Friday, November 14, 2014

मीठे इंजेक्शन

खुश रहने के लिये क्या चाहिये होता है भला। बस, अपनी तकलीफो को नज़रअंदाज करों, बिमारियों को छुपाओ और बीते हुये सुखों को याद करो। बस मिल गया जिंदा रहने का आसरा। कहते हुये एक परिवार अपने दुखों का मजाक नहीं बनायेगा तो जियेगा कैसे? वैसा ही ये सरकारी जगहों और अपने बनाये घरों के बीच का रिश्ता। अनेकों नराजगियों के बीच, तानेबाने की खींचातानी के चलते इनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ता। बस, चुइगम की तरह खिंचता जाता है।

आज महीने का दूसरा मंगलवार है। सुबह से ही भीड़ लगनी शुरू हो चुकी है। पिछले हफ्ते ही ये कह कर दिया था की आज ही के दिन बच्चों के रूटीनी इंजेक्शन लगाये जायेगें। इसलिये यहां सभी को इतनी जल्दी है की डिस्पेंशरी खुलने के समय से लगभग 2 घंटा पहले ही लाइन लगना शुरू हो चुका है।

आज लोगों की भीड़ है। बच्चे तैयार है। बिना निलाहे - दुलाये मांओ ने उन्हे इंजेक्शन के लिये तैयार कर लिया है।

एक बच्चे ने अपनी मां से पूछा, “मम्मी हम यहां पर क्यों आये है?”
तो मां कहती है, “बेटा यहां पर डॉक्टर आंटी सब बच्चों को टॉफियां बांट रही है तभी तो आज देखों कितने सारे बच्चे आये हुये।"
"मम्मी क्या डॉक्टर आंटी सबको टॉफी देगी?” बच्चे ने पूछा।
हां बेटा।"
फ्री में?”
हां बेटा।"
उनके पास इतनी सारी टॉफी होगीं?”
हां बेटा।"
जितनी मांगेगे उनती देगी?”
हां बेटा।"

"फिर तो मैं दो लूंगा।" उसने खुश होते हुये कहा।
बेटा वो उनको दो देगी तो चुपचाप बैठेगें छांव में। नहीं तो वो नहीं देगीं।" मां ने जैसे ही उससे ये बात कही वो भागकर गया और दीवार से लगी कुर्सियों पर बैठ गया।

मीठी गोली, मीठी दवाई, फ्रुर्टी का इंजेक्शन ना जाने किस किस चीज से सभी ने अपने बच्चों को बहकाया हुआ है।

मम्मी कब मिलेगी हमें टॉफियां?” एक बच्चे ने जोर से पूछा।
बस, बेटा थोड़ी देर और फिर अंदर चलेगें।" मम्मी ने फिर से बहलाते हुये उसे वापस जाने पर मजबूर कर दिया।

इतने एक बड़ी सी वेन डिस्पेंशरी के गेट के सामने रूकी। गेट पूरा खोल दिया गया। उसमें से दो लड़के छोटे छोटे कार्टन बॉक्स उतार कर अंदर ले जा रहे हैं। लाइन में खलबली शुरू हुई। सभी बैठे लोग खड़े हो गये। दूर खड़े अपने नम्बरों में आ गये। बच्चे अपने अपने मम्मी और पापा के पास में खड़े हो गये। लगता है खिड़की खुलने वाली है।

वहां पर खड़े बच्चों ने उन दोनों लड़को से पूछा, “अंकल इसमें हमारे लिये मीठी टॉफियां है?”
उसमें से एक लड़का बोला, “नहीं, इसमें तो इंजेक्शन हैं तो जो आपके लगेगें।"

उस लड़के बड़ी जोरों से हंसे और वहां खड़े बच्चों ने रोना शुरू किया। 

लख्मी 

Tuesday, November 11, 2014

Friday, October 31, 2014

पुल


हम
अनेकों "मैं" का बसेरा।
'एक' और 'अनेक' के बीच का एक ऐसा पुल जिसपर कभी भी यहां से वहां हुआ जा सकता है।
विभिन्न आवाज़ों से बनी एक गूंज।
"सब कुछ" की इच्छा से बना

मैं
रिफ्लेक्शन व शहडोह जो कभी भी अपने से बाहर हो सकती है।
"मैं" अनेकता या विशालता का रूप है
स्वयं और लिबास के बीच हमेशा टकराव में रहता है।
अनेकों परतों का डेरा जैसा, अपने से बाहर के दृश्य को विविधत्ता मे ही सोचने पर जोर देता है।
मैं असल में, तरलता का ऐसा अहसास है जो जितना फैल सकता है उतना ही जमा भी रह सकता है।

Wednesday, September 3, 2014

आवाज़ों का चक्रव्यू


गाड़ी नियमित चल रही है। रास्ते के दोनों ओर रेत का लंबा मैदान फैला हुआ है। दोपहर का समय है। खिड़की के बाहर भी अगर देखने की इच्छा हो तो क्या देखा जाए। गाड़ी चलाने वाला आंखो पर काला चश्मा लगाए अपना पूरा ध्यान सामने की ओर रखा हुआ है। कभी रोशनी गाड़ी के शीशे पर गिरती कभी पूरी गाड़ी में भर जाती। पर गाड़ी नियमित चल रही है। कोई रोकटोक नहीं है। रास्ते के किनारे में जैसे ही कोई दिखाई देता तो बिना गाड़ी को देखे ही आगे की और चला जाता। गाड़ी की रफ्तार एक समान है। 
 
बच्चे चिल्ला रहे है। औरतें भी एक दूसरे को गालियां दे रही हैं। बर्तनो के गिरने से बच्चो का चिल्लाना जैसे बंद हो जा रहा है। धड़ाम से जैसे कुछ गिरा हो। आंखे छोटी सी स्क्रीन में उन्हे खोज रही है। गाड़ी अब भी उसी रफ्तार में है। रास्ता गाँव से होकर गुजर रहा है। पकड़, पकड़, अबे रुक जा, ऐसा क्या हो गया, मार, छोड़ मत फिर से अपने जोरों पर कूदा। “धड़,धड़,धड़,” गाड़ी के बड़े से घड्ढे से गुजरी। आसपास में खड़े लोगो ने उसे देखा। गाड़ी में गाना चल पड़ा। गाड़ी चलाने वाला उसे कुछ दूरी तक सुन रहा है। “अभी दिखाता हूँ तुझे की मैं चीज क्या हूँ?” अबे जा – जा बहुत देखे तेरे जैसे।“

गाड़ी शहर में दाखिल हुई। बड़ी बड़ी बिल्डिंग के बीच से गुजर रही है। बिना हॉर्न के रास्ते से कई गाड़ियों से मिल गई है। लंबी लंबी लाइन लगी है।

बच्चे अब भी रो रहे है। औरते भी रो रही है। “टन टन टना टन” गूंज रही है। कुछ स्टील की लंबी सलाखे आपस में टकरा ही रही हो। कान पूरी तरह से स्क्रीन में घुस गए। जानने के लिए आखिरकार मजरा क्या है? गाड़ी वाले ने गाड़ी का गाना बंद कर दिया। और एक बड़े से बार के सामने रुक गया। गाड़ी पूरी तरह से धुलमिट्टी में रंगी हुई है। अचनाक उपर से कोई गाड़ी पर गिरता है। गाड़ी का हॉर्न अपने आप ही बजने लगा है। बार के अंदर से गाड़ी चलाने वाला भाग कर आता है और गाड़ी छोड़ भाग रहा है।

कई सारे लोगो के एक साथ भागने की “धपड़ धपड़” ने जोर पकड़ा। किसी के रोने की तड़प बहुत जोरों से आई। मेरी साथ में स्क्रीन में आवाज़ खोजती यशोदा ने अचानक से स्क्रीन को नीचे की ओर गिरा दिया और घर के हर हिस्से में अपने सिर को घुमाने लगी। कूलर बहुत आवाज़ कर रहा है। घूँ, घूँ, घूँ, घूँ, जैसे उसी की कोई फनती उसी के पंखे से टकरा रही हो। यहाँ से वहाँ अपने सिर को घूमने के बाद में उसने फिर से एक बार कानो को धक लिया और अपना ध्यान फिर से उस स्क्रीन पर लगा दिया। कमरा काला हो गया। चेहरा स्क्रीन की रोशनी से चमक उठा।

गोली चलने लगी है। कुछ लोग उस गाड़ी चलाने वाले के पीछे भाग रहे है और धुयाधुन्ध गोलियां चला रहे हैं। गाड़ियों के हॉर्न बज रहे है। लग रहा है जैसे सब गलियाँ दे रहे हो।

मार डाल, छोड़ियो मत” औरते फिर से रोने लगी। किसी के दर्द में तड़पने की आवाज़ कानो के आरपार हो गई। यशोदा ने एक बार फिर से स्क्रीन को नीचे की ओर गिरा दिया और कूलर की तरफ में भागी। उसे लगा जैसे पत्ती, पंखड़ी से टकरा गई है जिससे वो टूट गई है। पर ऐसा कुछ नहीं था। कमरा पूरी तरफ से उनही आवाज़ों में लीन था। बच्चो को गुस्से में अंदर ले जाने का शोर सुनाई दिया। यशोदा बाहर बालकनी की ओर भाई। गली में सभी बाहर खड़े थे और कोने की ओर देख रहे है। गली के कोने पर दिल्ली पुलिस की गाड़ी खड़ी है। उसकी लाइट चमक रही है।  

लख्मी  

Friday, August 8, 2014

आदमी एकांत में है

राकेश

अपना बिस्तर अपना बेड

कोई एम्बूलेंस की आवाज़ नहीं। धूप के साथ जैसे इंतजार करते बिमारों के रिश्तेदार अब खुद भी सुस्ताने लगे हैं। छुट्टी का दिन है। बड़े डाक्टरों के बिना चलते अस्पताल का इंतजारिया कमरा भी बिना किसी रोकटोक के सुस्ता रहा है। छोटे डाक्टर भी दिखना बंद है। अस्पताल के कर्मचारी ही यहां से वहां भागते दौड़ते दिख रहे हैं। कम्बर, शॉल, पतली रजाइयां व पतली चादरों से देखती आंखे उन्हे ही निहार रही हैं। शायद जैसे कोई खबर उन्ही के हाथों मिल जाये। कमरे में इतनी कुर्सियां नहीं है जितना की जमीन पर अपने बिस्तर लगाये लोग पड़े हैं। कमरे के बाहर तीन से चार स्ट्रैक्टर खड़े हैं। उनमें से तीन भरे हैं। हाथ में अपना ही गुलूकोस पकड़े कोई लेटा हुआ है। उसके बगल में खड़ी एक औरत उससे कुछ पूछ रही है। बाहर स्ट्रेक्टर हैं और कमरे के अन्दर कई बिमार लोग। कोई कमर में गर्मपट्टी बंधाये कमर की तकलीफ से परेशान है तो कोई पैशाब की जगह एक नली पकड़े लेटा है। कोई मुंह को कपड़े से धका हुआ है तो कोई आंख के दर्द से परेशान है। ये वेटिंगरूम ही इनका अपना वार्ड है और बिस्तर अपना बेड। बस, यहां पर कोई बेड नम्बर नहीं है। बस, अपने पर्चे अपने सिरहाने पर लेटे है। खुद से अपना बेड तलाशते व बनाये ये लोग डाक्टर का इंतजार करते हैं और यह भी मालूम यहां कब तक रहना है। हां, मगर यह जरूर पता है कि यहां कबसे है। बस, खूश हैं कि इलाज हो रहा है। पैसा बच रहा है। यहां पर कोई मिलने का टाइम नहीं है। जब मर्जी रिश्तेदार आ जा सकते हैं। अस्पताल के कर्मचारी भी इससे संतुष्ट दिख रहे हैं।



यह वेटिंगरूम दिल्ली से बाहर से आये लोगों से भरा है। गुड़गांव, फरिदाबाद, दादरी, बलम्भगड़, गाजियाबाद लोगों से तो बाहर एमरजेंसी के सामने की खाली जगह में दिल्ली में ही रहने वालों की भीड़ जमा है। पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, बेग़मपुर, कटवारिया सराय और खानपुर। यहां पर एक जन से जब यह मालुम किया तो वह बोला कि पुरानी दिल्ली वालो का तो यह अपना अस्पताल है। वे तो यहां पर बुखार, पेट दर्द, कब्ज़ और तो और एसीडिटी की दवाई भी लेने आ जाते हैं। यह बात उन्होने बोली और जोर जोर से हंसने लगे। शायद यहां पर उनका अपना कोई नहीं था। अभी फिलहाल धूप इस जगह में चली रही है। खत्म होने के साथ आगे की ओर बड रही है और लोग उसके साथ साथ अपना बैठने का ठिकाना तलाशते व बनाते लोग आराम कर रहे हैं। यह जगह बिमारों से भरी हुई है। एम्बूलेंस, चौकीदार की सीटी, भारी स्ट्रेक्टर खींचने आवाज़ जैसे यहां के लिये आम सी आवाज़ है और उसके साथ साथ किसी के रोने, दर्द में चिल्लाने की भी। लेकिन फिर भी इस आवाज़ के होते ही सभी उसी ओर देखने लगते हैं। वेटिंगरूम में एक दूसरे से अपनी बिमारी / तकलीफ बांटते लोग इसी में संतुष्ट दिखे की उनके जैसे यहां कई हैं। एक दूसरे की छुट्टी की खबर सुनते ही उनको यह लगता दिखता की अब उनको भी जल्दी ही छुट्टी मिल जायेगी।

लेकिन आज सरकारी छुट्टी होने से कईओ की जैसे छुट्टी केंसल हो गई। 

लख्मी