Friday, August 8, 2014

आदमी एकांत में है

राकेश

अपना बिस्तर अपना बेड

कोई एम्बूलेंस की आवाज़ नहीं। धूप के साथ जैसे इंतजार करते बिमारों के रिश्तेदार अब खुद भी सुस्ताने लगे हैं। छुट्टी का दिन है। बड़े डाक्टरों के बिना चलते अस्पताल का इंतजारिया कमरा भी बिना किसी रोकटोक के सुस्ता रहा है। छोटे डाक्टर भी दिखना बंद है। अस्पताल के कर्मचारी ही यहां से वहां भागते दौड़ते दिख रहे हैं। कम्बर, शॉल, पतली रजाइयां व पतली चादरों से देखती आंखे उन्हे ही निहार रही हैं। शायद जैसे कोई खबर उन्ही के हाथों मिल जाये। कमरे में इतनी कुर्सियां नहीं है जितना की जमीन पर अपने बिस्तर लगाये लोग पड़े हैं। कमरे के बाहर तीन से चार स्ट्रैक्टर खड़े हैं। उनमें से तीन भरे हैं। हाथ में अपना ही गुलूकोस पकड़े कोई लेटा हुआ है। उसके बगल में खड़ी एक औरत उससे कुछ पूछ रही है। बाहर स्ट्रेक्टर हैं और कमरे के अन्दर कई बिमार लोग। कोई कमर में गर्मपट्टी बंधाये कमर की तकलीफ से परेशान है तो कोई पैशाब की जगह एक नली पकड़े लेटा है। कोई मुंह को कपड़े से धका हुआ है तो कोई आंख के दर्द से परेशान है। ये वेटिंगरूम ही इनका अपना वार्ड है और बिस्तर अपना बेड। बस, यहां पर कोई बेड नम्बर नहीं है। बस, अपने पर्चे अपने सिरहाने पर लेटे है। खुद से अपना बेड तलाशते व बनाये ये लोग डाक्टर का इंतजार करते हैं और यह भी मालूम यहां कब तक रहना है। हां, मगर यह जरूर पता है कि यहां कबसे है। बस, खूश हैं कि इलाज हो रहा है। पैसा बच रहा है। यहां पर कोई मिलने का टाइम नहीं है। जब मर्जी रिश्तेदार आ जा सकते हैं। अस्पताल के कर्मचारी भी इससे संतुष्ट दिख रहे हैं।



यह वेटिंगरूम दिल्ली से बाहर से आये लोगों से भरा है। गुड़गांव, फरिदाबाद, दादरी, बलम्भगड़, गाजियाबाद लोगों से तो बाहर एमरजेंसी के सामने की खाली जगह में दिल्ली में ही रहने वालों की भीड़ जमा है। पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, बेग़मपुर, कटवारिया सराय और खानपुर। यहां पर एक जन से जब यह मालुम किया तो वह बोला कि पुरानी दिल्ली वालो का तो यह अपना अस्पताल है। वे तो यहां पर बुखार, पेट दर्द, कब्ज़ और तो और एसीडिटी की दवाई भी लेने आ जाते हैं। यह बात उन्होने बोली और जोर जोर से हंसने लगे। शायद यहां पर उनका अपना कोई नहीं था। अभी फिलहाल धूप इस जगह में चली रही है। खत्म होने के साथ आगे की ओर बड रही है और लोग उसके साथ साथ अपना बैठने का ठिकाना तलाशते व बनाते लोग आराम कर रहे हैं। यह जगह बिमारों से भरी हुई है। एम्बूलेंस, चौकीदार की सीटी, भारी स्ट्रेक्टर खींचने आवाज़ जैसे यहां के लिये आम सी आवाज़ है और उसके साथ साथ किसी के रोने, दर्द में चिल्लाने की भी। लेकिन फिर भी इस आवाज़ के होते ही सभी उसी ओर देखने लगते हैं। वेटिंगरूम में एक दूसरे से अपनी बिमारी / तकलीफ बांटते लोग इसी में संतुष्ट दिखे की उनके जैसे यहां कई हैं। एक दूसरे की छुट्टी की खबर सुनते ही उनको यह लगता दिखता की अब उनको भी जल्दी ही छुट्टी मिल जायेगी।

लेकिन आज सरकारी छुट्टी होने से कईओ की जैसे छुट्टी केंसल हो गई। 

लख्मी




Monday, July 28, 2014

बैठने की कोई रोक नहीं


लोग गली - गली ये देखते हुए घुमते कि कौन सी ऐसी जगह है जहाँ कुछ पलों का आराम किया जाये मगर एक रोज का नहीं हर रोज आया जाये? कहाँ पर कोई रौनकदार सभा बैठी हैं? कहाँ पर शौर है? कहाँ पर लोग बुलायेगे और कहाँ पर बैठने में मज़ा आयेगा? लेकिन यहाँ सारी जगहें एक ही आकार और रूप लिए ही थो थी। कभी - कभी तो आँखें कहीं रूक भी जाती लेकिन ये जबरदस्ती खुद को कहीं जमाने का समान होता। मन तो जैसे कुछ और ही तलाश रहा होता था।

एक माहौल से दूसरे माहौल से लोग अगर अपने पाँच पाँच मिनट भी दे जाते तो दूसरा दिन भी वहीं की तरफ ही अपने पाँव कर लेते। जहाँ एक बार पाँव जमा दिये तो समझो जमा दिये। सारी जगहें तो यहाँ पर ऐसी ही थी कि किसी को भी को कहीं पर भी रूकने की कोई मनाही नहीं थी। जमने और बैठने की कोई रोक नहीं थी और कोई जगह खुद के लिए तलाशने की कोई रोक-टोक नहीं थी। तभी तो कदम कहीं पर निचावले नहीं रहते थे। जैसे पाँव में पहिये लगे थे। भागे फिरते थे कहीं के होने जाने के लिए। ये दौर बना रहता था एक - दूसरे को बुलाने का। चाहें दो या चार पल ही साथ निभाने के लिए ही सही लेकिन एक दूसरे के अन्दर की इस लरक को लोग बखूबी पहचानते थे।

इस दौर में तो जैसे धर्म का ही प्रचार किया जाता था। जो भी इस दौरान नई जगह या नया माहौल अपने पाँव जमाता लोग उसे अपना कहकर अपनी ग्रफ्त में कर लेते मगर असल में वो ग्रफ्त उस जगह और माहौल के लिए कैदखाना नहीं बनती थी। बस, जो होता था वो था नज़र और दिलो - दिमाग में अपनी बात, काम और कर्मों को जैसे उतारा जाये? वही बिना आना-कानी शायद कानों तक चला भी जाता।

ये दौर शायद सुनकर और सुनाकर निकल जाने वाला नहीं था। जो भी दृश्य, शब्द और गुट आदमी के बाहर आ जाता तो वो अपना ठिकाना खुद ही बना लेता, जम जाता और बहुत जल्दी जगह में ठहराव पा लेता। उसके बाद में हर कोई उसके नीचे या ऊपर अपने आशियाने तैयार करता। एक से दूसरे के अन्दर तैरने के तरीके खुद से बना लेता। जैसे इस पल में सभी खाली नइया की तरह से इस समा के समन्दर में खड़े होते और कोई भी माहौल उनके लिए किसी खास तरह से चप्पू का अभिनय निभाकर उन्हे कहीं दूर ले जाने की कोशिश में रहता। शायद ये हो भी रहा था। जो सब के लिए बेहत्तर था, आखिर घूमता कौन नहीं चाहता था?, कौन नहीं था जो तैरना चाहता था? और कौन नहीं था जो खुद से, काम से और बने - बनाये इस माहौल से दूर नहीं जाना चाहता था? ये दूर जाना, खुद में खोना बेअसर था। बिलकुल अनमोल के समान जिसका कोई मोल नहीं होता। जमीन से जुड़े रहना, अपनी जमीन को सकेरना, बनाना और ताज़ा रखना ये सभी के अन्दर पल रहा था और नये माहौल बनने की ताज़गी उनमें वलवलाती रहती।

Friday, July 11, 2014

मौत. . .

जगह की रग़ो में बसने वाली कुछ ऐसी घटनाए जिनमें इतनी कपकपाहट होती है की उनको छूना, कई भावों को जन्म देने के समान बन जाता है। जो किसी एक घर की होती है लेकिन उसमें कई अनेकों घर जुड़ जाते हैं।

ये सिलसिलेवर होती है।

अगर इन सभी में से सारे भावों को निकाल दिया जाये तो क्या बचता है?

 

Thursday, July 3, 2014

मौस्की के आलम

मौस्की के आलम यह सिलसिला है उन तमाम लोगों के संजोग और विलाप का जो किसी को बुलाने और भागने मे भरोसा नहीं रखते। उनके लिये खुद को नज़रों मे लाने के समान जीते हैं। बेनज़र और बेइफ्तियार बनकर जीना इनके लिये मौकों के पैमाने जैसा है।

यहीं - कहीं इनकी इतनी महक है कि जीवन की सभी धाराओं में हम जाये भी नहीं तो भी उनके चित्र बना सकते हैं जैसे - समंदर मे उतरे बिना उसकी गहराई का पता कर लिया हो। उसे भाप कर, उसका एहसास करके, उसके छु कर, उसे सुनकर और उसे महसूस कर के।

जिंदगी कि किताब

Monday, June 30, 2014

खामोश पन्ने

हर जगह किसी न किसी कहानी की तरह है। जिसमें कई पन्ने हैं और हर कहानी में कुछ ऐसे भी पन्ने हैं जो किनारों से कुछ इस तरह मुड़े हैं कि अपने साथ या तो कई पन्नों को चिपका ले जाते हैं या फिर उन्हे बोलने का मौका नहीं देते।

जिंदगी की किताब :

Thursday, June 19, 2014