Monday, October 15, 2012

रंगो की अय्याशियां



पिछली रात अशौक ने रजनी के चेहरे पर कई रंग लगा दिये। रजनी को इन सबका पता भी नहीं था। वे मदमस्त नींद में मुस्कुराती हुई सो रही थी। अशौक ने रंगो से उसके चेहरे को पूरी तरह से रंग दिया था। लाल, पीला, हला और नीले रंग से इतनी लकीरें खींच दी थी की लगता था कई सारे इंसान के साथ रजनी आज बिस्तर मे है।

दूसरे दिन रजनी उठी तो हर रोज़ की तरह वो सबसे मिलने के लिये अपने कमरे से निकली। जो भी उसे देखता तो हंस पड़ता। वे समझ नहीं पाती। जो भी उससे बात करता तो बड़ी मुस्कुराहट के साथ। मगर रजनी अपने काम मे पूरी तरह जुटी हुई थी। वे जिस जिस के पास मे जाती वो ही उसे देखकर चौंक जाता। उसे करीब से जानने वाले उसपर हंसते और दूर से जाने वाले पूरी तरह से चौंक गये थे।

सब की हंसी का कारण बनी रजनी वापस अपने कमरे में पहुँची। खुद को संवारने के लिये जैसे ही शीशे के सामने पहुँची वे खुद चौंक गई और फिर जोरो से हंसी। काफी देर तक वे खुद को बस, देखती रही। रंगो को प्यार से छूती वे और भी ज्यादा बिगाड़ रही थी। जैसे खुद का ही चेहरा बिगाड़ रही हो। कुछ देर आइने के सामने खड़े होने के बाद में रजनी उसी हालत में फिर से घर के अंदर घूमी, अब की बार वो उन लोगों के पास मे गई जो उसे देखकर हमेशा नराज रहते थे तो कभी गुस्सा हो जाते थे। उनके सामने वे खड़ी रही। उन बच्चों के पास मे गई जो उसकी डांट फटकार पर भी हंसते थे। उन्हे डराने के लिये।

फिर दोबारा से अपने कमरे मे आइने के सामने आई और रंग को मलने लगी।


जिन्दगी मे कई बार ऐसे वक़्त आते है जब ये सोचना बेहद जरूरी होता है कि जीवन के किस हिस्से को आगे ले जाने की जरूरत है? उसे जो कामयाबी और नकामी का उदाहरण बनेगा या उसे जो कुछ नया गढ़ेगा। यह वक़्त नये और छूटने वाली अनेकों छवियों के बीच मे खड़ा कर देते हैं। क्या पकड़ा जाये और क्या छोड़ दिया जाये? असल में कुछ नया मिलना और कुछ छूट जाना हमेशा साथ साथ चलता है। कुछ छूट जाने का गम करना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना की नये की उमंग मे आगे बढ़ना। यह सोच उज्वल है। मगर शायद कुछ ऐसा भी है जिसे जीवन मे रिले करने की भूख रहती है। रिले करना विभिन्नताओ के अहसास में रहने के समान है। रिले ट्रांसफर है सोच का, छवि का, और समय का।

साथ ही वे मौके भी जब हम सभी खुद को एक बार ऐसे तैयार करते जिससे किसी को चौंका सके, हैरान कर सके, चिड़ा सके, लुभा सके, अपनी ओर खींच सके, डरा सके, पंगा ले सके या चैलेंज कर सके। कुछ तो बहुत कम समय के लिये बन पाते हैं तो कुछ कम समय के लिये होते मगर बार बार सिर चड़ जाते है। जीवन मे किसी वक़्त ने कोई चेहरा जैसे तोहफे मे दे दिया हो। वो याद तो रखा जायेगा मगर किस तरह?  उसे हम खुद से बुन ले तो क्या हो?


एक वक़्त ने उनके सामने भी ऐसे ही हालात पैदा कर दिये थे। जिनमे किन्ही दो रूपो में से उन्हे किसी एक छवि को अपनाना था। एक तो वे जो उन्हे पूरी तरह से इस दुविधा मे फसाये हुये थी कि वे कहां चली जायेगी और दूसरी वे जिसका बढ़ना पूरी तरह से तह होता है। पढ़ना, बढ़ना, शादी करना, मां बनना और फिर जिन्दगी के किसी पायदान पर रूक जाना। पायदान का दबदबा बेहद कठोर रहता है। समाजिक जिन्दगी का मान सम्मान बना रहता है। वे जो एक और रूप तैयार करता है जिसका रंगीले चेहरे से कोई लेना देना नहीं।

हर साल नाच मण्डली में हिस्सा लेती है। हिस्सा लेने से पहले वे कहां रहती थी व क्या करती थी। मण्डली का इससे कोई लेना देना नहीं होता था। शायद मण्डली का हर बंदा इसी रूप से नवाजा गया था। वे क्या छोड़कर आयी से ज्यादा वे इस बार क्या लेकर आयी है। नाच जमने से पहले यह जानने की रात हर साल जमती।

यह रात कई रोज की रातों से भिन्न होती। थकने और दुरूस्त होने से पहले की रात। कभी याद नहीं रहती। हर कोई दिन के शुरू होते ही क्या रूप धारण करके इस बार बाहर निकलेगा को रचता, बोलता और उसमे खो जाता। ऐसा मालुम होता की जैसे हर कोई वो बनकर निकलना चाहता है जिसमे वो खूबसूरत लगे, दुरूस्त लगे और यादगार लगे और कभी कभी तो होता की वे वो बनने की कोशिश मे है जिसे वो पहली बार खुद पर ट्राई करेगा।

एक पूरी रात उस किरदार मे ढ़लने के लिये होती। एक दूसरे को गहरी निगाह से देख सभी उस किरदार का अहसास करते। जैसे सपाट चेहरे पर उस किरदार का रंगीला चेहरा बना रहे हो। एक ही रात मे सभी अपने चेहरे मे दिखते चेहरे को पोत उन राहों पर निकल जाते जो अब भी अपने ही जैसे को तलाश रही होती है। उन पुते रंगीले चेहरे के पीछे के चेहरे को सभी ताकना चाहते और खोचना भी।

वे आज तैयार थी अपने चेहरे की शेप के भीतर किसी और को बसाये।

रूप वापस लौटते हैं। किसी समय को साथ लेकर। वे समय जिसे जवाब देना चाहते हैं या वे समय जिससे बहस करना चाहते हैं। समय जिसमें रूप खो गये थे, जाने नहीं जा रहे थे, नकार दिये जा रहे थे। समय उन पड़ावो को रिले करता चलता है जिसमें फिर से ये उम्मीद होती है कि वे रंग ले सकते हैं।

लख्मी

चार दीवार के बाहर

कभी "रैनबसेरा"

अनेक मे होना - उन अनेक में के बीच जो जीवित है।

लगा - जहां हर कोई किसी के भी नजदीक हो सकता है, दूरी बना सकता है, सुन सकता है और दूर से सुनने के अहसास ले सकता है। कई बातें एक साथ चल रही है।

सही मायने में - जब कोई अपने किसी वक़्त को दोहरा रहा होता है तो उसी वक़्त कई और जीवन दोहराने मे चल गुजर रहे होते है। एक दूसरे से मिक्स होते हुए। किसी बड़ी आवाज़ को रचते हुये। समय को भूलाते हुए या समय को याद बनाते हुए। स्पेश किसी आर्केश्ट्रा की तरह हमेशा बज रहा है।




रात में गली के कौने का माहौल

मिलने वाले एक दूसरे के साथ पहचान में है। कई टाइम से मिल रहे होते हैं। एक दूसरे को सुन रहे होते है। इतनी पहचान के बाद भी वे हर मुलाकात मे हो रही या निकलती बातों से हमेशा अंजान रहते हैं। मिलने के स्वाद इसी मे छुपा है। माहौल कभी एकांत मे नहीं होता। ये जरूर है कि वे किसी एकांत के लिये बनाया व चुना जरूर जा रहा है। माहौल उस बाघी दुनिया मे उतार देता है जिसने किसी रात तो फैसला किया कि इसे चारदीवारी या छुपने की जगह पर नही बिताया जायेगा।



ट्रेन के रद्द हो जाने से पहले - स्टेशन का वेटिंग रूम
जहां लोग जितने भी समय रूक जाये मगर, हमेशा हमसफ़र ही बने रहते हैं। जो कभी भी एक दूसरे से बिछड़ सकते है। खुद में सबको लेकर।



जनमासा -
जहां पर कुछ समय के लिये लोगों को रोका जाता है
जैसे - किसी बरात को, किसी सरकारी महकमे को, मुसाफिरों को,



मार्किट के बीच में बना शीशमहल
यहां पर सिर्फ लोग रात गुजारने के लिये आते हैं। वे किसी अकेले का नहीं होता।



मण्डी मे बना चौकीदार का कमरा
जो कभी घर नहीं कहलाता और ना ही मण्डी।



किसी का कमरा

बिना दिवारो के है या फिर कई खिड़की दरवाजे हैं जहां से किसी एक ही गुट या माहौल को कहीं से भी, कभी भी हर कोई देख सकता है या देख रहा है।



सुनते हुए महसूस हुआ की हर सुनने पर इस जगह की कल्पना बदल जाती है। निजी बातें नजदीकी बड़ाती जाती है और समानो को यहां से वहां करती आवाज़ें और नजदीकी में चली आती है। निजी बातें रिलेशपन में डूब रही है और दूसरी ओर सक्रियेता का बड़ता वज़न है।

एक पोइंट पर आकर लगता है वो कमरा जहां पर हम रोज जाते हैं और रूकते हैं। वे हमारे जाने से पहले क्या होता है? उसके सामने से गुजरने वाले, उसपर कोई काम करने वाले, उसके बगल मे रहने वाले के क्या? हजारों रूप एक स्पेश अपने मे बसाये हुए है। असल मे देखने वाला, बरतने वाला, सुनने वाला किस भाव से उससे मिल रहा है से भी स्पेश के प्रति छवि की रूपरेखा बदल जाती है।

लख्मी

अधपका सबके बीच

मैं पूर्ण नहीं हूँ, अपूर्ण भी नहीं हूँ, आधा - अधूरा, अधपका सबके बीच हूँ। मेरा रूप कितना विशाल, घना और तरलता में है, ये सफ़र अनिश्चित्त है। समय सदेव उसके साथ बहस में रहता है।

हम इसी समय को रचने के मौके में खुद को उतारते हैं। कब आप बोडी को मौजूद करोगें और कब आप बोडी को छोड़कर ख्यालों मे आसमान को मापोगे? समय इन दोनों रूपो को एक साथ एकत्रित करता है। इस निरंतर व्यवस्थित होने से निकाल के अपने लिए एक अनिश्चितता को तैयार करना, अपने आसपास इसके लिए जगह खुद बनाना। अपने को रचने के लिए बेपरवाह समय को रचना है। रास्ते में जो मिलेगा, उसे भी अपने साथ बहा लेना है।

मेरा शरीर मुझसे अपेक्षा नहीं रखता की मैं उसकी निगरानी करता रहूँ या उसकी निगरानी में रहूँ। उसकी नंगन्ता से मेरे साथ रिश्ता ड़र से ना शुरू हो। मैं जितना पोशाक से बाहर अपने आप को देखने का उनमाद रखता हूँ उतना ही बे-पोशाक होकर भी। ये अस्त्तिव मेरे शरीर को सिर्फ नाम देता है, पहचान देता है पर उसकी बे-परहावा छलांगे मेरे लिये रिक्स भी है। वो रिक्स जो मैने अपने से चुना है जिसमें ध्वस्थ होने का ख़तरा और अवारा होने की गुज़ाइश है पर अपूर्ण मे ही रहना है जिसमे मैं जीता हूँ। वही मेरी रचना और मेरे समय की अनिचता है मेरी टकरार मेरे सध्यात के बनाए ढ़ाचे से है। 

शरीर मुझे कहाँ फैंकता है, समय के दायरों का उल्घन करने की कोशिश करूँ तो कहाँ पहुँचता हूँ किसको रचने मे निकलता हूँ।
अनफिनिश हूँ और अपने आपको अनफिनिश रखने की कोशिश मे हूँ। इस अहसास से निरंतर अपने आपको रिवेंट करने में हूँ। मेरा समय अनिश्चिता मे है। ये कहीं पर टिकने या टिक जाने की बहस मे नही है। वो इस कि एक भाषा ढूंढ रहा है अपने आपको अपूरता मे चुनना वो थकान है जो मुझे तलाशती है, मैं जिसे तलाशता हूँ। मेरे पैर कहीं ले जायेगे और मेरा मूवमेंट उसको छोड़ देगा, मैं उस फलसखे से टकराता है। जो कहता है कि अस्थिर हो जाना समय का अस्थिर होना नहीं है। ये समय, मेरे अपनाये समय से बहस मे है। जो मुझमे फिट नहीं होता मगर मैं इस अनफिट से जीने की लरक मे चला जाता हूँ।

फिट ना होना, उसको लुफ्ट मे रखना नहीं है बल्कि वही जीवन को बना कर रखना है।

लख्मी

Thursday, September 13, 2012

एक बस ड्राइवर अपने आप में

उंचाई और निचाई से बने रास्तों ने हमेशा सर्तक रहने पर ही जोर दिया। बस, अपने साथ वाले पर नजर रखने की ताक में रखा। रूट तय है और लोगों को गिनकर चलना फिक्स। और बस अगर चलते वक़्त अपने जोश मे कभी आ जाती तो लोगों की गिनती में बड़ा परिवर्तन आ जाता है। ये करना तय नहीं है। मैंने रोज ये घटते बड़ते देखा है। और घटने को बड़ाने मे तब्दील करने का काम करते भी। दिन खत्म होता जाता है। घटने को कम करना और बड़ाने में उसे ले जाना हर रोज़ का बन गया है। जिस रास्ते जा रहे हैं उसी रास्ते वापसी। कहां पर रूकना है, कितना रूकना है मे टाइम की कोई जानकारी नहीं। इस सबके बीच मे मैं दिन को कैसे दोहराऊँ? लोगों की गिनती फटी और बिखर गई टीकट मे भी परिवर्तन मे आ ही जाती है। बस मे जो भी चड़ता या उतरता है उसकी गिनती रोज होती है। मगर चलाने वाले की उस गिनती से कोई लेना देना नहीं। 

पूरा रास्ता नफा कहां है और नुकसान कितना की सोच ने एक दिन मे गुजरे हर रास्तो को उसकी चमक से ही बाहर कर दिया। मेरी समझ में आज तक नही आया की नफा क्या है और नुकसान क्या? लोगों को गिनना या उनकी दूरी को गिनना? दूरी को गिनना बेमाइने है। दूरी जो रोज़ाना की तय होकर रास्तों पर निकलती है और लोगों को गिनना मुश्किल बनता चलता गया है। नफा व नुकसान के बने टोकरे मे दिन को धकेलना लोगों के बीच होने को गायब करता जाता है। हर रोज़ के एक ही रास्ते पर चलते चलते हैं  लगता है कि रास्तो के माहिर तो हो गये लेकिन मंजिल पर उतर जाने के बाद लगता कि रास्तों ने उस रफ्तार और खो जाने को खा लिया जिसमें हमेशा जागते रहने की शर्त छुपी है। मैं तो कभी किसी को लेकर खो ही नहीं पाया। कैसे खो जाऊँ? इस घटते जाने को बड़ाने की लड़ाई से बाहर निकलकर।


सोचता हूँ की रूट को बदल बदल कर चलूँ।
रास्तों मे छुपी ऊंचाई और निचांई के साथ खेल से भरा लुफ्त है। कौन मिला और कौन छूटा को सोचने की जरूरत के बिना सफ़र बहता चलेगा। जैसे रास्तों ने अपने रहस्य को दिखा दिया हो। जिसमे घुसना भी दिलचस्प है और ना घुसना भी। अगर हर रास्ते के बाद कोई मंजिल है तो बीच में तो रहस्य है। मजा होगा। कहां निकल जायेगें की उत्तेजना और ना निकल पाने में राह खोजने की चाहत रूट को भी मजेदार बना देगी। हर दिन सेंकड़ो लोग चड़ते हैं और अपनी अपनी दूरी के समान रहकर उतर जाते हैं। इनकी दूरी के साथ रास्ते के अन्दर के मोड़ ज्ञात होगें।


सोचता हूँ की किसी दिन बिना टीकट के लोगों को आने - जाने दूँ।
हर रोज़ एक ही रूट पर चलना या हर रोज़ एक ही रास्ते पर चलना क्या? रास्ते तो हमेशा ही लम्बे रहे हैं। बस सिर्फ इतना फर्क है कि चलने वाला अपना सफ़र कर रहा है या अपने कदम गिन रहा है। कदम गिनना ही रूट है। रूट रास्ते को भोगते जा रहे हैं और उंचाई - निंचाई उन सपाट रास्तों को जिनपर जागना सिर्फ किसी पर नज़र रखना नहीं है। यहां पर चलने वालों ने ऊंचाई और निंचाई को नफा नुकसान माना है।

रोज कई लोग आगे के गेट से चड़ते हैं। बिना कुछ बोले चुपचाप बोनट पर बैठ जाते हैं। कई लोग फिर वहीं पर जमा होते रहते हैं। ना जाने क्या बातें चलती रहती है। उन्हे कहां उतरना है जैसे कुछ समय के लिये भूल गये हो। उस्ताद जी, कहकर ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि हमारी बहुत पुरानी जान पहचान है। सिर्फ टीकट की गिनती इन मुलाकातो को बता नहीं पाती। किसको कितनी दूर जाना है ये तह होना ठीक होता हो लेकिन मोड़ कभी कभी इसे भी बदलने को उक्सा जाये तो? एक दिन ऐसा हो की जिसको जहां जाना है जा सकता है। जिसको जहां उतरना है उतर सकता है। गिनती से बाहर होते लोग अपनी जगहों से कहां पर जाने के लिये निकलेगे।


सोचता हूँ किसी दिन सवारी बन जाऊ :
देख पाऊँगा की अंधेरे और उजाले दोनो के बीच में सिर्फ समय के फासले का ही खेल नहीं चलता। सवारी कहां है? और कितनी है? को चुनना अंजानी मुलाकातों को भूला देता है जो अपने लिये कुछ बुन के लिये आती है और फिर गायब हो जाती है। अगर दिन के खत्म होते होते उन मुलाकातों को दोहराया जाये तो कैसे?

नफा और नुकसान सफर में रहने को जोर नहीं देता। वे फिर सफ़र ही कहां है। कितना चले को सोचा जाये या कितनो को देखे और मिले को सोचकर अपने रास्ते को बुना जाये। हर रोज एक ही रास्ते पर चलते चले जाना उस बीच के हिस्से को गायब कर दिया है। जहां से गुजरने पर ये ख्याल ही दूर हो जाता है कि कौन कितने समय से मेरे साथ है। बल्कि कौन कहां जा रहा है और उसका इंतजार किसको अपने साथ लेकर जायेगा का भ्रम जिंदा रहता है। ये सफ़र उस भ्रम का सारथी कि तरह है।

ये सारथी कौन है -  चलाने वाला चालक, बैठे रहने वाला सहायक, हर किसी के रास्ते का हमसफ़र, रास्तों को अपनाने वाला कोई पागल, गलती से चड़कर उतरने का ठिकाना तलाशने वाला, चालक के रोल में कोई काम करने वाला या चलने को काम मानने वाला या नये लोगों के साथ मे रहकर जीने वाला, भागकर बस में चड़ने वाला, गेट पर ही रहने वाला, बस की सजावट में उसमें लाइने लिखने वाला, संदेश देने वाला, सड़क पर रहकर बस पर नज़र रखने वाला या रास्ते पर कौन कैसे चलेगा के रूट मेप बनाने वाला।


अभिनय बेशक बहुत छोटा व बनावटी होता है मगर हर बार के रोल में राहों के मेप बदल जाते हैं।


 लख्मी

हूटर पर नृत्य

आसमान में सो चक्कर लगाने के बाद पानी पीने उतरे एक पक्षी ने खुद के अक्श को देखते हुये सोचा -

कभी कभी सोचता हूँ की पनियल सा बनकर बस चलता चला जाऊं। लोग मेरे अन्दर से होकर निकलते जाये। मेरा अहसास हो उन्हे लेकिन मुझे चलने के लिये रास्ता ना दे। कभी किसी के साथ साथ चल दूं। उसे लगे की उसके साथ कोई है, मगर वो मुझसे दूरी ना बनाये। डरे नहीं, भागे नहीं।

घर, परिवार, यारो की गढ़ी नजरों को धोका दूं। या फिर उन्हे भी चौंका दूं। मुझे चिंहित करने वालो को परेशान करूं या उन्हे हैरान करूं।

रात मे चिपकने वाले उन पोस्टरो की तरह हो जाऊं जिनमे जाने - पहचाने चेहरे भी उस तरह अंजान बन जाते है कि उन्हे फिर से खोजना पड़ता है। हर आंख उसे उस तेड़ी निगाह से देखती है जिसमें यह तंज होता है कि "ये पहले मिला या नहीं" इस तंज़ को अपना लिबास बना लूँ।

या किसी नाटक के उस किरदार की तरह हो जाऊं जो बिना डायलॉग के खड़ा है या रामलीला के स्टेज पर दिखती उस परछाई की तरह दिखने लगूं जिसे सब देख सकते हैं कि वे उड़ रही है या मेकअप उतारते उस कलाकार की तरह बन जाऊं जो मेकअप में भी  अंजान था और मेकअप उतारने के बाद भी या ऐसा बन जाऊं या वैसा दिखने लगूं या तैसा बन जाऊं या.....या.....या.... या....

इस "या" की भूख कभी बूढ़ी नहीं होती। वे हमेशा जवान रहती है। अनेकों 'या' एक अकेला मन अपने मे लिये चलता है। फेलियर से बाहर निकालने वाला या, खो जाने के लिये बना या, तैयार होने के लिये या, चौंकाने के लिये या, जीवन मे "नहीं बन पाया" की भरपाई का या, चुनाव की कसौटी का या, शख्सियत बदलने के लिये या, डर से भरा या, उन्माद का या, मसखरी से सजा या, मजबूरी का या, सलाह सा बना या। आइने के सामने दिख रहे बिम्ब ने खुद के चेहरे पर हाथ मारते हुए इस पल में अनेकों 'या' के होने को जिया हो जैसे। दरवाजा सामने दिख रहा है। जिससे हर रोज़ जो अन्दर आयेगा, बाहर भी वही जायेगा के ऊपर करोड़ो सवाल बिछा दिये गये।

पक्षी सा मन आइने के सामने खड़े बिम्ब में मिक्स हो गया।


हाथ में कुछ किताबें लिये वे उस जगह पर पहुँच गये जहां से शहर मे निकलने का पहला दौर शुरू हुआ था। एक साइकिल पर रखी किताबें उन्हे जितना लोगों के बीच मे उतारती  उतना ही अपने अंदर भी ले जाती। उनके पास कोई नहीं आता। वे ही सभी किताबों को पढ़कर अलग अलग नाम लिख देते। उनके रजिस्टर मे लिखा होता - अशोक एक किताब ले गया है जिसका पता ये है। अनेकों लोग उनके नाम, किताबों के नाम और पते लिख वे ही सभी को पढ़ रहे थे। काम कि दुनिया के साथ खेल कर वे किन्ही भीड़ को खुद से रचते चले जा रहे थे।

सरकारी संदेश अनुसार किताबघर के बंद होने को बोल दिया गया था। वे अनेकों नाम लिख कर उन सभी किताबों को अपने घर ले गये। आज वे उन सभी को निकालकर उनमें खुद को तलाश रहे थे। जैसे वो एक परछाई हो और उड़ रहे हो।

पक्षी सा बन वे कमरे से बाहर निकल गये।

लख्मी