जमीन पर बहुत गहरी छाया थी। उसके नीचे एक रेहडी खड़ी थी। आसपास मे कोई नहीं था। वे छाया नियमित हिल रही थी। कभी जमीन के उसी हिस्से पर छाया बड़ी हो जाती तो कभी अपना ठिकाना बदल लेती लेकिन वे जगह चुनी जा चुकी थी। सामने एक खिड़की के भीतर से कोई लाइट चमक रही थी। ज्यादा तेज नहीं थी लेकिन उसका लगातार आना इस जमीन पर गिरी छाया मे हरकत ले आता। फिर एक जोरदार आवाज़ और वॉयव्रेशन के जैसा पूरी जगह का कांप जाना। आवाज़ के क्षण भर बाद में फिर से वही।
छाया बड़ी हो रही है - रेहडी को पूरी तरह से ढक लिया है। खिड़की से एक बार फिर से लाइट का इशारा हुआ और एक जोरदार आवाज़ - दीवार पर पड़ता वार उसे हिला देता। पहली और दूसरी मंजिल को एक ही रूप मे बना दिया गया है। वे छाया जब भी उस लाइट की तरफ मे जाती तो दीवार से टकरा जाती और फिर शुरू होता वार का होना।
एक बड़ी सी चैन जमीन पर गिरने लगी - वही चैन जो छोटी होने पर ताले मे लगने से चीज की बंदिश हो जाती है। उसका आकार 100 गूना था। सांप की तरह वे जब गिरती चली जा रही थी। साथ ही वे छाया जो अब तक जमीन पर पड़ी थी वे वहां से अपनी जगह बदल रही थी। खिडकी के इतनी पास हो गई थी के खिड़की को देखना मुश्किल हो गया था। वे कभी दूर होती तो कभी खिडकी पर वार करती और किसी पोटली को वहाँ से निकाल लाती।
लख्मी
Saturday, November 5, 2011
आसमान की ओर मुँह किये सभी लेट गये
कोई विशाल वाइपर अंधेरे पड़ें आसमान में नाच रहा है। रोशनी जमीन तक आने से कतरा रही है। अपने पांव के नीचे की जमीन को देखना भारी हो रहा है। कोई उसे देखने को निकला जो आँखों में समा जाने से लड़ता है। हैरानी है समय में कि आँख की कोशिश इतनी मुलायम और तीव्र भी हो सकती है। सब नशे में है - ऐसा नशा जो जगह से हिलने नहीं देता मगर आँखों को दूर फैंकने की हिम्मत दे डालता है। ये उस रोशनी का एक खेल है जिसके पीछे नाच रहे है सब।
वो कहीं जा नहीं रही, मंडरा रही है - खेल रही है। किसी ऐसे विशाल रूप में जिसमें उसकी दूरी को सब पकडने के लिये उत्सुक हैं। ये क्या है? और ये कहाँ से आ रही है? सवाल हर कोई अपने भीतर दबाये हुए उसे निहार रहा है। हर किसी के सिर पर वे सवार है। बिना किसी डर के और बिना किसी ठोस आकार के। और कुछ नहीं है जिसे देखा जा सकता है। इसके पीछे जाने की इच्छा बेहद तीव्र है। मगर जाया कहाँ जाये? “लगता है कोई जहाज है", कोई टॉर्च मार रहा है।" अंदाजे चल निकले हैं। मगर बिना किसी सिर पैर के।
उसमें किसी और हरकत को देखे जाने की इच्छा परवान चड़ चुकी है। आसमान की ओर मुँह किये सभी लेट गये हैं। दाँय से बाँय होती उस रोशनी के साथ गर्दन हिला रहे हैं। वे विशाल हो रही है - बादलों को एक चमक देते हुए वे घूम रही है। जैसे जैसे उसका आकार विशालता में फैलता जा रहा है। पैंरो के नीचे की जमीन पर परछाईयाँ बनती जा रही हैं। परछाइयाँ गहरी हो चली हैं। एक दूसरे मे गुथी परछाइयाँ, एक दूसरे पर चड़ी परछाइयाँ - वे दूर जा रही है और कुछ बन रही है। कभी डरावनी शक़्स मे तबदील हो जाती तो कभी लगता की मेरे लिये बन रही है। मगर मेरी नहीं है। उसके बहने और विशाल होने में तमाम शक़्ले समाई हुई थी। इतने मे उन्होनें खत के ऊपर रखे उस पेपर वेट को हटाया और खत पढ़ना शुरू किया।
लख्मी
वो कहीं जा नहीं रही, मंडरा रही है - खेल रही है। किसी ऐसे विशाल रूप में जिसमें उसकी दूरी को सब पकडने के लिये उत्सुक हैं। ये क्या है? और ये कहाँ से आ रही है? सवाल हर कोई अपने भीतर दबाये हुए उसे निहार रहा है। हर किसी के सिर पर वे सवार है। बिना किसी डर के और बिना किसी ठोस आकार के। और कुछ नहीं है जिसे देखा जा सकता है। इसके पीछे जाने की इच्छा बेहद तीव्र है। मगर जाया कहाँ जाये? “लगता है कोई जहाज है", कोई टॉर्च मार रहा है।" अंदाजे चल निकले हैं। मगर बिना किसी सिर पैर के।
उसमें किसी और हरकत को देखे जाने की इच्छा परवान चड़ चुकी है। आसमान की ओर मुँह किये सभी लेट गये हैं। दाँय से बाँय होती उस रोशनी के साथ गर्दन हिला रहे हैं। वे विशाल हो रही है - बादलों को एक चमक देते हुए वे घूम रही है। जैसे जैसे उसका आकार विशालता में फैलता जा रहा है। पैंरो के नीचे की जमीन पर परछाईयाँ बनती जा रही हैं। परछाइयाँ गहरी हो चली हैं। एक दूसरे मे गुथी परछाइयाँ, एक दूसरे पर चड़ी परछाइयाँ - वे दूर जा रही है और कुछ बन रही है। कभी डरावनी शक़्स मे तबदील हो जाती तो कभी लगता की मेरे लिये बन रही है। मगर मेरी नहीं है। उसके बहने और विशाल होने में तमाम शक़्ले समाई हुई थी। इतने मे उन्होनें खत के ऊपर रखे उस पेपर वेट को हटाया और खत पढ़ना शुरू किया।
लख्मी
Wednesday, October 19, 2011
उल्टी पड़ती लहरें

कुछ आवाज़ें उन चेहरों की तरह होती है जिन्हे याद रखने के लिये कभी ख्यालों मे नहीं रखा जाता।
भिन्न होती आवाजें उस ओर जाने के लिये तैयार थी जहां का उन्हे रास्ता नहीं पता था
मेरी उलझने मुझे उन रास्तों का कहती है।
मेरे हर पल जो बितते हुए पलों से टकराते चलते थे
वो उन चेहरों मे बदलने लगे जिन्होनें उन रास्तों का कभी खुद को माना नहीं।
छोटे कागजों के टुकड़े इधर से उधर हवा मे तैर रहे हैं
कभी हवा उन्हे एक ही जगह पर रोक लेती है और कभी अपनी पूरी ताकत के साथ किसी और दिशा मे फैंक देती है।
मैं उन सभी कागज़ों को बीच मे खड़ा हूँ
ये देखने की कोशिश मे की, वे कब तक किसी एक ही जगह पर टिके रहते हैं।
राकेश
मेरी थकान
एक दिन मेरी थकान मुझसे बोली, तू मुझे लेकर जायेगा कहां?
मैं थोड़ा हिचकिचाया, थोड़ा हैरान हुआ - मेरी थकान मुझसे बात कैसे कर सकती है। क्या वो भी बोल सकती है। कुछ पल की शांति ने शायद ये किया होगा? शायद मेरे कान बज रहे होगें। वो तो मुझे मारती है, मेरे शरीर से उसकी दुश्मनी है, उससे मेरी रोज लड़ाई होती है। पर मैंने कभी उसे जीतने नहीं दिया। और अंत में मैं उसका कातिल बन गया।
पर वो तो मरती ही नहीं, बस शांत हो जाती है। आज वो बोली, "तू मुझसे जीतने का घमंड करता है। फिर भी तू रोज डरता है। तु सिर्फ इतना बता की क्या तू अपनी थकान को खुद चुनता है?"
मैं कहां सुस्ताऊंगा को चुनता हूँ,
मैं कहां ताजा होऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां खो जाऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां मिल पाऊंगा वो चुनता हूँ।
ऐसा क्या है जो मैंने छोड़ दिया, इस सवाल ने इन सबका रास्ता मोड़ दिया,
लख्मी
मैं थोड़ा हिचकिचाया, थोड़ा हैरान हुआ - मेरी थकान मुझसे बात कैसे कर सकती है। क्या वो भी बोल सकती है। कुछ पल की शांति ने शायद ये किया होगा? शायद मेरे कान बज रहे होगें। वो तो मुझे मारती है, मेरे शरीर से उसकी दुश्मनी है, उससे मेरी रोज लड़ाई होती है। पर मैंने कभी उसे जीतने नहीं दिया। और अंत में मैं उसका कातिल बन गया।
पर वो तो मरती ही नहीं, बस शांत हो जाती है। आज वो बोली, "तू मुझसे जीतने का घमंड करता है। फिर भी तू रोज डरता है। तु सिर्फ इतना बता की क्या तू अपनी थकान को खुद चुनता है?"
मैं कहां सुस्ताऊंगा को चुनता हूँ,
मैं कहां ताजा होऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां खो जाऊंगा वो चुनता हूँ
मैं कहां मिल पाऊंगा वो चुनता हूँ।
ऐसा क्या है जो मैंने छोड़ दिया, इस सवाल ने इन सबका रास्ता मोड़ दिया,
लख्मी
Wednesday, October 12, 2011
Tuesday, October 4, 2011
ये कोई अनोखी दुनिया नहीं है
पांचवा दिन - ओखला
डब्बा फेक्ट्री जो ओखला में है, वहां पर सुरेश नाम का एक शख़्स फैक्ट्री मे मोटे तौर पर मजदूर के ऊपर काम करता है। उनका दिल्ली मे आने का एक खास तरह का मक्सद था, पर वो उस मक्सद मे कामयाब नहीं हो सका लेकिन उसके बाद उन्होने कोशिस करना नहीं छोड़ा, काम की तलाश मे उनको ओखला में उनके जिले का एक शख़्स मिला। उसने ओखला मे काम करने वालो के बारे मे बताया और कहा की आप को मैं कहीं फिट कराऊगां। यहां पर वही जमता है जो जो कुछ कलाकारी जानता हो, यानी कोई ज्ञान होना जरूरी है। उसने सुरेश को अपने जीजा के साथ डब्बा बनाने की जगह मे भेज दिया जहां पर हर रोज छोटे और बड़े गत्ते कि डब्बे बनते थे। डब्बे बनाना सुरे को आता नहीं था। शुरूवात मे वो कारीगर के साथ उसकी मदद करने के काम मे लगा, जिसे हेल्पर कहते हैं।
500 किलो के कुछ पेपर को रोज मशीनो मे डालकर काटा जाता था। फिर पेस्टिंग कर उन्हे गोंध से चिपकाने के बाद कटिंग की जाती। तरह तरह कि मशीनो के सातह उसको रहने की आदत सी पड़ गई। वो रोज ओखला से, संगविहार जाता और अकेला ही वो अपने गांव से यहां संगमविहार मे रहता था। मगर उसका सारा धचयान अपनी मशीनो मे लगा रहता। 12 घंटे के काम के बाद भी उसका मन नहीं भरता था। उसका लगता था की वो घर आने के बाद भी वहीं उन्ही मशीनों मे है। सिखने के इस दौर मे और कमाई के सफर में उसके सपने तक बदल गये थे। शहर और उसकी आवाजों के साथ मशीन का शरीर और आवाज उसके कान मे हमेशा गूंजती रहती।
शुरू मे जब वो मशीनो मे रहता था तो उसका कैंद्र मशीनो के पुरजों पर छाया रहता था। वो उन्हे काटने और बनाने के काम को देखता रहता था। मशीन कैसे चलती है और काम कैसे करती है वो इसको बडी ध्यान से देखता और जब मालिक चला जाता तो मशीनो को स्टार्ट करके उन पर काम करने की कोशिश करता। ओखना वो साइकिल से ही जाया करता। अब बस में चड़ना - उतरना उसे परेशानी देने वाला सफर लगता। लेकिन बाकी मजदूरों के साथ काम करते करते उसे इसकी आदत हो गई थी। वो जब यहां आया था तो उके रहने का कोई इंतजाम नहीं था। और फैक्ट्री के मालिक को कोई ऐसा बंदा चाहिये था जो दिन मे काम भी करे और रात को फैक्ट्री मे रूक कर रात मे भी काम करवाना हो तो कारीगरों को कंपनी मिल जाये। ये काम भी हो जाये। सो सुरेश को काम की सारी शर्ते मंजूर हो गई थी।
सुरेश नया था मगर उसके काम करने का जूनून बहुत पहले का था। काम चाहे जो भी हो वो कोशिस करने से क्या नहीं हो सकता। वो इसे मानकर जीता था। वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। मगर सेंटीमिटर, स्क्यर, मेप का उसे आइडिया भी हो गया था। उसके बाद फैक्ट्री मे एक शख़्स काम करने के आया। वो था मंगलू जो कभी गलियों में कबाड़ जमा करता था और गोदाम मे बेच आता था। मंगलू का अपनी अदा है। वो अपने काम को खुद करता है। नियम है कि कब क्या करना है और मोबाइल पर गाने सुनने का सुख बस इस मे अपनी दुनिया बनाया है और उसे बेशक जीता है। वो स्टींग मशीन पर ज्यादा काम करता है। जो मेप, द्वारा बनाई गये गत्तों को सही करती है। इस तरह की कुछ और भी मशीने है। जैसे लॉटरी पेटींग कटिंग, चैन लौटाल जिस पर सारे मजदूर काम करते हैं। घंटो का काम मिंटो मे होता है।
ये कोई अनोखी दुनिया नहीं है, असल मे कोई दुनिया अनोखी नहीं होती, उसे अनोखा बनाया जाता है। जो सुरेश, मंगलू और उनके साथ रहने वाले वो लोग जो किस दुनिया से आये है को कोई नहीं पूछता, बस जो सामने है उसे देखकर हंसते हैं जिन्दगी को।
राकेश
डब्बा फेक्ट्री जो ओखला में है, वहां पर सुरेश नाम का एक शख़्स फैक्ट्री मे मोटे तौर पर मजदूर के ऊपर काम करता है। उनका दिल्ली मे आने का एक खास तरह का मक्सद था, पर वो उस मक्सद मे कामयाब नहीं हो सका लेकिन उसके बाद उन्होने कोशिस करना नहीं छोड़ा, काम की तलाश मे उनको ओखला में उनके जिले का एक शख़्स मिला। उसने ओखला मे काम करने वालो के बारे मे बताया और कहा की आप को मैं कहीं फिट कराऊगां। यहां पर वही जमता है जो जो कुछ कलाकारी जानता हो, यानी कोई ज्ञान होना जरूरी है। उसने सुरेश को अपने जीजा के साथ डब्बा बनाने की जगह मे भेज दिया जहां पर हर रोज छोटे और बड़े गत्ते कि डब्बे बनते थे। डब्बे बनाना सुरे को आता नहीं था। शुरूवात मे वो कारीगर के साथ उसकी मदद करने के काम मे लगा, जिसे हेल्पर कहते हैं।
500 किलो के कुछ पेपर को रोज मशीनो मे डालकर काटा जाता था। फिर पेस्टिंग कर उन्हे गोंध से चिपकाने के बाद कटिंग की जाती। तरह तरह कि मशीनो के सातह उसको रहने की आदत सी पड़ गई। वो रोज ओखला से, संगविहार जाता और अकेला ही वो अपने गांव से यहां संगमविहार मे रहता था। मगर उसका सारा धचयान अपनी मशीनो मे लगा रहता। 12 घंटे के काम के बाद भी उसका मन नहीं भरता था। उसका लगता था की वो घर आने के बाद भी वहीं उन्ही मशीनों मे है। सिखने के इस दौर मे और कमाई के सफर में उसके सपने तक बदल गये थे। शहर और उसकी आवाजों के साथ मशीन का शरीर और आवाज उसके कान मे हमेशा गूंजती रहती।
शुरू मे जब वो मशीनो मे रहता था तो उसका कैंद्र मशीनो के पुरजों पर छाया रहता था। वो उन्हे काटने और बनाने के काम को देखता रहता था। मशीन कैसे चलती है और काम कैसे करती है वो इसको बडी ध्यान से देखता और जब मालिक चला जाता तो मशीनो को स्टार्ट करके उन पर काम करने की कोशिश करता। ओखना वो साइकिल से ही जाया करता। अब बस में चड़ना - उतरना उसे परेशानी देने वाला सफर लगता। लेकिन बाकी मजदूरों के साथ काम करते करते उसे इसकी आदत हो गई थी। वो जब यहां आया था तो उके रहने का कोई इंतजाम नहीं था। और फैक्ट्री के मालिक को कोई ऐसा बंदा चाहिये था जो दिन मे काम भी करे और रात को फैक्ट्री मे रूक कर रात मे भी काम करवाना हो तो कारीगरों को कंपनी मिल जाये। ये काम भी हो जाये। सो सुरेश को काम की सारी शर्ते मंजूर हो गई थी।
सुरेश नया था मगर उसके काम करने का जूनून बहुत पहले का था। काम चाहे जो भी हो वो कोशिस करने से क्या नहीं हो सकता। वो इसे मानकर जीता था। वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। मगर सेंटीमिटर, स्क्यर, मेप का उसे आइडिया भी हो गया था। उसके बाद फैक्ट्री मे एक शख़्स काम करने के आया। वो था मंगलू जो कभी गलियों में कबाड़ जमा करता था और गोदाम मे बेच आता था। मंगलू का अपनी अदा है। वो अपने काम को खुद करता है। नियम है कि कब क्या करना है और मोबाइल पर गाने सुनने का सुख बस इस मे अपनी दुनिया बनाया है और उसे बेशक जीता है। वो स्टींग मशीन पर ज्यादा काम करता है। जो मेप, द्वारा बनाई गये गत्तों को सही करती है। इस तरह की कुछ और भी मशीने है। जैसे लॉटरी पेटींग कटिंग, चैन लौटाल जिस पर सारे मजदूर काम करते हैं। घंटो का काम मिंटो मे होता है।
ये कोई अनोखी दुनिया नहीं है, असल मे कोई दुनिया अनोखी नहीं होती, उसे अनोखा बनाया जाता है। जो सुरेश, मंगलू और उनके साथ रहने वाले वो लोग जो किस दुनिया से आये है को कोई नहीं पूछता, बस जो सामने है उसे देखकर हंसते हैं जिन्दगी को।
राकेश
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