कौन कर रहा है ये गुस्सा?
किस पर कर रहा है ये गुस्सा?
क्या है ये गुस्सा?, कैसा है ये गुस्सा?
इस गुस्से की तस्वीरें क्या हैं?
जो होकर निकल गया है कहीं, उसकी लकीरें क्या हैं?
कोई लाइन में लगे रहने पर है गुस्सा
कोई लाइन से निकल जाने पर है गुस्सा
कोई किसी के खो जाने पर है गुस्सा
कोई अपनो के छुप जाने पर है गुस्सा
कोई स्सिटम पर है गुस्सा
कोई आज़ादी पर है गुस्सा
कोई अपनी दिनचर्या पर है गुस्सा
कोई अपनी दिनचर्या बिखर जाने पर है गुस्सा
मैं किस पर करूँ गुस्सा, मैं ये विचार कर रहा हूँ
कोई मुझे बताये कि मैं इस कदर खुद पर अत्याचार कर रहा हूँ
कोई किसी के बर्ताव पर है गुस्सा
कोई किसी के स्वभाव पर है गुस्सा
कोई किसी कि अदा पर है गुस्सा
कोई किसी के फ़िदा होने पर है गुस्सा
कोई जगह के बदल जाने पर है गुस्सा
कोई रोज़मर्रा पर है गुस्सा
कोई किसी की बात पर है गुस्सा
कोई किसी के साथ पर है गुस्सा
मैं किस पर करूँ गुस्सा, मैं ये विचार कर रहा हूँ
कोई मुझे बताये कि मैं इस कदर खुद पर अत्याचार कर रहा हूँ
कोई किसी के बड़बोलेपन पर है गुस्सा
कोई किसी की चुप्पी पर है गुस्सा
कोई बदले की आग पर है गुस्सा
कोई जगह के छिन जाने पर है गुस्सा
कोई वक़्त पर किसी चीज़ के ना आने पर है गुस्सा
कोई वक़्त से पहले चीज़ें हो जाने पर है गुस्सा
कोई किसी की रफ़्तार पर है गुस्सा
कोई किसी के ठहराव पर है गुस्सा
मैं किस पर करूँ गुस्सा, मैं ये विचार कर रहा हूँ
कोई मुझे बताये कि मैं इस कदर खुद पर अत्याचार कर रहा हूँ
किसी-किसी गुस्से की बुनियाद गहरी सी लगती है
कोई तो आग है जो कहीं ठहरी सी लगती है
गुस्सा शहर की सड़कों पर बिखर रहा है
गड़े मुर्दो की तरह, दिलों से उखड़ रहा है
राज करती कुर्सियों पर वल-वलाता है गुस्सा
दुखते अरमानों को छोड़, घर से निकल आता है गुस्सा
गुस्से में अपनो को यहाँ खोज रहा है कोई,
तलाश के घेरे मे मोम सा पिघल आता है गुस्सा
धमाको के धूँए मे पैदा होता है गुस्सा
मनोरंजन के बीच मे घुस आता है गुस्सा
तोतली ज़ुबानों मे जबरदस्ती झौंक दिया गया है गुस्सा
आँखों से आँखों मे बट रहा है गुस्सा
गुटों की ज़ुबानों मे छट रहा है गुस्सा
गुस्सा ही गुस्से पर हावी है
गुस्सा ही गुस्से का साकी है
वे भी इसकी लपेट में उतर आयेगें एक दिन
जो इस भीड़ में होते हुए भी बाकि हैं
मैं किस पर करूँ गुस्सा, मैं ये विचार कर रहा हूँ
कोई मुझे बताये कि मैं इस कदर खुद पर अत्याचार कर रहा हूँ
इस गुस्से की तस्वीरें क्या हैं?
जो होकर निकल गया है कहीं, उसकी लकीरें क्या हैं?
लख्मी
Wednesday, December 3, 2008
कुछ चश्मों से देखना
Friday, November 28, 2008
किसी को देखना और किसी में होना
किसी को देखना और किसी में होना, ये किस समझ को खींचता है और उसमे आवाज़ का क्या रिश्ता है? अक्सर हम अपने सामने बैठे शख़्स को एक तात्पर्य दे देते हैं कि वो हमारे सामने है और हमसे बाहर है? वो जो सुना रहा है वो उसकी टेंशन या स्वीकृति उसमे उसका दाखिल होना और हाज़िर होना वो स्वर से, बोली से या समझ से हो सकता है। तो देखने वाली हमारी आँखे उसके बिन्दु तलाशती है और आँकती है कि वो किन शब्दों में अपनी हाज़री को बयाँ कर पा रहा है बस, नज़र का दायरा महज़ उतारे हुए तक ही सीमित रहता है। उस आवाज़ का आकार या गहराई समझ मे नहीं आती। जो किसी कंठ से निकल रही है।
आवाज़ का रिश्ता महज़ ब्यौरा या भराव के लिए नहीं होता। वो एक भाव देती है और अन्य भाव पैदा करती है। वो भाव जो वो पैदा कर रही होती है वो नियमित समय की अवधि का कोई जवाब नहीं होता। वो एक ख़ास तरह का हस्तक्षेप होता है। जिसमे हस्तक्षेप के मायने वहाँ तक होते हैं जहाँ तक हम अपने दाखिल होने की हदों को संभाल सकते हैं। संभालना इसलिये होता है कि हम अपने अनुभव के मोड़ पर है पर किसी कहानी के अन्दर जहाँ पर हम अपनी मौजूदगी का आभास कर पा रहे होते हैं। मगर मैं वहाँ तक पँहुचा कैसे उसकी जर्नी मे समय का भाव पता होना चाहिये और उसके साथ-साथ मे हस्तक्षेप किसी मे हाज़िर होने की "मैं हूँ" वाला को आँका या नियमित किया दायरा नहीं होता।
कोई अपनी ज़िन्दगी को बोल रहा है। कोई अपनी ज़िन्दगी को शब्दों मे उतार रहा है। वो सामाजिक क्रियाओं के कुछ ऐसे बटँवारे है जिसमे वो अपनी कोई अलग छवि या "मुझे अलग देखो" कि अपील लिए नहीं है वो उस सामाजिक क्रियाओ मे हस्तक्षेप करने के लिए ही उतरना होता है।
माना जाता है की दोनों तरफ़ मे अपने अनुभव से कुछ है। पर उस अनुभव मे आते दृश्य मेरे हाज़िर होने से परे नहीं है और वो पल ना ही उनकी कोई खींची गई तस्वीर जिसमे मैं अपने चेहरे को तलाशू या खोंजू। वो घूम रहा है। अब उस दायरे में जिसमे पहला कदम रखा जा चूका है। इस हाज़िर होने मे कभी एक तरफ़ा नज़र नहीं होती और ना ही अकेलेपन का अहसास। एक पहले से ही जगह, ज़िन्दगी, समा, दायरा है जिसमे "मेरे होने का आभास जितना जरूरी है उतना ही वहाँ पर जाने का पहला कदम।"
इसका होना खुद से भी होता है और समाने से भी ज्ञात होता है। इनमे अन्तर क्या है? उनकी "बोली" मे वो छवि होती है जो वो बना रहे है और हमारी हस्तक्षेपी दुनिया मे वो जमा होती जाती है। हम फिसलते नहीं उसमे। जो लैख लाता है उसमे हाज़िर का आभास उसका है। वो अलग-अलग केन्द्रों से होता है। मज़ा, जोश, टेन्शन, उलझन, कर्कसी, ख़टास का अहसास तो कभी अपनी महत्वपूर्णता यानी के एक तरह का पारिवारिक रिश्ता। पर सुनने वाले के लिए वो बहस होगी या कुछ और?
मैं उस हाज़िर मे अपने कदम रखता हूँ तो कैसे? उसके हाज़िर होने के आभास को मद्देनज़र रखते हुए या अपने कदमो को कोई दिशा देता हूँ? किस की आवाज़ मेरे हाज़िर होने को आगे की तरफ़ मे धकेलती है? लैख मे जो दुनिया है वो या जो अपनी दुनिया का एक पात्र या किनारा उसमे पहले से ही दाखिल कर चुका है?
लख्मी
आवाज़ का रिश्ता महज़ ब्यौरा या भराव के लिए नहीं होता। वो एक भाव देती है और अन्य भाव पैदा करती है। वो भाव जो वो पैदा कर रही होती है वो नियमित समय की अवधि का कोई जवाब नहीं होता। वो एक ख़ास तरह का हस्तक्षेप होता है। जिसमे हस्तक्षेप के मायने वहाँ तक होते हैं जहाँ तक हम अपने दाखिल होने की हदों को संभाल सकते हैं। संभालना इसलिये होता है कि हम अपने अनुभव के मोड़ पर है पर किसी कहानी के अन्दर जहाँ पर हम अपनी मौजूदगी का आभास कर पा रहे होते हैं। मगर मैं वहाँ तक पँहुचा कैसे उसकी जर्नी मे समय का भाव पता होना चाहिये और उसके साथ-साथ मे हस्तक्षेप किसी मे हाज़िर होने की "मैं हूँ" वाला को आँका या नियमित किया दायरा नहीं होता।
कोई अपनी ज़िन्दगी को बोल रहा है। कोई अपनी ज़िन्दगी को शब्दों मे उतार रहा है। वो सामाजिक क्रियाओं के कुछ ऐसे बटँवारे है जिसमे वो अपनी कोई अलग छवि या "मुझे अलग देखो" कि अपील लिए नहीं है वो उस सामाजिक क्रियाओ मे हस्तक्षेप करने के लिए ही उतरना होता है।
माना जाता है की दोनों तरफ़ मे अपने अनुभव से कुछ है। पर उस अनुभव मे आते दृश्य मेरे हाज़िर होने से परे नहीं है और वो पल ना ही उनकी कोई खींची गई तस्वीर जिसमे मैं अपने चेहरे को तलाशू या खोंजू। वो घूम रहा है। अब उस दायरे में जिसमे पहला कदम रखा जा चूका है। इस हाज़िर होने मे कभी एक तरफ़ा नज़र नहीं होती और ना ही अकेलेपन का अहसास। एक पहले से ही जगह, ज़िन्दगी, समा, दायरा है जिसमे "मेरे होने का आभास जितना जरूरी है उतना ही वहाँ पर जाने का पहला कदम।"
इसका होना खुद से भी होता है और समाने से भी ज्ञात होता है। इनमे अन्तर क्या है? उनकी "बोली" मे वो छवि होती है जो वो बना रहे है और हमारी हस्तक्षेपी दुनिया मे वो जमा होती जाती है। हम फिसलते नहीं उसमे। जो लैख लाता है उसमे हाज़िर का आभास उसका है। वो अलग-अलग केन्द्रों से होता है। मज़ा, जोश, टेन्शन, उलझन, कर्कसी, ख़टास का अहसास तो कभी अपनी महत्वपूर्णता यानी के एक तरह का पारिवारिक रिश्ता। पर सुनने वाले के लिए वो बहस होगी या कुछ और?
मैं उस हाज़िर मे अपने कदम रखता हूँ तो कैसे? उसके हाज़िर होने के आभास को मद्देनज़र रखते हुए या अपने कदमो को कोई दिशा देता हूँ? किस की आवाज़ मेरे हाज़िर होने को आगे की तरफ़ मे धकेलती है? लैख मे जो दुनिया है वो या जो अपनी दुनिया का एक पात्र या किनारा उसमे पहले से ही दाखिल कर चुका है?
लख्मी
जगह का बनना
इसे दक्षिण पुरी कहते हैं
लगभग बाराह या साढ़े बाराह बजे का वक़्त होगा। गाड़ी गली मे कई कपड़ों की रस्सियों को तोड़ती हुई अंदर आ घुसी थी। झुग्गी तो अभी पूरी तोड़ी भी नहीं थी और गाड़ी वाले ने सभी को अवाज लगाई की "चलों भाई किस-किस को चलना है अंदर बैठ जाओ।" सभी ने कपड़ों को साड़ियों और चादरों मे लपेटकर गठ्ठियाँ बाँध ली, पर कपड़ों के साथ-साथ लोगों ने दरवाजे, खिड़कियाँ, चौखट और टीन की छतें भी उखाड़ ली थी। वो भी तो ले जाना था। लेकिन एक ट्रक और चालीस लोग और उनका समान भी उसमे, ये बड़ा-बड़ा उखाड़ा गया समान, घरों का ढाँचा कैसे ले जाया जाए? कोई इसे छोड़कर जाना नहीं चाहता था। सभी ने जैसे-तैसे उसे भी ट्रक मे भरा और गठ्ठरियों पर बड़े समानों की तरह लद गए।
सभी सोच रहे थे कि "जाना कहाँ पर है? वो करीब ही होगी?” ट्रक मे बैठे सभी दस मिनट गाड़ी चलने के बाद मे बड़ी जोर से चिल्लाते या आवाज लगाते जिनमे से ख़ासकर आवाजे औरतों की होती "ए, भईया कहाँ ले जा रहा है और कितनी दूर है?”
वो ट्रक की ट्रोली की तरफ़ मे निकलती छोटी सी खिड़की से तेज आवाज मे कह देता "बस, आने वाला है यहीं पर है आप सब बैठ जाओ रोड खराब है।"
इतना कहकर वो चुप हो गया और थोड़ी देर के बाद उसने हमें यहाँ इस जंगल मे लाकर छोड़ दिया जिसे वो दक्षिण पूरी कह रहा था।
शुरूवाती दो दिन
दक्षिण पुरी जो अलग-अलग जगह की बस्तियों के विस्थापन से बनी है। जहाँ पर शहर की अन्य जगहों से लोगों को लाया गया। ओखला, पहाड़गंज और कितवई नगर। दक्षिण पुरी की गलियों मे जहाँ पर चालीस से पैंतालिस मकान हैं। कई गालियाँ तो एक ही जगह से आए लोगों से बनी हैं। पूरी गली एक परिवार की तरह से है। चाचा, मामा , ताया और पता नहीं क्या-क्या? सारी औरतों के चेहरे पर घूँघट हमेशा चड़ा रहता है। इन औरतों के बीच मे अक्सर दक्षिण पुरी की शुरुवाती बातों की कहानियाँ उछल पड़ती है।
कहती है, "जब हम यहाँ पर आए थे तो काफ़ी मारा-मारी होती थी। कभी घरों को घेरने के लिए तो कभी रात मे पेहरेदारी के लिए। हमारे तो सभी एक ही तरफ़ के लोगों ने एक पूरी लाइन ही घेर ली थी और किसी को अंदर ही नहीं आने दिया। रात भर सभी खाट डालकर बैठे रहते। चार सोते तो दो जागते, ऐसा ही चलता। पर शाम को बड़ा मजा आता था। हम तो चुपके से खेतों मे जाकर सब्जी तोड़कर लाते थे। ताजी-ताजी सब्जी मिलती कभी 'सेम की फली' तो कभी 'पालक' काफ़ी सब्जियाँ लगी थी। यहाँ दूध तो भैसों का मिल ही जाता था और शाम का खाना रोजाना सब्जी तौड़कर लाओ और बनाओ ऐसा रहता। जंगल तो था पर खाने को मिल जाता था सब ठीक ही था। शुरु के दो दिन मुश्किल थे पर कट गए।
दोबारा ढूँढते रहे हम तो
काम-वाम सब छूट गया था, इस घर के चक्कर मे। जैसी बातें वहाँ ओख़ला की बस्ती मे होती थी हमारे घर के आगे वैसा तो यहाँ पर कुछ भी नहीं था। मुझसे अक्सर कहते थे, "भोलू राम तू चिंता मत कर अपनी जगह और पक्के मकान मिलेगें" ऐसा सुनने से काफ़ी होसला बड़ता था। लेकिन हम जब यहाँ पर आए तो यहाँ तो खेती होती थी और कुछ पहाड़ भी थे। यहाँ पर खानपूर गाँव की तरफ़ के जाट-गूज़र लोगों के खेत थे। जो एक ही तरफ़ मे फैले थे जिस तरफ़ मे हमको जगह मिली थी वो कच्ची जमीन थी जो पता नहीं क्यों चौबिसों घण्टे गीली रहती थी। पहले दिन और रात को तो हम यूहीं उसी कच्ची जमीन पर अपने समानों पर ही लदे सोए रहे। बच्चों को हम पहले ही उनकी नानी के यहाँ पर सिकंदरा बाद मे छोड़ आए थे। बस, मैं और मेरी वाइफ ही यहाँ पर आए थे। दिन तो हमारा ये देखने मे ही निकल गया था की कितने और लोग हैं जो हमारी तरह यहाँ आए हैं और पता नहीं कहाँ के होगें? जैसे ही कोई ट्रक वहाँ आता तो यहाँ बैठे सभी की नज़रें उसी की तरफ़ जाती और समान उतारते और बैठते लोग दिखने लगते चारों तरफ़ घाँसे और खेत देख-देखकर मन ही नहीं भर रहा था। वहीं पर बार-बार नज़र घूम रही थी। फिर थोड़ी देर के बाद हमने समानों को एक तरफ़ मे रखा और चादर तानकर छाँव करने की सोची पर रात भी हमारी जागते हुए गुजरी।
शमसान तले थे सभी
"अरे यहाँ तो बड़ बुरा हाल था। ऐसी जगह दी जहाँ अगर एक छप्पर डालने के लिए डण्डा जमीन मे गाड़ते तो गड्डा खोदते ही हड्डियाँ निकलती थी। यहाँ तो ये दक्षिण पुरी पूरा शमशान था। लोग यहाँ पर लाश जलाते और दफ़नाते थे। आसपास तो पहले से ही लोग रहते थे। ये मदनगीर गाँव, खानपूर गाँव, तुगलकाबाद के लोगों का शमशान घाट था और यहाँ तो जब आए थे तो कभी भी जानवर निकल आते थे। शांप, नेवले, बिछ्छू, अरे मुझे याद है एक बार हम घर बनवाने के लिए नींव खुदवा रहे थे तो जमीन गीली थी। नींव को गहरा खोदना था। जब नींव खोदनी शुरू की तो कुछ हड्डियाँ निकलने लगी। जब तो कुछ नहीं हुआ पर जैसे ही जमीन मे से इंसानी आधी खोपड़ी निकली तो मेरी वाइफ के तो होस ही उड़ गए। वो तो बेहोस तो गई, उसे तो पता ही नहीं था की उसे तो नींव गाड़ने की पूजा करनी है। उसने तो साफ़ मना कर दिया था। यहाँ रहने के लिए उस समय वो पेट से भी थी, पप्पू होने वाला था। वो तो भागने लगी फिर काम हल्का करके उसे उसके पीहर छोड़कर आया और बाद मे खुद बनवाया ऐसा हुआ।
नेता जी अक्सर उस दिन को याद करते हैं और दक्षिण पुरी को अगर किसी को बताना हो तो शमशान घाट कहे बिना रह तो नहीं पाते।
कौने मे रहने का मज़ा
दक्षिण पुरी जहाँ-यहाँ आज मकानो की किमत बहुत है और कौने के मकानो की किमत तो दस, बराह, पन्दराह लाख तक है। कौने के मकान वाले लोग तो आज बैठे-बैठे लेन्ड लॉड हो गए है। गली मे रहने वाला हर शख़्स आज कहता है की काश हमारा कौने का मकान होता आज। लेकिन, जब यहाँ दक्षिण पूरी मे नये-नये बसे थे या जब दक्षिण पुरी बस रही थी तो कोई भी कौने का मकान लेने को राजी नहीं था क्योंकि आसपास बड़े-बड़े खेत और दूर-दूर तक दिखता जंगल तो हमेशा डर रहता था किसी जानवर के आने का कौने का मकान एक दम पिछड़ा सा लगता था तो सभी अन्दर का मकान चाहते थे। लोगों के बीच का और रात होने के बाद तो लूट-पात भी होती थी आसपास के कुछ (लठेत, शराबी-कबाबी लड़के लूटपात भी करते थे) तभी तो कोई भी अपने कमरे या छप्पर मे ही जगा खाली देखकर कुछ भी उड़ाकर ले जाते थे। हर वक़्त जान-माल ख़तरा बना रहता था पर आज तो कौने के मकानो मे लोगों ने दूकानें खोलकर किराये पर चड़ाई हुई हैं और घर बैठे-बिठाए तीन-चार हजार किराया आ जाता है साथ की साथ रोड लाइट, कलोनी लाइट अलग लगी है।
दक्षिणपुरी और अस्तबल
ओमी जी जिनके लिए यहाँ आना एक लम्बा और थोड़ा भड़कीला रहा। ओमी जी का ओख़ला बस्ती मे एक छोटा सा अस्तबल था जिसमे उनकी तीन गाये पलती थी जिनका दूध वो निकालते और बैचते थे लेकिन जब वहाँ से 1975 मे झूग्गी को हटाया गया तो अस्तबल भी टूटा। सभी तो ट्रको मे बैठकर यहाँ दक्षिण पुरी मे आ गए पर ओमी जी की गायों को लाने का ठेका नहीं लिया था सरकार ने तो उन्हें ही एक बग्गी मे गाये और घर वालों को लाना पड़ा। जब हारे-थके यहाँ दक्षिण पुरी मे आए तो खुद भी भूखे थे और गाय भी गायों को तो यहाँ खाने को एक हरा खेत मिल गया था पर ओमी जी की मुश्किले अब बड़ गई थी। क्योंकि वो गुजरों से पंगा नहीं लेना चाहते थे। गायें जब मर्जी खेतों मे घुस जाती और खेतों को खाती तो हमेशा ओमी जी गायों को बाँध कर रखते और हमेशा देख भाली करते पर उनका यहाँ दूध का काम बहुत चला था। यहाँ कोई खाने पीने का साधन नहीं था तो लोग स्टोव तो साथ ही लाये थे तो दूध लेकर चाय पानी का तो इन्तजाम कर लेते थे। लगभग सभी दस, बराग दिनो का सौदा साथ लेकर चले थे पर ओमी जी ने भी अच्छा अस्तबल सा बना लिया था एक बड़ा अस्तबल।
नई जगह के बनने का मतलब क्या होता है?
एक जगह का टूटना और कोई नई जगह का बनना इसका मतलब होता है की नये सपनों को जिन्दा करना सब अपने साथ-साथ घर बनाने का कुछ तो समान लेकर आए थे। अब एक झुग्गी तोड़कर झुग्गी मे तो वापस कोई रहना नहीं चाहता था तो लोगों ने अपना कच्चा-पक्का घरोंदा बनाने शुरू किया। लोग रोज दूर दो-छ: किलो मीटर पैदल जाते और बन रहे या टूट रही स्कूल की तरफ़ जाकर वहाँ से टूटी सिल्प, सिल्लियाँ उठा लाते और पहाड़ियों पर जाकर मिट्टी खोद-खोदकर भर-भर कर लाते। उस समय मे तो इंटे भी सस्ती आती थी तो अब लोगों ने अपने खुद से अपना घरोंदा बनाना आरम्भ किया। मिट्टी से चिनाई करते इंटे-दर-इंटे चड़ाकर कम से कम रहने लायक तो बना ही लिया। छत पर बस्ती से लाई सिमेंट और टीन की चद्दरे डाली और एक कमरे का घर तैयार किया। दिन भर मिट्टी खोदकर लाते फिर चिनाई मे लग जाते। अन्दाजे से दिवारें खड़ी करते। बस, मजबूती को देखकर और फिर जमीन को यूहीं मिट्टी का छोड़ दिया फिर उसी मे रहना भी शुरू किया।
लख्मी
लगभग बाराह या साढ़े बाराह बजे का वक़्त होगा। गाड़ी गली मे कई कपड़ों की रस्सियों को तोड़ती हुई अंदर आ घुसी थी। झुग्गी तो अभी पूरी तोड़ी भी नहीं थी और गाड़ी वाले ने सभी को अवाज लगाई की "चलों भाई किस-किस को चलना है अंदर बैठ जाओ।" सभी ने कपड़ों को साड़ियों और चादरों मे लपेटकर गठ्ठियाँ बाँध ली, पर कपड़ों के साथ-साथ लोगों ने दरवाजे, खिड़कियाँ, चौखट और टीन की छतें भी उखाड़ ली थी। वो भी तो ले जाना था। लेकिन एक ट्रक और चालीस लोग और उनका समान भी उसमे, ये बड़ा-बड़ा उखाड़ा गया समान, घरों का ढाँचा कैसे ले जाया जाए? कोई इसे छोड़कर जाना नहीं चाहता था। सभी ने जैसे-तैसे उसे भी ट्रक मे भरा और गठ्ठरियों पर बड़े समानों की तरह लद गए।
सभी सोच रहे थे कि "जाना कहाँ पर है? वो करीब ही होगी?” ट्रक मे बैठे सभी दस मिनट गाड़ी चलने के बाद मे बड़ी जोर से चिल्लाते या आवाज लगाते जिनमे से ख़ासकर आवाजे औरतों की होती "ए, भईया कहाँ ले जा रहा है और कितनी दूर है?”
वो ट्रक की ट्रोली की तरफ़ मे निकलती छोटी सी खिड़की से तेज आवाज मे कह देता "बस, आने वाला है यहीं पर है आप सब बैठ जाओ रोड खराब है।"
इतना कहकर वो चुप हो गया और थोड़ी देर के बाद उसने हमें यहाँ इस जंगल मे लाकर छोड़ दिया जिसे वो दक्षिण पूरी कह रहा था।
शुरूवाती दो दिन
दक्षिण पुरी जो अलग-अलग जगह की बस्तियों के विस्थापन से बनी है। जहाँ पर शहर की अन्य जगहों से लोगों को लाया गया। ओखला, पहाड़गंज और कितवई नगर। दक्षिण पुरी की गलियों मे जहाँ पर चालीस से पैंतालिस मकान हैं। कई गालियाँ तो एक ही जगह से आए लोगों से बनी हैं। पूरी गली एक परिवार की तरह से है। चाचा, मामा , ताया और पता नहीं क्या-क्या? सारी औरतों के चेहरे पर घूँघट हमेशा चड़ा रहता है। इन औरतों के बीच मे अक्सर दक्षिण पुरी की शुरुवाती बातों की कहानियाँ उछल पड़ती है।
कहती है, "जब हम यहाँ पर आए थे तो काफ़ी मारा-मारी होती थी। कभी घरों को घेरने के लिए तो कभी रात मे पेहरेदारी के लिए। हमारे तो सभी एक ही तरफ़ के लोगों ने एक पूरी लाइन ही घेर ली थी और किसी को अंदर ही नहीं आने दिया। रात भर सभी खाट डालकर बैठे रहते। चार सोते तो दो जागते, ऐसा ही चलता। पर शाम को बड़ा मजा आता था। हम तो चुपके से खेतों मे जाकर सब्जी तोड़कर लाते थे। ताजी-ताजी सब्जी मिलती कभी 'सेम की फली' तो कभी 'पालक' काफ़ी सब्जियाँ लगी थी। यहाँ दूध तो भैसों का मिल ही जाता था और शाम का खाना रोजाना सब्जी तौड़कर लाओ और बनाओ ऐसा रहता। जंगल तो था पर खाने को मिल जाता था सब ठीक ही था। शुरु के दो दिन मुश्किल थे पर कट गए।
दोबारा ढूँढते रहे हम तो
काम-वाम सब छूट गया था, इस घर के चक्कर मे। जैसी बातें वहाँ ओख़ला की बस्ती मे होती थी हमारे घर के आगे वैसा तो यहाँ पर कुछ भी नहीं था। मुझसे अक्सर कहते थे, "भोलू राम तू चिंता मत कर अपनी जगह और पक्के मकान मिलेगें" ऐसा सुनने से काफ़ी होसला बड़ता था। लेकिन हम जब यहाँ पर आए तो यहाँ तो खेती होती थी और कुछ पहाड़ भी थे। यहाँ पर खानपूर गाँव की तरफ़ के जाट-गूज़र लोगों के खेत थे। जो एक ही तरफ़ मे फैले थे जिस तरफ़ मे हमको जगह मिली थी वो कच्ची जमीन थी जो पता नहीं क्यों चौबिसों घण्टे गीली रहती थी। पहले दिन और रात को तो हम यूहीं उसी कच्ची जमीन पर अपने समानों पर ही लदे सोए रहे। बच्चों को हम पहले ही उनकी नानी के यहाँ पर सिकंदरा बाद मे छोड़ आए थे। बस, मैं और मेरी वाइफ ही यहाँ पर आए थे। दिन तो हमारा ये देखने मे ही निकल गया था की कितने और लोग हैं जो हमारी तरह यहाँ आए हैं और पता नहीं कहाँ के होगें? जैसे ही कोई ट्रक वहाँ आता तो यहाँ बैठे सभी की नज़रें उसी की तरफ़ जाती और समान उतारते और बैठते लोग दिखने लगते चारों तरफ़ घाँसे और खेत देख-देखकर मन ही नहीं भर रहा था। वहीं पर बार-बार नज़र घूम रही थी। फिर थोड़ी देर के बाद हमने समानों को एक तरफ़ मे रखा और चादर तानकर छाँव करने की सोची पर रात भी हमारी जागते हुए गुजरी।
शमसान तले थे सभी
"अरे यहाँ तो बड़ बुरा हाल था। ऐसी जगह दी जहाँ अगर एक छप्पर डालने के लिए डण्डा जमीन मे गाड़ते तो गड्डा खोदते ही हड्डियाँ निकलती थी। यहाँ तो ये दक्षिण पुरी पूरा शमशान था। लोग यहाँ पर लाश जलाते और दफ़नाते थे। आसपास तो पहले से ही लोग रहते थे। ये मदनगीर गाँव, खानपूर गाँव, तुगलकाबाद के लोगों का शमशान घाट था और यहाँ तो जब आए थे तो कभी भी जानवर निकल आते थे। शांप, नेवले, बिछ्छू, अरे मुझे याद है एक बार हम घर बनवाने के लिए नींव खुदवा रहे थे तो जमीन गीली थी। नींव को गहरा खोदना था। जब नींव खोदनी शुरू की तो कुछ हड्डियाँ निकलने लगी। जब तो कुछ नहीं हुआ पर जैसे ही जमीन मे से इंसानी आधी खोपड़ी निकली तो मेरी वाइफ के तो होस ही उड़ गए। वो तो बेहोस तो गई, उसे तो पता ही नहीं था की उसे तो नींव गाड़ने की पूजा करनी है। उसने तो साफ़ मना कर दिया था। यहाँ रहने के लिए उस समय वो पेट से भी थी, पप्पू होने वाला था। वो तो भागने लगी फिर काम हल्का करके उसे उसके पीहर छोड़कर आया और बाद मे खुद बनवाया ऐसा हुआ।
नेता जी अक्सर उस दिन को याद करते हैं और दक्षिण पुरी को अगर किसी को बताना हो तो शमशान घाट कहे बिना रह तो नहीं पाते।
कौने मे रहने का मज़ा
दक्षिण पुरी जहाँ-यहाँ आज मकानो की किमत बहुत है और कौने के मकानो की किमत तो दस, बराह, पन्दराह लाख तक है। कौने के मकान वाले लोग तो आज बैठे-बैठे लेन्ड लॉड हो गए है। गली मे रहने वाला हर शख़्स आज कहता है की काश हमारा कौने का मकान होता आज। लेकिन, जब यहाँ दक्षिण पूरी मे नये-नये बसे थे या जब दक्षिण पुरी बस रही थी तो कोई भी कौने का मकान लेने को राजी नहीं था क्योंकि आसपास बड़े-बड़े खेत और दूर-दूर तक दिखता जंगल तो हमेशा डर रहता था किसी जानवर के आने का कौने का मकान एक दम पिछड़ा सा लगता था तो सभी अन्दर का मकान चाहते थे। लोगों के बीच का और रात होने के बाद तो लूट-पात भी होती थी आसपास के कुछ (लठेत, शराबी-कबाबी लड़के लूटपात भी करते थे) तभी तो कोई भी अपने कमरे या छप्पर मे ही जगा खाली देखकर कुछ भी उड़ाकर ले जाते थे। हर वक़्त जान-माल ख़तरा बना रहता था पर आज तो कौने के मकानो मे लोगों ने दूकानें खोलकर किराये पर चड़ाई हुई हैं और घर बैठे-बिठाए तीन-चार हजार किराया आ जाता है साथ की साथ रोड लाइट, कलोनी लाइट अलग लगी है।
दक्षिणपुरी और अस्तबल
ओमी जी जिनके लिए यहाँ आना एक लम्बा और थोड़ा भड़कीला रहा। ओमी जी का ओख़ला बस्ती मे एक छोटा सा अस्तबल था जिसमे उनकी तीन गाये पलती थी जिनका दूध वो निकालते और बैचते थे लेकिन जब वहाँ से 1975 मे झूग्गी को हटाया गया तो अस्तबल भी टूटा। सभी तो ट्रको मे बैठकर यहाँ दक्षिण पुरी मे आ गए पर ओमी जी की गायों को लाने का ठेका नहीं लिया था सरकार ने तो उन्हें ही एक बग्गी मे गाये और घर वालों को लाना पड़ा। जब हारे-थके यहाँ दक्षिण पुरी मे आए तो खुद भी भूखे थे और गाय भी गायों को तो यहाँ खाने को एक हरा खेत मिल गया था पर ओमी जी की मुश्किले अब बड़ गई थी। क्योंकि वो गुजरों से पंगा नहीं लेना चाहते थे। गायें जब मर्जी खेतों मे घुस जाती और खेतों को खाती तो हमेशा ओमी जी गायों को बाँध कर रखते और हमेशा देख भाली करते पर उनका यहाँ दूध का काम बहुत चला था। यहाँ कोई खाने पीने का साधन नहीं था तो लोग स्टोव तो साथ ही लाये थे तो दूध लेकर चाय पानी का तो इन्तजाम कर लेते थे। लगभग सभी दस, बराग दिनो का सौदा साथ लेकर चले थे पर ओमी जी ने भी अच्छा अस्तबल सा बना लिया था एक बड़ा अस्तबल।
नई जगह के बनने का मतलब क्या होता है?
एक जगह का टूटना और कोई नई जगह का बनना इसका मतलब होता है की नये सपनों को जिन्दा करना सब अपने साथ-साथ घर बनाने का कुछ तो समान लेकर आए थे। अब एक झुग्गी तोड़कर झुग्गी मे तो वापस कोई रहना नहीं चाहता था तो लोगों ने अपना कच्चा-पक्का घरोंदा बनाने शुरू किया। लोग रोज दूर दो-छ: किलो मीटर पैदल जाते और बन रहे या टूट रही स्कूल की तरफ़ जाकर वहाँ से टूटी सिल्प, सिल्लियाँ उठा लाते और पहाड़ियों पर जाकर मिट्टी खोद-खोदकर भर-भर कर लाते। उस समय मे तो इंटे भी सस्ती आती थी तो अब लोगों ने अपने खुद से अपना घरोंदा बनाना आरम्भ किया। मिट्टी से चिनाई करते इंटे-दर-इंटे चड़ाकर कम से कम रहने लायक तो बना ही लिया। छत पर बस्ती से लाई सिमेंट और टीन की चद्दरे डाली और एक कमरे का घर तैयार किया। दिन भर मिट्टी खोदकर लाते फिर चिनाई मे लग जाते। अन्दाजे से दिवारें खड़ी करते। बस, मजबूती को देखकर और फिर जमीन को यूहीं मिट्टी का छोड़ दिया फिर उसी मे रहना भी शुरू किया।
लख्मी
जब रोशनी पड़ती है
लाल बिल्डिंग स्कूल, रमेश भाई उम्र मे 35साल के होगें और 17 सालों से मोची का काम करते आये हैं। पहले लाल बिल्डिंग स्कूल के बाहर एक 423 बस का स्टेंड हुआ करता था पर जब 423 बस का रूट चैंज हुआ तो वो बस स्टेंड अब खाली राहगीरों का अड्डा ना रहकर रमेश भाई का घर और कमाई का ज़रिया बन गया है। मतलब रमेश भाई ने उस बस स्टेंड को अपना घर बना लिया है।
एक कच्ची गीली मिट्टी से बनी ईटों की दीवारें और एक नीला और काले रंग के कड़क तिरपाल की छत। आगे खुद की मोची की एक छोटी सी दुकान। जिसे बनाये और जमाये हुए लगभग 10साल ही हुए हैं। 7 साल तक तो इन्होनें मोची का ही काम किया। पेटी लेकर गली-गली घूमते थे। लेकिन काम मे तरक्की हुई और एक ठीया डाल लिया।
18 साल पहले रमेश भाई अकेले ही राजस्थान से आये थे नौकरी की तलाश में। दिल्ली मे काम बहुत है ये सोचकर। दिल्ली से होकर जाते उनके दोस्त बताते थे "दिल्ली शहर में पैसा लुटता है बस, लुटने वाला चाहिये" तो बस, यही लूटने की उंमग लिए निकल गए अपने गाँव से लेकिन रहेगें कहाँ? ये तो बिलकुल ही नहीं सोचा था। घरवालों से पूछा तो था की क्या हमारा कोई रिश्तेदार दिल्ली मे रहता है? तो शायद, जबाब नहीं मिला। फिर भी एक ख़्याब लिए और जेब मे कुछ पैसे लिए ये जनाब दिल्ली मे आ गए। रहने को घर नहीं था, तो पहले घर ढूंढने को सोचा पर कुछ हासिल नहीं हुआ। किससे बात करते? किससे पूछते? ये तो सब दिमाग में हवा था। कोई चेहरा था ही नहीं जिससे कुछ पूछा जाये? फिर भी जहाँ चाय पीते वहीं से कभी चाय वाले से पूछ लिया करते। काम की और रहने की, लेकिन किसी को यहाँ की भागदौड मे बातें करने के लिए किसी हमसफ़र की तो तलाश है पर काम के लिए किसी हैल्पर की नहीं।
रमेश भाई दिखने मे तो ठीक-ठाक थे तो बेलदारी करने की सोची पर हिम्मत नहीं हूई। रात होते-होते जब खाने की तिलमिलाहट उठी तो मार्किट में पँहुचे जहाँ पर किराये पर रोज़गार मिलता था। मतलब वे काम जिनमे अपनी तरफ़ से कोई पैसा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। जैसे- कबाड़ी को साईकिल, सब्जी, फल, आईसर्किम बैकने वालों के लिए रेहड़ी और मोची के लिए पेटी। इतना देखकर रमेश भाई ने फौरन हिसाब लगाना चालू किया और कुछ दिनों तक इन मे से किसी काम को करने का फैसला किया मगर सस्ता। रमेश भाई ने वहाँ पर बातचीत की।
एक शख़्स से पूछा, "जी मोची की पेटी हमें चाहिये तो क्या करना होगा?”
वे शख़्स ऊपर से नीचे तक उन्हे देखते हुए, रमेश भाई से बोला, "कहाँ के हो? पहले भी कभी काम किया है? यहाँ पर किसी को जानते हो? रहते कहाँ हो?”
इतने सारे सवाल सुनकर रमेश भाई थोड़े चुप से हो गए और लरकते-लरकते हुए उगंलियों को मरोड़ते हुए बोले, "जी मैं यहाँ पर नया हूँ पर आप मुझपर भरोसा कर सकते हैं। मैं अभी तो यहीं रहता हूँ। खाना खाकर यहीं मार्किट मे सामने वाले होटल के बाहर उस सिल्ली पर सो जाता हूँ।"
न जाने उस शख़्स ने क्या देखा और पेटी देने को कह दिया पर पेटी का किराया था 20 रुपये। चाहें कमाई हो या ना हो, मंजूर है। रमेश भाई ने झट से कहा, "ठीक है, मालिक।"
रमेश भाई की जुबाँ से मालिक सुनकर तो उस शख़्स के चेहरे पर एक ललचाई सी मुस्काम छलक पड़ी बस, यहाँ से शुरू हुआ। दिल्ली मे घूमने का दौर और लोगों को, जगह को, सफ़र को, जूतों से, पैरों से, देखने का। कहते है ना 'आदमी की इज्जत उसके पैरों से होती है, इंसान की पहचान उसके जूतों से होती है। तो बस, इंसान को पहचाने का मौका यहाँ से ही मिलेगा। बस, निकल पड़े शहर को नजदीकी से देखने के लिए।
मैं रमेश भाई को वहाँ से गुजरते हुए देखता था। कभी लोगों के बीच, कभी परिवार के बीच तो कभी जूतों की भीड़ मे एक लम्बे छज्जे की छत, बाहर की दीवार पर लटके लैदर के चमड़े के नये जूते, एक तरफ़ खाली शॉल लाल, काले नीचे कट्टा बिछाकर, एक पेटी, कई चमड़े की कटे चिथड़े। उन्ही मे हमेशा घिरे रहते थे। आज जब मैं उनके पास गया तो वो एक जूते मे नया शॉल फिट कर रहे थे। एक नीचे रखा था सिलोचन लगाये हुए और दूसरे मे कील ठोक रहे थे। मैं पँहूचा उनके पास बातें करने के लिए। शाम का वक़्त था शाम भी अभी अधूरी थी यानि के तीन सवा तीन का बख़्त होगा? अब उनके बात करने के लिए वैसे तो जा नहीं सकते थे तो एक जूता लेकर गया। थोड़ी बातचीत हो कोई बहाना तो मिले।
मैंने कहा, "आपने अपने ठीये को बड़ा ही खूबसूरती से सजाया हुआ है। क्या बात है। आपने कैसे सजाया ये?”
रमेश भाई ठक-ठक करते हुए बोले, "अरे कहाँ भाई साहब, ये तो बस, इस वज़ह से है की यहाँ से आने-जाने वालों को दिखे तो सही कि यहाँ पर होता क्या है? और मिलता क्या है? अब हम शॉहकेश तो रख नहीं सकते इसलिये इन्हे ही दीवार पर कील गाड़ कर टाँग देते हैं।"
मैंने कहा, "आपने तो ये पेटी भी बड़ी ही हसीन बनाई हुई है। ये फोटो, ये स्टीकर, क्या बात है कैसे सजाते हैं आप ये?”
रमेश भाई अब जूतों को सुखने के लिए रखते हुए बोले, "इसे खूबसूरत नहीं बनायेगें तो किसे बनायेगें। हम तो इसकी पूजा भी करते हैं। भाई साहब आप क्या बात कर रहे हैं। अब इस पर जो फोटो लगी है वो क्या है की हमारी पंसद है। मैं और मेरी पत्नी की ख्याइस है की हम किसी बर्फ़ वाले इलाके मे घूमने जाये तो हमने ये तस्वीर लगाई है। बस, इसी को देखकर उस जगह के बारे मे सोचते रहते हैं कभी तो जायेगें?
उनकी जुबाँ पर जाना था कश्मीर और फोटो लगा था स्वजीलैंड का बीच-बीच मे जूतों पर उनकी नज़र थी अपनी बात को बडाते हुये, "और ये स्टीकर भाई साहब जिन रिश्तो मे हम कुछ नहीं कह पाते उनमे ये स्टीकर और हमारी पेटी बहुत कुछ कह देती है। "आज नगद कल उधार" भाई साहब इस पेटी को बारह साल हो गए है पर आप इसे देखकर ये सोच नहीं सकते की इसको कितना टाइम हो गया होगा? है ना! लगती है ना एक दम जवान।"
मैं क्या पूछता, जब वो इतने प्यार से अपनी पेटी के बारे में बता रहे थे तो मैं तो उन्हे टोक भी नहीं पाया तो पूछता क्या? मैंने उनसे कोई सवाल नहीं किया बस, मैंने कहा, "और बताइये अपनी इस हसीन पेटी के बारे मे इसकी सजावट, रूप और नाज़ुकपन के बारे में? क्या-क्या लगाते हैं इसपर इसे इतना खूबसूरत बनाने के लिए?”
रमेश भाई, बीढ़ी जलाते हुए और एक ग्राहक को 'जूते रख दो थोड़ी देर के बाद आना' कहते हुए, "मुझसे अभी तक किसी ने मेरी पेटी के बारे मे बात नहीं की थी आपने की है तो आज तो आपको बताउँगा।"
अब तो उनकी अवाज़ मे बड़ा ही शाँतपन था। लगता था की वो किसी को तो बताना चाहते थे। बीढ़ी का लम्बा कश़ और धीमी सी आवाज में बोले थे। अब तक मेरे जूतों को वो भूल ही चुके थे अंदर घर में से कुछ बनाने की आवाज आ रही थी शायद, उनकी पत्नी होगी?
"ये तो अब की पेटी है भाई साहब। जब मैं इसे लेकर घूमता था तो सभी मेरी पेटी को देखते थे हीरो-हिरोइन के पोस्ट कार्ड और उनके बीच मे छोटे-छोटे शीशे पेटी के चारों तरफ़ लगे थे। जब मैं चलता था तो शीशों की चमक रास्तों की छाँव वाली जगह, दीवार, चेहरे, कपड़े और समान सभी पर पड़ती थी तो हीरे की तरह चमकती थी। स्टीकर मैं शेरों-शायरी वाले लगाता था ताकी लोगों को मैं सड़क पर मिला तो टाइम पास करने के लिए कुछ तो हो। मुझे उस समय अजय देवगन पसंद था तो उसी के पोस्ट कार्ड लगे होते थे। पेटी के अंदर एक पोस्ट कार्ड साइज का शीशा जो ढक्कन पर ही लगा होता था। जब पेटी खुलती थी तो वो तभी दिखाई देता था। उसमे तो पेटी खुलने के बाद घरों की बालकनी ही नज़र आती थी और कभी-कभी मेरे पीछे से गुज़रते लोग ही नज़र आते थे। जिसकी खूबसूरती से तो मुझे उसका वज़न भी हल्का लगता था और मज़ा भी आता था। मेरे दोस्तों की टोली मे तो लोग मुझे चमकीले के नाम से बुलाते थे।"
मैंने पूछा, "पर आईना आपने पेटी में क्यों लगाया?”
रमेश भाई फौरन जवाब देते हुए, "मैंने तो वो सिर्फ़ सजावट के रूप मे लगाये थे। बाहर तो चमक के लिए अगर किसी के चेहरे पर लाइट पड़े तो वो मेरी तरफ़ उस चमक को देखते हुए जरूर देखेगा और अंदर तो मैंने अपने लिए और ग्राहक के लिए क्योंकि कोई भी कहीं भी लिए वो अपने आपको वहाँ पर देखना जरूर चाहता है। जैसे बस स्टेंड पर अगर हमें कोई देखकर हँसे तो हम चेहरे पर कुछ लगा तो नहीं यही सोचते हैं, कहीं ख़ास जगह या ख़ास शख़्स से मिलना तो तब या सुबह से शाम तक काम किया हो तब पर चेहरा देखते जरूर है। पर साहब मेरे पेटी के वो पोस्ट कार्ड साइज के टीवी जैसे शीशे मे तो मुझे जगह ही दिखती थी। जहाँ मैं बैठा होता था और वो चेहरे जिनके मैं सिर्फ़ जूते ही ग़ौर से देख पाता था।"
इतना कहकर रमेश भाई बीढ़ी तो ख़त्म कर ही चुके थे। अब अपना काम भी ख़त्म करना चाहते थे और इतना कहकर जूता उठाकर उसे धड़ा-धड़ ठोकने लगे। मैंने अपने जूते लिए पचास रुपये दिए और आने के लिए उठ खड़ा हुआ एक मुस्कुराहट के साथ और रमेश भाई अपनी उसी लाइन मे जुट गए जहाँ पहला नम्बर भी उन्ही का है और आखिर भी...।
रमेश भाई पुराने जूते की मरम्मत के साथ नये जूते भी बैचते हैं। रमेश भाई, "भाई साहब अगर आपको नये जूते चाहिये तो हमें मत भुलना सस्ते मे लगा देगें।"
उन्होंने पैसे बोरी के नीचे रखे और फिर काम चालू कर दिया और मैं भी वहाँ से निकला और रास्ता पार करने के बाद पीछे मुड़कर देखा तो रमेश भाई फिर से बीढ़ी जलाकर आराम से धूआँ हवा मे उड़ा रहे थे।
लख्मी
एक कच्ची गीली मिट्टी से बनी ईटों की दीवारें और एक नीला और काले रंग के कड़क तिरपाल की छत। आगे खुद की मोची की एक छोटी सी दुकान। जिसे बनाये और जमाये हुए लगभग 10साल ही हुए हैं। 7 साल तक तो इन्होनें मोची का ही काम किया। पेटी लेकर गली-गली घूमते थे। लेकिन काम मे तरक्की हुई और एक ठीया डाल लिया।
18 साल पहले रमेश भाई अकेले ही राजस्थान से आये थे नौकरी की तलाश में। दिल्ली मे काम बहुत है ये सोचकर। दिल्ली से होकर जाते उनके दोस्त बताते थे "दिल्ली शहर में पैसा लुटता है बस, लुटने वाला चाहिये" तो बस, यही लूटने की उंमग लिए निकल गए अपने गाँव से लेकिन रहेगें कहाँ? ये तो बिलकुल ही नहीं सोचा था। घरवालों से पूछा तो था की क्या हमारा कोई रिश्तेदार दिल्ली मे रहता है? तो शायद, जबाब नहीं मिला। फिर भी एक ख़्याब लिए और जेब मे कुछ पैसे लिए ये जनाब दिल्ली मे आ गए। रहने को घर नहीं था, तो पहले घर ढूंढने को सोचा पर कुछ हासिल नहीं हुआ। किससे बात करते? किससे पूछते? ये तो सब दिमाग में हवा था। कोई चेहरा था ही नहीं जिससे कुछ पूछा जाये? फिर भी जहाँ चाय पीते वहीं से कभी चाय वाले से पूछ लिया करते। काम की और रहने की, लेकिन किसी को यहाँ की भागदौड मे बातें करने के लिए किसी हमसफ़र की तो तलाश है पर काम के लिए किसी हैल्पर की नहीं।
रमेश भाई दिखने मे तो ठीक-ठाक थे तो बेलदारी करने की सोची पर हिम्मत नहीं हूई। रात होते-होते जब खाने की तिलमिलाहट उठी तो मार्किट में पँहुचे जहाँ पर किराये पर रोज़गार मिलता था। मतलब वे काम जिनमे अपनी तरफ़ से कोई पैसा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। जैसे- कबाड़ी को साईकिल, सब्जी, फल, आईसर्किम बैकने वालों के लिए रेहड़ी और मोची के लिए पेटी। इतना देखकर रमेश भाई ने फौरन हिसाब लगाना चालू किया और कुछ दिनों तक इन मे से किसी काम को करने का फैसला किया मगर सस्ता। रमेश भाई ने वहाँ पर बातचीत की।
एक शख़्स से पूछा, "जी मोची की पेटी हमें चाहिये तो क्या करना होगा?”
वे शख़्स ऊपर से नीचे तक उन्हे देखते हुए, रमेश भाई से बोला, "कहाँ के हो? पहले भी कभी काम किया है? यहाँ पर किसी को जानते हो? रहते कहाँ हो?”
इतने सारे सवाल सुनकर रमेश भाई थोड़े चुप से हो गए और लरकते-लरकते हुए उगंलियों को मरोड़ते हुए बोले, "जी मैं यहाँ पर नया हूँ पर आप मुझपर भरोसा कर सकते हैं। मैं अभी तो यहीं रहता हूँ। खाना खाकर यहीं मार्किट मे सामने वाले होटल के बाहर उस सिल्ली पर सो जाता हूँ।"
न जाने उस शख़्स ने क्या देखा और पेटी देने को कह दिया पर पेटी का किराया था 20 रुपये। चाहें कमाई हो या ना हो, मंजूर है। रमेश भाई ने झट से कहा, "ठीक है, मालिक।"
रमेश भाई की जुबाँ से मालिक सुनकर तो उस शख़्स के चेहरे पर एक ललचाई सी मुस्काम छलक पड़ी बस, यहाँ से शुरू हुआ। दिल्ली मे घूमने का दौर और लोगों को, जगह को, सफ़र को, जूतों से, पैरों से, देखने का। कहते है ना 'आदमी की इज्जत उसके पैरों से होती है, इंसान की पहचान उसके जूतों से होती है। तो बस, इंसान को पहचाने का मौका यहाँ से ही मिलेगा। बस, निकल पड़े शहर को नजदीकी से देखने के लिए।
मैं रमेश भाई को वहाँ से गुजरते हुए देखता था। कभी लोगों के बीच, कभी परिवार के बीच तो कभी जूतों की भीड़ मे एक लम्बे छज्जे की छत, बाहर की दीवार पर लटके लैदर के चमड़े के नये जूते, एक तरफ़ खाली शॉल लाल, काले नीचे कट्टा बिछाकर, एक पेटी, कई चमड़े की कटे चिथड़े। उन्ही मे हमेशा घिरे रहते थे। आज जब मैं उनके पास गया तो वो एक जूते मे नया शॉल फिट कर रहे थे। एक नीचे रखा था सिलोचन लगाये हुए और दूसरे मे कील ठोक रहे थे। मैं पँहूचा उनके पास बातें करने के लिए। शाम का वक़्त था शाम भी अभी अधूरी थी यानि के तीन सवा तीन का बख़्त होगा? अब उनके बात करने के लिए वैसे तो जा नहीं सकते थे तो एक जूता लेकर गया। थोड़ी बातचीत हो कोई बहाना तो मिले।
मैंने कहा, "आपने अपने ठीये को बड़ा ही खूबसूरती से सजाया हुआ है। क्या बात है। आपने कैसे सजाया ये?”
रमेश भाई ठक-ठक करते हुए बोले, "अरे कहाँ भाई साहब, ये तो बस, इस वज़ह से है की यहाँ से आने-जाने वालों को दिखे तो सही कि यहाँ पर होता क्या है? और मिलता क्या है? अब हम शॉहकेश तो रख नहीं सकते इसलिये इन्हे ही दीवार पर कील गाड़ कर टाँग देते हैं।"
मैंने कहा, "आपने तो ये पेटी भी बड़ी ही हसीन बनाई हुई है। ये फोटो, ये स्टीकर, क्या बात है कैसे सजाते हैं आप ये?”
रमेश भाई अब जूतों को सुखने के लिए रखते हुए बोले, "इसे खूबसूरत नहीं बनायेगें तो किसे बनायेगें। हम तो इसकी पूजा भी करते हैं। भाई साहब आप क्या बात कर रहे हैं। अब इस पर जो फोटो लगी है वो क्या है की हमारी पंसद है। मैं और मेरी पत्नी की ख्याइस है की हम किसी बर्फ़ वाले इलाके मे घूमने जाये तो हमने ये तस्वीर लगाई है। बस, इसी को देखकर उस जगह के बारे मे सोचते रहते हैं कभी तो जायेगें?
उनकी जुबाँ पर जाना था कश्मीर और फोटो लगा था स्वजीलैंड का बीच-बीच मे जूतों पर उनकी नज़र थी अपनी बात को बडाते हुये, "और ये स्टीकर भाई साहब जिन रिश्तो मे हम कुछ नहीं कह पाते उनमे ये स्टीकर और हमारी पेटी बहुत कुछ कह देती है। "आज नगद कल उधार" भाई साहब इस पेटी को बारह साल हो गए है पर आप इसे देखकर ये सोच नहीं सकते की इसको कितना टाइम हो गया होगा? है ना! लगती है ना एक दम जवान।"
मैं क्या पूछता, जब वो इतने प्यार से अपनी पेटी के बारे में बता रहे थे तो मैं तो उन्हे टोक भी नहीं पाया तो पूछता क्या? मैंने उनसे कोई सवाल नहीं किया बस, मैंने कहा, "और बताइये अपनी इस हसीन पेटी के बारे मे इसकी सजावट, रूप और नाज़ुकपन के बारे में? क्या-क्या लगाते हैं इसपर इसे इतना खूबसूरत बनाने के लिए?”
रमेश भाई, बीढ़ी जलाते हुए और एक ग्राहक को 'जूते रख दो थोड़ी देर के बाद आना' कहते हुए, "मुझसे अभी तक किसी ने मेरी पेटी के बारे मे बात नहीं की थी आपने की है तो आज तो आपको बताउँगा।"
अब तो उनकी अवाज़ मे बड़ा ही शाँतपन था। लगता था की वो किसी को तो बताना चाहते थे। बीढ़ी का लम्बा कश़ और धीमी सी आवाज में बोले थे। अब तक मेरे जूतों को वो भूल ही चुके थे अंदर घर में से कुछ बनाने की आवाज आ रही थी शायद, उनकी पत्नी होगी?
"ये तो अब की पेटी है भाई साहब। जब मैं इसे लेकर घूमता था तो सभी मेरी पेटी को देखते थे हीरो-हिरोइन के पोस्ट कार्ड और उनके बीच मे छोटे-छोटे शीशे पेटी के चारों तरफ़ लगे थे। जब मैं चलता था तो शीशों की चमक रास्तों की छाँव वाली जगह, दीवार, चेहरे, कपड़े और समान सभी पर पड़ती थी तो हीरे की तरह चमकती थी। स्टीकर मैं शेरों-शायरी वाले लगाता था ताकी लोगों को मैं सड़क पर मिला तो टाइम पास करने के लिए कुछ तो हो। मुझे उस समय अजय देवगन पसंद था तो उसी के पोस्ट कार्ड लगे होते थे। पेटी के अंदर एक पोस्ट कार्ड साइज का शीशा जो ढक्कन पर ही लगा होता था। जब पेटी खुलती थी तो वो तभी दिखाई देता था। उसमे तो पेटी खुलने के बाद घरों की बालकनी ही नज़र आती थी और कभी-कभी मेरे पीछे से गुज़रते लोग ही नज़र आते थे। जिसकी खूबसूरती से तो मुझे उसका वज़न भी हल्का लगता था और मज़ा भी आता था। मेरे दोस्तों की टोली मे तो लोग मुझे चमकीले के नाम से बुलाते थे।"
मैंने पूछा, "पर आईना आपने पेटी में क्यों लगाया?”
रमेश भाई फौरन जवाब देते हुए, "मैंने तो वो सिर्फ़ सजावट के रूप मे लगाये थे। बाहर तो चमक के लिए अगर किसी के चेहरे पर लाइट पड़े तो वो मेरी तरफ़ उस चमक को देखते हुए जरूर देखेगा और अंदर तो मैंने अपने लिए और ग्राहक के लिए क्योंकि कोई भी कहीं भी लिए वो अपने आपको वहाँ पर देखना जरूर चाहता है। जैसे बस स्टेंड पर अगर हमें कोई देखकर हँसे तो हम चेहरे पर कुछ लगा तो नहीं यही सोचते हैं, कहीं ख़ास जगह या ख़ास शख़्स से मिलना तो तब या सुबह से शाम तक काम किया हो तब पर चेहरा देखते जरूर है। पर साहब मेरे पेटी के वो पोस्ट कार्ड साइज के टीवी जैसे शीशे मे तो मुझे जगह ही दिखती थी। जहाँ मैं बैठा होता था और वो चेहरे जिनके मैं सिर्फ़ जूते ही ग़ौर से देख पाता था।"
इतना कहकर रमेश भाई बीढ़ी तो ख़त्म कर ही चुके थे। अब अपना काम भी ख़त्म करना चाहते थे और इतना कहकर जूता उठाकर उसे धड़ा-धड़ ठोकने लगे। मैंने अपने जूते लिए पचास रुपये दिए और आने के लिए उठ खड़ा हुआ एक मुस्कुराहट के साथ और रमेश भाई अपनी उसी लाइन मे जुट गए जहाँ पहला नम्बर भी उन्ही का है और आखिर भी...।
रमेश भाई पुराने जूते की मरम्मत के साथ नये जूते भी बैचते हैं। रमेश भाई, "भाई साहब अगर आपको नये जूते चाहिये तो हमें मत भुलना सस्ते मे लगा देगें।"
उन्होंने पैसे बोरी के नीचे रखे और फिर काम चालू कर दिया और मैं भी वहाँ से निकला और रास्ता पार करने के बाद पीछे मुड़कर देखा तो रमेश भाई फिर से बीढ़ी जलाकर आराम से धूआँ हवा मे उड़ा रहे थे।
लख्मी
इसमे सभी शामिल है
कला का हमारे आसपास और समाज मे विभिन्न तौर का रिश्ता बना हुआ है जो मानने और जानने के बीच ही टिका रहता है और शायद इससे ही समाज चलता है। हाथो के बाँटने से उपजता है और एक हाथ से दूसरे हाथ कि लेन-देन से फैलता है। अगर यही समाज है तो फैलाव है क्या?
दो भागों के दरमियाँ ही कला का रूप उभरकर आता है। और किसी एक जीवन मे भी इसका आधार सामान्य तौर पर नहीं होता। कोई कला पैदा करता है तो कोई कला को बढ़ाता और चलाता है।
दोनो के ही महत्वपूर्ण कार्य योग हैं।
कला पैदा करने के ढाँचे हमारे आसपास ओझल हैं पर कला को चलाने और बढ़ाने के ढाँचे नज़र आते हैं। ढाँचे और कला अब भी वही हैं जो सिखने-सिखाने के दौर मे रहते हैं।
कला पैदा करना क्या है? कई लोग जो अपने जीवन के तरीकों को कोई उपकरण देते हैं जो शायद कार्यशील भी होता है पर उसका बाहर आना अपनी जगह पर रहने के दायरों से बाहर ही होता है। तो ये क्या है?
एक शख़्स से मुलाकात हुई, राजू जी जो बहुत अच्छे एक्टर हैं और कई अलग-अलग तरह के नाटक भी कर चुके हैं। एक नाटक मण्डली भी बना रखी है जिसमे वो अलग-अलग लॉकेल्टी मे जा जाकर नुक्कड़ नाटक करते हैं और अपने रॉल को खुद लिखते हैं। कैसे? और कहाँ से? उनकी एन्ट्री होगी उसे तैयार करते हैं पर कभी भी अपने ब्लॉक या इलाके मे नुक्कड़ नाटक नहीं करते। बहुत कम लोग हैं जो शायद ये जानते होंगे कि वो नुक्कड़ नाटक भी करते हैं।
अपनी जगह से बाहर मे अपनी कला को दिखाना क्या है? क्या है जो वो अपने यहाँ नहीं दिखा सकते? बाहर दिखा सकते है?
ये कोई ऐसी कला नहीं है जो किसी को खुश करने वाली हो। अपने लिए एक जीने का तरीका होता है अथवा वो किसी ढाँचे या स्पेस का इंतजार करती है? क्या हर किसी को खुलने के लिए किसी ख़ास जगह या शख़्स का इंतजार होता है?
एक और शख्स के बारे मे बताता हूँ, जो गिटार सीख रहे है अभी और काम पर से आने के बाद अपनी छत पर बैठे गिटार पर अगुंली चलाते रहते हैं। उनका रियाज़ अपनी छत पर ही चालू रहता है। गानों कि उन्होंने कॉपी बनाई है और उसी मे लगे रहते है पर आजकल उन्होंने एक टाइम बनाया हुआ है बाहर लोगों के साथ मे इसको बांटने का जैसे ही वो कोई गाना बजाने मे सक्षम हो जाते हैं रिदम, ताल, लय मे सबमे परफेक्ट हो जाते हैं तो रात मे गली मे खाट बिछाकर अपना गाना बजाने लगते हैं। जिससे शायद कोई सुने या ना सुने पर जो लोग गली मे खाट बिछाकर सोते हैं वो सुनते हैं और बड़े शौक से।
मेरे हाथों से कोई चीज़ बन रही है या आकार ले रही है वो मेरे लिए क्या है? और मैं उसे अब रोजाना बना रहा हूँ तब वो क्या है?
बस्ती के काफी पुराने शख़्स घसीटाराम जी के पास जाओ तो वो अपनी कॉपी का जिक्र करते हैं। उसके कितने पेज थे? उनपर क्या-क्या लिखा था? और किन-किन रंगो के पेनों से, सब पता है उन्हें। उसी से अक्सर बात शुरू होती है जिसका लगभग वही पेज हमेशा खुलता है जिसमे वो पहली बार 'रसिया' गए थे। वे लिखा होता है। मगर असल मे वो कॉपी है ही नहीं। वो जानते हैं हमारे सुनने कि इच्छा को और बैठने कि ललक को। हर बार वो उस माहौल को बनाने मे समक्ष हो जाते हैं।
किसी आकार और रूप को देखने कि नज़र मे कला उभरती है तो बिना आकार और रूप के वो क्या है? कोई कुछ बनाकर दिखा दे वो कला और जो अपनी बातों मे लीन कर ले या मोह ले वो जादूगर। पर इसके अलावा जानना क्या है?
लोग जानने और बनाने कि कग़ार मे कलाकार छुपाते हैं और कलाकार कि कग़ार मे गुरू। गुरू जिसका रिश्ता इनके बीच उपजने का होता है। वो उपजना जिसके अंदर कई सारी बातों का पुष्टीकरण हो।
हाजिर जवाब, शातिर, अपनी पब्लिक को समझने वाला, हर चीज पर बोलने वाला
एक छवि है और एक छवि को सोचते हुए ऑदा। जो नवाजे जाते हैं लाइनो से।
जैसे, घाट-घाट का पानी पिया है, पुराना चावल है या गुरु आदमी है।
एक जो पढ़ा लिखा है और दूसरा जो देखा दिखाया है। यानि जहाँ पर रहता है वहाँ के बारे मे हर बदलाव को देखा और समझा है पर ये क्या है समाज मे?
ज्ञानी, जिसके लिए कोई कोना या जगह बनाने कि जरुरत नहीं। वो शख़्सियत अपने आप मे एक ढाँचा पाये हुए है। उसको जीते हैं कि उसकी समझ का कोई ना कोई हिस्सा हम मे या हमारे बच्चों मे उतर जाये जिससे आने वाला समय और अभी का चलता समय बड़ी सहजता से गुजरे फिर चाहें वो किसी भी चीज का ज्ञान हो।
ये एक अन्तर ही तो है, ज्ञानी और कला मे अंतर लेकर जीते हैं लोग।
कला जो आकार या रूप लेकर कलाकार बनाती है तो ज्ञानी जो ज्ञान पाता है। वो किसी जगह, शब्द या जीवन को समझता है तो वो कला नहीं है वो तरीका है। इसमे फिर लैवल काम मे आता है। कला अटपटा लगने लगता है। यहाँ बनता है तरीका। उसके जैसे तरीके अपनाओ और अपनी लाइफ़ जीओ।
ज्ञानी जो जगह बनाने मे जूझता नहीं। वहीं कलाकार अपनी जगह बनाता है। उसकी जगह तैयार नहीं होती वो जगह तलाशता है। कला बाँटने वाले ढाँचे नज़र आते हैं।
कुछ कला अपने दायरों को बनाती हैं। लोगों मे आने को उत्सुक होती हैं। "मुझे देखो" कि अपेक्षा होती है। जिसमे किसी शख़्स कि शख़्सियत बनने और काम, रिश्तों के अलावा एक ख़ास पहचान बनाने कि लालसा होती है। एक चेहरे कि खुशी के साथ।
जानने और मानने का दौर रहता है।
मैं जानता हूँ - जन्म होना।
मैं मानता हूँ - जन्म को दोहराना।
ये खेल है, इसमे सभी शामिल है।
लख़्मी
दो भागों के दरमियाँ ही कला का रूप उभरकर आता है। और किसी एक जीवन मे भी इसका आधार सामान्य तौर पर नहीं होता। कोई कला पैदा करता है तो कोई कला को बढ़ाता और चलाता है।
दोनो के ही महत्वपूर्ण कार्य योग हैं।
कला पैदा करने के ढाँचे हमारे आसपास ओझल हैं पर कला को चलाने और बढ़ाने के ढाँचे नज़र आते हैं। ढाँचे और कला अब भी वही हैं जो सिखने-सिखाने के दौर मे रहते हैं।
कला पैदा करना क्या है? कई लोग जो अपने जीवन के तरीकों को कोई उपकरण देते हैं जो शायद कार्यशील भी होता है पर उसका बाहर आना अपनी जगह पर रहने के दायरों से बाहर ही होता है। तो ये क्या है?
एक शख़्स से मुलाकात हुई, राजू जी जो बहुत अच्छे एक्टर हैं और कई अलग-अलग तरह के नाटक भी कर चुके हैं। एक नाटक मण्डली भी बना रखी है जिसमे वो अलग-अलग लॉकेल्टी मे जा जाकर नुक्कड़ नाटक करते हैं और अपने रॉल को खुद लिखते हैं। कैसे? और कहाँ से? उनकी एन्ट्री होगी उसे तैयार करते हैं पर कभी भी अपने ब्लॉक या इलाके मे नुक्कड़ नाटक नहीं करते। बहुत कम लोग हैं जो शायद ये जानते होंगे कि वो नुक्कड़ नाटक भी करते हैं।
अपनी जगह से बाहर मे अपनी कला को दिखाना क्या है? क्या है जो वो अपने यहाँ नहीं दिखा सकते? बाहर दिखा सकते है?
ये कोई ऐसी कला नहीं है जो किसी को खुश करने वाली हो। अपने लिए एक जीने का तरीका होता है अथवा वो किसी ढाँचे या स्पेस का इंतजार करती है? क्या हर किसी को खुलने के लिए किसी ख़ास जगह या शख़्स का इंतजार होता है?
एक और शख्स के बारे मे बताता हूँ, जो गिटार सीख रहे है अभी और काम पर से आने के बाद अपनी छत पर बैठे गिटार पर अगुंली चलाते रहते हैं। उनका रियाज़ अपनी छत पर ही चालू रहता है। गानों कि उन्होंने कॉपी बनाई है और उसी मे लगे रहते है पर आजकल उन्होंने एक टाइम बनाया हुआ है बाहर लोगों के साथ मे इसको बांटने का जैसे ही वो कोई गाना बजाने मे सक्षम हो जाते हैं रिदम, ताल, लय मे सबमे परफेक्ट हो जाते हैं तो रात मे गली मे खाट बिछाकर अपना गाना बजाने लगते हैं। जिससे शायद कोई सुने या ना सुने पर जो लोग गली मे खाट बिछाकर सोते हैं वो सुनते हैं और बड़े शौक से।
मेरे हाथों से कोई चीज़ बन रही है या आकार ले रही है वो मेरे लिए क्या है? और मैं उसे अब रोजाना बना रहा हूँ तब वो क्या है?
बस्ती के काफी पुराने शख़्स घसीटाराम जी के पास जाओ तो वो अपनी कॉपी का जिक्र करते हैं। उसके कितने पेज थे? उनपर क्या-क्या लिखा था? और किन-किन रंगो के पेनों से, सब पता है उन्हें। उसी से अक्सर बात शुरू होती है जिसका लगभग वही पेज हमेशा खुलता है जिसमे वो पहली बार 'रसिया' गए थे। वे लिखा होता है। मगर असल मे वो कॉपी है ही नहीं। वो जानते हैं हमारे सुनने कि इच्छा को और बैठने कि ललक को। हर बार वो उस माहौल को बनाने मे समक्ष हो जाते हैं।
किसी आकार और रूप को देखने कि नज़र मे कला उभरती है तो बिना आकार और रूप के वो क्या है? कोई कुछ बनाकर दिखा दे वो कला और जो अपनी बातों मे लीन कर ले या मोह ले वो जादूगर। पर इसके अलावा जानना क्या है?
लोग जानने और बनाने कि कग़ार मे कलाकार छुपाते हैं और कलाकार कि कग़ार मे गुरू। गुरू जिसका रिश्ता इनके बीच उपजने का होता है। वो उपजना जिसके अंदर कई सारी बातों का पुष्टीकरण हो।
हाजिर जवाब, शातिर, अपनी पब्लिक को समझने वाला, हर चीज पर बोलने वाला
एक छवि है और एक छवि को सोचते हुए ऑदा। जो नवाजे जाते हैं लाइनो से।
जैसे, घाट-घाट का पानी पिया है, पुराना चावल है या गुरु आदमी है।
एक जो पढ़ा लिखा है और दूसरा जो देखा दिखाया है। यानि जहाँ पर रहता है वहाँ के बारे मे हर बदलाव को देखा और समझा है पर ये क्या है समाज मे?
ज्ञानी, जिसके लिए कोई कोना या जगह बनाने कि जरुरत नहीं। वो शख़्सियत अपने आप मे एक ढाँचा पाये हुए है। उसको जीते हैं कि उसकी समझ का कोई ना कोई हिस्सा हम मे या हमारे बच्चों मे उतर जाये जिससे आने वाला समय और अभी का चलता समय बड़ी सहजता से गुजरे फिर चाहें वो किसी भी चीज का ज्ञान हो।
ये एक अन्तर ही तो है, ज्ञानी और कला मे अंतर लेकर जीते हैं लोग।
कला जो आकार या रूप लेकर कलाकार बनाती है तो ज्ञानी जो ज्ञान पाता है। वो किसी जगह, शब्द या जीवन को समझता है तो वो कला नहीं है वो तरीका है। इसमे फिर लैवल काम मे आता है। कला अटपटा लगने लगता है। यहाँ बनता है तरीका। उसके जैसे तरीके अपनाओ और अपनी लाइफ़ जीओ।
ज्ञानी जो जगह बनाने मे जूझता नहीं। वहीं कलाकार अपनी जगह बनाता है। उसकी जगह तैयार नहीं होती वो जगह तलाशता है। कला बाँटने वाले ढाँचे नज़र आते हैं।
कुछ कला अपने दायरों को बनाती हैं। लोगों मे आने को उत्सुक होती हैं। "मुझे देखो" कि अपेक्षा होती है। जिसमे किसी शख़्स कि शख़्सियत बनने और काम, रिश्तों के अलावा एक ख़ास पहचान बनाने कि लालसा होती है। एक चेहरे कि खुशी के साथ।
जानने और मानने का दौर रहता है।
मैं जानता हूँ - जन्म होना।
मैं मानता हूँ - जन्म को दोहराना।
ये खेल है, इसमे सभी शामिल है।
लख़्मी
नदी का घाट
बहुत बार देखा है की जब हम रोज़ाना घर से काम और काम से जगह में वापस घर आते हैं या यूँ कहिये की जो जहाँ है, वो वहीं घूमफिर कर आ जाते हैं। चाहें जितना भी चले, जितना भी उड़े अपनी जगह लौट आते हैं। मगर सैकड़ो पंछी आसमान मे उड़ते है कुछ घर आने के लिए उड़ते हैं कुछ उड़ने के लिए उड़ते है।
शायद हम वही है हमारी सोच नदियों की भाँति बहती रहती हैं। जो धीरे-धीरे नये पड़ाव, नये किनारों को पकड़ती है फिर भी वो थमती नहीं है। उसका पानी सर्दी, गर्मी, आँधी-तूफान मे भी गतिपूर्ण रहता है। अपना ताज़ा स्पर्श लोगों को देता है। नदी जहाँ ठहराव लेती है वहीं एक घाट बनता है। लोग जहाँ आकर धर्म से और खुद से जुड़े संबधो को आहुति दे कर चले जाते हैं। समय वहाँ बदलता रहता है तो कभी इंतजार में रहता है।
कहने को तो किनारें या घाट लोगों के लिए एक क्रियाकलाप का स्थल है। मगर इस स्थल को बनाये रखने वाले छोटे-छोटे झुंड उसे हर तरह से रचनात्मक रखते हैं कि जो भी इसे देखें ठहराव न कहे। अपने शरीर का मेल समझ कर उतार देते हैं फिर नया चोला पहन लेते हैं। समाज निरंतर चलता रहता है। इस का रुख चारों दिशाओं मे अपने पाँव पसारता रहता है। हमारी लाइफ रोज़ाने के नियमबद्ध जीने को चुनौती देती है। हमें अपनी तरह जीने का संदेश देती है।
हम देखें कि क्या-क्या हमारे आसपास संदेश मिल रहे हैं। समाज जगह को चिन्हित कर के छोड़ देता है मगर वहाँ आसपास रहने वाले लोग उस जगह को गहरा करते हैं। जिससे चिन्हित करने का सही मायनें और वज़न सामने आता है।
नदी का घाट एक संकल्प, लक्षय धारण करने की जगह है। पुरानी पोशाकों को बदल कर नई पोशाक धारण करते हैं और अपने पिछले कर्मो को विसर्जित कर के नये कर्मो का लेखा-जोखा बना लेते हैं। ये वैसा ही है, जैसे किसी पत्थर या शीला पर बने पुराने निशानों को मिटा कर दोबारा से वज़ूद को गढ़नें की शुरूआत करना।
हम ऐसा करते सकते हैं। इस के लिए संधर्भ या मौका ढूंढने की क्या जरूरत है हर पल तुम्हारा है फैसला तुम्हारा है। आज मानव कि समझ में अपने कर्मो के मेल को धोकर जो मिलता है वो उनकी कालगुजारी का वज़न है। जिससे आत्मा को शूकून मिलता है। शहरों में रहने के बावज़ूद लोग तरह-तरह के धर्मो को आहुती दिया करते हैं। आहुती तो एक दान की तरह है। किसी ने कहा है, “दान-पून्न करने से मन मे लीन घुल जाता है। जीवन हजारों बार अपने समक्ष आहुती देता ही रहता है।
राकेश
शायद हम वही है हमारी सोच नदियों की भाँति बहती रहती हैं। जो धीरे-धीरे नये पड़ाव, नये किनारों को पकड़ती है फिर भी वो थमती नहीं है। उसका पानी सर्दी, गर्मी, आँधी-तूफान मे भी गतिपूर्ण रहता है। अपना ताज़ा स्पर्श लोगों को देता है। नदी जहाँ ठहराव लेती है वहीं एक घाट बनता है। लोग जहाँ आकर धर्म से और खुद से जुड़े संबधो को आहुति दे कर चले जाते हैं। समय वहाँ बदलता रहता है तो कभी इंतजार में रहता है।
कहने को तो किनारें या घाट लोगों के लिए एक क्रियाकलाप का स्थल है। मगर इस स्थल को बनाये रखने वाले छोटे-छोटे झुंड उसे हर तरह से रचनात्मक रखते हैं कि जो भी इसे देखें ठहराव न कहे। अपने शरीर का मेल समझ कर उतार देते हैं फिर नया चोला पहन लेते हैं। समाज निरंतर चलता रहता है। इस का रुख चारों दिशाओं मे अपने पाँव पसारता रहता है। हमारी लाइफ रोज़ाने के नियमबद्ध जीने को चुनौती देती है। हमें अपनी तरह जीने का संदेश देती है।
हम देखें कि क्या-क्या हमारे आसपास संदेश मिल रहे हैं। समाज जगह को चिन्हित कर के छोड़ देता है मगर वहाँ आसपास रहने वाले लोग उस जगह को गहरा करते हैं। जिससे चिन्हित करने का सही मायनें और वज़न सामने आता है।
नदी का घाट एक संकल्प, लक्षय धारण करने की जगह है। पुरानी पोशाकों को बदल कर नई पोशाक धारण करते हैं और अपने पिछले कर्मो को विसर्जित कर के नये कर्मो का लेखा-जोखा बना लेते हैं। ये वैसा ही है, जैसे किसी पत्थर या शीला पर बने पुराने निशानों को मिटा कर दोबारा से वज़ूद को गढ़नें की शुरूआत करना।
हम ऐसा करते सकते हैं। इस के लिए संधर्भ या मौका ढूंढने की क्या जरूरत है हर पल तुम्हारा है फैसला तुम्हारा है। आज मानव कि समझ में अपने कर्मो के मेल को धोकर जो मिलता है वो उनकी कालगुजारी का वज़न है। जिससे आत्मा को शूकून मिलता है। शहरों में रहने के बावज़ूद लोग तरह-तरह के धर्मो को आहुती दिया करते हैं। आहुती तो एक दान की तरह है। किसी ने कहा है, “दान-पून्न करने से मन मे लीन घुल जाता है। जीवन हजारों बार अपने समक्ष आहुती देता ही रहता है।
राकेश
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