उस दिन अवमास्या की रात थी। इस काली रात में भगत जी ने ख़ास तौर से लोगों को बुलवाया था। चारों तरफ लोग अपने हाथो में पूजा की सामग्री का सजा हुआ ख़प्पर लेकर बैठे हुए थे की कब भगत जी उन्हे आदेश दिया और वो सब ख़प्पर उनके कहे के मुताबिक हाथ से नीचे रखे। सब कुछ विधी-विधान के मुताबिक हो रहा था। भगत जी का नाम यहाँ सब जानते थे पर सब उन्हे भगत जी या बाबा कहकर पुकार रह थे। उनका नाम प्रेमनाथ है उम्र करीब 80 साल की होगी। शरीर को देखकर लग रहा था की वे 50 या 60 साल के है।
चमकादड़ों की तरह सीर पर धुआँ गुच्छा बनकर उड़ रहा था। फ़र्श खून की छीटों से सना हुआ था। बिल्लियाँ आकर उस खून में लथ-पथ फ़र्श को चाट रही थी। भगत जी ने अपनी चारपाई से एक कुत्ता भी बाँध रखा था। बार-बार भगत जी तेल में भीगे रूई की जलती बत्तियों को अपने सामने बैठी महीला की हथैलियों पर हाथ उठा-उठाकर मार रहे थे। जैसे ही हथैली पर जलती हुई बत्ती को छूकर हटाते तभी हथैली पर छपे काले धब्बे की आकृति में किसी को पहचान ने की कोशिश करते फिर दोबारा वैसे ही करते। हर बार कुछ अलग तरह की आकृति उस महीला की
हथैली पर छप जाती। नज़दीक में बैठे लोग ये देख कर हैरान हो जाते। वहाँ दूसरी तरफ एक कमरे में काला अंधेरा था जहाँ किसी के होने की कोई मौज़ूदगी भी नहीं दिख रही थी। आँखें जब उस तरफ देखने का अभ्यास करती तो मन के भीतर अन्नत भाव उभर आते।
वो उस जगह आकर रोके जहाँ साधना ही ज़िन्दगी को उपस्थित कर रही थी। जलती हुई रूई की बत्तियों का प्रकाश दोनों के बीच में एक दायरा बना रहा था। वे झुक-झुककर हथैली को देखते। तमाम उल्टी-सीधी लक़ीरों के ऊपर अतीत को उभारने की कोशिश की जा रही थी। कुछ तो पता चले। अनगिनत बार ऐसा करने के उपरान्त कुछ हाथ लगा। बिल्लियाँ जमे हुए खून की छीटो को ज़ीभ से चाटकर साफ कर चुकी थी। शायद जितनी देर भगत जी ने ये विधी पूरी करने मे लगाई उससे पहले ही बिल्लियों ने सारा मामला साफ कर दिया था।
इस काम के होते ही उन्होनें तसल्ली भरी सांस लेकर अपने बारे में कुछ कहना शुरू किया। सारी बातें वो बड़ी ही सरलता से कहे जा रहे थे। बचपन से ही भगत जी इस विद्या में निपुर्ण थे। उनका जीवनकाल कुछ इस तरह से आरम्भ हुआ।
जब वो चार-पाँच साल के ही थे। वो किस्सा अंग्रेजो के ज़माने का था। तब भारत अंग्रेजो का गुलाम था। उनके पिता श्री चिरंजी लाल पुलिस थाने में हवलदार की नौकरी किया करते थे। घर में सब कुछ था, .एशों-आराम। अचनाक अपनी माँ का चेहरा याद करके उनकी आँखें चमक उठी। भीतर से मन माँ को याद करके उसी मार्मिकता से व्याकुल हो गया। जैसे एक छोटा बच्चा माँ के न होने से व्याकुल हो जाता है
फिर वो वापस मुस्कराकर बोले, "मेरी माँ मुझे बहुत प्यार करती थी। हम तीन बहन भाई थे। दो बहन और मैं।
मैं बड़ा था। बदकिस्मती से उस जमाने में माता(चेचक) निकली करती थी जिसका कोई इलाज नहीं होता था। इसे ला-इलाज बिमारी समझकर हर कोई हम से कोसो दूर भागता था।
तभी मेरे पिता जी ये सोच कर बड़े परेशान रहते थे। उनके महकमे में सब जानते थे की मुझे कोई छूत की बिमारी लगी है। वो सब पिताजी से भी कतराते थे। गाँव में जीना मुश्किल हो गया था। हर रोज मेरे पिता जी को ताना दिया जाने लगा। पिताजी को अपने मान-सम्मान की बड़ी परवाह थी ।
मौहल्ले में सब उनसे डरते थे पर मेरे कारण सबके मुँह उनके ऊपर खुल जाते थे। उस रोज माँ से ज़िद्द की, "इस को कहीं छौड़कर आ जा। कोई मुझसे बात नहीं करता। सब मुझे कोसते रहते हैं। मेरी नौकरी ख़तरे में है। इलाके के साहब लोग मुझे रोज फटकारते हैं। जब भी घोड़े पर सवार होकर गलियों में गश्त लगाने जाता हूँ तो पीछे से लोग धुतकारते हैं। अब सहा नहीं जाता। तू करेगी ये काम या मैं ही उसे ज़हर देकर मार डालूँ और कहीं गड्डे में डाल आऊँ।"
माँ इस बात के लिए कभी राज़ी नहीं होती की उस के बेटे को कोई मारने की बात कहे। वो तो अपनी पति के हाथो मजबूर थी। वरना मेरे बारे में बुरा सोचने वाले का वो गला घोंट कर मार डालती। माँ बड़ी दयालू और हर सूरत में क्षमा याचनी होती है। पड़ोसियों ने उससे कहा की इसे किसी के पास छोड़ आ, नहीं तो तेरे आदमी के महकमे के साहब लोग इसे तुझसे छीन ले जायेगें।
रात भर माँ की आँखें मेरे गम में रो-रोकर पत्थर की तरह ठोस हो जाती थी। चेहरा दर्द में डूब जाता था । पति और अपनी ममता के तराजू के दो पड़लों मे वो अकेली झूलती रही। होशमन्द होकर भी बेहोशी कि सी एक ज़िन्दा लाश की तरह वो मुझे देखती रहती। कौन तोड़ता इस माँ के विश्वास को? उसे जो करना था वो करके ही दम लेती। उस के लिए पति का आदेश और अपने सपूत की रक्षा दोनों ही महत्वपूर्ण थे।
जब महामारी फैली हुइ थी। इस की चपेट से बचना बड़ा कठीन होता था। डॉक्टर इस का इलाज नहीं कर पाते थे। क्योंकि इस बिमारी के बिगड़ जाने के बाद बचना नामुमकिन था। माँ वो कर गई जो उसे करना था गाँव से दूर एक नदी के घाट पर किसी सन्यासी का डेरा लगा था। माँ उसे शायद पहले से जानती थी। उस साधू की साधना में हर प्रकार की शक़्ति थी। वो दिव्य और अति तीव्र राहत पहुँचाने वाली जड़ी बुटियों का ज्ञाता था। इस घाट पर वो गोबर से बने उपलों के ढेर लगा कर उनमें आग जला कर बीचों-बीच बैठता था। कहते हैं- ये तपो बाबा था। जो आग मे जलती लपटों के बीच बैठकर दिव्य शक़्तियों हेतू , ईश्वर की साधना में लीन रहता था प्रात: काल ही वो जागकर यज्ञ करता और तपस्या में लीन हो जाता।
माँ उस के डेरे के पास घाट के किनारे पर ही मुझे छोड गई। मैं रोता रहा जोर-जोर से मगर कोई न आया पर मैं आचनक हो चूप हो गया। मुझे अब डर नहीं लग रहा था। जब वो जटाधारी बाबा ने अपनी गोद में उठाया तो अच्छा लगा। वो मुझे बिना संकोच किए अपने डेरे पर ले आये और अपनी सारी विद्यायें मुझे सिखला दी। सौभाग्यवश वहाँ डेरे पर पहलवान कुश्ती करने आते थे। मुझे भी गूरूजी ने पहलवानों के साथ कुश्ती करने को कहा मैं धीरे-धीरे स्वास्थ होता गया। गूरूजी की लाभकारी जड़ी-बुटियों ने मुझे चेचक के रोग से बचा लिया था। जब में पूरी तरह निरोग हो गया तो दूर खड़ी मैनें एक औरत को देखा यकिनन वो मेरी माँ ही थी जिसे देख कर मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी। माँ गूरूजी की मिन्नते करने लगी। बहुत रोई गूरू जी कह रहे थे की "मैं जानता हूँ तू रोज यहाँ आती थी। छूप कर अपने लाडले बेटे को निहारती थी। तेरा कोई दोष नहीं। हर माँ अपनी औलाद का भला ही चाहती है।
ले जाना अपने बेटे को पर इसे अभी और भी कुछ जानना है और सिखना है, समझना है।"
मुझे गले से जी भर के लगा कर माँ ने अपनी अदमरी ममता में जाँन फूँक दी। मैं वहीं गूरू जी के डेरे पर बड़ा होता रहा बहुत ज्ञान-ध्यान की बातें वहाँ से ग्रहण की और मेरा नाम के साथ भी नाथ गोत्र जुड़ गया। गूरू जी गोरख़नाथ के शिष्य शिष्य थे तो मेरे नाम के साथ भी नाथ जुड़ गया। मुझे प्रेमनाथ कहकर पुकारने लगे।
लोगों के दुख -दर्द दूर करने करते-करते मैं दिल्ली शहर में सन् 1982 में आया था। फिर यहाँ के कुछ पीड़ित लोगों ने मुझसे अपना इलाज करने को कहा तो मेरा धर्म था कि किसी भी दुखिया को न नहीं कहूँ। मैनें अपने गूरू जी को वचन दिया था। इस वचन को भरते-भरते मैं अपना सब कुछ भूला चूका था। वचनबध होने के बाद प्रेमनाथ भगत जी ने बड़ी सहजता से चन्द पंक्तियों में कहा। उन की आवाज में अब करूणा फूट पड़ी थी।
"अब तो बस जब तक ज़िन्दा हूँ सबको को कुछ ना कुछ देता रहूँगा। मर गया तो फिर भी कुछ देकर ही जाऊँगा। अपने साथ बस, जीवन भर की साधना ही ले जाऊँगा।"
यह कहकर वे चारपाई से खिसके और अपने पास रखी शराब की आधी भरी बोतल कि तरफ देख कर बोले, "ला दे इसी बात पर लल्ला एक गिलास बना दें।"
कुछ पुरानी यादें , माँ का प्यार , गूरूजी का जीवनदान और आज बची-कुची शराब का हल्का-हल्का शुरूर जो उनके चेहरे पर दमभर रहा था।
राकेश
Tuesday, May 12, 2009
वो यहीं है कहीं नहीं गए हैं...
खेल और ठाठ से जीना देखा जाये तो हर किसी की भूमिका रही है। अलग-अलग लोगों की ज़िन्दगी ने जीने का मज़ा ही कुछ और है।
रेहड़ी पर पड़ी चमकीले रंग की पन्नी की रोशनी और पोदीने की महक ने उसे और भी मनभावक बना दिया था। उनकी रेहड़ी पर हमेशा भीड़ ही लगी रहती। वो गा-गाकर पूरी दक्षिणपुरी मे घूमते। काफी पुराने हैं वे यहाँ के। लोग उन्हे बाल्टी की आवाज़ से पहचानते हैं। वे अपनी रेहड़ी पर बाल्टी रखते और पोदीने का जंजीरा बाल्टी को बजाकर और गाकर वो पूरे इलाके में लोगों के बीच में शामिल होते।
"अजी पीलो- हाँ जी पीलों- मेरा जंजीरा बना है आला, इसे पी गई वेजन्तीमाला, उसका पड़ गया अमिताभ से पाला। अजी पीलो- हाँ जी पीलो।"
ये गीत गली मे पड़ते ही घरों के दरवाज़े खुलने से पहले ही बच्चे बाहर निकल आते। बस, रेहड़ी के पास खड़े होकर पूरी गली को अपने सिर पर उठा लेते।
उनके हाथ के बने जंजीरे के स्वाद के चटखारे न जाने कितने लोगों को कुछ देर उनका गीत सुनने पर मजबूर करता। ये रिश्ता खाली सुनाना और समान बैचने के समान नहीं था। उनकी रेहड़ी तो न जाने कितने शायरों के दिवानों से भरी दिखती। कहीं पर शायरी लिखी होती तो कहीं पर गीत। सब के सब उसी की लाइनों को पड़ते हुए वहीं पर जमे रहते।
कुछ साल पहले ये एक कोका कोला की कम्पनी में काम करते थे। उनके घर में कोका कोला कोल्ड्रिंक और न जाने कितने ढक्कन पड़े दिखते। वो रोज़ शाम मे जब भी वहाँ से आते तो गली के सभी बच्चो को जमा कर लेते और गिलासों मे सबको कोल्ड्रिंक पिलाते। सारे बच्चे उनके आने की राह हमेशा देखा करते थे।
उनका यही काम रहता, कभी बच्चो की महफिल जमाते तो कभी बड़े बुर्जुगों के साथ में ये शरबत की तरह रखकर एक खास तरह की मण्डली जमा लेते। बस, फिर तो गीत और चटखारों की दुनिया शुरू हो जाती। उस समय ये सारी कोल्ड्रिंक पीना किसी के बस का नहीं था। 5 रुपये मे ये शरबत किसी को पसंद नहीं था। बस, यहीं से इस शरबत के नाम से पीते और गीतों की दुनिया में चले जाते। रोनक से भरपूर ये राहें हमेशा ताज़ी बनी रहती।
उनके हाथ में खाली बचा रह गया था उन गीतों की दुनिया का सच। बाकी सब झूठ था। काम और कम्पनी बन्द होने कारण अब वो पूरे उन मण्डलियों के हो गए थे। लेकिन ये मण्डलियाँ खाने को शायद नहीं दे सकती थी। ये मण्डलियाँ हर गीत में अहसास भर पाती थी, देश-परदेश की बातें कह जाती थी लेकिन दोस्तों के बीच पलते जरूरत के हिस्सो को कभी छू भी नहीं पाती थी। ये दौर खुद को बदलने के लिए था।
वे तो अब भी वही बाँट रहे थे। वो ही गीत, वही शरबत और वही प्यार इसी में उन्हे खुशी मिलती थी। आज भी वे वही सब बाँट रहे हैं। जिसमे जीने की तमन्ना खूब पलती है। वही लोग, वही जगहें और वही शरबत के तौर पर मिलने वाला पानी। गीतों में चटखारे आज भी रोशन हैं। गीत उनकी ज़ुबान से निकलता तो दूर तक जाता। और शाम की बातों को लोग सुनने के लिए उन्हे अपने करीब भी रखते थे।
वो आज भी वहीं हैं जहाँ उन्हे होना चाहिये। शादियों और छोटे-छोटे अवसरों में वो कही यही जंजीरा पिलाते हुए दिखते हैं और गीतों को गाते नज़र आते हैं। यही उनका काम है।
लख्मी
रेहड़ी पर पड़ी चमकीले रंग की पन्नी की रोशनी और पोदीने की महक ने उसे और भी मनभावक बना दिया था। उनकी रेहड़ी पर हमेशा भीड़ ही लगी रहती। वो गा-गाकर पूरी दक्षिणपुरी मे घूमते। काफी पुराने हैं वे यहाँ के। लोग उन्हे बाल्टी की आवाज़ से पहचानते हैं। वे अपनी रेहड़ी पर बाल्टी रखते और पोदीने का जंजीरा बाल्टी को बजाकर और गाकर वो पूरे इलाके में लोगों के बीच में शामिल होते।
"अजी पीलो- हाँ जी पीलों- मेरा जंजीरा बना है आला, इसे पी गई वेजन्तीमाला, उसका पड़ गया अमिताभ से पाला। अजी पीलो- हाँ जी पीलो।"
ये गीत गली मे पड़ते ही घरों के दरवाज़े खुलने से पहले ही बच्चे बाहर निकल आते। बस, रेहड़ी के पास खड़े होकर पूरी गली को अपने सिर पर उठा लेते।
उनके हाथ के बने जंजीरे के स्वाद के चटखारे न जाने कितने लोगों को कुछ देर उनका गीत सुनने पर मजबूर करता। ये रिश्ता खाली सुनाना और समान बैचने के समान नहीं था। उनकी रेहड़ी तो न जाने कितने शायरों के दिवानों से भरी दिखती। कहीं पर शायरी लिखी होती तो कहीं पर गीत। सब के सब उसी की लाइनों को पड़ते हुए वहीं पर जमे रहते।
कुछ साल पहले ये एक कोका कोला की कम्पनी में काम करते थे। उनके घर में कोका कोला कोल्ड्रिंक और न जाने कितने ढक्कन पड़े दिखते। वो रोज़ शाम मे जब भी वहाँ से आते तो गली के सभी बच्चो को जमा कर लेते और गिलासों मे सबको कोल्ड्रिंक पिलाते। सारे बच्चे उनके आने की राह हमेशा देखा करते थे।
उनका यही काम रहता, कभी बच्चो की महफिल जमाते तो कभी बड़े बुर्जुगों के साथ में ये शरबत की तरह रखकर एक खास तरह की मण्डली जमा लेते। बस, फिर तो गीत और चटखारों की दुनिया शुरू हो जाती। उस समय ये सारी कोल्ड्रिंक पीना किसी के बस का नहीं था। 5 रुपये मे ये शरबत किसी को पसंद नहीं था। बस, यहीं से इस शरबत के नाम से पीते और गीतों की दुनिया में चले जाते। रोनक से भरपूर ये राहें हमेशा ताज़ी बनी रहती।
उनके हाथ में खाली बचा रह गया था उन गीतों की दुनिया का सच। बाकी सब झूठ था। काम और कम्पनी बन्द होने कारण अब वो पूरे उन मण्डलियों के हो गए थे। लेकिन ये मण्डलियाँ खाने को शायद नहीं दे सकती थी। ये मण्डलियाँ हर गीत में अहसास भर पाती थी, देश-परदेश की बातें कह जाती थी लेकिन दोस्तों के बीच पलते जरूरत के हिस्सो को कभी छू भी नहीं पाती थी। ये दौर खुद को बदलने के लिए था।
वे तो अब भी वही बाँट रहे थे। वो ही गीत, वही शरबत और वही प्यार इसी में उन्हे खुशी मिलती थी। आज भी वे वही सब बाँट रहे हैं। जिसमे जीने की तमन्ना खूब पलती है। वही लोग, वही जगहें और वही शरबत के तौर पर मिलने वाला पानी। गीतों में चटखारे आज भी रोशन हैं। गीत उनकी ज़ुबान से निकलता तो दूर तक जाता। और शाम की बातों को लोग सुनने के लिए उन्हे अपने करीब भी रखते थे।
वो आज भी वहीं हैं जहाँ उन्हे होना चाहिये। शादियों और छोटे-छोटे अवसरों में वो कही यही जंजीरा पिलाते हुए दिखते हैं और गीतों को गाते नज़र आते हैं। यही उनका काम है।
लख्मी
बस, इंतजार ही किया...
किसी भी वक़्त को वो कभी आसानी से पकड़ नहीं पाये। बस, उस वक़्त के आर-पार ही भागते रहे। शायद इसी में उन्हे मज़ा आता था। घंटो वो एक ही जगह पर खड़े रहते। जिसका वो इंतजार कर रहे थे वे कैसे दिखते हैं ये भी उन्हे पता नहीं था, और वो उन्हे कैसे पहचानेगें ये भी। फिर भी उनका रोज उस जगह पर तकरीबन चार घंटे खड़ा होना तय रहता।
आज उन्हे किसी ने बड़े प्यार से बुलवाया था। उसी की खुशी उनके चेहरे पर छाई थी। अपनी पढ़ाई ख़त्म करके उनके पास कुछ भी करने को नहीं था। घर मे जो भी हो लेकिन वो इतना तो जानते थे कि अभी उनके पास दो साल तो है जिसमे वो कुछ अपने लिए कर सकते हैं। अगर ये गवा दिए तो फिर तो लग गये किसी काम पर जिसमें उनका मन कतई नहीं था।
वे भागे-भागे जाते थे उस तरफ जहाँ पर उन्हे कोई अपने साथ बिना वज़ह के ले जाने की कहता। वो रात-रात भर घूमते। कभी वेटर बनकर पार्टियों में, कभी शादियों में डीजे वाले साथ, कभी नाटक करने वालो के साथ, कभी बाजारों में तो कभी जागरणों में। उन्हे इन जगह पर जाने से कोई भी नहीं रोक सकता था। दिन और रात को उन्होनें बड़ी सहजता से ज़ुदा-ज़ुदा कर रखा था। दिन में क्या करना है और रात में क्या उन्हे खूब पता था। कभी वो दिन को रात बना देते तो कभी रात को गहरी रातें। जिसमे कोई किसी को ना तो जानता है और न ही पहचानता है।
एक बेहद छोटा सा ग्रुप जिसको बनाने में इतनी मेहनत नहीं लगी थी लेकिन उसे रोजाना बनाये रखने में अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ती थी। इसमे एक ढोलक बजाने वाला था, एक ड्रमसेट, एक गाने वाला और एक चांगों बजाने वाला हाँ कभी-कभी इसमे गिटार तो कभी मटके बजाने वाले भी जुड़ जाते थे।
उन्ही के आने जाने से ये फलता-फूलता था। सब इसी की रौनक में बेहद खूश होते। कई रौनक इन सब ने साथ मिलकर ताज़ा की हैं। शुरू-शुरू में तो ये अपने ही रिश्तेदारों की जगहों को रौनक करते थे। चाहें कुछ भी, कुछ मिले या ना मिले बस, सब के सब खुद ही पँहुच जाते और माहौल को खुशगवार बना देते। ये माहौल को ताज़ा बनाना लोगों के दिलों मे उतरने के समान था। जो वे बहुत आसानी से कर लिया करते। जिसका असर शायद उन्हे दूसरे ही पल मे मिल जाता था।
ये भी उन पार्टियों के हिस्सेदार थे और उस ग्रुप के साथी थे। भले ही उन्हे कुछ बजाना नहीं आता था और न ही कुछ माहौल बनाना। ये तो खुद ही उस माहौल के दिवाने थे। हाँ इन्हे चांगों बजाना बेहद भाता था। मगर उसे खरीदना तो दूर उसे सीखने के भी उन्हे कुछ देने होगें इसी से वे डर जाते थे। लेकिन ये उनका खुद का ही भ्रम था।
रोज शाम में चार बजे वो ग्रुप साथ होता। जिसमें कोई न कोई गाना बजाया जाता। कभी गाना नया होता तो कभी पुराना। गाने के साथ मे गाने वाला, बजाने वाले और सुनने वाले सभी साथ में होते। ये सारा प्रोग्राम किसी न किसी की छत पर होता। सब कुछ यहाँ पर जैसे शांत होता, छत पर किसी के होने का अहसास गायब हो जाता। बस, जो भी होता वो दिलों के अन्दर से निकलने वाली आवाज़ होती और उन सब के रियाज़ के कण जिसने में बेहद ताकत होती।
ये छत छोटी थी, मगर इतनी भी छोटी नहीं थी कि इन सभी के लिए जगह न बन पाये। कहीं से बहुत मद्दम आवाज़ आ रही थी। जैसे कोई तारों के साथ खेल रहा है। हर तार के अन्दर से निकलती आवाज़ रात के आलम को हसीन बना रही थी। मदहोशी के आलम मे हर किसी को जैसे करीब ला रही हो। आसमान साफ था, संगीत के साथ जैसे जुगाली कर रहा था। कभी नवाबो की तरह से सब कुछ सुनता तो कभी मदहोश होकर हवा के झौकों से के रूप में फूलों की बरसात करता। वाह! क्या मज़ा था।
उन्होनें पहली बार एक चांगों खरीदा था। लेकिन इसको बजाना उन्हे आज भी नहीं आता था। घर में रखकर उसे वे कभी सीधा तो कभी उल्टा करके देखते। ये पुराना था, पुराना तो खरीदा था लेकिन उनके दिल में इसका अहसास नये से भी काफी ज़्यादा था। वे उनके दिल का जैसे टुकड़ा था।
लख्मी
आज उन्हे किसी ने बड़े प्यार से बुलवाया था। उसी की खुशी उनके चेहरे पर छाई थी। अपनी पढ़ाई ख़त्म करके उनके पास कुछ भी करने को नहीं था। घर मे जो भी हो लेकिन वो इतना तो जानते थे कि अभी उनके पास दो साल तो है जिसमे वो कुछ अपने लिए कर सकते हैं। अगर ये गवा दिए तो फिर तो लग गये किसी काम पर जिसमें उनका मन कतई नहीं था।
वे भागे-भागे जाते थे उस तरफ जहाँ पर उन्हे कोई अपने साथ बिना वज़ह के ले जाने की कहता। वो रात-रात भर घूमते। कभी वेटर बनकर पार्टियों में, कभी शादियों में डीजे वाले साथ, कभी नाटक करने वालो के साथ, कभी बाजारों में तो कभी जागरणों में। उन्हे इन जगह पर जाने से कोई भी नहीं रोक सकता था। दिन और रात को उन्होनें बड़ी सहजता से ज़ुदा-ज़ुदा कर रखा था। दिन में क्या करना है और रात में क्या उन्हे खूब पता था। कभी वो दिन को रात बना देते तो कभी रात को गहरी रातें। जिसमे कोई किसी को ना तो जानता है और न ही पहचानता है।
एक बेहद छोटा सा ग्रुप जिसको बनाने में इतनी मेहनत नहीं लगी थी लेकिन उसे रोजाना बनाये रखने में अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ती थी। इसमे एक ढोलक बजाने वाला था, एक ड्रमसेट, एक गाने वाला और एक चांगों बजाने वाला हाँ कभी-कभी इसमे गिटार तो कभी मटके बजाने वाले भी जुड़ जाते थे।
उन्ही के आने जाने से ये फलता-फूलता था। सब इसी की रौनक में बेहद खूश होते। कई रौनक इन सब ने साथ मिलकर ताज़ा की हैं। शुरू-शुरू में तो ये अपने ही रिश्तेदारों की जगहों को रौनक करते थे। चाहें कुछ भी, कुछ मिले या ना मिले बस, सब के सब खुद ही पँहुच जाते और माहौल को खुशगवार बना देते। ये माहौल को ताज़ा बनाना लोगों के दिलों मे उतरने के समान था। जो वे बहुत आसानी से कर लिया करते। जिसका असर शायद उन्हे दूसरे ही पल मे मिल जाता था।
ये भी उन पार्टियों के हिस्सेदार थे और उस ग्रुप के साथी थे। भले ही उन्हे कुछ बजाना नहीं आता था और न ही कुछ माहौल बनाना। ये तो खुद ही उस माहौल के दिवाने थे। हाँ इन्हे चांगों बजाना बेहद भाता था। मगर उसे खरीदना तो दूर उसे सीखने के भी उन्हे कुछ देने होगें इसी से वे डर जाते थे। लेकिन ये उनका खुद का ही भ्रम था।
रोज शाम में चार बजे वो ग्रुप साथ होता। जिसमें कोई न कोई गाना बजाया जाता। कभी गाना नया होता तो कभी पुराना। गाने के साथ मे गाने वाला, बजाने वाले और सुनने वाले सभी साथ में होते। ये सारा प्रोग्राम किसी न किसी की छत पर होता। सब कुछ यहाँ पर जैसे शांत होता, छत पर किसी के होने का अहसास गायब हो जाता। बस, जो भी होता वो दिलों के अन्दर से निकलने वाली आवाज़ होती और उन सब के रियाज़ के कण जिसने में बेहद ताकत होती।
ये छत छोटी थी, मगर इतनी भी छोटी नहीं थी कि इन सभी के लिए जगह न बन पाये। कहीं से बहुत मद्दम आवाज़ आ रही थी। जैसे कोई तारों के साथ खेल रहा है। हर तार के अन्दर से निकलती आवाज़ रात के आलम को हसीन बना रही थी। मदहोशी के आलम मे हर किसी को जैसे करीब ला रही हो। आसमान साफ था, संगीत के साथ जैसे जुगाली कर रहा था। कभी नवाबो की तरह से सब कुछ सुनता तो कभी मदहोश होकर हवा के झौकों से के रूप में फूलों की बरसात करता। वाह! क्या मज़ा था।
उन्होनें पहली बार एक चांगों खरीदा था। लेकिन इसको बजाना उन्हे आज भी नहीं आता था। घर में रखकर उसे वे कभी सीधा तो कभी उल्टा करके देखते। ये पुराना था, पुराना तो खरीदा था लेकिन उनके दिल में इसका अहसास नये से भी काफी ज़्यादा था। वे उनके दिल का जैसे टुकड़ा था।
लख्मी
Friday, May 8, 2009
उन्हे जाना कहाँ उन्हे खुद नहीं पता...
जीवन के कई साल उनके कहाँ फुर्र हो गए इसका तो उन्हे पता नहीं है लेकिन इतना मालुम है कि वो न जाने कितने जनों के मन के अन्दर बसे हैं। ये वो कभी कहते तो नहीं है पर उनके चेहरे की मुस्कुराहट से मालुम होता है।
उन्होनें चुराया है जगहों को, उन्होनें छुपाया है किसी कोने में खुद के बदलाव को। अगर वो चाहते तो शायद वो भी कहीं खो जाते पर यही सोचने में उनको कई साल लगने वाले थे। क्या खुद को कोई खोने और बदलाव की आग में झुलसने से बचा सकता है? क्या कभी आपने बचाया है खुद को?
कई जगह के रहनवाज़ बने हैं वो और उन्हे इस बात की खुशी भी है। रात का आलम गहराया हुआ है। हर चीज़ खुद को अपने मे बसाये रखने की ताकत से भर गई है। ये ताकत कोई उनसे छीन नहीं सकता।
उन्होनें बमों की लड़ी लगाई और पाँच फिट की दूरी से उसमे आग लगा दी। थोड़ी ही देर में बस, एक वही उन आवाज़ों के बीच रहे बाकी कुछ भी नहीं दिख रहा था और ना ही सुनाई दे रहा था। दबादब एक के बाद एक, आवाज़ से पूरा इलाका भन्नाया हुआ था। लोग जहाँ उन आवाज़ों से भय कर रहे थे और वो उन आवाज़ों को अपनी ताकत मानकर उनके बीच में खड़े थे।
बमों की बरसात हो जाने के बाद बातें जैसे ही होती वो उनसे दूर हो जाते। ये तो उनका रोज़ाना का काम है इसके बारे में क्या सुनना?
"क्या आतीशबाज़ी है भई मज़ा आ गया।"
"ये होता है स्वागत। टॉप क्लास।"
जहाँ बराती और घराती के बीच इन ज़ुमलों को लेकर वाह-वाही बरसाई जा रही थी वहीं वो दूर खड़े बस, अपने काम से खुश होते नज़र आते। वो कहते हैं, "भई हम तो खुशी बाँटने का काम करते हैं। यही हमारा नेग है।"
सब लोग कानों पर हाथ रखे खड़े हैं। अभी उन्होनें दरवाजे के सामने एक बहुत बड़ी बमों की लड़ी लगाई हुई है। बरात के पास में आते ही वो उसे जलायेगे। ये दुल्हे के लिए है स्पेशल। दूल्हा घोड़ी पर होगा। तो वो लगभग दस फिट की दूरी से ही उसे जला देगें। जब तक दुल्हा घोड़ी से उतरेगा तब तक वो जलेगी।
बमों की लड़ी गोल धारे में लगाई है उन्होनें और बीच में चार अनार लगाये है। सबसे पहले वो बमों की लड़ी जलेगी उसके बाद में वो चार अनार, उसके बाद में चार आसमान में फटने वाले बड़े बम। ये आखिर में होगा। उसके बाद में दुल्हा अन्दर चला जायेगा और उनका काम ख़त्म हो जायेगा।
बात अगर कहीं अटकती है तो वो है सन 1980 में। ये उनका पुश्तैनी काम था। चर्चा हो या आतीशबाज़ी के लिए उनका कहीं पर परीचित होना। ये बहुत आम सी बात होती। उनके अब्बा के मन में बम को लेकर न जाने क्या बसा होता। मगर वो चाहते थे की सभी त्यौहारों को बम से रोशन किया जाये। खुशी में सभी को बम से सलूट किया जाये। चाहे वो शादी की खुशी हो या दीवाली का शुभअवसर। वे हमेशा उसी के लिए तैयार रहते।
बम बनाना उनका शौक था। इसी शौर के कारण उनके अब्बू ने उनका नाम ही आतीश रख दिया था। मगर इस शौक के लिए कभी कोई ठिकाना नहीं मिलता था।, दूर-दूर तक सभी इसकी आवाज़ से चौंक जाते थे। मन में होता था कि कोई ऐसा बम बनाया जाये जिसमे सारे रंग हो। वो जब चले तो पूरे अंधेरे को काट दे। एक ही बम हो मगर उसके जलने मे वो पाँच बार अपनी रोशनी फैलाये। उसके रंग हवा में ऐसे झूमे की वो सारी रात को दिन के रोशन उजाने में तब्दील करदे। इसी की चाहत में ये भी अपने इस काम मे अपने हाथ आज़माने के लिए उतर गए।
हर वक़्त मन होता था कामयाबी हासिल नही हुई। देखते-देखते तंगी उनके सिर पर नाचने लगी। अब अपने शौक को रिझाने का काम उनकी तकलीफ के कारण बन गया। वो हमेशा सोचते थे की इसका असर क्या है? वो अपने आसपास देखते थे तो उन्हे लगता था की कुछ चीज़ को हासिल करने का सवाल उनके मन में ही आता था। बाकि तो सभी उन दुनिया में लीन थे। लेकिन दिमाग की फसल ने साथ देने से मनाकर दिया और बम में रंग भरने की चाहत को अधूरे में ही छोड़कर जाना पड़ा।
उनके अब्बू के मन में तंगी और कामयाबी के सवाल कभी नहीं खरोंचते थे। वो उनको देखकर हर वक़्त अचम्भे में रहते। इतना हुनर है लेकिन कभी किसी बड़ी बम बनाने वाली दुकान पर काम नहीं करते। बस, खुद मे घुसे रहते हैं। किसी को अगर सिखाने के लिए बुलाते नहीं है तो कोई आ जाये तो उसे भगाते भी नहीं है। उनका चेहरा लोग याद रखते हैं मगर उनकी जगह को नहीं? ऐसा क्यों होता था उसका कभी वो रत्तीभर भी अहसास नहीं कर पाये थे। छोटे-छोटे कागज़ों के टुकड़े उनके इर्द-गिर्द पड़े रहते, रस्सियों के गुछ्छे भी उनके मसालो में सने रहते और साथ में हर रोज़ कोई नया ही उनके उन गोलों पर मसाला रगड़ रहा होता। उन्हे तो ये तक नहीं मालुम होता था कि आज उनके पास में कौन बैठा है?
आतीश कहते हैं, "मैं उनके इस ज़ज़्बे को कभी नहीं समझ पाया था और ना ही साते जन्म तक मैं समझ सकता था। उनसे तो कुछ पूछने का भी मन नहीं होता था। घर में मैं और उनके अलावा था ही कौन? लेकिन उनकी दुनिया तो अलग ही थी। मैं उनकी दुनिया में शामिल नहीं था या मैं उनकी दुनिया से निकल भागा था ये मेरी गलती है।
वो बमों की पटली कसते हुए बाहर की तरफ मे रवाना होने वाले थे। तभी शादी वाले घर से उन्हे किसी ने रोका और वो थोड़ी देर के लिए रूक गए।
हारा-थका हुआ मैं वापस पँहुचा ये उस बात से तकरीबन 2 से 3 साल पुरानी बात है। अब्बू वहीं थे। जिन लौंडों को मैं उनके पास छोड़कर गया था उनमे से मुझे कोई दिखा नहीं या हो सकता है मेरी ही निगाह उनमे से किसी को पहचान नहीं पा रही थी। मेरे हाथ मे कुछ नहीं था, हमारा घर जला हुआ था। एक तरफ की दीवार को समझों पूरी ही जल गई थी। समान तो अन्दर पूरा सही सलामत था। अब ये पूछना तो बेकार था की ये जला कैसे? बम की दुकान कितनी ही मजबूत हो लेकिन एक दिन जलती जरूर है। और ये तो बमो का घर था। अब्बू मे मेरी तरफ इशारा करते हुए मेरा हाल-पूछा। मैं सलाम कहकर उनकी बगल मे ही बैठ गया।
दिन में तो कुछ भी बातें नहीं हुई थी, बस मसालो की महक में पूरा दिन मेरी नाक की तरह से जल रहा था। अब्बू ने चार अनार निकाले और उन्हे जलाया। उसी की रोशनी मे उन्होनें मुझे कुछ पैसे पकड़ाये और कहा गिनों। मैंने उस अनार की रोशनी मे वो पैसे गिने। उन्होनें दूसरा अनार भी जलाया। उस रोशनी मे मैंने बिजली का बिल देखा। 7 हजार रूपये हो गया था।
हमारा घर अकेला था मेरठ में। उसके बाद तो बस, जगंल ही शुरू होता था। रात का खाना खाकर फिर रात में उन्होंने एक और बम जलाया, उसे देखकर तो मेरे होश ही उड़ गए। अब्बू ने वो बम बना लिया था जिसमे से सात रंग निकलते थे। भइवाह- क्या बात है।
उस दिन के बाद में मैं कभी काम पर नहीं गया। यहीं मेरठ में रह गया। अब दिल्ली आया हूँ तो आने का मज़ा ही कुछ और है। दिल्ली के चांदनी चौक के इलाके के पीछे सदर बाजार मे हमारी अपनी जगह है। वही पर मैं भी अब्बू की तरह से बम बनाता हूँ। अनपढ़ हूँ लेकिन मुझे लोग मास्टर जी कहते हैं।
इतनी पहचान है कि आसपास की सारी शादियों में मुझे ही बुक किया जाता है। पूरा पहाड़गंज, चांदनीचौक, दिल्लीगेट, बारहखम्बा रोड़ और भी जगहों पर। नाम गूंज रहा है। सब अल्लाह की मेहरबानी है और अब्बू का हाथ है सिर पर। दिवाली के लिए तो मैं स्पेश्ल बम बनाता हूँ। और सबसे पहले मैं ही उसकी शुरूआत अपनी दुकान से करता हूँ।
बात चाहें कहीं की कहीं पँहुच गई हो, मगर जो वो अपने अन्दर लिए घूम रहे थे वो छलक उठा था। इस मुलाकात का कोई ठोर-ठिकाना नहीं था। लेकिन इसकी बुनाई समय के धागों ने कर दी थी। हम तो पात्र थे जो किसी ऐसे क़िरदार को अपने बीच महसूस कर रहे थे जिसका कोई भी पहलू हम पकड़ ही नही सकते थे। बात का अन्त होना जरूरी नहीं था।
लख्मी
उन्होनें चुराया है जगहों को, उन्होनें छुपाया है किसी कोने में खुद के बदलाव को। अगर वो चाहते तो शायद वो भी कहीं खो जाते पर यही सोचने में उनको कई साल लगने वाले थे। क्या खुद को कोई खोने और बदलाव की आग में झुलसने से बचा सकता है? क्या कभी आपने बचाया है खुद को?
कई जगह के रहनवाज़ बने हैं वो और उन्हे इस बात की खुशी भी है। रात का आलम गहराया हुआ है। हर चीज़ खुद को अपने मे बसाये रखने की ताकत से भर गई है। ये ताकत कोई उनसे छीन नहीं सकता।
उन्होनें बमों की लड़ी लगाई और पाँच फिट की दूरी से उसमे आग लगा दी। थोड़ी ही देर में बस, एक वही उन आवाज़ों के बीच रहे बाकी कुछ भी नहीं दिख रहा था और ना ही सुनाई दे रहा था। दबादब एक के बाद एक, आवाज़ से पूरा इलाका भन्नाया हुआ था। लोग जहाँ उन आवाज़ों से भय कर रहे थे और वो उन आवाज़ों को अपनी ताकत मानकर उनके बीच में खड़े थे।
बमों की बरसात हो जाने के बाद बातें जैसे ही होती वो उनसे दूर हो जाते। ये तो उनका रोज़ाना का काम है इसके बारे में क्या सुनना?
"क्या आतीशबाज़ी है भई मज़ा आ गया।"
"ये होता है स्वागत। टॉप क्लास।"
जहाँ बराती और घराती के बीच इन ज़ुमलों को लेकर वाह-वाही बरसाई जा रही थी वहीं वो दूर खड़े बस, अपने काम से खुश होते नज़र आते। वो कहते हैं, "भई हम तो खुशी बाँटने का काम करते हैं। यही हमारा नेग है।"
सब लोग कानों पर हाथ रखे खड़े हैं। अभी उन्होनें दरवाजे के सामने एक बहुत बड़ी बमों की लड़ी लगाई हुई है। बरात के पास में आते ही वो उसे जलायेगे। ये दुल्हे के लिए है स्पेशल। दूल्हा घोड़ी पर होगा। तो वो लगभग दस फिट की दूरी से ही उसे जला देगें। जब तक दुल्हा घोड़ी से उतरेगा तब तक वो जलेगी।
बमों की लड़ी गोल धारे में लगाई है उन्होनें और बीच में चार अनार लगाये है। सबसे पहले वो बमों की लड़ी जलेगी उसके बाद में वो चार अनार, उसके बाद में चार आसमान में फटने वाले बड़े बम। ये आखिर में होगा। उसके बाद में दुल्हा अन्दर चला जायेगा और उनका काम ख़त्म हो जायेगा।
बात अगर कहीं अटकती है तो वो है सन 1980 में। ये उनका पुश्तैनी काम था। चर्चा हो या आतीशबाज़ी के लिए उनका कहीं पर परीचित होना। ये बहुत आम सी बात होती। उनके अब्बा के मन में बम को लेकर न जाने क्या बसा होता। मगर वो चाहते थे की सभी त्यौहारों को बम से रोशन किया जाये। खुशी में सभी को बम से सलूट किया जाये। चाहे वो शादी की खुशी हो या दीवाली का शुभअवसर। वे हमेशा उसी के लिए तैयार रहते।
बम बनाना उनका शौक था। इसी शौर के कारण उनके अब्बू ने उनका नाम ही आतीश रख दिया था। मगर इस शौक के लिए कभी कोई ठिकाना नहीं मिलता था।, दूर-दूर तक सभी इसकी आवाज़ से चौंक जाते थे। मन में होता था कि कोई ऐसा बम बनाया जाये जिसमे सारे रंग हो। वो जब चले तो पूरे अंधेरे को काट दे। एक ही बम हो मगर उसके जलने मे वो पाँच बार अपनी रोशनी फैलाये। उसके रंग हवा में ऐसे झूमे की वो सारी रात को दिन के रोशन उजाने में तब्दील करदे। इसी की चाहत में ये भी अपने इस काम मे अपने हाथ आज़माने के लिए उतर गए।
हर वक़्त मन होता था कामयाबी हासिल नही हुई। देखते-देखते तंगी उनके सिर पर नाचने लगी। अब अपने शौक को रिझाने का काम उनकी तकलीफ के कारण बन गया। वो हमेशा सोचते थे की इसका असर क्या है? वो अपने आसपास देखते थे तो उन्हे लगता था की कुछ चीज़ को हासिल करने का सवाल उनके मन में ही आता था। बाकि तो सभी उन दुनिया में लीन थे। लेकिन दिमाग की फसल ने साथ देने से मनाकर दिया और बम में रंग भरने की चाहत को अधूरे में ही छोड़कर जाना पड़ा।
उनके अब्बू के मन में तंगी और कामयाबी के सवाल कभी नहीं खरोंचते थे। वो उनको देखकर हर वक़्त अचम्भे में रहते। इतना हुनर है लेकिन कभी किसी बड़ी बम बनाने वाली दुकान पर काम नहीं करते। बस, खुद मे घुसे रहते हैं। किसी को अगर सिखाने के लिए बुलाते नहीं है तो कोई आ जाये तो उसे भगाते भी नहीं है। उनका चेहरा लोग याद रखते हैं मगर उनकी जगह को नहीं? ऐसा क्यों होता था उसका कभी वो रत्तीभर भी अहसास नहीं कर पाये थे। छोटे-छोटे कागज़ों के टुकड़े उनके इर्द-गिर्द पड़े रहते, रस्सियों के गुछ्छे भी उनके मसालो में सने रहते और साथ में हर रोज़ कोई नया ही उनके उन गोलों पर मसाला रगड़ रहा होता। उन्हे तो ये तक नहीं मालुम होता था कि आज उनके पास में कौन बैठा है?
आतीश कहते हैं, "मैं उनके इस ज़ज़्बे को कभी नहीं समझ पाया था और ना ही साते जन्म तक मैं समझ सकता था। उनसे तो कुछ पूछने का भी मन नहीं होता था। घर में मैं और उनके अलावा था ही कौन? लेकिन उनकी दुनिया तो अलग ही थी। मैं उनकी दुनिया में शामिल नहीं था या मैं उनकी दुनिया से निकल भागा था ये मेरी गलती है।
वो बमों की पटली कसते हुए बाहर की तरफ मे रवाना होने वाले थे। तभी शादी वाले घर से उन्हे किसी ने रोका और वो थोड़ी देर के लिए रूक गए।
हारा-थका हुआ मैं वापस पँहुचा ये उस बात से तकरीबन 2 से 3 साल पुरानी बात है। अब्बू वहीं थे। जिन लौंडों को मैं उनके पास छोड़कर गया था उनमे से मुझे कोई दिखा नहीं या हो सकता है मेरी ही निगाह उनमे से किसी को पहचान नहीं पा रही थी। मेरे हाथ मे कुछ नहीं था, हमारा घर जला हुआ था। एक तरफ की दीवार को समझों पूरी ही जल गई थी। समान तो अन्दर पूरा सही सलामत था। अब ये पूछना तो बेकार था की ये जला कैसे? बम की दुकान कितनी ही मजबूत हो लेकिन एक दिन जलती जरूर है। और ये तो बमो का घर था। अब्बू मे मेरी तरफ इशारा करते हुए मेरा हाल-पूछा। मैं सलाम कहकर उनकी बगल मे ही बैठ गया।
दिन में तो कुछ भी बातें नहीं हुई थी, बस मसालो की महक में पूरा दिन मेरी नाक की तरह से जल रहा था। अब्बू ने चार अनार निकाले और उन्हे जलाया। उसी की रोशनी मे उन्होनें मुझे कुछ पैसे पकड़ाये और कहा गिनों। मैंने उस अनार की रोशनी मे वो पैसे गिने। उन्होनें दूसरा अनार भी जलाया। उस रोशनी मे मैंने बिजली का बिल देखा। 7 हजार रूपये हो गया था।
हमारा घर अकेला था मेरठ में। उसके बाद तो बस, जगंल ही शुरू होता था। रात का खाना खाकर फिर रात में उन्होंने एक और बम जलाया, उसे देखकर तो मेरे होश ही उड़ गए। अब्बू ने वो बम बना लिया था जिसमे से सात रंग निकलते थे। भइवाह- क्या बात है।
उस दिन के बाद में मैं कभी काम पर नहीं गया। यहीं मेरठ में रह गया। अब दिल्ली आया हूँ तो आने का मज़ा ही कुछ और है। दिल्ली के चांदनी चौक के इलाके के पीछे सदर बाजार मे हमारी अपनी जगह है। वही पर मैं भी अब्बू की तरह से बम बनाता हूँ। अनपढ़ हूँ लेकिन मुझे लोग मास्टर जी कहते हैं।
इतनी पहचान है कि आसपास की सारी शादियों में मुझे ही बुक किया जाता है। पूरा पहाड़गंज, चांदनीचौक, दिल्लीगेट, बारहखम्बा रोड़ और भी जगहों पर। नाम गूंज रहा है। सब अल्लाह की मेहरबानी है और अब्बू का हाथ है सिर पर। दिवाली के लिए तो मैं स्पेश्ल बम बनाता हूँ। और सबसे पहले मैं ही उसकी शुरूआत अपनी दुकान से करता हूँ।
बात चाहें कहीं की कहीं पँहुच गई हो, मगर जो वो अपने अन्दर लिए घूम रहे थे वो छलक उठा था। इस मुलाकात का कोई ठोर-ठिकाना नहीं था। लेकिन इसकी बुनाई समय के धागों ने कर दी थी। हम तो पात्र थे जो किसी ऐसे क़िरदार को अपने बीच महसूस कर रहे थे जिसका कोई भी पहलू हम पकड़ ही नही सकते थे। बात का अन्त होना जरूरी नहीं था।
लख्मी
दुनिया से बातें...
वक़्त मे बहती यादों के साथ लड़ने के लिए कहीं खड़ा है आदमी।
जिसे भूलने से डरता है उसी को दोहराता है आदमी।
एक आदमी काम करके रोज़ थक जाया करता था।
कहीं थककर बैठकर किसी न किसी से बतिआया करता था।
शाम के पानी आने वक़्त हो चला था। गिरधर जी रोज़ाना की ही तरह से पानी के इंतजार में तैयार खड़े थे। पानी भरना तो उनका एक बड़ा ही खूबसूरत बहाना है। वो उस समूह से मिलने की कोशिश में हमेशा रहते जिसे वो दूर ही दूर से चाहने लगे थे। एक बार कोई जरा कहदे की वो गुट आज यहाँ आने वाला है बस, वो सारे काम-वाम छोड़कर उनका किसी प्रेमिका की तरह से इंतजार किया करते। उन्हे उसी में मज़ा आता था।
ये गुट था जगह-जगह पर जाकर कुछ किताबें पढ़ने के लिए बाँटने वाला। चाहें वे किसी धर्म की हो या फिर किसी आस्था की, वे शहरों मे इन किताबों के पाठक तलाशते थे। कभी सड़क के किनारे खड़े हो जाते तो कभी जानने वालो के जरिये उनके जानने वालो के घर में चले जाते। बस, इस किताब के बारे में कभी कहते तो कभी इंसानी नितियों और चलने के बारे में गहरी बातें करते पाठकों के मनों को क्षुक्क्षम करते। लेकिन किताबों की चाहत उनके मन में हमेशा ताज़ी रहती। उनकी इन कोशिशों से आसपास को देखने का मन बहुत रोशन हो जाता।
अनेकों लोगों से खूब बातें करना और उनको किताबों के बारे में बोलना। यही काम भाता था गिरधर जी को। वे किताबों के रक्षक हैं, ये कहना बहुत अटपटा लगता है लेकिन लोग उन्हे ऐसा कहते हैं। उन्हे हर तरह कि किताबों को जमा करने में बेहद सुख मिलता है। किताबों के लिए उनका उतावलापन देखने से बनता है। कभी-कभी तो किसी कबाड़ जमा करने वाले के साथ बैठे मिलते हैं।
उनकी गली के बाहर थोड़ी पास में ही एक कबाड़ी की दुकान है। उनके यहाँ पर हर हफ्ते में दो बार रद्दी आती है। वो उन बोरियों मे घुसे रहते हैं। अगर उसमे कोई पढ़ने लायक किताब मिल जाये तो उसे वे फौरन रख लेते हैं और अपनी झोली के वज़न मे बढ़ोत्तरी कर लेते है।
वो सरकारी नौकरी करते थे, अपनी हर तंख़्वया पर उनका किसी न किसी किताब का घर में लाना तो तय रहता था। उन्हे सबसे ज़्यादा अगर कुछ पसंद था तो वो था, लोकगीतों की किताबों को पढ़ना। उनका मानना था की वो किताबें जो कहीं नहीं पढ़ी जाती वो अक्सर कबाड़ी के थैलो में मिल जाती है। उनके पास अपने घर में भरमार है किताबों की, लेकिन इस भागदौड़ में वो किसी कौने में पढ़ी है तो कभी कोइ पढ़ने ले गया तो वापस ही नहीं आता।
एक बार वो कह रहे थे, "किताबें किसी फोटोएल्बम से कम नहीं होती एक बार कोई ले गया तो वापस ही नहीं लाता। अपने पसंद की कोई न कोई चीज़ वो रख लेता है।"
पानी के चक्कर मे वो काफी देर तक वहीं खड़े रहे। काम करना तो अब बन्द हो गया है और किताबें लेना भी तो उन्ही गुट के इंतजार मे लगे रहते हैं। छोटी-छोटी कहानियों में बसते ज्ञान और संतुष्टी की बातें उनको भाने लगी हैं।
आने वाले समय मे क्या रह जायेगा?, आने वाला समय कैसा होगा?, हम जो कर रहे हैं वो आखिर में क्या है? इंसान के लिए आखिर में क्या रहने वाला है? हमारा आज किसी तरह की ओर है? और हमारे कहने-सुनने और संगत बनाने में हमें क्या अभी सोचना बाकी है?
इन सवालों से वो किताबें भरी रहती हैं। इन सवालों के हल क्या हैं उसे सोचने से पहले उन कहानियों मे जो लोग हैं उन्हे ढूँढना ही किसी शिकार की तरह है। उनको चश्का लगा है इन सवालों से अब सभी को देखने का। वो जो अभी तक देख पाये हैं वो क्या था? और उनको अभी और क्या देखने को मिलने वाला है? वे बेहद खुश होते हैं जब वे उन किताबों से पहले उन गुट में से किसी एक से भी बात कर लेते हैं तो।
एक बार उन्ही में से एक शख़्स से बात हुई वो आदमी दीन-धर्म और दुनिया के रचने के बारे में बता रहा था। गिरधर जी को उस आदमी की बोली बहुत मीठी लगी। इतने प्यार से कोई दुनिया को बताता है क्या? और इतने प्यार से कोई दुनिया क्या हो जायेगी ये कहता है क्या? गिरधर जी सब कुछ उतनी ही उदारता से सुन रहे थे जितने स्नेह से वो आदमी बता रहा था।
वो बोला, "आपको पता है दुनिया का जब अन्त होगा तो कौन लोग बचेगें?, आपको पता है जब ऊपर वाला नीचे आयेगा तो कौन उनका सामना कर पायेगें?
क्या आपको पता है कि अगर आपसे कहे की आप दुनिया को दोबारा से बनाओ तो आप कैसे बनाओगे और आपकी दुनिया मे कौन लोग होगें?"
गिरधर जी उनको भौचक्के से निहार रहे थे। उनके हाथों में एक मोटी सी किताब थी। गिरधर जी नज़र उसी पर टीकी थी। वे आदमी बीच-बीच में उस किताब को खोलता और एक सवाल उनके सपूत कर देता। शायद ही उस आदमी को भी पता होगा की इन सवालों का अर्थ क्या है?
गिरधर जी बोले, "क्या मैं बिना रिश्तेदारों के दुनिया को सोच सकता हूँ? क्या मैं बिना काम के सोच सकता हूँ? ये ही तो दुविधा है की मैं मरने के बाद ही ये सब सो पाउँगा, अगर मैं इसी दुनिया में वापस आऊँगा तो दुनिया बनाने में मज़ा ही क्या है? मैं भी कभी-कभ सोचता हूँ की कितनों के सपनों मे भगवान दर्शन दे जाते हैं मैं इतनी कोशिश करता हूँ लेकिन मेरे सपनों में वो एक बार भी नहीं आये। मुझसे कुछ नहीं कहते।"
वो आदमी बोला, "ऊपर वाले की कोई आवाज़ नहीं है, ये सब आपकी खुद की आवाज़ है। जो आप सुनना चाहोगें, करना चाहोगे। उसी मे ऊपर वाला आपके साथ होगा। बस, वो काम और बात कहने और करने वाली होनी चाहिये।"
गिरधर जी बोले, "मुझे नौकरी करते हुए 30 साल होने वाले हैं। मैंने बहुत सारे काम किये उनमे मैंने जो अपने मन से किये उनकी तो गिनती ही नहीं है। उसे कौन पूछता है, वो सब तो भूलने के लिए होते हैं। ये भी सब पढ़कर और सुनकर भूल जायेगें।"
वो आदमी बोला, "हम आपको ये किताब देते हैं, इसे पढ़कर आप नहीं भूलेगे। मगर हाँ आपको इस किताब को मन से पढ़ना होगा।"
गिरधर जी बोले, "हाँ मैं बहुत दिल से पढूँगा।"
गिरधर जी ने उस किताब को अपने माथे से लगाया और उसे अपने गोद में रख लिया। वो दिन है और आज का दिन है। गिरधर जी के पास ना जाने कितनी किताबे हो गई हैं। ये पहली किताब थी, आज उनके पास में बहुत सारी किताबे हैं और किताबें खोजने का चश्का बड़ गया है। वो भी उनके साथ मे किताबों के बारे लोगों से बातें करने के लिए जाते हैं। उनके पास किताबों में खाली सवाल ही नहीं बल्की वो बातें करने की चाहत भी है जिसके चलते वे इस पाठकों की दुनिया में शामिल हुए हैं।
कहते हैं, "लोगों से उन सवालों पर बातें करने में मज़ा आता है जिनके बारे में उन्हे पता नहीं है लेकिन उस सवाल के आने पर वो डर जरूर जाते हैं। कुछ बहस पर अड़ जाते हैं। कहते है हम तो ऐसे ही ठीक है, कुछ किताब को हाथ में लेने से डरते हैं, कुछ खाम्खा में कहते हैं आपने देखी है दुनिया तो कोई कहते है सब कुछ यहीं पर रख है। इतनी लाइनें सुनी है इस गुट मे शामिल होकर की डर से कैसे छुटा जाता है वो समझ में आया है।
उनका आज भी पाठक तलाश्ने का का जारी है। आपको वो कहीं भी मिल सकते हैं। किसी के घर में, गली में, सड़क पर, पार्क में, बस में या फिर आपके खुद के घर में।
लख्मी
जिसे भूलने से डरता है उसी को दोहराता है आदमी।
एक आदमी काम करके रोज़ थक जाया करता था।
कहीं थककर बैठकर किसी न किसी से बतिआया करता था।
शाम के पानी आने वक़्त हो चला था। गिरधर जी रोज़ाना की ही तरह से पानी के इंतजार में तैयार खड़े थे। पानी भरना तो उनका एक बड़ा ही खूबसूरत बहाना है। वो उस समूह से मिलने की कोशिश में हमेशा रहते जिसे वो दूर ही दूर से चाहने लगे थे। एक बार कोई जरा कहदे की वो गुट आज यहाँ आने वाला है बस, वो सारे काम-वाम छोड़कर उनका किसी प्रेमिका की तरह से इंतजार किया करते। उन्हे उसी में मज़ा आता था।
ये गुट था जगह-जगह पर जाकर कुछ किताबें पढ़ने के लिए बाँटने वाला। चाहें वे किसी धर्म की हो या फिर किसी आस्था की, वे शहरों मे इन किताबों के पाठक तलाशते थे। कभी सड़क के किनारे खड़े हो जाते तो कभी जानने वालो के जरिये उनके जानने वालो के घर में चले जाते। बस, इस किताब के बारे में कभी कहते तो कभी इंसानी नितियों और चलने के बारे में गहरी बातें करते पाठकों के मनों को क्षुक्क्षम करते। लेकिन किताबों की चाहत उनके मन में हमेशा ताज़ी रहती। उनकी इन कोशिशों से आसपास को देखने का मन बहुत रोशन हो जाता।
अनेकों लोगों से खूब बातें करना और उनको किताबों के बारे में बोलना। यही काम भाता था गिरधर जी को। वे किताबों के रक्षक हैं, ये कहना बहुत अटपटा लगता है लेकिन लोग उन्हे ऐसा कहते हैं। उन्हे हर तरह कि किताबों को जमा करने में बेहद सुख मिलता है। किताबों के लिए उनका उतावलापन देखने से बनता है। कभी-कभी तो किसी कबाड़ जमा करने वाले के साथ बैठे मिलते हैं।
उनकी गली के बाहर थोड़ी पास में ही एक कबाड़ी की दुकान है। उनके यहाँ पर हर हफ्ते में दो बार रद्दी आती है। वो उन बोरियों मे घुसे रहते हैं। अगर उसमे कोई पढ़ने लायक किताब मिल जाये तो उसे वे फौरन रख लेते हैं और अपनी झोली के वज़न मे बढ़ोत्तरी कर लेते है।
वो सरकारी नौकरी करते थे, अपनी हर तंख़्वया पर उनका किसी न किसी किताब का घर में लाना तो तय रहता था। उन्हे सबसे ज़्यादा अगर कुछ पसंद था तो वो था, लोकगीतों की किताबों को पढ़ना। उनका मानना था की वो किताबें जो कहीं नहीं पढ़ी जाती वो अक्सर कबाड़ी के थैलो में मिल जाती है। उनके पास अपने घर में भरमार है किताबों की, लेकिन इस भागदौड़ में वो किसी कौने में पढ़ी है तो कभी कोइ पढ़ने ले गया तो वापस ही नहीं आता।
एक बार वो कह रहे थे, "किताबें किसी फोटोएल्बम से कम नहीं होती एक बार कोई ले गया तो वापस ही नहीं लाता। अपने पसंद की कोई न कोई चीज़ वो रख लेता है।"
पानी के चक्कर मे वो काफी देर तक वहीं खड़े रहे। काम करना तो अब बन्द हो गया है और किताबें लेना भी तो उन्ही गुट के इंतजार मे लगे रहते हैं। छोटी-छोटी कहानियों में बसते ज्ञान और संतुष्टी की बातें उनको भाने लगी हैं।
आने वाले समय मे क्या रह जायेगा?, आने वाला समय कैसा होगा?, हम जो कर रहे हैं वो आखिर में क्या है? इंसान के लिए आखिर में क्या रहने वाला है? हमारा आज किसी तरह की ओर है? और हमारे कहने-सुनने और संगत बनाने में हमें क्या अभी सोचना बाकी है?
इन सवालों से वो किताबें भरी रहती हैं। इन सवालों के हल क्या हैं उसे सोचने से पहले उन कहानियों मे जो लोग हैं उन्हे ढूँढना ही किसी शिकार की तरह है। उनको चश्का लगा है इन सवालों से अब सभी को देखने का। वो जो अभी तक देख पाये हैं वो क्या था? और उनको अभी और क्या देखने को मिलने वाला है? वे बेहद खुश होते हैं जब वे उन किताबों से पहले उन गुट में से किसी एक से भी बात कर लेते हैं तो।
एक बार उन्ही में से एक शख़्स से बात हुई वो आदमी दीन-धर्म और दुनिया के रचने के बारे में बता रहा था। गिरधर जी को उस आदमी की बोली बहुत मीठी लगी। इतने प्यार से कोई दुनिया को बताता है क्या? और इतने प्यार से कोई दुनिया क्या हो जायेगी ये कहता है क्या? गिरधर जी सब कुछ उतनी ही उदारता से सुन रहे थे जितने स्नेह से वो आदमी बता रहा था।
वो बोला, "आपको पता है दुनिया का जब अन्त होगा तो कौन लोग बचेगें?, आपको पता है जब ऊपर वाला नीचे आयेगा तो कौन उनका सामना कर पायेगें?
क्या आपको पता है कि अगर आपसे कहे की आप दुनिया को दोबारा से बनाओ तो आप कैसे बनाओगे और आपकी दुनिया मे कौन लोग होगें?"
गिरधर जी उनको भौचक्के से निहार रहे थे। उनके हाथों में एक मोटी सी किताब थी। गिरधर जी नज़र उसी पर टीकी थी। वे आदमी बीच-बीच में उस किताब को खोलता और एक सवाल उनके सपूत कर देता। शायद ही उस आदमी को भी पता होगा की इन सवालों का अर्थ क्या है?
गिरधर जी बोले, "क्या मैं बिना रिश्तेदारों के दुनिया को सोच सकता हूँ? क्या मैं बिना काम के सोच सकता हूँ? ये ही तो दुविधा है की मैं मरने के बाद ही ये सब सो पाउँगा, अगर मैं इसी दुनिया में वापस आऊँगा तो दुनिया बनाने में मज़ा ही क्या है? मैं भी कभी-कभ सोचता हूँ की कितनों के सपनों मे भगवान दर्शन दे जाते हैं मैं इतनी कोशिश करता हूँ लेकिन मेरे सपनों में वो एक बार भी नहीं आये। मुझसे कुछ नहीं कहते।"
वो आदमी बोला, "ऊपर वाले की कोई आवाज़ नहीं है, ये सब आपकी खुद की आवाज़ है। जो आप सुनना चाहोगें, करना चाहोगे। उसी मे ऊपर वाला आपके साथ होगा। बस, वो काम और बात कहने और करने वाली होनी चाहिये।"
गिरधर जी बोले, "मुझे नौकरी करते हुए 30 साल होने वाले हैं। मैंने बहुत सारे काम किये उनमे मैंने जो अपने मन से किये उनकी तो गिनती ही नहीं है। उसे कौन पूछता है, वो सब तो भूलने के लिए होते हैं। ये भी सब पढ़कर और सुनकर भूल जायेगें।"
वो आदमी बोला, "हम आपको ये किताब देते हैं, इसे पढ़कर आप नहीं भूलेगे। मगर हाँ आपको इस किताब को मन से पढ़ना होगा।"
गिरधर जी बोले, "हाँ मैं बहुत दिल से पढूँगा।"
गिरधर जी ने उस किताब को अपने माथे से लगाया और उसे अपने गोद में रख लिया। वो दिन है और आज का दिन है। गिरधर जी के पास ना जाने कितनी किताबे हो गई हैं। ये पहली किताब थी, आज उनके पास में बहुत सारी किताबे हैं और किताबें खोजने का चश्का बड़ गया है। वो भी उनके साथ मे किताबों के बारे लोगों से बातें करने के लिए जाते हैं। उनके पास किताबों में खाली सवाल ही नहीं बल्की वो बातें करने की चाहत भी है जिसके चलते वे इस पाठकों की दुनिया में शामिल हुए हैं।
कहते हैं, "लोगों से उन सवालों पर बातें करने में मज़ा आता है जिनके बारे में उन्हे पता नहीं है लेकिन उस सवाल के आने पर वो डर जरूर जाते हैं। कुछ बहस पर अड़ जाते हैं। कहते है हम तो ऐसे ही ठीक है, कुछ किताब को हाथ में लेने से डरते हैं, कुछ खाम्खा में कहते हैं आपने देखी है दुनिया तो कोई कहते है सब कुछ यहीं पर रख है। इतनी लाइनें सुनी है इस गुट मे शामिल होकर की डर से कैसे छुटा जाता है वो समझ में आया है।
उनका आज भी पाठक तलाश्ने का का जारी है। आपको वो कहीं भी मिल सकते हैं। किसी के घर में, गली में, सड़क पर, पार्क में, बस में या फिर आपके खुद के घर में।
लख्मी
महीने का वो 1500 रूपये
गली में आज बड़ा शोर मचा था। गली के बीच से होते हुए लोग निकल रहे थे। जगमगाती शाम ने अभी सूरमा लगाया था। इसलिये कोना-कोना सलेटी रंग से भर गया था। रोजाना की तरह गली-गली में संजती सँवरती लोगों की ये शामें आज कुछ ज़्यादा ही बेताब लग रही थी । गली के दोनों और दो मंजिला-तीन मंजिला मकानो से ढेरों रोशनियाँ बाहर झाँक रही थी ।
वो दरवाजा आज बन्द क्यों था जो रोजाना खुला रहता था। ये संदेह मुझे बैचेन कर रहा था। दरवाजे के बाहर जब कोई आँख लगा कर छेद में से अन्दर देखता तो अन्दर के कमरे का सारा नक्शा ही बदल जाता ।
"कौन है वहाँ" ये आवाज़ मन की स्थिरता को तोड़ देती। वो आवाज़ के साथ ही दरवाज़े की कुण्डी खोलकर बाहर देखने लगता पर उसे वहाँ कोई भी नज़र नहीं आता। जरा सा सहम कर वो चूपचाप वापस चला जाता। जो अभी आया वो राजेश था। जिसने सक-पकाकर दरवाजा खोला । फिर तीव्रता से नज़र घुमाकर वो दरवाजा बन्द कर गया।कई दिनों से वो हॉउस बॉय बनके प्रराईवेट नौकरी कर रहा है। वो अपनी बहन के यहाँ खूराकी यानी खाना-पिना रहना ये सब देकर रहता है । महीने का वो 1500 रूपये देता है। उसे कभी भी वक़्त नहीं मिलता की वो अकेले मे कोई फिल्म देख पाता ।
इसलिये कई मौको की तलाश में वो रोज़ाना चूक जाता था। उस रोज वो इस मौके का फायदा उठा रहा था । दरवाजे पर हुइ दस्तक से वो बाहर आकर देखने लगा। शायद उसका वहम था। राजेश इस बात को मज़ाक समझ कर दरवाजा बन्द कर के चला गया पर दोबारा किसी ने दरवाजे के बहार से छेद में से देखने की कोशिश की दरवाजे पर चल रही खुसर-फुसर को सुनकर राजेश फिर आ पहुँचा दरवाजा खोला- दाँय-बाय कोई नहीं था। बस, एक बिल्ली का बच्चा बैठा था। राजेश को पता लग गया की कोई जान गया है की अन्दर क्या हो रहा है । मगर मजबूर था । अपने साथ किसी और को अन्दर बुला भी नहीं सकता था।
क्योंकि गली के सारे लड़के उस के अच्छे दोस्त थे पर अच्छे दोस्तों से भी वो आज बीएफ फिल्म देख रहा था। जब सब को पता था की बीएफ फिल्में क्या है और कहाँ से मिलती है? तो भी सब अपने बीच ये बात खुलने ही नहीं देते की सब जानते हैं की बीएफ फिल्म क्या होती है?
नज़रों से कैसे छुप जाता है ये अदा ही राजेश को अब तक बचाए थी । सब की आँखों में एक निहायती शरीफ बनके रहने के बाद भी इन फिल्मों का मज़ा लेता था। ये फिल्म मे उस की थकान उतार देती थी । जिनके नीचे बैठकर वो अपने को हल्का महसूस करता था। काश वो ये समझ पाता की वो किस दिशा में जा रहा है । पर उस की ये नसमझी ही तो उसे इस शहर मे काम करने की थकावट से मुक्त कर देती थी। जब वो दफ्तर से छूट कर घर आ जाता तो मारे थकावट के बदन टूट जाता। घर में टीवी के कान मरोड़ ने वाले और भी दर्शक होते थे। इसलिये उसे अवसर ही नहीं मिलता था। कि वो आराम पा सकें। इसलिये आज का मौका वो हाथों से जाने नहीं देना चाहता था।
बाहर आकर वो मुस्कराया फिर दरवाज़े को बन्द कर के चला गया। हाथ में रिर्मोट लेकर वो फिर अन्दर ही बैठ गया ।वहाँ तो अग्रेजी फिल्म चल रही थी । उस जगह रोज़ ऐसा नहीं होता था बहुत दिनों से राजेश फिल्म देखने का विचार बना रहा था पर एक अच्छे मौके की उसे तलाश था। टीवी का वॉलियम कम था ताकी बाहर आवाज न जा सके । लेकिन ऐसा नहीं था की सुनना मूश्किल लग रहा हो । कम ही सही पर कुछ तो था जो फिल्म के सीन के साथ में चलती आवाज़ से समझ में आ रहा था।
वो बीएफ फिल्म देख रहे हैं। दरवाज़े पर झूलकर गली के लड़के फिल्म पर आँख लगाये खडे थे। फ्रीज़ के ऊपर ही टीवी और उस पर सीडी प्लेयर रखा था जिसके ठीक सामने राजेश बैठा रिंर्मोट से फिल्म को कभी रोकता तो कभी चलाता। वो कमरे में अकेला नहीं था उस का साथी जो उस के साथ वहाँ बैठा था। दोनों के चेहरे पर अजीब सा भाव दिख रहा था । जो न पूरा डर था न ही खुशी मान लिजिये की वो इन दोनों का कॉमिनेशन था।
कोई आ न जाये वरना सारा भाँडा फूट जायेगा। इस बेचैनी में फिल्म का असली मज़ा भी जा रहा था। बार- बार कोई परेशान कर रहा था। इस बार कोई और नहीं मैं ही था जो दरवाजे पर खड़ा था।
"क्या हुआ राजेश?” दरवाजे के खुलते ही मैनें सवाल किया । राजेश ने दाँय-बाय देखा और मुझे अन्दर बुला कर लाया । मैनें कमरे की गर्मी को महसूस कर के फिर पूछा, “ बाहर दरवाजे पर बडी लाईन लगी थी क्या हुआ?”
वो बोला, "कुछ नहीं हम लोग तो अपना मनोरंजन कर रहे थे।"
तब मुझे लगा की कोई तो बात है। सब कुछ जानने के बाद राजेश के अन्दर का वो शख़्स जो अब तक चाँद की तरह बादलों में छूपा था। वो नज़र आ गया पर घर के सारे लोगों से उस ने ये बातें न बताई थी। राजेश को उस वक्त मेरी हमदर्दी की जरूरत थी मैं उसे देख कर मुस्कूराए जा रहा था। मुझे देख कर पहले ही उसने सारी वीसीडी दूबका दी थी। मैं जान गया था मगर फिर भी अन्जान बना रहा।
राकेश
वो दरवाजा आज बन्द क्यों था जो रोजाना खुला रहता था। ये संदेह मुझे बैचेन कर रहा था। दरवाजे के बाहर जब कोई आँख लगा कर छेद में से अन्दर देखता तो अन्दर के कमरे का सारा नक्शा ही बदल जाता ।
"कौन है वहाँ" ये आवाज़ मन की स्थिरता को तोड़ देती। वो आवाज़ के साथ ही दरवाज़े की कुण्डी खोलकर बाहर देखने लगता पर उसे वहाँ कोई भी नज़र नहीं आता। जरा सा सहम कर वो चूपचाप वापस चला जाता। जो अभी आया वो राजेश था। जिसने सक-पकाकर दरवाजा खोला । फिर तीव्रता से नज़र घुमाकर वो दरवाजा बन्द कर गया।कई दिनों से वो हॉउस बॉय बनके प्रराईवेट नौकरी कर रहा है। वो अपनी बहन के यहाँ खूराकी यानी खाना-पिना रहना ये सब देकर रहता है । महीने का वो 1500 रूपये देता है। उसे कभी भी वक़्त नहीं मिलता की वो अकेले मे कोई फिल्म देख पाता ।
इसलिये कई मौको की तलाश में वो रोज़ाना चूक जाता था। उस रोज वो इस मौके का फायदा उठा रहा था । दरवाजे पर हुइ दस्तक से वो बाहर आकर देखने लगा। शायद उसका वहम था। राजेश इस बात को मज़ाक समझ कर दरवाजा बन्द कर के चला गया पर दोबारा किसी ने दरवाजे के बहार से छेद में से देखने की कोशिश की दरवाजे पर चल रही खुसर-फुसर को सुनकर राजेश फिर आ पहुँचा दरवाजा खोला- दाँय-बाय कोई नहीं था। बस, एक बिल्ली का बच्चा बैठा था। राजेश को पता लग गया की कोई जान गया है की अन्दर क्या हो रहा है । मगर मजबूर था । अपने साथ किसी और को अन्दर बुला भी नहीं सकता था।
क्योंकि गली के सारे लड़के उस के अच्छे दोस्त थे पर अच्छे दोस्तों से भी वो आज बीएफ फिल्म देख रहा था। जब सब को पता था की बीएफ फिल्में क्या है और कहाँ से मिलती है? तो भी सब अपने बीच ये बात खुलने ही नहीं देते की सब जानते हैं की बीएफ फिल्म क्या होती है?
नज़रों से कैसे छुप जाता है ये अदा ही राजेश को अब तक बचाए थी । सब की आँखों में एक निहायती शरीफ बनके रहने के बाद भी इन फिल्मों का मज़ा लेता था। ये फिल्म मे उस की थकान उतार देती थी । जिनके नीचे बैठकर वो अपने को हल्का महसूस करता था। काश वो ये समझ पाता की वो किस दिशा में जा रहा है । पर उस की ये नसमझी ही तो उसे इस शहर मे काम करने की थकावट से मुक्त कर देती थी। जब वो दफ्तर से छूट कर घर आ जाता तो मारे थकावट के बदन टूट जाता। घर में टीवी के कान मरोड़ ने वाले और भी दर्शक होते थे। इसलिये उसे अवसर ही नहीं मिलता था। कि वो आराम पा सकें। इसलिये आज का मौका वो हाथों से जाने नहीं देना चाहता था।
बाहर आकर वो मुस्कराया फिर दरवाज़े को बन्द कर के चला गया। हाथ में रिर्मोट लेकर वो फिर अन्दर ही बैठ गया ।वहाँ तो अग्रेजी फिल्म चल रही थी । उस जगह रोज़ ऐसा नहीं होता था बहुत दिनों से राजेश फिल्म देखने का विचार बना रहा था पर एक अच्छे मौके की उसे तलाश था। टीवी का वॉलियम कम था ताकी बाहर आवाज न जा सके । लेकिन ऐसा नहीं था की सुनना मूश्किल लग रहा हो । कम ही सही पर कुछ तो था जो फिल्म के सीन के साथ में चलती आवाज़ से समझ में आ रहा था।
वो बीएफ फिल्म देख रहे हैं। दरवाज़े पर झूलकर गली के लड़के फिल्म पर आँख लगाये खडे थे। फ्रीज़ के ऊपर ही टीवी और उस पर सीडी प्लेयर रखा था जिसके ठीक सामने राजेश बैठा रिंर्मोट से फिल्म को कभी रोकता तो कभी चलाता। वो कमरे में अकेला नहीं था उस का साथी जो उस के साथ वहाँ बैठा था। दोनों के चेहरे पर अजीब सा भाव दिख रहा था । जो न पूरा डर था न ही खुशी मान लिजिये की वो इन दोनों का कॉमिनेशन था।
कोई आ न जाये वरना सारा भाँडा फूट जायेगा। इस बेचैनी में फिल्म का असली मज़ा भी जा रहा था। बार- बार कोई परेशान कर रहा था। इस बार कोई और नहीं मैं ही था जो दरवाजे पर खड़ा था।
"क्या हुआ राजेश?” दरवाजे के खुलते ही मैनें सवाल किया । राजेश ने दाँय-बाय देखा और मुझे अन्दर बुला कर लाया । मैनें कमरे की गर्मी को महसूस कर के फिर पूछा, “ बाहर दरवाजे पर बडी लाईन लगी थी क्या हुआ?”
वो बोला, "कुछ नहीं हम लोग तो अपना मनोरंजन कर रहे थे।"
तब मुझे लगा की कोई तो बात है। सब कुछ जानने के बाद राजेश के अन्दर का वो शख़्स जो अब तक चाँद की तरह बादलों में छूपा था। वो नज़र आ गया पर घर के सारे लोगों से उस ने ये बातें न बताई थी। राजेश को उस वक्त मेरी हमदर्दी की जरूरत थी मैं उसे देख कर मुस्कूराए जा रहा था। मुझे देख कर पहले ही उसने सारी वीसीडी दूबका दी थी। मैं जान गया था मगर फिर भी अन्जान बना रहा।
राकेश
जरा नजदिक से..
मेरे एक दोस्त ने कहा, "हमारी पार्टी वालों में मिल जाओ, चलो हमारे साथ आज़ादी के नारे लगाओं।"
पर मैं सोचने लगा की आज़ादी क्या हैं? जिसका नशा मुझ पर चढ़ा है। गर्मियों के मौसम हैं आग आसमान से बरसाती है। कमरे भवक रहे हैं। रेलियों में पसीने से लथपथ लोगों के चेहरे मुर्झाए हैं।
किस की आवाज़ पर ये लोग दौड़ रहे हैं, कौन इनका मसीहा कौन है इनका दूश्मन? बेख़बर हैं। भटक गए हैं जीवन का ये कौन सा ढ़ग हैं। जो एक-दूसरे से घृणा की जा रही है। करूँणा कहाँ गूम है। उदारता कहाँ खो गए?
आज वक़्त ये मजबूरी है की वो अपने आप पर ही रोता है। किसका क्या दोष इसमें, बस आँखों का इक धोका है। इसलिए किस के साथ जाऊँ कुछ मालूम नहीं होता है। जो जीवन मरने के बीच का लोचा है। क्या किसी ने इसके बारे में सोचा है।
राकेश
पर मैं सोचने लगा की आज़ादी क्या हैं? जिसका नशा मुझ पर चढ़ा है। गर्मियों के मौसम हैं आग आसमान से बरसाती है। कमरे भवक रहे हैं। रेलियों में पसीने से लथपथ लोगों के चेहरे मुर्झाए हैं।
किस की आवाज़ पर ये लोग दौड़ रहे हैं, कौन इनका मसीहा कौन है इनका दूश्मन? बेख़बर हैं। भटक गए हैं जीवन का ये कौन सा ढ़ग हैं। जो एक-दूसरे से घृणा की जा रही है। करूँणा कहाँ गूम है। उदारता कहाँ खो गए?
आज वक़्त ये मजबूरी है की वो अपने आप पर ही रोता है। किसका क्या दोष इसमें, बस आँखों का इक धोका है। इसलिए किस के साथ जाऊँ कुछ मालूम नहीं होता है। जो जीवन मरने के बीच का लोचा है। क्या किसी ने इसके बारे में सोचा है।
राकेश
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