Friday, April 10, 2015

अब नींद कहाँ आने वाली थी

उन्हे बेहद डर लगता था। हर तेज आवाज पर वो चौंक जाते थे। चाहे वो आवाज़ दरवाजा जोर से पिटने की हो या फिर लिफाफे में हवा भर कर उसे फोड़ने की या फिर किसी बम या पटाखे की। वो इन सभी आवाज़ों से खौफ़ खाते थे। जब तक इस तरह की कोई भी आवाज उनके कानों में पड़ती रहती उनकी आँखों में नींद की परत कभी नहीं उतर पाती। अपने कानो को वो जोरो से भीच लिया करते। मगर फिर भी आवाज़ों से उनका पाला कभी नहीं छूट पाता था।

अपने मन को बहलाने के लिए वो पड़ोस के घर में हमेंशा घुसे रहते थे। उनकी सीट जैसे पड़ोसी के घर में पहले से ही बुक रहती थी। कभी - कभी तो वो वहीं पर नींद की झपकियाँ ले लेते थे और जब आँख खुली तो हमेंशा की तरह अपनी माँ की बगल में सोये हुए होते। जिससे उन्हे ये कभी नहीं पता चल पाता था की वो नींद में चलकर आये हैं या उन्हे कोई अपनी गोद में झुलाता हुआ लाया है। हाँ कभी - कभी उनके गालों पर किसी न किसी के निशान छपे रहते थे। कभी कपड़े की सिलवटें जैसे तो कभी कुछ बलखाती डोरियों जैसे। जिन्हे वो जब भी छुते तो उन्हे दर्द तो नहीं होता था लेकिन अपने गालों को छुने में कुछ अलग सा महसूस होता। वो उठने के बाद उन्हे सहलाते ही रहते।

रोजाना की तरह वे अपने घर में सोये हुए थे। उनके कमरे में गोलियाँ चलने की काफी तेज आवाजें आ रही थी। न चाह कर भी वो उन आवाजों को अनसुना नहीं कर सकते थे। धड़ा - धड़ गोलियाँ कहीं दागी जा रही थी और लोगों के करहाने की आवाज़ें उन्ही आवाजों के घोल में मिली थी। लगता था की जैसे किसी बहुत ही बड़े ग्रोह से लड़ाई चल रही है। उनकी नज़र उनके दरवाजें पर दौड़ जाती। मगर ऐसा लगता था की दुनिया में खाली अब वही बचे हैं बाकि तो सब शिकार हो गये हैं। दीवारें आज थर थरा रही थी। बर्तनों के एक दूसरे से टकराने का शौर कमरे की शान्ती को और भी खौफनाक बना देता। अबकी बार तो आवाज़ तो और मजबूत थी। उस एक ही आवाज़ ने बाकी सारी आवाज़ों को दबा दिया था। अब तो छोटे - छोटे पटाखों के जैसे लड़ियों की आवाज़ तेज होने लगी जिसमें लगता था जैसे आदमियों के मरने की गुंजाइशे बड़ रही हो।

Monday, February 2, 2015

टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी


दूर से ही देख रही थी वो बांस की मजबूत कुर्सी और उसके बगल मे रखी वो टेबल जिसके ऊपर अगर हाथ रखकर कोई खड़ा भी हो जाये तो टूटकर नीचे ही गिर जायेगी। लेकिन अभी कुछ देर के बाद मे वहाँ पर भीड़ ऐसे टूट कर पड़ेगी के उसको रोकना यहाँ किसी के बस का नहीं होगा।

वो वहीं पर उस टेबल से कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठे थे। ये उनका काम नहीं था लेकिन उनके पास इस काम के अलावा इस समय कुछ और करने को ही नहीं था इसलिये रोज़ सुबह निकल पड़ते और कईओ की दुआये लेते हुये उस जगह पर बैठ जाते। उनके हाथ दुख जाते मगर यहाँ पर बोल खत्म होने का नाम ही नहीं लेते थे और उनका काम था उन बोलों को शब्दों मे उतारना। कुछ इस तरह उतारना की पढ़ने वाले को उनके अन्दर दबे दर्द का बखूबी अहसास हो जाये और जिसके लिये उन बोलों को शब्दों के जरिये शहर में उतारा जा रहा है वो नंगे पाँव बस होता चला जाये।

उनके नाम के बिना ही उनको लोग जानने लगे थे और वो भी नाम के साथ किसी को नहीं जानते थे। ये इस वक़्त मे बनने वाले ऐसे रिश्ते थे जो लम्बे बहुत रहेगें लेकिन कभी एक - दूसरे पर जोर नहीं डालेगें। एक - दूसरे को खोजेगें जरूर लेकिन खोने से घबरायेगें भी नहीं। दूर हो जाने से उदास जरूर होगें लेकिन हताश नहीं हो जायेगें। यहाँ चेहरे की पहचान बिना नाम जाने थी और नाम की पहचान बिना चेहरे के। फिर भी इनकी उम्र इतनी थी के जगह को अपनी उम्र देकर उसकी जिन्दगी बड़ा देती।

रिश्ते, कितने मीठे और सूईदार होते हैं? ये हम वियोग या योग मे कह भी दे तो उसमें बहस करने की कोई बात नहीं है। ये तो सम्पर्ण करने के सामन होता है। जिसके करीब उतना ही मीठा और जिसके बहुत करीब उतना ही सूईदार। जिससे दूर जाना उतना ही मीठेपन का अहसास कराता और उससे बेहद दूर जाना उतना ही सूईदार। कोई अगर ये कह दे तो क्या उससे लड़ने जाया जा सकता है? ये तो वे अहसास से जो बिना माने या मानने से इंकार भी किये सफ़र कर ही जाता है। इसमे "मेरी" "तेरी" की भी लड़ाई हो सकती है और लड़ाई हो भी क्यों भला? ये जीवन की वे लाइने हैं जिसमें दोनों ओर से न्यौता खुला होता है। बिलकुल फिल्मों के उन गानों की तरह जो न तो किसी हिरोइन के लिये गाये जाते हैं और न ही किसी हीरो के लिये। मतलब वे गाने फिल्म के किसी क़िरदार के लिये नहीं होते। वे तो जीवन का कोई हिस्सा पकड़कर उसके मर्म के लिये गाये जाते हैं। उसका अहसास गाने वाले के लिये भी होता है, गाने पर अदाकारी करने वाले के लिये भी, गाना लिखने वाले के लिये भी और गाना सुनने वालों के लिये भी।

उनके पास इतने पेपर पड़े होते जितने की उस टेबल पर नहीं होते थे। वे लगातार लिख रहे थे। क्या लिख रहे थे उन्हे ये मालुम था लेकिन सो मे से कितने अलग है वे नहीं। विषय एक जैसा होता, मगर उसके नीचे बनी वे चार लाइने कहीं भी ले जाने का दम भरती थी। इन कागजो को भरने की कोई किमत नहीं थी और न ही कोई ये किमत अदा कर सकता था। वे कागज और उनपर लिखी वे चार लाइनें उन भेदों को भी खुलेआम खोलकर रख देती जो कई समय से दिल के अंदर बसी मीलों का सफर कर रही थी। कई जगहें बदलकर यहाँ तक आई थी और न जाने कितनी और आगे जायेगीं। कोन कहाँ से क्या लाया है और कोन किसके साथ क्यों आया है? कोन कैसे यहाँ आया है और कोन किसको कहाँ लेकर जायेगा? ये सब भरा हुआ था। इसको अगर यहाँ आज खोल दिया तो इसकी मौत निश्चित है फिर मरे हुए के सामने हम रोने के अलावा क्या कर सकते हैं? या उसे कुछ देर दोहराकर भूल जाने के लिये तैयार हो जाते हैं और अगर दोहराकर भूलकर जाने के लिये ये सब दोहराया जायेगा तो इसका जिन्दा रहना जरूरी है। इसलिये इसको इतना ही गाया जाये तो ठीक है नहीं तो मिलने की मिठास खत्म हो जायेगी।

पुछताछ की मार से सभी यहाँ अच्छी तरह से वाकिफ हो गये थे। सबको अंदाजा हो गया था की यहाँ कोन कब आकर क्या पूछेगा? और हमें किन बातों और जवाबों के लिये तैयार रहना है। इसी को यहाँ पर सभी ने खेल बना लिया था। हर कोई जैसे मसखरी करने के लिये कोई रूप धारण करना चाहता था। जहाँ पर सभी किसी मोहर के नीचे दब जाने का खौफ पालते थे वहीं पर वो सभी मे उसका लुफ्त बाँट रही थी। वे अपनी गली की सबसे मसखरी औरत थी। मजा तो जैसे उनके शरीर का ही हिस्सा था। हर कोई उनको जानता था मगर कोई ये नहीं जानता था की आज और कल के बीच मे उनके खुरापाती दिमाग मे कोनसी छेड़खानी जन्म ले लेगी और वो उस दिमाग को हमेशा खाली और शांत रखती जिससे उनको खेलना है। सारे कागजात लेकर जब सारे मर्द लोग जमीन और जगह के लिये निकल जाते तो उनका खेल शुरू होता।

Friday, November 14, 2014

मीठे इंजेक्शन

खुश रहने के लिये क्या चाहिये होता है भला। बस, अपनी तकलीफो को नज़रअंदाज करों, बिमारियों को छुपाओ और बीते हुये सुखों को याद करो। बस मिल गया जिंदा रहने का आसरा। कहते हुये एक परिवार अपने दुखों का मजाक नहीं बनायेगा तो जियेगा कैसे? वैसा ही ये सरकारी जगहों और अपने बनाये घरों के बीच का रिश्ता। अनेकों नराजगियों के बीच, तानेबाने की खींचातानी के चलते इनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ता। बस, चुइगम की तरह खिंचता जाता है।

आज महीने का दूसरा मंगलवार है। सुबह से ही भीड़ लगनी शुरू हो चुकी है। पिछले हफ्ते ही ये कह कर दिया था की आज ही के दिन बच्चों के रूटीनी इंजेक्शन लगाये जायेगें। इसलिये यहां सभी को इतनी जल्दी है की डिस्पेंशरी खुलने के समय से लगभग 2 घंटा पहले ही लाइन लगना शुरू हो चुका है।

आज लोगों की भीड़ है। बच्चे तैयार है। बिना निलाहे - दुलाये मांओ ने उन्हे इंजेक्शन के लिये तैयार कर लिया है।

एक बच्चे ने अपनी मां से पूछा, “मम्मी हम यहां पर क्यों आये है?”
तो मां कहती है, “बेटा यहां पर डॉक्टर आंटी सब बच्चों को टॉफियां बांट रही है तभी तो आज देखों कितने सारे बच्चे आये हुये।"
"मम्मी क्या डॉक्टर आंटी सबको टॉफी देगी?” बच्चे ने पूछा।
हां बेटा।"
फ्री में?”
हां बेटा।"
उनके पास इतनी सारी टॉफी होगीं?”
हां बेटा।"
जितनी मांगेगे उनती देगी?”
हां बेटा।"

"फिर तो मैं दो लूंगा।" उसने खुश होते हुये कहा।
बेटा वो उनको दो देगी तो चुपचाप बैठेगें छांव में। नहीं तो वो नहीं देगीं।" मां ने जैसे ही उससे ये बात कही वो भागकर गया और दीवार से लगी कुर्सियों पर बैठ गया।

मीठी गोली, मीठी दवाई, फ्रुर्टी का इंजेक्शन ना जाने किस किस चीज से सभी ने अपने बच्चों को बहकाया हुआ है।

मम्मी कब मिलेगी हमें टॉफियां?” एक बच्चे ने जोर से पूछा।
बस, बेटा थोड़ी देर और फिर अंदर चलेगें।" मम्मी ने फिर से बहलाते हुये उसे वापस जाने पर मजबूर कर दिया।

इतने एक बड़ी सी वेन डिस्पेंशरी के गेट के सामने रूकी। गेट पूरा खोल दिया गया। उसमें से दो लड़के छोटे छोटे कार्टन बॉक्स उतार कर अंदर ले जा रहे हैं। लाइन में खलबली शुरू हुई। सभी बैठे लोग खड़े हो गये। दूर खड़े अपने नम्बरों में आ गये। बच्चे अपने अपने मम्मी और पापा के पास में खड़े हो गये। लगता है खिड़की खुलने वाली है।

वहां पर खड़े बच्चों ने उन दोनों लड़को से पूछा, “अंकल इसमें हमारे लिये मीठी टॉफियां है?”
उसमें से एक लड़का बोला, “नहीं, इसमें तो इंजेक्शन हैं तो जो आपके लगेगें।"

उस लड़के बड़ी जोरों से हंसे और वहां खड़े बच्चों ने रोना शुरू किया। 

लख्मी 

Tuesday, November 11, 2014