किताबें अपने साथ कई तरह की तलाश लिए चलती हैं जिसमें जुड़ने वाला हर अनुभव उसमें अपने को महसूस करने के कोने तलाशता है। वो तलाश कभी तो उसमें उभरने वाले सवाल बनती है तो कभी अपने मन-मुताबिक कलपना करके जगह बना लेती है।
यही खोज किताबों की दुनिया में हमें खींच लेती है। जिसके साथ बनने वाला रिश्ता कई तरह के रूप बयाँ करता है।
ये तलाश क्या है? वैसे माना जाये तो तलाश हमें एक जैसे रूप मे नहीं जीती। वे बदलती रहती हैं। तलाश का बदलना, जहाँ दूर की अवशेषों को करीबी से देखने और सोचने पर मजबूर करता है वहीं पर फैलाव के ऐसे कोनों को खोलता है जो इस बदलाव को भी उर्वर बनाती है। जैसे - तलाश कभी जगहों में तबदील होती है तो कभी उन अहसासों में जो हर रोज की ज़िन्दगी में कभी नज़र नहीं आते या फिर ये वो किनारें हैं जिनको हमेशा नज़र-अन्दाज करके जिया जाता है।
किताबों की दुनिया में, कई तरह के अहसास भी छुपे होते हैं। वे हर अनुभव और जीवन से बहस, सवाल और कल्पना की उड़ान में शामिल होकर जीने के तरीके बनाते हैं। इसके बावज़ूद भी यही सवाल आकर ठहर जाता है कि किताबें हर शख़्स के अनुभव में कैसे जुड़ती अथवा उनकी तलाश में भागीदार बनती है? इस तलाश में क्या-क्या छुपा होता है?
असल मायने में, हर किताब अपने साथ में अपनी पब्लिक की कल्पना लिये चलती है। उसमें बनने वाले माहौल व चित्र किसी जीवन से संवाद बनाने की कोशिश लिये रहते है। मांग, चाहत और उत्सुक्ता का रिश्ता उसमें चाव जगाता है। लेकिन वो किताब कौन सी होती है जो हमें अपनी ओर आक्रषित करती अथवा खींचती है?
कल्पना में किताब का आकार और उसमें उभरने वाले माहौल ही पाठक की चाहत के पात्र बनते हैं। जिसमें माहौल, जगहें, शख़्स, शब्द, कुछ ऐसे ब्यौर जिनमें वे अहसास हो, जो सामने चलते बेजान चीज़ों को भी जिन्दा करदे जैसे नई कल्पनायें दें।
इन चीज़ों को किताब में भरपूर चाहत और मांग से तलाशा जीता है। एक ऐसी किताब जो हमें ऐसे संदर्भो से रू-ब-रू करवायें जिनके साथ हमारा नाता खाली देखकर निकल जाने का नहीं होता या वे रिश्तें उभार जो खुद से बनाये तरीकों पर जीते हैं।
हर संदर्भ में किताब अपनी एक खास जगह बनाती है। जिसकी जगह बन जाने पर हर शख़्स उसमें खुद को खोजता है। अपने सवालों को, अपनी जगहों को, अपनी याद से जुड़ाव रखने वाले चित्रों को, नये शब्दों को, नये रिश्तों को और नई कल्पनाओ को।
ये सब अलग-अलग जीवन की हिस्सेदार बनती है।
जिसमें ऐसे माहौल हो, जिनमें हम रोज जीते हैं लेकिन उनको देखने के विभिन्न-विभिन्न नज़रिये बना नहीं पाते, वे माहौल हो जिनको देखने और उसमे रहने का रिश्ता कई अलग तरह के रूपों में जाहिर होता है।
माहौल, वे रूप लिए हुए हो जो अपने साथ कई ऐसी आवाज़ें लेकर आये जिनको सुनकर अनसुना कर दिया जाता है। किताब का आकार कुछ ऐसे माहौल उभार जो नज़र में होकर भी गायब होते हैं।
जगह, कई अलग-अलग तरह की जगह से मुलाकात करने की इच्छा दिल में ऐसी चाहत को बयाँ करती है कि हम अपने आप उसमें घुसते जाते हैं। किताब में कई ऐसी जगहें हो, जो खाली बनावट का रूप लिए ही ना हो, वे किसी की कल्पनाओ के साथ मे उड़ान भर सके। वे जगहें हो जिन्हें हम खुद से बनाते हैं।
एक ऐसी किताब जो अपने अन्दर के हर अहसास से आदि हो, हर अनुभव को उसमें जगह देने का न्यौता हो जिसमें कई भिन्न-भिन्न छवियाँ अपने रूपों के साथ में जुड़ाव बना सके।
हर चाहत के अनुसार किताब में चीज़ों का आना मुश्किल होता है। लेकिन उसके साथ-साथ उसमें चेहरों, जगहों और नये अथवा विभिन्न माहौल की तलाश हमेशा चलती रहती है। इस तलाश में किताब का नया आकार उभरता है।
लख्मी
Monday, May 10, 2010
Saturday, May 8, 2010
माहौल को सोचना
Friday, April 30, 2010
जीवनी का विवरण
हमारे आसपास क्या है? टेडी-मेडी सपाट सतहें। उनके साथ बने कुछ कोने जो किसी न किसी से जुड़े रहते हैं। ये कोने स्थिर होकर भी स्थिर नहीं होते। किसी याद या ठहरे विचार को हरकत में ले जाते हैं।

ये बहुत दूर भी ले जाते हैं और आँखों के सामने एक जीवनी का विवरण भी कर जाते हैं। हम अपनी याद का कोई महफूज पल, दिन या सफ़र वापस किसी कोने और अवसर के दौरान जी पाते हैं जिसके साथ जीवन के आने वाले कल की सूचना मिल जाती है।

जिसको सुनकर हैरानी नहीं होने चाहिये। क्योंकि जो हो रहा है उसका कारण है। इसके अलावा हम भी किसी वज़ह या बे-वज़ह से जुड़े होने के बाद भी हम कहाँ है ये देखने की कोशिश करते हैं। हम जहाँ हैं हम वहीं हैं और इसके साथ जो हो रहा है वो कसौटी है, सिच्यूवेशन है। जिसमें शरीर किसी उर्जा की तरह काम करता है।

राकेश

ये बहुत दूर भी ले जाते हैं और आँखों के सामने एक जीवनी का विवरण भी कर जाते हैं। हम अपनी याद का कोई महफूज पल, दिन या सफ़र वापस किसी कोने और अवसर के दौरान जी पाते हैं जिसके साथ जीवन के आने वाले कल की सूचना मिल जाती है।

जिसको सुनकर हैरानी नहीं होने चाहिये। क्योंकि जो हो रहा है उसका कारण है। इसके अलावा हम भी किसी वज़ह या बे-वज़ह से जुड़े होने के बाद भी हम कहाँ है ये देखने की कोशिश करते हैं। हम जहाँ हैं हम वहीं हैं और इसके साथ जो हो रहा है वो कसौटी है, सिच्यूवेशन है। जिसमें शरीर किसी उर्जा की तरह काम करता है।

राकेश
हमारे सामने बनी एक रूपरेखा

जो रोज़ मिलता है और मिलकर कहीं खो जाता है। उसे कैसे अपने रूटीन में रखेगें?
हमारी कल्पना हमारे साथ चलती है। बस, जगह बदलने से हम उस कल्पना का पुर्नआभास नहीं कर पाते। कैसे देख सकते हैं उस द्वृश्य को जो हमारे सोचने की वज़ह है? क्या उसका फैलाव है? या हमारे देखने का नज़रिया? जिसके माध्यम से हमारे सामने बनी एक रूपरेखा दिलो-दिमाग पर अदा सी छोड़ जाती है।
वो मिलने की चाहत। वो पाने की लालसा। जो ले आती है हमें कई रफ्तारों के बीच जिसमें हमारी भी इक रफ्तार होती है। पहले हम जगह को समझने के लिये समय को अपने लिये रोक लेते हैं फिर समझ आने के बाद उस रफ्तार में गिर जाते हैं। ये क्या? क्या ये कोई प्रणाली है या जाँच? या फिर कोई प्रयोगनात्मक समझ है।
हर जगह ऐसी होती है?

राकेश
मिटना ही जीवन है
Sunday, April 25, 2010
100 रू जूर्माना देना पडेगा ।
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हम बीयरबार में बैठे थे। गर्मी से राहत पाने के लिये बीयर एक मात्र झुगाड़ था। न्यू गाजियाबाद में देशी बीयरबार है। जहाँ पर ब्राण्ड तो विदेशी है मगर उस अड्डे का रहन-सहन बिलकुल दैहाती है। न्यू गाजियाबाद दिल्ली की सिमाओ से सटा है। इसलिये दिल्ली शहर के पहनावों और अदाओं का यहाँ अभी आग़ाज हो रहा है।
शहर आबादी जैसे कट के यहाँ आ गई हो। वहाँ के माहौल की गुणवत्ता ये थी गाँव जैसा मज़ा वहा बैठने से आ रहा था। पेड़ों के शरारती हवा अन्दर की गर्मी को मात दे रही थी। पसीना पारे की तरह उतरा रहा था। छत में गाडर लगे मरे-मराये पंखे की हालत किसी चूसे हुये आम जैसी हो रही थी। बीयरबार मे दिवारों पर विदेशी शराब और ब्राण्डों का विज्ञापन बडे-बडे पोस्टर के रूप में छपा था। जिसको देखकर जगह में उत्तेजना पैदा होती थी। बाहर से हल्की रोशनी नाइंटीन डिग्री का कोण बना रही थी।
प्लास्टिक के ग्लासों मे बुलबुले छोड़ती ठन्डी बीयर पसीने को उडन छूं कर रही थी। बड़े साधारण कुर्सी-टेबल पर हम कोहनियों को टेककर बाहर की गर्मी को चैन की सासों से दूर कर रहे थे। वक़्त शाम का ही था अभी बार में लोगों का आना शुरू हो रहा था। कांउटर से बीयर लेकर लोग हॉल के अन्दर आकर चौगड़ी मारकर बैठ जाते।
हमारे पास बीयर पीने के अलावा और कुछ नहीं था। गले की तराई जो करनी थी। सौ खाली बीयर ही मजा दे रही थी पर कुछ देर तक उसके बाद तो लगा की खाने को कम से कम नमकिन ही मिल जाये। पसीना अभी सूखा नहीं था। पंखा तो मानो हम पर एहसान कर रहा हो "जनाब अपनी रफ्तार तो तेज करो।" मेरे साथी ने गौर फरमाया।
पास की टेबल पर चार आदमी और बैठे थे। उसकी नाफरमानी बता रही थी की वो टल्ली हो चुके है। तभी तो अपने ही साथी का कॉलर पकड़ के महाशय मर्दानगी दिखा रहे थे। उनके बीच गाली-गलोच भी हो रहा था। इतने में जिसने अपने सामने वाले का कॉलर पकड़ रख था। उसके मोबाइल फोन की घण्टी बजी, उसने फोरन मोबाईल फोन उठाया और एक दम सीधा हो गया।
"जी मैम ओके मैम, येस मैम" कुर्सी छोड़कर उठा। लगा किसी के आगे गिड़-गिड़ा रहा हैं। हमारे आँखो करंट लगा कमाल है अभी उजाड़-गंवार की तरह ये एक-दूसरे से पेशा रहे थे। अब अचानक क्या हुआ? बाहर बहुत गर्मी है। इस लिये इस माहौल की ठंडक ने शरीर में दबा के शूरूर भर दिया था।
हर किसी की जेब को बचाने लायक बीयर ही तो पीनी होती है। उसका शूरूर ही तो मजा देता है फिर चाह वो रंगीनियत और चमक-धमक भरा माहौल हो या फिर सादा वातावर्ण। दो घूंट उतरते ही कोई पॉवर सी सीर चढ जाती है।
गर्म फुंकारों को गले से छोड़ते हुये हम उस जगह को अपना नया अनुभव कह कर बातचीत करने लगे।
"सब कुशल मंगल है।" इस जूमले ने मोके रौनक को बड़ा दिया।
आनंद ने बीयर के घूंट मार कर आह! भरी आवाज निकाली और करते भी क्या घूंट मारने के बाद जब डकार आती तो बाहर छोडने के लिये दाँय-बाँय देखना पड़ रहा था। हमारे चेहरों पर राहत से पहले किसी धूप के मारे इंसान को जैसे पेड़ की छांया मिल जाती है। वैसी हो गई थी।
हम कम बोल रहे थे। बोलने से स्वाद कम महसूस हो रहा था। इस लिये इक-दूजे को तसल्ली भरी निगांहो से देख रहे थे। उनके बार-बार मुस्कुराने के अंदाज से माहौल जैसे किसी नई उर्जा को ला रहा था।
उनकी हंसती हुंई आँखे धीरे-धीरे हम तीनों के भीतर तक जा रही थी। उन्हे रोकना नामूमकिन सा था। आनंद पैरो को हिलाकर कुछ कहने का साहस जुटा रहा था। वो और राजू निगाहों से बातें कर रहे थे। हमारे हाथ बीयर की बोतलों को इधर-उधर घसीट रहे थे। ये क्रिया हमारे मन की व्यथा को प्रकट करने के लिये काफी थी। टेबल पर ग्लास और टेबल के नीचे पैरों का एक-दूजे से भिड़ाना। क्या चल रहा था। काम की थकावट से चूर शरीर बीयर के दो ठन्डे घूट को झिल समझ कर उसमे गोता मार गया। अब कान कुछ सुन नहीं पा रहे थे। आँखों को सब अलग दिख रहा था। मगर होश में है ये जताना भी जरूरी था वरना अगली बार यहाँ का चक्कर भूल जाओ। मन में कई अजीब सी बातें बिरयानी की तरह पक रही थी।
पैग पर पैग और कुछ नई-पुरानी बातें जो हर कोई करता है शायद इस चीज के साथ इसी लिये हर कोई बैठता है।
राकेश
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