मँहगाई गरीबी ज़ुर्म और घोटाला
इन पर नहीं प्रतिबंध होने वाला
क्या अर्थ है समाज का समझ नहीं आता
अपने हाथों से ही अपनी पहचान को मिटा डाला
फिर वर्तमान समस्या का हल निकाल डाला
लोग कहते हैं,सरकार ने विकास की ओर जाते-जाते मंदी की खाई में धकेल डाला
वो तो भला हो मैटो वालो का की जम़ीन खोदकर हमें निकाल डाला
खुदाई चलती रही कार्यशैलियों की रफ़्तार भी थम गई
किसने कारीगरों के हाथों पर तेजाब डाला
मशीनों की रणनिती ने किया इंसानो पर राज
क्या करे विदेश मुद्रा ने हम को खरीद डाला
आज देश है पर्यटक स्थल,
क्योंकि यहाँ है विदेशी पंछियों का बोल-बाला
सोने की चिडिया था जो भारत
आज वो बना रोबॉट मतवाला
जिसकी संवेदनाए मर गई है
चूके अपने हाथों ने ही उसका दिल निकाल डाला
आज भी होते है आदोंलन,
क्योंकि अधिकारों का नहीं कोई रखवाला
दुष्कर्म रोज होते हैं, ज़ुर्म के मुँह पर कौन मारे ताला
राकेश
Thursday, January 15, 2009
हड़ताल में पूरा शहर है अटका
ज़िन्दगी के आठ दिन
कटे तारे गिन-गिन
राशन ख़त्म, भाषण ख़त्म
हुआ बाजारों में आने वाला माल ख़त्म
माँगे बनी हड़ताल का कारण
प्लेटफ़ोर्म ख़ाली रेल बिन
गाड़ी रुकी तेल बिन
जिसको देखो सिर पकड़े बैठा, टूटे हड़ताल इस ताक में रहता
पर हड़ताल एक सच्चाई है, जिसने अत्याचार पर आवाज उठाई है
एक ही मुद्दा नहीं अपने बीच यारों, न जाने कितने मुद्दों की तो अभी बारी नहीं आई है
मंदी की चपेट में आया जीवन, सरकार ने ऐसी कूटनिती कुछ ऐसी बनाई है
इन आठ दिनों ने दिया है झटका
हड़ताल में पूरा शहर है अटका
जब टूटी हड़ताल तो सब का दिल मटका
रुक न जाये अर्थव्यवस्था का पहिया
जरा जमकर जोर लगाना भईया
खुली हड़ताल तो राहत पाई है
माँगे पूरी हुई तो सूकून से रोटी खाई है।
राकेश
कटे तारे गिन-गिन
राशन ख़त्म, भाषण ख़त्म
हुआ बाजारों में आने वाला माल ख़त्म
माँगे बनी हड़ताल का कारण
प्लेटफ़ोर्म ख़ाली रेल बिन
गाड़ी रुकी तेल बिन
जिसको देखो सिर पकड़े बैठा, टूटे हड़ताल इस ताक में रहता
पर हड़ताल एक सच्चाई है, जिसने अत्याचार पर आवाज उठाई है
एक ही मुद्दा नहीं अपने बीच यारों, न जाने कितने मुद्दों की तो अभी बारी नहीं आई है
मंदी की चपेट में आया जीवन, सरकार ने ऐसी कूटनिती कुछ ऐसी बनाई है
इन आठ दिनों ने दिया है झटका
हड़ताल में पूरा शहर है अटका
जब टूटी हड़ताल तो सब का दिल मटका
रुक न जाये अर्थव्यवस्था का पहिया
जरा जमकर जोर लगाना भईया
खुली हड़ताल तो राहत पाई है
माँगे पूरी हुई तो सूकून से रोटी खाई है।
राकेश
Tuesday, January 13, 2009
ये नोर्मल तस्वीर क्या है?
कल एक अजीब सी बात हुई, ये बहुत ही सोचने के लायक थी। ऐसा नहीं है कि ये कभी सुना या सोचा नहीं है लेकिन ये तो एकदम गज़ब ही था। कल मेरा जाना एक सरकारी दफ़्तर में हुआ। जिसमे मुझसे कुछ डॉकोमेन्टस माँगे गए। जैसे- राशन कार्ड, पासपोर्ट साइज़ फोटो, स्कूल का सार्टीविकेट, वोटर आई कार्ड वगैरह। उसके साथ-साथ एक फोर्म भी भरना था जो उन्ही ने ही दिया था। मैं वो फोर्म भरकर और ये सारे काग़जात लेकर उसी ऑफिस मे पँहुच गया। उन्होंने मेरे सारे काग़जात देखे और फोटो को देखते हुए कहा, "ये क्या तस्वीर है? आपको पता नहीं है कि पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर कैसे खिंचवाई जाती है, इसमे चेहरे को नोर्मल रखना होता है। ये क्या तस्वीर। है? ये नहीं चलेगी, जाइये दोबारा लेकर आईये।"
उनकी ये बात सुनकर मैं वापस अपने घर चला आया। मैंने कोई बेकार तस्वीर थोड़ी खिंचवाई थी। मेरा एक दोस्त गोविंदा का बहुत बड़ा फैन है तो वो जब भी तस्वीर खिंचवाता था तो अपने चेहरे को हमेशा गोविंदा अंदाज़ में बना लेता था फिर चाहें वो पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर हो या पोस्टकार्ड साइज़ की। मैंने भी तो कुछ ऐसा ही तो किया था। इसमे हर्ज़ ही क्या था?
मगर उस ऑफिसर ने कहा था की नोर्मल तस्वीर होनी चाहिये। ये रटता हुआ मैं फोटोग्राफर के पास में गया। उससे मैंने कहा, "भाई साहब एक पासपोर्ट साइज़ में तस्वीर खिंचवानी है लेकिन फोटो नोर्मल होनी चाहिये।"
वे ये सुनकर हँसने लगा और कहने लगा, "सर चिंता मत किजिये आप, फोटो एकदम नोर्मल होगी।"
उसने मुझे अपने अन्दर वाले कमरे में बैठा दिया। सामने का पर्दा लगाया और लाइट को बन्द कर दिया। ये एक छोटा सा कमरा था। यहाँ का नया फोटोस्टुडियो था ये। पीछे सफेद रंग का पर्दा खींचा और सामने लगी टेबल पर उसने मुझे बैठा दिया। उसके बाद वो मेरे चेहरे की तरफ़ में आया और देखने लगा। मैंने उससे कहा, "भाईसाहब ये नोर्मल होना क्या होता है? ये चेहरा नोर्मल है ये कैसे पता चलता है? हम हर तस्वीर में अपनी अदा दिखा सकते हैं अलग-अलग भाव भी ला सकते हैं तो ये पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर में क्यों नहीं?"
उसको पता चल गया था कि आज उसको क्या कहा जा रहा हैं। वो कुछ ना बोलते हुए बस, मेरी तरफ़ देखकर हँसने लगा। फिर बोला, "ये बताया नहीं जा सकता सर, पर हाँ मैं जो तस्वीर खींचूगा वो नोर्मल होगी, एकदम आम आदमी की।"
वो ये कहते हुए मेरी तरफ में आया और मेरी कमीज़ ठीक करते हुए बोला, "सर आप बस, मेरी तरफ देखिये। चेहरे को एकदम ढीला छोड़ दिजिये। आँखें एकदम सामने। जब तक मैं ना कहूँ पलक मत झपकना। अपनी बॉडी को थोड़ा हल्का किजिये, हाँ एकदम सही। सीना टाइट कर लिजिये। हाथों को अपने घुटनों पर रख लिजिये। चेहरा थोड़ा नीचे की तरफ, गर्दन का कंठ नहीं नज़र आना चाहिये। आँखें बड़ी मत किजिये, एकदम रिलेक्स होकर बैठिये। एक मिनट में बस, आपका फोटो खिंच जायेगा।"
वो मेरी कमीज को दोबारा से ठीक करते हुए वापस अपनी जगह पर गया। उसकी दूरी लगभग चार फीट की थी। एक बड़ा सा कैमरा मेरे ऊपर ताना हुआ था और बगल में जलती लाइट मेरे मुँह पर पड़ रही थी। मेरा चेहरा लगभग चमक रहा था। ऐसा लग रहा था की जैसे जीरो वॉट का बल्ब मेरे चेहरे पर ही जल रहा हो। इसके बाद मे दो बार कैमरे का फ्लैस मेरे चेहरे पर पड़ा और तस्वीर खिंच गई।
वो मेरी तरफ मे देखते हुए बोला, "लिजिये सर खिंच गई आपकी नोर्मल तस्वीर।"
इस बार मैं हँसा और उससे कहा, "भाई साहब एक बात बताइये ये कौन सा वाला नोर्मल है? डॉक्टर जो कहता है वो वाला नोर्मल? या उस सरकारी आदमी ने जो माँगा वो वाला? फ़िल्मों में जो नज़र आता है वो वाला या आपने जो खींचा वो वाला?"
फोटोग्राफ़र बोला, "सर, ये सारा है। ये वो भी है जो डॉक्टर कहता है और वो वाला भी है जो उस सरकारी आदमी ने माँगा था और ये वो वाला भी है जो मैंने खींचा है। बेसिक्ली ये नोर्मल इंसान वो है जिसकी डिंमाड सबसे ज़्यादा है। मगर ये ही नहीं मिलता।"
"तो क्या मिलता है भाई साहब यहाँ?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र बोला, "यहाँ पर सब कुछ मिलावट का समान मिलता है। ये मिलावट आपको पता है क्या है। यही तो मस्ती है। यहाँ पर हर कामों मे अलग-अलग चीज चाहिये। तो लोग उसी हिसाब से बँट जाते हैं। जैंसे जो शादी के लिए चाहिये वे अलग है, सरकारी कामों मे अलग, पोज़िंग के लिए अलग, पोर्टपोलियों के अलग और अब तो हैंटीकेप के सार्टीविकेट के लिए भी अलग तो लोग भी उसी के हिसाब से अपने आपको बदल लेते हैं।"
"एक बात बताइये भाईसाहब, आपने ये अलग-अलग महकमों और कामों मे चेहरे बनाने की डिंमाड को कैसे जाना?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र बोला, "सबसे पहली बात तो ये की मैं भी तो इसी दुनिया में रहता हूँ। इसलिए जो भी यहाँ होता है तो मेरे साथ भी होता है। दूसरा ये की, हमें चेहरों के भाव से, एक्ट से खेलना आना चाहिये तभी तो ये काम है, नहीं तो हमें आता क्या है और सही बात बताऊँ, वो ये की यहाँ पर ये खेल सबको आता है।"
मैंने कहा, "तो ये खेल हर साइज़ के फोटो के साथ खेला जाता है? किस साइज के साथ में कौन सा खेल है ये कैसे बन गया?"
फोटोग्राफ़र बोला, "मेरे हिसाब से तो खाली दो ही तरह के भाव हैं इस दुनिया में। जिसमे से एक हमने बनाया है दूसरा जो हमने नहीं बनाया। बस, उसे मान लिया है। पहला तो ये ही जो आपने खिंचवाया। पासपोर्ट साइज़ का खेल। नोर्मल फोटो, और दूसरा जो खुलकर आता है वो है कि किसी भी साइज़ में आप किसी भी तरह का भाव अपने चेहरे में ला सकते हो।"
"तो ये नोर्मल होना और बाकी का होना क्या है? क्या वो नोर्मल नहीं है?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र ने कहा, "ये नोर्मल होना कुछ नहीं होता। ये सब बस, माँग है। सरकार को लगता की हम एक ऐसा चेहरा बनाके उसको दे जिसमे कुछ भी अलग से मिलाया ना गया हो। सरकार समझती है की आदमी मे रोना, हँसना, तेडूपंती या स्टाइल सब अलग से आई हैं। ये ऊपर वाले ने नहीं दी। तो सरकार वो चेहरा माँगती है।"
ये माँग के साथ में चेहरे का होना ये तो बहुत कस देता होगा। ये कसा हुआ भी ना लगे और खूबसूरत भी लगे ये कैसे करते फिर?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र ने कहा, "सर, यही तो हमारा काम है। एक बात कहे आपसे, जब कोई अपनी फोटो खिंचवाता है तो वो हमेशा ये सोचता है कि जब वे अपनी खींची हुई तस्वीर को देखे तो उसे लगता चाहिये की उसका चेहरा ऐसा दिखता है। जो उसे शीसे में नहीं दिखता वो तस्वीर में दिखना चाहिये बस, कोई-कोई अपनी पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर को ही बड़ा करवा लेता है। कभी-कभी तो फ्रैम भी।"
"आपको क्या है लगता है अभी तक जितनी भी तस्वीरें आपने खींची हैं उन तस्वीरों मे से कितनी नोर्मल है और कितनी नहीं?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र ने कहा, "आपको अभी दिखाता हूँ। जैसे ये देखिये।"
उसने मेरे सामने काफी सारी तस्वीरें बिछा दी। जिसमे बहुत सारे लोगों की तस्वीरें थी। पहली फैमली फोटो थी। जिसमे एक आदमी ने अपने बच्चे को गोद मे ले रखा था और बीवी उसका हाथ पकड़कर उसके साथ मे खड़ी थी। इसे उसने नोर्मल कहा था, दूसरी भी इन्ही की तस्वीर दिखाई उसमे वो औरत कुर्सी पर बैठी थी और वो उसके पीछे खड़ा था उसके काँधों पर हाथ रखे। ये उसने स्टाइलिस्ट कहा था।
एक तस्वीर में तीन लड़के थे, एक बैठा हुआ था और दो उसके पीछे खड़े थे। एक के हाथ में हंटर था तो दूसरा उसकी तरफ में देख रहा था। तीसरी तस्वीर किसी स्कूल की थी। जिसमे चालिस बच्चो के बीच में एक टीचर बैठी है और सारे बच्चे सामने देख रहे हैं। एकदम सीधे। उन्ही में से एक लड़का अपने बालों में हाथ मार रहा था। वो उस तस्वीर में सबसे अलग ही नज़र आ रहा था।
ऐसी ही ना जाने कितनी ही तस्वीरें थी उसके पास में। जिसको वो अब बटवारे में टटोल रहा था। लेकिन ये बटवारा किसी काम का नहीं था। बस, अपने आँकड़े ठीक करने के जैसा ही था। लेकिन था मज़ेदार। मैं उसे उसी सोच मे छोड़कर चला आया पर वो बिलकुल सटीक था अपनी सोच पर। जैसे चेहरों के खेल मे वो बहुत आगे निकल गया हो। शायद यही उसका काम था। जिसमे वो अपने को भी देखता था। क्योंकि इस खेल का सबसे मंझा हुआ खिलाड़ी तो वही था।
मैं वहाँ से निकलते हुए बस, यही सोच रहा था की अब उस सरकारी अफ़्सर को मेरी तस्वीर नोर्मल लगे। फिर कहता कि लगेगी क्यों नहीं आखिर ये खींची किसने है?
लख्मी
उनकी ये बात सुनकर मैं वापस अपने घर चला आया। मैंने कोई बेकार तस्वीर थोड़ी खिंचवाई थी। मेरा एक दोस्त गोविंदा का बहुत बड़ा फैन है तो वो जब भी तस्वीर खिंचवाता था तो अपने चेहरे को हमेशा गोविंदा अंदाज़ में बना लेता था फिर चाहें वो पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर हो या पोस्टकार्ड साइज़ की। मैंने भी तो कुछ ऐसा ही तो किया था। इसमे हर्ज़ ही क्या था?
मगर उस ऑफिसर ने कहा था की नोर्मल तस्वीर होनी चाहिये। ये रटता हुआ मैं फोटोग्राफर के पास में गया। उससे मैंने कहा, "भाई साहब एक पासपोर्ट साइज़ में तस्वीर खिंचवानी है लेकिन फोटो नोर्मल होनी चाहिये।"
वे ये सुनकर हँसने लगा और कहने लगा, "सर चिंता मत किजिये आप, फोटो एकदम नोर्मल होगी।"
उसने मुझे अपने अन्दर वाले कमरे में बैठा दिया। सामने का पर्दा लगाया और लाइट को बन्द कर दिया। ये एक छोटा सा कमरा था। यहाँ का नया फोटोस्टुडियो था ये। पीछे सफेद रंग का पर्दा खींचा और सामने लगी टेबल पर उसने मुझे बैठा दिया। उसके बाद वो मेरे चेहरे की तरफ़ में आया और देखने लगा। मैंने उससे कहा, "भाईसाहब ये नोर्मल होना क्या होता है? ये चेहरा नोर्मल है ये कैसे पता चलता है? हम हर तस्वीर में अपनी अदा दिखा सकते हैं अलग-अलग भाव भी ला सकते हैं तो ये पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर में क्यों नहीं?"
उसको पता चल गया था कि आज उसको क्या कहा जा रहा हैं। वो कुछ ना बोलते हुए बस, मेरी तरफ़ देखकर हँसने लगा। फिर बोला, "ये बताया नहीं जा सकता सर, पर हाँ मैं जो तस्वीर खींचूगा वो नोर्मल होगी, एकदम आम आदमी की।"
वो ये कहते हुए मेरी तरफ में आया और मेरी कमीज़ ठीक करते हुए बोला, "सर आप बस, मेरी तरफ देखिये। चेहरे को एकदम ढीला छोड़ दिजिये। आँखें एकदम सामने। जब तक मैं ना कहूँ पलक मत झपकना। अपनी बॉडी को थोड़ा हल्का किजिये, हाँ एकदम सही। सीना टाइट कर लिजिये। हाथों को अपने घुटनों पर रख लिजिये। चेहरा थोड़ा नीचे की तरफ, गर्दन का कंठ नहीं नज़र आना चाहिये। आँखें बड़ी मत किजिये, एकदम रिलेक्स होकर बैठिये। एक मिनट में बस, आपका फोटो खिंच जायेगा।"
वो मेरी कमीज को दोबारा से ठीक करते हुए वापस अपनी जगह पर गया। उसकी दूरी लगभग चार फीट की थी। एक बड़ा सा कैमरा मेरे ऊपर ताना हुआ था और बगल में जलती लाइट मेरे मुँह पर पड़ रही थी। मेरा चेहरा लगभग चमक रहा था। ऐसा लग रहा था की जैसे जीरो वॉट का बल्ब मेरे चेहरे पर ही जल रहा हो। इसके बाद मे दो बार कैमरे का फ्लैस मेरे चेहरे पर पड़ा और तस्वीर खिंच गई।
वो मेरी तरफ मे देखते हुए बोला, "लिजिये सर खिंच गई आपकी नोर्मल तस्वीर।"
इस बार मैं हँसा और उससे कहा, "भाई साहब एक बात बताइये ये कौन सा वाला नोर्मल है? डॉक्टर जो कहता है वो वाला नोर्मल? या उस सरकारी आदमी ने जो माँगा वो वाला? फ़िल्मों में जो नज़र आता है वो वाला या आपने जो खींचा वो वाला?"
फोटोग्राफ़र बोला, "सर, ये सारा है। ये वो भी है जो डॉक्टर कहता है और वो वाला भी है जो उस सरकारी आदमी ने माँगा था और ये वो वाला भी है जो मैंने खींचा है। बेसिक्ली ये नोर्मल इंसान वो है जिसकी डिंमाड सबसे ज़्यादा है। मगर ये ही नहीं मिलता।"
"तो क्या मिलता है भाई साहब यहाँ?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र बोला, "यहाँ पर सब कुछ मिलावट का समान मिलता है। ये मिलावट आपको पता है क्या है। यही तो मस्ती है। यहाँ पर हर कामों मे अलग-अलग चीज चाहिये। तो लोग उसी हिसाब से बँट जाते हैं। जैंसे जो शादी के लिए चाहिये वे अलग है, सरकारी कामों मे अलग, पोज़िंग के लिए अलग, पोर्टपोलियों के अलग और अब तो हैंटीकेप के सार्टीविकेट के लिए भी अलग तो लोग भी उसी के हिसाब से अपने आपको बदल लेते हैं।"
"एक बात बताइये भाईसाहब, आपने ये अलग-अलग महकमों और कामों मे चेहरे बनाने की डिंमाड को कैसे जाना?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र बोला, "सबसे पहली बात तो ये की मैं भी तो इसी दुनिया में रहता हूँ। इसलिए जो भी यहाँ होता है तो मेरे साथ भी होता है। दूसरा ये की, हमें चेहरों के भाव से, एक्ट से खेलना आना चाहिये तभी तो ये काम है, नहीं तो हमें आता क्या है और सही बात बताऊँ, वो ये की यहाँ पर ये खेल सबको आता है।"
मैंने कहा, "तो ये खेल हर साइज़ के फोटो के साथ खेला जाता है? किस साइज के साथ में कौन सा खेल है ये कैसे बन गया?"
फोटोग्राफ़र बोला, "मेरे हिसाब से तो खाली दो ही तरह के भाव हैं इस दुनिया में। जिसमे से एक हमने बनाया है दूसरा जो हमने नहीं बनाया। बस, उसे मान लिया है। पहला तो ये ही जो आपने खिंचवाया। पासपोर्ट साइज़ का खेल। नोर्मल फोटो, और दूसरा जो खुलकर आता है वो है कि किसी भी साइज़ में आप किसी भी तरह का भाव अपने चेहरे में ला सकते हो।"
"तो ये नोर्मल होना और बाकी का होना क्या है? क्या वो नोर्मल नहीं है?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र ने कहा, "ये नोर्मल होना कुछ नहीं होता। ये सब बस, माँग है। सरकार को लगता की हम एक ऐसा चेहरा बनाके उसको दे जिसमे कुछ भी अलग से मिलाया ना गया हो। सरकार समझती है की आदमी मे रोना, हँसना, तेडूपंती या स्टाइल सब अलग से आई हैं। ये ऊपर वाले ने नहीं दी। तो सरकार वो चेहरा माँगती है।"
ये माँग के साथ में चेहरे का होना ये तो बहुत कस देता होगा। ये कसा हुआ भी ना लगे और खूबसूरत भी लगे ये कैसे करते फिर?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र ने कहा, "सर, यही तो हमारा काम है। एक बात कहे आपसे, जब कोई अपनी फोटो खिंचवाता है तो वो हमेशा ये सोचता है कि जब वे अपनी खींची हुई तस्वीर को देखे तो उसे लगता चाहिये की उसका चेहरा ऐसा दिखता है। जो उसे शीसे में नहीं दिखता वो तस्वीर में दिखना चाहिये बस, कोई-कोई अपनी पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर को ही बड़ा करवा लेता है। कभी-कभी तो फ्रैम भी।"
"आपको क्या है लगता है अभी तक जितनी भी तस्वीरें आपने खींची हैं उन तस्वीरों मे से कितनी नोर्मल है और कितनी नहीं?" मैंने कहा।
फोटोग्राफ़र ने कहा, "आपको अभी दिखाता हूँ। जैसे ये देखिये।"
उसने मेरे सामने काफी सारी तस्वीरें बिछा दी। जिसमे बहुत सारे लोगों की तस्वीरें थी। पहली फैमली फोटो थी। जिसमे एक आदमी ने अपने बच्चे को गोद मे ले रखा था और बीवी उसका हाथ पकड़कर उसके साथ मे खड़ी थी। इसे उसने नोर्मल कहा था, दूसरी भी इन्ही की तस्वीर दिखाई उसमे वो औरत कुर्सी पर बैठी थी और वो उसके पीछे खड़ा था उसके काँधों पर हाथ रखे। ये उसने स्टाइलिस्ट कहा था।
एक तस्वीर में तीन लड़के थे, एक बैठा हुआ था और दो उसके पीछे खड़े थे। एक के हाथ में हंटर था तो दूसरा उसकी तरफ में देख रहा था। तीसरी तस्वीर किसी स्कूल की थी। जिसमे चालिस बच्चो के बीच में एक टीचर बैठी है और सारे बच्चे सामने देख रहे हैं। एकदम सीधे। उन्ही में से एक लड़का अपने बालों में हाथ मार रहा था। वो उस तस्वीर में सबसे अलग ही नज़र आ रहा था।
ऐसी ही ना जाने कितनी ही तस्वीरें थी उसके पास में। जिसको वो अब बटवारे में टटोल रहा था। लेकिन ये बटवारा किसी काम का नहीं था। बस, अपने आँकड़े ठीक करने के जैसा ही था। लेकिन था मज़ेदार। मैं उसे उसी सोच मे छोड़कर चला आया पर वो बिलकुल सटीक था अपनी सोच पर। जैसे चेहरों के खेल मे वो बहुत आगे निकल गया हो। शायद यही उसका काम था। जिसमे वो अपने को भी देखता था। क्योंकि इस खेल का सबसे मंझा हुआ खिलाड़ी तो वही था।
मैं वहाँ से निकलते हुए बस, यही सोच रहा था की अब उस सरकारी अफ़्सर को मेरी तस्वीर नोर्मल लगे। फिर कहता कि लगेगी क्यों नहीं आखिर ये खींची किसने है?
लख्मी
अपने से बहस
हमारा "आसपास" क्या है?, क्या "आसपास" है और क्या दूर, इस समझ के पात्र क्या हैं? कुछ "आसपास" होना और दूर होने का मतलब क्या है? इसके बीच मे जुड़ाव क्या है? "आसपास" और दूर होने का फैसला हम कैसे करते हैं?
इन सवाल को लेकर मैं जहाँ पर रहता हूँ और वहाँ के बारे मे सोचता हूँ तो कई तरह की पैकिंग नज़र आती हैं। जैसे, समाज़ मे "आसपास" को बहुत तरह की पैकिंग मे रखा गया है। जिसमे हमारे रहने को, हमारे चलने को, हमारे काम करने को, हमारे काम करने के बाद मे आने वाले कल की कल्पना करने को, हमें कहाँ जाना है?, कहाँ तक पँहूचना है?... इन सूरतों में हमारे दिमाग के साथ मे हमारे शरीर की पैकिंग पहले से ही तय हो जाती है।
इसका एक उदाहरण देने की कोशिश करता हूँ, जैसे, घर का एक ढाँचा, क्या कभी उसे ध्यान से देखा है? साढ़े बाइस गज़ के मकान को रहने लायक बनाया जाता है। परिवार के सदस्य के मुताबिक उसकी कल्पना को बनावट का रूप दिया जाता है। दो लोगों का परिवार, दो बच्चो की कल्पना और मकान तैयार, उसके साथ मे बस, मिलने के लिए आने वाले लोगों कि भी कल्पना आकार पा लेती है। मगर इसको हम अगर कुछ देर के लिए भूला दे तो?, बच्चा बड़ा हुआ उसकी शादी हुई तो एक कमरा ऊपर चड़ा दिया, दूसरे की हुई तो एक और चड़ा दिया। ये भी वहाँ तक होता है जहाँ तक पैकिंग की संभावनाये होती है। वे भी जायज़ संभावनाये। अगर ये नहीं हो पाता तो उस घर के ढाँचे मे एक और जगह जुड़ जाती है। और पैकिंग के लिए वे भी तैयारी के लिए मौज़ूद है।
ये सोच हमारे संदर्भ मे क्या करती है? हमारे बीच मे ये उपजाऊ है या नहीं?
अभी तक हमारे लिए "आसपास" कई तरह की विशेषताओ से भरा है। मैं कहता हूँ हमारे बीच मे "आसपास" को खुलते, सींचते, उठाते, कहानी कहते, भूल जाते और याद करते हुए देखा है। उसके साथ-साथ उसमे खुद के रॉल को भी बखूबी महसूस किया है। इस दायरे मे ज़्यादातर "आसपास" हमारे अपने रहन-सहन, माहौल से सीधा बातचीत मे रहा है। जो कभी कुछ बोलता है तो कभी गूंगा है। हम जहाँ पर खड़े हुए बस, आसपास वहीं से बयाँ होता है। जो कभी-कभी किसी सूरत मे महज़ एक शब्द की ही भांति दोहराया गया है।
मैं कोशिश कर रहा था "आसपास" को "दूरी" से लिखने व सोचने की। यानि के हमसे दूर क्या है? वे क्या है जिसे हम दूर कहतें हैं? किससे दूरी मे रहते हैं? दूरी को बताने के लिए हमारे पास क्या सवाल हैं और क्या तस्वीरें हैं?
एक आदमी से मैंने पूछा तो वे बोला, "कुछ चीज़ें दूर होती हैं। जहाँ तक हम पँहूच नहीं सकते, कुछ चीज़ों तक पँहूचने की हमारी औकात नहीं होती। बाकि सब तो हमारे आसपास ही है।"
इस ज़ुबान से हम क्या सोच सकते हैं? समाज़ नज़दीकी बोलने के लिए उसका विलोम शब्द अपने हाथ मे रखता है। ये क्रिया क्या है?
"आसपास" से "दूरी" तक को सोचना व सींच पाना।
मुझे लगा ये सोचते हुए की हमें हमारे रियाज़ मे कुछ परिवर्तन लाने होगें। हमारी नज़र, हमारी ज़ुबान और चीज़ें पकड़ने का काँटा सभी को एक ही तरह की आदत पड़ जाती है। जब हम एक ही लय मे लम्बा चलते हैं। हमारे दायरे भले ही फैलाव मे हो लेकिन वे रास्ते हमारे अन्दाजेभर ही होते हैं। अपने आपको किरॉस चैक करना शायद अपनी जगह नहीं बना पाता हमारे अन्दर।
"विलोम शब्द" या "विलोम रूप" की तरह से देखना उसी कार्य को समपन्न करता है।
विलोम शब्द को हम क्या मानते हैं? जब बचपन मे ये सिखाया जाता था तो दिमाग खाली उस शब्द तक ही सीमित रहता था जिसे विलोम रूप मे देखा जा रहा है। उससे क्या आकार दिमाग मे खुल रहा है वे समझने की दुनिया शायद स्कूल के महकमे नहीं समा पाई।
हमारे जीने के तरीके को समाज अपनी नियमों अनुसार से एक रूप मे कस देता है। जिससे वे हर कदम को तय करता है। कहाँ से निकलेगा और आगे क्या मिलेगा ये तक हमारे कदमो के साथ मे तय होता है।
सही मायने मे तो हमारे शरीर के साथ मे हमारे दिमाग का रिश्ता बेहद टाइट बन जाता है या बना दिया जाता है। बाकि रह गया नज़रिया उसे हम खुद से बनाने की कशिश मे लगे रहते हैं। इसको हम किस रूपक मे देखें? या समाज मे इस बदलते नज़रिये की जरूरत क्या है?
हमारी उस जगह से शुरूआत करते हैं, जहाँ पर हम रहते हैं, जिनसे हमारे रिश्ता है ओर जिनसे हम टकराते हैं।
यहाँ से इस बुनियादी दुनिया को समझने की कोशिश की जा सकती है क्या?
लख्मी
इन सवाल को लेकर मैं जहाँ पर रहता हूँ और वहाँ के बारे मे सोचता हूँ तो कई तरह की पैकिंग नज़र आती हैं। जैसे, समाज़ मे "आसपास" को बहुत तरह की पैकिंग मे रखा गया है। जिसमे हमारे रहने को, हमारे चलने को, हमारे काम करने को, हमारे काम करने के बाद मे आने वाले कल की कल्पना करने को, हमें कहाँ जाना है?, कहाँ तक पँहूचना है?... इन सूरतों में हमारे दिमाग के साथ मे हमारे शरीर की पैकिंग पहले से ही तय हो जाती है।
इसका एक उदाहरण देने की कोशिश करता हूँ, जैसे, घर का एक ढाँचा, क्या कभी उसे ध्यान से देखा है? साढ़े बाइस गज़ के मकान को रहने लायक बनाया जाता है। परिवार के सदस्य के मुताबिक उसकी कल्पना को बनावट का रूप दिया जाता है। दो लोगों का परिवार, दो बच्चो की कल्पना और मकान तैयार, उसके साथ मे बस, मिलने के लिए आने वाले लोगों कि भी कल्पना आकार पा लेती है। मगर इसको हम अगर कुछ देर के लिए भूला दे तो?, बच्चा बड़ा हुआ उसकी शादी हुई तो एक कमरा ऊपर चड़ा दिया, दूसरे की हुई तो एक और चड़ा दिया। ये भी वहाँ तक होता है जहाँ तक पैकिंग की संभावनाये होती है। वे भी जायज़ संभावनाये। अगर ये नहीं हो पाता तो उस घर के ढाँचे मे एक और जगह जुड़ जाती है। और पैकिंग के लिए वे भी तैयारी के लिए मौज़ूद है।
ये सोच हमारे संदर्भ मे क्या करती है? हमारे बीच मे ये उपजाऊ है या नहीं?
अभी तक हमारे लिए "आसपास" कई तरह की विशेषताओ से भरा है। मैं कहता हूँ हमारे बीच मे "आसपास" को खुलते, सींचते, उठाते, कहानी कहते, भूल जाते और याद करते हुए देखा है। उसके साथ-साथ उसमे खुद के रॉल को भी बखूबी महसूस किया है। इस दायरे मे ज़्यादातर "आसपास" हमारे अपने रहन-सहन, माहौल से सीधा बातचीत मे रहा है। जो कभी कुछ बोलता है तो कभी गूंगा है। हम जहाँ पर खड़े हुए बस, आसपास वहीं से बयाँ होता है। जो कभी-कभी किसी सूरत मे महज़ एक शब्द की ही भांति दोहराया गया है।
मैं कोशिश कर रहा था "आसपास" को "दूरी" से लिखने व सोचने की। यानि के हमसे दूर क्या है? वे क्या है जिसे हम दूर कहतें हैं? किससे दूरी मे रहते हैं? दूरी को बताने के लिए हमारे पास क्या सवाल हैं और क्या तस्वीरें हैं?
एक आदमी से मैंने पूछा तो वे बोला, "कुछ चीज़ें दूर होती हैं। जहाँ तक हम पँहूच नहीं सकते, कुछ चीज़ों तक पँहूचने की हमारी औकात नहीं होती। बाकि सब तो हमारे आसपास ही है।"
इस ज़ुबान से हम क्या सोच सकते हैं? समाज़ नज़दीकी बोलने के लिए उसका विलोम शब्द अपने हाथ मे रखता है। ये क्रिया क्या है?
"आसपास" से "दूरी" तक को सोचना व सींच पाना।
मुझे लगा ये सोचते हुए की हमें हमारे रियाज़ मे कुछ परिवर्तन लाने होगें। हमारी नज़र, हमारी ज़ुबान और चीज़ें पकड़ने का काँटा सभी को एक ही तरह की आदत पड़ जाती है। जब हम एक ही लय मे लम्बा चलते हैं। हमारे दायरे भले ही फैलाव मे हो लेकिन वे रास्ते हमारे अन्दाजेभर ही होते हैं। अपने आपको किरॉस चैक करना शायद अपनी जगह नहीं बना पाता हमारे अन्दर।
"विलोम शब्द" या "विलोम रूप" की तरह से देखना उसी कार्य को समपन्न करता है।
विलोम शब्द को हम क्या मानते हैं? जब बचपन मे ये सिखाया जाता था तो दिमाग खाली उस शब्द तक ही सीमित रहता था जिसे विलोम रूप मे देखा जा रहा है। उससे क्या आकार दिमाग मे खुल रहा है वे समझने की दुनिया शायद स्कूल के महकमे नहीं समा पाई।
हमारे जीने के तरीके को समाज अपनी नियमों अनुसार से एक रूप मे कस देता है। जिससे वे हर कदम को तय करता है। कहाँ से निकलेगा और आगे क्या मिलेगा ये तक हमारे कदमो के साथ मे तय होता है।
सही मायने मे तो हमारे शरीर के साथ मे हमारे दिमाग का रिश्ता बेहद टाइट बन जाता है या बना दिया जाता है। बाकि रह गया नज़रिया उसे हम खुद से बनाने की कशिश मे लगे रहते हैं। इसको हम किस रूपक मे देखें? या समाज मे इस बदलते नज़रिये की जरूरत क्या है?
हमारी उस जगह से शुरूआत करते हैं, जहाँ पर हम रहते हैं, जिनसे हमारे रिश्ता है ओर जिनसे हम टकराते हैं।
यहाँ से इस बुनियादी दुनिया को समझने की कोशिश की जा सकती है क्या?
लख्मी
Friday, January 9, 2009
एक अकेला शहर में
दिनॉक: 12-12-2008, समय: 11:40 बजे
इसमे उभरते जीवन की कल्पना मे बहते कुछ पल, समझने की कोशिश करे तो, अंजानपन को जीना क्या है? जो ज़िन्दगी में कोहरे की तरह आकर बस जाता है और हम उसे अपने आसपास का एक अनुमान समझकर जीने की कोशिश करते हैं। वो शायद आँखों की पकड़ में नहीं आ पाता। उसे छूने का अहसास बनाया जा सकता है जिसे अपनी याद्दाश्त का हिस्सा बना लिया जाये, वो एक क्षण ही है। जो आज को अपना सम्मान समझ लेता है।
राकेश
Thursday, January 8, 2009
एक ज़िन्दगी की बदलती कहानी
हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

राकेश
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

हम तस्वीरों में अपने आप को कहाँ देखते हैं?
बहते हुए पानी में हम कभी भी अपनी परछाई को समझने की कोशिश कर सकते हैं।

राकेश
Wednesday, January 7, 2009
उसकी चुप्पी से डर था
हमारे जीवन के सवाल क्या हैं? या वे सवाल क्या हैं जो हमें जीने लायक बनाते हैं? या वे जिससे हम जीना सीखते हैं? या वे जिनको लेकर हमें रोज चलना और बदलना होता है?
क्या कुछ ऐसे सवाल भी होते हैं जो हमें टकराने को कहते हैं? किससे टकराने को और कैसे टकराने को जोर देते हैं। क्या कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्हे हम खुद बनाते हैं अपने लिए या वे हमारे लिए कोई बनाकर देता है। हमारे खुद के सवालों मे हमारी इच्छाएँ क्या रूप लेती हैं अथवा उन सवालों में क्या जो हमारे लिए किसी ने बनाकर छोड़े हैं।
क्या हमें ये पता है कि हर दिन के अनुसार हमारे सवाल बदल जाते हैं या फिर छूटे हुए सवाल ही नये आकार और रूप ने बदलकर ताज़ा हो जाते हैं। इनका रिश्ता खाली निर्धारित समय से होता है या फिर ये हमारे जीवन जीने के तरीको में या बदलाव के रूपों मे भी अपना जोर दिखाते हैं?
सवालों को सोचते हुए लगता है कि हमें किसी ने घेरा हुआ है, हम आजाद नहीं है। हम जो भी अपने लिए बनाते अथवा चुनते हैं वे किसी न किसी तरह से एक ऐसी पकड़ मे दबती जाती है कि उसका बेजोड़ तलाशना भी मुश्किल लगता है लेकिन कभी-कभी ये हमें नई राहें खोजने की चेष्टा देती है। कहीं और निकल जाने की उम्मीद भरती है। जिसमे "कहीं और" बहुत फैला हुआ लगता है। आपार कल्पनाए लिए हमारे बगल में चलता है। कभी भरे व लदे चित्रों के साथ तो कभी खाली शुमसान माहौल की तरह।
एक चित्र को सामने लाये तो, जैसे- कोई भरी या लदी गाड़ी पटरी से उतर जाये तो क्या होता है?
ये समय हमारे जीवन मे पलभर के लिए सब कुछ थामकर कोई एक ऐसा हिस्सा खुला छोड़ देता है जिससे कहीं खिचने की भरपूर चाहत होती है। लेकिन वो क्या है?
एक और चित्र को बयाँ करते हैं, जैसे- अचानक से जीवन जीने का तरीका, उसका आधार, रूप-सज्जा और बोल बदल जाये तो क्या होता है?
ये मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि कोई गाड़ी पटरी से उतर गई है। यहाँ जीवन गाड़ी नहीं बल्कि वे तेजी है जो धीमी रफ़्तार मे तब आती है जब कोई उसकी कम रफ़्तार की उम्मीद लगाता है या फिर उसके मुकाबले अपनी रफ़्तार नहीं बना पाता।
मेरे दिमाग मे पहले ये सब किसी अवधारणा के तहत ही था। हाँ भले ही अपने अनुमान से शहर, जीवन और तेजी को समझने मे मैंने कई कोशिशें की हैं। पर वे क्या रही हैं मेरे लिए? खाली वे अंदाजेभर ही तो थे जो किसी को समझाने भर के रूपक थी। शायद मैं खुद घूम रहा हूँ।
पिछले दिनों मेरी काफी पुरानी साथी से मुलाकात हुई, उसको देखकर और उसकी बातों को सुनकर पहली बार लगा कि जैसे उसकी आवाज़ किसी भरे व लदे भाव से भारी हो गई है। ये एक अहसास था उसके लिए जो उसके अन्दर था। जिसने उसके अपने कुछ सवाल बदल दिये थे। जिसके साथ उसका मेल-जोल भी शुरू हो गया था। पहले जैसी किसी बात पर ना जाऊँ तो वे कुछ पूछ रही थी। जो उसके लिए था जिसमे अगर मैं अपनी राय या शब्द जैसे कुछ रखता तो वो मेरे लिए उसके जीने के अनुसार बेहद दूर था। वे मेरा ही नहीं था। मेरे शरीर के साथ समाज का रिश्ता कई अन्य असवधारणाओं से रचा गया था। जिसमे मुझे ताकतवर बनाया दिया था। इन सब बातों का उसके अहसास और आवाज़ से कोई नाता नहीं था और ना ही कोई रिश्ता बनाया जा सकता था।
वे कह रही थी, "मैंने पिछले दिनों अपने घर मे एक बदलाव देखा है। एक ऐसा बदलाव जिसे महसूस करके ऐसा लगा जैसे वे अभी हाल-फिलाल मे नहीं आया है। वे पहले से ही जमा हुआ था या कह सकती हूँ कि वे कहीं छुपा था मेरे ही घर के अन्दर। हाँ जिसके नीचे वे छुपा था वे मेरे घर, परिवार के वे रिश्ते थे जिनके मान-सम्मान को बरकरार रखा जाता है और ये भी की उस बदलाव को बाहर आने की कोई जगह नहीं दी गई थी मेरे घर मे। कई ऐसे बड़े रिश्ते हैं हमारे घर मे कि उनकी आड़ मे कई ऐसे बदलाव सांस लेते हैं। जो अभी बाहर आने बाकी हैं।
ये सारा बदलाव खाली मेरे लिए ही था। जिसमे मुझे भी बदलने पर मजबूर किया। जो चाहते न चाहते मुझपर हावी हुआ। जिसको अभी तुम देख सकते हो। मेरे हर रोज को जीने के सवाल ही बदल दिए गए और उसके साथ-साथ मेरे लिए वे गहरे भी हो गए। मैं समझ नहीं पाती की ये घर के माहौल में अचानक कैसे उतर आते हैं। बस, एक बात कहती हूँ जिसने ये सारी बातें मुझमे तैयार की हैं।
मैं हर रोज सवेरे जल्दी उठती हूँ। दस लोगों के लिए खाना बनाती हूँ, चाय-नाश्ता सब कुछ तैयार करती हूँ। लेकिन जब कोई घर मे आता है तो मेरे बारे कहा जाता है कि इसका कोई नहीं है, ये अकेली रह गई है। तब मैं समझ नहीं पाती कि वे दस लोग कौन हैं जिसके लिए मैं रोज सुबह उठ रही हूँ या खाना बना रही हूँ। ये कौन है? या मैं कौन हूँ?
वे रिश्ता जिसके तले वे सब कुछ छुपा था वे नहीं रहा या वे अपनी कोई परछाई भी नहीं छोड़कर गया? जो भी कोई आता है मुझे इस तरह से भाव भरी नज़रों से देखता है कि एक पल भी मैं उनकी आँखों मे नहीं देख पाती झटक जाती हूँ। यही सोचकर की कहीं मेरी आँखों मे पानी ना उतर आये। और जब वे उस झलक को मेरी आँखों में नहीं देख पाते तो उनकी नर्मी मेरे लिए और भी मजबूत हो जाती है। जिसको खुद मे उतर जाने को मैं रोक नहीं पाती। वे हमेशा कहते हैं कि तुझे उनकी याद नहीं आती?
मैं क्यों याद करूँ उन्हे?, जो छुटा है उसी को क्यों दोहराऊँ, जो वे सब अपने साथ ले गए उसे क्यों वापस खींचूँ? और जो उनकी परछाई है उसके साथ मे मैं क्या रिश्ता बनाऊँ?
ये सब कुछ बदलाव की आग मे शामिल है जिसको महसूस करना भी एक पल के बेहद कठोर लगता है। अब तो टाइम का भी पता नहीं रहता। घर के साथ मे टाइम का रिश्ता किसी और ही दिशा मे दौड़ रहा है या समझों दौड़ चुका है। जितनी भी देर बाहर रहूँ कोई सवाल-जवाब नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये मुझे अच्छा नहीं लगता। हाँ, मानती हूँ की अच्छा लगता है पर पहले जिन माहौलों की आदत या अहसास मुझमे भर गया है उसमे ये बदलाव डरा देता है।"
वो मुझे इसके बाद मे देखती रही। उसकी उस वक़्त की आँखों मे कुछ चाहने की राह थी। वे आँखे अभी भी नहीं भूली जाती मुझसे। ये सब कुछ दुनियाना उसका कोई समाजिक रिश्तो के बदलाव को ही जाहिर करना नहीं था। जिसको "ऐसा ही होता है" कहकर टाला जा सकता हो। या फिर दुनिया का आइना दिखाकर सहमति जताई जा सकती हो या फिर उसको ताकत देकर छोड़ा जा सकता हो। ना जाने ये विवरण कहाँ ले जाता है? पहली बार लगा जैसे मैं या हम समाजिक रिश्तों मे अभी काफी पीछे खड़े हैं अगर कुछ मानते हैं तो ये सब कुछ भम्र हो सकता है। बस, दूर खड़े ये सोच रहे हैं कि उनसे कैसे जुझा जाये या फिर कैसे समझा जाये। हमारा टकराना या फिर उनमे रहकर कई अन्य तरह के बदलावों को देखना। ये कई तरह की संभावनाओं को सामने लाकर खड़ा कर देता है। बस, फ़र्क सिर्फ़ इतना है की ये संभावनायें हमारे हाथ मे नहीं होती। ये वे संभावनाये नहीं है जिनकी उम्मीद हम अक्सर बाँध कर रखते हैं।
हाँलाकि वे मुस्कुराकर ये सब कहे जा रही थी। मुझे उसके कहने या बोलने से नहीं बस, उसकी चुप्पी से डर था।
लख्मी
क्या कुछ ऐसे सवाल भी होते हैं जो हमें टकराने को कहते हैं? किससे टकराने को और कैसे टकराने को जोर देते हैं। क्या कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्हे हम खुद बनाते हैं अपने लिए या वे हमारे लिए कोई बनाकर देता है। हमारे खुद के सवालों मे हमारी इच्छाएँ क्या रूप लेती हैं अथवा उन सवालों में क्या जो हमारे लिए किसी ने बनाकर छोड़े हैं।
क्या हमें ये पता है कि हर दिन के अनुसार हमारे सवाल बदल जाते हैं या फिर छूटे हुए सवाल ही नये आकार और रूप ने बदलकर ताज़ा हो जाते हैं। इनका रिश्ता खाली निर्धारित समय से होता है या फिर ये हमारे जीवन जीने के तरीको में या बदलाव के रूपों मे भी अपना जोर दिखाते हैं?
सवालों को सोचते हुए लगता है कि हमें किसी ने घेरा हुआ है, हम आजाद नहीं है। हम जो भी अपने लिए बनाते अथवा चुनते हैं वे किसी न किसी तरह से एक ऐसी पकड़ मे दबती जाती है कि उसका बेजोड़ तलाशना भी मुश्किल लगता है लेकिन कभी-कभी ये हमें नई राहें खोजने की चेष्टा देती है। कहीं और निकल जाने की उम्मीद भरती है। जिसमे "कहीं और" बहुत फैला हुआ लगता है। आपार कल्पनाए लिए हमारे बगल में चलता है। कभी भरे व लदे चित्रों के साथ तो कभी खाली शुमसान माहौल की तरह।
एक चित्र को सामने लाये तो, जैसे- कोई भरी या लदी गाड़ी पटरी से उतर जाये तो क्या होता है?
ये समय हमारे जीवन मे पलभर के लिए सब कुछ थामकर कोई एक ऐसा हिस्सा खुला छोड़ देता है जिससे कहीं खिचने की भरपूर चाहत होती है। लेकिन वो क्या है?
एक और चित्र को बयाँ करते हैं, जैसे- अचानक से जीवन जीने का तरीका, उसका आधार, रूप-सज्जा और बोल बदल जाये तो क्या होता है?
ये मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि कोई गाड़ी पटरी से उतर गई है। यहाँ जीवन गाड़ी नहीं बल्कि वे तेजी है जो धीमी रफ़्तार मे तब आती है जब कोई उसकी कम रफ़्तार की उम्मीद लगाता है या फिर उसके मुकाबले अपनी रफ़्तार नहीं बना पाता।
मेरे दिमाग मे पहले ये सब किसी अवधारणा के तहत ही था। हाँ भले ही अपने अनुमान से शहर, जीवन और तेजी को समझने मे मैंने कई कोशिशें की हैं। पर वे क्या रही हैं मेरे लिए? खाली वे अंदाजेभर ही तो थे जो किसी को समझाने भर के रूपक थी। शायद मैं खुद घूम रहा हूँ।
पिछले दिनों मेरी काफी पुरानी साथी से मुलाकात हुई, उसको देखकर और उसकी बातों को सुनकर पहली बार लगा कि जैसे उसकी आवाज़ किसी भरे व लदे भाव से भारी हो गई है। ये एक अहसास था उसके लिए जो उसके अन्दर था। जिसने उसके अपने कुछ सवाल बदल दिये थे। जिसके साथ उसका मेल-जोल भी शुरू हो गया था। पहले जैसी किसी बात पर ना जाऊँ तो वे कुछ पूछ रही थी। जो उसके लिए था जिसमे अगर मैं अपनी राय या शब्द जैसे कुछ रखता तो वो मेरे लिए उसके जीने के अनुसार बेहद दूर था। वे मेरा ही नहीं था। मेरे शरीर के साथ समाज का रिश्ता कई अन्य असवधारणाओं से रचा गया था। जिसमे मुझे ताकतवर बनाया दिया था। इन सब बातों का उसके अहसास और आवाज़ से कोई नाता नहीं था और ना ही कोई रिश्ता बनाया जा सकता था।
वे कह रही थी, "मैंने पिछले दिनों अपने घर मे एक बदलाव देखा है। एक ऐसा बदलाव जिसे महसूस करके ऐसा लगा जैसे वे अभी हाल-फिलाल मे नहीं आया है। वे पहले से ही जमा हुआ था या कह सकती हूँ कि वे कहीं छुपा था मेरे ही घर के अन्दर। हाँ जिसके नीचे वे छुपा था वे मेरे घर, परिवार के वे रिश्ते थे जिनके मान-सम्मान को बरकरार रखा जाता है और ये भी की उस बदलाव को बाहर आने की कोई जगह नहीं दी गई थी मेरे घर मे। कई ऐसे बड़े रिश्ते हैं हमारे घर मे कि उनकी आड़ मे कई ऐसे बदलाव सांस लेते हैं। जो अभी बाहर आने बाकी हैं।
ये सारा बदलाव खाली मेरे लिए ही था। जिसमे मुझे भी बदलने पर मजबूर किया। जो चाहते न चाहते मुझपर हावी हुआ। जिसको अभी तुम देख सकते हो। मेरे हर रोज को जीने के सवाल ही बदल दिए गए और उसके साथ-साथ मेरे लिए वे गहरे भी हो गए। मैं समझ नहीं पाती की ये घर के माहौल में अचानक कैसे उतर आते हैं। बस, एक बात कहती हूँ जिसने ये सारी बातें मुझमे तैयार की हैं।
मैं हर रोज सवेरे जल्दी उठती हूँ। दस लोगों के लिए खाना बनाती हूँ, चाय-नाश्ता सब कुछ तैयार करती हूँ। लेकिन जब कोई घर मे आता है तो मेरे बारे कहा जाता है कि इसका कोई नहीं है, ये अकेली रह गई है। तब मैं समझ नहीं पाती कि वे दस लोग कौन हैं जिसके लिए मैं रोज सुबह उठ रही हूँ या खाना बना रही हूँ। ये कौन है? या मैं कौन हूँ?
वे रिश्ता जिसके तले वे सब कुछ छुपा था वे नहीं रहा या वे अपनी कोई परछाई भी नहीं छोड़कर गया? जो भी कोई आता है मुझे इस तरह से भाव भरी नज़रों से देखता है कि एक पल भी मैं उनकी आँखों मे नहीं देख पाती झटक जाती हूँ। यही सोचकर की कहीं मेरी आँखों मे पानी ना उतर आये। और जब वे उस झलक को मेरी आँखों में नहीं देख पाते तो उनकी नर्मी मेरे लिए और भी मजबूत हो जाती है। जिसको खुद मे उतर जाने को मैं रोक नहीं पाती। वे हमेशा कहते हैं कि तुझे उनकी याद नहीं आती?
मैं क्यों याद करूँ उन्हे?, जो छुटा है उसी को क्यों दोहराऊँ, जो वे सब अपने साथ ले गए उसे क्यों वापस खींचूँ? और जो उनकी परछाई है उसके साथ मे मैं क्या रिश्ता बनाऊँ?
ये सब कुछ बदलाव की आग मे शामिल है जिसको महसूस करना भी एक पल के बेहद कठोर लगता है। अब तो टाइम का भी पता नहीं रहता। घर के साथ मे टाइम का रिश्ता किसी और ही दिशा मे दौड़ रहा है या समझों दौड़ चुका है। जितनी भी देर बाहर रहूँ कोई सवाल-जवाब नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये मुझे अच्छा नहीं लगता। हाँ, मानती हूँ की अच्छा लगता है पर पहले जिन माहौलों की आदत या अहसास मुझमे भर गया है उसमे ये बदलाव डरा देता है।"
वो मुझे इसके बाद मे देखती रही। उसकी उस वक़्त की आँखों मे कुछ चाहने की राह थी। वे आँखे अभी भी नहीं भूली जाती मुझसे। ये सब कुछ दुनियाना उसका कोई समाजिक रिश्तो के बदलाव को ही जाहिर करना नहीं था। जिसको "ऐसा ही होता है" कहकर टाला जा सकता हो। या फिर दुनिया का आइना दिखाकर सहमति जताई जा सकती हो या फिर उसको ताकत देकर छोड़ा जा सकता हो। ना जाने ये विवरण कहाँ ले जाता है? पहली बार लगा जैसे मैं या हम समाजिक रिश्तों मे अभी काफी पीछे खड़े हैं अगर कुछ मानते हैं तो ये सब कुछ भम्र हो सकता है। बस, दूर खड़े ये सोच रहे हैं कि उनसे कैसे जुझा जाये या फिर कैसे समझा जाये। हमारा टकराना या फिर उनमे रहकर कई अन्य तरह के बदलावों को देखना। ये कई तरह की संभावनाओं को सामने लाकर खड़ा कर देता है। बस, फ़र्क सिर्फ़ इतना है की ये संभावनायें हमारे हाथ मे नहीं होती। ये वे संभावनाये नहीं है जिनकी उम्मीद हम अक्सर बाँध कर रखते हैं।
हाँलाकि वे मुस्कुराकर ये सब कहे जा रही थी। मुझे उसके कहने या बोलने से नहीं बस, उसकी चुप्पी से डर था।
लख्मी
Subscribe to:
Posts (Atom)