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Friday, July 17, 2015
Monday, March 25, 2013
दुनिया गोल है
दुनिया गोल है। ये मैनें आठवी कक्षा में पढ़ा था। तब उतना समझ नहीं आता था। बस, जबाब देना जरूरी होता था कि हां दुनिया गोल है। अब ये सिद्धांत है या प्रेक्टिकल है यह मुझे कतई नहीं पता था। बहुत कुछ आज ख़ुद पर ही जाँच करने पर पता चला है कि जितना सोचने में वक़्त लगता है उससे कहीं ज़्यादा अपने सामने किसी सम्भावना से इच्छा अनुसार जीने में भी लगता है।
सब गोल है। इंसान जहां से चलता है एक न एक दिन उसी धरातल पर आ गिरता है। वो जब अपनी यादों को झिजोरना आरम्भ करता है तो उसे अतीत की मौज़ूदगी नजर आती है की वो तब कहां था या क्या था? और फिर वो
वर्तमान को समझता है तो उसे सब पहले जैसा ही मालूम होता है। पर ऐसा क्यो है?
इंसान समय के कई पहलूओ में फंस कर जिता है। समय छलिया है। जो तरह - तरह की लीलाएँ रचता और करता है। जिसके प्रभाव से इंसान कभी लाचार हो जाता है तो कभी उसे आसमान भी कम पड़ जाता है। कभी वो खुशी महसूस करता है और कभी दुख।
ज़िन्दगी कभी मौत से जीत जाती है तो कभी मौत ज़िन्दगी से। कई रिती-रिवाजों में संकृतियों में समाज एक सामूहिक रूप से अपने स्नेह और भावनात्मकता को लेकर इंसान को स्वतंत्रत और परिस्थितियाँ पुर्ण जीवन जीने का आधिकार देता है।
जो इंसान के अपने हाथों जीना होता है। वो ख़ुद से अपने जीवन को जी सकता है। मगर उसे समाज के साथ चलना ही पड़ता है। क्यों?
समाज कारवां के जैसा है। जिसकी भीड़ से होकर अगर कोई निकल गया या पीछे छूट गया तो समाज उसे भूल जायेगा और समाज से ही बने सारे रिश्ते-नाते भी वह शख़्स को विसरा (भूला) देंगे। फिर चाहें वो अपने जीवन के किसी भी आधार को क्यों न घसीटता फिरे। अगर वापस समाज को पाना है तो समाज की शर्तो और उसकी न्यूनतमता में अपने को बनाना होगा और अगर समाज का दामन थामे चलोगे तो अवश्य ही जीवन का उद्दार हो जायेगा। क्यों सरकार जो मार्गदर्शन देगी उसी में जीवन के सारे काम ज़िम्मेंदारी और नैतिक स्वार्थ भी पुरा होगा?
राकेश
Friday, August 20, 2010
अपनी दुनिया
कभी-कभी सब अजीब सा लगता खुशी और ग़म साथ चलने वाले दो साएँ की तरह होते हैं। जो न हाथ में आते हैं और न ही हमें छोड़ते हैं। हालातों के टकरावों में सोया हुए तूफान को छेड़ देते हैं। जिसके कारण दर्द असानिये हो जाता है। दर्द का पता भी तब चलता है। जब झुँझलाकर अपनी वास्तविक इच्छाओं को मार दें।
ये कैसी मौत हैं? जिसमें आँखों से पट्टी बांधकर किसी ज्वालामूखी में उतरने की कोशीश कि जा रही है। चारों तरफ भागकर और सब के बीच रहकर भी कोई अकेला नहीं होता। क्या चाहिये, कहाँ जाना है? हम इस सवाल को भूलकर अपनी दूनिया में मस्त होकर जीवन को जीते जाते हैं। वो जीवन जो नित-नये रूपों में दिखाता है। वो जो किसी आँख के दोष या छलावे पर निर्भर करता है।
नीला दूपट्टा, सूखमय अहसास, आराम की नींद, हासिल करना। उसे पाना जो खोया है। ये किस तरह का जीवन है? क्या सब किसी छल का चक्कर हैं? समाज में जीवन का नियम है उस से कोई बचा है या किसी ने इस समाज में आने के लिये अपने नियम बनाये हैं। अगर वो निजी है तो वो समाज में कैसे खुद को जमा सकते हैं। समाज तो बना ही विभिन्न नियम और आजादियों को लेकर। जो सब के लिये कुशल हो लाभप्रद हो। उस समाज के नियमों का गठन ही तो एक मात्र जीवन का घेरा है जिसमें खुद को किसी पर किसी मे जाहिर करने की प्रक्रिया जारी रहती है। जहाँ से हम अपने स्वप्न दर्शनों को किसी के ऊपर उडेल देते हैं। वो अपना हो जाता है या हम उसके हो जाते हैं। यही जिन्दगी का मेल है।
राकेश
ये कैसी मौत हैं? जिसमें आँखों से पट्टी बांधकर किसी ज्वालामूखी में उतरने की कोशीश कि जा रही है। चारों तरफ भागकर और सब के बीच रहकर भी कोई अकेला नहीं होता। क्या चाहिये, कहाँ जाना है? हम इस सवाल को भूलकर अपनी दूनिया में मस्त होकर जीवन को जीते जाते हैं। वो जीवन जो नित-नये रूपों में दिखाता है। वो जो किसी आँख के दोष या छलावे पर निर्भर करता है।
नीला दूपट्टा, सूखमय अहसास, आराम की नींद, हासिल करना। उसे पाना जो खोया है। ये किस तरह का जीवन है? क्या सब किसी छल का चक्कर हैं? समाज में जीवन का नियम है उस से कोई बचा है या किसी ने इस समाज में आने के लिये अपने नियम बनाये हैं। अगर वो निजी है तो वो समाज में कैसे खुद को जमा सकते हैं। समाज तो बना ही विभिन्न नियम और आजादियों को लेकर। जो सब के लिये कुशल हो लाभप्रद हो। उस समाज के नियमों का गठन ही तो एक मात्र जीवन का घेरा है जिसमें खुद को किसी पर किसी मे जाहिर करने की प्रक्रिया जारी रहती है। जहाँ से हम अपने स्वप्न दर्शनों को किसी के ऊपर उडेल देते हैं। वो अपना हो जाता है या हम उसके हो जाते हैं। यही जिन्दगी का मेल है।
राकेश
Tuesday, February 2, 2010
पिंजरा पंछी के उड़ जाने से बेजान सा रह जाता है ।
जमीन पर रखा तसला शोहले उगल रहा था। कनातों के बीच चारपाईयों पर इखट्टा लोग रात की बेहोसी को तोड़ कर अपनी उपस्थिति का संकेत दे रहे थे।
मन मै पैदा होने वाली चेतनाएं काफिर रात मे बेहोशी के आलम को ,होठो की खामोशी से बनी अंतहीन समय की दिवारों से अपना सिर टकरा-टकरा कर कुछ बयां कर रही थी।
जलती हुंई लकडी की आग पर हाथ सेंकते चारो तरफ बैठे लोगो का मन विलाप और शोक् से थक चूका था।
अब तीन दिन बितने के बाद हर चेहरे पर मूस्कुराहट ने जन्म लिया था। ये प्रारंभिक आशाये फिर से रिश्तो के बिच अपना आंशिया बना रही थी।
तीन दिन बाद हसीं आने के बाद लगा जैसे कई सदियो से हसंंना ही भूल गये हो। मगर शंकर बाबा ,गम मे चूर और विलाप से भरे मनो की व्याकुलता को दूर करने के लिये किस्सो की झडीयाँ लगा रहे थे।
वो मस्तमलंगा की तरह सब को सवांग सूनाते और उनके चेहरों की खामोशी को तोड़ने की कोशीश करते।
शंकर बाबा की बाते समझ मे नही आती ,बैठे-बैठे नाचते तो,कभी हाथ और सिर हिला कर मस्करी भी करते । उनकी हसी की आवाज गली के सन्नाटे को चेता देती ।
लेकिन सूबहा अभी बहुत दूर थी और मन के पार जाने वाली यादें झिजोड रही थी। घटनाएंं समय की कालगुजारीयो की गवाह होती है। ये आस-पास ही होती है अद्विश्यता मे छिपी हुँई।
शंकर बाबा ज्यो-ज्यो किसी की नकल उतार कर हंसते ,तो उनके पास बैठे बच्चे आदमी और ओरतें उनकी श्रोता बन कर जुमलो पर जोर से हंसती। जब हंस,हंस के दम फूलने लग जाता तो कहती "अरे बाबा पागल है "बार-बार इस कथन वो दोहराते भी और हंसते भी रहतें।
फिर से शंकर बाबा कोई कविता ,छंद या दोहा तो कभी चूटकुला सूनाते। वो जानबूझकर ऐसा कर रहे थे । क्यो के तीन दिन से जैसे उनका परीवार किसी चूप्पी मे जा बसा हो ।
मानसिकता शून्याता के शिखर पर थी ।
समय ने डर और संकोच से बनी अवधारणाओ को जिन्दगी मे न्यौता दिया था।
आज की सूबहा कोई नई सूबह नही थी मगर कुछ यूं हुआ की, ये सूबह आज शत्रूता के भेष मे सामने खडी थी। जिस का प्रतिद्वंद्वी बार-बार हलातो की बयानबांजी से टूट कर निहत्था हो गया था।
बडी तेजी से उसकी ओर बडती आक्रमकता सवालो का तूफान लेकर बड़ रही थी। कोई ओर चारा नही था ,सिवाये इस तूफान के सामने खडे होने के ।
विचारो की गुथ्थी को मन सुल्झाने की तमाम नकाम कोशीशे कर चूका था।
कई सवालों के जबाब पाने के लिये उसका मन जहा-तहा भटकने लगा। जिस खबर ने कानो में जाते ही मार डाला था । जैसे पिंजरा पंछी के उड़ जाने से बेजान सा रह जाता है । उसी तरह खामोशी के चन्द पलों ने आत्मा पर सैकडों जख्म बना दिये थे।
जब सूना की वो खत्म हो गया । यानी हमारे साथ किसी का होना अब रेत पर बनी छवि की तरह हवा के झोकों से मिट गया।
जिन्दगी की सूंची मे से एक ओर नाम कट गया।
वो मौत ममता की गोद से भी गहरी थी क्या ? वो मौत पिता के सपनों से भी उँची थी क्या ? वो मौत अपनो की चाहत से भी बडकर थी क्या ?
जो एक ही झटके मे ही हवा के झोके से आशाओ का लक्षयभेद गई। क्षणभर मे ही जिन्दगी ने मौन रूप धारण कर लिया।
राकेश..
मन मै पैदा होने वाली चेतनाएं काफिर रात मे बेहोशी के आलम को ,होठो की खामोशी से बनी अंतहीन समय की दिवारों से अपना सिर टकरा-टकरा कर कुछ बयां कर रही थी।
जलती हुंई लकडी की आग पर हाथ सेंकते चारो तरफ बैठे लोगो का मन विलाप और शोक् से थक चूका था।
अब तीन दिन बितने के बाद हर चेहरे पर मूस्कुराहट ने जन्म लिया था। ये प्रारंभिक आशाये फिर से रिश्तो के बिच अपना आंशिया बना रही थी।
तीन दिन बाद हसीं आने के बाद लगा जैसे कई सदियो से हसंंना ही भूल गये हो। मगर शंकर बाबा ,गम मे चूर और विलाप से भरे मनो की व्याकुलता को दूर करने के लिये किस्सो की झडीयाँ लगा रहे थे।
वो मस्तमलंगा की तरह सब को सवांग सूनाते और उनके चेहरों की खामोशी को तोड़ने की कोशीश करते।
शंकर बाबा की बाते समझ मे नही आती ,बैठे-बैठे नाचते तो,कभी हाथ और सिर हिला कर मस्करी भी करते । उनकी हसी की आवाज गली के सन्नाटे को चेता देती ।
लेकिन सूबहा अभी बहुत दूर थी और मन के पार जाने वाली यादें झिजोड रही थी। घटनाएंं समय की कालगुजारीयो की गवाह होती है। ये आस-पास ही होती है अद्विश्यता मे छिपी हुँई।
शंकर बाबा ज्यो-ज्यो किसी की नकल उतार कर हंसते ,तो उनके पास बैठे बच्चे आदमी और ओरतें उनकी श्रोता बन कर जुमलो पर जोर से हंसती। जब हंस,हंस के दम फूलने लग जाता तो कहती "अरे बाबा पागल है "बार-बार इस कथन वो दोहराते भी और हंसते भी रहतें।
फिर से शंकर बाबा कोई कविता ,छंद या दोहा तो कभी चूटकुला सूनाते। वो जानबूझकर ऐसा कर रहे थे । क्यो के तीन दिन से जैसे उनका परीवार किसी चूप्पी मे जा बसा हो ।
मानसिकता शून्याता के शिखर पर थी ।
समय ने डर और संकोच से बनी अवधारणाओ को जिन्दगी मे न्यौता दिया था।
आज की सूबहा कोई नई सूबह नही थी मगर कुछ यूं हुआ की, ये सूबह आज शत्रूता के भेष मे सामने खडी थी। जिस का प्रतिद्वंद्वी बार-बार हलातो की बयानबांजी से टूट कर निहत्था हो गया था।
बडी तेजी से उसकी ओर बडती आक्रमकता सवालो का तूफान लेकर बड़ रही थी। कोई ओर चारा नही था ,सिवाये इस तूफान के सामने खडे होने के ।
विचारो की गुथ्थी को मन सुल्झाने की तमाम नकाम कोशीशे कर चूका था।
कई सवालों के जबाब पाने के लिये उसका मन जहा-तहा भटकने लगा। जिस खबर ने कानो में जाते ही मार डाला था । जैसे पिंजरा पंछी के उड़ जाने से बेजान सा रह जाता है । उसी तरह खामोशी के चन्द पलों ने आत्मा पर सैकडों जख्म बना दिये थे।
जब सूना की वो खत्म हो गया । यानी हमारे साथ किसी का होना अब रेत पर बनी छवि की तरह हवा के झोकों से मिट गया।
जिन्दगी की सूंची मे से एक ओर नाम कट गया।
वो मौत ममता की गोद से भी गहरी थी क्या ? वो मौत पिता के सपनों से भी उँची थी क्या ? वो मौत अपनो की चाहत से भी बडकर थी क्या ?
जो एक ही झटके मे ही हवा के झोके से आशाओ का लक्षयभेद गई। क्षणभर मे ही जिन्दगी ने मौन रूप धारण कर लिया।
राकेश..
Thursday, February 26, 2009
सर्वहारा रातें- किताब
सर्वहारा रातें- किताब
हम अभिनंदन करते हैं ज़ाक राँसिएर का कि वो हमारे बीच आए। उनकी किताब "सर्वहारा रातें" जो अभी प्रकासित हुई है जिसका हिन्दी भाषा में अनूवाद हुआ है। उन्होनें हमारे साथ अपनी किताब "सर्वहारा रातें" को लेकर अपना अनुभव बाँटा। उनसे हुई बातचीत में हमे बौद्धिक ज़िन्दगी के एक दौर की रचनाओं और गुज़रे कल के पहलूओं से मुख़ातिव होना है। उनके और हमारे बीच एक मुलाकात हुई जिसमें इतिहास को नया ढ़ंग से जीना और अपनी रचनाओं को लेकर खुद की क्षमता से अपने आसपास को सींचना था। जो उनसे बातचीत में उभरा जिसमें नया जीवन या अपना जीवन तय करके जीने की आज़ादी है उसे कैसे सोचें?
शरीर और हक़ीकत के बीच जब अपनी रचना को महसूस करते हैं तो उस के बिताए गए क्षणों को एक जगह एकत्रित करके या जमा करके देखें तो प्रतिदिन का एक आकार नज़र आता है। अपने मनमुताबिक सोची गई रचनाओं के समाज की धारणाओं से टकराना होता है लगातार वे दिखता है। समाज के नियम और कानून से बने निर्देशों के तारों में फँसने के बाद भी व्यक़्ति अपने संम्पर्क के नये तार जोड़ता है।
इसी ख़ास तरह में आने वाले शख़्सों के बारे में आपको रू-ब-रू करवा रहा हूँ। जो इतिहास मे जीते 'अतीत' की कई परछाइयों को ज़हन में एकदम से उभारने वाला ख़्याल देते हैं। वो जीवन जो किसी हवा-पानी, समाज, धर्म, रहन-सहन या रिती-रिवाजों से बंधित नहीं है। उस जीने और हर पल बनने की प्रक्रिया को हम दुनिया के किसी भी कोने में देख सकते हैं, सुन सकते हैं। हर शख़्स में अपनी रचना करके और ख़्याली दुनिया बनाकर जीने की गुंजाइश होती है। वो चाहें अपना देश हो या विदेश इंसान कहीं भी हो उसका वज़ूद उसे पल-पल के समावेशों में धकेलता रहता है
जिसमें जीने की साँस लेती क्रियाएँ होती हैं। जो अपने एकान्त को किसी दुनिया में जोड़ देती है और तब अपने अहसासों को खुद से समझने और सोचने कि जिज्ञासा जागती है।
हमारी जगहों में, ज़िन्दगी में, माहौलों में वो सम्भावनाएँ हैं जो एक-दूसरे के बीच के रिश्ते को रचनात्मक ढ़ंग से जीया जाने को कहती है। जो गुज़रे कल को भी आज के दौर से वापस मिलाती है और अपने साथ लेकर चलती है।
19वीं सदी के फ्रांसिसी ताला-मिस्त्रियों, दर्ज़ियों, मोचियों कम्पोज़िटरों के जीवन-संघर्ष, सपनों और बौद्धिकता की दिलचस्प और विचारोत्तेजक कहानी कहने वाली किताब जब 1970 में पहली बार प्रकासित होते ही सर्वहारा वर्ग के इतिहास और विचारधारा की स्थापित समझ के लिए चुनौती बन गए। इस पुस्तक की अहमियत पर समय, स्थान और भाषा के फ़ासलों का कोई असर नहीं पड़ा है। ग़ैर जिंसी उत्पादन सूचना क्रान्ति और ग्लोबल बाज़ार के मौज़ूद ज़माने में भी फ़ांसिसी दार्शनिक ज़ाक राँसिएर की यह रचना प्रासंगिक बनी हुई है।
इसके पन्नों पर श्रमिक जीवन और अनुभव के जिन रूपों को पेश किया गया है वह भारत के संघर्षरत मज़दूरों के ज्य़ादा नज़दीक लगते हैं। जो अपने रोज़मर्रा के संस्मरणों को अपने सपनों में लेकर जीते और वक़्त की कालगुज़ारियों में कविता या कहानियों को गढ़ते। ज़हन में आने वाले ख़्यालों के रचनात्मक ढ़ंग को बनाकर सतह दर सतह जमा करते जातें। किताब ये दावा मोटे पैमाने पर करती है की जो किताब की रचनाओं में उभरता जीवन है वो हर एक शख़्स में मौज़ूद है, बसा हुआ है।
बस, जरूरत है तो खुद में तलाशने की। इतिहास दोहराने का ही नहीं रह गया बल्कि उसे वापस पुर्णस्थापित करके हम जीवन को आलोकिक बना सकते हैं। आज वही सब कुछ घट रहा है जिससे मिलते-जुलते हालात का सामना उन दस्तकार-मज़दूरों ने किया था जिनका ज़िक्र इस किताब में किया है।
उस समय 19वीं सदी का जो समाजिक माहौल रहा जो सामाजिक संर्धभ (ढ़ाचा) रहा वो क्या था और उसमें जीने की क्या-क्या सम्भावनाएँ रही। उस समय फ्रांसिसी मजदूरों में मोचियों, दर्ज़ियों, ताला-मिस्त्रियों कम्पोज़िटरों के यानी उस स्तर के हुनरबाजों की दुनिया रात के अंधेरों को अपने लफ़्जों, ख़्यालगोइयों, कविता और कहानियों से रोशन हो जाती।
उन रातों में जो रंग होता उसे वो अपने अन्दर लेकर जीतें। तब ये लोग अपने से टकराई गई स्थितियों और उनकी रचनात्मकता को चिट्ठियों मे उतार देते। उन चिठ्ठियों की में लिखी गई रचनाएँ समय की ख़ुर्दरी परतों को अपने कोमल और करूणा भरे अहसासों से भर देती।
जिसमें अपने शरीर के टकराव, माहौल, सम्भावनाएँ होती। जिनसे कविताएँ, कहानियाँ, किस्सा, सवाल, बहस अपना मज़ा और फलसफाएँ होते। जिसमें एक दुनिया देखती थी। जो काम के बारे में नहीं थी। किसी कानून या नियम को लेकर लड़ाई नहीं थी। न ही कोई समाजिक मुद्दा जिसके खिलाफ़ नारे या आदोलन हो। बल्कि वो दुनिया होती जिसमें वे अपनी सम्मपन्यता में जीने की इच्छा रखते। अलग-अलग कल्पना लेकर जीते हैं। जैसे वो लोग दिन के ऊजालों को छोड़कर अंधेरों में भी अपने मन की ज़्योती से अपना दायरा देखते।
उनकी अपनी बौद्धिक ज़िन्दगी का समाज उन्हे वो जगह नहीं देता था जो वो चाहते थे। क्योंकि समाज हमे जो पहचान या रूतबा बनाकर देता है हमे उसी में जीना होता है। यानी एक न्यूनतम दायरे में। इस तरह समाज हमारा कई विभाजनों में गठन कर देता है और इस गठन के तहत ही हम जीने को मजबूर हो जाते हैं। सब के साथ न चाहकर भी हमे रिश्तों- नातों, सिमाओ में सहमती में जीने की आदत डालनी पड़ती है। हम इससे कोई विद्रोह नहीं कर सकते न ही उन्होनें किया था।
किताब हमें जिस ज़मीन पर लाकर रखती है उसमें अपने जीवन को नया ढ़ंग से जीने और मानसिकता के संतुलन मिलते हैं जिसमें प्रकृति भी हमें वो जीवन के बीज़ देती है जीन से ज़िन्दगी के कुछ और बगीचें तैयार किये जा सकते हैं।
बिना किसी काम, संघर्ष या विद्रोह की भाषा बनायें हम जीवन को जी सकते हैं जैसे उन्होनें भी जीया। एक नया ज़ुबान जो वो लोगों के मुँह पे डाल गए। अपने पास आती चीज़ों को असहमति मे जीया जो जगह या अपने नैतिक अधिकार की चिन्ता किए बगैर उनसे असहमत होकर जीवन में कल्पना करके जीना चाहा। उस अदा में वो लोग रहते थे।
हमारी बातचीत जब ज़ाक राँसिएर से इस किताब में कि गई रचनाओं और मजदूर वर्ग को लेकर हो रही थी।उनका कहना था की मैने सोचा की 19वीं सदी को कैसे देखे जो आक्राईव है। देखना की उसमें क्या मिलेगा? जब वे आक्राईव मे गए तो मिला की उसमें लिखी चिठ्ठियों में कविताएँ, फलसफाएँ, सवाल, बहस, मज़ा है। जो किसी काम के बारे में नहीं है और इंसान के जीने की कसौटी पर वो आवाज़ है "हम हैं" की लड़ाई थी। तर्ज़ुबे और अपने विश्वास को साथ लेकर चलना जो उन लोगों ने अपने दम पर किया। बिना समाज के प्रोत्साहन के अपने अकेलेपन को रचनात्मक रूप से सोचा और उड़ान भरी कल्पनाएँ दी।
ये अनूभव हमने भी किया की जब हमारे बीच ये आया की हम अपने रचना खुद करते हैं। अपने लिए अपना शरीर खुद बनाते हैं जिसमें समाकर हम बौद्धिक जीवन की आशाओं को सींचते हैं। समाज हमारे शरीर को बहुविभाजनों रख देता है। इसलिये अपना दायरा देखना और समझना कठिन हो जाता है।
हमारे विचार बातचीत के माहौल को अलग-अलग दिशाओं के फाटक खुल रहे थे। जो किताब की रचना को सोचकर समझकर हमारे साथी अपने आसपास फलने वाले लोगों की दिनचर्या को लेकर किसी के अकेलेपन या एकांत में जीने वालो की दुनिया के बारे में अपना गहरा शौध रख रहे थे जिसमें देखने के फ्रेम नज़र आ रहे थे। हमारी बातचीत में कुछ बिन्दू उभरे।
हमारे साथी शमशेर अली ने कहा, "कोई है जो शरीर पाने या बनाने के लिए जद्दोजहद करता है पर दिखता नहीं है।लेकिन उस का होने का अंदेशा लगता है। वो क्या है उसे कैसे सोच सकते हैं। मेरे लिए शरीर क्या मायने हैं और वो कैसे मेरे जीवन में मायने रखता है?
राँसिएर ने कहा, "शरीर में जो आया या शरीर से जो टकराया वो बार-बार होता रहा उस रचना में एक प्रेक्टिस को रखना था। जो उन लोगों का प्रेक्टिस था। "मैं" को कैसे जगह में जीते है? "मैं" कैसे रहूँगा किसी जगह में, किसी का अपने होने की आवाज़ को रखना।"
समाज विभाज को पैदा कैसे करता है? इससे टकराकर शरीर का जीवन, अपनी कल्पनाओ को जीना। उद्देश्य, काम समाज में किसी अधिकार के संर्घष से प्रभावित न होकर एक जंग से असहमति की ज़ुबान बना कर जीना। "सर्वहारा रातों" में जो जीवन है उससे अपनी पहचान की एक अलग ही तस्वीर दिखती है। नज़रिये जो कई कल्पनाएँ हमे सर्मपित करते हैं।
स्टूडियों मे हुई बातचीत में लख्मी ने कहा, "वो जो मुझे चाहिए वो शरीर मेरे सामने हैं पर मैं अपने अन्दर उसे कैसे सोचूँ जिससे मैं अपने से दूसरों के बीच की दूरी को समझ सकूँ। जो मेरे ख़्यालों मे एक दुनिया का गठन करता है। जो मेरे सामने है उससे जो दूरी है वो हमारे बीच क्या रिश्ता बनाती है? हमारे स्टूडियों में एक साथी जिनका नाम महेश है। महेश जी हमे महीने में दो-तीन बार आकर अपनी कि गई रचनाएँ सूना जाते हैं। वो अपने घर, परिवार काम के बीच से जो जगह निकालते हैं उसी में ही हमारे लिए जगह बन जाती। वो शख़्स अपने साथ कौन सा शरीर लेकर आता है जिसके बारे में उनके जैसा ही कोई उस शरीर से रिश्ता समझा पाता है।
मैं कहता हूँ एक शरीर है जो समाज मे मिलता नहीं जिससे हटकर मुझे अपना शरीर बनाना है जो मेरी सम्मपन्यता हो। मैं इस जीवन की सम्मपन्यता से संतूष्ट नहीं हूँ तो मेरे शरीर की क्या, कैसी, कौनसी आज़ादी होगी? जिस समय मे मैं अपनी कल्पना करने लगता हूँ उससे एक आकार उभरता है मेरा आज़ादी उसी शरीर में है। उसी में मैं उड़ान भरता हूँ। बौद्धीक ज़िन्दगी सब जगह है मगर इस में जो खुद से बने ढ़ाँचे हैं। वो ही नया शब्द की नया ज़ुबान नया दायरों की समझ देते हैं। मजदूरों के हमने जो ठिकाने देखे हैं। वो घर काम सामजिक, संर्धभ के ढ़ाँचे के अलावा कुछ नहीं देखा पाते पर इस के बीच में वो दुनिया है जिसमें अपने शरीर को नये सिरे से ऊर्जा प्रात होती है। बौद्धिक ज़िन्दगी लिखना कला ही नहीं है। आप कुछ सोच रहे हैं या आपके पास कुछ हैं जो आप खुद की सच्चाई को लेकर आज़ादी है।
जिसमें अपने आप को बनाने का प्रक्रिया है जो अपने पास ही होता है। जो आपको अच्छा लगता है सूझता है वो ही लिखने की प्रक्रिया है। जीने की आज़ादी है। आप के पास अस्पष्ट कुछ है जो आप किसी दूसरे के पास ले जाते हो। ले जाने की प्रक्रिया ही यात्रा कहलाती हैं।
राकेश
हम अभिनंदन करते हैं ज़ाक राँसिएर का कि वो हमारे बीच आए। उनकी किताब "सर्वहारा रातें" जो अभी प्रकासित हुई है जिसका हिन्दी भाषा में अनूवाद हुआ है। उन्होनें हमारे साथ अपनी किताब "सर्वहारा रातें" को लेकर अपना अनुभव बाँटा। उनसे हुई बातचीत में हमे बौद्धिक ज़िन्दगी के एक दौर की रचनाओं और गुज़रे कल के पहलूओं से मुख़ातिव होना है। उनके और हमारे बीच एक मुलाकात हुई जिसमें इतिहास को नया ढ़ंग से जीना और अपनी रचनाओं को लेकर खुद की क्षमता से अपने आसपास को सींचना था। जो उनसे बातचीत में उभरा जिसमें नया जीवन या अपना जीवन तय करके जीने की आज़ादी है उसे कैसे सोचें?
शरीर और हक़ीकत के बीच जब अपनी रचना को महसूस करते हैं तो उस के बिताए गए क्षणों को एक जगह एकत्रित करके या जमा करके देखें तो प्रतिदिन का एक आकार नज़र आता है। अपने मनमुताबिक सोची गई रचनाओं के समाज की धारणाओं से टकराना होता है लगातार वे दिखता है। समाज के नियम और कानून से बने निर्देशों के तारों में फँसने के बाद भी व्यक़्ति अपने संम्पर्क के नये तार जोड़ता है।
इसी ख़ास तरह में आने वाले शख़्सों के बारे में आपको रू-ब-रू करवा रहा हूँ। जो इतिहास मे जीते 'अतीत' की कई परछाइयों को ज़हन में एकदम से उभारने वाला ख़्याल देते हैं। वो जीवन जो किसी हवा-पानी, समाज, धर्म, रहन-सहन या रिती-रिवाजों से बंधित नहीं है। उस जीने और हर पल बनने की प्रक्रिया को हम दुनिया के किसी भी कोने में देख सकते हैं, सुन सकते हैं। हर शख़्स में अपनी रचना करके और ख़्याली दुनिया बनाकर जीने की गुंजाइश होती है। वो चाहें अपना देश हो या विदेश इंसान कहीं भी हो उसका वज़ूद उसे पल-पल के समावेशों में धकेलता रहता है
जिसमें जीने की साँस लेती क्रियाएँ होती हैं। जो अपने एकान्त को किसी दुनिया में जोड़ देती है और तब अपने अहसासों को खुद से समझने और सोचने कि जिज्ञासा जागती है।
हमारी जगहों में, ज़िन्दगी में, माहौलों में वो सम्भावनाएँ हैं जो एक-दूसरे के बीच के रिश्ते को रचनात्मक ढ़ंग से जीया जाने को कहती है। जो गुज़रे कल को भी आज के दौर से वापस मिलाती है और अपने साथ लेकर चलती है।
19वीं सदी के फ्रांसिसी ताला-मिस्त्रियों, दर्ज़ियों, मोचियों कम्पोज़िटरों के जीवन-संघर्ष, सपनों और बौद्धिकता की दिलचस्प और विचारोत्तेजक कहानी कहने वाली किताब जब 1970 में पहली बार प्रकासित होते ही सर्वहारा वर्ग के इतिहास और विचारधारा की स्थापित समझ के लिए चुनौती बन गए। इस पुस्तक की अहमियत पर समय, स्थान और भाषा के फ़ासलों का कोई असर नहीं पड़ा है। ग़ैर जिंसी उत्पादन सूचना क्रान्ति और ग्लोबल बाज़ार के मौज़ूद ज़माने में भी फ़ांसिसी दार्शनिक ज़ाक राँसिएर की यह रचना प्रासंगिक बनी हुई है।
इसके पन्नों पर श्रमिक जीवन और अनुभव के जिन रूपों को पेश किया गया है वह भारत के संघर्षरत मज़दूरों के ज्य़ादा नज़दीक लगते हैं। जो अपने रोज़मर्रा के संस्मरणों को अपने सपनों में लेकर जीते और वक़्त की कालगुज़ारियों में कविता या कहानियों को गढ़ते। ज़हन में आने वाले ख़्यालों के रचनात्मक ढ़ंग को बनाकर सतह दर सतह जमा करते जातें। किताब ये दावा मोटे पैमाने पर करती है की जो किताब की रचनाओं में उभरता जीवन है वो हर एक शख़्स में मौज़ूद है, बसा हुआ है।
बस, जरूरत है तो खुद में तलाशने की। इतिहास दोहराने का ही नहीं रह गया बल्कि उसे वापस पुर्णस्थापित करके हम जीवन को आलोकिक बना सकते हैं। आज वही सब कुछ घट रहा है जिससे मिलते-जुलते हालात का सामना उन दस्तकार-मज़दूरों ने किया था जिनका ज़िक्र इस किताब में किया है।
उस समय 19वीं सदी का जो समाजिक माहौल रहा जो सामाजिक संर्धभ (ढ़ाचा) रहा वो क्या था और उसमें जीने की क्या-क्या सम्भावनाएँ रही। उस समय फ्रांसिसी मजदूरों में मोचियों, दर्ज़ियों, ताला-मिस्त्रियों कम्पोज़िटरों के यानी उस स्तर के हुनरबाजों की दुनिया रात के अंधेरों को अपने लफ़्जों, ख़्यालगोइयों, कविता और कहानियों से रोशन हो जाती।
उन रातों में जो रंग होता उसे वो अपने अन्दर लेकर जीतें। तब ये लोग अपने से टकराई गई स्थितियों और उनकी रचनात्मकता को चिट्ठियों मे उतार देते। उन चिठ्ठियों की में लिखी गई रचनाएँ समय की ख़ुर्दरी परतों को अपने कोमल और करूणा भरे अहसासों से भर देती।
जिसमें अपने शरीर के टकराव, माहौल, सम्भावनाएँ होती। जिनसे कविताएँ, कहानियाँ, किस्सा, सवाल, बहस अपना मज़ा और फलसफाएँ होते। जिसमें एक दुनिया देखती थी। जो काम के बारे में नहीं थी। किसी कानून या नियम को लेकर लड़ाई नहीं थी। न ही कोई समाजिक मुद्दा जिसके खिलाफ़ नारे या आदोलन हो। बल्कि वो दुनिया होती जिसमें वे अपनी सम्मपन्यता में जीने की इच्छा रखते। अलग-अलग कल्पना लेकर जीते हैं। जैसे वो लोग दिन के ऊजालों को छोड़कर अंधेरों में भी अपने मन की ज़्योती से अपना दायरा देखते।
उनकी अपनी बौद्धिक ज़िन्दगी का समाज उन्हे वो जगह नहीं देता था जो वो चाहते थे। क्योंकि समाज हमे जो पहचान या रूतबा बनाकर देता है हमे उसी में जीना होता है। यानी एक न्यूनतम दायरे में। इस तरह समाज हमारा कई विभाजनों में गठन कर देता है और इस गठन के तहत ही हम जीने को मजबूर हो जाते हैं। सब के साथ न चाहकर भी हमे रिश्तों- नातों, सिमाओ में सहमती में जीने की आदत डालनी पड़ती है। हम इससे कोई विद्रोह नहीं कर सकते न ही उन्होनें किया था।
किताब हमें जिस ज़मीन पर लाकर रखती है उसमें अपने जीवन को नया ढ़ंग से जीने और मानसिकता के संतुलन मिलते हैं जिसमें प्रकृति भी हमें वो जीवन के बीज़ देती है जीन से ज़िन्दगी के कुछ और बगीचें तैयार किये जा सकते हैं।
बिना किसी काम, संघर्ष या विद्रोह की भाषा बनायें हम जीवन को जी सकते हैं जैसे उन्होनें भी जीया। एक नया ज़ुबान जो वो लोगों के मुँह पे डाल गए। अपने पास आती चीज़ों को असहमति मे जीया जो जगह या अपने नैतिक अधिकार की चिन्ता किए बगैर उनसे असहमत होकर जीवन में कल्पना करके जीना चाहा। उस अदा में वो लोग रहते थे।
हमारी बातचीत जब ज़ाक राँसिएर से इस किताब में कि गई रचनाओं और मजदूर वर्ग को लेकर हो रही थी।उनका कहना था की मैने सोचा की 19वीं सदी को कैसे देखे जो आक्राईव है। देखना की उसमें क्या मिलेगा? जब वे आक्राईव मे गए तो मिला की उसमें लिखी चिठ्ठियों में कविताएँ, फलसफाएँ, सवाल, बहस, मज़ा है। जो किसी काम के बारे में नहीं है और इंसान के जीने की कसौटी पर वो आवाज़ है "हम हैं" की लड़ाई थी। तर्ज़ुबे और अपने विश्वास को साथ लेकर चलना जो उन लोगों ने अपने दम पर किया। बिना समाज के प्रोत्साहन के अपने अकेलेपन को रचनात्मक रूप से सोचा और उड़ान भरी कल्पनाएँ दी।
ये अनूभव हमने भी किया की जब हमारे बीच ये आया की हम अपने रचना खुद करते हैं। अपने लिए अपना शरीर खुद बनाते हैं जिसमें समाकर हम बौद्धिक जीवन की आशाओं को सींचते हैं। समाज हमारे शरीर को बहुविभाजनों रख देता है। इसलिये अपना दायरा देखना और समझना कठिन हो जाता है।
हमारे विचार बातचीत के माहौल को अलग-अलग दिशाओं के फाटक खुल रहे थे। जो किताब की रचना को सोचकर समझकर हमारे साथी अपने आसपास फलने वाले लोगों की दिनचर्या को लेकर किसी के अकेलेपन या एकांत में जीने वालो की दुनिया के बारे में अपना गहरा शौध रख रहे थे जिसमें देखने के फ्रेम नज़र आ रहे थे। हमारी बातचीत में कुछ बिन्दू उभरे।
हमारे साथी शमशेर अली ने कहा, "कोई है जो शरीर पाने या बनाने के लिए जद्दोजहद करता है पर दिखता नहीं है।लेकिन उस का होने का अंदेशा लगता है। वो क्या है उसे कैसे सोच सकते हैं। मेरे लिए शरीर क्या मायने हैं और वो कैसे मेरे जीवन में मायने रखता है?
राँसिएर ने कहा, "शरीर में जो आया या शरीर से जो टकराया वो बार-बार होता रहा उस रचना में एक प्रेक्टिस को रखना था। जो उन लोगों का प्रेक्टिस था। "मैं" को कैसे जगह में जीते है? "मैं" कैसे रहूँगा किसी जगह में, किसी का अपने होने की आवाज़ को रखना।"
समाज विभाज को पैदा कैसे करता है? इससे टकराकर शरीर का जीवन, अपनी कल्पनाओ को जीना। उद्देश्य, काम समाज में किसी अधिकार के संर्घष से प्रभावित न होकर एक जंग से असहमति की ज़ुबान बना कर जीना। "सर्वहारा रातों" में जो जीवन है उससे अपनी पहचान की एक अलग ही तस्वीर दिखती है। नज़रिये जो कई कल्पनाएँ हमे सर्मपित करते हैं।
स्टूडियों मे हुई बातचीत में लख्मी ने कहा, "वो जो मुझे चाहिए वो शरीर मेरे सामने हैं पर मैं अपने अन्दर उसे कैसे सोचूँ जिससे मैं अपने से दूसरों के बीच की दूरी को समझ सकूँ। जो मेरे ख़्यालों मे एक दुनिया का गठन करता है। जो मेरे सामने है उससे जो दूरी है वो हमारे बीच क्या रिश्ता बनाती है? हमारे स्टूडियों में एक साथी जिनका नाम महेश है। महेश जी हमे महीने में दो-तीन बार आकर अपनी कि गई रचनाएँ सूना जाते हैं। वो अपने घर, परिवार काम के बीच से जो जगह निकालते हैं उसी में ही हमारे लिए जगह बन जाती। वो शख़्स अपने साथ कौन सा शरीर लेकर आता है जिसके बारे में उनके जैसा ही कोई उस शरीर से रिश्ता समझा पाता है।
मैं कहता हूँ एक शरीर है जो समाज मे मिलता नहीं जिससे हटकर मुझे अपना शरीर बनाना है जो मेरी सम्मपन्यता हो। मैं इस जीवन की सम्मपन्यता से संतूष्ट नहीं हूँ तो मेरे शरीर की क्या, कैसी, कौनसी आज़ादी होगी? जिस समय मे मैं अपनी कल्पना करने लगता हूँ उससे एक आकार उभरता है मेरा आज़ादी उसी शरीर में है। उसी में मैं उड़ान भरता हूँ। बौद्धीक ज़िन्दगी सब जगह है मगर इस में जो खुद से बने ढ़ाँचे हैं। वो ही नया शब्द की नया ज़ुबान नया दायरों की समझ देते हैं। मजदूरों के हमने जो ठिकाने देखे हैं। वो घर काम सामजिक, संर्धभ के ढ़ाँचे के अलावा कुछ नहीं देखा पाते पर इस के बीच में वो दुनिया है जिसमें अपने शरीर को नये सिरे से ऊर्जा प्रात होती है। बौद्धिक ज़िन्दगी लिखना कला ही नहीं है। आप कुछ सोच रहे हैं या आपके पास कुछ हैं जो आप खुद की सच्चाई को लेकर आज़ादी है।
जिसमें अपने आप को बनाने का प्रक्रिया है जो अपने पास ही होता है। जो आपको अच्छा लगता है सूझता है वो ही लिखने की प्रक्रिया है। जीने की आज़ादी है। आप के पास अस्पष्ट कुछ है जो आप किसी दूसरे के पास ले जाते हो। ले जाने की प्रक्रिया ही यात्रा कहलाती हैं।
राकेश
Thursday, January 15, 2009
किसने किया, मुँह बन्द
मँहगाई गरीबी ज़ुर्म और घोटाला
इन पर नहीं प्रतिबंध होने वाला
क्या अर्थ है समाज का समझ नहीं आता
अपने हाथों से ही अपनी पहचान को मिटा डाला
फिर वर्तमान समस्या का हल निकाल डाला
लोग कहते हैं,सरकार ने विकास की ओर जाते-जाते मंदी की खाई में धकेल डाला
वो तो भला हो मैटो वालो का की जम़ीन खोदकर हमें निकाल डाला
खुदाई चलती रही कार्यशैलियों की रफ़्तार भी थम गई
किसने कारीगरों के हाथों पर तेजाब डाला
मशीनों की रणनिती ने किया इंसानो पर राज
क्या करे विदेश मुद्रा ने हम को खरीद डाला
आज देश है पर्यटक स्थल,
क्योंकि यहाँ है विदेशी पंछियों का बोल-बाला
सोने की चिडिया था जो भारत
आज वो बना रोबॉट मतवाला
जिसकी संवेदनाए मर गई है
चूके अपने हाथों ने ही उसका दिल निकाल डाला
आज भी होते है आदोंलन,
क्योंकि अधिकारों का नहीं कोई रखवाला
दुष्कर्म रोज होते हैं, ज़ुर्म के मुँह पर कौन मारे ताला
राकेश
इन पर नहीं प्रतिबंध होने वाला
क्या अर्थ है समाज का समझ नहीं आता
अपने हाथों से ही अपनी पहचान को मिटा डाला
फिर वर्तमान समस्या का हल निकाल डाला
लोग कहते हैं,सरकार ने विकास की ओर जाते-जाते मंदी की खाई में धकेल डाला
वो तो भला हो मैटो वालो का की जम़ीन खोदकर हमें निकाल डाला
खुदाई चलती रही कार्यशैलियों की रफ़्तार भी थम गई
किसने कारीगरों के हाथों पर तेजाब डाला
मशीनों की रणनिती ने किया इंसानो पर राज
क्या करे विदेश मुद्रा ने हम को खरीद डाला
आज देश है पर्यटक स्थल,
क्योंकि यहाँ है विदेशी पंछियों का बोल-बाला
सोने की चिडिया था जो भारत
आज वो बना रोबॉट मतवाला
जिसकी संवेदनाए मर गई है
चूके अपने हाथों ने ही उसका दिल निकाल डाला
आज भी होते है आदोंलन,
क्योंकि अधिकारों का नहीं कोई रखवाला
दुष्कर्म रोज होते हैं, ज़ुर्म के मुँह पर कौन मारे ताला
राकेश
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