Tuesday, May 10, 2011

खुद से एक मुलाकात : जगह की कल्पना

मैं ने पूछा, "किसी ऐसी जगह की कल्पना करना जो काम और रिश्तो के बिना हो तो उसके मायने क्या है?”

स्वयं ने कहा, "बिना काम, रिश्तो के अलावा जो जगह एक उडान में होती है। वो उडान जो किसी दायरे में नहीं है। जगहें जब काम और रिश्तों से बाहर होती है तो एक खास लिमिटेशन अपना लेती है। अगर इस लिमिटेशन को तोड़ दिया जाये तो किस जगह की कल्पना उभरेगी। जहां पर कई और लोग भी शामिल है।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह के लंबे दौर की कल्पना करने के लिए हमें किन-किन स्रोतो को सोचना पड़ता है?”
स्वयं ने कहा, "समाज पर लोगों की अपनी भाषा है। कोई भी जगह को अगर हम उससे हटकर रखते है तो लोग उसे समझते नहीं। उनके अपने अधिकार है और हमें उनके अधिकार में रहकर ही किसी जगह को देखना होता है। मैं कहता हूँ की मुझे देखना नहीं आता मगर मैं देखना चाहता हूँ तो मैं उनकी आंखो से देखता हूँ। कोई जगह जब फैलाव में होती है तो उसमे नजरिये जुड़ते है। वो फिर बैठने और देखने के नजरियो में बहने लगती है।"

मैं ने पूछा, "उस जगह की छवि हम किस तरह उतारते हैं खुद मे और सामाजिक तौर पर उसका आधार क्या है?”
स्वयं ने कहा, "ग्रुप के साथ के मायने बहुत गहरे और जिम्मेदारी के होते है। कोन होगा जो जगह को रचेगा और उसकी कल्पना में जो लोग है वो कोन है? जो जब कोई आये तो भी और ना आये तो भी माहौल को बनाये रखता है। इसी से किसी आधार की रचना होती है। अगर बाहर हमसे कोई कहे कि आपका कोई आधार नहीं है तो आप बहस कर सकते हैं। ग्रुप की एक छवि होती है जो तैयारी में होती है। किसी जगह का आधार यह होता है की उसका बैलेन्स हो। ग्रुप का होना एक तालमेल का होना होता है। कहते हैं ग्रुप खाली बैठना या कई अलग चेहरे से या लोगों से ही नहीं होता। वो तालमेल जिम्मेदारी और बैलेन्स से होता है। ग्रुप का होना जरूरी होता है। वो जगह को फैलने का और असिमता में ले जाने की एक राह देता है।"

मैं ने पूछा, "कोई जगह ग्रुप के साथ और ग्रुप के बिना कैसे जीती है? ग्रुप के होने और ग्रुप के ना होने के मायने क्या है?”
स्वयं ने कहा, "किसी जगह को लम्बा देखने या सोचने के लिये उसकी खाली छवि का ही आकार से नहीं बनता। उसमे धैर्य और विश्वास का महत्वपुर्ण अभिनय होता है। जिसमें अगर कोई लोग आ रहे है तो उसमे सबकी अपनी सोच और कला है। अलग-अलग सोच और कलाओ का अदान-प्रदान ही जगह को लम्बा दिखाता है। एक-दूसरे के प्रति सुनने और देखने की उदारता होना जरूरी है। जैसे, एक ढोलक है जिसकी दो तरफ़ की साइड होती है। उसके एक तरफ़ को बजाने मे सिर्फ एक ताल ही होती है मगर दोनों साइड को बजाने मे संगीत बनता है। अलग-अलग आवाज है। यही रियाज़ होता है दोनों तरफ़ को संगीत बनाने का। सुनना बेहद जरूरी होता है जो सुनना होता है। वही बोलना भी है और माहौल में रिश्तो को अपनाना जो दूसरों की कलाओ से पनपता है।"

मैं ने पूछा, "किन-किन साधनो और चीजो से उस जगह मे संतुष्टी पाते हैं हम या कैसे अपनाते हैं?”
स्वयं ने कहा, "कोई भी अगर उस जगह में दाखिल होता है तो वो अपनी रचना और कल्पना से। हम जैसे उस कमरे की कल्पना अपने हाथों से कर सकते है पर उस कमरे में नर्मी और रचनायें आने वालो से ही होगीं। कोई भी शख्स भी यहां पर आता है और अपनी इच्छा से कहीं किसी दिवार पर कुछ बनाना चाहता है या कल वो उस दिवार पर कील ठोक कर कुछ बाधंना चाहता है तो हमें उस चाहत को समझना होगा। हर शख़्स अपनी कल्पना और इन्ट्रश्ट से आता है। वो चाहे रिश्ते हो या फिर चाहत। हमे बस उसके छूने को देखना होता है मान लिजिये एक ही दिवार है:- जिसमें कुछ बना सकते है, कुछ ठोक सकते है या कुछ टांग सकते है। ये ही लोगों को स्पेश देता है। ये सन्तुष्टी होती है। एक ही स्पेश पर एक खुलेपन और अपनेपन में होता है या लोग उसे वैसे देखने लगते है। हर शख़्स अपनी फोर्स और आजादी से किसी जगह में उतारता है। वो अपनी एक नियमित्ता में हाजिर होता है।"

मैं ने पूछा, "कोई जगह किसी की उम्मीद या चाहत को कैसे संजो पाएगी और कैसे वापस करती है?”
स्वयं ने कहा, "हर शख़्स को एक उम्मीद और चाहत तो होती ही एक वापस नजर की। किसी जगह पर जाना, वहां पर अपना टाइम देना और अपने हाथों से बनी कुछ निशानियां छोड़ देना। ये अपने आप ने एक उम्मीद जगा देता है उसमे वापसी की नजर का अन्देशा नजर आने लगता है। जैसे किसी चीज को छूने के तरीके अपनेपन में होते हैं। तो लगता है की इस जगह ने स्वयं ही मेरे टाइम को समझा है और कुछ लौटाया है।"

मैं ने पूछा, "वही वापस हुआ है ये पता कैसे चलता है?”
स्वयं ने कहा, "वो अपनी तस्वीर अगर देख लेता है। जैसे मैं यहां पर आकर पढ़ता हूँ या सुनता हूँ। वो अहसास अगर उसमें आता जा रहा है तो उसके अन्दर एक तसल्ली होने लगती है। उसमे रिस्पोन्स का होना एक खास और ज्यादा अभिनय निभाता है। रिस्पोन्स किसी फोम्स के जरिये ही नहीं होता। वो एक-दूसरे से परिचय से भी होता है। इससे मान-सम्मान का एक रिश्ता बनता है। एक उसका अभिनय भी बता दिया जाये तो वो और गहरा हो जाता है।"

मैं ने पूछा, "क्या आपको लगता है की किसी जगह ने आपको कुछ वापस लैटाया है? उसका अहसास कैसे हुआ ओर अपने मे क्या परिवर्तन देखते है?”
स्वयं ने कहा, "मैं अपना लोगों के साथ में जीना बताता हूँ। जब हम किसी लाईब्रेरी में जाते हैं। अक्सर हम अपने में खूब बातें करते हैं, बहस करते हैं। दस बातें हो जाती हैं चलो कोई बात नहीं। मगर बाहर ऐसा नहीं होता। बाहर में किसी से दो बातें करदो तो वो लड़ने लगते हैं। काट करते हैं। यहां पर लोगों मेरे अन्तरदृद्ध को भी बढ़ावा देते हैं। लेवल दिखाते हैं कि यहां पर तू खुलकर बोलता है। ये सोचना, यहां बहकता है। यहां खुशी होती है और काम के मामले में ये रिर्टन गिफ्ट मिल ही जाते हैं।"

मैं ने पूछा, "कब पता लगने लगता है की जगह अपनी है और अपने जैसा अहसास है?”
स्वयं ने कहा, "लम्बे समय के बाद या शुरुवात में?”

मैं ने पूछा, "शुरुवात के माहौल में ही?”
स्वयं ने कहा, "मान लिजिये कि किसी जगह में बहुत कुछ भरा हुआ है। तो वहां पर किसी भी चीज को छूने में पता चलता है। किसी पुतले को वहां पर रख दो और देखो कि उस पुतले को वहां पर लोग कैसे देखते है, बहुत से छूते है। तीन-चार दिन के बाद में आने के अहसास छूने मे पता लगने लगता है। अपने मे लगता है की मैं छू पाया हूँ और सोच भी पाया हूँ। ये अहसास आपको कोई दिला नहीं पाता ये अहसास खुद में होना होता है। वो होता है आपके शामिल होने से।"

मैं ने पूछा, "अपनी कला दिखाना, शांत बैठना या बाते करना ये सब किस तरह की कल्पना देता है किसी जगह को?”
स्वयं ने कहा, "इन चीजों को लेकर ही हम अगर किसी सपाट जगह में भी देखे तो वो चित्र ही अपने आपने में इतना गहरा बन जाता है की वहां से गुजरने वाला भी उस चित्र भरे माहौल मे अपने आप कैद होने लगता है। एक अदभूद तरीका या अन्दाज़ लगने लगता है। अपने काम धन्धे से, समाज से, अपनी रोजाना की जिन्दगी से लोग कट कर ये जगह बना रहे है। ये देखना भी जरूरी होता है कि यहां आसपास में लोग किन चीजों से कटे हैं? जगह ना मिलना, सुनने वाला ना मिलना। इनको अगर कहीं दूर भेज दे तो ये कैद भी एक सुकून भरा और आजादी भरा स्थान लगता है। ये दृश्य को देखकर ये नही कहा जा सकता है कि ये लोग अपना टाइम बिता रहे है और ना ही पैशे और शौक के नापतोल में फँसा जा सकता है। जैसे, गिटार में अलग-अलग तरह की स्पिरिन्ग होती हैं और उसमे से अलग-अलग तरह के सुर निकलते हैं। ये कह सकते हैं इन्हे। तो उसमे सरगम एक ही है पर ध्वनि अलग-अलग है। वो ही आपको कल्पना की दुनिया में भेज देता है।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह में अपनी मर्जी से आना और अपनी मर्जी से जाना ये क्या तस्वीर देता है उस जगह को?”
स्वयं ने कहा, "पहला तो होता ही लोग अपने मन के अन्दर ये बना लेते है की यहां कभी भी आना और कभी जाना। वो बहुत तेजी से होने लगता है। दूसरा, सब लोग जैसे जीते है अपनी जिन्दगी को। ये खुले तौर पर एक प्लान और आकार देता है। जिसमें चार चीजें जरूरी होता है। जैसे, व्यवहार, वैचारिक और चिन्तन। जैसे की घर का मुखिया है। उसे हम कह दे की 'तुम चिन्ता मत करो घर की, आपका घर चल जायेगा।' और अगर वो इस मुद्रा में आ जाये तो उसका घर किस दिशा में दौड़ना शुरु कर देगा। जगह तो बढ़ने लगती है आजादी से पर ये ज्ञात नहीं होगा की वो कहां जा रही है। रोकनामें है या बढ़ने में है। बस कुछ करने में है।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह को नियमित चलाना क्या है और क्यों है उस जगह को जिसे खुला स्पेस बोला जाता है?”
स्वयं ने कहा, "एक दिक्कत तो यहां पर साफ ही होती है कि हम जगह को खुली भी बोल रहे हैं और उसे नियमित भी चलायेगें। वो सभी जगह है। हर शख़्स रोज सुबह ये ही सोचकर निकलता है की वो अपनी नियमितता को बचाये। जिसमें वो भागता है, दौड़ता है, कहीं जम्प करता है और उसके साथ कुछ ऐक्सीडेन्ट भी होता है। अक्सर किसी भी जगह के आने के और जाने के वक़्त को सोचा जाता है। जिस वक़्त में तेजी और जल्दी होती है मगर उसके बीच के वक़्त को नहीं देखा जाता। नियमित्ता वो है। सबकी अपनी एक लय है और उसकी अपनी नियमित्ता मगर जहां वो जाकर गिरेगा वहां उस जगह की अपनी नियमित्ता होगी तो उसकी जगह के साथ संधी होनी बेहद महत्वपुर्ण हो जाती है। किसी भी जगह को बनाने के साथ-साथ चलाने तेजी या जल्दी में नहीं होता। उसका वही टाइम तो एक लय में पिरोना होता है।"

मैं ने पूछा, "लोग जो आ रहे है उनकी अपनी जिन्दगी का उथल-पुथल है तो उसको कैसे ला रहे है यहां?”
स्वयं ने कहा, "कोई भी अपनी जिन्दगी के रोजाना कि लय में से कुछ हटकर जो वक़्त बनाते हैं उसमे कुछ पिरोने की तलाश करते हैं। जो उस जगह में नहीं होता जहां वो रहते हैं। तो बाहर जाते हैं। जगह को अपने शब्द और नियमों को लाना होता हैं। यहां आने वाला अपने आपको किसी छत का आसरा दे पाये। नहीं तो लोग खुली जगह को बहुत सस्ते मे लेते हैं।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह की अपनी क्या अपेक्षाए होती हैं आने वालो से?”
स्वयं ने कहा, "मान लिजिये:- इस दुनिया में कोई भी जगह ऐसी नहीं है जहां खुलकर बोला जाये। जहां कहते है वहां है। वो वहां भी इसके मायने कुछ ओर ही होगें। ये मायने बनाने होते हैं। शब्दों के आने और जाने के और बैठने और बोलने के। तभी कोई जगह तेजी और गर्मी पकड़ती है और अपने साथ मे कई और कल्पनाओ को उडान देती है।"

मैं ने पूछा, "कोई शख्स जो शाम में घर लौटता है और अपने कपड़े बदलकर गली के कोने मे खड़ा हो जाता है, घंटो खड़ा होता है आसपास देखता रहता है ये अगर उस जगह मे आ जाए तो, और कोई शख्स है जो काम मे व्यस्त रहते हैं कभी कभी शाम मे अपनी लिखी हुई कोई चीज सुना देते हैं अगर ये दोनो शख्सियतें उस जगह मे आ जाती है तो उस जगह की कल्पना क्या रहती है?”
स्वयं ने कहा, "जगह हमने सोची है हर तरह की कल को उभारे। किसी नई चीज को जन्म दे। अपना उपजाऊ माहौल लेकर जी रही हो और किसी का उपजाऊ माहौल को लेकर आगे बढ़े। हमारे आसापस ऐसे कई लोग हैं जो किसी सीट की तलाश में है। अपने अन्दर कई तरह की कलाओ को लेकर कहीं खडे, घूमे या बैठे है। अगर ये जगह उनको कोई सीट दे पाती है तो वो इसे बहुत अभिवादन की नजर से देखने लगता है। अपने अनूभव का हिस्सा बनाता है। जहां जगह के कुछ नियम होगें जो सारी कलाओ को किसी ठहराव मे लायेगे। हर शख्स मे अपना कोई बेकाबूपन और आग होती है। जो एक-दूसरे के समीप खडी होती है। उसे समा पाने की ताकत जुटानी होती है। यही बेकाबूपन और आग इस जगह की ज्योती बनेगी। किसी जगह की असीमता मे कई बेकाबूपन के परर लगे होते है। जिनके साथ लगाम का साथ होना जरूरी होता है।"

मैं ने पूछा, "इन्ही बेकाबूपन और शख्सियतो को सोचते हुये शुरुआती दौर मे किस तरह के माहौल की रचना करनी होती है या किस किस तरह के माहौलो की रचना को सोचते हुए चलना होता है? इनके बीच के रिश्तो को हम उभार पाये।"
स्वयं ने कहा, "पहला - तालमेल होने जरूरी लगता है। दूसरा - बराबरी जो कला और आर्ट के साथ मे होगा। तीसरा - उडान जो समय के साथ ‌और अनूकूल होगा। चौथा - यहां पर एक भाषा को बनाना होगा। जो इन चिजों को एकत्रित कर पाये। क्योंकि बाहर वो भाषा नही होती लोगो के पास तो वो कहीं ठहरते नही है। आगे चलकर वो धीरे-धीरे कंडीशन बन जाती है। हमें उस कंडीशन पर पकड़ देखनी होती है। जैसे-जैसे मिलना-जुलना होने लगेगा उसकी भी तस्वीर साफ़ होने लगेगी।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह पर लोग कैसे आते है? उनके आने को और उनके रुक जाने को वो कैसे सोचती है?”
स्वयं ने कहा, "किसी भी नये बन रहे उपजाऊ माहौल का पहला इम्प्रेशन यही होता है की कोई भी जब आकर बैठता है तो उसके साथ मे साझेदारी क्या होनी चाहिये। पहला ये की माहौल सुनना और सुनाना यही बहुत होता है आज के दौर मे। फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरु होता है। चीजो तक कैसे जाया जाये। जो आकर बैठ गया है उसके आगे क्या रखा जाये। कमरे का डिजाइन, थीम इन चीजों से उसको एक ठहराव देना होगा।"

मैं ने पूछा, "वहां पर लोग आयेगें कैसे?”
स्वयं ने कहा, "कमरे की रूपसज्जा को लेकर शुरुवात मे लोगो मे जाना होगा। ये लेकर जब हम जाते है तो मान लिजिये कि हाथ पकड़कर लाना होता है। वो हाथ हमे बनाना होगा। आने वाले के हाथो मे क्या है? कई चाहते होती है जो किसी बाहर के खुले माहौल मे जमी होती है। उनको रगींन दिवारो और किसी छत के नीचे अगर लाया जायेगा तो क्या माहौल उनके आगे रखा जायेगा ये सोचना बेहद जरूरी होगा। उस कमरे मे कुछ क्रिटिकल चीजे होनी चाहिये। जो बाहर की फोर्स, चकाचौंद, तेजी को यहां पर ला सके और फिर हम उसे बाहर कैसे दिखा पायेगे। जैसे, इसमे जुड़ते है अन्य शब्द:- इन्तजार, बैचेनी, तेजी और टाइमपास इनको उस कमरे की कल्पना मे फिर हमे लाना होगा।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह कि कल्पना मे तीन चीजें कौन सी हो सकती है जो उसके लिये घातक होगी?”
स्वयं ने कहा, "शायद पहला - अपनी आग (जो अपने इगो से बनती है हमने देखना होगा कि हम कितने भी आग बबूला हो जाये पर उस जगह कि अहमियत को समझना होगा।) दूसरा - अपने अभिनय को खुला नही छोड़ सकते। तीसरा - समाज और दुनिया मे हम देखते है तो अक्सर उसी चश्मे से हम दुनिया को देखने लगते है अपने रिश्तो को अपने कामो को और ऐसी खुली जगहो को। हमे उस चश्मे से बहस मे रहना है।"

मैं ने पूछा, "किसी जगह की कल्पना ने तीन चीजें जो बेहद जरूरी है वो होनी ही चाहिये?” ।
स्वयं ने कहा, "पहला - प्रयोग जो वहां आने सभी को ठहराव देगा। दूसरा - परिचय जो रिश्तो को भी अपने नामो मे जोड़ेगा और जगह को सामाजिक तस्वीर देगा। तीसरा - हमारा अभीनय जो रचनात्मक को हकिकत कि छवि देगा।"

राकेश

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