असंख्य में देख पाते है? उस एकांत में होना या असंख्य में होना क्या होता है?”
आशा वेदप्रकाश, “मैं हर रोज़ के झमेलों से दूर जाना चाहती हूँ लेकिन इनमें मुझे रहना पड़ेगा। मुझे एकांत पसंद नहीं है, अगर वे खमोशी मे जाये तो। इतना शोर है आसपास में क्यों मैं दबी सी रहूँ। क्यों ना बातें करूँ, दूसरों की सुनूँ। लेकिन कभी लगता है कि जब हमें इन्ही झमेलों से, घरेलू कामों से और इसकी बंदिशों से नफरत होने लगती है तब लगता है कि एकांत हो। इनसे बाहर निकला जाये। किसी ऐसी जगह पर जाया जाये तो इन सबसे बाहर हो, इतनी बाहर नहीं की वापस ना आया जाये लेकिन बाहर हो। थोड़ी दूरी पर।"

पूछने वाला, "हमारे लिये कोई जगह बनाकर देगा तब हम जीना तय करेगें या हम भी कभी बनाने वाले बनेगें? कब ये सोच आती है कि अब हमें बनाने वाला बनना है?”
आशा वेदप्रकाश, “अब तक तो ऐसा होता आया है कि हमारे लिये किसी ने जगह बनाई है। घर मा-पिता ने बनाया और बाकि सब सरकार ने बनाया। लेकिन एक जगह है जो किसी ने नहीं बनाई बस बन गई। जैसे मेरी मां का घर, वे किसी को बुलावा नहीं देकर आई फिर भी हर रोज़ घर में कई औरतें आकर बैठती है और फिर शुरू होता है दिन। वे सब ऐसे बातें करती हैं जैसे फिर कभी नहीं मिलेगी। अगर किसी ने बात शुरू करदी तो आज ही खत्म करके जायेगी चाहें कितनी ही देर उसे हो जाये। और मेरी मां भी इसी मे खुश रहती है।"

पूछने वाला, "कब लगता है कि हमें अपने याद और अतीत के बाहर जाकर जीना होगा?”
आशा वेदप्रकाश, “हम अपने बारे मे कब तक बता सकते हैं? हर वक़्त तो यह नहीं किया जा सकता। जब तक हम यह नहीं समझ सकते तो क्या अपने आने वाले समय को सोच पायेगें? बिलकुल नहीं। जब मैं अपने बीते समय को सोचती हूँ कुछ नज़र नहीं आता। लगता है जैसे आँखों से मिट गया है। जब उससे बाहर निकलकर देखती हूँ तो कुछ साफ तो नहीं दिखता लेकिन फिर भी लगता है जैसे अब जाया जा सकता है।"

पूछने वाला, "इसमें "तलाश" क्या है? तलाश को किस तरह समझे? उसमें कितनी जगहों का असर मौजूद रहता है?”
आशा वेदप्रकाश, “तलाश तो होती है, बिना तलाश के तो कुछ नहीं है। कौन जितना वो कर पाया है उसमें खुश रहता है? मैं तो खुश नहीं रहती है। तलाश तो हमें एक्टिव रखती है। ऐसा लगता है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है। महज़ अपने लिये ही नहीं बल्कि अपने साथ कई औरों के लिये। तलाश दो चीज़ों से तो बनी होती है - पहली : अपने लिये और दूसरा : अपने से किसी और के लिये।"

पूछने वाला, “अगर किसी चीज़ का अंत का पता न हो तो वे जीवन में जिन्दा कैसे रहती है?”
आशा वेदप्रकाश, “तभी तो वो जिन्दा है, अगर अंत हो गया तो समझो वो गई। वो जिन्दा रहती है ऐसे की उसे कुछ और नहीं चाहिये। वे हर रोज़ आपके सामने आकर खड़ी हो जायेगी। लगेगा जैसे कुछ बोल रही है। लेकिन शायद हमें समझ मे नहीं आता। रोज़ उससे मिलकर जाओगे, शाम को आकर मिलोगे, अपने साथ लेकर जाओगे और वापस भी लेकर आ जाओगें मगर वो मरेगी नहीं।"

लख्मी

Wednesday, September 28, 2011

बातचीत टूकड़ों में जीती है

SMS - एक आदमी चौराहे पर जाकर खड़ा हो गया।
SMS - वो खड़ा है या कुछ सोच रहा है?
SMS - वो इधर – उधर कुछ देखता रहा।
SMS - वो किसी का इंतजार कर रहा है क्या?
SMS - वो कहीं पर जाना चाहता है।
SMS - उसके हाथों में कुछ है क्या?
SMS – नहीं, मगर उसकी मुट्ठी बन्द है।
SMS – क्या वो इस जगह में पहली बार आया है?
SMS - पूरी जगह को वो ताक रहा है।
SMS - शायद वो कुछ याद करने की कोशिश में हैं।


वो शख़्सियतें कौन सी होती हैं जिनकी गढ़ना नहीं होती?

SMS – एक आदमी भरे कोहरे में अपने नाख़ून ब्लेड से काट रहा है।
SMS – लोग उसे कैसे देख रहे हैं?
SMS – उसके नाखूनों में से खून निकल रहा है। जिसके बारे में उसे पता है लेकिन उसका अहसास नहीं।
SMS – क्या लोग उसे देखकर कुछ कह रहे हैं?
SMS – उसके हाथ और पाँव देखने से लगते हैं जैसे बहुत सुन्न पड़ गए हैं।
SMS – क्या उसकी नज़र किसी को नहीं देख रही?
SMS – वो कुछ देर के लिये थम गया।


यही जीवन है। - यही जीवन है?

SMS – लाउडस्पीकर पर एलान था की बस्ती 3 महीने में टूट जायेगी।
SMS – ये ख़बर उनके पास कहाँ से आई?
SMS – किसी ने तो दी होगी? एलान वालों के पास तो नेता लोग बोलते हैं।
SMS – क्या उससे पहले कोई नोटिस दिया जायेगा?
SMS – ये जो एलान हो रहा है इसे ही नोटिस समझो।

बातचीत टूकड़ों में जीती है। देखने में दोहराना, निकालना उठाना, रिवांइड में जाना, चुनिन्दा चीज़ों को पेश करना {रुप बदल जाना}, इसे पेश करने में नमी का अहसास, बहुत बड़ी चीज़ का अहसास होना पर टुकड़ो में, उस प्रक्रिया के बाद कि तरगें।

सोच और कल्पना को हम ज़िन्दगी में सोचते हैं। रफ़्तार को सोचते हैं, जिसमें कई छोटे-छोटे सफ़र हर रोज़ साँस लेते और धड़कते हैं। इन ज़िन्दगियों को रोज़ सुबह अपनी जैब में कुछ जरूरत, दिल में कुछ सपने और दिमाग में कोई ना कोई प्लान लिये अपने दरवाज़े से निकालते हैं और उसके हवाले कर देते हैं जो हमारी कल्पना मे हमारे जैसा है - हमशक़्ल नहीं है, हमारे स्वरूप में है।

लख्मी

Monday, September 12, 2011

वो हर वक़्त कुछ कुरेदते रहे हैं।

शिवराम जी, शमसानघाट से बाहर निकलते समय कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते लेकिन जब शमसानघाट मे दाखिल होते हैं तो पीछे मुड़कर जरूर देखते हैं। वे कहते थे कि मैं जब यहाँ पर आता हूँ तो उसे जरूर देखता हूँ की मेरे पीछे कोन आ रहा है लेकिन जब यहाँ से बाहर जाता हूँ तो पीछे मुड़कर नहीं देखता क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे साथ बहुत सारे लोग चलकर आये हैं।

उनका दिन यहाँ पर किसी ऐसी रात से कम नहीं था जिसे वे जीना चाहते हैं। जो बिना दायरे के और बिना समाजिकता के चल सकता है। जब हम उनसे कोई पूछता था की तुम ये काम क्यों करते हो?, ये तो हमारे खानदान मे किसी ने नहीं किया और जो समाज नहीं चाहता, उसे कोई नहीं कर सकता। तो वे अच्छी तरह से समझते थे कि उनसे क्या पूछा जा रहा है। मगर वे कहते थे कि बिना समाज के और बिना रिश्तेदारी के भी एक जगह है जो चल सकती है, जिन्दा रह सकती है। वे ये है।

इसलिये वे यहाँ से पीछे मुड़कर नहीं देख सकते थे और जब घर से यहाँ आते तो देखते थे।

उनके साथ बातचीत :

राजन ने पूछा, "आप अपनी थकान कैसे चुनते हैं? वो जो जिसे आप कोसना नहीं चाहते।”
शिवराम जी शमसानघाट में अस्थी की राख के ढेर में कुछ कुरेदते हुए बोले, “मैं पूरा दिन यहाँ आती भीड़ के भीतर अकेले महसूस होते हुए नहीं थकना चाहता।, राख मे कुछ कुरेदते हुये नहीं थकना चाहता, लोग आते हैं, कुछ देर बैठते और फिर चले जाते हैं ये मुझे बेहद अच्छा लगता है। मैं उनका फिर देखने के इंतजार मे नहीं थकना चाहता। मैं अखबार पढ़ते हुये और नये काम की सोचने मे नहीं थकना चाहता। यहाँ पर जब लोग आते हैं तो लगता है कि सारा रोना - धोना घर छोड़ आये हैं या वो जो जा रहा है वो इन सबके आंसू अपने साथ लेकर जा रहा है। मैं इन बातों मे रहकर मस्त रहता हूँ। इन्ही में रहना चाहता हूँ, इनको रात मे याद करते हुये कभी जिन्दगी मे थकना नहीं चाहता।"

राजन ने पूछा, “कब लगता है - मुझे अब अपने जीने के तरीके पर सोचना होगा?”
शिवराम जी अब भी उसी राख में से कुछ निकाल रहे थे - कुछ चुनते हुये बोले, “कई बार लगता है कि अपने आप को बदल लो, मगर वो सब नुकशान या मुनाफे के भीतर होता है। पर मुझे यहाँ पर आने के बाद मे लगा की ये जगह हमें ये सोचने के लिये नहीं कहती। लगता है कि यहाँ पर जीवन बहुत बदल गया है। खासकर उस जीवन से जो मुनाफे और नुकशान के जवाब मांगता है। मैं कहता हूँ की अगर मुनाफा और नुकशान से डरकर अगर आप अपने जीने के तरीके को बदलोगे तो ये तुमने थोड़ी बदला। ये बदलना पड़ा। मजा तो तब है जब बिना वज़ह के जीने का तरीका बदलना हो। जिसमें हमें जीने का जो तरीका है उसके बदलाव का पता हो ना कि उसके कारण का।"

राजन ने पूछा, “जीवन के वो कौन से पल या दर्शन हैं जो आपको अपनी छवि यानि जो अब हम हैं उससे खिसका देते हैं?”

शिवराम जी बोले, “मैं क्या हूँ और मैं क्या था, दिन में ज्यादा बार सोचा नहीं जा सकता। मैं इस जगह में जो करता हूँ उसे करते समय मैं खुद से पूछूँ की मैं तो ये पहले कभी नहीं करता था तो ये सब कुछ मेरी बेबसी की कहानी बन जायेगी। तब लगता है कि सारी खाल उतार दूं जो मैंने पहन रखी है। बहुत कुछ होता है एक ही दिन में जो पूछता है कि "तू कौन है"

राजन ने पूछा, “जीवन में कब "कहाँ" का ख्याल आता है?”
शिवराम जी अस्थियों वाले कमरे मे घुसते हुए बोले, “यहाँ पर आने के बाद मे लगता है कि "अब कहाँ" मैं यहाँ पर काफी काफी देर तक खड़ा रहता हूँ। कभी-कभी तो बातें तक करता हूँ यहाँ पर बैठकर। खुद को सोचता हूँ की मैं भी यहीं इन्ही के बीच मे कहीं पर लटका हूँ और कभी लगता है कि ये मेरे बस का नहीं है। मैं तो ये कगरा कितना शांत है, लगता है कि यहाँ पर लटकी हर थैली बात करती है। मैं कहाँ जा सकता हूँ यहाँ से? इन सबके अब ना तो कोई रिश्ते है और ना ही कोई काम, ये तो अपने कहाँ पर पहुँच गये हैं लेकिन मुझसे कह रहे हैं कि शिवराम तू आपको नहीं लगता ऐसा?“

राजन ने पूछा, “ये लौटना क्या है? हम कब "वापसी" को सोचते हैं?“
शिवराम जी बोले, “लौटना वो है जब आपके हाथ मे कुछ हो। लेकिन वापसी वो है जब आपके हाथ मे कुछ ना हो लेकिन आपके साथ कोई हो। मैं जब कुछ समान नहीं लेकर घर जाता था तो मेरी बीवी बहुत बातें मुझे सुनाती थी। लेकिन जब मैं कुछ समान अपने साथ लेकर जाने लगा तो वो उस समान को अन्दर ही नहीं लेती। मगर मैं दोनों हालात में घर के अन्दर दाखिल हो जाता था। मैं ये सोचता था कि मेरी बीवी को चाहिये क्या? वापसी क्या इनकी तरह नहीं हो सकती। जैसे यहाँ पर कोई वापसी नहीं करता। लेकिन यहाँ से वापसी करता है। मैं भी यहीं से वापसी करता हूँ।"

"वापसी" भीतर से सोचते हुये महसूस हुआ की जीवन में वापसी का अहसास अपने से बाहर लेकर जाने की कोशिश है ना की अपने भीतर ही लौटना है। शिवराम जी के साथ बातचीत में लगा की उनका घर लौटना और शमसान के मे वापस आना ही उनका जीवन के "कहाँ" के सवाल यहाँ आकर एक ठहराव लगा। मेरे उनसे बातें करने की कोशिश में। और बेकारगी के बिना जीवन की कल्पना करने की इच्छा उन्हे इस जगह से जोड़े रहती है। हमें “मेरी जिन्दगी में सब बदला कैसे मैं नहीं जानता लेकिन मैं बदलाव में कैसे बदला को मैं कई बार सोचा हूँ"

लख्मी

Friday, May 13, 2011

किसको क्या चाहिये :

अजनबी ने कहा, "हमें कब लगता है कि किसी जगह को अब बनना चाहिये?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "हम नई जगह जो बना रहे है उसमें लोग अपना समय खुद से देगें और चुनेगें जो की उनकी अपनी शर्तो के साथ होगा। कुछ काम होगा, कला होगी, हुनर होगा, इनको एक सूत्रधार में डालते हुये बनाना होगा। एक – दूसरे से अगर कुछ बन पाया तो समझो की जगह बन गई।"

अजनबी ने पूछा, "नियमित्ता होनी चाहिये ये कब महसूस होता है?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "नियमित तौर पर जो माहौल होगा तो हम उसके मुताबिक जगह में रख सकते हैं। हमें एक मार्किट बनाना होगा नियमित्ता को बनाने के लिये। लोग हमारे पास आयेगें कैसे। के लिये मार्किट बनानी होती है। इसने हमारे बारे मे लोगों पता तो हो, चाहे वे आये नहीं।"

अजनबी ने कहा, "किसी जगह में आजादी के क्या मायने होते है और इसे कैसे जीना चाहिये?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "आजादी का मतलब कई जिन्दगी में बहुत सारे काम है। उस चीज को लाने के लिये हम अपने से अपना एक रुप, ढंग और तरीके से निकलकर ही कर पाते हैं अन्यथा वे तो मनमर्जी हो गया। अब आजादी और मनमर्जी मे फर्क होता है ये कैसे समझाओगे लोगों को आप?

अजबनी ने पूछा, "किसी जगह या समुह में नियम या शर्ते लागु करने से क्या होता है?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "जगह में नियम से जगह निरंतर तो हो जाती है लेकिन शर्ते और नियम मे फर्क है। जैसे हम अपनी शर्ते रखकर काम करते हैं अगर अपने नियम बनाये ले तो काम मिलेगा लेकिन फिर काम, सिर्फ काम होगा। उसमे ये नहीं हो पायेगा की हमें लगे की सामने वाले काम कल तक लटका दिया तो खराब हो जायेगा। तो हम उसे खींचकर आज मे खत्म करते हैं। इसमे शर्ते हो सकती है, लेकिन नियम मे प्यार – प्रेम वाली बात नहीं रहती।"

अजनबी ने पूछा, "अपनी जगह को बनाये रखने के लिये अपनी क्या भुमिका होनी चाहिये?”
राजमिस्त्री जी ने क हा, “ हमें अपने को सब चीज़ों से ऊपर करना होता है, अगर जिद् पर अड़े रहे तो काम खराब, मनमर्जी रहे तो काम खराब, तो इनके बीच मे रहकर काम सोचना होता है। ऐसा आदमी जो बुरा लगने, गुस्सा होने से हटकर, लोगों के साथ मे रहकर कुछ कर पाये।"

अजनबी ने पूछा, "किसी कल्पना की नींव रखने से पहले कौन-कौन सी बातें ध्यान में रखनी जरुरी है?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "हकिकत को समझो, चाहे मानो मत, सही मानो मे तो विकास को सोचों, स्वचलित रहो अपना-अपना मत करो, कला को मदद की नज़र रखते हुए और एक – दूसरे मे देते हुये।"

अजनबी ने पूछा, "जगह में होते बदलावों से आप क्या समझते हो?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "बदलाव ये है की, एक तरीके से आगे बड़ रहा है। जगह का अपनाना और उन लोगों की के बारे मे सोचना (कल्पना) होना है जिनको मैं जानता भी नहीं तो क्या हुआ पर वो मेरे अपने है। अपने देखने को कैसे अपना सकते है। जगह तो हर दिन बदलती है जैसे कैलेन्डर माहिने मे एक बार नहीं बल्कि हर दिन एक नया और ताजा सोच लेकर उतरती है।

अजनबी ने कहा, "जगह अपने आप को परिभाषित करे ये कैसे मुमकिन है?”
राजमिस्त्री जी ने कहा, "कोई चीज़ नहीं करती ऐसा, जगह को पहले आप चाहिये उसके बाद जगह को आप चाहते हैं। जब हम दोनों को ये चाहिये होती है तब कोई जगह बनती है। जैसे मैं अपने को बताऊ तो हम मिस्त्री क्यों बनाये गये क्यों जमीन को हम चाहिये थे। उसके बाद हमे जमीन चाहने लगी। तब जब जगह बोलती है।"

लख्मी

Friday, April 30, 2010

हमारे सामने बनी एक रूपरेखा



जो रोज़ मिलता है और मिलकर कहीं खो जाता है। उसे कैसे अपने रूटीन में रखेगें?

हमारी कल्पना हमारे साथ चलती है। बस, जगह बदलने से हम उस कल्पना का पुर्नआभास नहीं कर पाते। कैसे देख सकते हैं उस द्वृश्य को जो हमारे सोचने की वज़ह है? क्या उसका फैलाव है? या हमारे देखने का नज़रिया? जिसके माध्यम से हमारे सामने बनी एक रूपरेखा दिलो-दिमाग पर अदा सी छोड़ जाती है।

वो मिलने की चाहत। वो पाने की लालसा। जो ले आती है हमें कई रफ्तारों के बीच जिसमें हमारी भी इक रफ्तार होती है। पहले हम जगह को समझने के लिये समय को अपने लिये रोक लेते हैं फिर समझ आने के बाद उस रफ्तार में गिर जाते हैं। ये क्या? क्या ये कोई प्रणाली है या जाँच? या फिर कोई प्रयोगनात्मक समझ है।

हर जगह ऐसी होती है?






राकेश

Friday, January 22, 2010

हर समय हमारे साथ हमारी यद्दश्तौर और कल्पना

हम जो जीवन मे सोच रहे है उसका एक उदहारण, चित्र उभारना चाहिये। जो हमारी अवधारणाओं और विशेष विषय के उदाहरण पर विचार विमर्श उनको बाँटने से ही उनके जीवन बुनियाद मजबूत हो जाती है। जीवन के सभी तत्वों को गम्भीरता से लेना चाहिये जिससे ऐसा न हो की आप का लाइव दूसरों के पहलू से बहुत दूर हो जाये। यदी ऐसा होगा तो खुद में एक धूंधलापन पैदा हो जाने का डर आ जाता है। अपने जीवन को विशेष रूप से सोचने की कोशिश न छोड़ें।

अपने आपको हर किमत मे पकड़े रहे तभी बौद्दिकी ज़िन्दगी को हर्ष और उल्लास से जी सकेंगे। जीवन के संचार, संकेतों और प्रतिकों का अध्ययन है और आमतौर पर तीन शाखाओं में विभाजित है। शब्दों, लक्ष्ण और बातें जो वे उल्लेख के बीच सम्बंध, उनका औपचारिक संरचनाओं में संकेत के बीच सम्बंध लक्षण और उन लोगों पर न के प्रभाव के बीच सम्बंध जो है उन्हें उपयोग करें।

सकेतिकता अक्सर महत्वपूर्ण मानवविज्ञान आयाम होने के रूप में देखा है, उदाहरण के लिए का प्रस्ताव है कि हर संस्कृतिक, जीवन, समय को घटना संचार के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि विज्ञान के तार्किक आयामों पर ध्यान केंद्रित कुछ वे ऐसे कैसे जीवों के पूर्वानुमान के बारे में और अनुकूलन के लिए, अपनी दुनिया में जगह बनाने के लक्षणिक रूप में प्राकृतिक विज्ञान के लिए और जीवन के कर्मकांडो में भी सम्बंधित क्षेत्र लाक्षणिक सिद्धांतों अध्यन कर सकते हैं। हम अपने किसी उद्देश्य के रूप में संकेतो या अपनी जीवन प्रणालियों को समझने का एक
ग्रह बना सकते है।

जो हर समय हमारे साथ हमारी याद्दाश्त में स्थिर होगा और जिसका रूप की कल्पना का ढ़ाँचा जगह में बखूबी दिखेगा। जहाँ पर रहने वाले जीवों में सूचना का संचार रचनात्मक माहौल में शामिल किया है। दिमाग की एक उपज है जो समूहों और आर्कषण देने वाले माहौलों से उभरी एक कल्पना है।


राकेश

Saturday, December 5, 2009

एक कुत्ते को ताप कर चार लड़को ने रात काट दि ।

एक रात की बात है ।



अब हम कहाँ जाये ? ये बात उन्हे सताती रही।



हम चारों एक पेड़ के नीचे आकर खड़े हो गये ।जिसके पास से हमें गर्मी महसूस हो रही थी।
वो चारो वही थककर बैठ गयें ।



वहाँ जो आटे की बोरी का कट्टा पड़ा था उसमें से ही गर्मी नीकल रही थी वो वही हाथो
को फेला कर तापने लगें।
काली रात के सायें मे उन्हे दिन की धूप की गर्माई का अहसास हो रहा था।
शायद कुत्ता भी अपने को उनके बीच महफूज़ समझ रहा था।



तड़के ही कुत्ता उठ खड़ा हुआ और उनके बीच से नीकल भागा ......




राकेश

Thursday, February 26, 2009

सर्वहारा रातें- किताब

सर्वहारा रातें- किताब

हम अभिनंदन करते हैं ज़ाक राँसिएर का कि वो हमारे बीच आए। उनकी किताब "सर्वहारा रातें" जो अभी प्रकासित हुई है जिसका हिन्दी भाषा में अनूवाद हुआ है। उन्होनें हमारे साथ अपनी किताब "सर्वहारा रातें" को लेकर अपना अनुभव बाँटा। उनसे हुई बातचीत में हमे बौद्धिक ज़िन्दगी के एक दौर की रचनाओं और गुज़रे कल के पहलूओं से मुख़ातिव होना है। उनके और हमारे बीच एक मुलाकात हुई जिसमें इतिहास को नया ढ़ंग से जीना और अपनी रचनाओं को लेकर खुद की क्षमता से अपने आसपास को सींचना था। जो उनसे बातचीत में उभरा जिसमें नया जीवन या अपना जीवन तय करके जीने की आज़ादी है उसे कैसे सोचें?

शरीर और हक़ीकत के बीच जब अपनी रचना को महसूस करते हैं तो उस के बिताए गए क्षणों को एक जगह एकत्रित करके या जमा करके देखें तो प्रतिदिन का एक आकार नज़र आता है। अपने मनमुताबिक सोची गई रचनाओं के समाज की धारणाओं से टकराना होता है लगातार वे दिखता है। समाज के नियम और कानून से बने निर्देशों के तारों में फँसने के बाद भी व्यक़्ति अपने संम्पर्क के नये तार जोड़ता है।

इसी ख़ास तरह में आने वाले शख़्सों के बारे में आपको रू-ब-रू करवा रहा हूँ। जो इतिहास मे जीते 'अतीत' की कई परछाइयों को ज़हन में एकदम से उभारने वाला ख़्याल देते हैं। वो जीवन जो किसी हवा-पानी, समाज, धर्म, रहन-सहन या रिती-रिवाजों से बंधित नहीं है। उस जीने और हर पल बनने की प्रक्रिया को हम दुनिया के किसी भी कोने में देख सकते हैं, सुन सकते हैं। हर शख़्स में अपनी रचना करके और ख़्याली दुनिया बनाकर जीने की गुंजाइश होती है। वो चाहें अपना देश हो या विदेश इंसान कहीं भी हो उसका वज़ूद उसे पल-पल के समावेशों में धकेलता रहता है
जिसमें जीने की साँस लेती क्रियाएँ होती हैं। जो अपने एकान्त को किसी दुनिया में जोड़ देती है और तब अपने अहसासों को खुद से समझने और सोचने कि जिज्ञासा जागती है।

हमारी जगहों में, ज़िन्दगी में, माहौलों में वो सम्भावनाएँ हैं जो एक-दूसरे के बीच के रिश्ते को रचनात्मक ढ़ंग से जीया जाने को कहती है। जो गुज़रे कल को भी आज के दौर से वापस मिलाती है और अपने साथ लेकर चलती है।

19वीं सदी के फ्रांसिसी ताला-मिस्त्रियों, दर्ज़ियों, मोचियों कम्पोज़िटरों के जीवन-संघर्ष, सपनों और बौद्धिकता की दिलचस्प और विचारोत्तेजक कहानी कहने वाली किताब जब 1970 में पहली बार प्रकासित होते ही सर्वहारा वर्ग के इतिहास और विचारधारा की स्थापित समझ के लिए चुनौती बन गए। इस पुस्तक की अहमियत पर समय, स्थान और भाषा के फ़ासलों का कोई असर नहीं पड़ा है। ग़ैर जिंसी उत्पादन सूचना क्रान्ति और ग्लोबल बाज़ार के मौज़ूद ज़माने में भी फ़ांसिसी दार्शनिक ज़ाक राँसिएर की यह रचना प्रासंगिक बनी हुई है।

इसके पन्नों पर श्रमिक जीवन और अनुभव के जिन रूपों को पेश किया गया है वह भारत के संघर्षरत मज़दूरों के ज्य़ादा नज़दीक लगते हैं। जो अपने रोज़मर्रा के संस्मरणों को अपने सपनों में लेकर जीते और वक़्त की कालगुज़ारियों में कविता या कहानियों को गढ़ते। ज़हन में आने वाले ख़्यालों के रचनात्मक ढ़ंग को बनाकर सतह दर सतह जमा करते जातें। किताब ये दावा मोटे पैमाने पर करती है की जो किताब की रचनाओं में उभरता जीवन है वो हर एक शख़्स में मौज़ूद है, बसा हुआ है।
बस, जरूरत है तो खुद में तलाशने की। इतिहास दोहराने का ही नहीं रह गया बल्कि उसे वापस पुर्णस्थापित करके हम जीवन को आलोकिक बना सकते हैं। आज वही सब कुछ घट रहा है जिससे मिलते-जुलते हालात का सामना उन दस्तकार-मज़दूरों ने किया था जिनका ज़िक्र इस किताब में किया है।

उस समय 19वीं सदी का जो समाजिक माहौल रहा जो सामाजिक संर्धभ (ढ़ाचा) रहा वो क्या था और उसमें जीने की क्या-क्या सम्भावनाएँ रही। उस समय फ्रांसिसी मजदूरों में मोचियों, दर्ज़ियों, ताला-मिस्त्रियों कम्पोज़िटरों के यानी उस स्तर के हुनरबाजों की दुनिया रात के अंधेरों को अपने लफ़्जों, ख़्यालगोइयों, कविता और कहानियों से रोशन हो जाती।

उन रातों में जो रंग होता उसे वो अपने अन्दर लेकर जीतें। तब ये लोग अपने से टकराई गई स्थितियों और उनकी रचनात्मकता को चिट्ठियों मे उतार देते। उन चिठ्ठियों की में लिखी गई रचनाएँ समय की ख़ुर्दरी परतों को अपने कोमल और करूणा भरे अहसासों से भर देती।

जिसमें अपने शरीर के टकराव, माहौल, सम्भावनाएँ होती। जिनसे कविताएँ, कहानियाँ, किस्सा, सवाल, बहस अपना मज़ा और फलसफाएँ होते। जिसमें एक दुनिया देखती थी। जो काम के बारे में नहीं थी। किसी कानून या नियम को लेकर लड़ाई नहीं थी। न ही कोई समाजिक मुद्दा जिसके खिलाफ़ नारे या आदोलन हो। बल्कि वो दुनिया होती जिसमें वे अपनी सम्मपन्यता में जीने की इच्छा रखते। अलग-अलग कल्पना लेकर जीते हैं। जैसे वो लोग दिन के ऊजालों को छोड़कर अंधेरों में भी अपने मन की ज़्योती से अपना दायरा देखते।

उनकी अपनी बौद्धिक ज़िन्दगी का समाज उन्हे वो जगह नहीं देता था जो वो चाहते थे। क्योंकि समाज हमे जो पहचान या रूतबा बनाकर देता है हमे उसी में जीना होता है। यानी एक न्यूनतम दायरे में। इस तरह समाज हमारा कई विभाजनों में गठन कर देता है और इस गठन के तहत ही हम जीने को मजबूर हो जाते हैं। सब के साथ न चाहकर भी हमे रिश्तों- नातों, सिमाओ में सहमती में जीने की आदत डालनी पड़ती है। हम इससे कोई विद्रोह नहीं कर सकते न ही उन्होनें किया था।

किताब हमें जिस ज़मीन पर लाकर रखती है उसमें अपने जीवन को नया ढ़ंग से जीने और मानसिकता के संतुलन मिलते हैं जिसमें प्रकृति भी हमें वो जीवन के बीज़ देती है जीन से ज़िन्दगी के कुछ और बगीचें तैयार किये जा सकते हैं।

बिना किसी काम, संघर्ष या विद्रोह की भाषा बनायें हम जीवन को जी सकते हैं जैसे उन्होनें भी जीया। एक नया ज़ुबान जो वो लोगों के मुँह पे डाल गए। अपने पास आती चीज़ों को असहमति मे जीया जो जगह या अपने नैतिक अधिकार की चिन्ता किए बगैर उनसे असहमत होकर जीवन में कल्पना करके जीना चाहा। उस अदा में वो लोग रहते थे।

हमारी बातचीत जब ज़ाक राँसिएर से इस किताब में कि गई रचनाओं और मजदूर वर्ग को लेकर हो रही थी।उनका कहना था की मैने सोचा की 19वीं सदी को कैसे देखे जो आक्राईव है। देखना की उसमें क्या मिलेगा? जब वे आक्राईव मे गए तो मिला की उसमें लिखी चिठ्ठियों में कविताएँ, फलसफाएँ, सवाल, बहस, मज़ा है। जो किसी काम के बारे में नहीं है और इंसान के जीने की कसौटी पर वो आवाज़ है "हम हैं" की लड़ाई थी। तर्ज़ुबे और अपने विश्वास को साथ लेकर चलना जो उन लोगों ने अपने दम पर किया। बिना समाज के प्रोत्साहन के अपने अकेलेपन को रचनात्मक रूप से सोचा और उड़ान भरी कल्पनाएँ दी।

ये अनूभव हमने भी किया की जब हमारे बीच ये आया की हम अपने रचना खुद करते हैं। अपने लिए अपना शरीर खुद बनाते हैं जिसमें समाकर हम बौद्धिक जीवन की आशाओं को सींचते हैं। समाज हमारे शरीर को बहुविभाजनों रख देता है। इसलिये अपना दायरा देखना और समझना कठिन हो जाता है।

हमारे विचार बातचीत के माहौल को अलग-अलग दिशाओं के फाटक खुल रहे थे। जो किताब की रचना को सोचकर समझकर हमारे साथी अपने आसपास फलने वाले लोगों की दिनचर्या को लेकर किसी के अकेलेपन या एकांत में जीने वालो की दुनिया के बारे में अपना गहरा शौध रख रहे थे जिसमें देखने के फ्रेम नज़र आ रहे थे। हमारी बातचीत में कुछ बिन्दू उभरे।

हमारे साथी शमशेर अली ने कहा, "कोई है जो शरीर पाने या बनाने के लिए जद्दोजहद करता है पर दिखता नहीं है।लेकिन उस का होने का अंदेशा लगता है। वो क्या है उसे कैसे सोच सकते हैं। मेरे लिए शरीर क्या मायने हैं और वो कैसे मेरे जीवन में मायने रखता है?

राँसिएर ने कहा, "शरीर में जो आया या शरीर से जो टकराया वो बार-बार होता रहा उस रचना में एक प्रेक्टिस को रखना था। जो उन लोगों का प्रेक्टिस था। "मैं" को कैसे जगह में जीते है? "मैं" कैसे रहूँगा किसी जगह में, किसी का अपने होने की आवाज़ को रखना।"

समाज विभाज को पैदा कैसे करता है? इससे टकराकर शरीर का जीवन, अपनी कल्पनाओ को जीना। उद्देश्य, काम समाज में किसी अधिकार के संर्घष से प्रभावित न होकर एक जंग से असहमति की ज़ुबान बना कर जीना। "सर्वहारा रातों" में जो जीवन है उससे अपनी पहचान की एक अलग ही तस्वीर दिखती है। नज़रिये जो कई कल्पनाएँ हमे सर्मपित करते हैं।

स्टूडियों मे हुई बातचीत में लख्मी ने कहा, "वो जो मुझे चाहिए वो शरीर मेरे सामने हैं पर मैं अपने अन्दर उसे कैसे सोचूँ जिससे मैं अपने से दूसरों के बीच की दूरी को समझ सकूँ। जो मेरे ख़्यालों मे एक दुनिया का गठन करता है। जो मेरे सामने है उससे जो दूरी है वो हमारे बीच क्या रिश्ता बनाती है? हमारे स्टूडियों में एक साथी जिनका नाम महेश है। महेश जी हमे महीने में दो-तीन बार आकर अपनी कि गई रचनाएँ सूना जाते हैं। वो अपने घर, परिवार काम के बीच से जो जगह निकालते हैं उसी में ही हमारे लिए जगह बन जाती। वो शख़्स अपने साथ कौन सा शरीर लेकर आता है जिसके बारे में उनके जैसा ही कोई उस शरीर से रिश्ता समझा पाता है।

मैं कहता हूँ एक शरीर है जो समाज मे मिलता नहीं जिससे हटकर मुझे अपना शरीर बनाना है जो मेरी सम्मपन्यता हो। मैं इस जीवन की सम्मपन्यता से संतूष्ट नहीं हूँ तो मेरे शरीर की क्या, कैसी, कौनसी आज़ादी होगी? जिस समय मे मैं अपनी कल्पना करने लगता हूँ उससे एक आकार उभरता है मेरा आज़ादी उसी शरीर में है। उसी में मैं उड़ान भरता हूँ। बौद्धीक ज़िन्दगी सब जगह है मगर इस में जो खुद से बने ढ़ाँचे हैं। वो ही नया शब्द की नया ज़ुबान नया दायरों की समझ देते हैं। मजदूरों के हमने जो ठिकाने देखे हैं। वो घर काम सामजिक, संर्धभ के ढ़ाँचे के अलावा कुछ नहीं देखा पाते पर इस के बीच में वो दुनिया है जिसमें अपने शरीर को नये सिरे से ऊर्जा प्रात होती है। बौद्धिक ज़िन्दगी लिखना कला ही नहीं है। आप कुछ सोच रहे हैं या आपके पास कुछ हैं जो आप खुद की सच्चाई को लेकर आज़ादी है।

जिसमें अपने आप को बनाने का प्रक्रिया है जो अपने पास ही होता है। जो आपको अच्छा लगता है सूझता है वो ही लिखने की प्रक्रिया है। जीने की आज़ादी है। आप के पास अस्पष्ट कुछ है जो आप किसी दूसरे के पास ले जाते हो। ले जाने की प्रक्रिया ही यात्रा कहलाती हैं।




राकेश

Tuesday, January 27, 2009

दोहराये गए का विश्लेषण

मेरी इन दिनों अपने एक साथी से बातचीत हुई, वे इन दिनों काफी सारी किताबें पढ़ रही है। ये किताबे उसके जीवन मे एक ख़ास जगह बनाने की कोशिश मे है। अपने हर दिन मे घर और परिवार के बीच रहकर भी जो समझ ताज़ा होती है उसके बाद भी हमारे दर्मियाँ वो अहसास छुपा रह जाता है जिसको उन्ही रिश्तों के बीच मे हम तालशते हैं। वे क्या है? परिवार जो अपने बनाये कारणों के तहत ही किसी भी रिश्ते अथवा परिवार के सदस्य को सोचता है। वे बेहद ठोस होता है। जिसमे अपने लिए जगह बनाना किसी ना दिखने वाली लड़ाई की ही तरह से होता है। मगर किताबें उस अहसास मे अपनी जगह बना लेती है।

हर किताब अपने साथ कई तरह की तलाश लिए चलती है। जिसमे जुड़ने वाला हर अनुभव उसमे अपने को महसूस करने के कोने तलाश्ता है। वो तलाश कभी तो उसमे उभरने वाले सवाल बनती है तो कभी अपने मनमुताबिक कल्पना करके जगह बना लेती है।

किताबों ने उसको खुद को समझने अथ‌वा अपने जीने के तरीको से बहस करने का मौका प्रदान किया है। उसकी बातों मे किसी खास हलचल को महसूस किया जा सकता है। बदलाव, खाली बदलाव ही नहीं होता। यानि के कुछ हटा और कुछ आया, इसको सोचने के अलावा ये सोचा जा सकता है कि कुछ तब्दील हो गया।

ये "तब्दील" शब्द हमारे सोचने के चश्मों को एक नया मौड़ और ढाँचा देता है। बहुत सारी बुनियादी बातों के और परिवार के बीच मे कारणों के बाद उसकी शारीरिक भाषा मे एक ऐसी ही तब्दीली महसूस होती है।

वे कहती है, “हमारे सामने आज भी वही शख़्स चल-घूम रहे हैं जो पहले भी चलते थे। कोई हमारे से टकरा जाता था तो कभी कोई बिना बात के मुस्कुराकर भी चला जाता था। कोई दूर खड़ा देखता रहता था तो कोई पास आकर कुछ कहने की कोशिश करता था। कोई इशारों की ज़ुबाने मे कुछ कहने की कोशिश करता था तो कोई नज़र छुपाकर निकलता था। कोई हमारे लिए रास्ता बनाता था तो कोई ऐसे विहेव करता था कि वो दुनिया मे अकेला है। ये हमारे समाने निरंतण चलते रहते हैं। ये वे चित्र हैं जिनको हम याद भी रख सकते हैं और भूल भी सकते हैं। मगर, हमारे ऐसा करने या करने से इन्हे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, ये तो इन्ही रास्तों मे दोबारा से मिलेगें। चाहें आप देखो या ना देखो। क्या हमें आज भी कुछ पता है इस बैचेनी या कंपन के बारे में कि ये अपने इस स्वभाव मे क्या लिए चल रहे हैं?”

वे बेहद आसानी से अपने देखे, सुने या महसूस किये अहसास को दोहरा जाती है। एक पल के लिए नहीं सोचती की व इस दुनिया मे क्या और कैसा सवाल बना रही है। जो चित्र खाली इन रास्तों पर या तो नज़ायज़ माने जाते हैं या फिर देखकर अंदेखे किये जाते हैं वे हमारे लिए क्या सवाल बन सकते हैं? ये हमारे लिए क्या कोई शब्द बनाते हैं? मैंने उसकी बातों को सोचना पहले तो जरूरी नहीं समझा, सोचा ये तो लड़कियों के साथ मे रोजाना होता होगा, इसमे मेरे लिए क्या है? मैं क्या कोई कदम उठाऊ? लेकिन क्या होगा, क्या मैं कोई झंडा लिए शहर को सुधारने निकला हूँ क्या? मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकता। तो क्या करूँ? फिर जब अपने आसपास को दोहरा ने की कोशिश की तो कुछ चित्र ऐसे उभरे जो मैं रोजाना अपने किसी हिस्से मे ढ़ालने की कोशिश करता हूँ। वे मेरे सोचने और लिखने के माध्यम मे बसे हैं। इनको कैसे मैं हटा सकता हूँ? कुछ ऐसे सवाल बनकर सामने आते हैं जो कुछ शब्दों को सामने लाकर खड़ा कर देते हैं। जैसे, किसी की कंपन को लिखना या सोचना या फिर दोहराना या बख़ान करना या खुद के लिए लेना ये कैसे पोसिबल होता है? इसकी इंद्रियाँ क्या है?

हम अपनी ज़िंदगी से क्या मेल करवाते हैं किसी जीवन को या जीने के तरीके को?

ये कहना बहुत ही आसान होता है कि ये दोहराया जा सकता है और ये दोहराने के तरीके है। पर हम किसी ज़िंदगी को दोहरा रहे हैं ये होता है या हमारे साथ उसका कोई रिश्ता बन गया होता है? हम उस रिश्ते को दोहराते हैं या फिर उस रिश्ते से दोहराते हैं? ये दोनों क्या है?

हम अपने दोहराये गए का अनालाइस ही नहीं कर सकतें। क्योंकि दोहराये मे किसी जीवन का पूरा अहसास शामिल है। जो सांस लेता है, जीता है, रोता है, ठहरता है, कभी-कभी गाता भी है तो कभी-कभी गुस्सा भी होता है। ये खाली एक ऐसा पहलू नहीं है कि उसे एक आत्मनिर्भर करके ही बताया जा सकें। वो अगर ज़ुबान पर आ गया है तो उसका नाता शायद बन गया है। उसी से वो रूप पाता है। नहीं तो उसी किसी ज़ुबान से रूप पाने की क्या चेष्टा।

हमारे लिए किसी का रूप क्या है और उसके साथ हमारा रिश्ता क्या है? मैं मानता हूँ ये तो मौके और जीवन अथवा सोचने के ऊपर निर्भर करता है लेकिन कुछ तो होता ऐसा जो रूपक हो हमारे लिए?

किसी कहानी को पढ़ना अथवा किसी जीवन को पढ़ना जो हमारे सामने सांस लेता है, डरता है, ताकतवर है उसके और मेरे बीच की ठहरी या फिसलती बातचीत मे बहुत सी चीजें बड़ी तेजी से निकल जाती हैं। जिनको शायद पकड़ना बेहद मुश्किल होता है, कुछ ऐसा भी होता है जो उसकी ज़िन्दगी का बहुत डरा देने वाला पल होता है जिसे पकड़ भी लिया तो छोड़ देना होता है।

हमारे सामने कोई कुछ पल के लिए अपनी यातनाओ और कामनाओ को रख कर चला गया। कुछ समय फिसला और कुछ पकड़ मे आ गया। लेकिन सब कुछ क्या मेरे लिए ही था, जो गया उसको हम कैसे पकड़े। उसको कैसे पढ़े? उसकी इंद्रियाँ क्या होगी?

ये तब्दीली का दौर चलता रहता है। मेरी दोस्त से मुलाकातों मे कुछ ऐसी ही तब्दीलियाँ उभरती हैं। क्या इस सोच को समझना हमारे लिए कुछ संभावनायें छोड़ता है। ये रुका सा महसूस होता है। इससे बाहर कैसे निकला जाये?

लख्मी

Tuesday, January 13, 2009

ये नोर्मल तस्वीर क्या है?

कल एक अजीब सी बात हुई, ये बहुत ही सोचने के लायक थी। ऐसा नहीं है कि ये कभी सुना या सोचा नहीं है लेकिन ये तो एकदम गज़ब ही था। कल मेरा जाना एक सरकारी दफ़्तर में हुआ। जिसमे मुझसे कुछ डॉकोमेन्टस माँगे गए। जैसे- राशन कार्ड, पासपोर्ट साइज़ फोटो, स्कूल का सार्टीविकेट, वोटर आई कार्ड वगैरह। उसके साथ-साथ एक फोर्म भी भरना था जो उन्ही ने ही दिया था। मैं वो फोर्म भरकर और ये सारे काग़जात लेकर उसी ऑफिस मे पँहुच गया। उन्होंने मेरे सारे काग़जात देखे और फोटो को देखते हुए कहा, "ये क्या तस्वीर है? आपको पता नहीं है कि पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर कैसे खिंचवाई जाती है, इसमे चेहरे को नोर्मल रखना होता है। ये क्या तस्वीर। है? ये नहीं चलेगी, जाइये दोबारा लेकर आईये।"

उनकी ये बात सुनकर मैं वापस अपने घर चला आया। मैंने कोई बेकार तस्वीर थोड़ी खिंचवाई थी। मेरा एक दोस्त गोविंदा का बहुत बड़ा फैन है तो वो जब भी तस्वीर खिंचवाता था तो अपने चेहरे को हमेशा गोविंदा अंदाज़ में बना लेता था फिर चाहें वो पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर हो या पोस्टकार्ड साइज़ की। मैंने भी तो कुछ ऐसा ही तो किया था। इसमे हर्ज़ ही क्या था?

मगर उस ऑफिसर ने कहा था की नोर्मल तस्वीर होनी चाहिये। ये रटता हुआ मैं फोटोग्राफर के पास में गया। उससे मैंने कहा, "भाई साहब एक पासपोर्ट साइज़ में तस्वीर खिंचवा‌नी है लेकिन फोटो नोर्मल होनी चाहिये।"

वे ये सुनकर हँसने लगा और कहने लगा, "सर चिंता मत किजिये आप, फोटो एकदम नोर्मल होगी।"

उसने मुझे अपने अन्दर वाले कमरे में बैठा दिया। सामने का पर्दा लगाया और लाइट को बन्द कर दिया। ये एक छोटा सा कमरा था। यहाँ का नया फोटोस्टुडियो था ये। पीछे सफेद रंग का पर्दा खींचा और सामने लगी टेबल पर उसने मुझे बैठा दिया। उसके बाद वो मेरे चेहरे की तरफ़ में आया और देखने लगा। मैंने उससे कहा, "भाईसाहब ये नोर्मल होना क्या होता है? ये चेहरा नोर्मल है ये कैसे पता चलता है? हम हर तस्वीर में अपनी अदा दिखा सकते हैं अलग-अलग भाव भी ला सकते हैं तो ये पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर में क्यों नहीं?"

उसको पता चल गया था कि आज उसको क्या कहा जा रहा हैं। वो कुछ ना बोलते हुए बस, मेरी तरफ़ देखकर हँसने लगा। फिर बोला, "ये बताया नहीं जा सकता सर, पर हाँ मैं जो तस्वीर खींचूगा वो नोर्मल होगी, एकदम आम आदमी की।"

वो ये कहते हुए मेरी तरफ में आया और मेरी कमीज़ ठीक करते हुए बोला, "सर आप बस, मेरी तरफ देखिये। चेहरे को एकदम ढीला छोड़ दिजिये। आँखें एकदम सामने। जब तक मैं ना कहूँ पलक मत झपकना। अपनी बॉडी को थोड़ा हल्का किजिये, हाँ एकदम सही। सीना टाइट कर लिजिये। हाथों को अपने घुटनों पर रख लिजिये। चेहरा थोड़ा नीचे की तरफ, गर्दन का कंठ नहीं नज़र आना चाहिये। आँखें बड़ी मत किजिये, एकदम रिलेक्स होकर बैठिये। एक मिनट में बस, आपका फोटो खिंच जायेगा।"

वो मेरी कमीज को दोबारा से ठीक करते हुए वापस अपनी जगह पर गया। उसकी दूरी लगभग चार फीट की थी। एक बड़ा सा कैमरा मेरे ऊपर ताना हुआ था और बगल में जलती लाइट मेरे मुँह पर पड़ रही थी। मेरा चेहरा लगभग चमक रहा था। ऐसा लग रहा था की जैसे जीरो वॉट का बल्ब मेरे चेहरे पर ही जल रहा हो। इसके बाद मे दो बार कैमरे का फ्लैस मेरे चेहरे पर पड़ा और तस्वीर खिंच गई।

वो मेरी तरफ मे देखते हुए बोला, "लिजिये सर खिंच गई आपकी नोर्मल तस्वीर।"

इस बार मैं हँसा और उससे कहा, "भाई साहब एक बात बताइये ये कौन सा वाला नोर्मल है? डॉक्टर जो कहता है वो वाला नोर्मल? या उस सरकारी आदमी ने जो माँगा वो वाला? फ़िल्मों में जो नज़र आता है वो वाला या आपने जो खींचा वो वाला?"

फोटोग्राफ़र बोला, "सर, ये सारा है। ये वो भी है जो डॉक्टर कहता है और वो वाला भी है जो उस सरकारी आदमी ने माँगा था और ये वो वाला भी है जो मैंने खींचा है। बेसिक्ली ये नोर्मल इंसान वो है जिसकी डिंमाड सबसे ज़्यादा है। मगर ये ही नहीं मिलता।"

"तो क्या मिलता है भाई साहब यहाँ?" मैंने कहा।

फोटोग्राफ़र बोला, "यहाँ पर सब कुछ मिलावट का समान मिलता है। ये मिलावट आपको पता है क्या है। यही तो मस्ती है। यहाँ पर हर कामों मे अलग-अलग चीज चाहिये। तो लोग उसी हिसाब से बँट जाते हैं। जैंसे जो शादी के लिए चाहिये वे अलग है, सरकारी कामों मे अलग, पोज़िंग के लिए अलग, पोर्टपोलियों के अलग और अब तो हैंटीकेप के सार्टीविकेट के लिए भी अलग तो लोग भी उसी के हिसाब से अपने आपको बदल लेते हैं।"

"एक बात बताइये भाईसाहब, आपने ये अलग-अलग महकमों और कामों मे चेहरे बनाने की डिंमाड को कैसे जाना?" मैंने कहा।

फोटोग्राफ़र बोला, "सबसे पहली बात तो ये की मैं भी तो इसी दुनिया में रहता हूँ। इसलिए जो भी यहाँ होता है तो मेरे साथ भी होता है। दूसरा ये की, हमें चेहरों के भाव से, एक्ट से खेलना आना चाहिये तभी तो ये काम है, नहीं तो हमें आता क्या है और सही बात बताऊँ, वो ये की यहाँ पर ये खेल सबको आता है।"

मैंने कहा, "तो ये खेल हर साइज़ के फोटो के साथ खेला जाता है? किस साइज के साथ में कौन सा खेल है ये कैसे बन गया?"

फोटोग्राफ़र बोला, "मेरे हिसाब से तो खाली दो ही तरह के भाव हैं इस दुनिया में। जिसमे से एक हमने बनाया है दूसरा जो हमने नहीं बनाया। बस, उसे मान लिया है। पहला तो ये ही जो आपने खिंचवाया। पासपोर्ट साइज़ का खेल। नोर्मल फोटो, और दूसरा जो खुलकर आता है वो है कि किसी भी साइज़ में आप किसी भी तरह का भाव अपने चेहरे में ला सकते हो।"

"तो ये नोर्मल होना और बाकी का होना क्या है? क्या वो नोर्मल नहीं है?" मैंने कहा।

फोटोग्राफ़र ने कहा, "ये नोर्मल होना कुछ नहीं होता। ये सब बस, माँग है। सरकार को लगता की हम एक ऐसा चेहरा बनाके उसको दे जिसमे कुछ भी अलग से मिलाया ना गया हो। सरकार समझती है की आदमी मे रोना, हँसना, तेडूपंती या स्टाइल सब अलग से आई हैं। ये ऊपर वाले ने नहीं दी। तो सरकार वो चेहरा माँगती है।"

ये माँग के साथ में चेहरे का होना ये तो बहुत कस देता होगा। ये कसा हुआ भी ना लगे और खूबसूरत भी लगे ये कैसे करते फिर?" मैंने कहा।

फोटोग्राफ़र ने कहा, "सर, यही तो हमारा काम है। एक बात कहे आपसे, जब कोई अपनी फोटो खिंचवाता है तो वो हमेशा ये सोचता है कि जब वे अपनी खींची हुई तस्वीर को देखे तो उसे लगता चाहिये की उसका चेहरा ऐसा दिखता है। जो उसे शीसे में नहीं दिखता वो तस्वीर में दिखना चाहिये बस, कोई-कोई अपनी पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर को ही बड़ा करवा लेता है। कभी-कभी तो फ्रैम भी।"

"आपको क्या है लगता है अभी तक जितनी भी तस्वीरें आपने खींची हैं उन तस्वीरों मे से कितनी नोर्मल है और कितनी नहीं?" मैंने कहा।

फोटोग्राफ़र ने कहा, "आपको अभी दिखाता हूँ। जैसे ये देखिये।"

उसने मेरे सामने काफी सारी तस्वीरें बिछा दी। जिसमे बहुत सारे लोगों की तस्वीरें थी। पहली फैमली फोटो थी। जिसमे एक आदमी ने अपने बच्चे को गोद मे ले रखा था और बीवी उसका हाथ पकड़कर उसके साथ मे खड़ी थी। इसे उसने नोर्मल कहा था, दूसरी भी इन्ही की तस्वीर दिखाई उसमे वो औरत कुर्सी पर बैठी थी और वो उसके पीछे खड़ा था उसके काँधों पर हाथ रखे। ये उसने स्टाइलिस्ट कहा था।

एक तस्वीर में तीन लड़के थे, एक बैठा हुआ था और दो उसके पीछे खड़े थे। एक के हाथ में हंटर था तो दूसरा उसकी तरफ में देख रहा था। तीसरी तस्वीर किसी स्कूल की थी। जिसमे चालिस बच्चो के बीच में एक टीचर बैठी है और सारे बच्चे सामने देख रहे हैं। एकदम सीधे। उन्ही में से एक लड़का अपने बालों में हाथ मार रहा था। वो उस तस्वीर में सबसे अलग ही नज़र आ रहा था।

ऐसी ही ना जाने कितनी ही तस्वीरें थी उसके पास में। जिसको वो अब बटवारे में टटोल रहा था। लेकिन ये बटवारा किसी काम का नहीं था। बस, अपने आँकड़े ठीक करने के जैसा ही था। लेकिन था मज़ेदार। मैं उसे उसी सोच मे छोड़कर चला आया पर वो बिलकुल सटीक था अपनी सोच पर। जैसे चेहरों के खेल मे वो बहुत आगे निकल गया हो। शायद यही उसका काम था। जिसमे वो अपने को भी देखता था। क्योंकि इस खेल का सबसे मंझा हुआ खिलाड़ी तो वही था।

मैं वहाँ से निकलते हुए बस, यही सोच रहा था की अब उस सरकारी अफ़्सर को मेरी तस्वीर नोर्मल लगे। फिर कहता कि लगेगी क्यों नहीं आखिर ये खींची किसने है?

लख्मी

Wednesday, October 29, 2008

पाँच मिनट हमारी ज़िन्दगी मे क्या है?

कई माहौल देखे व माहौलों के बारे मे सुना है। पर सवाल के घेरे कम नहीं होते। कभी-कभी किसी माहौल को देखकर बहुत ताज़ुब सा होता है। कई माहौल जिनमे गज़ब का समय भरा है। पिछले 30 से 40 सालो से या उससे भी ज़्यादा समय से वे वैसे के वैसे बनते आ रहे हैं और उसमे लोग वैसे ही जुड़ते जा रहे हैं। किसी को उस माहौल मे किसी को जानना कोई जरूरत की बात नहीं है। बस, वे माहौल के भागीदार है वे ही बहुत है। उनमे हमेशा लोगों को बैठे देखने से कई सवाल उभरते हैं।

जगाहों का अपुर्ण होना क्या है? अपूर्णता किसके लिए है? किसी जगह के लिए है उस के लिए है जो वहाँ जाता है? किस तरह से समझने की नज़र होती है उस अपुर्णता हो? अपनी चाहत, पसंद और इच्छा को सोचते हुए किसी अपुर्णता का अहसास होता है या उस जगह के काल्पनिक ढाँचें के नज़र आने पर?

जगहों से अक्सर हमारे जहन मे 'अपने लिए' एक स्थान पाने की चाहत से पनपता है। जिसका रिश्ता हमारी ज़ोन्दगी के किसी ख़ास हिस्सो से होता है। एकान्त, मिलना, बैठना, बोलना हर तरह के बौद्धनिये समय को जी पाने की लरक होती है। ये लरक उपजती कहाँ से है? और इसका निकाष क्या है? ये हमें कहाँ तक खींचकर ले जाती है?

हमारी चौख़ट के बाहर की दुनिया हमारी कौन सी कल्पना मे है? जिसमे हम अपने स्थान को खौजते हैं और क्या तलाशते हैं? हमारे अपने ध्यान मे क्या कोई नक्शा है उस जगह का या तलाश का?

बस्ती की उन जगहों पर नज़र दौड़ाने की कोशिश की जो एक पारिवरिक नितियों और कार्यबध नितियों के विपरित है। जिसको हम एक खुली जगह के नाम से अभी दोहरा सकते हैं। उसका नाम और स्थान क्या है वो बाद मे खौजने की कोशिश करेगें।

उस जगह पर जाकर...
वहाँ पर बैठे एक शख़्स से बातचीत की, जो दक्षिण पुरी मे अभी नय-नया आया है मगर, कुछ ही वक़्त मे उसने अपने दिन मे कई माहौल को जगह दी है। दरअसल, दिमाग मे ये था कि कोई कैसे किसी नई जगह पर जाकर अपना स्थान बना लेता है?

मैंने पूछा, "जब कोई आता है और बोलता है तो उसकी निकलने वाली पहली बातें उसके जीवन के कहाँ से होती है?”

वे बोले, "ज़्यादातर तो लोग अपनी बातों को अभी के समय से शुरू करते हैं। हैलो या नमस्ते वगैरह करके वो कभी अपने आने के कारण नहीं बताते और ना ही क्यों बता रहा हूँ वो बताते। सबका अलग-अलग रिश्ता होता है। नज़रें चाहें वहाँ पर किसी एक पर ही क्यों ना हो मगर बातें सभी सुन रहे होते हैं। उस बात को बताने मे उनको कोई डर नहीं होता। जिनको वो वहाँ बोल रहे होते हैं अपने अनुभव के किसी भी टाइम को वो सोचे होते हैं की क्या कहना है? यहाँ पर तो सबसे ज़्यादा अपना वो टाइम बताया जाता है जो "टोप-क़्लास" था। थोड़ी मस्ती होती है, थोड़ा मजा होता है या फिर देखा-दिखाया टाइम।"

मैंने पूछा, “कोई अपनी अगर बोलते-बोलते लम्बा ही बोल गया तो? यानि कोई बहकता नहीं है क्या यहाँ?”

वे बोने, “बढ़े बहकते है यहाँ तो बन्दे। कभी तो इतनी पुरानी बातें बताने लगते है की जैसे वो टाइम बस उसी ने देखा है और अगर उसे पता चल जाये की या ये अनुमान भी हो जाये कि वो जो बोल रहे हैं वो सिर्फ़ वही जानते हैं तो फिर वो बताते नहीं रुकते और फिर बनाते जाते हैं और बोलते जाते हैं और यहाँ पर बैठे हम लोग उनकी उन बातों मे उस वक़्त का इन्तजार करते हैं जहाँ से हमने दुनिया देखी है।"

मैंने पूछा, “यहां पर सब सुनते हैं? कोई बोलता नहीं है उस सुनने के टाइम मे?”

वे बोले, “नहीं-नहीं, बोलते हैं पर उनकी बात ख़त्म होने के बाद मे कोई काटता नहीं है उनकी बात को। नहीं तो उनको बुरा लगेगा या उनको ये लगेगा की उनकी बात का कोई मोल नहीं है। कभी तो सब उनसे पूछने बैठ जाते है कहते है कि "वो टाइम वापस चाहते हैं क्या आप?”

मैंने पूछा, “तो वो क्या कहते हैं?”

वे बोले, “कुछ नहीं बस, हँस पड़ते हैं और कहते हैं की बीता हुआ समय वापस नहीं आता। अगर आता तो तुम मेरी सुनते? नहीं। यही तो मेरी ताकत है जो इस समय तुम बैठे हो मेरे आगे?”

मैंने पूछा, “रोज-रोज यहाँ पर बातें होती है कैसे? क्या सब कुछ रिपीट नहीं होता कभी?”

वे बोले, “नही यार रिपीट तो कुछ नहीं होता। बस, लोग अपनी बातें बोलने के लिए कुछ ना कुछ लेकर आते हैं। हर बार बातें कभी पेपर या अख़बार से होती है तो कभी टीवी से या कभी बीती यादों से जैसे मान लो बात शुरु हुई 'हादसे' से और वो एक दम निजी हो जाती है फिर हादसे अन्दर से निकलने लगते हैं और सरक जाते हैं सीधा घर की ओर। जैसे कुछ लोग तो कुछ हादसे बोल भी नहीं पाते पर कोई-कोई हादसा कह देना आसान सा होता है। लोग उसे हँसकर बताने लगते हैं फिर वो एक परिवार की बात बन जाती है। निजी हो जाती है एकदम।"

मैंने पूछा, “किस तरह की निजी?”

वे बोले, “अपने बच्चों तक हो जाती है। परिवार मे किस तरह से रहते हैं अभी तक और किस-किस तरह से निभा रहे हैं अपने को अपने ही घर मे।"

मैंने पूछा, “क्या लोग यहाँ पर अपने निजी परिवार के बारे मे भी बोलने लगते हैं तो कैसे सुनते है सभी?”

वे बोले, “कोई भी उसे नया नहीं मानता। कहानी कोई भी हो पर है तो एक घर की ही ना! की बढ़े होते ही सब अलग हो जाते हैं। ये पहले लगता था लोगों को की कोई गज़ब हुआ है पर अब नहीं लगता। हां बस, इतना होता है कि लोग अपने घर के भी उन सभी बातों को सोचने लगते हैं और ये देखने लगते हैं की इसका भारी है या मेरा?”

मैंने पूछा, “तो फिर नया क्या होता है यहाँ? कोई यहाँ पर रोज आता है। कोई महिने मे दो बार आता है। कोई हफ्ते मे एक बार आता है तो उसका यहाँ आकर कैसे दिल बहलता होगा या वो यहाँ बोलता है तो उसका बोलना क्या है फिर?”

वे बोले, “भईया इस माहौल की ख़ाशियत और सादगी ही यही है की कोई भी कभी भी लौटे ये उसके लिए वही है। जैसी वो छोड़ कर गया था। बहुत सारे बन्दे होते हैं जो सिर्फ़ यहाँ दुआ-सलाम करने के लिए ही आते हैं, कोई खाली खड़ा होने आता है तो कोई खाली दूर से देखने के लिए। जगह तो बदलती रहती है मगर जिन लोगों से उसकी अहमियत है वो होने पर एक माहौल बनता है गुट बनता है जो जहाँ भी बैठ जाये वहीं पर जगह तैयार।"

मैंने पूछा, “और अगर किसी दिन वो लोग ना हो जिनसे ये माहौल बनता है तो उस जगह का क्या होगा जहाँ लोग मिलते हैं?”

वे बोले, “तो जो आयेगा वो वहां बैठा नज़र आयेगा। एक रिश्ता बन गया है ना अब तो।"

मैंने पूछा, “ये जगह आपके लिए क्या है?”

वे बोले, “मेरे लिए तो ये मान लो की बस, एक ऐसी जगह है जहाँ बैठकर मैं यहाँ क्या-क्या हुआ जान सकता हूँ और सबसे बात कर सकता हूँ। हम जहाँ पर रहते हैं वहाँ जान-पहचान होना भी तो जरूरी होता है। यहाँ पर आने से ये भी नहीं लगता की मैं यहाँ पर जो रहते हैं उनसे कट रहा हूँ। सही मायने मे यहाँ पर मज़ा आता है और कब तक इन्सान घर मे बैठा रहेगा।”

मैंने पूछा, “और कब तक आदमी इस जगह मे रहेगा?”

वे बोले, “जब तक वो रहना चाहें। लोगों मे रहना और उनकी बातों को सुनना किसको अच्छा नहीं लगता भला दोस्त।? अब देखलो ज़्यादा टाइम नहीं हुआ है मुझे यहां पर और काफी लोग जानते है मुझे क्यों?”

मैंने पूछा, “क्यों? और कैसे जानते है लोग आपको?”

वे बोले, “क्योंकि मेरा रिश्ता और आना-जाना इन जगहों से रहा है जहाँ पर लोग बैठे नज़र आते हैं। वहाँ सैन्ट्रल मार्किट के कोने पर, स्कूल के बाहर, एल ब्लॉक मे, मार्किट मे, डाकघर के बाहर। पहले तो मैंने बस, यहाँ पर बस, आना-जाना किया करता था फिर दुआ-सलाम। अगर अपने टाइम का पाँच मीनट भी हम इन जगहों मे खड़े रहते हैं तो हमारी जान-पहचान बन जाती है।"

क्या बात कही है आपने, मस्त रहिये। सर...

क्या लेकर आती है ये जगहे हमारे जीवन मे? फिर इन जगहो का महत्वपुर्ण होना कब होने लगता है? कई लोगों से जान-पहचान ये क्या लाती है हमारी ज़िन्दगी मे या ये क्या है? लोग कितने लोगों को जानते हैं उसे बड़े ताव से बताते हैं और उनके साथ मे क्या रिश्ता है वो भी। ये जानना-पहचाना समाज मे एक तरह के तबके के लोगों का हुआ करता था पर जब ये आम हो जाता है या आम मे रहकर भी उससे थोड़ा हटकर रहता है तो क्या बना रहा होता है?

अपनी बौद्धनिये जीवनी को खाली कलाओ से नहीं जताते। कब दिखाने-चौंकाने के रिश्ते मे पनपती है मगर इन मामूली जगहो के नक्शे या सोच वाली जगह। जहाँ पर चार-पांच लोग आपस मे बातें, खेल कर रहे होगें वो जगह किसी के लिए कहीं महत्वपुर्ण होने की सम्भावनायें देती हैं उस सम्भावानाओ मे कैसे जीते हैं हम?

यहाँ पर लगा की सार्वजनिक जगह खाली अलग-अलग कौनों से आए लोगों के आने से ही नहीं है। वहाँ पर रहकर कोई कुछ दोहरा, बता, बोल या सुन ही नहीं रहा होता है बल्कि कोई वहाँ के लोगों के साथ अगर पाँच मीनट भी मिलता है तो वो कुछ तैयार कर रहा है। ये क्या तैयारी है या फिर ये क्या है? क्या कोई चाहत है? रास्तों पर चलते कई लोगों के मुस्कुराते चेहरो को देखने की तलब है? या नाम लेकर कोई किसी ना किसी तरफ़ से आवाज देगा वो सुनने की लरक? पता नहीं क्या? लेकिन, जो भी है वो गज़ब है।

लख्मी

Sunday, October 26, 2008

ये हिसाब का पानी है

इस शहर की चाल-ढाल मे शामिल होकर अपनी रफ्तार भरे जीवन के सपनों को बुनते हुए हम बस, एक नई भागदौड़ मे ही लगे रहते हैं और शहर की भी जीवनशैली मे अपनी भागीदारी दिखाकर जगह-जगह, चौक-चौराहों पर वक़्त की कभी ना ख़त्म होने वाली कगार पर खड़े हुए, मौसम के बे-ढंगे अन्दाज मे और इतराती धूप की चुलबुलाती दोपहरी मे रंगीले छातों की छांव के नीचे किसी फुटपाथ या रास्तों पर ठन्ड़े पानी की रेहड़ियाँ लगाते शख़्स। शहर की किसी न किसी हरकत से वाकिफ़ होते हैं। अपनी रोज की मेहनत कश्त भरी ज़िन्दगी मे जीते रहे हैं। जो उड़ेल देते हैं खुद को दूसरों की रोज़मर्रा मे पानी का एक तरल एहसास बनाकर।

ऐसी ही एक जगह मे हमारी बात हुई। अपने पूरे दिन को बताते हुए एक नौजवान से।
जगह रही, पान का खोका जिसके पीछे एक दीवार के साथ मे बस स्टेंड हैं और वहीं फुटपाथ की पट्टरियाँ बनी हैं जहाँ से हर वक़्त लोगों का काफिला गुजरता रहता है।
आवाजे, स्कूटर, कार, ऑटो रिक्शे जो कि तेज होर्न बजाते हुए गुज़र रहे हैं।

अपने विचारों मे खोए, पास ही मे खड़े शख़्सों की बातें, बड़े हौले से रुक-रुककर सुनाई दे रही है। पहली नज़र उनकी मुस्कूराहट कि ओर थी फिर चेहरे पर उभरती कुछ सलवाटों की तरफ़ उनसे करीबी लहजे से पास आकर एक शुरुआत कि और उनका नाम पूछा तो वो एक हंसी भरे भाव को चेहरे पर लाकर अपना नाम बताने लगे, वे बोले, “मेरा नाम अब्दुल है।"

महरुम रंग की कमीज उनके सांवले रंग पर खिल रही थी। पानी से दोनों हाथ भीगे हुए थे। एक हाथ मे पीतल का कड़ा था और दूसरे हाथ की उंगलियों मे तांबे कि अंगुठियाँ थी। उस सवाल के बाद भी फिर से देखा सुना सवाल मैंने किया। “आप क्या करते हैं?” चेहरे पर संकोच के बादल छा गये थे उनके, वे मेरी तरफ़ मे एक मज़ाकिया अन्दाज मे देखने लगे। सोच तो रहे होगें कि क्या फालतू का सवाल कर रहा है, दिख रहा है कि मैं शहर मे क्या करता फिर रहा हूँ या क्या पॉजिशन है मेरी। वे मुझे यूहीं हंसते देखते रहे मगर फिर भी अपने अन्दाज मे उन्होने कहा, "मैं मशीन का ठन्डा पानी बेचता हूँ।"

जब काम काज की बात सामने आई तो दिमाग मे उम्र जानने की इच्छा जगी। वे बहुत नर्म खाल का था। यानि ये हमारी भाषा मे कहा जाता है कि नई-नई मूंछे निकली थी उसकी। मैंने अबदुल के थोड़ा करीब आकर पूछा, "आप की उम्र क्या होगी?“

गर्मी मे रुखे अन्दाज से उसने कहा, “यही कुछ बीस-इक्कीस साल की होगी।"

अब हमारी बाते शुरू हो गई थी। उसके दिमाग मे बहुत था मेरे लिए, मगर पता नहीं माहौल मे ऐसा क्या था की वो जवाब देने वाला बन गया था और मैं कुछ ना कुछ पूछने वाला। कभी-कभी शायद शहर की किसी ना किसी राह पर ऐसी पॉजिशन हमारे साथ बन जाती है। हम शहर की सूमसान या रौनकदार सड़को पर लाइव इन्टरव्यू करने लग जाते है या हम बातचीत के बीच की बनती सारी दूरियों को अपने से काफी दूर कर देते हैं और बस, निकलने लगती हैं हमारी सारी बातें, किसी ना किसी अन्दाज़ मे। वैसा अब शुरू हो चुका था।

"अच्छा आप पानी की रेहड़ी कब से लगा रहे हो?”

अभी माथे पर पसीनें की बूंदे बन आई थी। कुछ याद करते हुए अब्दुल बोला, "शायद दो साल हो गए।"

ये उन्होनें दोनों हाथों की हथेलियों को मसलकर कहा था। उस के बाद मैंने अबदुल कि रेहड़ी पर नज़र दौड़ाई। पानी के खाली गिलास उल्टे रखे थे एक प्लास्टिक की टोकरी मे दस-बारह नींबू पड़े थे। एक रूमाल को फैला कर रखा हुआ था और पानी के नल के पास पानी चिपटा हुआ था। ऐसा लग रहा था की यहाँ से पानी रिस-रिस कर जम गया है। यहाँ से नज़र हटाने के बाद उनसे मैंने पूछा, "अब्दुल आप ये पानी की रेहड़ी कितने बजे लगाते हो?”

उनके लिए ये एक आसान सवाल था जिसे वो बिना अटके ही बोल गए, "नो बजे, सुबह जल्दी उठकर मैं आश्रम से रेहड़ी मे पानी भर कर लेकर आता हूँ और यहाँ लगा लेता हूँ।"

अब वे अपनी बातों मे गहरापन ला रहे थे। ऐसा लग रहा था कि एक अनुभव को दोहराने की कोशिश हो रही है। अब कोई उनकी उम्र पर जाने वाला नहीं था। शायद, उनकी उम्र उनके काम कर सामने कुछ भी नहीं थी। अगर अब्दुल से बातें करनी है तो उसके अनुभव से करो। दोपहर सिर पर ही नाच रही थी। गर्मी से दोनों के बदन मे खुजली मच रही थी। अब्दुल एक छाते के नीचे बैठे हुए थे। उनकी आँखों मे आँखे डालते हुए उनसे पूछा, “रेहड़ी मे कितना पानी आता है? और कितने लीटर पानी रोज निकल जाता है?”

वो पूरे दिन का अंदाजा लगाकर नज़रों को किसी हरकत मे लाकर बड़े रंज से बोले, ”पानी तो कई लीटर आता है इसमे मगर मौसम को देखकर ही पानी मिलता है। आजकल गर्मी भी होती है और कभी बारिश भी होती है तो बारिश और ठंडी मे हमारा पानी बहुत कम निकलता है। फिर भी रोज 6-7 इंच पानी निकल जाता है।"

मैंने कुछ आश्चर्य और जिज्ञासापूर्ण तरीके से पूछा, "ये छ: सात इंच का क्या मतलब है?”

तो अब्दुल मुझे समझाते हुए कहने लगे, "अरे रेहड़ी लम्बी और चौड़ी भी होती है। इसकी टंकी मे इचं के हिसाब से ही पानी नापा जाता है और अंदाजा लगाते हैं कि पानी कितना निकल गया। वैसे छ: सात इंच मे 10-15 लीटर पानी होता है।"

"एक बात बतायेगें मुझे, मैंने कई पानी की रेहड़ी वालो को देखा है। जब शहर की सड़को पर कोई नहीं होता तब भी वे अकेले खड़े नज़र आते हैं आपको पूरे दिन यहाँ रेहड़ी पर खड़े रहना कैसा लगता है?”

इसके बाद ही बड़ी तेजी से होर्न देता ट्रक गुजरा और छोटी-छोटी गाड़ियों के घर्राहट मिनट दर मिनट मे हो रही थी फिर अब्दुल कुछ अपने पूरे दिन को सोचते हुए बोले, "बस, सब लोगों को आते जाते देखकर। उनको हंसते-बोलते सुनकर वक़्त कट जाता है और वैसे भी हमारे पास कोई ना कोई बंदा आकर पानी मांगता है तो कोई रोब से बोलता है। 'ओए एक गिलास पानी दे' तो कोई बड़ी तेजी से कहता है 'अबे जल्दी दे छोटू' इस तरह के शख़्स भी मिलते हैं कि हमारे पास खड़े होकर सिर्फ़ इशारा करके कहते हैं आँखे और भंवो को ऊपर करके अपनी तरफ़ ले आना तो मैं समझ जाता हूँ कि पानी माँग रहे हैं। बहुत ही मस्ती मे होते हैं 'हैलो भाई या सरजी एक गिलास पानी दो' फिर कुछ लोग इंग्लिश भी झाड़ जाते हैं।"

अब अब्दुल का चेहरा कुछ खिंचा हुआ था और आँखे भी भिच गई थी। एक शख़्स के बारे मे बताते हुए उन्होने कहा, “कहा तो इंगलिश भी झाड़ जाते हैं कहते हैं 'प्लीज वन ग्लास वाटर' ।

एक हिम्मत की सांस लेकर अब्दुल ने अपना बदन ढीला छोड़ा और मैंने उनसे पूछा, "अच्छा यह पानी की रेहड़ी आपकी है या किसी और की?”

वो रेहड़ी पर हाथ फेरते हुए बोले, नहीं, इसका मालिक कोई और है, बाबू नाम है उसका। उसकी ऐसी दस-बारह रेहड़ियाँ हैं। जो अलग-अलग जगह जैसे आई.टी.ओ चौक की लाल बत्ती पर, लाजपत नगर मार्किट मे, मूलचंद बस स्टाप के पास और चिड़िया घर के बस स्टेंड पर लगती है। ऐसी काफी जगहे हैं जहाँ मेरे जैसे बदें पानी की रेहड़ी लगाते हैं।"

इसी बीच पानी पीने वाले शख़्स भी आ रहे थे। अब्दुल मुझसे बात करते-करते उन्हे नल का हत्था खींचकर पानी भी पिला रहे थे। उनके इस पूरे दिन की मशक्कत को देखते हुए उसकी कमाई के बारे मे पूछ लिया, "तो अब्दुल जी रोज की कमाई है आपकी या महीने का पैसा मिलता है?”

जब बात पैसे की आई तो कुछ थके हुए मूड मे बोले, "नहीं-नहीं, पूरे दिन के बाद मालिक आकर पानी स्केल से नापकर एक कॉपी मे लिख जाते हैं। जितने इंच पानी निकला उतना लिखकर रात आठ या साढ़े आठ बजे तक मुझे 70 रुपए दे जाते हैं।"

"हर रोज 70 रुपए ही मिलते हैं?”

यह अब्दुल का अपना मासिक गणित हिसाब था। मैंने उसे छेड़ना ज़रूरी नहीं समझा।

"अच्छा अब्दुल भाई, क्या आपका हाथ नहीं दुखता बार-बार नल का हत्था खींचने पर?”

अब्दुल ने कहा, “नहीं कुछ ख़ास नहीं, पहले मैं शुरू मे झिझकता था मगर अब आदत डाल ली है। कभी-कभी रात को सोते समय भी सीधे हाथ की कलाई ऊपर नीचे होती है तो मामा हँसते हैं और सुबह मेरा मज़ाक बनाकर सुनाते हैं।"

मैंने कहा, "उनकी मुस्कुराहट मे शामिल होकर और उनकी इस आदत को जान कर क्या आप इसी जगह पर खड़े होते हैं हर रोज?”

अब्दुल ने कहा, “नहीं ऐसा नहीं है। मैं कभी चाँदनी चौक चला जाता हूँ। कभी दरिया गंज तो कभी प्रगति मैदान। हमारी जगहें बदलती रहती हैं और रेहड़ियाँ भी।"

"अच्छा" ये मुंडी हिलाकर मैंने कहा था और फिर उस जगह लोगों की आवाजाही तेज़ हो गई फिर बीच-बीच मे पानी पीने वाले और आने लगे। कुछ रुक-रुककर हमारे बीच ही सवाल ज़वाब होने लगे। मैंने कहा, "अच्छा आप कितनी बार इस रेहड़ी का पानी पीते हैं?”

ये सवाल ऐसे ही पानी को देखकर पूछ लिया था। अब्दुल भवें उपर चढ़ाकर सरल भाव से बोले, "नहीं साहब, मैं इस रेहड़ी का पानी नहीं पीता। मेरी बोतल तो अलग है। (अब्दुल ने एक पुरानी पेप्सी की बोतल मे भरा पानी दिखाते हुए) यह देखो।"

अजीब बात थी ना! पानी वाला खुद रेहड़ी का पानी नहीं पीता मगर रोजाना वो सैकड़ों लोगों को ठंडा पानी पिलाता है। ये मैंने मन मे ही सोचा था मगर अब्दुल की आँखों मे कुछ चुंभ रहा था फिर मैंने उनकी रेहड़ी पर लिखे हुए स्लोगन को पढ़ा, लाल रंग के पेंट से लिखा था। एक सजावटी ढंग से

!ॐ नम: शिवाय!
मशीन का ठंडा पानी
50पैसे गिलास

और बड़े अक्षरों मे एक नाम लिखा था। "बाबू“ साथ ही लिखा था । "हमारे यहाँ शादी और पार्टी के लिए गाड़ी व मयूर जग का प्रबंध होता है"
Contactकरें :

एक शायरी अपने आप को पेश करने की दो लाईने भी थी। अब्दुल को मुस्कुरा कर मैंने वह लाईने पढ़ दी। जो उनकी रेहड़ी के सामने लिखी थी

!फूल है गुलाब का सुगंध लेकर जाओ!
!पानी हैं हिसाब का रुपया देकर जाओ!

इस आवाज के साथ ही एक हंसी हम दोनों के चेहरे पर उभर आई। वाकई यह हिसाब का पानी था।

राकेश

Saturday, September 27, 2008

टेलिफोन की करकश

सोहन लाल जी ने अपना गीत पकड़ा दिया ये कहकर "अभी कच्चा है, काफी समय दिया मगर अब भी ताज़गी नहीं ला पाया हूं। लग रहा है कि थोड़ा फिका छोड़ दिया है। जरा तुम हाथ लगाकर देखो, क्या पता पक जाये।"

घर मे इतनी रोशनी होने के बाद भी आँखों मे नमी रहती लगता है जैसे अंधेरा अब भी गहराया है पुतलियों पर, लो दिमाग में फिर से शायरों कि मुलाकातो का असर होने लगा। पसीनो में अगर बदन तर हो तो पंखे की हवा भी बड़ी सुहावनी लगती है और हमारे घर का ये खैतान का पंखा पिछले 30 सालो से बिना कुछ खाए-पीए हमें हवा खिलाता आ रहा है। वैसे इसके नीचे बैठने से लगता है कि जैसे किसी राजा-महाराजा के यहां पंखे चला करते थे जो हवा देने के लिए नहीं बल्कि खाली मक्ख़ियां उड़ाने के लिए रखे जाते थे। मगर, पसीनो की तराई ने आज तो इस पंखे की हवा को भी किसी टॉपक़्लास कम्पनी के कूलर की तरह से कर दिया था।

इतने मे फोन की घण्टी ने आवाज लगाई। ये मोबाइल फोन भी कमाल है जब हाथों मे नहीं था तो ठीक था मगर, जब से आया है बस, यही दिल की धड़कन बन गया है। आधे से ज़्यादा काम तो इसी पर हल हो जाते हैं या ये कहिये कि इसी की वज़ह से कई लोग मिलते नहीं है मगर, फिर भी कहते है कि मिला था। ये मिलना भी कोई मिलना है। नम्बर दिल्ली का नहीं था और ना ही किसी जानने वाले था। लगता था कि आज किसी नये शख्स कि आवाज सुनने को मिलेगी।

हमने फोन उठाया और कहा,

"हैलो!”

"हैलो!, जी आप सुरेश बोल रहे हैं?”

"हां जी, बोल रहा हूं मगर आप कौन मैंने पहचाना नहीं?”

"जी आप मुझे नहीं जानते मगर मैं आपको जानती हूं। मुझे आपका नम्बर मेरे एक दोस्त ने दिया था। क्या आप विजय को जानते है?”

"कौन सा विजय? मैं दो विजय को जानता हूं। एक तो एक अस्पताल मे काम करते हैं। मगर वे बहुत अच्छे गीतकार हैं। कई दोस्त हैं उनके जो गीत व कवितायें लिखते हैं। विजय जी उन्ही के गीतों को गाते हैं। दूसरे विजय हैं, जिनकी बातों मे ही हर बार एक नई ही बात सुनाई देती है। हर वक़्त कुछ ना कुछ करने की बात करते रहते हैं। कभी ये सीखुंगा तो कभी ये। जितना भी कमाते हैं वे सारा का सारा नये संगीत के इंस्ट्रुमेन्ट खरीदने मे ही जाता है। चाहे बजाना आये या ना आये बस, उन्हे लाना जरूर है। एक बार ड्रम सेट ले आया था और दबादब उसे बजाने लगा। पूरी गली वाले उससे दुखी से रहते है मगर, उसके हाथ नहीं रुकते। वे जागरण मे भी जाते हैं ड्रम सेट को बजाने के पैतरें सीखने और उनके छोटे भाई साहब जो हैं वे बस, उन नई चीजों के साथ मे एक तस्वीर जरूर खिचंवाते हैं।"

" हां, वही विजय! आजकल ये अपने घर में रखी तस्वीरो की एक डायरी बना रहे हैं। काफी पुरानी टाइम की तस्वीरे हैं इनके पास।"

"हां जी, यही है! अब आप कहिये कैसे फोन किया आपने?”

"जी क्या मैं आपसे थोड़ा और देर बात कर सकती हूं? आप अगर कुछ काम है तो पहले कर लिजिये, मैं फिर एक घण्टे के बाद मे फोन कर लुगीं।"

"नहीं, जी आप कहिये आपको क्या बात करनी है? वैसे आप बोल कहां से रही हैं? ये नम्बर दिल्ली का तो नहीं है।"

" जी, मैं अलीगढ़ से बोल रही हूं। मुझे आपके बारे में थोड़ा बहुत विजय ने बताया था। सीधे लफ़्जों मे कहूं तो मुझे आपसे कुछ अपने लिए बात करनी थी। मैं आपसे कुछ मदद चाहती हूं और विजय की बातों से मुझे लगा की सिर्फ़ आप ही हैं जो मेरी कुछ मदद कर सकते हैं या कुछ बातचीत कर सकते हैं जिससे मुझे कुछ आइडिया दे सकते हैं। क्या मैं आपको अपने बारे मे बता सकती हूं?”

"जरूर कहिये, मैं सुन रहा हूं।"

"इस समय मैं एक ऐसे वक़्त से गुजर रही हूं कि मुझे किसी भी बात या पल का पता नहीं चल रहा है। जो भी वक़्त इस दौरान मेरे आगे से गुजर रहा है और उस समय में चलते सारे वाक्या मेरे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहे हैं। मैं बुथ बनी बस, देखती जा रही हूं, कुछ भी कह नहीं पाती। क्या करूं मैं इस वक़्त मे वो भी समझ से बाहर है। यहां होते हर वाक्या या हर बात मेरे बहुत ही नजदीक से जुड़े हैं। मेरे पापा से, जो कि अब नहीं रहे। जो वक़्त मेरे सामने है उसमे लोगों की बातें मे और मुझे समझाने मे पापा कही तक नज़र नहीं आते। मैं एक तरफ़ मे अपने पापा की बॉडी को देख रही हूं तो दूसरी ओर लोगों की बातों को सुन रही हूं। दोनों मे कहीं तक भी कोई मेल नहीं है। मेरे पापा ऐसे नहीं है !, मैं ये कैसे समझाऊ? मैं खाली अपने पापा के बारे मे ही नहीं, मैं एक ऐसे शख्स के बारे मे बताना चाहती हूं जो कभी अपने बारे मे नहीं सोचता था, उसके लिए उसके दोस्त, रिश्ते, काम और उनका अकेलापन ही उनका खुद था। उन्होनें जो भी किया आज वे खाली बातों मे था। वे भी ऐसी बातें जो अभी कुछ ही देर की है, उसके बाद मे सब ख़त्म हो जायेगी। क्या करूं सकती हूं मै? मैं लिखना चाहती हूं उनके बारे में?”

"माफ़ किजियेगा, सुनकर दुख हुआ! वैसे क्या लिखना चाहती हैं आप अपने पापा के बारे में?”

" मैं अपने पापा से 4 साल दूर रही हूं। मगर, ऐसा नहीं है कि मेरा और उनका रिश्ता बेगानों के जैसा था। मैं अपने घर से, बड़े होते ही बॉर्डिगं स्कूल मे भेज दी गई। हम घर मे सिर्फ़ तीन ही लोग थे। मैं, पापा और मम्मी। मगर, हमेशा पापा अपने काम और अपने बनाये रिश्तों मे ही गुम रहा करते थे। उनका कभी अपने पारिवारिक रिश्तो मे कसाव महसूस होता था इसलिये उनके घर के बाहर बहुत रिश्ते थे। उन्ही वे बहुत खुश रहते थे। काफी दोस्त थे उनके। हमेशा दोस्तों के किस्से उनकी जुबान पर रखे रहते थे। मेरे से वे बहुत कम मिलने आते थे पर जब भी मिलने के लिए तो बस, दोस्तो के बारे मे ही बताते रहते थे या क्या करवाना है अपने घर के लिए वे ही बोलते रहते थे। मैंने कभी उनको अपने बारे मे बोलते हुए नहीं सुना था। जब भी बोलते तो कभी मुझे लेकर तो कभी औरो को लेकर। मैं हमेशा उनका मुंह ही ताकती रहती थी और देखती रहती थी की ये शख्स क्या है? मुझसे मिलने आये हैं मगर मेरे बारे अभी का कुछ नहीं पुछ रहे बस, दोस्तो का ही जिक्र कर रहे हैं। कभी-कभी उनके ऊपर बहुत गुस्सा भी आता था। पर वो जब चले जाते थे तो मन मे आता था कि वो चाहे किसी और की ही बात क्यों ना करें मगर बस, वे पास में रहे तो कितना अच्छा हो। कभी-कभी बहुत मिस करती थी मैं उनको, उनकी बातों को, जैसे आज बहुत कमी महसूस हो रही है मुझे उनकी लेकिन आज वो सामने होने के बाद भी नहीं है। क्या करू मैं? और यहां पर सारे उनके बारे मे बुरा ही बोल रहे है। लग रहा है की जैसे ये जो शख्स मुझे दिखाया जा रहा है उन्हे तो मैं जानती ही नहीं हूं। मैं सबको बता देना चाहती हूं की जो आप सब मुझसे कह रहे हो मेरे पापा के बारे मे, वो सब गलत है। जो हमेशा आपकी ही बातें करते थे। दोस्तो मे रहते थे, वे ये तो नहीं हो सकते। मैं वो सब मुलाकातें लिखना चाहती हूं जो उन्होने मेरे साथ मे बिताई। जिसमे वो एक पापा नहीं होते थे कोई और ही बने होते थे।"

" एक बात पुछना चाहूंगा मैं आपसे, क्या आपके साथ मे बिताया समय आपके पापा के बारे में बताने के लिए पूरा है? क्या आपके पापा के बोलने और आपके साथ बिताये समय में जो वो शख्स थे, वही यहां घर मे आने के बाद मे भी थे?”

"मैंने अपने पापा के बारे में यहां जो सुना उसको सुनकर तो मैं भी हैरान हूं और मन मे सवाल उठ रहे हैं कि क्या यहां पर पापा कुछ और थे? अगर वो यहां ऐसे थे तो मेरे साथ मे क्या थे? पर हम अगर किसी के साथ मे घण्टो बात करते हैं और उसको सुनते है। सालो मे, महिनो या हफ्तो मे ही सही तो उसके बारे मे कुछ तो बना पाते है ना! ऐसा ही मैंने किया है। मैने उनको सुनकर जो अपने लिए कुछ बनाया है वो मेरे लिए ज्यादा मूल्यवान है। जिसमे कम से कम मे किसी के खराब होने, कोसने व किस को कितने दुख दिये को सोचने से दूर तो हूं। सभी किसी ना किसी को कुछ ना कुछ दुख देते ही आये है। शायद, कभी मैंने और आपने भी किसी ना किसी को दुख तो दिया होगा तो क्या सभी हमें उसी से देखने लगे? बाकि सब गायब हो जाता है क्या?”

"आपकी यादों और उनके बोल में नजर आने वाला शख्स कहीं खो तो नहीं गया है? शायद, हो पर दिखाई नहीं दे रहा हो? आपकी यादें और आपके साथ मे एक शख्स की बातचीत उसके कई ऐसे रूप उभारती है जिसको बताने के लिए शायद उस वक़्त मे किसी के पास शब्द ना हो।"

"कोई क्यों नहीं दिखाई देता? अगर देखने के शब्द होते है तो वो फिर यहां पर क्यों नहीं है? मैं दूंगी शब्द वो जिससे उनका कोई तो रूप नज़र आये। मैंने शुरूवात कि है अपनी उन मुलाकातों को लिखने की। मगर, आंसू पीछा नहीं छोड़ रहे। हंसी खिलती है तो आंसू बनकर छलक जाती है। मैं चाहती हूं की आप वो सब पढ़े और देखे जो मैं किसी के बारे मे बता रही हूं वो कौन है और कैसे है? क्योंकि यहां जितने भी लोग है उनके ऑखों पर एक पर्दा है जो उस शख्स को देखने नहीं देगा। आप देखें। मैं कैसे पढ़ा सकती हूं आपको वो सब?”

"मैं जरूर पढ़ूंगा! मैं आपको अपनी मेल आई.डी देता हूं। lakhmi_cm2005@yahoo.co.in आप मुझे इसपर मेल कर सकती हैं। आपने कहा था ना की दुख, दर्द और कोसने से दूर हूं तो आँसूओं को काबू करना होगा। बहुत नजदीक का रिश्ता है तो थोडा मुश्किल होगा मगर, यही चुनौती है जो आप खुद ले सकती हो। मैं अपने एक दोस्त का लेख आपको भेजूंगा जो उन्होने अपने पापा को लिखा है। बहुत गहरा समय है उस लेख मे। आप मुझे अपना आई. डी. भेज दिजियेगा। आपका नाम क्या है?”

"मेरा नाम नेहा है। मैं अपनी आई.डी भेज दूगीं। मुझे प्लीज़ जरूर भेजियेगा। अपने दोस्त का लेख। थेंक्यू सुरेश जी। बहुत अच्छा लगा मुझे आपसे बात करके। विजय को आज दिल से थेंक्यू कहूगीं जो उसने मेरी आपसे बात कराई।"

"मुझे भी बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके। आज पहली बार टेलिफोन पर मैंने किसी के अहसास को सुना है। आप लिखियेगा जरूर। चाहे कितने ही ऑसूं आये मगर, रूकना नहीं। बस, लिखते रहियेगा और हां, मेल करते रहियेगा। ठीक है, फिर से बात होगी। बॉये टेक केयर।"

"बॉये सुरेश जी।"


इस बातचीत में पहली बार मैंने अपने को हकिकत के बहुत नजदीक पाया। ये कोई लेख की बात नहीं हो रही थी। ये कोई खास अहसास था। जिसे खाली बातचीत करके छोड़ा नहीं जा सकता था। कोई क्यों नहीं दिखाई देता?, कोई क्यों गायब है?, कोई बातों मे है मगर रू-ब-रू नहीं है, ऐसा क्यों?

लख्मी

Saturday, September 20, 2008

वो दुनिया बुन रहे हैं

दरवाजे पर टिके रहने के कारण उनकी आँखें खुली रहती थी।

उन्होंने कमरे के अन्दर हमारे घुसते ही आव देखा ना ताव सीधी एक लम्बी सी आवाज मे कहा, "आईये बाबूजी।"
वे हमारे अन्दर आते-आते इसी लाइन को दोहराते रहे। आज फ़िर से उन्होंने हमारी परीक्षा ली जिसमे आज फ़िर से हम कुछ कह नहीं पाये। वे हमे अपनी दुनिया मे खींचे ले गये। उस हल्के से इशारो से यादों के हादसे मे। हर तरह के भाव को उन्होंने अपने उस वक़्त की छवि में बसाया हुआ था जिसका बाहर आना खाली हमारे लिए सुनना मात्र नहीं था। वे ज़िन्दगी के उन ख़ास पलों और भावों से हमे अवगत करा रहे थे जिन्हे वे सुनाकर अपनी यादों मे खो रहे थे। यह हमारे ज़िन्दगी के लिए एक नया मौका था।

उन्होंने अपना हाथ अपने पीछे रखी टेबल के नीचे घुसाया जहां पीले रंग की एक पन्नी रखी थी। उसे बाहर खींचा और पलकों को झुका कर पन्नी हमारी ओर बढ़ा दी। मुस्कुराते हुए हल्के स्वर में कहा, “इसे उठाना ज़रा बाबूजी।"

मन ही मन लगा कि ये क्या है? इसमें क्या होगा? उनके चेहरे पर फैली खुशी को देखकर मेरा हाथ एक दम से उस पन्नी की तरफ़ बढ़ गया। लगा जैसे एक बार फिर से हमारी परीक्षा शुरू हो चुकी है। देखना था कि इसमें है क्या और ये क्यों हमे इसे उठाने को कह रहे है? जरूर कोई ख़ास अहसास था जो ये हमें दिलाना चाहते थे। पिछले काफ़ी दिनों से हम उनके पास जा रहे थे। उन्होंने कई बार हमसे वादा किया था कि वे हमें अपनी कुछ ख़ास चीजों को दिखायेगें। शायद, खाली किसी की सुनकर और अपनी सुनाकर ही ज़िन्दगी को दोहराया नहीं जाता उसकी छुअन से भी उसका अहसास कराया जाता है। हिचकिचाते हुए हमने उस पन्नी को उठाया। ज़्यादा भारी नहीं थी पर चार किलो से कम भी नहीं थी।

उन्होंने हमारे आगे पन्नी को नीचे रखते ही पुछा, “कितना भारी है?”
उनकी तरफ़ देखते हुए मैंने कहा, “लगभग चार-पाँच किलो का तो वज़न होगा।”
हंसते हुए वे बोले, “जानते हैं इसमें क्या है?”

उनकी जब भी यह हंसी निकलती हमे थोड़ी सी खुशी होती और दिल मे थोड़ी घबराहट भी रहती। उनकी हंसी हमेशा हमारे सामने सवाल खड़े करती। उनकी उस पन्नी में जो कुछ था। वह हमारे लिए एक जादू के समान था। हम उसे देखकर चौंकने को बेकरार जरूर थे। बस, हम उस पन्नी के खुलने से पहले उथल-पुथल की दुनिया में थे। यही मथ्था-खोरी करने में लगे थे कि लोग क्या-क्या जमा करते रहते हैं? कुछ जेवर-गहने होंगे, बट्टे भी हो सकते हैं, क्या पता पैन हो, मैडल भी हो सकते हैं और ना जानें कितनी तरह की तस्वीरें हमने अपने मन मे बना ली थी। हलांकि उन तस्वीरों का उनके ऊपर कोई असर नहीं था। वे उस पन्नी की गांठ खोलने में व्यस्त थे और उनके चेहरे से हंसी नहीं छूट रही थी। वे हमें देखकर लगातार मुस्कुरा रहे थे और हम उन्हें लगातार देखते रहे। लेकिन उनकी पूछी बातों पर हम कुछ भी कहने मे असमर्थ थे। जवाब पाने की चाह मे वे हमारी तरफ़ देखकर हंसते रहे। शायद ये अपने सामने वाले को चकित करने के लिये एक दुनिया बुन रहे हैं।

बड़े प्यार से उन्होंने कहा, “इसमें सिक्के हैं।"

सिक्के यानी पैसे। ये सिर्फ़ सिक्के ही नहीं थे। 5 पैसे, 10 पैसे, 20 पैसे, 1 रुपया और 5 रुपये, ये कहते हुए उन्होंने सारे सिक्के हमारे आगे बिछे बिछौने पर डाल दिये। 5 पैसे, 10 पैसे और 20 पैसे के सिक्के तो उन्होंने मुट्ठी मे ही भरकर हमारे सामने डाले। मगर 1 रुपये के सिक्कों को उन्होंने अख़बार मे लपेटा हुआ था। 20-20 सिक्को का एक बंडल बनाकर। उन्होंने पहले तो उन 1 के सिक्कों को यूहीं हमारे सामने रख दिया। पहली बार देखने मे तो लगा ही नहीं कि वे एक रुपये के सिक्के है। अख़बार मे लपेटे हुए वे किसी बंदूक कि गोली या किसी डिब्बी से कम नहीं लग रहे थे। वे बड़े आराम से उस लिपटे हुए अख़बार को खोल रहे थे। बहुत ही प्यार से उनके हाथ हरकत कर रहे थे। धीरे-धीरे उन्होंने उन सभी सिक्कों को अख़बार से खोलकर बाहर वैसे ही रख दिया जैसे वह अख़बार मे तह करके रखे हुए थे। इसी तरह उन्होंने धीरे-धीरे करके पूरे बिछौने पर सिक्के ही सिक्के डाल दिये। सिक्कों को बिछौने पर रखकर वे पन्नी को अपने घुटनों के नीचे दबाकर चुपचाप बैठ गये और हमारे चेहरे को देखने लगे। कम से कम दो ही मिनट तक वे चुपचाप बैठे रहे। उस दो मिनट मे हम उन सिक्कों को अपने हाथों में ले-लेकर देख रहे थे। कभी दोनों मुट्ठियों मे भर कर उठा लेते तो कभी उन्हें उलट-पलट कर देखते। कुछ सोचना तो फ़िलहाल थम ही गया था। उनके कमरे में जलती लाइट फ़र्श पर पड़े उन सिक्कों पर पड़ रही थी। हम उन सिक्कों को उठाकर ये देखने की कोशिश करते की इनमें सबसे बाद का सिक्का कौन सा है? इस समय बस, इतना था कि हमारे सामने सिक्के ही सिक्के थे और हम उनमे खोये हुए थे ।

जब हमने उन सिक्कों को उठाया था तब उसका वज़न 4 से 5 किलो था मगर जैसे इन दो ही मिनट में उनका वज़न बढ़ गया था। वे भी शायद हमारी जुबां से कुछ सुनना चाहते थे पर हमारी आँखों, चेहरों और हरकतों को देखकर सब-कुछ समझ चुके थे। कुछ देर की चुप्पी के बाद वे बोले, “ये एक-एक सिक्का मेरा एक-एक दिन है यूं समझ लीजिये आप।"

उनकी इस बात मे बहुत ठहराव था। कुछ और समय तक सिक्कों की अवाज़ हमारे दर्मियां रही। पैसा जिससे बच्चो को बहलाया जाता है और उसी पैसे को बचत के ज़रिये सम्भाल कर रखा जाता है। लेकिन हमारे आगे जो यह पड़ा था वह क्या था? ये किसी बचत के तहत नहीं था। लगता था जैसे ये पैसा नहीं है कुछ और ही है मगर, मालुम नहीं क्या? क्या ये उनका, पैसा था या कोई समय बिछा पड़ा था। जिन्होंने हमारे आगे वह पन्नी खोल कर रखी थी क्या यह वही शख्स थे जिन्होंने कभी इस पैसे से कोई कल की कल्पना नहीं की थी? कई तरह के सवाल दिमाग मे घूम रहे थे और नज़र सामने पड़े सिक्को पर थी हमारे आगे पड़े सिक्को की गिनती पांच हजार थी। वो हाथों मे इन सिक्को को पकड़र कर बैठे थे मगर अपनी किसी और ही दुनिया के बारे मे हमे सुना रहे थे। जिसकी गूंज मे उनके जन्म सन् 1952 का वर्णन था। वे हमेशा जब भी अपने बीते कल का जिक्र करते तो उसमें अपना वह समय बताते जब वह नौकरी पर पहली बार गए थे। तब वे भारत के प्रधान मंत्री के साथ मे काम करते थे। उस वक़्त बड़े-बडे नाम उनकी बातों मे छलक उठते। यूहीं कहानी सन् 1952 से अक्सर शुरू होकर धीरे-धीरे सन् 1998 तक आती और फिर उस तरफ़ चली जाती जहां से मागों की दुनिया शुरू होती है। जहां पर घर और परिवार के वे काम और रिश्ते होते है जो हमेशा कुछ न कुछ मांगते ही रहते हैं। चाहें बेटा, माँ, बहू, पोते, बीवी और भी कई रिश्ते। मगर इनके बीच में उनका खुद का होना क्या है? बेटों की हरकतें और मांग पूरी हो जाने के बाद में क्या? कोई उम्मीद रखना भी बे-मायने है। आज जो हमारे सामने बिछी थी वो क्या थी? क्या कह सकते थे हम उन शख्स को जिनका कहानियों से रिश्ता था।

आज उन दिनों का दोहराना उसी कहानी को टुकड़ों में भी कर देता। उनकी चुप्पी देखा जाये तो इस समय की ताकत और जान दोनों थीं, जो न बाहर जाने दे रही थी और न ही उस पल में रहने दे रही थी। "मैंने अपने टाइम में जीने लायक चीजें तो बहुत सी की हैं जैसे घूमना, खाना, पीना, सोना और काम करना पर अब आकर लगता है कि इंसान जिस चीज के पीछे सारी उम्र भागता-फिरता रहता है वह मिल जाने के बाद भी उसकी मागें कभी ख़त्म नहीं होती। अपनी तनख्वाह को हम जैसा चाहें खर्च कर सकते हैं, रख सकते हैं। एक का दो करना चाहें वो भी कर सकते है। लेकिन हमारा शरीर भी कुछ मांग करता है। उसे पूरी कैसे करें? हमने की है।"

गर्वीली आँखों से उन्होंने बोला, "मैंने अपनी आखिरी तनख्वाह रखी है। इस काम-धन्धे की दुनिया से मुक़्ति पाने के लिए। उफ़! हमारा शरीर बहुत तरह के कामों से निज़ात चाहता है। आज भी कभी देखता हूं अपनी आखिरी तनख्वाह को तो आँखें भर आती हैं। एकदम से अपना सब कुछ वापस दिमाग मे घूम जाता है। जाने कहां-कहां जाते थे हम। वो सब घूमना और काम पर जाना। तरह-तरह के शख्सों से मिलते थे। अब तो उन दिनों को याद करना जैसे एक आदत सी बन गई है। इन सिक्कों से दिल लगा रहता है कभी निकाल लेता हूँ कभी वापस रख देता हूँ लेकिन अभी तक कहीं खर्च नहीं किया है। मगर थोड़ा डर रहता है कि अगर ये भी बन्द हो गये तो इसकी वैल्यू इस शहर में ख़त्म हो जाएगी। इसलिये मैं अपने दरवाजे पर बैठकर हर रोज़ गली के बच्चो को एक-एक सिक्का बांटता रहता हूँ।"

लख्मी कोहली

Friday, September 19, 2008

जरूरतो की परछाई क्या हैं?

डाकघर दोपहर के 2 बजे थे। डाकघर की खिड़की खुलने से लगभग 5 मीनट पहले। इस समय डाकघर एक दम खाली रहता है। पंखे की हवा से टेबल पर रखे पन्ने फड़फड़ाते रहते है। मैं दरवाजे पर खड़ा इन्तजार कर रहा था वहां पर किसी के आने का। वहीं कोने मे रखी एक बड़ी सी टेबल के नीचे की तरफ़ एक शख्स कुछ फाईलों मे कुछ टटोल रहे थे। साथ के साथ मोहर लगाने की आवाजें भी आ रही थी।

इज़ाज़त मांगता हुआ मैं अन्दर दाखिल हुआ, वे वहां से खड़े हो गये। बड़ी-बड़ी मूंछे, लम्बे-चौड़ै वे देखने मे किसी पुलिस वाले की की कठ-काठी के जैसे ही दिखते हैं। लाल चन्द नाम है इनका, दक्षिण पुरी के एक इकलौते डाकघर के ये सबसे पुराने काम करने वाले हैं। पिछले 5 सालों से ये यहीं पर अपनी पोस्टिंग सम्भाल रहे हैं। लाल चन्द जी यहां दक्षिण पुरी के रहने वाले नहीं है। वे आर.के.पुरम के रहने वाले है। सरकारी क़्वाटरों मे इनका भी एक घर है। जो सरकारी नौकरी से मिला है।

उन्होनें ऊपर उठते ही कहा, “हां, क्या चाहिये?” फाइल को बन्द कर दिया था उन्होनें।

मैंने उनसे बात करने को कहा, “सर क्या मैं आपसे कुछ बात कर सकता हूं? कुछ जरूरी बात है।"

"जरूर कर बेटा, मगर क्या बात करनी है?”

मैंने कहा, “एक सवाल करना था आपसे, मुझे लगा उसे आप सही से समझा पायेगें।"

"क्या सवाल है?” ( वे बोले मेरी तरफ़ देखते हुए)

"आज के टाइम मे लोगों की जरूरतों की जगह कहां है उनके जीवन में?” (मैंने उनसे सवाल किया।)

वे मेरी तरफ़ मे देखते हुए बहुत सोचकर बोले, “यह सवाल करने की क्या जरूरत पड़ गई तुम्हारे को?”
मैंने कहा, “सर मैं जब भी अपने घर या दोस्तों मे कोई बात करता हूं या किसी भी चीज़ को लेकर बात करता हूं तो बात शूरु भले ही कहीं से भी हो पर ख़त्म जरूरत पर होती है। मैं समझना चाहता हूँ इसे। क्या आप समझा सकते हैं?”

"और कितने लोगों से बात कि है तुमने इसके बारे में?” ( वे बोले कुछ समझने के लिए)

"नहीं, मगर ये बात जरूर है की मैं जरूरत के पहाड़ो को बहुत बार सुन चुका हूं घर में, दोस्तों मे, स्कूलों मे मगर कभी ठीक से समझ नहीं पाया। शूरुवात आपसे करना चाहता हूँ क्योंकि मैंने सुना है की यहां पर जरूरतों को सोचते हुए या आने वाले समय को सोचते हुए। कुछ रास्ते लोग खोजते हुए चले आते हैं।"

वे कुर्सी पर बैठते हुए बोले, "मैं क्या बता सकता हूँ तुम्हें बस, यही बता सकता हूं कि मैंने यहां से क्या अनुमान लिया है। उसके आलावा क्या? मुझे देखो कभी पाला नहीं पड़ा था मेरा किसी के भी जीवन की कहानियों से और ना ही कभी मैंने इस काम की लाइन मे किसी के घर के बारे मे जानने की कोशिस भी की है। मगर, फिर भी यहां के बारे मे बहुत कुछ जान चुका हूँ मैं। यहां जरूरतें कभी तो कठिन परिस्थिती है तो कभी बचत के साथ जुड़ी है। अपने 35 साल के अनुभव मे मैंने अनेकों खाते खोले मगर यहां दक्षिण पुरी मे सबसे ज्यादा खाते 60 साल की उम्र वालो के हैं और उसके साथ मे सुनी है मैंने यहां कई कहानियां। यहां तो बहुत किस्से हैं जो जरूरत की मार खाये हैं। कई लोग तो यहां घण्टों बैठे रहे हैं और कईयों ने तो अपना घर का सारा समान लिए रात बिताई है यहां पर। मैं इतने डाकखानो मे रहा या तो मैं वहां नौकरी कर रहा था या फिर यहां कुछ और कर रहा हूँ। आज के समय मे तो जरूरत ही तय करती है सब।"

"जहां आप पहले रहे, वहां पर क्या मालुम होता था जरूरतों को लेकर?” ( मैंने उनसे पुछा)

उन्होनें एक रजिस्टर निकाला और दिखाने लगे। कहने लगे की "ये वे रजिस्टर है जिसमे कई जरूरते जमा है। बताओ अब इसे कैसे देखोगें? लोगों ने अपना 3,3 हजार रूपये तक 8 साल के लिए फिक्स कराया हुआ है जो 8 साल के बाद मे डबल मिलेगा। जानते हो जिसने ये कराया है उसकी उम्र कितनी है? 65 साल और उन्होनें ये अपनी पोती की शादी मे कुछ अपनी तरफ से देने के लिए करवाया है। उनकी पोती 8 साल के बाद मे 20 साल की हो जायेगी और नोमिनेट भी उसी को किया है। मगर, जहां पर मैं पहले था वहां पर तो ऐसा कुछ भी नहीं था। मेरा अनुभव 28 साल की उम्र मे शुरू हुआ। कई तबादलों मे मैं अपनी ज़िन्दगी के 36 साल दिये है। मैं पहले जिन डाकघरों में रहा वहां डाकखाने का मतलब था, वे ख़बर जो जमा रखना जो महज़ सरकारी चिठ्ठियों मे ही आती थी। जैसे, रिज़ल्ट, नौकरी, सम्मन और बील वगैरह। किसी के नाम का ख़त आना या देखना बेहद मुश्किल होता। सन 1970 मे मैं आर.के.पुरम के डाकखाने मे था। वहीं पर मेरा क़्वाटर भी है, उसके बाद मुझे कालका जी भेजा गया, 4 साल के बाद मालविया नगर, उसके 3 साल के बाद ओखला, उसके फोरन 2 साल के बाद ही कोटला मुबारक पुर फिर दोबारा से आर.के.पुरम, उसके 3 साल के बाद नेहरूप्लेस फिर ओखला पार्ट-2, उसके बाद मुझे यहां दक्षिण पुरी मे भेजा गया। वहां जरूरत का मतलब जल्दबाजी और बैचेनी था बस। असल मे वहां किसी को किसी का नाम जानने की भी कोई जरूरत नहीं होती थी और मैं यहा अपनी 5 साल की नौकरी मे लगभग 500 लोगों के नाम जानता हूँ और ना जाने कितने घरों की कहानियों को मैं सुन चुका हूँ।"

"क्या आपने किसी का ख़त पढ़ा या पढ़कर सुनाया है?” मैंने उनसे पुछा।

वे अपने चेहरे पर एक हठ वाला भाव लाते हुए बोले, “हां, बहुत से लोगों का पढ़कर सुनाया है। मेरा तो सबसे पहले काम ही यही था यानि कई साल तक ख़तों को पोस्टऑफिस लाने का काम किया है। तब बहुत सुनाता था।"

"कुछ याद है सर?” मैंने उनसे पुछा।

वे कुछ याद करने की कोशिस मे बोले, “याद तो कुछ नहीं है मगर हां, जिन लोगों को पढ़कर सुनाया उनका हसंना और रोना याद रह जाता था।"

मैंने पुछा, “क्यों सर वही क्यों याद रह जाता था?”

वे बोले, “उन लिखे शब्दों मे जान ही वही फूकतें थे। चाहे उनमे कोई मौत की ख़बर, बिमारी, जरूरत या खुशी कोई सी भी ख़बर लिखी हो मगर बिना पढ़ने या सुनने वाले के वे बेजान ही रहती हैं। उसके साथ जुड़ा हसंना या रोना ही उसमे जान डालता है। तो वही याद रह जाता था।"

मैंने पुछा, “कितने तरह के लोग याद है आपको सर?”

वे हसंकर मेरी तरफ मे देखते हुए बोले, “मुझे तरह तो याद नहीं मगर, यहां आये लोगो के किसी चीज को जानने से उसे अपनाने, करवाने तक जो सवाल करते थे वो और जल्दी रखते थे कि क्या बताये? कोई भी प्लान सुनते तो फौरन करने की कह देते। आई थी एक बुढ़िया, वो खिड़की के सामने ही बैठी थी। मैं उनकी आवाज सुन सकता था मगर, देख नहीं सकता था। वे नीचे बैठे-बैठे खाता खुलवाने की कह रही थी। शायद वे सुनती भी कम थी। मैं उचक-उचक कर देख रहा था। "अम्मा अन्दर चली आ" उन्होनें सुना भी नहीं फिर मैं ही उन्हे बाहर जाकर उठा कर लाया। वो अपनी पैन्सन शूरू करवाने आई थी। महिने के 300 के हिसाब से उन्हे 3 महिने के 900 रुपये मिलने थे। वे अपना खाता खुलवाने आई थी। बस, हाथों मे फोटो और 500 रुपये लेकर वो चली आई थी। जब तक मै उनका फोर्म भरता रहा तब तक वो अपने घर, परिवार और बेटो-बहुओ की बातें बताने लगी। मुझे वो इसलिए याद नहीं है कि वे बुढ़िया अपने घरवालो से छुपकर कुछ करवाने आई थी बल्कि वो पूरा दिन यहीं बैठी रही थी। कॉपी के लिए।
इतना तो पता चला है कि यहां पर कोई किसी भी चीज को आसानी से जाने नहीं देना चाहता। अब बताओ इसमे क्या है? कुछ भी तो नहीं मगर, फिर भी एक दौड़ है जरूरत के रेस मे। बस, मुझे तो इतना पता है कि जरूरत यहां की नीव मे है।"

लख्मी कोहली