Tuesday, May 19, 2009

खुद के अक्स है या ओरो के अंदर के चेहरे....



कोई अपनी छाप कैसे छोड़ता है? हम दौड़ते जा रहे है, भागे जा रहे है मगर क्या हमे मालूम है अपने पीछे कितने निशान छोड़ते जा रहे है?

ये एक झरोखा है, इसमें से वो दिखता है जो नज़रे एक बार में देख कर छोड़ देती है मगर आँखे किसी चीज़ के पीछे कितनी दूर तक जा सकती है?

ये एक दिशा है, जो कहीं खींच कर ले जाती है. बिलकुल उस रास्ते की तरह जो खुद में कई मौड़ लिए रहता है. बस कदम चलते जाते है और रास्ता बदलता जाता है. हमारे पैर कितनी दूर तक बिना मौड़ के चल सकते है?

ये एक अक्स है, जो हर किसी के अंदर से होकर निकलता है, जिसे बस खुद में बसाया जाता है, उसके साथ खेला जा है और उसके साथ जिया भी जाता है. क्या हमे पता है की हम अपने अंदर कितने अक्स लिए घूमते है?

परछाइयों के पीछे दौड़ कर तो देखो. कहाँ का सवाल कभी सामने ही नहीं आएगा.


लखमी

ये सब कहाँ है?

कुछ बनाते, लिखते व सुनते कहीं छुट जाते है. उनको दोबारा कैसे दोहराया जाये?

बीती कहानियों में दोहराए गए लोग और उन्ही कहानियों में सुनाये गए लोग कहाँ मौजूद है? क्या उनका कोई ठिकाना है? या वो खाली बनाये जाते है किसी माहोल को रचने व बनाने के लिए? हम कितनी कहानियों में न जाने कितने लोगों के बीच में रह चुकें है? ये बताना शायद मुस्किल होगा. क्या वे लोग खाली उदाहरण बनकर आते है या फिर वो सुनाने वाले के अंदर के कुछ हिस्से होते है? ये बताना हमारे लिए एक बेहद ठोश रूप में आता है जिससे हम अक्सर किनारा कर लेते है.

कई सवाल और न जाने कितने ऐसे चेहरे जिनको हम खुद में लिए घूमते है और ये सोचते है की जो भी हमारे सामने बनता जा रहा है वो असल में एक चित्र है जिससे हमारा कोई रिश्ता नहीं है. ये मानकर अगर हम चलना भी चाहें तो कोई बुरी बात नहीं होगी.

मेरे सामने गुजरने वाला हर लम्हा किसी याद से कम नहीं है. लेकिन मैं उसे दोहराने से कभी-कभी चूक जाता हूँ इसलिए नहीं की मैं उसे खुद में उतार नहीं सकता या उसे अपने माहोल में बयां नहीं कर सकता. ऐसा नहीं है. मगर क्या हम हर लम्हा और हर बीती दुनिया के पलो को बयां कर सकते है? लेकिन क्या हमे पता है की बीते और गुज़रे लम्हों में क्या-क्या समाया व छुपा होता है?

उन लोगों और कहानियों को हम कैसे सोचें जो हमे सुना दी गई है. जिनमे हम नहीं है और जिनकी दुनिया से हम वाकिफ भी नहीं है. उसे दोहराने और कह पाने की ताकत हम कैसे जुटा सकते है? कितने तरह के लोगों से हम इन्ही कहानियों के जरिये मिल चुके है?


लखमी

Monday, May 18, 2009

कुछ ऐसी पहेलियाँ जो अद्धखुली घूमती हैं...



कुछ अद्धबनी शक्लों में पुर्ण चेहरे भी होते हैं। जिन्हे किसी की तलाश होती है और वो भी अपने होने के मक्सद को खोज़ करते-करते कहीं ठहर जाते हैं।




हमारे पीछे और आगे कौन है? ये किसी को क्या पता! मगर अपने बीच कई सूरतों का संगम होता है। हर चीज़ बराबर है फिर भी सबकी अपनी -अपनी सीधी, टेडी, तीरछी पहचान सामने आती है।





कौन है वो जो अकेला नहीं कौन है? वो सबके बीच मे नहीं है! इंसान खुदगर्ज़ है जो अपनी ही कल्पना की दस्तकों को भूलकर सिर्फ़ यथार्थ के कुण्ड में डुबकी मारता है।





कोई जाने या न जाने फेरियाँ बाज़ारो में मज़ा लुटाती। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं फिर भी माँगने का सिल-सिला चलता रहता है। ये रिश्ता ही एक-दूसरे को करीब रखता है।





वो भूख जो इंसान को शुरू से ही सता रही है। वो कभी मिटती नहीं, मिट जाते हैं उसे पाने वाले और छोड़ जाते हैं सौगातों के रूप में अपनी धरोहरें, मिसाले, चिन्हे और पहेलियाँ। जिन्हे समझने की जिज्ञासा लिए आने वाला कल आकाशवाणियाँ करता जाता है।





खुद से भटकती सोच जब किसी पर उतारू होती है तो सही-गलत का फ़र्क किए बिना वो उस रूप में आ जाती हैं। जिसको आसानी से मन्जूर करना सम्भव नहीं। वो तमाशा बन जाती है और दूसरों के हँसते-मुस्कराते चेहरों में रूपान्तरण होकर छलक जाती है। वो रोके नहीं रुकता। ऐसे ही मज़मों का मंजर बना रहे तो ज़िन्दगी हसीन हो जाए।





राकेश

बारातघर से गुज़रता रास्ता...

बारातघर के सामने से जगमगाते बिजली के झूमर और बैंड-बाजे के साथ नाचते-गाते लोगों का रोमांचकारी माहौल गुज़र रहा था। रात के अंधेरे को मात देती ये अलौकिक बारात की टुकड़ियाँ सड़क के रास्ते से अक्सर निकला करती है।

एक गली के कोने पर बना ये सफ़ेद गुम्मट का मन्दिर जो काफी अरसे पुराना है। सब कुछ बदल गया पर ये मन्दिर की दरों-दिवार और यहाँ पर बहुत पहले से ही बैठने वाला एक शख़्स नहीं बदला। हम बदलाब को एक नई भूमिका में देखगें। जो की सब कुछ बदल रहा है पर शरीर जो तस का मस अपने आधार पर कायम है। जो वक़्त के आगे अपना असाधारण पात्र बनके अपने को हालात के किसी भी प्रहार से टूटने से बचाएँ रखता है। जीवन में अपने को इस असाधारण वेशभूषा में लाकर रखने वाले जो मन्दिर की देवी की सेवा करते ही रहते हैं। एक पेहरेदार की तरह वो मन्दिर के ठीक दरवाज़े के पास बैठ जाते है। जिन्हे यहाँ के लोग केशरी लाल के नाम से जानते है और एक बुर्ज़ुग शख़्स के नाते सब उनका बड़ा ही सम्मान करते है।


बदलाव पर ये अन्गिनत कथाएँ सुनाते रहते हैं और गली के सारे लोग इनकी बातों का विश्वास करते हैं। एक अनुभवी व्यक़्ति होने के साथ उनकी दिलचश्पी मन्दिर के साथ वक़्त गुज़ारने में ज़्यादा रहती है। वो अभी रिटायर हो चुके हैं। केशरी लाल की आँखों से देखे तो आज की तस्वीर के अन्दर ही बदलाव से पहले की वो धरातल दिखाई देगी। जहाँ कभी जमाने भर के हर ख़्याल और अफ़सानों को सुनाने वालों का गुट हुआ करता था। दिवारों की खुर्दरी सतहों पर हरी-सफेद फफूंदी हुआ करती थी। जब यहाँ एक बड़ा सा शौचालय हुआ करता था। लेटरिंग के दरवाज़ों के बाहर खड़े शख़्स तैमद, निक्कर और गम्छा डालकर बीढ़ियों के धूएँ में अपने को व्यस्त रखा करते थे। दिवारों के मुंडेरियों पर बोतलों और पुराने डिब्बो की लाईन लगी रहती थी। हर कोई यहाँ अपने को हल्का करने आता था। करीब सुबह के तीन-चार बजे से ही आसपास के ब्लॉको से लोगबाग यहाँ आ कर फ्री हुआ करते।

ये शौचालय पीली कोठी के नाम से दक्षिणपुरी मे प्रसिद्द था क्योंकि शौचालय की बाहर की दिवारों पर पीले रंग की सफेदी कर रखी थी। सड़क के ठीक साथ में ही ये शौचालय बना था जे ब्लॉक और अठ्ठारह ब्लॉक के बीच में बनी पीली कोठी नामक शौचालय अब पहले वाली पहचान खो बैठा है।

बारातघर जो इस की जगह में खड़ा है। जो पहले था वो अब नहीं बस, कल और आज के बीच लटकी चन्द तस्वीरें हैं जो कहीं गुमनामी के अन्धेरों में किसी के साये में बैठी है। आँख जब सब कुछ साफ़-साफ़ देखना चाहती है तब ये वक़्त की आँधी ऐसी चलती है मानों कुछ देखता ही मुश्किल हो जाता है फिर एक ही रास्ता बचता है की जो ज़्यादा नज़दिक है उसी छोर को पकड़ लिया जाये। वक़्त की इस बेडोल आंधी में सब पानी की रह बह जाता है। बस, रह जाता है तो ज़मीन पर घाँस तिनको और रह गए अवशेष जो मिट्टी की दलदल में धसें और ऊपर आये तत्व। आदमी तत्व का रूप है या तत्व आदमी के रूप बना खड़ा होता है।

केशरी लाल जब वे भी अपनी स्वीकृति को लिए सब की दावतों में जुड़े रहते थे। सड़क से गुज़रते लोग उन्हे हाथ उठाकर दूआँ-सलाम करते थे। कोई ऐसा नहीं था जिसकी नज़र इनके ऊपर न पड़ती हो। सड़क सामने पहले भी बारातों का सिल-सिला जारी रहता था लोग तब भी इसी तरह दुल्हे के घोड़ी चढ़ने का जश्न मनाया करते थे। वो भी एक वक़्त था ये भी एक वक़्त है। कही इसी के बीच में विशेष रूप से फँसे ये भी अपने को सम्पन्न देखते हैं पर ये सम्पन्न होना कुछ अलग है। जिसमें सत्तर वर्षीये केशरी लाल जी अपने को किसी मजबूत शिला से कम नहीं समझते। पूरे दिन सड़क के पास में पीपल के पेड़ की छाँव में आराम से मन्दिर की निघरानी करते हैं। जो कोई भी सड़क से होकर गुज़रता है उसे बड़ी बारीकी से जाँचते हैं। ये उनकी आदन बन गई है। उम्र के साथ शरीर कि अन्दर की ताकत कम हो गई है जिससे शरीर प्रभावित है। उनके कान में एक सुनने की मशीन लगी रहती है जो पहले से तेज़ और साफ सुनने में उन की मदत करती है।

वैसे भी उनको देखकर ऐसा लगता है की वो बिना मशीन के भी सुन सकते है। क्योंकि उन देखकर लगता है की उनकी आँखें वक़्त के किसी सुक्ष्मदर्शी फ्रेम से झाँक रही है। वो बैठे रहते हैं कुछ सोचने और हक़िकत से कल्पना कि बुनाई करने में। उनका चेहरा समान्य रूप से खिला रहता है पर वो उस के पीछे प्रचंड समाधी लिए होते हैं।

राकेश

बाँटकर गायब हो जाना...

एक बेहद छोटी सी मुलाकात, जिसने कई सवालों को हमारे खोलकर रख दिया। ये शख़्स दक्षिणपुरी के उन लोगों में से हैं जो नितियों को जीने के साथ-साथ उसे बदलने की भावनाओ को खुद में पालते हैं। ज़ोरआज़माइश करते हैं, सवाल पैदा करते हैं लेकिन बाँटकर कहीं गायब हो जाते हैं। ये शहर की रग़ में हैं। इन्हे तलाशकर कहीं खोने के लिए तैयार रह सकते हैं।

आज उन्होनें एक सवाल किया वो बोले, "हम जो भी अपने घर, परिवार और रिश्तेदारों से हटकर करते हैं। वो कुछ भी हो सकता है, चाहें कुछ बनाना, चाहे कुछ लिखना या चाहें कुछ गढ़ना। उसमें जो हम बन जाते हैं या होते हैं क्या वो सदा के लिए हममें उतर जाता है? वो सब कुछ हमारे स्वभाव में कैसे आता है?"

यहाँ पर थोड़ी देर के लिए सब कुछ खामोश हो गया था। इस सवाल के बीच में कोई भी चीज़ न तो तेरी थी और न ही मेंरी। यानि ये सवाल तेरा-मेंरा की दुनिया लेकर नहीं था। वे हम दोनों के ही अन्दर के पहलुओ को छेड़ रहा था।

मैं इस बात को ख़ुद में कई बार सोच चुका हूँ। लेकिन कभी पार नहीं पा पाया। हमारा लेखन या वो अक्श जो हम खुद बनाते हैं लेकिन वो क्या मूरत बन जायेगा वो हमें मालुम नहीं होता। उसका अहसास क्या है वो पहचानते हैं लेकिन उसका अस्तित्व क्या होगा वो नहीं जान पाते। उस दुनिया में हम रहते भी हैं लेकिन सारी दुनिया को उसमें समेंटना हमारे लिए मुश्किल हो जाता है। सारी दुनिया को बना सकते हैं लेकिन सारी दुनिया को खुद में उतारना बेहद मुश्किल हो जाता है। ये सारी दुनिया क्या है? वो दुनिया जो हममें है या वो दुनिया जो हममें होने के बाद भी बाहर है। ये लड़ाई की तरह हमारे ज़हन में दौड़ती रहती है।

अक्सर स्वभाव भारी होता है या पड़ता है। उसका रिश्ता नज़र आती बातों और चीज़ों से बनाया जाता है। कभी-कभी हमारे अन्दरूनी छंद या कल्पनाए स्वभाव की भूमिका बनती हैं मगर उनका दबदबा हरकतों और कहने सुनने के ऊपर ही अटका होता है। स्वभाव शख़्स के नैतृत्व के बहाव से परे होता है तो अन्दाज़ ही उसके पैश होने के तरीको को उजागर करता है।

परिवार, रिश्ते और काम हमें हमारे स्वभाव से परे जाने ही नहीं देते। लगता है जैसे जो भी चीज़ इस दौरान की जा रही है वो हमारे स्वभाव का ही एक हिस्सा बन जाती है। अगर हम हर शख़्स को उसके स्वभाव से आंकने लगेगें तो हमें क्या-क्या नज़र आ सकता है?

वो कहते हैं, "हम जहाँ कुछ बनाते हैं तो उसमें खो जाते हैं। उसमें हर चीज़ को सोचते हैं, कभी-कभी खुद को कोसते भी हैं, उस चीज़ से बिगड़ते हैं मगर कभी उसे तोड़ते नहीं बस, बनाये चले जाते हैं। जब कुछ लिखते हैं तो उसमें बहुत कुछ खूबसूरत बनाने की इच्छा रखते हैं। जिसमें कुछ जान बाकी नहीं होती उसे भी ज़िन्दा मानकर उसके साथ चलने लगते हैं। इसमें कोई भी चीज बेकार नहीं होती। ये हमारी समझ में बसा होता है। पर क्या इस तरह की सोच में जाने का, उतरने का या बहने का कोई वक़्त होता है? हमारी असल ज़िन्दगी और पारिवारिक नितियाँ हमें इससे बाहर खींच लेती हैं या हम खुद ही बाहर आ जाते हैं?"

ये सवाल अपने आपसे टकराने के सवाल थे। जो वो खुद में बुदबुदा रहे थे। शब्दों की ताकत, इच्छा और कल्पना की शक़्ति हमें हमसे कहीं दूर ले जाती है। जिसमें हमें ना तो किसी भी चीज़ का बुरा लगता है और न ही कोई चीज़ बेकार लगती है, न कोई मरा दिखता है ओर न ही कोई अजनबी बना नज़र आता है। ये दुनिया जब हम अपने में रच लेते हैं तो हम कहाँ होते हैं? वही हमारा अपना स्वभाव है। क्या वो दुनिया महज़ रची हुई है जिसके मिटने की कोई तारीख़ है या वो और गहरी होती जाती है? ये हमारे अन्दर के अहसास हैं। जो उससे बाहर नहीं जाना चाहते।

यहाँ पर जैसे एक सवाल को समझने के लिए सवालों की बौछार सी होने लगती है। वो सवाल कितना गहरा है उसकी गहराई नापने का काम यहाँ पर शुरू हो जाता है।

वो बोले, "मुझे अफ़सोस है कि मैं कभी नहीं रह पाता अपने इस रूप में, लेकिन मैं कुछ रचना और गढ़ना कभी बन्द नहीं करता। हाँ इसके दरिया में गोते जरूर लगाता हूँ। गोते लगाकर सबको उसकी छींटों से भिगो देता हूँ उसके बाद बाहर निकल आता हूँ। ऐसा लगता है जैसे कोई धारा या तो मुझे अपने अन्दर खींच लेती है और बहा ले जाती है या फिर कोई मुझे बाहर धकेल देता है। हर बात को, माहौल को और घरेलु नितियों को बहलाने का काम मुझे कसोटने लगता है काम का दरिया जैसे मुखे अपने अन्दर की कल्पनाओ को पैदा नहीं करने देता। मैं ऐसे कभी नहीं कहता की घरेलु नितियों में सम्भावनाये नहीं होती शायद मैं ही नहीं समझ पाता। मेंरी मुलाकात दोबारा उसी कल्पनाओ से जब भी होगी मैं आपके पास जरूर आऊगाँ"

लख्मी

बातों के सहारे...

दिल्ली शहर के रग़ में बसी कई ऐसी जगहें हैं जो कहीं छुपी हुई हैं। उसी में जीते हैं कई ऐसे जीवन को खुद को बुलंद और कुछ न कुछ तलाशने में रखकर जीते हैं। उन्ही से मुलाकातों का सिलसिला खुद को शहर के बीचो-बीच छोड़ देता है और कहता है जाओ खोजों खुद को। उन्ही तलाश में एक जगह ये भी...


बस, कुछ ही समय का काम है यहाँ पर बाकि के वक़्त तो सिर्फ बातें होती हैं।

बातें यहाँ सौगात की तरह बाँटी जाती हैं। बातें जिनका मौड़ क्या है वे समझना बेमतलब का होगा। बातें उसी अहसास से गुज़रती है जिसमे हल्के-फुल्के पलों का बोल-बाला रहता है। बातें क्यों हो रही हैं?, क्या हो रही हैं? और कौन किस को खोजकर बातें कर रहा है वे तय नहीं है।

मगर फिर भी बातों की पतंग यहाँ सभी के अरमानों के बादलों मे बड़े प्यार से उड़ती है, लहरती है और कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर ठुमकती भी है।

पहली ही नज़र मे ये एक बड़ी और गहरी जगह के रूप मे खुल जाती है, मानों जैसे हर गली एक अलग ही देश की हो जाती है। जहाँ कोई गोदाम में पड़े कागज़ों और गत्तों के ढेर पर अटका किसी को कुछ सुनाता दिखेगा तो कोई पुरानी कब्रों पर बैठा पूरे इलाके मे नज़र दौड़ाता हुआ लोगों के बारे मे कहता रहेगा। कोई ढेर मे से पन्नियाँ चुनता हुआ कोई अपना ही गीत गाता फिरता है। अपनी बोती भर जाने के बाद साथी की बोरी मे अपना हाथ घुसाता रहेगा। कोई चावलों मे परछा मारती हुई किसी के घर की बातों मे कोई हुई सी देखेगी।

नज़र जैसे ही उठती है तो छोटे-छोटे गुटों मे ये हल्की-फुल्की बातें एक-दूसरे के अंदर दौड़ती नज़र आती हैं।

इस जगह को यही सवारते हैं, सकेरते हैं और भरते भी हैं। सकेरा हुआ जर्दा भी यहाँ पर बेहद अनमोल है। छटाई, चुनना और इकठ्ठा करना जैसे शब्द यहाँ की रोज़मर्रा में उतर चुके हैं।

अभी कुछ ठप है, मगर इसका अहसास करना आसान नहीं है। इस तस्करी से भरपूर इलाके के आसरे कई कमाउ लोग जुड़े हैं जिनके यहाँ पर हर वक़्त रहने से ये कभी ठप नहीं लगती।

यहाँ पर होती बातों मे ये जगह हमेशा कमाऊ और माल से लदी दिखती है। लोग इंतजार करते हैं यहाँ पर कट्टो के चिट्ठे लगने का। गोदाम के भर जाने से दिहाड़ी की गुंजाइसें खुलने लगती है। जिसका इंतजार केवल यहाँ के लोग ही नहीं बल्कि वे लोग भी करते हैं जो ट्रक, टेम्पो के साथ मे रहते हैं। महिने मे चार बार ये मौका बड़ी बेसब्री से आता है, जिसमे दिहाडी कमाने वाला दौड़ लगाता है। ये दौड़ दस मे से आठ को तो जीतनी होती ही है तो दौड़ हमेशा लगती है।

किसी बड़ी खुशी के इतजार मे लोग छोटे-छोटे खुशी के अवसर नहीं छोड़ते। टेम्पो मे समान लादना हो या टेम्पो वाले के साथ हेल्परी करवानी हो, ये काम जोरो पर होता है।

इस काम की माँग शुरू होने वाली है। गोदाम भरा और लदा खड़ा है। बोरियों के चिट्ठो ने पीछे के गोदामों को ढक दिया है। गली में कोई कागज़ खुला हुआ नहीं दिखता। न ही कोई बोरी खाली पड़ी दिख रही है। सब कुछ कसकर बाँधा गया है। गोदाम की जमीन सूखी और साफ पड़ी है। सात-सात फिट के कट्टे काफि वज़नदार रूप लिए हुए है।

तैयारी जोरो पर हैं...

"हम तो भइये महीने टू महीने कमाते हैं यहाँ। कभी समान लदवाने का तो कभी कुछ बिनने का। उसी से शाम के खाने का और पीने का जुगाड़ हो जाता है। मस्त लाइफ कटती है हमारी। दिन में दो-चार को हराकर कुछ निकाल लेते हैं, और कभी हार जाते हैं तो थोड़ा पिट भी लेते हैं। लेकिन लाइफ मज़े मे गुज़रती है। कसर नहीं छोड़ते किसी भी चीज़ मे और कोई काम भी अधूरा भी नहीं रहने देते।"

"हम तो यहाँ की सफाई करते हैं, उसी में हैड टू हैड पैसा मिल जाता है। ये पैसा हमें कोई देता थोडइ है. जो मिलता है उसे ही बैचकर कमा लेते हैं।"

तीन लड़के गोदाम के नल पर तोलिया बांधे एक दूसरे से बातें कर रहे थे। एक कहता, "इस बार मामा के वलीमे मे कोई खुशी न मिली हमें तो, हमारे तो चाचाजान ही हमारे पीछे लगे रहे। कहीं जाने ही नहीं दिया।"

दूसरा बोला, "एक बात तो बताओ भाई, अगले महीने क्या करोगे? क्या यही समान लादने का काम करना है या किसी गाड़ी पर रहोगे?"

पहला बोला, "अरे हम जैसे मेहनती आदमी को काम की कमी न है, कर लेगें कोई भी काम।"

तीसरा बोला, "भइये काम कोई भी करेगें लेकिन वे करेगें जिस काम के बन्द होने के आसार नहीं होगें।"

एक औरत गली की छोटी सी नाली मे सीकों की झाड़ू मारती हुई कुछ बड़बड़ा रही थी। "कभी तो पानी का निकास छोड़ दिया करो जब देखो कुछ न कुछ ठूसकर उसे यहीं अटका देते हैं। हम सोचते हैं कि यहाँ पर कुछ जमे न मगर कोई न कोई समान इसमें अटका ही रहता है।"

दो आदमी गोदाम के अंदर एक बेहद छोटे टेबल फैन को चलाये बैठे थे और गोदाम में नज़रे घुमाते हुए बातें कर रहे थे। उनमे से एक आदमी बार-बार समान का हिसाब लगा रहा था। वे बोला, "एक बार गर किसी की नज़र लग जाए तो काम कहाँ होता है। सोलह दिन में भी इतना माल नहीं लपेटा की एक टेम्पो भी लद जाये।"

"मैं तो ये सोच रहा हूँ भाईजान की दिल्ली का सारा कूड़ा जा कहाँ रहा है जो यहाँ नहीं आया तो?"

बाहर चौपाल पर मिले दो दोस्त एक-दूसरे से पहली बार मिले हैं उस अहसास से बातें कर रहे थे। एक बोला, "अरे कैसा है यार? तू तो मिलता ही नहीं है। कहाँ हैं आजकल?"

दूसरा दोस्त, "बस, यहीं है तू बतला कैसा है? काम कैसा चल रहा है?"

पहला दोस्त, "काम तो बड़िया चल रहा है। बस, आजकल अपनी दुकान खोलली है लेकिन काम तो हम गोदाम में ही करते हैं। दुकान का महीना और गोदाम की दिहाड़ी दोनों की हुड़क लग गई है हमें तो"

दूसरा दोस्त, "तू यहाँ है कबसे जो दुकान खोलली और दिहाड़ी भी मार रहा है?"

पहला दोस्त, "भाई हम तो यहाँ पर होश संभालते ही आ गए थे। हफ़्ते मे तीन दिन काम करते और कुछ न कुछ जुटा ही लेते रहे। खूब दिहाड़ी मारी है हमने। यहाँ जितने भी काम हैं सबमे हाथ आज़माया है हमने तो, जब लगा की इस दूकान की जरूरत है यहाँ पर डाल दी।"

दूसरा दोस्त, "बहुत बड़िया यार, लगे रहो और मिलते रहो यार।"

बातों का काफ़िला बाहर की तरफ मे दौड़ा चला आता है। जिसे कोई नहीं रोक सकता और रोकेगा भी क्यों भला। ये तमन्ना ही कुछ इस तरह की है जिसपर जोर नहीं चलता। कई छोटे-छोटे मौकों मे ये खूब फलता है। ऐसा लगता है जैसे ये बातें इस जगह की अंतरमन की तस्वीरों को खोल देती हैं। जिसको देखने मे जितना मज़ा आता है उतना ही उसे समझने की चेष्ठा जगती है। जिसके सहारे ये जीती है।

लख्मी

Tuesday, May 12, 2009

तुम तो अपने ही आदमी हों

दिन तारीख़ तो याद नहीं पर जब मुलाकात हुइ तो वो चन्द बातें याद रह गई जो अबतक मेरे वक़्त काटने का एक ला जवाब रास्ता बन गई थी। आर.टी.वी छोटी बस स्टेंड जो एच ब्लॉक के चौराहें पर हैं जिसके रास्ते चार अलग-अलग दिशाओं को चले जाते हैं। एक शमशान भूमि दूसरा तुगलकाबाद तीसरा खानपूर और चौथा पूष्प विहार को जहाँ अभी बी.आर.टी बस कॉरीडोर बना है। जगह का ये वर्णन दक्षिणपूरी के रहने वाले हर शख़्स के दिलो-दिमाग पर न छूटने वाली स्टेप की तरह लगा है।

किसी ने बड़ी तेज़ी से आवाज़ दी "ओ पप्पू"। माहौल पहले से ही अपने अन्दर होने वाली हरकतों से झुँज़लाया हुआ था। हम एक कोना पकड़ कर खड़े थे। उनसे मुलाकात उनके नाम से शुरू हुए फिर सीधे काम-धन्धे पर आ गई। उसके बाद हुआ असली सामना। दो-चार बार उनके बारे में काफी सुना था पर कोई काम नहीं पड़ा। बातों की इस असीमता में उनका मिलना बेहद ला जवाब था। वो वक़्त को अपना दोस्त बताते हुए बोले, "वक़्त दोस्त की तरह होता है जो कभी साथ नहीं छोड़ता हर पल हर क्षणिक ज़िन्दगी का हाथ थामें चलता है। ये पता रहे की हम किसी के साथ चल रहे हैं जहाँ ये भूले तो रास्ता भटक जायेगें और तब अकेले हो जायेगें। समझो, जहाँ हाथ छूटा किस्सा ख़त्म।"

गाड़ियो से और आते-जाते लोगों की बातों के शौर में उनकी बातों को मैं सुन्ने की पूरी कोशिश कर रहा था। वो दृश्य मेरे ज़हन में अभी घूम रहा था। घर आकर मैनें अपना टीवी ऑन किया फिर यकायक ध्यान उनके चेहरे की तरफ चला गया। कमरे के शौर से मैं कहीं बहुत दूर पहुँच गया। जहाँ मैं अपने से सवाल जवाब करने लगा। क्या नाम था उनका?, हाँ याद आया- शंकर।
नाम याद आते ही मैं वापस अपने कमरे की चार दिवारी में आ गया। टीवी चल रहा था। बस इतना मालूम हो रहा था। रह-रहकर शंकर भाई उस माहौल से जुड़ी एक तस्वीर में मौज़ूद छवि की तरह लग रहे थे पर वो किस्सा ख़त्म कहाँ होने वाला था।

सुबह के 11 बज रहे थे। मैं उनके पास खड़ा था। आँखों के ठीक सामने शंकर भाई का चेहरा था। वो पैशे से राजमिस्त्री हैं और ज़ुबान के उतने ही पक्के हैं जितनी की उन हाथ से बनाई गई ईंट-पत्थर की दिवार होती है। जब मैंनें उनसे एक छोटा सा बाथरूम बनवाने की बात की तो मुस्कुराकर उन्होनें कहा, "चिन्ता मत करो तुम तो अपने ही आदमी हो जब बोलोगे बना देगें।"

शंकर भाई के इस डायलॉग ने मुझे जैसे एकदम निश्चिन्त कर दिया फिर भी मैंनें समान कितना लगेगा और उनका अंदाजा लेने के ख़्याल से दोबारा सवाल कर डाला।
"शंकर भाई मुझे अगर आईडिया मिल जाये तो मैं उसके हिसाब से समान मगवाँ लूगाँ।"

शंकर भाई ने कहा, "जब काम करना हो तो बता देना समान का क्या है वो थोड़े ही अपने आप अपने पाँव आ जायेगा तो हम ही तभी ही बता दूँगा।"

उनसे सारी बातें हो गई थी बस, मैं घर आकर कैसे बनेगा बाथरूम ये सोच रहा था। कमरे में मौज़ूद उमस का मुझे अहसास हुआ तो मैंनें पंखा चला लिया इस से मेरे हाँफते विचारों को राहत सी मिल गई। तीसरी बार जब फिर से मैंनें उनकी तरफ ध्यान दिया तो वो खड़े हुए हाथ की उंगलियों पर बाथरूम में लगने वाली चीज़ों का हिसाब लगा रहे थे।

उनकी खानेदार कमीज़ की जैब में छोटा सा कैल्कुलेटर होने के बावज़ूद भी शंकर भाई हथैलियों से क्यों काम ले रहे हैं। पागल है क्या हर पागल ऐसा ही होता है। वो अपने मन सोचता है और मन के गणित से सारे समिकरणों का हल निकाल लेता है। वो हथैलियों पर बनी लक़ीरों से ही काम ले रहे थे। मेरे ख़्यालों में मेरे उस पीरियड ने दस्तक दी जब मैं नवी कक्षा में था। दरअसल मुझे स्कूल में पढ़ायें गए विषय याद आ गये जो ज़िन्दगी में आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कल थे खैर, जाने दो।
मैंनें उन्हे तनिक भी वो बात कहने की कोशिश नहीं की जो अभी मैं सोच रहा था। वहीं कैल्कुलेटर वाली बात। शंकर भाई ने कहा, "तुम्हारे ज़्यादा पैसे नहीं लगने दूँगा। जब मन हो बता देना समान भी दिलवा दूँगा और कोई सेवा मेरे लायक?”

उनके इन शब्दों ने मेरा मुँह बन्द कर दिया। तब लगा की ये अपनेपन का अहसास देने वाला कौन है? जो अभी का भरोसा दिला रहा है। एक खुशी सी मेरे चेहरे पर आ गई। ये मेरे निश्चिन्त होने की एकमात्र निशानी थी।

राकेश