Friday, February 8, 2013

दो अवशेषों के बीच बातचीत

10 दोस्तों का एक गुट एक पिज़्जा हॉट से खाकर निकला। एक प्लेट में पिज़्जा के कुछ टुकड़े और दूसरी प्लेट में एक सौ का नोट छोड़कर।




टीप में दिये गये 100 रूपये के नोट ने प्लेट में पड़े पिज्ज़ा से पूछा, " तुम बता सकते हो कि आखिर काम क्या है?”
पिज्ज़ा ने उसकी ओर देखते हुये जवाब दिया, "काम भूख को संतुलन में रखने के लिये किया जाता है।"

100 रूपये का नोट, "तो फिर कमाई क्या है?”
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, " कमाई तो भूख को बढ़ाने के लिये होती है।"

100 रूपये का नोट, "एक अच्छे काम में और एक अच्छी कमाई में क्या फर्क है?”
पिज़्ज़ा ने कहा, " जिसमें हर तरह की भूख का निवारण हो। वो सिर्फ शरीर की शक़्ति, दिमागी संतुलन को भी महत्व दिया जाये।"

100 रूपये का नोट, "तुम्हारे इस काम में आराम क्या होता है?”
पिज़्ज़ा ने कहा, "यहां केफे कॉफी शॉप में आकर लगा और जाना भी की आराम यहां पर व्यस्त रूटीन की थकावट को पाना नहीं है। ये बिलकुल ऐसा है जैसे कोई मॉडल के जैसा जिसे हर 2 मीनट के बाद मे कपड़े बदलने है जब वो कपड़े बदलता है तो रिलेक्श नहीं होता बल्कि स्थिर होता है मगर उसका पूरा ध्यान उस रेंप पर होता है जहां से वो आया है और अभी वहीं पर जाना है। हम भी एक कुर्सी पर बैठे उस रेंप के लिये बैठे हैं।"

100 रूपये का नोट, "किसी काम के लिये तैयार होना क्या है? क्योंकि मुझे तैयार नहीं किया जाता। मुझे लाया जाता है। मैं किसी का नहीं हूँ। मैं हाथ का मैल हूँ। ये कहा जाता है और तुम्हारे लिये क्या?”
पिज़्ज़ा ने थोड़ा रूककर जवाब दिया, "तैयारी तो ताजा होना है, लूक बनाना है, इम्प्रेशन लाना है और साथ ही ये तैयारी सिर्फ इसलिये भी नहीं है की तुम कैसे दिख रहे हो। ये उस आंख के लिये है जो दिखाई नहीं दे रही मगर फिर भी तुम्हे देख रही है। वे आंख किसी अकेले की भी नहीं है। किसी भी हो सकती है। हर आंख का अपना ही एक सवाल है उन सभी सवालों का एक बेशब्द जवाब है ये तैयारी। तुम कौन हो, कहां जा रहे हो, तुम्हारा स्टेटश क्या है, किस रूतबे में हो, क्या करने जा रहे हो और साथ ही पहचान के सवाल भी होते होगें। इन सबको बदलती, पलटती और सहराती भी है ये तैयारी। तैयारी खुद के साथ होती जरूर है लेकिन होती अपने से बाहर के लिये हैं। कुछ देर ही होती है फिर समाप्त हो जाती है। मैं इसमे रोज जीता हूँ।"

100 रुपये के नोट ने फिर पुछा, "तैयारी पूरी हो गई क्या तुम्हे इसकी परख हो जाती है?”
पिज़्ज़ा ने कहा, "मुझे बनाने वाले ने जब मुझे फिर से देखा, तभी ये अहसास हो जाता है। हाथ मे लेता है, छूता है, देखता है, रखता है, फिर से देखता है, जैसे वो मेरी तैयारी में खुद तैयार कर रहा हो। वॉमप भी करता है। आसपास से खुद को ट्रेंड करता है। देखकर सीखता है और खुद में धारण कर लेता है। मैं कुछ समय के बाद मे उसका हो जाता हूँ। मैं उसका हुआ और वो मेरा। जैसे वो मेरे अंदर घुस गया हो। हम असल में अपने अंदर मे घुसे हुए उन सभी लोगों की एक्टींग करते हैं। कब कौनसे बंदे की एक्टिंग करनी हैं इसको जान लेते है। तैयारी तो सारी भीड़ मे खोई हुई है। किसी के कंधे पर हाथ रख कर पूछो की 'भाई साहब क्या कर रहे हो?' तो वो बोलेगा कोर्स कर रहा हूँ या कहेगा की जॉब कर रहा हूँ। कोई भी शायद ये कहे की घूम रहा हूँ शहर देख रहा हूँ और अगर ये वो कह भी देगा तो आपको लगेगा की आपका मजाक उड़ा रहा है या तंज मे बोल रहा है। यहां पर एक शख्स रोज़ आता है। वो मेरा फेन है। मुझे बेहद पसंद करता है। मेरी इज़्जत करता है। मैंने उसकी सारी बातें सुनी है। वो कभी अपनी बात नहीं करता और वो कभी अकेला भी नहीं आता। वे अपनी जेब में जैसे शहर की हर तरह की नौकरी लिये चलता है। उसके साथ आये सभी उससे नौकरी ही बात करते हैं। जब भी उससे काम की बात होती है वो तो कहता है की चल चला जा मैं पता देता हूँ मेरा नाम ले दियो बस, नौकरी लग जायेगी।"


100 रुपये के नोट ने चाव दिखाते हुए पूछा, "किसी राह पर कितनी चीजों को हम छोड़ते हुए पहुँचे हैं इसका पता कैसे चलता है?”
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया बिना किसी इमोशन के, "वैसे देखा जाये तो हमने पकड़ा ही क्या है अब तक? हमें एलियंस की फिल्मों की तरह रखा जाता है। हमें देखकर लोग चौंकते हैं, डरते हैं और अपना भी बना लेते हैं। एक डायलॉग है जो मैंने यहां कईओ के मुंह से सुना है कि हम इंसान अपना दिमाग 10 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाते हैं। बाकि का 80 प्रतिशत तो खाने में खत्म कर देते हैं। तभी तो हम जिन्दा होते हैं रोज और हम रोज़ इस्तेमाल में आते हैं। हम 90 प्रतिशत तो छोड़ते और भूलते ही तो जा रहे हैं। इसका अपना दम है।"


100 रूपये के नोट ने गुस्से में पूछा, "तो क्या हमें चुना जा रहा है?” 
पिज़्ज़ा ने कहा बिना किसी इमोशन के, "चुनाव अपने आप में खुद क्या होता है? 1000 लोग रोज आये। आने से पहले कुछ चुनकर आये। कुछ यहां पर आकर चुनाव किये। कुछ अपने से बाहर होकर चुनाव किये तो कुछ किसी का चुनाव देखकर चुने। स्वाद से चुने, जेब देखकर चुने, टेबल देखकर चुने, परिवार देखकर चुने, टाइम देखकर चुने, भीड़ देखकर चुने, भूख सोचकर चुने। खाने के लिये, पैकिंग के लिये, किसी को देने के लिये, किसी को मनाने के लिये, किसी को दूर करने के लिये, प्लेट मे छोड़ देने के लिये। चुनाव है नहीं। चुनाव होता नहीं, चुनाव हो रहा है और होता रहा है।"

100 रूपये का नोट  गुस्सा जारी रखते हुये,  "क्या  इसके लिये भी कुछ सवालों की जरूरत पड़ती है? मुझे प्लेट मे छोड़ दिया गया। मेरी इज्जत बड़ गई किसी के जहन में। मगर मैं तुम्हारे लिये मानयता नहीं रखता। मुझे छोड़ा गया है। मेरा चुनाव किया गया। या मुझे छोड़ दिया गया?” 

पिज़्ज़ा ने कहा  ( बिना किसी इमोशन के), "बहुत तरह के सवालों की जरूरत हो सकती है।


100 रूपये के नोट ने पूछा, “ये सवाल आखिर पूछता कौन है?”
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, “ये सवाल पुछता कोई नहीं है। इन सवालों का अहसास होता रहता है। कभी जब काम में हल्का सा भी मन हटा तब इनका अहसास होगा, कभी जब किसी एक ही काम मे लीन हो गये तब इनका अहसास होगा। मैं जब यहां पर पहली बार आया था तभी इसका अहसास पूरी तरह हो गया था। हर कोई जो यहां पर मेरे से पहले ही काम कर रहा था उसकी तेजी, भागमभागी, बोलचाल सब में इन सवालों का अहसास था। कोई अगर आ गया वो बाहर नहीं जाना चाहिये और अगर कोई नहीं आया तो उसे बुलाकर लाना है। उसे ये अहसास करवाना है कि ये जगह उसी के लिये है और इससे बेहतरीन जगह दुनिया में और कोई नहीं। इतना सोच पाया कि काम की दुनिया में "मोहना" बेहद जरूर है। आसान है लेकिन इसको आज़माना बेहद मुश्किल। जैसे मुझे एक बंदा यहां पर रोज़ यहां से वहां करता है। वो कर क्या रहा है ये तो पता नहीं लेकिन वो हमेशा जैसे बहुत सारे लोगों मे घिर हुआ है। हमेशा फोन पर रहता है। काम जितना आसपास से काटता है उतना ही वो आसपास में ना दिखने वाली भीड़ को तैयार भी कर देता है। हम भी इन सामने दिखती कुर्सियों पर उस भीड़ को हमेशा देखते हैं। हर पांच मिनट के बाद में हममे से कोई ना कोई इन कुर्सियों के पास जाता है और घूमकर आ जाता है। और जब हमारी ट्रेनिंग होती है तो इन्ही खाली कुर्सियों पर ना जाने कितने लोग बैठे होते है। और हर बंदे का एक ऐटीट्यूट होता है। जो हमें अपने अन्दर ले लेगा और उसे हमें काटना होगा। जैसे हम खुद को ही काट रहे हैं और खुद को ही मोहित कर रहे हैं।"

100 रूपये के नोट ने पूछा, "क्या तुम भी कुछ सवाल रखते हो इस सब मे?"
पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, “मेरे सवाल तो नहीं मगर शायद तुमने कभी इनको सोचा हो? मैं बस, अपनी बैचेनी को हल करना चाहता हूँ। काम का ताल्लुक अंतिम चीज से है तो उसको रूटीन से क्यों जोड़ा गया। ऐसा क्या है जो काम नहीं है? कमाई, मेहनताना, दिहाड़ी इनके साथ जोड़ दिया जाना वाला काम ही वाज़िब है? सब काम कर रहे है और कोई जगह काम करने के लिये नहीं बनाई जाती तो ये दुनिया कैसी होती? एक चीज और – सोचो की अगर काम का कोई सरकल नहीं होता तो? जैसे हर बंदा इस सरकल में है। आज जो मेरे पास कस्टमर बनकर आया है मैं भी उसके यहां जरूर गया होउंगा या जाऊंगा। बस मे चड़ा कोई कन्डेक्टर से टीकट लेता है तो कन्डेकर भी उसके ओफिस मे किसी ना किसी काम से गया होगा। हर कोई एक दूसरे के पास मे घूम ही तो रहा है मगर फिर भी सिर्फ अपने काम की बात कर रहा है एक दूसरे के काम की नहीं। मैं सोचता हूँ की ऐसे ही कैफेकॉपीशॉप खोलूँ जहां पर लोग अपना काम करने आये। हर कोई ओडर लेने वाला, टेलीफोन ओपरेटर, चित्रकार, कारपेंटर, सभी, एक ऐसी बिल्डिंग जहां काम हो। बिना ओफिस बने और ना ही दुकान।"

100 रूपये का नोट हंसा और बोला, “तुम्हे फिर मेरा साथ जरूर चाहिये होगा। मतलब काम से बाहर की जगह जहां पर लोग एक दूसरे से कुछ बातें करने आये और जो वो कर रहे हैं उसमे उसे जोड़ ले। इस तरह की जगह से तुम संतुष्ट हो जाओगे? और कहां पर बनेगी ये जगह?”

पिज़्ज़ा ने जवाब दिया, “अभी तो पता नहीं लेकिन बनेगी जरूर।"


लख्मी

असंगति

राकेश

कुछ अनसुने किस्से


अगर ये पता हो जाये की हमें करना क्या है तो दिमाग चलना बंद हो जाता है और फिर शरीर किसी मशीन की तरह चलता है उस काम को करने के लिये। काम उस मशीन को पूजा मानता है।

अखबार की कई कटिंग ना जाने कितने सालों से उपर वाले कमरे की दिवारों मे किन्ही पतले सरियों में फसी पड़ी हैं। दीवारें कई मेग्जिन की कटिंगो से सजी है और अलमारियां उन कहानियों की किताबों से जिसमें अपने उन दिनों को गुजार देने की बातें शामिल हैं जब सिर्फ कटिंग करना ही अपना एक मात्र काम था। सुबह अखबार और मेग्जिन डाला करते और शाम मे उसी मे अपने लिये भी मेग्जिन और अखबार ले आते और फिर शाम में शुरू होता अपने कमरे को अपने लिये तैयार करना। हर कलेक्शन बनाने की इच्छा शक़्ति जैसे अपने जोरों पर थी। कहानियों की दीवार, डायलॉग की अलमारियां, तस्वीरों की छतें और पर्चियां नौकरियों की और एक बड़ा सा मेप जिसमें कहां कहा गये नौकरी के लिये उसका हिसाब समित एक अपना भी मेप बना था।

मेरे कई दोस्त उसमें मेरा साथ देते। हर कोई उसमें कितना पैसा कहां लगा, कहां गये और कहां पर नहीं जा पाये सब नोट होता। कभी कोई नौकरी नहीं। इस बात का कतई गम नहीं। लेकिन वो साथी कहीं किसी नौकरी मे खो गये। तब जाकर अहसास हुआ की काम की दुनिया कुछ चुराती नहीं उसे गायब हो जाने पर मजबूर करती है।

अपना तो एक अखबार का ठिया है और मेग्जिन का भी। 18 साल से वहीं कर रहा हूँ। सोच रहा हूँ वही फिर से अपनी बचकानी हरकत को चालू करूं। क्या पता कुछ उनके जैसे नये दोस्त मिल जाये।

लख्मी

Friday, January 11, 2013

आदमी नियमित काम पर है

राकेश

एक और आंख चाहिये

शहर और उसकी घनत्वत्ता
शहर और उसकी बैचेनी
शहर और उसकी तड़प
शहर और उसकी उत्तेजना
शहर और उसकी हैरानी
शहर और उसकी हैवानी

इनको देखने के लिये एक और आंख चाहिये।

राकेश

Thursday, January 10, 2013

खुश रहना इतना दूर

खुश रहने के लिये आखिर करना क्या पड़ता है? क्या खुद को भुला देना ही खुशी है? या खुद को हमेशा याद मे रखना ही खुशी के समान है? मेरे दोस्त अक्सर इस बात से बहस करने के लिये हर दम खुद को आज़माते रहते हैं। लेकिन इसका हल उतना ही नाज़ुक और महीम होता है जैसे तेज़ पानी की धार मे कई बुलबुले जन्म लेते हैं और खत्म होते जाते हैं। इस जीवन की गुणवत्ता को खुशी के अहम झरोखो से होकर देखने की लालसा खुशी का पर्दा कहलाती है।

ये बात कोई खुशी की परिभाषा नहीं है और न ही उसकी कोई चादर। ये तो वो अहसास है जो जीने मे कभी कटूरता ले आते हैं तो कभी सम्पर्ण की बात कहते हैं मगर हाँ, इस बात में कई अनंत जीवन के रूप शामिल होगें।

शहरी चेहरों पर गुदी कई ऐसी व्याख्याएँ अपनी छाप छोड़ती जाती हैं जैसे जो शायद किसी एक ही जुबान से निकलने के बाद में अनेकों जीवन के आधार की अभिलाषी हो। ये होना कोई जादूई खेल नही हैं बल्कि ये उस दमखम से खुद को पैश करना और करते जाना है जिसको कोई कभी न कभी अपना ही लेगा ये रिद्धम इसी दौर में जीती है। जैसे - इसका जीवन फिल्म के उन डायलॉग की तरह होता है जो फिल्म मे किसी मतलब के नहीं होते हैं लेकिन फिर भी किसी के जीवन में किसी पीटे वक़्त को दोहराने के लिये जुबानों पर आ ही जाते हैं।

जीवन के अनेकों अहसासों मे सबसे ज्यादा दूरी किस अहसास से हो जाती है और किसको हमेशा पाने की रेस में रखा जाता है? लेकिन, इससे भी ज्यादा जरूरी ये बात दिमाग मे अपनी निगेबाँह छोड़ती है कि क्या हम हर वक़्त उसी चीज़ की या अहसास की तलाश मे रहते हैं जिसके स्वाद को हमने सिर्फ छुआ या महसूस किया है? क्या हम हर स्वाद को पाने की लालसा पाल सकते हैं? क्या हमारा अपना कोई स्वाद बनता है उसकी परख क्या है?

ये अपने को समझने की बात नहीं है बल्कि उस रफ़्तार को छेड़ने की कोशिश है जिसको हम रेस कहते हैं और सारी तलाशों को उसके मोड़ बनाकर जीते हैं। खेर, ये मोड़ क्या कहते हैं और कहाँ पर ले जाकर छोड़ देते हैं इसका खामियाज़ा किसी के कब्जें मे नहीं है। ये तो अपने मनमुखी द्वार से बनते हैं और अपने साथ किसी वक़्त की गहरी छाप को ले जाते हैं।
सवाल अब भी वहीं पर जमा रहता है - खुश रहना क्या है?

खुश रहना उस उल्लास की तरह क्यों है जो महज़ किसी अवसर का अभिलाषी है? खुश रहना उस भेंट की भांति क्यों है जो किसी और से मिलती है? खुश रहना उस विज्ञापन की तरह क्यों है जो तीन घण्टे के बीच मे आती है? खुश रहना क्यों चाहता है कोई?

इस बात के कई जवाब होगें लेकिन खुश रहने की चाहत बनाना यानि किसी ऐसे स्वाद की तरह बढ़ना जो मन पसंद है।

मेरी एक दोस्त मिली उसका एक बात का जवाब सुनकर मैं दंग रह गया - जो बहुत सरल था। जिसमे कोई बनावट नहीं दिखी मुझे। उसी से ये समझ मे आया की जीवन की नीति क्या है?

उससे मैंने पूछा, “तुम डरावनी फिल्में ही क्यों पसंद करती हो?”
वो बोली, “क्योंकि मुझे बहुत डर लगता है।"

ये एक लाइन मुझे बहुत सरल बना गई। मेरा एक साथी जिसे लिखने का बहुत शौक है। उससे एक बार सवाल किया मैनें, “तुम अगर बहुत मेहनत करके, रात भर जागकर कोई लेख लिखो तो किस गुट मे उसे पढ़ना चाहोगें?”

उसने मुझसे कहा, “उसमें जो लेख को कहानी की भांति सुनता है। जो खुद नहीं लिखता।"

इन दोनों जवाबों में दोबारा "क्यों" कहने का सवाल ही पैदा नहीं हो पाया। ऐसा लगा की जीवन साथी, संगत और आसपास को एक बार फिर से सोचने की पैदाइश हो रही है। ये वो आसपास नहीं है जो पसंद और न पसंद से बना है बल्कि ये वो है जो बहस से जन्मा है।

खुशी होना और खुश होना - इसी रिद्धम के बीच की धरा है जिसमें शख्सियत और जीवन का खेल है। कौन कहाँ पर रूक जायेगा?

लख्मी