Saturday, October 23, 2010

ओखला कॉर्पोरेट्स और जनता की पहल

मानवीय नमूना





ओखला के आसपास बहुत से पॉश कॉलोनियों मिल अपने घरेलू सफाई, ड्राइवरों, आदि ।
कॉर्पोरेट्स और जनता की पहल की कमी जैसी मदद करता है ऐसे स्थानों बनाया है।
ये बस्ती में रहने वाले लोगों जिसे हम क्षेत्र के प्रदूषण के लिये जिम्मेदार ठहराजाता है।
वो किसी के लिए घरेलू नौकर का स्रोत बनते है। और फैक्ट्रीयो मे श्रम भी करते है।
उनके घर कैसे है कैसे जीवनयापन करते है।
इस कार्यालो के मलिको को कोई फर्क नही पड़ता ।
उनका मशीन से काम कर के आने बाद वो अपने आम जीवन को किसी कल्पना की तरह सोच कर फेक्ट्रीयो में काम खत्म करने के बाद शूरू होता है।
पहले और बाद के बीच का जो दायरा है वो मशीन को अपनी दुनिया मे कुछ अलग ढंग से ले जाने का है।
जिस मे अगर झाक कर देखेंगे तो दोनो का मिला-जूला एक गठन समझने को मिलेगा।

राकेश

Wednesday, October 13, 2010

Friday, October 8, 2010

अनगिनत परछाइयों की छाया



हर कोई अपने अंदर कई ऐसी परछाइयाँ लिये चलता है जिसे वे किसी छाया के रूप के बनाने की कोशिश में है। वे परछाइयाँ जो उसकी हैं, उसपर जिसकी पड़ी हैं उसकी हैं, उसकी हैं जो उसे छोड़कर चला गया है और उसकी जो उसके लिये आया है। एक अकेली परछाई हकीकत में कई छुअनों का अहसास देती है और एक छाया कई परछा‌इयों के मिलन से बनती है।

वो मिलन जो किसी के छूने से बना है, किसी के इशारे से पनपा है, किसी के अक्श से बना है। इसमें उस गुंजाइश का कल्पना होती है जो कई और जगहें और ठिकाने बनायेगा। वे ठिकाने जो किसी एक के लिये नहीं होगें।

लख्मी

Monday, October 4, 2010

शहर का नीला डर

ये एक ख़ास मिलन है। इस मिलन में एक ख़ास झलक है और इस झलक में एक ख़ास पल भी छुपा है। साथ ही साथ इसको एक ख़ास भविष्य से भी समझा और देखा जा सकता है। भई, सरकारी महकमों का तो यही समझाना है। फिर कोई कैसे चूक सकता है इसे समझने के लिये। 'तैयारी औ डर' ये संजोग इस सारे सफ़र का।




तैयारी जहाँ विश्वासजनक दुनिया बनाने की पूर्ण कोशिश करती है वही पर एक डर के पायदान को भी खुला छोड़ देती है। हम किस ओर जा रहे हैं और हमरा ओर है कोनसा? इस सवाल का सबसे महत्वपूर्ण भाग तो तब शुरू होता है जब ये दोनों की एक दूसरे के बहुत नजदीक होते हैं। दिनॉक 1/10/2010 को दिल्ली की सड़कों पर इस अहसास को महसूस किया मैंने। वैसे तो मेरे एक साथी ने इसे पहले ही मुझे महसूस करवा दिया था मगर मैं सोच रहा था कि सारे सविधान तोड़ने वाली और उसे भिड़ने वाली पब्लिक कैसे नियमित दुनिया की रहनवाज़ हो सकती है?
'यहाँ पोस्टर लगाना मना है' इस लाइन को छुपा देता है शहर पोस्टर के नीचे।
'नो पार्किंग' इसपर डिप्पर लाइट ओन करके सुस्ताता है शहर।
'ये आम रास्ता नहीं है' इसे अपना समझकर इस्तेमाल करता‌ है शहर।


मगर ये सारे सविधानों का पिता दिखा उस तारीख को। शहर का 'नीला डर' ये आसमान नहीं है और न ही पानी है। ये तो कुछ और है।
लेकिन खेल फिर भी चालू है - भिड़ंत को हर जगह महसूस किया जा सकता है।

एक बार हमारे एक साथी ने सवाल किया था जो आज खुला महसूस होता है -
जो नियमों को माने वो सच्चा और अच्छा नागरिक और जो नियम न माने वो बाग़ी लेकिन जो नियम में जाये और बाहर आ जाये उसे क्या कहेगें?


लख्मी

दूरियाँ



'कहीं' किसके पास है?
'कहीं' कोन जीना चाहता है?
'कहीं' को कोन देता है?

लख्मी

Tuesday, September 28, 2010

सच और सजीव के पीछे क्या?

झूठ क्या है? कितना आसान और सुलझा हुआ सा सवाल है? इसी में जुड़ा है निर्जीव क्या है? बौद्धिक रूप से देखा जाये तो कुछ भी झूठ और निर्जीव नहीं होता। हम एलीमेंटस को निर्जीवता से आंकते हैं और सुनने - समझने को झूठ का जवाब। लेकिन, अगर सब कुछ अनुभव हैं तो और सबका अनुभव सबका अपना सच होता है तो फिर झूठ क्या है?

झूठ एक संभावनात्मक रूप से जीता है। जिसके आधार अगर न कहकर भी तलाशा या जिया जाये तो वे फलता - फूलता है। इसके अवशेष कई कथाओं को जीवन देता है। सही मायने मे अगर इसके चिंह खोजें जाये। ये महज इसका रिश्ता कहने और सुनने के साथ होता है। झूठ की अपनी कोई तस्वीर नहीं है। ये मानना और माने जाने के साथ बहस करता है। झूठ तब आता है या तब होता जब सच्चाई होना होता है। यानि झूठ को अकेले नहीं समझा जा सकता वे सच्चाई के सामने खड़ा होकर पैदा होता है।

जीवन को जीने के कई कारण, निर्णय और समझोते हैं जिनमें खुद को उसमे ढालने और रमाने का एक खास अहसास जुड़ा होता है। इनको अपने मानने और किसी और समझाने की कल्पना को सोचा जाये तो ये संभावनात्मक बनता है। यहाँ इस अवस्था में हम झूठ और सच को सोचे तो लगता है की जैसे दो पार्टीशन को जीने की बात कर रहे हैं।

सबसे मजेदार बात होती है कि झूठ मे किसी दूसरे की कल्पना समाई होती है। सच खुद में होता है लेकिन झूठ हमेशा किसी दूसरे का अहसास करवाता है। झूठ अपने से बाहर होता है। अपने अंदर का झूठ भी खुद के अनुभव का सच बनकर बाहर आता है।

इसके अहसास क्या है ?
सच बहुत ठोस होता है लेकिन झूठ तरल और न होने की छवि में बनाया और पिरोया जाता है
झूठ रूपकों से बयाँ किया जाता हैं
झूठ में एक समय का अहसास होता है
झूठ में कभी अकेला नहीं होता वे किसी माहौल, शख़्स या कहानी का पात्र बनकर उभरता है

कैसे ये अहसास होता है कि ये जगह किसकी है? इसमें बँटवारा ये हो सकता है कि "हमारी - तुम्हारी" या फिर इसको सोचा जाये की "सबकी"। इसको कैसे चिन्हित किया जाये?

ये एकदम अधूरा और कटा हुआ है। समझ लें की जीवन के अक्श अभी किसी 'पज़ल गेम' की तरह से टूकड़े होकर बिखरे पड़े हैं। ये टूकड़े मरने के समान नहीं होते बल्कि इनको जोड़ा जा सकता है। दोबारा से बनाया जा सकता है।

लख्मी