रात, परछाई और छाया इनके रंग क्या है? क्या रात परछाई से जुदा है? या रात और परछाई के मिलन से छाया बनती है? इनको एक साथ मे सोचना और इनके एक साथ मे चलने को हम किन और शब्दों से सोच पाते हैं?
पिछले दिन कुछ दोस्तों से बात करते हुये ये तीन शब्दों को बहुत नजदीक से देखने और सोचने की कोशिश की। ऐसा नहीं था कि सोचना मेरी खुद की कल्पना से दूर था या ऐसा भी नहीं था की इन शब्दों से ही सोचना और कल्पना मेरी हकीकत और सपनों की दुनिया को एक साथ पिरो रही थी। ये खाली किसी रंग के साथ बहने की कोशिश थी।
परछाई क्या है?
प्रतिबिम्ब, अक्श या फिर कुछ और – इन सभी मे कुछ तलाशने और तराशने की पूरी निपूर्ण कोशिश सभी को अपनी कुछ ऐसी कहानियों के अन्दर ले जा रही थी जिन्हे सुनाना कोई गज़ब अहसास नहीं बनाता हाँ, बस माहौल को बहने का इतना गहरा मौका दे देता है जिससे कई और अन्य ज़िन्दगियों को अपने साथ ले जाया जा सकता है। मगर कहानियाँ सुनाना कोई बड़ा काम नहीं था। यहाँ पर सबके दिमाग था की कैसे इन तीन अलग-अलग स्थितियों और रूपों को एक साथ समझा जा सकें?
परछाई, अपने शरीर के नृत्य से मिलने का एक खास अहसास को बनाती है जिसमें हम हमारे खुद के नृत्य से मिलते हैं और उसके साथ बनाने वाले खुद के नातों हम अपने उस पल भर और क्षणिक अहसासों से भरते जाते हैं। हर परछाई का दूसरा अंग उसके छाया होने को भी जी भरकर जीता है। इसमें किसी दूसरे शख़्स के होने का अहसास होता है। परछाई – इसका जीवन खुद की पहचान को खोकर भी जीवित रखता है। किसी भीड़ मे खड़े इंसान की कोई पहचान जरूर होती है लेकिन परछाइयों की भीड़ मे किसी परछाई की कोई पहचान नहीं होती। वे तो खुद के नृत्य से जानी और सम्भोदित होती है।
पहचान और परिचय से बाहर होकर जीना जहाँ शरीर को फँसाये रखता है वहीं पर परछाई इन दोनों रूटों को तोड़कर कभी भी जी लेती है। जिसमे शरीर खाली एक ऐसे ठोस धातू की भांति बन जाता है जो कभी भी अपने को तोड़ेगा औ कभी भी मोड़ेगा लेकिन परछाई उसको अपने आगोश में लेगी। जिसमें रोशनी का नाता खाली उसके साथ डांस मे साथ देने के अलावा कुछ नहीं रहता।
यहाँ पर रात को भी सोचते समय लगा की किसी बहुत बड़े आकार की ऐसी परछाई है जिसे किसी खास पहचान से जाना और दर्शाया जाता है जिसमें खास जीवन जी उठता है और जीता है।
ये रात और परछाई के अन्दर जीना क्या है? इनको छाया बनने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन जरूरत का होना या न होना खाली मतलबी दुनिया का चेहरा ही नहीं दिखाता बल्कि किन्ही ऐसे अन्य जीवनों और सफ़रों को साथ मे खड़ा करना भी होता है जिन्हे साथ मे उड़ने और चलने की कशक हो गई होती है। इनको अपने जीवन मे किस तरह से सोचा जाता है?
अगर हम परछाई मे शरीर, रात में से समय और छाया मे वस्तू को निकाल देते तो इनको समझने के इशारे क्या है?
बात यहाँ से सफ़र की ओर बड़ती है -
लख्मी
Saturday, April 17, 2010
Wednesday, April 14, 2010
कोई परछाई हमें देखती है ,सूनती है।
इस मे हम कहाँ है।

कोई है जो हमेशा साथ है और होकर भी अद्विश्य है।

आवाज देती परछाई।

हमें सूनती और देखती है।

साथ रहती है ।

सामने तो कभी पिछे ।

हर वक़्त

किसी जगह में

अपने साथ भी

कभी दिख जाती है और कभी हाथ ही नही आती है।

राकेश

कोई है जो हमेशा साथ है और होकर भी अद्विश्य है।

आवाज देती परछाई।

हमें सूनती और देखती है।

साथ रहती है ।

सामने तो कभी पिछे ।

हर वक़्त

किसी जगह में

अपने साथ भी

कभी दिख जाती है और कभी हाथ ही नही आती है।

राकेश
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Friday, March 26, 2010
शुरूआत और अंत के बीच :
हमारे जीवन की रफ्तार और ठहराव का इतना जोर हमपर रहता है कि हर पल और उसके अंदर बनी हलचल इन दोनों के नाम कर दी जाती है। जीवन के ऐसे दो बड़े मटके जिनका मुँह बहुत बड़ा है और पेट भूखा। हमारे पास अपने चलने और बैठने को सोचने के लिये और क्या शब्द हैं? जिनको जीवन में किसी खास भिड़ंत से खुद के साथ छेड़ा जा सकता है।
लख्मी
झूठ क्या है?
मेरे एक साथी ने मुझसे ये सवाल किया। पहले तो लगा की ये क्या सवाल है? लेकिन उसके बाद में इसे संभावनात्मक रूप से देखने और समझने की कोशिश की तो इसमें किसी खास दायरे को बनाया भी और तोड़ा भी। अगर सब कुछ अनुभव है तो और सब सच है तो झूठ क्या है?
झूठ एक संभावनात्मक रूप से जीता है। जिसके आधार अगर न कहकर भी तलाशा या जिया जाये तो वे फलता - फूलता है। इसके अवशेष कई कथाओं को जीवन देता है। सही मायने में अगर इसके चिंह खोजे जाये तो ये महज इसका रिश्ता कहने और सुनने के साथ होता है। झूठ की अपनी कोई तस्वीर नहीं है ये मानना और माने जाने के साथ बहस करता है। झूठ तब आता है या तब होता जब सच्चाई होना होता है। यानि झूठ को अकेले नहीं समझा जा सकता वे सच्चाई के सामने खड़ा होकर पैदा होता है।
जीवन को जीने के कई कारण, निर्णय और समझोते हैं जिनमें खुद को उसमे ढालने और रमाने का एक खास अहसास जुड़ा होता है। इनको अपने मानने और किसी और समझाने की कल्पना को सोचा जाये तो ये संभावनात्मक बनता है। यहाँ इस अवस्था में हम झूठ और सच को सोचे तो लगता है की जैसे दो पार्टीशन को जीने की बात कर रहे हैं।
सबसे मज़ेदार बात होती है कि झूठ में किसी दूसरे की कल्पना समाई होती है। सच खुद में होता है लेकिन झूठ हमेशा किसी दूसरे का अहसास करवाता है। झूठ अपने से बाहर होता है। अपने अंदर का झूठ भी खुद के अनुभव का सच बनकर बाहर आता है।
इसके अहसास क्या है ?
सच बहुत ठोस होता है लेकिन झूठ तरल और न होने की छवि में बनाया और पिरोया जाता है।
झूठ रूपको से बयाँ किया जाता है।
झूठ में एक समय का अहसास होता है।
झूठ में कभी अकेला नहीं होता वे किसी माहौल, शख़्स या कहानी का पात्र बनकर उभरता है।
अगर इसे बँटवारे मे सोचा जाये तो इसका जीवन दायरों में नहीं तो इसका जीवन एक ऐसे विशाल रूप में है जिसको कैद नहीं किया जा सकता।
लख्मी
झूठ एक संभावनात्मक रूप से जीता है। जिसके आधार अगर न कहकर भी तलाशा या जिया जाये तो वे फलता - फूलता है। इसके अवशेष कई कथाओं को जीवन देता है। सही मायने में अगर इसके चिंह खोजे जाये तो ये महज इसका रिश्ता कहने और सुनने के साथ होता है। झूठ की अपनी कोई तस्वीर नहीं है ये मानना और माने जाने के साथ बहस करता है। झूठ तब आता है या तब होता जब सच्चाई होना होता है। यानि झूठ को अकेले नहीं समझा जा सकता वे सच्चाई के सामने खड़ा होकर पैदा होता है।
जीवन को जीने के कई कारण, निर्णय और समझोते हैं जिनमें खुद को उसमे ढालने और रमाने का एक खास अहसास जुड़ा होता है। इनको अपने मानने और किसी और समझाने की कल्पना को सोचा जाये तो ये संभावनात्मक बनता है। यहाँ इस अवस्था में हम झूठ और सच को सोचे तो लगता है की जैसे दो पार्टीशन को जीने की बात कर रहे हैं।
सबसे मज़ेदार बात होती है कि झूठ में किसी दूसरे की कल्पना समाई होती है। सच खुद में होता है लेकिन झूठ हमेशा किसी दूसरे का अहसास करवाता है। झूठ अपने से बाहर होता है। अपने अंदर का झूठ भी खुद के अनुभव का सच बनकर बाहर आता है।
इसके अहसास क्या है ?
सच बहुत ठोस होता है लेकिन झूठ तरल और न होने की छवि में बनाया और पिरोया जाता है।
झूठ रूपको से बयाँ किया जाता है।
झूठ में एक समय का अहसास होता है।
झूठ में कभी अकेला नहीं होता वे किसी माहौल, शख़्स या कहानी का पात्र बनकर उभरता है।
अगर इसे बँटवारे मे सोचा जाये तो इसका जीवन दायरों में नहीं तो इसका जीवन एक ऐसे विशाल रूप में है जिसको कैद नहीं किया जा सकता।
लख्मी
Friday, March 12, 2010
कल्पना के उस सागर में।
आसमान कहाँ तक है।
समय की लूक्का-छिप्पी
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