Wednesday, October 29, 2008

E.M.U दिल्ली का एक प्रसिद्ध सफ़र

ये एक निहायती थकावट मे चूर कर देने वाला समय था। फ़र्श की उखड़ी सतह पर पानी बहता हुआ चबूतरे से नीचे की नालियों मे गिर रहा था। कुछ उठा-पटक की आवाजें उस जगह से विक्रम को सुनाई दे रही थी। मगर उसे जल्दबाजी मे बहुत कुछ छूटता मालूम हो रहा था। जहाँ समय का अंदाजा लगाना मुश्किल था। विक्रम गर्म किट पहने मूंह मे पता नहीं क्या चबा रहा था। उसने कमर से एक बैग टांगा हुआ था और हाथों मे उन्ही दस्तानो को पहना हुआ था जो उसने पिछली रात मे भी पहने हुए थे। वो हथैलियों को मसल रहा था। उसके पीछे एक आवाज आई "चाय वाले, चाय वाले" और ठंडी हवा चल रही थी। गर्म चाय लेकर उसने बिना कुछ कहे पैसे दे दिए। वो चाय वाला केतली लिए चला गया। सभी स्टेशन की तरह यहाँ भी सूचना देता म्युज़िक बज रहा था। चाय के स्टॉलों से भगोनों मे से उबलती चाय की भाप उड़ रही थी। खिड़कियों की लाइट बुझी हुई थी। एक काले कोट वाले शख़्स ने रूम से बाहर आकर दीवार पर एक पेपर को चिपकाया फिर वो अंदर चला गया। छज्जो मे लगे बल्ब जल रहे थे। खाकी पौशाक पहने पुलिश वाले डन्डा पटकाते हुए स्टेशन पर गश्त लगा रहे थे। विक्रम खड़े-खड़े थक गया था। उसने एक बेंच पर बैठना जरूरी समझा। अभी दूसरी गाड़ियों की भारी होर्न की आवाज स्टेशन पर गूंज रही थी। विक्रम बेंच पर घुटनों को ऊपर-नीचे रखे हुए पट्टरियों की तरफ़ देखने लगा। ओश अभी तमाम जगहों पर जमी हुई थी। वो वहीं बैठा हुआ धुंए की तरह फैली हुई धुंध के पीछे कुछ तलाशने की कोशिश कर रहा था।

ट्रेन एक लम्बा सफ़र तय करती हुई अपने आने का आगमन देते हुए बड़ी भारी होर्न का आवाज सुनाती हुई तेजी से प्लेटफार्म एक जोरदार धक्के के साथ आकर लगी। ट्रेन के प्लेटफार्म पर लगते ही दरवाजे से चिपके हुए पेसेंजर अपना बोरी बिस्तर लादे हुए झट से खींचा-तानी करते हुए उतरने लगे। इस दौरान जो ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। वो लोग भी दरवाजे पर ऐसे टूट पड़े जैसे सब्जी मंडियों मे सब्जियों पर कोई टूट पड़ता है। मोटे पतले हल्के भारी थेले, सूटकेस, बक्सा लेकर दरवाजे के बीच मे ही अंदर जाने वाले लोग भीड़ की परवाह करे बिना ही घुस गए। एक ही साथ जैसे प्लेटफार्म पर मधुमक्खियों के छत्ते की तरह भिनभिनाते और जैसे मधुमक्खियों को किसी ने छेड़ दिया हो। इस उथल-पुथल को समझ पाना बेहद मुश्किल था।

रोशनी पर अंधेरा छाने लगा था। विक्रम सोच नहीं पा रहा था के अंदर जांऊ कैसे? इनकी तरह जबरदस्ती तो घुस नहीं सकता। भला किसी को टक्कर मारकर कैसे बड़ सकता हूँ। ट्रेन के ड्रावरने इंजन के दरवाजे से सीटी बजाई। ट्रेन ने जोर का झटका धीरे से लिया। झंडी बाबू ने ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। अंनाऊसमेंट के शोर मे ना जाने कहाँ-कहाँ से डुबकियाँ मारती आवाजें गूंजती हुई शरीर मे एक झंझनाहट सी पैदा कर रही थी। ट्रोली खींचते हुए लोडिंग बॉय ने वैटिंग रूम के पास ट्रोली को खड़ा करके दीवार से सटाकर और दरवाजे को पूरा खोलकर वो अंदर चला गया। अभी पैसेंजर ठीक से चढ़े नहीं थे। ट्रेन ने धीरे-धीरे करके खिसकना शुरू किया। लटके हुए लोगों अंदर दरवाजे पर ही नहीं अंदर गेट पर भी खड़े हो गए और एक रफ्तार भरा कदम उठाकर ट्रेन ने स्टेशन को छोड़ दिया। सभी लोग किसी ना किसी तरह ट्रेन मे चढ़ चुके थे। विक्रम भी ट्रेन के अंदर ही भीड़ मे फंसा हुआ खड़ा हो गया था। सीटें फुल हो गई थी। ठंड के कारण डब्बे मे लोगों के शरीर एक दूसरे से सटे हुए थे। इसलिए ठंड भी ज़्यादा नहीं लग रही थी। रूक-रूककर खड़े हुए और सीटों पर बैठे पेसेंजरो की गर्दन हौले-हौले हिल रही थी। बीच मे और सीटों के पास लगे लोहे के पाईपो को खड़े हुए शख़्सो ने पकड़ा हुआ था।

शहर से बाहर निलकते ही ट्रेन ने एक लम्बा होर्न बजाया और धका-धक छुक-छुक करते हुए पटरियों को बदलती हुई तेज रफ्तार मे चल रही थी। बीढ़ी-सिगरेट पीने वालो ने अब तसल्ली की सांस ली और अपने जेब से तम्बाकू पीने वालों शख़्सो ने कश लगाकर धुंआ छोड़ा और इसी के साथ बातों ही बातों मे किस्सो की पोटली खुल गई। भीड़ के धक्के को झेलते हुए बड़ी मुश्किले से जबरन डब्बे मे घुसना पड़ा। ट्रेन हवा को अपनी तेज रफ्तार से चिरती हुई शहरों और गांव से गुजर रही थी। नदियो और नहरो को पार करते हुए डब्बे मे जब सांय-सांय की आवाज होती तो किसी और ठहरी जगह का अहसास करा जाती।

भीड़ मे काले जूते पहने हुए वो मोटे शरीर वाला भारी मूंछे और घुंघराले बाल थे। उसने काला कोट डाला हुआ था। वो डब्बे मे बैठे लोगों को धक्का मारकर साइड मे होने को कह रहा था। उसकी आँखो मे गुस्सा और ज़बान पर ओझी भाषा थी। विक्रम को उसने तिरछी नज़र से डरावने अंदाज से अपने भारी हाथ को उसके कंधो पर रखकर उसे जगाया। "अरे सुनो, सो रहे हो क्या?“ उस टीटी ने विक्रम से कुछ तहज़ीब से ही पूछा था। बाकियों से तो वह चिढ़ा हुआ सा ही सवाल कर रहा था। विक्रम नींद से जागकर और तंग आँखो को मिड़कर उबासी लेकर बोला, "क्या बात है?” उसका लहजा मुलायम था। डब्बे की घिचपिच मे बैठे हुए लोगों के सामान को ठोकर से वो दायें-बायें सरकाते हुए टिकट मांगता, “जल्दी कर, सुनाई नहीं दिया क्या? अक्ल क्या अपने बाप के घर छोड़कर आया है?“ उसकी कड़क आवाज और मोटी आँखों से लगता कि यह कोई जल्लाद है क्या?

विक्रम उबासी लेकर बोल पाता कि जनाब प्रोबलम क्या है। तभी टीटी उसकी तरफ़ कुछ इतमिनान से देखकर घूमा और आगे चला गया। जहाँ विक्रम बैठा था उसकी सीट के पीछे वाली सीट पर बैठे शख़्स थके हुए से लटके चेहरे लिए ट्रेन के डब्बो के झटको मे झूल रहे थे। उनके बीच मे एक शख़्स कम्बल को सिर से ओढ़े हुए कोहनियों को मोड़ कर कम्बल की गर्माई मे आँखे बन्द कर बैठा था। तभी एक आवाज़ आई "अरे वो टिकट दिखा" उसने फट से पलके खोली पसीने से उसका माथा पसीज़ रहा था। होठों पर पप्ड़ियाँ पड़ी हुई थी। प्यास से मूंह चिपचिपाया हुआ था। टीटी के दो,तीन बार मांगने पर कोई जवाब नहीं दिया। उसके पास बैठे बाकी शख़्स उसे ही देख रहे थे। टीटी फिर गुर्राकर बोला, “सुनाई नहीं देता क्या, कान के पर्दे फट गए?“ अब वो अपनी पर आ गया था और शक करते हुए वो चौड़ा होने लगा।बिमार शख़्स को समझ नहीं आ रहा था आखिर अब करूं क्या? टीटी गुस्से मे उसे कंधे से पकड़ कर उसे उठाता हुआ बोला, "मैं पहले ही समझ गया था कि तेरे पास टिकट नहीं है फिर भी ऐसे ही मैं तुझसे पूछ रहा था।" कम्बल ओढ़े हुए शख़्स ने भर्राती आवाज मे हपकाई लेकर कहा उसकी सांसे भी तेज चल रही थी "टिकट हैं मेरे पास आप ढंग मे रहिए। मेरी तबियत बहुत ख़राब है इसलिए मैं कुछ समझ नहीं पाया। यह रहा टिकट।"

टिकट देखकर टीटी चुपचाप वहाँ से निकल गया। विक्रम मूंह उठाये, यह सब सीट के पीछे वाली जाली से देख रहा था। टीटी के जाते ही खुसर-पुसर शुरू हो चुकी थी। "कमाल है खामखा लोगों को तंग करते रहते हैं।" एक ने सीना चौड़ा करते हुए बोला। वैसे ही डरा रहा था "अच्छा हुआ मान गया वरना”......... ऊपर सीटों पर बैठे लोग मूंह फाड़े नीचे देख रहे थे। डब्बे की छत मे लगे पंखो के ऊपर लोगों ने अपने जूते चप्पल रखे हुए थे। विक्रम गले मे पड़े मफलर को सही करता हुआ ठंड मे सिमटा हुआ बैठा रहा।

राकेश

रास्तों मे चिन्हो की कमी से रास्ते नहीं सूखते।

रास्तों मे चिन्हो की कमी से रास्ते नहीं सूखते। मगर हम किन रास्तों पर है और किन रास्तों पर जा रहे हैं वो हमेशा अस्पष्ट रहता है। उसमे शायद मैं खुद होता हूँ तो फिर भी अस्पष्टता किस तरह की होती है? क्या मेरे जीवन मे लोगों की कमी है और अगर क्या वो लोग मिल जायेगें तो क्या वो कमी पुर्ती मे बदल जायेगी?

कई लोग जिनकी कल्पना मे शख़्सियतें महज़ एक रोल के तहत ही होती है पर मैं अगर वो रोल को छोड़कर या हटाकर उस शख़्स की कल्पना कंरू तो क्या आकृती खड़ी कर पाऊगाँ? तो फिर हम किस कार्यपुर्ण रोल की कल्पना लिए है या किसी शख़्स की? मेरे ख़्याल से दोनों ही हमारी समाजिक दुनिया मे महत्वपुर्ण हैं। हम 'रॉल' कि कल्पना करते हैं तो उसमे उस रॉल की तैयारी खुद से करते हैं। उसे
अपने खुद के सवालों से खड़ा करते हैं। वो क्या करेगा? कब करेगा? क्यों करेगा? कब जरूरत होगी और कब नहीं? वगैरह।

उसकी एक निर्धारित कार्यशैली का पर्चा हम तैयार कर लेते हैं पर ये अगर किसी शख़्स की कल्पना है तो शायद बहुत अजीबो-गरीब होती मगर ये अजीबो-गरीब समझ बन रही है और या बन चूकी है?

हम किसी कि कल्पना कर रहे हैं तो कोई हमारी भी कर रहा है। दोनों एक-दूसरे के बहुत नजदीक है। बस, सूरत से अभी पहचान नहीं पाये। ऐसे ही जब हम किसी के सामने होते हैं तो हमारी नज़र उन पर होती है और उनकी नज़र हम पर। दोनों एक-दूसरे कि आकृतियों और रॉल तैयार कर रहे होते हैं। तो ये कितनी मुलाकातों मे तैयार हो पाती है? और नींव किन भाषा और सवालों से रखी जाती है? तो कहीं वो शख़्स मैं तो नहीं?

ऐसी ही एक उल्झन का सामना हम कर रहे हैं। हम किसी के लिए ख़ास शख़्स है उसकी खुशी है या हम किसी के लिए वो ख़ास शख़्स
है। जो सुनने वाला है और जो हर बार सुनकर आ जाता है? हर बार का मतलब वो कि हमारे जाने और बैठने को आँक गया है और हमेशा एक ही टाइम और चीज से उस आने कि अपेक्षा मे सब कुछ छुपा देता है? इनको लेकर हम जी रहे हैं? तो ये क्या है?

कहते हैं कि "जो अपनी पब्लिक को जानता है" ये लाइन किस चित्रण को खोलती है? एक दुनिया जो हर शख़्स को उसकी चाहत से समझती है या खाली जरुरत से? किसके आगे क्या बनना है वो बेहतर जानता है। तो हम क्या पब्लिक है या उसकी 'जानने' कि समझ को बढ़ावा दे रहे हैं?

इसी पब्लिक कि भीड़ मे हम थोड़ा अलग हो जाते हैं उसकी नज़र से पर उस अलग होने मे हम उनको सुनकर क्या कर रहे है? अक्सर हम जाते है किसी के पास। तो उनके बोलो को कहानियों को सुनते है। वो अपनी अस्थाई ज़िन्दगी के चित्रो को बताते जाते हैं। खोलते जाते हैं। और कहीं पर आकर रुक जाते हैं जीवन चित्र, साधारण समय और कहानी को बयाँ करना। एक बीता समय है। जिसमे काम के टाइम से बधां और कसा अनुभव लगता है। उसमे सिर्फ़ उनको खोजने कि नहीं खोलने कि भी भाषा सवाल बनकर आती है। लगता है जैसे उनमे
बहुत कहानियाँ और बहुत टाइम छुपा है। आने दो बाहर, इनमे कुछ तो है जो रोजाना से हटकर है उसी को और और कि जुबाँ मे लाते रहते हैं और एक टाइम पर आकर वो रुक जाती है तो हम क्या तलाश रहे हैं?

तलाश को हम एक टाइम पर हटाकर सोचे तो हम अपनी अगली मुलाकात कि क्या इमैज तैयार कर रहे हैं? वो अगली बार हमें अपने पास पाकर क्या करेगा? और पास बुलाकर क्या? और हमें ढूंढकर क्या? इनकी आज कि मुलाकात मे क्या बन रहा है?

ज़्यादा से ज़्यादा एक अच्छा ख़ासा वो ख़ास आदमी जो कल्पना मे पहले से ही तैयार है इसमे फिर हमारा 'मैं' कहाँ है? मेरा 'मैं' क्या किसी और के लिए तलाश करता है? इतनी बातो, अनुभवो या मुलाकातों मे 'मैं' का क्या आधार और रूप हैं? वो क्या पूछता है?

सवाल करता है खुद से और खुद के बाहर से? हमारी बातचीत और दो ज़िन्दगियों के सामने बैठने का तात्पर्य क्या है? अभी तक। महज़ सुनना और सुनाना। इसे आगे कुछ बताया जा सकता है क्या? या इस ख़ास कि कोई आगे कि लाइफ़ है? ख़ास कि भावनायें क्या हैं?
कहते हैं लोगों का पब्लिक मे खुद को एक बौद्धिक रूप मे पेश करने का मतलब होता है खुद के जमे हुए समाज के बंटवारे के बीच खड़ा करना। या उसमे अस्थिरता, रूकावट लाना। इस अस्थिरता या रूकावट को या तो ख़ाली वाह! वाह! के ज़रिये सोख़ लिया जायेगा। या फिर किसी अन्य दुनिया+जगह कि कल्पना+संरचना मे बहाव+उड़ान मे लाया जायेगा। जिसमे मैं और मेरे सामने आती और बनती दुनिया के बीच मे दो तरह कि आकृति कि समझ मे अधीनता और स्वरूपता हो। पर उस अन्य दुनिया या जगह के लिए हमारे पास सवाल क्या हैं?

ऐसे सवाल जो किसी एक ज़िन्दगी कि औपचारिकता को बताने जताने बोलने खोजने तक ही ना रह जाये। बल्कि उस ज़िन्दगी से हमें बाहर के वो सवाल मिल पाये जिससे हम कई ज़िन्दगियों को सोख़ पाये? और आने वाली मुलाकातों मे अपनी बनती छवि को कोई आकार या रूप दे पाये?

लख्मी

पाँच मिनट हमारी ज़िन्दगी मे क्या है?

कई माहौल देखे व माहौलों के बारे मे सुना है। पर सवाल के घेरे कम नहीं होते। कभी-कभी किसी माहौल को देखकर बहुत ताज़ुब सा होता है। कई माहौल जिनमे गज़ब का समय भरा है। पिछले 30 से 40 सालो से या उससे भी ज़्यादा समय से वे वैसे के वैसे बनते आ रहे हैं और उसमे लोग वैसे ही जुड़ते जा रहे हैं। किसी को उस माहौल मे किसी को जानना कोई जरूरत की बात नहीं है। बस, वे माहौल के भागीदार है वे ही बहुत है। उनमे हमेशा लोगों को बैठे देखने से कई सवाल उभरते हैं।

जगाहों का अपुर्ण होना क्या है? अपूर्णता किसके लिए है? किसी जगह के लिए है उस के लिए है जो वहाँ जाता है? किस तरह से समझने की नज़र होती है उस अपुर्णता हो? अपनी चाहत, पसंद और इच्छा को सोचते हुए किसी अपुर्णता का अहसास होता है या उस जगह के काल्पनिक ढाँचें के नज़र आने पर?

जगहों से अक्सर हमारे जहन मे 'अपने लिए' एक स्थान पाने की चाहत से पनपता है। जिसका रिश्ता हमारी ज़ोन्दगी के किसी ख़ास हिस्सो से होता है। एकान्त, मिलना, बैठना, बोलना हर तरह के बौद्धनिये समय को जी पाने की लरक होती है। ये लरक उपजती कहाँ से है? और इसका निकाष क्या है? ये हमें कहाँ तक खींचकर ले जाती है?

हमारी चौख़ट के बाहर की दुनिया हमारी कौन सी कल्पना मे है? जिसमे हम अपने स्थान को खौजते हैं और क्या तलाशते हैं? हमारे अपने ध्यान मे क्या कोई नक्शा है उस जगह का या तलाश का?

बस्ती की उन जगहों पर नज़र दौड़ाने की कोशिश की जो एक पारिवरिक नितियों और कार्यबध नितियों के विपरित है। जिसको हम एक खुली जगह के नाम से अभी दोहरा सकते हैं। उसका नाम और स्थान क्या है वो बाद मे खौजने की कोशिश करेगें।

उस जगह पर जाकर...
वहाँ पर बैठे एक शख़्स से बातचीत की, जो दक्षिण पुरी मे अभी नय-नया आया है मगर, कुछ ही वक़्त मे उसने अपने दिन मे कई माहौल को जगह दी है। दरअसल, दिमाग मे ये था कि कोई कैसे किसी नई जगह पर जाकर अपना स्थान बना लेता है?

मैंने पूछा, "जब कोई आता है और बोलता है तो उसकी निकलने वाली पहली बातें उसके जीवन के कहाँ से होती है?”

वे बोले, "ज़्यादातर तो लोग अपनी बातों को अभी के समय से शुरू करते हैं। हैलो या नमस्ते वगैरह करके वो कभी अपने आने के कारण नहीं बताते और ना ही क्यों बता रहा हूँ वो बताते। सबका अलग-अलग रिश्ता होता है। नज़रें चाहें वहाँ पर किसी एक पर ही क्यों ना हो मगर बातें सभी सुन रहे होते हैं। उस बात को बताने मे उनको कोई डर नहीं होता। जिनको वो वहाँ बोल रहे होते हैं अपने अनुभव के किसी भी टाइम को वो सोचे होते हैं की क्या कहना है? यहाँ पर तो सबसे ज़्यादा अपना वो टाइम बताया जाता है जो "टोप-क़्लास" था। थोड़ी मस्ती होती है, थोड़ा मजा होता है या फिर देखा-दिखाया टाइम।"

मैंने पूछा, “कोई अपनी अगर बोलते-बोलते लम्बा ही बोल गया तो? यानि कोई बहकता नहीं है क्या यहाँ?”

वे बोने, “बढ़े बहकते है यहाँ तो बन्दे। कभी तो इतनी पुरानी बातें बताने लगते है की जैसे वो टाइम बस उसी ने देखा है और अगर उसे पता चल जाये की या ये अनुमान भी हो जाये कि वो जो बोल रहे हैं वो सिर्फ़ वही जानते हैं तो फिर वो बताते नहीं रुकते और फिर बनाते जाते हैं और बोलते जाते हैं और यहाँ पर बैठे हम लोग उनकी उन बातों मे उस वक़्त का इन्तजार करते हैं जहाँ से हमने दुनिया देखी है।"

मैंने पूछा, “यहां पर सब सुनते हैं? कोई बोलता नहीं है उस सुनने के टाइम मे?”

वे बोले, “नहीं-नहीं, बोलते हैं पर उनकी बात ख़त्म होने के बाद मे कोई काटता नहीं है उनकी बात को। नहीं तो उनको बुरा लगेगा या उनको ये लगेगा की उनकी बात का कोई मोल नहीं है। कभी तो सब उनसे पूछने बैठ जाते है कहते है कि "वो टाइम वापस चाहते हैं क्या आप?”

मैंने पूछा, “तो वो क्या कहते हैं?”

वे बोले, “कुछ नहीं बस, हँस पड़ते हैं और कहते हैं की बीता हुआ समय वापस नहीं आता। अगर आता तो तुम मेरी सुनते? नहीं। यही तो मेरी ताकत है जो इस समय तुम बैठे हो मेरे आगे?”

मैंने पूछा, “रोज-रोज यहाँ पर बातें होती है कैसे? क्या सब कुछ रिपीट नहीं होता कभी?”

वे बोले, “नही यार रिपीट तो कुछ नहीं होता। बस, लोग अपनी बातें बोलने के लिए कुछ ना कुछ लेकर आते हैं। हर बार बातें कभी पेपर या अख़बार से होती है तो कभी टीवी से या कभी बीती यादों से जैसे मान लो बात शुरु हुई 'हादसे' से और वो एक दम निजी हो जाती है फिर हादसे अन्दर से निकलने लगते हैं और सरक जाते हैं सीधा घर की ओर। जैसे कुछ लोग तो कुछ हादसे बोल भी नहीं पाते पर कोई-कोई हादसा कह देना आसान सा होता है। लोग उसे हँसकर बताने लगते हैं फिर वो एक परिवार की बात बन जाती है। निजी हो जाती है एकदम।"

मैंने पूछा, “किस तरह की निजी?”

वे बोले, “अपने बच्चों तक हो जाती है। परिवार मे किस तरह से रहते हैं अभी तक और किस-किस तरह से निभा रहे हैं अपने को अपने ही घर मे।"

मैंने पूछा, “क्या लोग यहाँ पर अपने निजी परिवार के बारे मे भी बोलने लगते हैं तो कैसे सुनते है सभी?”

वे बोले, “कोई भी उसे नया नहीं मानता। कहानी कोई भी हो पर है तो एक घर की ही ना! की बढ़े होते ही सब अलग हो जाते हैं। ये पहले लगता था लोगों को की कोई गज़ब हुआ है पर अब नहीं लगता। हां बस, इतना होता है कि लोग अपने घर के भी उन सभी बातों को सोचने लगते हैं और ये देखने लगते हैं की इसका भारी है या मेरा?”

मैंने पूछा, “तो फिर नया क्या होता है यहाँ? कोई यहाँ पर रोज आता है। कोई महिने मे दो बार आता है। कोई हफ्ते मे एक बार आता है तो उसका यहाँ आकर कैसे दिल बहलता होगा या वो यहाँ बोलता है तो उसका बोलना क्या है फिर?”

वे बोले, “भईया इस माहौल की ख़ाशियत और सादगी ही यही है की कोई भी कभी भी लौटे ये उसके लिए वही है। जैसी वो छोड़ कर गया था। बहुत सारे बन्दे होते हैं जो सिर्फ़ यहाँ दुआ-सलाम करने के लिए ही आते हैं, कोई खाली खड़ा होने आता है तो कोई खाली दूर से देखने के लिए। जगह तो बदलती रहती है मगर जिन लोगों से उसकी अहमियत है वो होने पर एक माहौल बनता है गुट बनता है जो जहाँ भी बैठ जाये वहीं पर जगह तैयार।"

मैंने पूछा, “और अगर किसी दिन वो लोग ना हो जिनसे ये माहौल बनता है तो उस जगह का क्या होगा जहाँ लोग मिलते हैं?”

वे बोले, “तो जो आयेगा वो वहां बैठा नज़र आयेगा। एक रिश्ता बन गया है ना अब तो।"

मैंने पूछा, “ये जगह आपके लिए क्या है?”

वे बोले, “मेरे लिए तो ये मान लो की बस, एक ऐसी जगह है जहाँ बैठकर मैं यहाँ क्या-क्या हुआ जान सकता हूँ और सबसे बात कर सकता हूँ। हम जहाँ पर रहते हैं वहाँ जान-पहचान होना भी तो जरूरी होता है। यहाँ पर आने से ये भी नहीं लगता की मैं यहाँ पर जो रहते हैं उनसे कट रहा हूँ। सही मायने मे यहाँ पर मज़ा आता है और कब तक इन्सान घर मे बैठा रहेगा।”

मैंने पूछा, “और कब तक आदमी इस जगह मे रहेगा?”

वे बोले, “जब तक वो रहना चाहें। लोगों मे रहना और उनकी बातों को सुनना किसको अच्छा नहीं लगता भला दोस्त।? अब देखलो ज़्यादा टाइम नहीं हुआ है मुझे यहां पर और काफी लोग जानते है मुझे क्यों?”

मैंने पूछा, “क्यों? और कैसे जानते है लोग आपको?”

वे बोले, “क्योंकि मेरा रिश्ता और आना-जाना इन जगहों से रहा है जहाँ पर लोग बैठे नज़र आते हैं। वहाँ सैन्ट्रल मार्किट के कोने पर, स्कूल के बाहर, एल ब्लॉक मे, मार्किट मे, डाकघर के बाहर। पहले तो मैंने बस, यहाँ पर बस, आना-जाना किया करता था फिर दुआ-सलाम। अगर अपने टाइम का पाँच मीनट भी हम इन जगहों मे खड़े रहते हैं तो हमारी जान-पहचान बन जाती है।"

क्या बात कही है आपने, मस्त रहिये। सर...

क्या लेकर आती है ये जगहे हमारे जीवन मे? फिर इन जगहो का महत्वपुर्ण होना कब होने लगता है? कई लोगों से जान-पहचान ये क्या लाती है हमारी ज़िन्दगी मे या ये क्या है? लोग कितने लोगों को जानते हैं उसे बड़े ताव से बताते हैं और उनके साथ मे क्या रिश्ता है वो भी। ये जानना-पहचाना समाज मे एक तरह के तबके के लोगों का हुआ करता था पर जब ये आम हो जाता है या आम मे रहकर भी उससे थोड़ा हटकर रहता है तो क्या बना रहा होता है?

अपनी बौद्धनिये जीवनी को खाली कलाओ से नहीं जताते। कब दिखाने-चौंकाने के रिश्ते मे पनपती है मगर इन मामूली जगहो के नक्शे या सोच वाली जगह। जहाँ पर चार-पांच लोग आपस मे बातें, खेल कर रहे होगें वो जगह किसी के लिए कहीं महत्वपुर्ण होने की सम्भावनायें देती हैं उस सम्भावानाओ मे कैसे जीते हैं हम?

यहाँ पर लगा की सार्वजनिक जगह खाली अलग-अलग कौनों से आए लोगों के आने से ही नहीं है। वहाँ पर रहकर कोई कुछ दोहरा, बता, बोल या सुन ही नहीं रहा होता है बल्कि कोई वहाँ के लोगों के साथ अगर पाँच मीनट भी मिलता है तो वो कुछ तैयार कर रहा है। ये क्या तैयारी है या फिर ये क्या है? क्या कोई चाहत है? रास्तों पर चलते कई लोगों के मुस्कुराते चेहरो को देखने की तलब है? या नाम लेकर कोई किसी ना किसी तरफ़ से आवाज देगा वो सुनने की लरक? पता नहीं क्या? लेकिन, जो भी है वो गज़ब है।

लख्मी

शहरी रोकनामा

ज़िन्दगी की रफ़्तार में हमारे साथ चलता-फिरता ये रोज़मर्रा, जो दिन को कभी हसीन तो कभी संजीदा बना देता है। इसमें गिरते-उभरते शख़्स, काम, शब्द और ख़्याल जीवन मे नए आसार की तरह से पनपते हैं। इस में कहीं आने-जाने लिए खुले रास्ते हैं तो कहीं किसी माहौल पर शोर गुल का दबदबा, गलियों में कहीं महकती हवाओं का खुलापन हैं तो कहीं बाहर किसी जगह चिलचिलाती धूप की गर्माई, कहीं बिना बुलाए ही सर्दी-गर्मी बारिश टपक पड़ती है। सड़कों पर बोलियाँ मारते फेरीवाले वक़्त-बे-वक़्त अपना धन्धा जमाए कशमकश मे जीते हैं।

ऐसा कभी भी देखा जा सकता है। कश्मीरी गेट पर, जो दिल्ली का एक प्रसिद्ध अन्तराष्टीये बस अड्डा है। यहाँ से शहरों के बाहर जाने के लिए बसे मिलती हैं। दिन हो या रात कश्मीरी गेट पर आवाज़ों का एक बड़ा समूह हमेशा तैयार रहता है आपका अभिनंदन करने के लिए। इसमें छोटे-छोटे झुंडो से निकलती, गूंजती आवाजों को सुनो, ऐसा लगता है कि हर वक़्त कोई किसी को सुनता होगा। सब अपने-अपने मतलब से ही मुख़ातिब होकर सोचते होगें। बस अड्डे के अन्दर आते ही 'आप का स्वागत है, आपकी यात्रा मंगलमय हो और फिर जाते वक़्त भी धन्यवाद किया जाता है।

ये तो हुआ आप की ख़ातिरदारी का सिलसिला जो शहर में आप के आगमन में आपको कुछ रोक थाम वाले आचार-विचार भी नज़र आयेंगे। जो हर वक़्त आपको ताकते रहते हैं। आपकी नज़र उन तक जाये या ना जाये मगर कोई है जो आपको लगातार देख रहा है। उसकी आँखो से आप बच नहीं सकते।

'कृप्या पायदान पर यात्रा न करें'

आप शहरों मे इस नकारत्मक लाईन को जगह-जगह देख सकते हैं। इसे आप बसों के गेट के दरवाज़ों पर देख सकते हैं और ऐसा कुछ 75 फिसदी आप को दुकानों, सरकारी महकमों सड़कों आदि में ज़्यादातर दिखेगी। ये नकारत्मक

'उचक्का'

शब्द आप को कई प्रकार मे मिल सकता है। हमारी सड़कों पर चलती बस, ट्रक, टेम्पों अथवा जगह को ये आदेश लागू है।

'हॉर्न वर्जित है'

धीमी और तेज़ रफ़्तार के लिए गाड़ियों के ड्राईवर अपनी लाईन में निती लिए, ट्रेफिक के नियमों का...कहीं पालन करते हैं और कहीं नहीं। एक महाशय ड्राईवर से मैंने पूछा, "आप कब से गाड़ी चला रहे हो?”

ड्राईवर बोला, ”दस साल हो गए।"

"अच्छा इन दस सालों मे आपने कितने सिंगनल तोड़े?”

ड्राईवर ने कहा, "आपको बताऊंगा तो आप चलान काट दोगे?”

“खैर, आप गाड़ी चलाते वक़्त क्या-क्या ध्यान मे रखते हो?”

ड्राईवर ने कहा, "आप अपनी बराबर की सीटों कि तरफ़ उंगली करते हुए कहा कि सवारी कि ज़िम्मेदारी और बस चलाते वक़्त आस-पास कि गाड़ियाँ, सड़कों पर सिंगनल देते बॉर्ड और रेड लाईट पर अपने बीच का डिस्टेन्स।"

इससे ज़्यादा एक ड्राईवर से और क्या पूछा जा सकता है? लेकिन बात गतिरोदक हो या अपने लिए कोई और मना ही सोचिए ज़रा ... ये शब्द तो एक और रुप मे हमें मिल जाता है। जैसे, 'डॉक्टर की सलाह पर लपेट कर परहेज़ करें' ताकि ड्रॉक्टर कि दवाई की सुरक्षा कवच बना रहे हैं मसलन कोई न कोई व्यक़्ति इस परहेज़ नाम का शिकार होता ही है। चाहें, वो शराबी-कताबी या फिर कोई वाहन चालक क्यों न हो। ऐसे अनगिनत बार बस स्टेंड वगैरह के पास बने पान के खोके जहाँ पर आए किसी ऑफिस के कर्मचारियों रोग विकारों से हैलो करते हैं। इन ठियों को देखो जहाँ नशीले प्रदार्थ बे छूट मिलते हैं। लोग खड़े होकर या किसी दिवार से कंधा लगाए इनका सेवन करते हैं। जहाँ एक तरफ़ खाने-पीने कि आज़ादी है। वहीं दूसरी तरफ़ बॉर्ड पर लिखवा दिया जाता है और साथ की साथ टांग भी दिया जाता है। 'नशीली चीज़ों का सेवन हानिकारक है' पर कौन माने ये तो एक बकवास भरा जज़्बात है।

ये कहकर लोग हिमायती बन जाते हैं। शहर-गांव मे भारी मात्रा मे बीढ़ी-तंबाकू कि खरीद के लिए सुनहरे अक्षरों मे लिखा मिलेगा।

'28 वर्ष से कम उम्र के व्यक़्तियों को तंबाकू उत्पादकों कि बिक्री एक दंडनिय अपराध है।'

वैसे इस बात की गवाह दीवारें भी हैं। अपने अन्दर के अहसासों को लेकर जीती हैं और उनपर उद्देशों को लिख दिया जाता है। एक बार एक सड़क से सटी दीवार पर लिखा देखा था। 'नो पार्किंग' कुछ छण भर पहले वहाँ पर परिन्दा तक नहीं था। फिर कुछ छण बाद ही देखा उसी जगह के पास डीडीए फ्लैट बने हैं और फ्लैटों के ठीक सामने से सड़क निकल रही है। फ्लैटों से आगे जाकर एक टी क्रोस है और वहीं नजदीक ही एक पाँच फिट ऊचीं दीवार है। दीवार पर लोहे के सरिए लगे हैं और उस पर क्रीम कलर की हल्की सफेदी हुई है। उस पर बड़े अक्षरों मे लिखा है

'नो पार्किंग, यहाँ पर गाड़ी खड़ी करना सख़्त मना है।'

लेकिन, ये तो शहर है, जिसे पढ़ने का वक़्त कहाँ है? यहाँ से गाड़ियाँ आजा रही थी। दीवार की लैफ्ट साईड से मोटर बाईक सवार एक बन्दा मुड़ता हुआ दीवार की तरफ़ देखने लगा। उसने अपना हैलमेट उतारा और कमीज की बाजु को आगे, पीछे से झाड़कर आगे, पीछे और बांये देखा फिर अपनी गाड़ी मे चाबी मारने के बाद वो इधर-उधर देखता हुआ। अपने रास्ते हो लिया। शायद, कोई काम हो। कमाल है लिखने वाले ने लिख दिया 'नो पार्किंग' मगर उसे सोचने वाले ने क्या माना?

बरहाल, ऐसा मैंने एक और दीवार पर देखा, काफी पुरानी दिवार थी। जिसमे तरेड़ भी आ रही थी। बारिश मे भीगने से उस पर कहीं-कहीं हरे काले, धब्बे भी थे। देखने से लगता था की वो दीवार मरम्मत मांग रही है। उस दीवार के ऊपर के किनारों के नीचे ही लिखा था।

'पोस्टर लगाना मना है'

वैसे उस दीवार के बीचो-बीच बड़े-बड़े पोस्टर पहले से ही लगे थे और इस्टीगर भी। दीवार ने तो काफी मना किया होगा पोस्टर लगाने वाले को कि भाई मान जाओ, आपके ही जैसा एक जिम्मेदार शख़्स ये लिख गया है। पोस्टर लगाना मना है तो आप समझ क्यों नहीं रहे, पर पोस्टर चिपकाने वाले ने भी अपनी ड्यूटी निभानी है। उसने लेई से भरे एक कन्स्तर मे से भरकर लेई ली और पोस्टर पर लगाकर दीवार पर चिपका दिया, बाद मे उस चिपके हुए पर ऐसे हाथ फेरता जैसे दीवार की मालिश कर रहा हो। उसका हाथ पोस्टर के कागज़ पर मख़्खन की तरह से फिसलता। अब दीवार क्या करे कोई देखने वाला भी नहीं होता। ये काम तो रात के अंधेरे मे किया जाता है। जो दिन के उजाले मे आते-जाते लोगों की बतौर नज़र मे आ जाता है।

अक्सर ऐसा होता है कोई बड़ी बात नहीं, ये तो आम बात है। अगर कोई चीज किसी एक मक्सद के लिए बनती है तो निकालने वाले उसके दस मतलब निकाल लेते हैं। शख़्सों की चहल-कदमी के नीचे दबे-उठे रास्ते कहीं अच्छे खासे होते हैं तो कहीं उन्हे यूँ ही नज़र अन्दाज कर दिया जाता है। अब आप रास्तों की मान्यता और अमान्यता को ही ले तो 'ऐरियों' को अलग-अलग भागों मे बांट कर उन पर किसी टीन के बोर्ड पर लेवल लगाये जाते हैं। जो कुछ ख़ास प्रभाव डालते और छोड़ते हैं।

'ये आम रास्ता नही है'

जरा सोचिये ये शब्द किसे रोक रहे हैं? उन्हे जो इस लाईन को देखते हुए निकल जाते हैं उन्हे या फिर उन्हे जिन्हे जो महज़ वहाँ किसी काम के लिए रुकते हैं? अगर, ये पोस्टर आप के घर के दरवाजे पर लगा दिया जाए तो आप का रुख किस की तरफ़ होगा? शायद आप बौख़ला उठेगें। लेकिन, स्थानिये जगहों मे आप को निमन्त्रन देते शब्द भारी तादात मे मिल सकते हैं। देखा जाये तो शहर एक तरह से धीरे-धीरे अपार शब्द कोष का भण्डार बनता जा रहा है। आज कहाँ शब्दों की जरुरत नहीं? कुछ शब्द बस, और फिर दिनभर का आराम। ये आबादी के लिए एक सरल तरीका हो सकता है जहाँ लोग कम, चींजे ज़्यादा हो और जहाँ चींजे कम, लोग ज़्यादा हो। वहाँ कुछ मनाही करना उतना लाभप्रद नहीं होता जितना कामगार होता है। चीजों के बनते ही लोग उन्हे काम मे लेने के नुस्के अथवा तरीके सोच लेते हैं।

चलिए अब हमारी दिल्ली मे बने या बन रहे फ्लाई औवर जिन्हे हम हिन्दी मे 'सेतु' और आम भाषा मे 'पुल' कहते हैं। दिवारें बड़े-बड़े मजबूती सीमेन्ट और लोहे के उम्दा-सरियों से बने बिम को लाल, काले ,हरे, पीले रंगो से मार्ग दर्शक चिन्ह या मसुरियों के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं। इन रास्तो, गली-कुचो, चौराहों पर किसी न किसी के सहारे घोषित की गई बातें फैलाकर अच्छा ख़ासा ढांचा सा बना जातें हैं और इस ढाँचे से निकले रास्तों पर भीन्न-भीन्न रूप नज़र आते हैं। जहाँ पर्मीशन होती है और नहीं भी तभी तो लिखा मिलता है। 'ये आम रास्ता नहीं है' किसी रास्ते मे बोर्ड आदी पर लिखा होता है। रास्ते आम हो या ख़ास, सबके लिए इन का अलग मतलब है। कोई कहता है सीधे जाकर बांये मुड़े और कोई कहता है बांये हाथ जा कर दांये मुड़ना। ऐसे ही ज्ञात कराते हैं। गाईड मैप जगहों को तलाशने मे मदद करते हैं लेकिन इन लोहे के बोर्डो पर बने मैप को भी लोग अपना ज़रिया बना लेते हैं। दिन-रात भागती-दौड़ती आबादी और ट्रफिक की घिचपिच शोर-गुल मचाता शहर हमेशा भूखा सा रहता है और चिल्लाता है।गाड़ियों की टीं... टीं... टाँ... भर्र..भर्र... गर्र... गर्र... सुनकर सब कुछ रुका सा लगता है लेकिन, ऐसा बिल्कुल नहीं है।

राकेश

Monday, October 27, 2008

दिलचस्पी की दुनिया

कभी-कभी हमें खुद ही पता नहीं होता कि हम किस राह पर है। बस, उस पर चलते जाना और उसमे अपने आप के लिए कोई ठहराव और मौड़ बनाना दिलचस्पी बढ़ाता है। अपनी भाषा और दिल मे आने वाली तस्वीरों को कोई ना कोई फ्रैम देना आदत सी बन गई है। अभी हम अपनी यातनाओं और कामनाओं को इतने तरह के फ्रैम दे चूके हैं की उनकी गाढ़ी तस्वीरें हमारे मददगार अतीत में जम गई हैं। जिनसे हम अपने वर्तमान का खेल खेलते हैं।

अपनी यादों, कामनाओं, यातनाओं को कोई गध और व्यंग देना क्या होता है? और उनको स्वर देना क्या? हमें ज्ञात है की हम अपने वर्तमान मे अतीत के कितने पन्नों को खींच लाते हैं और भविष्य के कितने? इसे अपने तक रखना और अपने से बाहर रखना क्या है? या है जो वो अनिवार्य भी है?

लिखना-बोलना हमारी चाहत के स्वरूप मे बसने वाले वो रूपक हैं। जिन्हे किसी ठोस ढाचें या बन्धिश मे नहीं देखा जा सकता। वो किसी छूपी हुई मिठास की भान्ति होते हैं। जिनका रस हम मे कहीं समाया होता है। उसमे से हम अक्सर अपनी ज़िन्दगी को "अर्थात-अर्थात" करके अक्सर समझाते, दोहराते और लिखते आए हैं। 'अर्थात' शब्द का आना हमारी ज़िन्दगी मे क्या महत्व रखता है? और इससे हम कहां तक का सफ़र तय कर पाते हैं?

बहुत आसान और भोजनिये होता है ये कहना कि "मेरा जीना कोई अलग नहीं है मगर मैं सोचता हूँ।"

सोच और हमारी नज़र क्या रूप लिए हमारे समीप रहती है? क्या महज़ ये छवि का शौध करना होता है या उस छवि से कोई तस्वीर बनाना, मगर इनमे अन्तर भी क्या है?
जो देखा वो लिख लिया। जो सुना वो दोहरा दिया। जो यादों मे था वो उतार दिया। जो दिमाग मे था उसे शब्द दिया। दिल मे था उसे तस्वीर दिया। इन सबके मायने हमारी ज़िन्दगी की किस दिशा मे लेकर जीते हैं और इनमे फ़र्क क्या है?

हमारे आसपास लोग लिख रहे हैं पर वो दोस्तों से नाम की अपेक्षा नहीं रखते और अपने लिखे गए को कहीं देख पाने की चाहत भी साथ रहती है। बहुत सुना है कई लोगों को जो गली मे या गली के कोनो मे दोस्तों की टोलियों मे टाइम को बिताने के लिए किया करते हैं। उनका वहाँ पर सुनाना ऐसा लगता है जैसे लाइट के जाने पर बच्चे अंताक्षरी खेल रहे हो। कोई शेर सुनाता, कोई कविता गाता तो कोई गीत गुनगुनाता। मगर आजतक कभी किसी को कहानी लिखकर सुनाते हुए नहीं देखा।

कब नाम दे दिया जाता है कि ये शायर है या ये गायक है? जब तक तसले मे आग रहती है तब तक या जब तक की वो तसले मे आग रहती है तब तक सुना पाता है? अपने लिए लिखना एक निजी तरह मे बहता है तो वो बाहर मे क्या है? याद को दोहराने के लिए या याद से लड़ने के लिए?

अपना डर, दुख, आँसू, खुशी या उस वक़्त को निकाष देने की बहस रहती है, जिसके साथ मे एक ऐसे समय का रिश्ता होता है जो समान्यता की कटूरता मे था। जिसको बिताना-गुजारना वो नहीं था जो आसान था। पर जो आसान नहीं था या कठिन था वो ही याद से लड़ने के लिए डायरियों मे होता है मगर अपनी याद बताने मे हसीं की चादर क्यों होती है? हम कैसे लिख रहे हैं अपनी यादों को और आँसूओं को?

लख्मी

Sunday, October 26, 2008

ये हिसाब का पानी है

इस शहर की चाल-ढाल मे शामिल होकर अपनी रफ्तार भरे जीवन के सपनों को बुनते हुए हम बस, एक नई भागदौड़ मे ही लगे रहते हैं और शहर की भी जीवनशैली मे अपनी भागीदारी दिखाकर जगह-जगह, चौक-चौराहों पर वक़्त की कभी ना ख़त्म होने वाली कगार पर खड़े हुए, मौसम के बे-ढंगे अन्दाज मे और इतराती धूप की चुलबुलाती दोपहरी मे रंगीले छातों की छांव के नीचे किसी फुटपाथ या रास्तों पर ठन्ड़े पानी की रेहड़ियाँ लगाते शख़्स। शहर की किसी न किसी हरकत से वाकिफ़ होते हैं। अपनी रोज की मेहनत कश्त भरी ज़िन्दगी मे जीते रहे हैं। जो उड़ेल देते हैं खुद को दूसरों की रोज़मर्रा मे पानी का एक तरल एहसास बनाकर।

ऐसी ही एक जगह मे हमारी बात हुई। अपने पूरे दिन को बताते हुए एक नौजवान से।
जगह रही, पान का खोका जिसके पीछे एक दीवार के साथ मे बस स्टेंड हैं और वहीं फुटपाथ की पट्टरियाँ बनी हैं जहाँ से हर वक़्त लोगों का काफिला गुजरता रहता है।
आवाजे, स्कूटर, कार, ऑटो रिक्शे जो कि तेज होर्न बजाते हुए गुज़र रहे हैं।

अपने विचारों मे खोए, पास ही मे खड़े शख़्सों की बातें, बड़े हौले से रुक-रुककर सुनाई दे रही है। पहली नज़र उनकी मुस्कूराहट कि ओर थी फिर चेहरे पर उभरती कुछ सलवाटों की तरफ़ उनसे करीबी लहजे से पास आकर एक शुरुआत कि और उनका नाम पूछा तो वो एक हंसी भरे भाव को चेहरे पर लाकर अपना नाम बताने लगे, वे बोले, “मेरा नाम अब्दुल है।"

महरुम रंग की कमीज उनके सांवले रंग पर खिल रही थी। पानी से दोनों हाथ भीगे हुए थे। एक हाथ मे पीतल का कड़ा था और दूसरे हाथ की उंगलियों मे तांबे कि अंगुठियाँ थी। उस सवाल के बाद भी फिर से देखा सुना सवाल मैंने किया। “आप क्या करते हैं?” चेहरे पर संकोच के बादल छा गये थे उनके, वे मेरी तरफ़ मे एक मज़ाकिया अन्दाज मे देखने लगे। सोच तो रहे होगें कि क्या फालतू का सवाल कर रहा है, दिख रहा है कि मैं शहर मे क्या करता फिर रहा हूँ या क्या पॉजिशन है मेरी। वे मुझे यूहीं हंसते देखते रहे मगर फिर भी अपने अन्दाज मे उन्होने कहा, "मैं मशीन का ठन्डा पानी बेचता हूँ।"

जब काम काज की बात सामने आई तो दिमाग मे उम्र जानने की इच्छा जगी। वे बहुत नर्म खाल का था। यानि ये हमारी भाषा मे कहा जाता है कि नई-नई मूंछे निकली थी उसकी। मैंने अबदुल के थोड़ा करीब आकर पूछा, "आप की उम्र क्या होगी?“

गर्मी मे रुखे अन्दाज से उसने कहा, “यही कुछ बीस-इक्कीस साल की होगी।"

अब हमारी बाते शुरू हो गई थी। उसके दिमाग मे बहुत था मेरे लिए, मगर पता नहीं माहौल मे ऐसा क्या था की वो जवाब देने वाला बन गया था और मैं कुछ ना कुछ पूछने वाला। कभी-कभी शायद शहर की किसी ना किसी राह पर ऐसी पॉजिशन हमारे साथ बन जाती है। हम शहर की सूमसान या रौनकदार सड़को पर लाइव इन्टरव्यू करने लग जाते है या हम बातचीत के बीच की बनती सारी दूरियों को अपने से काफी दूर कर देते हैं और बस, निकलने लगती हैं हमारी सारी बातें, किसी ना किसी अन्दाज़ मे। वैसा अब शुरू हो चुका था।

"अच्छा आप पानी की रेहड़ी कब से लगा रहे हो?”

अभी माथे पर पसीनें की बूंदे बन आई थी। कुछ याद करते हुए अब्दुल बोला, "शायद दो साल हो गए।"

ये उन्होनें दोनों हाथों की हथेलियों को मसलकर कहा था। उस के बाद मैंने अबदुल कि रेहड़ी पर नज़र दौड़ाई। पानी के खाली गिलास उल्टे रखे थे एक प्लास्टिक की टोकरी मे दस-बारह नींबू पड़े थे। एक रूमाल को फैला कर रखा हुआ था और पानी के नल के पास पानी चिपटा हुआ था। ऐसा लग रहा था की यहाँ से पानी रिस-रिस कर जम गया है। यहाँ से नज़र हटाने के बाद उनसे मैंने पूछा, "अब्दुल आप ये पानी की रेहड़ी कितने बजे लगाते हो?”

उनके लिए ये एक आसान सवाल था जिसे वो बिना अटके ही बोल गए, "नो बजे, सुबह जल्दी उठकर मैं आश्रम से रेहड़ी मे पानी भर कर लेकर आता हूँ और यहाँ लगा लेता हूँ।"

अब वे अपनी बातों मे गहरापन ला रहे थे। ऐसा लग रहा था कि एक अनुभव को दोहराने की कोशिश हो रही है। अब कोई उनकी उम्र पर जाने वाला नहीं था। शायद, उनकी उम्र उनके काम कर सामने कुछ भी नहीं थी। अगर अब्दुल से बातें करनी है तो उसके अनुभव से करो। दोपहर सिर पर ही नाच रही थी। गर्मी से दोनों के बदन मे खुजली मच रही थी। अब्दुल एक छाते के नीचे बैठे हुए थे। उनकी आँखों मे आँखे डालते हुए उनसे पूछा, “रेहड़ी मे कितना पानी आता है? और कितने लीटर पानी रोज निकल जाता है?”

वो पूरे दिन का अंदाजा लगाकर नज़रों को किसी हरकत मे लाकर बड़े रंज से बोले, ”पानी तो कई लीटर आता है इसमे मगर मौसम को देखकर ही पानी मिलता है। आजकल गर्मी भी होती है और कभी बारिश भी होती है तो बारिश और ठंडी मे हमारा पानी बहुत कम निकलता है। फिर भी रोज 6-7 इंच पानी निकल जाता है।"

मैंने कुछ आश्चर्य और जिज्ञासापूर्ण तरीके से पूछा, "ये छ: सात इंच का क्या मतलब है?”

तो अब्दुल मुझे समझाते हुए कहने लगे, "अरे रेहड़ी लम्बी और चौड़ी भी होती है। इसकी टंकी मे इचं के हिसाब से ही पानी नापा जाता है और अंदाजा लगाते हैं कि पानी कितना निकल गया। वैसे छ: सात इंच मे 10-15 लीटर पानी होता है।"

"एक बात बतायेगें मुझे, मैंने कई पानी की रेहड़ी वालो को देखा है। जब शहर की सड़को पर कोई नहीं होता तब भी वे अकेले खड़े नज़र आते हैं आपको पूरे दिन यहाँ रेहड़ी पर खड़े रहना कैसा लगता है?”

इसके बाद ही बड़ी तेजी से होर्न देता ट्रक गुजरा और छोटी-छोटी गाड़ियों के घर्राहट मिनट दर मिनट मे हो रही थी फिर अब्दुल कुछ अपने पूरे दिन को सोचते हुए बोले, "बस, सब लोगों को आते जाते देखकर। उनको हंसते-बोलते सुनकर वक़्त कट जाता है और वैसे भी हमारे पास कोई ना कोई बंदा आकर पानी मांगता है तो कोई रोब से बोलता है। 'ओए एक गिलास पानी दे' तो कोई बड़ी तेजी से कहता है 'अबे जल्दी दे छोटू' इस तरह के शख़्स भी मिलते हैं कि हमारे पास खड़े होकर सिर्फ़ इशारा करके कहते हैं आँखे और भंवो को ऊपर करके अपनी तरफ़ ले आना तो मैं समझ जाता हूँ कि पानी माँग रहे हैं। बहुत ही मस्ती मे होते हैं 'हैलो भाई या सरजी एक गिलास पानी दो' फिर कुछ लोग इंग्लिश भी झाड़ जाते हैं।"

अब अब्दुल का चेहरा कुछ खिंचा हुआ था और आँखे भी भिच गई थी। एक शख़्स के बारे मे बताते हुए उन्होने कहा, “कहा तो इंगलिश भी झाड़ जाते हैं कहते हैं 'प्लीज वन ग्लास वाटर' ।

एक हिम्मत की सांस लेकर अब्दुल ने अपना बदन ढीला छोड़ा और मैंने उनसे पूछा, "अच्छा यह पानी की रेहड़ी आपकी है या किसी और की?”

वो रेहड़ी पर हाथ फेरते हुए बोले, नहीं, इसका मालिक कोई और है, बाबू नाम है उसका। उसकी ऐसी दस-बारह रेहड़ियाँ हैं। जो अलग-अलग जगह जैसे आई.टी.ओ चौक की लाल बत्ती पर, लाजपत नगर मार्किट मे, मूलचंद बस स्टाप के पास और चिड़िया घर के बस स्टेंड पर लगती है। ऐसी काफी जगहे हैं जहाँ मेरे जैसे बदें पानी की रेहड़ी लगाते हैं।"

इसी बीच पानी पीने वाले शख़्स भी आ रहे थे। अब्दुल मुझसे बात करते-करते उन्हे नल का हत्था खींचकर पानी भी पिला रहे थे। उनके इस पूरे दिन की मशक्कत को देखते हुए उसकी कमाई के बारे मे पूछ लिया, "तो अब्दुल जी रोज की कमाई है आपकी या महीने का पैसा मिलता है?”

जब बात पैसे की आई तो कुछ थके हुए मूड मे बोले, "नहीं-नहीं, पूरे दिन के बाद मालिक आकर पानी स्केल से नापकर एक कॉपी मे लिख जाते हैं। जितने इंच पानी निकला उतना लिखकर रात आठ या साढ़े आठ बजे तक मुझे 70 रुपए दे जाते हैं।"

"हर रोज 70 रुपए ही मिलते हैं?”

यह अब्दुल का अपना मासिक गणित हिसाब था। मैंने उसे छेड़ना ज़रूरी नहीं समझा।

"अच्छा अब्दुल भाई, क्या आपका हाथ नहीं दुखता बार-बार नल का हत्था खींचने पर?”

अब्दुल ने कहा, “नहीं कुछ ख़ास नहीं, पहले मैं शुरू मे झिझकता था मगर अब आदत डाल ली है। कभी-कभी रात को सोते समय भी सीधे हाथ की कलाई ऊपर नीचे होती है तो मामा हँसते हैं और सुबह मेरा मज़ाक बनाकर सुनाते हैं।"

मैंने कहा, "उनकी मुस्कुराहट मे शामिल होकर और उनकी इस आदत को जान कर क्या आप इसी जगह पर खड़े होते हैं हर रोज?”

अब्दुल ने कहा, “नहीं ऐसा नहीं है। मैं कभी चाँदनी चौक चला जाता हूँ। कभी दरिया गंज तो कभी प्रगति मैदान। हमारी जगहें बदलती रहती हैं और रेहड़ियाँ भी।"

"अच्छा" ये मुंडी हिलाकर मैंने कहा था और फिर उस जगह लोगों की आवाजाही तेज़ हो गई फिर बीच-बीच मे पानी पीने वाले और आने लगे। कुछ रुक-रुककर हमारे बीच ही सवाल ज़वाब होने लगे। मैंने कहा, "अच्छा आप कितनी बार इस रेहड़ी का पानी पीते हैं?”

ये सवाल ऐसे ही पानी को देखकर पूछ लिया था। अब्दुल भवें उपर चढ़ाकर सरल भाव से बोले, "नहीं साहब, मैं इस रेहड़ी का पानी नहीं पीता। मेरी बोतल तो अलग है। (अब्दुल ने एक पुरानी पेप्सी की बोतल मे भरा पानी दिखाते हुए) यह देखो।"

अजीब बात थी ना! पानी वाला खुद रेहड़ी का पानी नहीं पीता मगर रोजाना वो सैकड़ों लोगों को ठंडा पानी पिलाता है। ये मैंने मन मे ही सोचा था मगर अब्दुल की आँखों मे कुछ चुंभ रहा था फिर मैंने उनकी रेहड़ी पर लिखे हुए स्लोगन को पढ़ा, लाल रंग के पेंट से लिखा था। एक सजावटी ढंग से

!ॐ नम: शिवाय!
मशीन का ठंडा पानी
50पैसे गिलास

और बड़े अक्षरों मे एक नाम लिखा था। "बाबू“ साथ ही लिखा था । "हमारे यहाँ शादी और पार्टी के लिए गाड़ी व मयूर जग का प्रबंध होता है"
Contactकरें :

एक शायरी अपने आप को पेश करने की दो लाईने भी थी। अब्दुल को मुस्कुरा कर मैंने वह लाईने पढ़ दी। जो उनकी रेहड़ी के सामने लिखी थी

!फूल है गुलाब का सुगंध लेकर जाओ!
!पानी हैं हिसाब का रुपया देकर जाओ!

इस आवाज के साथ ही एक हंसी हम दोनों के चेहरे पर उभर आई। वाकई यह हिसाब का पानी था।

राकेश

Thursday, October 23, 2008

पोस्टर पॉलिटिक्स

दक्षिण पुरी की खाली दीवारों पर कई रंगीन पोस्टर चिपक गए हैं। एक के साथ मे दूसरा और कहीं पर तो जनता पार्टी के साथ मे जन शक्ति पार्टी के पोस्टर चिपके हैं तो कहीं पर बीजेपी के साथ कांग्रेस के पोस्टर। वाह! क्या एकता है?

किन्ही मे दशहरे की शुभकामनायें हैं तो कहीं पर बालमिकी जयंती की हार्दिक शुभकामनायें। दक्षिण पुरी की दीवारों पर कभी बहुत छोटे-छोटे पोस्टर व पर्चे छपा करते थे मगर आजकल तो जैसे सारा ध्यान इन्ही पोस्टरों पर लगाया जाता हैं। जिसका जितना बड़ा पोस्टर उसका उतना बड़ा नाम। एक हूक सी महसूस होती है सभी मे। लगता है जैसे किसी दौड़ मे है सबके सब। इस बीच दक्षिण पुरी के कुछ लोग बहुत बड़-चड़ करके मजा व नफा लुटते हैं। इन लोगों कि यहां पर भरमार है।

शायद ही कोई दीवार इनकी नज़रों से बची होगी। नहीं तो हर जगह पर ये नज़र आते हैं। बड़े-बड़े 12 व 13 फुट के पोस्टर और कई रंग वाले। सब से बड़ी बात इनमे एक और लगती है। जो भी पोस्टर लगाया या बनया गया है उसमे किसी कार्यकर्ता के बोल सुनाई देते हैं। किसी मे लिखा होता है रमेश जी के सहयोग से तो कहीं पर लिखा होता है अजीत भाई जी की तरफ़ से सबको ईद मुबारक। कोई भी त्यौहार हो या किसी भी किस्म का कोई पर्व इनकी निगाह से बचता नहीं। आजकल तो मुबारकों के पोस्टरों मे एक और पोस्टर नज़र आता है जो किसी नेता जी के जन्मदिन की खुशी मे बनवाया जाता है और उसे उनके आने-जाने के रास्ते मे लगवा दिया जाता है।

ये दुनिया है पोस्टरों की, जिसमे अब कुछ ही दिनों के बाद मे हम सभी लोग आने वाले हैं और शर्त रख लिजियेगा हमें पता भी नहीं चलेगा। बस, हमें कोई बड़ा या छोटा भाई कहकर अपने पोस्टर मे शामिल कर लेगा।


ऐसे ही एक नेता जी ने गली मे कदम रखा। गली सिवर के पानी से बिलकुल फुल हो चुकी थी। पूरी गली मे ऐसी बदबू थी के सभी गली वाले अपने-अपने घरों मे फ्लीट मारकर बैठे थे। कोई होम फ्रैश्नर मार आराम से बैठा था। किसी के घर के सामने कुछ ज़्यादा ही पानी भरा हुआ था तो वो किसी ना किसी तरह से पानी निकलाने की कोशिस कर रहा था लेकिन कर भी क्या सकता था। बस, देख रहा था कि पानी का निकास कहां से है?

नेता जी ने जैसे ही गली मे कदम रखा तो उनकी भी नाक मे बदबू आई मगर नेता जी नाक बन्द तो नहीं कर सकते थे। क्योंकि फिर पब्लिक पर असर सही से नहीं पड़ेगा। अगर नेता ही लोगों की परेशानी को बिना समझे नाक पर रूमाल रख ले तो वो नेता किस काम का। तो अब नेता जी को बिना आना-कानी किए वो बदबू सूंघनी थी और वो बहुत ही ईमानदारी से उस बदबू मे दाखिल होते गए। उसके साथ-साथ उनके दिमाग मे एक पोइन्ट ये भी था की इससे अच्छा मौका कोई और नहीं होगा ये जताने का कि देखो तुमने जिसको वोट दिया या जो तुम्हारा नेता है वो आराम से बैठा है और आप लोग यहां बदबू मे बैठे हो। ये जताते हुए उन्होनें अपने आने का फायदा उठाते हुए ये बोलना शुरू किया, मगर क्या करें बोहनी ही खराब थी।

गली के सबसे बुर्ज़ुग शख़्स जिन्हे किसी की आवाज सुनाई कम देती है वो इन नेता जी से भिड़ गए। नेता जी ने अपनी ईमानदारी दिखाते हुए वही कहा जो हर नया नेता बनने वाला शख़्स कहता है कि आप लोगों की परेशानी वही समझ सकता है जो आप लोगों के बीच का हो और आप लोगों की ही तरह से जीता हो? हमें मौका दिजिये एक बार अपनी सेवा का। हम आपकी ही तरह हैं।

इतना कहना था की अंकल जी भिड़ गए। "अरे सुसरे एक जैसे होते हैं, आज तो तुम भी आ गए, तबसे कहां थे? अगर परेशानी समझनी है तो पहले लोगों के बीच मे जाकर उनसे पुछते की आखिर मे बताओ किस-किस चीज की दिक्कते हैं? साला यहां सीधा चले आए मदद मांगने को। यहां सवेरे से ना जाने कितने आए हैं मगर किसी को पुछो की क्या पता है कि यहां इस गली मे कितने दिनो से पानी कड़वा आ रहा है? तो साले किसी को पता नहीं है बस, सेवा करवा लो इनसे। अरे क्या सेवा करोगे तुम? यहां साला एक महिना हो गया सिवर को भरे हुए, कम्पलेन्ट करके आते हैं तो सरकारी नौकरी करने वालो को भी अपनी तरफ़ से 20 रुपये देना पड़ता है। क्या उन्हे तन्ख्या नहीं मिलती? सब के सब खाने वाले लोग हैं? भईया हमें हमारे हाल पर छोड़ दो।"

नेता जी ने बड़े ध्यान और उदारता से उनकी पूरी बात को सुना और बदले मे सिर्फ़ इतना कहा, "बाबू जी अगर मेरे साथ भी ऐसा होता तो मैं भी इसी तरह बिगड़ता। मगर, हमें ये खुद से समझना है कि आखिर मे गलती किसी कि है?”

ये कहकर नेता जी अगले घर के सामने गए। वहां एक नौजवान बन्दा खड़ा था। नेता जी ने वहां उसके पास मे जाकर उसके कांधो पर हाथ रखते हुए कहा, “ये हैं हमारे नौजवान भाई, कल की उड़ान। ये समझ सकते हैं हमें। जो बीत गया है वो क्या समझेगा। ये समझेगें, क्योंकि अभी इनको की आने वाले कल की नींव रखनी है।"

पीछे से उनके कार्यकर्ता भी साथ की साथ हां मे हां भरते रहें। ऐसा कहते जैसे- जो भी कह रहे हैं वो सब कुछ भला है और अच्छा है। नेता जी ने फिर से कहा, “देखो भाई ये हमारी नई और कल की उम्मीद मे बनी ये पार्टी है, इसे दक्षिण पुरी के नौजवान भाईयों ने बनाया है। जे, के, एल, बी अथवा सी ब्लाक के नौजवान भाईयों ने। अपने लिए और सबके लिए। हम चाहते हैं कि एक ऐसी पार्टी बनाई जाए जो एक-दूसरे को सुने और उसकी दिक्कतों को समझें। क्यों? ये होना जरूरी है। मैं आपको एक चीज दिखाता हूँ।"

उन्होनें अपने कार्यकर्ता के हाथों मे रखे पर्चों मे से एक पर्चा लिया और दिखाया, उसमे सबसे ऊपर उनका फोटो था एक तरफ़ मे और बाकी नीचे की तरफ़ मे कई फोटो थे। लगभग दस लोगों की तस्वीरें थी। सभी यहीं दक्षिण पुरी के ही चेहरे थे। नामी-ग्रिरामी लोग। जो किसी ना किसी वज़ह से दक्षिण पुरी मे सुर्खियों मे रहे हैं। पूरा पोस्टर लोगों से भरा हुआ था। ये भी एक खेल ही है, ये दिखाने का की इस पार्टी के सहयोग मे कितने लोग हैं? इस पार्टी पर विश्वास किया जा सकता है। आजकल एक इसकी भी हूक सी लगी है कि हर पार्टी के पोस्टर मे उस जगह के कई लोगों के चेहरे नज़र आने चाहियें।

नेताजी ने अपनी बात को रखते हुए कहा, “हम कल शाम मे 5 बजे, शीश महल मे एक बातचीत रख रहे हैं जिसमे दक्षिण पुरी के कई नौजवान भाई आयेगें। जो अपनी जगह को कल को एक नये रंग मे देखना चाहते हैं तो आप भी आइयें। हम आपको न्यौता देते हैं। ये रहा हमारा कार्ड।"

इतना कहकर नेता जी अपने रास्ते चल दिए। दक्षिण पुरी मे अक्सर ऐसी सभाये बनती आई हैं। जिनमे लोग बहुत तरीके जुड़े हैं। जिस सभा मे लोग वो होते हैं जिनका परिचय अपने आसपास मे लोगों से बनता है। जिनको गुरु या मस्तकलन्दर कहा जाता है वो इस सभा के सबसे टॉप के बल्लेबाज़ होते हैं। शाम के साढ़े चार बज चुके हैं। शीश महल मे सभा बैठने ही वाली है। लगता है जैसे नेता जी ने कई लोगों को न्यौता दिया है। छोटा सा कमरा है ये और लोगों से भरा हुआ हैं। सभी एक-दूसरे को जानते हैं। नेता जी तो अभी आए नहीं है मगर उनके कार्यकर्ताओ ने बैठने और पानी पीने का इन्तजाम कर रखा है। कार्यवाही शुरू होने ने बस, कुछ ही समय की देरी होगी। नेता जी के आने की ही बाट सब देख रहे हैं।

"और सुनाईये राज साहब कैसी चल रही है आपकी समाज सेवा?”

"कहां यार, सब श्याने हो गए हैं। सबको लगता है जैसे हम उनका पैसा खा रहे हैं? बताओ यार एक पार्क की मरम्मत करवाई है अभी साला, दो हजार रुपये तो मेरे अपनी जैब से लग गए। फिर भी लोग आते ही नहीं है कुछ सहयोग देने। तुम बताओ समीति मे लोग आने शुरू हुए?”

"मैंने तो अपने भाईबन्ध लगा दिए हैं। लगभग 20 लड़के हैं जो अपने दोस्तो का कार्ड बना रहे हैं। ऐसे ही समीति बनेगी।"

"समीति तो पहले बनती थी। एक बार कहो बस, लोग चले आते थे। कहने वाला एक होता था और सुनने वाले कई मगर अब तो सारे कहने वाले ही हैं। सभी नेता बनकर घूमते हैं। किसी को भी पकड़कर पुछलो, एक-एक आदमी सौ-सौ लोगों को लेकर चलता है।"

कई लोग तो खाली चुपचाप बैठे ये देख रहे थे कि हमें क्यों बुलाया है? ना तो हम समाज सेवा करते हैं और ना ही हमारी कोई समीति है। बस, आ गए हैं नेता जी के बुलाने पर। अरविन्द जी यही सोच-सोचकर पूरे कमरे मे नज़र घुमा रहे थे। एक तरफ़ की दीवार मे तो नेताजी के ही पोस्टर चिपके थे और बाकि कि दीवारें खाली और सूनी पड़ी थी। शायद, यहां पर अभी बहुत कुछ आना बाकी है। नौकरी छुट जाने के बाद मे इनका पूरा दिन लोगों के बीच मे गुजरता। बरात घर मे बैठे-बैठे। तो वहां के कई लोगों के साथ मे जान-पहचाह हो गई। बरात घर को साफ़ रखने मे बहुत ध्यान देते हैं इसके जरिये इनको कम से कम चाय तो मिल ही जाती। अब तो गली व इनके जानने वालो को बरात घर बुक करवाना हो तो वो इनके ही पास मे चले आते। ये सोच कर कि ग्रीन पार्क नहीं जाना पड़ेगा अरविन्द जी खूद ही करवा देगें। ये काम करवाने के उनको कुछ नहीं मिलता बस, न्यौता और पहचान मिल जाती। ये बहुत है उनके लिए।

नेता जी ने कमरे मे कदम रखा। सबको सलाम करते हुए वो अपनी कुर्सी पर बैठ गए। आते ही कहने लगे, “मैं बहुत शुक्रगुजार हूँ आप सभी का आपने मेरे कहने पर अपने दिन मे मेरे लिए वक़्त निकाला। अरे राजकुमार, सबको चाय पानी पिलाया क्या? जाओ सामने चाय वाले को बोलो कि दस चाय भेजे। मैं बस, यही कहना चाहता हूँ की हम एक पार्टी शुरू करने वाले हैं जो आप सबके सहयोग की प्यासी है। हम ये नहीं चाहते कि आप लोग अपने काम मे कोई खलल डालें। हम तो ये चाहते हैं कि आप बस, हमारे साथ खड़े रहे। फिर जैसा आप सभी चाहेंगे वैसा ही होगा। ये पार्टी आपकी है और आपके ही इलाके मे नई तरह की योज़नाए और काम के लिए बनी है। हमारा प्लान जो होगा वो आपके ही आगे रखा जायेगा। अगर आप लोग ये कह दे की आप हमारे साथ हैं तो हम काम शुरू करते हैं। अभी तक हमारे साथ मे 300 लोग जुड़ चुके हैं। जो दक्षिण पुरी के हैं। हम चाहते हैं कि आप लोग भी हमारे साथ मे जुड़े।"

नेता जी ने अच्छी ख़ासी पट्टी लोगों को पढ़ा दी थी। मगर लोग भी कम नहीं हैं अपने-अपने काम मे माहिर हैं। इनको शीसे मे उतारना किसी नौसिख़या आदमी का काम नहीं है। हर आदमी, अपने साथ मे तीन सौ-तीन सौ लोग लेकर चलता है। चाहें तो अपनी पार्टी खुद से बनाले। मगर बस, चाहता नहीं है। इतने मे चाय की प्याली नेताजी ने सबके आगे खिसकाते हुए कहा, “हम आपको घुमायेगें नहीं बस, आप कह दो कि आप हमारे साथ हैं।"

सभी लोगों ने चाय का घूंट मारते हुए कहा, “ठीक है सर आप इतना कह रहे हैं तो ठीक है। हम तो ये चाहते हैं कि हमारे जरिये कोई अच्छा काम हो जाए।"

इतना ही बहुत था नेता जी के लिए। "शुक्ररिया हम आपका फोटो अपने नये बन रहे पोस्टर मे छपवायेगें चलेगा ना?”

"चल तो जायेगा, लेकिन हमारा फोटो तो पहले भी कई पोस्टरो मे छप चुका है।"

"तो कोई बात नहीं जी, ये तो भागीदारी है। हर समीति मे आपका सहयोग है इसका मतलब। किसी मे ज़्यादा, किसी मे कम। बस, अबसे आप ये कह देना की हमारे साथ ज़्यादा है।"

एक लम्बी हंसी के साथ मे सभा बर्ख़ास्त हुई। सड़को के किनारे लगने वाले पोस्टर और पार्टियाँ कितने समूह बनाकर चलती है। कई पोस्टरों मे दिखने वाले लोग "दल बदलू" के नाम से जाने जाते हैं, मगर यहां पर तो ये भागीदारी की शक़्ल लिए हैं और शहर मे ये समीति का संगठन के रूप मे नज़र आती है। क्या आप भी सौ लोगो को जानते हैं? तो आप भी अपनी समीति बना सकते हैं या फिर किसी समीति मे भागीदारी दे सकते हैं। इससे आपको जानने वाले और पुछने वाले लोगों मे इज़ाफा होगा। लोग आपके इन्तजार मे बैठे रहेगें। मान-सम्मान होगा। बस, आने ही वाला है आपका नाम किसी नये बनने वाले पोस्टरो में। मुबारक हो, मुबारक हो।

लख्मी

Tuesday, October 21, 2008

किसी खोए हुए को ढूढ़ना है या किसी नये की तलाश है?

किसी खोए हुए को ढूढ़ना है या किसी नये की तलाश है?

सीधी लकीर की तरह जीना किसको भाता है? याद और बीता समय जो कभी भी वर्तमान की गती मे गाढ़े नहीं होते। वो एक औझल रूप की तरह से रहते हैं पर इसके बावज़ूद लोग उन्हे दोहराते चलते हैं। वैसे देखा जाए तो उनका गायब होना क्यों जरुरी होता है? इसका कोई कारण नहीं है मगर, लोग या तो किसी से दूर चले आए हैं या कोई उनसे दूर हो गया है या फिर जो जीवन मे बस गया है किसी घटना या अवसर के माध्यम से, वही तलाश वर्तमान मे एक फैलाव की तरह से चलती रहती है। ऐसा लगता है की जैसे सभी जानते हैं कि हर शख़्स यहां पर एक लय मे जीए चले जा रहा है और अपने लिए एक लकीर तैयार कर रहा है मगर उसी लकीर को हम जब किसी खोए हुए या चिन्हित सिद्धातों मे टटोलते हैं तो कभी भी जीवन सीधा नहीं रहता वो कई लोगों, जगह और अपेक्षाओ से भरा लगता है।

यहां पर हम कहते हैं, समझ नहीं आया!

जैसे रास्ते ब्लाईडं होते जाते हैं, आगे का सभी कुछ इन्ज़िवल होता है और पीछे का सब औझल होता जाता है। हम सिर्फ़ हाईवे पर रात मे चलती गाड़ियों की तरह अपने कदमो पर डिप्पर मार कर देखते हुए चलते हैं। शेरों-शायरी, कविताये-कहानियाँ और मुहावरों मे बीते समय को टटोलने की महक बखूबी छलकती है मगर इनका जीवन शख़्स के वर्तमान में रहता है।

"एक बार आँसुयों ने पुछा हमसे की हमें क्यों बुलाते हो।
हमने कहा हम तो उन्हे याद करते हैं आप क्यों चले आते हो।"

पवन भाई जो हमेशा एक काम मे लगे नज़र नहीं आते कभी ड्राईवर, कभी सुपरवाइजर और आजकल प्रोपर्टी डीलर का काम खोलकर बैठे हैं। जब भी लड़के उनके पास मे जाकर बैठते हैं तो कहानियाँ हमेशा एक चेहरे से शुरु होती है और अतित मे कहीं खो जाती हैं आवाज आती है। "बे-वफाई....बे-वफाई" अपनी डायरी के लिखने की चाहत अपने खोए हुए समय को तलाशकर अपने आने वाले और चल रहे जीवन को समझने की रहती है।

हमारे आसपास कुछ घूम रहा है जिसमे हम जी रहे हैं मगर मैं अगर दुकान खोलकर, पुजा करके, सफाई करके ग्राहको का इन्तजार करता तो मैं भी साथ वाली प्रर्चुन की और डीजल की दुकान की तरह से दुकानदार बन जाता। मगर जब कोई मुझसे हाथ मिलाता है और हाल पूछता है तो मुझे अच्छा लगता है और मैं उस पल, अहसास को उतार लेता हूँ। बस मे चड़ता हर शख़्स अपने मे लीन है ड्राइवर गाड़ी चलाने मे, कन्डैक्टर टिकट बांटने मे पर जब भी कोई लड़खडाता है तो मुझे वो मेरी धुन मे लगता है और मेरे अल्फाज़ कॉपी पर उतर जाते हैं।

"वो रोया होगा उस खाली कागज़ को देखकर!
हाये खुदा आज फिर से मैंने एक खाली ख़त भेज दिया।"

कुछ नये करने की तलाश मे एक अलगपन की अपेक्षा रहती है। चल-घूम रही चीजों मे एक अपने अलगपन मे रहने की लालसा जीती है। कुछ नये करने की लालसा मे जैसे जीने वाले हर शख़्स के ऊपर कुछ सवाल जुड़ जाते हैं अपनी सीधी लकीर वाली ज़िन्दगी से हटकर अगर कुछ नये करने की तलाश करने का प्रत्यन करते हैं तो एक 'डर' बनता है। यह लकीर ना तो खुद की बनाई कोई रोज़मर्रा है और ना ही रुटीन क्योंकि अगर यह भी होती तो इसे तोड़ने या बदलने मे ना तो मुश्किल होती और ना ही कोई टैन्सन। मगर इस ढाचें के सांचे मे जैसे जीवन के आकार कुछ फिक्स हो गए हैं।

फिक्स होना- अपनी शख्सियत का होना, अपने ऑदे का होना, अपने रिश्ते का होना, अपने सदंर्भ का होना और अपना दुनियाना जैसे दो भागों में बट गया है। एक तो वो जो इस सीधी लकीर का है और दूसरा वो जो अपने अन्दर के शेयर करने या ना करने के अन्तरद्वधं से बनता है। वो अन्तरद्वधं क्या है? क्या अन्दर है और उसके बाहर आने का क्या डर है?
क्या हम अन्दर की अन्तरद्वधं को और बाहर की छवि को अलग-अलग तो नहीं समझ रहे हैं या समझते हैं?

एक पण्डित जी जो कई लोगों के हाथ देखकर उनका आने वाला कल बताते हैं और अपने मान-सम्मान की छवि को नमस्कार के मायने देते हैं। भोला जी जिन्हे लिखने का शौक अभी कुछ समय मे लगा। जब उन्होनें अपने दोस्तों को फौन पर शेरों-शायरी भेजनी शुरू की, किसी के नख़रे पर, किसी की अदा पर और किसी की बात पर, यह लिखना शुरू हुआ। पर वो बाहर किसी को सुनाते नहीं हैं और ना ही बताते हैं। अपने लिए जीने वाला समय और अहसास एक तरह से जमा है की वो बाहर आए ही नहीं उस धारणा मे जीते हैं। "कहीं कोई ढप्पा ना लग जाए?", “नज़रों का नज़रिया ना बदल जाए?” इन्ही के द्वृधं मे घूमते रहते हैं।

कुछ चीजें और जीवन की सामग्री बहुत महफुजियत से कहीं जमा है जो घर मे है, जीवन मे है, अनुभव मे भी है मगर फिर भी उसकी कहीं कोई स्थिर जगह नहीं है। या बाहर मे कोई नज़र है?

"प्रमोद राज जी जो कई सालों से एक स्टैश्नरी चलाते हैं और साथ-साथ लिखने का भी शौक रखते हैं। ग़जल और कविता। यह उनके लिए खाली अपना लिखना ही नहीं है बल्कि पुरानी फिल्मे, गाने और अख़बार मे छपे शेर से शुरुवात किए थे। पहले उन्हे लिखते थे और नीचे लेखक, शायर और कवि का नाम लिख दिया करते।

कहते है, “जरुरी नहीं है कि आप एक लय के साथ मे अपने को बाधंलो बस, अपने अल्फाज़ बाहर आने चाहिये। एक बार पंजाब केसरी अख़बार मे काम करने वाले दोस्त ने फरमाया की "प्रमोद भाई इतना अच्छा लिखते हो तो कभी छपवाते क्यों नहीं तो बस, तीन दिन वहीं के चक्कर काटना शुरू किया। पर एक बात वो बोले, शहर को, उन लोगों को। हर शख़्स को या उसके चेहरे को मास़ूक बनाकर लिखने वालों की जरुरत नहीं है। बस, आज के हालात पर लिखो यह कहकर उन्होनें मेरी एक कविता छाप दी। तब मैं लोगों को वही अख़बार का पैज दिखाया करता था। अब तो वो भी मेरे पास मे नहीं है। पहले तो हर कागज का टुकड़ा अपना सा लगता था चाहें बस का टिकट हो या अपनी डायरी का पैज। बस, मुझे यह धुन अच्छी लगती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है तो बस, उन्ही शैतानियों को उतारते चलो।"

अपनी ज़िन्दगी के भागो को मुल्याकन करते चलना स्भावाभिक का नज़र आता है। 60 पर्सेटं समाज के लिए जिया, 20 पर्सेटं घर और परिवार के लिए, 15 पर्सेटं दोस्तों और रिश्तो के लिए जिया तो 5 पर्सेटं अपने लिए जीना क्यों औझल हो जाता है? कि ‌वो एक खूबसूरत अहसास बनकर अपने होने का अन्देशा बनने लगता है। अपनी चीजें, अपना शौक, अपने अल्फाज़ सब अनुभव मे हैं पर फिर भी छूपा सा रहता है क्यों?

समझ नहीं आया की धून मे कई परतें खुलती जाती हैं। हम कहीं और चले जाते हैं। ये सिलसिला चलता रहे तो हम एक पल मे ना जाने कितने रूपो अथवा समय को जी पायेगें। नये की तलाश और खोए हुए के साथ बहस ये ही जीवन के दो मुल्य दायरे हैं जिनमे हमें जीना, बनाना, टूटना अथवा सजोंना होता है।

लख्मी

ये बदलाव का टैन्ट है

आज 6 अक्टूबर 2008 है। ये तारीख़ अख़बारों से निकलकर बाहर आ गई है। जो ख़बर पिछले कई दिनों से टीवी व अख़बार मे छाई हुई थी। वे आज लोगों की ज़ूबान पर थी। शाम के पांच बजे हैं और आवाजों का काफ़िला अन्दर आने के लिए मचल रहा है।

"दक्षिणपुरी की तो किस्मत ही ख़राब हैं कोई अच्छी चीज का तो हकदार ही नहीं है।"

ये बोल यहां सभी की ज़ूबान पर थे। किसी चीज के ना मिलने का दर्द बोल रहा था। लेकिन कर भी क्या सकतें हैं, जिसके हाथों मे वो थी उससे मुहंजोरी कोई नहीं कर सकता। हां, भले ही अपने करीब के कार्यकर्ता को तो हर तरह से कोसा जा सकता है, क्योंकि उसे तो आना ही हमारे पास मे, मगर उसे कौन कहे जिसके इन्तजार मे आज लोगों को ख़ाली कुर्सियों पर बैठे-बैठे एक घण्टा हो गया था। बहुत ही शानदार टैन्ट था। कम से कम 200 गज़ का। इतनी बड़ी जगह तो यहां किसी के पास मे नहीं है। हद से हद 150 गज होगी। लेकिन उसमे भी उसने कितने सरकारी आलाअधिकारियों को बहुत सी मिठाई खिलाई होगी और ना जाने कितनी पैप्सियाँ तो पुलिष वाले भाईयों को। तब कहीं जाकर वो अपना मकान बना पाया होगा। खैर, ये तो खेला है जो जीवन भर खेलना है, इसपर बोलने से क्या होगा या इस बात को दोहराने से क्या होगा। जाने दो इस दुनिया को।

विराट का मैदान आज बड़ा खुशनसीब हो गया था। एक तरफ़ मे लगा हुआ था मेला तो दूसरी तरफ़ मे एक ऐसा टैन्ट लगा था जो कि आज किसी शादी का नहीं था। वो आज बहुत ही ख़ास था क्योंकि इसमे वो आने वाले थे जिसने इस जगह के उद़्धार मे सहयोग दिया था। या ये लोग उस परिवार के हैं जिन्होने दक्षिणपुरी जगंल या शमसान घाट को जीने लायक जगह समझा था। उसी के कारण यहां पर बहुत भीड़ थी। कई सफ़ेद पौशाकें आई हुई थी। रामलीला पार्टी वाले, नौजवान पार्टी वाले, नये कदम उठाने वाले, मौहल्लो के मुखिया, महिला उद़्धार वाली औरतें, कमेटी वाले और कई ऐसे लोग जो किसी गिनती मे नहीं आते मगर फिर भी बहुत ख़ास होते हैं। सुनने वाले वे लोग, जिन्हे शायद पता भी नहीं होता की यहां कुछ सालों के बाद मे क्या होने वाला है? बस, सुनने के लिए चले आते हैं। बहुत भीड़ लग चुकी थी। इन्तजार मे नज़रे गेट पर ही लगी थी।

सफ़ेद रंग और गुलाबी रंग का टैन्ट हवा मे झूल रहा था। 200 गमले पूरे पार्क मे लगे थे। बाहर लगे बोर्ड पर गीला कपड़ा मारकर चमका दिया था। मैदान के दोनों ओर मे बड़े-बड़े पोस्टर लगा दिए थे। जिनपर अच्छी ख़ासी पोस्टर राजनीति हो रखी थी। जितने भी लोग उस परिवार के हैं वे सभी अपने-अपने नाम के पोस्टरों को उस कतार मे लगा रहे थे ताकि परिवार के वालदेनों के साथ मे बच्चो का भी कुछ अता-पता रहे। यही तो वक़्त है कि अपनी पॉजिशन को जमाया जाए।

"रविकांत जी वो अप्लीकेशन तो लाए हैं ना?! मैड़म जी को पढ़वाना है। बहुत जरूरी है।"
"अरे हां, यार वो मैं कैसे भूल सकता हूँ। आज तो वो मैं देकर ही छोंडूगा।"


"यहां की पुलिष का पब्लिक के साथ मे व्यवहार को बताना है। वो ख़त लाई हो?”
"हां, लाई हूँ, मैड़म जी को तो आने दो।"
"अरे बस, आती ही होगीं। साढ़े पांच का वक़्त था, छ: बजने को आए हैं। आती ही होगी।"


ना जाने कितनी ही ज़ूबाने यहां पहले से ही तैयार हो चुकी थी। बस, वो कान आने बाकी थे। सभी लोग सामने-सामने वाली सीटों पर जम गए थे। ताकि बहुत ही सरलता से मैड़म जी से मिल लिया जाए। पहले घड़ी कि तरफ़ मे देखते तो कभी गेट की तरफ़। गेट पर चार औरतें जमीन पर बैठे-बैठे झाड़ू लगा रही थी। वे गेट से होते हुए टैन्ट तक आ रही थी, पीछे-पीछे दो आदमी उनकी साफ़ कि हुई जमीन पर लाल बदरपूर बिछा रहे थे। एक आदमी, उस लाल बदरपूर से बने रास्ते के दोनों किनारों पर डी.टी.टी के पाउडर से किनारियां बना रहा था। एक बड़ा ही खूबसूरत सा रास्ता बनता नज़र आने लगा था जैसे की जन्मअस्टमी मे बच्चे अपनी जन्मअस्टमी सजाते हैं। वो औरतें बैठे-बैठे ही झाड़ू लगाती, कभी तो दोनो ही रुक जाती तो कभी बड़ी तेजी से आगे की तरफ़ मे बड़ जाती। मिट्टी के अलावा तो उनकी झाड़ू मे कुछ और निकल ही नहीं रहा था तो वे उस मिट्टी को किनारे पर लगा देती। अब तक साढ़े छ भी बज चुके थे। कोई नहीं आया था। ना तो चौधरी प्रेम चन्द जी ही आए थे और ना ही शिला दिक्षित जी ही आई थीं। सभी के चेहरे पर अब इन्तजार करने की उम्मीद भी नहीं दिख रही थी। इतने मे चार आदमियों ने टैन्ट मे प्रवेश किया। उन्होनें अपने बीच मे कुछ बातें कि और चार आदमियों को टैन्ट के ऊपर चड़ा दिया। वे चारों टैन्ट उखाड़ने लगे। ये देखते ही सभी लोग कुर्सियों को छोड़कर खड़े हो गए। दो टैम्पो ने मैदान मे इन्टर किया। जिसमे मैदान मे गमलो को भरना शुरू किया। बड़ी जोरों पर काम शुरू हो चुका था। अब तो वहां पर आए हुए हर चेहरे मे ये साफ़ देखा जा सकता था कि आज उद़्घाटन नहीं होगा। फिर भी सभी ने उन टैन्ट वाले व गमले वाले ठेकेदारों से पुछा तो उन्होने सिर्फ़ इतना कहा कि "हमें ऑर्डर आए है कि यहां पर कोई काम नहीं है तो समान पैक करलो। तभी हम ये समान पैक कर रहे हैं। अब वो क्यों नहीं आई ये तो वो ही बता सकती हैं। हमें तो मैदान मे से ये समान हटाने को कहा गया है।"

अब लोगों मे अलग-अलग बातें शुरू हो चुकी थी। वे क्यों नहीं आई लोग खुद से बनाने लगे थे। कोई कहता, "मैड़म जी को पता नहीं था की यहां पर मेला लगा हुआ है। पूरी डिटेल नहीं गई होती मैड़म जी के पास मे इसलिए वो नहीं आईं।"
तो कोई अपनी पॉजिशन दिखाने मे जुट गया, “अरे जब तक हमारे सवालों के जवाब नहीं मिलेगें तब तक कैसे हो सकता है। सात साल पहले यहां पर अम्बेडकर जी की मूर्ती की स्थापना होगी ये कहकर इस मैदान को ख़ाली छोड़ा था। तभी ये मैदान मे स्तम्भ भी बनवाया था। इसे अम्बेडर जी के नाम से जाना जायेगा। मगर वे भी नहीं हुआ तो ये कैसे होगा।"

तो कोई बिमारी का बहाना बनाता तो कोई कुछ और कहता। मगर फिर भी लोग रात के सात बजे तक वहीं पर खड़े रहे। धीरे-धीरे करके मैदान मे सभी कुछ हटा दिया गया। ये ख़ाली मैदान ख़ाली ही रह गया। जिन खंर्जो को छुपा दिया गया था वे अब सभी दिखाई देने लगे थे। जिन पहाड़ियों को ढ़क दिया गया था वे अब नंगी पड़ी थी। पर सभी को इतना पता था कि अस्पताल का उद़्घाटन नहीं हुआ लेकिन इतना भी पता था कि ये अब रूकेगा नहीं। नौजवान लोगों की पार्टी के सामने ये सवाल था। उनका कहना था, “हमें तो सिर्फ़ ये पूछना था कि अब हम जब कोई खेल की प्रतियोगिता करवाए तो कहां? दक्षिण पुरी मे अगर खेलों को लेकर आगे बड़ाया जाए तो कहां? बड़े-बड़े स्टेडियम भी मिल सकते हैं मगर उसके लिए पहले छोटे-छोटे जगहों से निकलना पड़ता है। वो कैसे निकला जाएगा?”


इन सभी सवालों के जवाब अभी कुछ और महिनों के लिए रूक गए थे। मगर ये सभी जवाब मिलेंगे जरूर। टैन्ट हटाने वाले और गमले उठाने वाले लोग बोल रहे थे, “आज की तो बोहनी ही ख़राब है। सुबह से दो जगह मे से ख़ाली हाथ ही हटाना पड़ा है। अब दोबारा उसी जगह पर जाना होगा कभी किसी और दिन। पहले मालविया नगर मे किसी स्कूल का उद़्घाटन होना था वहां पर भी मनाही हो गई और अब यहां पर।"

धीरे-धीरे करके यहां की भीड़ तो ख़ाली होने लगी मगर, मेले की भीड़ मे कोई कमी नहीं आई। वे तो बड़ती ही जा रही थी। शायद, उनको पता भी नहीं था कि यहां इस कौने मे क्या हो रहा है। शायद, किसी शादी का टैन्ट होगा ये सोच कर लोग पार्किंग करने भी नहीं आए। लेकिन शोर मे कोई कमी नहीं थीं यहां का खेल रात के सात बज़े तक ख़त्म हुआ और वहां का खेल रात सात बज़े से शुरू हुआ।

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तारीख:- 6 अक्टूबर 2008, समय:- शाम 7:00 बजे

लख्मी

जख़्मी जुतों का डॉक्टर- 2

रमेश और गिरधर दुकान के बाहर ही पीपल के पेड़ के पास बैठे थे। वहां एक मिस्त्री आया और बोला।
"भाई, ये चप्पल टूट गई है। जरा दो टाँके मार दो।"

रमेश, "बस दो टाँके?"

मिस्त्री, "और क्या? इसे सिलने के कितने पैसे लोगे?”

रमेश, "पांच रुपये दे देना।"

मिस्त्री, "दो टाँकों के पाच रुपये? एक तो सुबह-सुबह चप्पल टूट गई और ऊपर से तुम पांच का नोट् मांग रहे हो।"

रमेश, "तो क्या कंरु मंहगाई जो हो गई है। तुम भी तो कमाने निकले हो क्या तुम्हे नहीं पता।"

मिस्त्री, "काम तक जाने से पहले चप्पल ने साथ छोड़ दिया।"

गिरधर बोला, "महाश्य जी! एक दिन सब साथ छोड़ देगें। तब क्या करोगें?”

मिस्त्री, "जब की जब देखी जायेगी। अभी तो मौज़ उड़ने दो।"

गिरधर, "अच्छा तो तुम मौज़ उड़ा रह हो। तो तुम्हारी आवाज मे मायूसी क्यों है?”

मिस्त्री, "तुम ये कैसे कह सकते हो की मे मायूस हूँ?”

गिरधर, "बड़ी सीधी सी बात है। आदमी सब कुछ छुपा सकता है, लेकिन जरूरत नहीं छुपा सकता। किसी न किसी तरह उस की जरुरत सामने आ जाती है।"

मिस्त्री, "सही कहते हो। मैं मायूस इसलिये हूँ की जितना कमाता हूँ उस से गुजारा नहीं होता बस, बीवी-बच्चे पल रहे हैं।"

गिरधर, "तो और क्या चाहते हो?”

(बार-बार चौराहों पर पड़ा सन्नाटा बिखर जाता और जिवश्यम की तरह आँखों के आगे धूल के कण लहराने लगते। सड़क के पास से गुजरते वाहनों की आवाजें दोनों की बातों मे शामिल हो जाती।)

मिस्त्री, "ज़िन्दगी को मज़े से जीने के लिए जरुरत की हर चीज होनी चाहिये।"

गिरधर, "लेकिन जितनी जरुरत उतनी ही चीजें, इतनी जगह कहां से लाओगे?”

मिस्त्री थोड़ा सोच कर बोला, "कहीं से तो जुगाड़ होगा।"

गिरधर, जुगाड़ तो अच्छा शब्द है लेकिन?”

(वो रुक गया। मिस्री भी कुछ बोल नहीं पाया।)

"मैं अभी जल्दी मे हूँ" ये कह कर चौक पर बैठे लोगों के पास चला गया।

गिरधर, "इसके पास जवाब हासिल ही नहीं हुआ तो मुंह मोड़ कर चला गया।"

रमेश, "दादाजी मैं तो बस, इतना जानता हूँ की पैसा फैकों और तमाशा देखो।"

गिरधर, "सब एक-दूसरे की होड़ मे हैं। देखा-देखी बदल रहे हैं।"

रमेश, "दादाजी आप कोई रास्ता दिखाना चाहते हैं?”

गिरधर, "नहीं, मैं खुद रास्ता नहीं जानता। रास्ता दिखाना आसान है मगर उस पर चलना बहुत कठीन है। मैं तो तुम्हारी नज़र से ज़िन्दगी को देखने की कोशिश कर रहा हूँ पर कोई ढ़ग नहीं बना पा रहा हूँ।"

रमेश, "तो आप बिना सवाल किए दूसरों मे उतरते क्यों नहीं?”

गिरधर, "कैसे उतरू? कोई उतरने लायक रुप ही नहीं मिलता।"

रमेश, "रूप, कैसा रूप?”

गिरधर, "हमारे आसपास कई रूप हैं जिन्हे हम अपनी वाणी से पुकारते हैं और अपने लिए माहौल की तैयारी करते हैं।"

रमेश, "मतलब, मैं समझा नहीं?”

गिरधर, "अगर रास्ता साफ़ नहीं है तो दूसरा रास्ता ढूंड़ लेते हों। उस रास्ते को साफ़ करना ही तुम्हारे लिए काम का विषय होता है।लेकिन अक्सर इस प्रयास से लोग ड़र जाते हैं। जैसे, सड़क साफ़ करने वाला जमादार। क्योंकि समाज की सड़के बहुत मैली है तो इसे साफ़ करने वालो के हाथ तो मैले होगें ही। कहते है न की कोयले की दलाली मे हाथ तो काले होते ही हैं। इसलिए समाज मे अच्छे और बुरे काम मे ही संजोग बनाता है। कृष्ण भगवान ने धर्म को बचाने के लिए कितने ही छल और कपट किए मगर वो सब धर्म कि विजय के लिए थे। इसलिए उनका कोई ड़न्ड भगवान पर सिद्द नहीं होता। क्योंकि भगवान कृष्ण अपने बनाये सिद्दातों पर चलें।"

रमेश, "जो नहीं चले उनका क्या?”

गिरधर, "उन्हे भगवान ने मोक्ष दिया।"

रमेश, "इस का मतलब की आप भी मुझे मोक्ष दे रहे हैं?”

गिरधर, "नहीं मे मोक्ष पाने की रहा ढूंड़ रहा हूँ।"

रमेश, "क्या मोक्ष किराने कि दुकान पर मिलेगा?”

गिरधर, "नहीं।"

रमेश, "घर मे मिलेगा?”

गिरधर, "नहीं।"

रमेश, "बाजार मे मिलेग?”

गिरधर, "नहीं-नहीं करते ही मोक्ष मिलेगा।"

रमेश, "इस का क्या मतलब है? दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।"

गिरधर, "अगर किसी चीज को पाने के लिए उस से 'नहीं-नहीं' मिली करते हुए जिया जाए तो पता चलेगा की हम बार-बार कितनी बार और क्या पा चुकें हैं। जैसे सूरज एक जगह से निकलता है और चलते-चलते दूसरी दिशा मे छुप जाता है। हम भी उसी तरह से किसी की दुनिया मे जाकर मिल जाते हैं।"

राकेश

Saturday, October 18, 2008

मेले की विदाई

"आईये-आईये दस रुपया, दस रुपया, मजा उठाईये, दस रुपया, रुपया, जो देखे वो ललचाए, जो न देखे वो कंवारा रह जाए!”

इस ज़ुमले को सुनकर कुछ जानने की इच्छा हुई कि दस रुपये मे क्या देखने को मिलेगा। मैदान में लगे ऐसी कई आवाजें आ रही थी। एक आवाज के पीछे दूसरी आवाज़ फिर तीसरी आवाज़ फिर चौथी आवाज उसके बाद और भी। विराट सिनेमा के पिछवाड़े, हर साल लगने वाला दशहरे का मेला इस बार आखरी था। भीड़ मे तितर-बितर मेला देखने आए लोग शोरगुल मे भी मजा उठा रहे थे। सर्कस की रोनक, लोहे के झिलमिलाते झुले, जादू दिखाने का टेन्ट, गुब्बारों पर निशाना लगाते निशानची।

सब का बार भरपूर मज़ा उठाने के बाद हम थकावट दूर करने के लिए चाट पकोढ़ियों की फेरी पर गए। वहां से हो आने के बाद घरवाली ने और घूमने की इच्छा जताई पर मैं पैसों को भीच रहा था। इसलिए 'मुंड़ नहीं कर रहा' कह कर बहाने बनाने लगा।

लेकिन, किसी ने कहा है की "घरवाली से कभी बहस नहीं करनी चाहिये।" मैं उनकी ज़िद्द के आगे हल्का पड़ गया। सौ रुपये का नोट् मैंने जेब मे दबा रखा था। सोचा था की इसे घर बचा कर ले जाऊंगा। घरवाली को ये कह कर मैं शुरु से टाल रहा था की पांच सौ का नोट् है खुल्ले नहीं है। लेकिन घरवाली भी बहुत चन्ट-चालाक होती है। चेहरे को ऐसे पढ़ लेती है जैसे एक्स-रे मशीन। शरीर की हड्डियों की तस्वीर खींच लेती है।

खैर, मैंने सौ का नोट् झूठ बोलकर तुड़वा लिया और कम पैसे लगने वाली जगह ढुड़ने लगा। तरह-तरह के झूले और नौटकियाँ, मौत का कुआं, बंगाल का जादू हर तरह से मन बहलाने के कार्यक्रम मौज़ूद थे। नजरें सारे मेले मे अपना ठिकाना ढुंड़ रही थी। तभी चमचमाती रोशनी वाली एक बॉल के जैसी कोई चीज आसमान मे उड़ती दिखा दी।तो कोई रेड़ियम के हाथ मे पहनने वाले कड़े बेच रहा था। मेले के चारों तरफ जुगनुओं की तरह टिम-टिमाती लड़ियाँ लगी थी। जमीन पर पांव घिसडकर चलते लोग जिनके पांव से धूल उड़ रही थी।

मैंने घरवाली के लिए कम पैसे का एक बड़िया शो चुन लिया और न चाहते हुए भी झूठे मुंह से बड़ी-बड़ी बातें करके अन्दर जाने का टिकट ले लिया। वो मान नहीं रही थी पर मैं मनाने की पूरी कोशिश कर रहा था। "चलो नागिन का शो देखते है। कैसे लड़की नागिन बनती है?” घरवाली को लगा की मैं उनका मज़ाक उड़ा रहा हूँ। ऊपर से अभी तक ये आवाज आ रही थी। मंचान पर बैठा आदमी टेपरिकॉड़र के गाने को रोक कर अपना अलाऊस्मेन्ट करता। "अंगूर की बेटी हूँ, आईये-आईये दस रुपये में। सुई न चुबा देना, दस रुपिया-दस रुपिया चलिये-चलिये, लड़की इच्छाधारी नागिन बनेगी। आईये, दस रुपिये।" अंगुर की बेटी हुं । वो आदमी चिल्लाता रहा। और गाना बजता रहा।

जब मैं घरवाली को थोड़ा रेलिंग के पास ले गया तो हमने देखा की दो लड़कियाँ शरीर पर आधे कपड़े पहने विश्राम अवस्था मे खड़ी थी। उस के बदन पर फोक्स लाईट की रोशनी पड़ रही थी। जिससे उसकी गोरी चमड़ी चमक रही थी।
घरवाली ने अन्दर जाने के लिए मना कर दिया और कहा "देखो तो अन्दर गुन्डे बैठे हैं। ये सब लड़की को ताड़ने आये हैं, यहां से चलो।" पर मेरा मन भी हुआ की देखे तो सही की माज़रा क्या है?

कैसे भी कर के उन्हे मना कर अन्दर ले आया। हम सीट पर बैठ गए। मैं नज़रो को यहां-वहां घुमाकर किसी तरह घरवाली से बच कर सामने खड़ी लड़कियों को देखने की कोशिश कर रहा था।पर घरवाली कि निगाहें मुझ पर जमी थी। जब शोर बड़ने लगा तो वो परेशान होने लगी और झुंजला कर बोली, "कहां ले आये मुझ को, देखो कैसे बद्तमीज लोग हैं लड़कियो को देखकर कुत्तों की तरह मुंह फाड़ रहे हैं चलो यहां से।" पर मै जबरन उन्हे दक्षिण पुरी का हवाला देकर कहता रहा। "अरे ये तो शरीफ़ लोग हैं जादू देखने आए हैं। तुम खा म खा ही इनकी तहजीब पर उंगली कर रही हो।

मेरे बोलने की देर थी की किसी ने सारे करे कराये पर पानी फेर दिया। उन लड़कियों को देख कर कोई पीछे से बोला, "अरे नाचो-नाचो, बिल्लो नाचो, बिल्लो रानी।" कमबख़्तों ने घरवाली के आगे मेरी नाक कटवा दी। कितनी तरीफ़े मैंने की थी। सब झूठ धरा का धरा रह गया। वो बोली, "अच्छा सब शरीफ़ हैं देखा कितने भूखे हैं ये।" मैं उन्हे फुंसलाने लगा की वो मुझ पर नराज न हो। तुम कहीं ध्यान मत दो आराम से सामने देखो। पीछे से फिर आवाज आई, एक आदमी मुंह मे दस का नोट् लेकर बोला, "अरे नाच , नाच बिल्लो रानी।" घरवाली अपने आपको टेन्ट मे बैठै सारे मर्दो मे अकेली औरत समझ रही थी। पर मैं कह रहा था की तुम अकेली नहीं हो। पीछे बैठा आदमी हाथों से चुम्मा हवा मे उड़ा कर लड़कियों पर देकर मार रहा था।

जब वो कहता नाच बिल्लो रानी तभी अलाउस्मेन्ट हुई, "आईये नाग माता के दर्शन कीजिए" दो बार फिर तीन बार। ये सुन कर अन्दर बैठे अधिकत्तर लोग हंसने लगे। उसके मूंह का पानी उतर गया। लड़को की गिग्घी बंध गई। मगर बाहर का श़ौर रुक नहीं रहा था। ऐसा लग रहा था की इन्द्रधनूष जम़ी पर उतर आया हो।

राकेश

ये हक की पर्ची है

पर्चियाँ ही पर्चियाँ, जहां देखो पर्चियाँ ही पर्चियाँ।
कहीं राशन की है पर्ची तो कहीं तेल की पर्ची,
कहीं नम्बर लगाती है पर्ची तो कहीं इनाम पाती है पर्ची
मकान टुड़वाती है पर्ची तो कहीं मकान दिलवाती है पर्ची।

जहां देखो आज पर्ची का ख़ुमार है
आज लगा लोगों को पर्ची का बुखार है
फंसा है इसमे सब, वो शतरंज है पर्ची
टीवी, रेड़ियो भी बन गए हैं, मनोरंजन की पर्ची।


दक्षिण पुरी मे पर्चियाँ कटने का माहिना। बस, अब सुबह हो शाम पर्ची काटने वालो की लाइन लगी रहेगी जिसमे हर उम्र के लोग होगें।

आजकल दक्षिण पुरी मे बच्चो की रेज़गारी बहुत ज़्यादा है। जब देखो 10 से 15 बच्चे उतर आते हैं गलियों मे। उन 15 के 15 बच्चो मे जिसको थोड़ा लिखना आता है उसको पर्ची बनाने का काम सौंपा जाता है और जो जोड़ने मे दुरूस्त है उसको पैसे का कलैक्शन करने को दिया जाता है बाकि तो सारे भीड़ जमा करने के लिए चले आते हैं। जब तक दस का नोट न दे दो तब तक घर के आगे से टस से मस नहीं होते। "जय कारा" भरते रहते हैं, कभी श्री राम चन्द्र जी की जय तो कभी सीता माता की जय और थोड़ी सी देर मे ही इतना श़ौर मचा देगें की हार-थक कर या परेशान होकर कोई ना कोई अन्दर से पैसे लेकर आ ही जायेगा। एक बार तो देखा जाए ये सस्ते भी पड़ते हैं नहीं तो बड़ी उम्र के लोग तो 21 रुपये से कम मे नहीं मानते। वैसे कहते हैं कि आप अपनी श्रद्धा से जो देना चाहें दे सकते हैं और 5 का सिक्का दिखा दो तो ऐसा मूंह बनाते हैं कि पता नहीं क्या दिखा दिया हो। पर्चियों पर पहले से ही सबसे कम राशि 21 रुपये लिखकर रखते हैं बस, नाम लिखना बाकि रह जाता है। नाम लिखा और काम ख़त्म।

इन लोगों की मात्रा कम नहीं होती, ये भी 15 से 20 लोग होते हैं और 15 मीनट मे पूरी गली कवर करने की कोशिस करते हैं। लेकिन मौके पर इनमे से कोई भी नहीं दिखता। पता नहीं किस रॉल मे होते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जिसे हमने चढ़ावा दिया था क्या ये वही रामलीला है या वो लोग यहां के नहीं थे।

अब पहले जैसी बात भी नहीं रही। पूरी दक्षिण पुरी मे गिनी-चुनी 3 या 4 ही रामलीला होती थी। जिसे देखने के लिए लोग 8 बजे ही तैयार हो जाते। कोई चारपाई उठाकर चला आता तो कोई कुर्सी, और गली की औरतें तो हाथों मे घर की पायदान बनाई बोरी दबाती और रामलीला के स्टेज के बाहर कोई अच्छी सी जगह चुनकर बैठ जाती। जहां से साफ़ नज़र आता हो। अब, इन्हे यहां से तब तक कोई नहीं हिला सकता जब तक के रामलीला ख़त्म नहीं हो जाती।

रामलील के भीड़ वाले दिन जो कलोनियों मे बहुत फैमस होते थे। जिनमे दबाकर भीड़ होती और चढ़ावा भी बहुत आता। 4 या 5 दिन का खेल ही जबरदस्त होता। जिसमे बैठने, चलने व खड़े रहने वालो तक को अपने मन के मुताबिक जगह नहीं मिलती थी। लोग दीवारों पर चढ़कर देखा करते। पहला दिन होता- ताड़िका वद्ध, दूसरा दिन- सीता स्वम्बर, तीसरा दिन- सीता हरन और चौथा दिन होता- कुम्भकरन का जागना और फिर उसके साथ मे युद्ध के सीन। इनमे तो बे-इन्तिहा चढ़ावा आता। सीता स्वम्बर के दिन तो लोग कन्यादान तक बहुत देते और ताड़िका वद्ध के समय तो देखने आई पब्लिक को भी रामलीला के पात्रो मे शामिल कर लिया जाता। ये खेल किसी मदारी की तरह से होता या ये समझ लिजिये की कोई तमाशाही के जाल हम फंस गए है। जिसमे फंसने का लुफ्त हमेशा उठाया जाता है।

जैसे- मान लेते हैं, दृश्य तैयार है।

रामलीला के स्टेज मे गुप अंधेरा है। सिर्फ़ नीले रंग की रोशनी इधर से उधर घूम रही है। हल्का-हल्का धूंआ पूरे स्टेज मे उस रोशनी से खेल रहा है। कुछ भी देख पाना मुश्किल है। सभी लोग महसूस कर रहे हैं अपने साथ मे बैठे शख़्स को कि ये ही है ताड़िका। दो लोग काले रंग के तिरपाल का सूट पहने स्टेज पर दिखाई देते हैं मगर धूंए की मे गायब हो जाते हैं। ऐसा खेल दबाकर चलता रहता है। लोगों के अन्दर आने वाले दृश्य के लिए जगह बनाने के लिए। विराना और पुराना मन्दिर फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुत तेज आवाज मे चल रहा है। इतने मे किसी लड़की के चीखने की आवाज बहुत जोरों से आती है। लोग अपनी जगहों से उछल पड़ते हैं। लगातार तीन मीनट के इस अंधेरे मे सभी खोए हैं ये देखने की लालसा मे कि कुछ दिखे। सबकी निगाह स्टेज पर टीकी है।

स्टेज़ मे अब सफेद पर्दे के पीछे किसी के जाने की परछाई नज़र आती है। लोग उनके हाथों मे धनुष-बाण देखकर ये अन्दाजा लगा लेते हैं कि ये श्री राम हैं। मगर चीखती आवाजों मे ताड़िका का चेहरा नज़र नहीं आ रहा है। बस, सकबकाये से लोग अपने पीछे ही महसूस करते किसी को।

कोई माइक पर हर दम ये कहता रहता है, “वो देखिये आपके पीछे ही है वो डायन, जो रातों को आपके सपनो मे आती है और सदियों से ना जाने कितनो का खून पी चुकी है, वो रही आपके पीछे।"

सभी अपने पीछे देखकर हंसते रहते।

अब म्यूज़िक एक दम बन्द है, हर तरफ़ मे एक गहरी और ठहरी खामोशी छा गई है। इतने मे एक काले रंग की औरत काले रंग का बड़ा सा घाघरा और नीबूंओ की माला पहने स्टेज के अन्दर से बहुत तेजी से भागकर आती है और पब्लिक मे बैठे एक पतले-दुबले लड़के को उठा कर ले जाती है। रास्ते मे बैठे लोग तो डर कर भाग ही जाते हैं। स्टेज पर हल्की रोशनी छाई है। वो औरत उस उठाये लड़के के पेट को फाड़ती है और उसकी अंतड़ियों को खा जाती है। बाकि के बचे हुए इंसान को उस औरत के साथ मे नाच रहे छोटे शैतान खा जाते हैं।

एक बार फिर से सन्नाटा छा जाता है, सीन ख़त्म। अब वो दोबारा आयेगी तब तक वो पर्दे के पीछे से दिखते रामचन्द्र जी सामने आ जायेगें।

बस, इस रात उस डर से मिलने हर कोई चला आता। इतने लोग देखने को मिलते थे ऐसा लगता था कि पूरी दक्षिण पुरी यहीं पर उतर आई हो। हर कोई लुफ्त का अहसास करता था। वाह!-वाह! मगर, क्या करें ये सब अब यादें बनकर रह गई हैं। इसे बार-बार दोहराने से क्या होगा? ये याद कोई रावण का पुतला तो नहीं है कि उसे हर साल एक बड़े से मैदान मे हजारों लोगों के सामने फूंका जाए। या ये वो भी नहीं है कि घर के बड़े अपने बच्चो को कांधो पर बैठाए याद के होते टूकड़ों को दिखाने चले आए। ये तो सूखी है, जो कभी-कभी अपने मन के मुताबिक हवा पाने पर उड़ती हुई आँखों के आगे उतर आती है। पल भर के लिए दिखती है उसके बाद मे कहीं सिमट जाती है। वैसे ही जैसे आज के वक़्त मे ये लुफ्त कहीं सिमट गया है।

दरवाजे पर जोरों से ठक-ठक हुई और उसके साथ मे एक भारी सी आवाज भी।
"हां रे भाई, बाहर आईयों, भगवान ने याद किया है।"

बहुत अजीब शब्द थे, लेकिन कोई बाहर नहीं आया बस, एक आवाज आई।
"ओ भईया कोई नहीं है यहां, आगे जाओ।"

"अरे ओ मेडम हम बिखारी है के, भले काम से आए हैं यहां। जो भी कहना है नीचे आकर कहो।"

नीचे दो लड़के खड़े थे, बड़ी-बड़ी मूंछे और कठ-काठी एक दम रावण के जैसी, वैसे यहां इन साहब को रावण के नाम से ही जाना व पूकारा जाता है। रामलीला के दिन शुरू हुए नहीं कि ये अपनी दाढ़ी को बढ़ाना शुरू कर देते हैं। ताकि रामलीला के दिनों तक रावण की मूंछे असली की मूंछे बन जाए।

वो नीचे उतर आई और कहने लगी, “भईया अभी यहां कोई है तो नहीं तो पर्ची तो हम नहीं कटवा सकते।"

"बहन जी ये तो कोई बात नहीं हुई, भगवान के नाम पर तो देना ही चाहिये ना, साल मे एक बार तो आते हैं।"

"वो तो ठीक है भईया, मगर क्या करें? घर मे कोई भी नहीं है।"

"हमें घर मे कोई हो या ना हो क्या लेना, चल रे भाई तू बना 101 रूपये की पर्ची।"

"अरे भईया, सुनते क्यों नहीं है आप मैं नहीं दे पाउगीं।"

रावण साहब अब अपने अन्दाज मे आने लगे, बिना कला देखे ये अन्दाजा नहीं होगा की रामलीला मे क्या होगा? वो अपनी मूंछो पर ताव कसते तो कभी अपनी पट पर हाथ मारते, “जय शंकर की" हम पिछले सात सालो से रामलीला कर रहे हैं आप लोगों के लिए। मगर, हर बार हमें ऐसे ही कहा जाता है, ये तो कोई बात नहीं हुई। हर बार रामलीला के बारे मे केबल टीवी पर सीधा प्रशारण करवाते हैं, बड़े-बड़े नेताओ को बुलवाते हैं, ताकि उनको भी पता चले की यहां पर लोग अब भी बीते समय को मानते हैं। उसके बाद भी हम 51 रुपये के हकदार नहीं है। ला भाई ला 51 रुपये की पर्ची काट।"

"भईया हम वहीं पर आकर आरती मे चढ़ा आयेगें। हम तो हर बार देखने के लिए आते हैं, हर बार चढ़ाते हैं।"

"वो तो आपकी श्रद्धा है बहन जी, भगवान से कुछ मांगोगे तो आपको ही फल मिलेगा। हम तो कला के पुजारी है, कला के लिए क्या-क्या नहीं करते। दक्षिण पुरी मे नाचने वाले और गीतकारों को हम लाते हैं और तो और हम तो नेताओ को इसलिए भी बुलाते हैं कि उनके आगे आप लोग अपनी बात रख सकों। ये ही तो मौका होता है। "जय शंकर की" चलिए कलाकारों के नाम पर 21 रुपये तो दिजिये।"

"हमने सारी रामलीलाए देखी हैं, कोई भी रामलीला दस बजे से पहले शुरू ही नहीं होती इसलिए पर्ची कटवाने का कोई फायदा ही नहीं होता। आरती तक के दर्शन तो नहीं हो पाते। पहले तो आठ बजे शुरू हो जाता करती थी। अब तो दस के बाद होती है।"

"कहां से शुरू होगी आप ही बताइये, साढ़े दस बजे से तो लोग आना शुरू होते हैं। तब कहीं जाकर ग्यारह बजे भीड़ होती है। साढ़े आठ बजे से लोग नाटको मे ऐसे घुस जाते हैं कि उन्हे ये तक याद नहीं रहता कि कहीं कोई प्रोग्राम भी हो रहा है। हम लोग आप लोगो के लिए तो रामलीला करते हैं जब कोई आयेगा ही नहीं तो कहां से रामलीला शुरू करेगें हम। कभी-कभी तो हम ही लाइट कटवाते हैं ताकि कोई आए तो सही।"

"भईया जब कोई आता नहीं है तो क्यों करते हो आप रामलीला? मत करों, अब लोगों को टाइम कहां है? काम पर से रात मे आते हैं, खाना खाते हैं और बिस्तर पकड़ लेते हैं। काम मे निचौड़ देते हैं।"

"बहन जी, रामलीला मे जो कलाकार हैं वो भी तो नौकरी करते हैं, काम पर से आने के बाद मे आप लोगों के लिए एक जगह बनाते हैं। उनका क्या शौक है भला बताइये आप? सबके सब बीवी-बच्चो वाले हैं। उनमे बस, कोई चीज बाकि रह गई है जिसे वो दिखाना चाहते हैं। अब आप लोग देखने नहीं आयेगें तो वो भी अपने-अपने परिवार मे घुस जायेगें। काम ख़त्म। चलिये बहन जी, जय शंकर की बोलिए और 21 रुपये की पर्ची कटवा लिजिये।"

"तुम भी तो आधे से ज़्यादा तो डांस दिखाते रहते हैं, रामलीला तो खाली नाम की रह गई है अब तो।"

"ऐसी बात मत किजिये बहन जी, उसी की वज़ह से तो भीड़ रहती है। लोग तो वो डांस देखने ही तो आते हैं। कोई इसलिए आता है कि उसके घर का कोई डांस कर रहा है तो कोई इसलिए आता है कि रामलीला मे मैं भी अगली बार मे डांस करूगां। आपको मालूम है कि लोग रामलीला से पहले ही नाम देकर चले जाते हैं डांस करने का। जल्दी जाइये बहन जी, 21 रुपये लेकर आईये। अभी तो कई घरों मे जाना है।"

"कहां जाना है भाई, सारी गली तो यहीं पर जमा है। यहीं मागं ले लो आप सभी से।"

"जय शंकर की, लाइये सभी यहीं दे-दो और हां रामलीला मे आप सबका आना जरूरी है। अगर नहीं आए तो अगली बार से ये होगी भी नहीं।"


लाइन मे लगे हैं लोग हाथ मे लिए पर्ची,
स्कूल मे भी मिलती है दाखिले की पर्ची
कहते हैं, भगवान दूर नहीं है इसी जीवन मे सभी को हिसाब मिलता है
उसी भगवान के घर मे आज, पर्चियों से उसका प्रसाद मिलता है।

हाथों से छूट जाए तो अन्जान है पर्ची,
आदमी से पहले उसकी पहचान है पर्ची
किसी एक की ही नहीं, सब की है ये पर्ची
कोई भी घर के सामने आकर कहता है,
हमारे हक की है ये पर्ची।


लख्मी

शहर एक माशूका की तरह हैं

इतना मुझे बता दो क्या ज़िन्दगी यही है,
सपने तो सारे टूटे, आरमां कोई नहीं है।
इतना तो मुझे बता दो क्या ज़िन्दगी यही है॥

कहता भी क्या किसी से, अपने मैं दिल की बातें,
तनहाई में कटी हैं खुशियों कि सारी रातें।
धड़कन है मेरी रूठी, ख्याबों मे जा बसी है,
सपने तो सारे टूटे, आरमां कोई नहीं है॥

मैं एक ऐसे शख़्स के बारे मे कहने जा रहा हूँ जो अपने रोज के ख़्यालों में व्यस्त अपनी प्रतिक्रियाओ मे अपनी आपबीति, दूसरो के बीच से साझेदारी मे और सामने से गुजरतें जीवन को अपने एक अंदाज जीते हैं। सरगमों और धुनो को गुनगुनाते हुए दोस्तों के हसीं माहौलों मे ये जिससे भी मिलते है वो और हसीन हो जाता है।

पिछले कुछ महिनों की मुलाकातों मे हमने उन के कई अहसासों और तर्जूबो को साथ-साथ बांटा है। अपने और उनकी बातचीत मे रिश्ते को पुख़्ता सतह तैय्यार करते हुए उनके साथ बिताए समय की कुछ टुकड़ियां आप को सुना रहा हूँ।

उनकी एक दूकान है जो दक्षिणपुरी जे-ब्लॉक के बाहर सड़क से सटी हुई है। इस दूकान मे वो स्टेशनरी की दूकान के साथ मे ऑडियो कैसेट और सीडी भी बेच लिया करते हैं। ये कुछ काम है इनके पर इस के साथ मे उनका चिन्तन-मनन भी। जिसमे ये मानते है की "ये मेरे लिए बस, इतना ही काफ़ी है। जो मै अपने जीवन को कहीं पनपता देखता हूँ। अपनी यादों की तरह-तरह की रचनायें करता रहता हूँ।"

इनका नाम है प्रमोद, लेकिन दोस्तों के छोटे-बड़े गुटों मे इन्हे एक ख़ास नाम मिला है "राज", उन्हें अपना चहेता मानने वाले इसी सुंदर नाम से पुकारते हैं।


कितनी हंसीन रात थी वो, जब इकरार किया था तुमने,
ना जाने क्या ख़ता हूई, जो इंकार भी किया तुमने।
बहते हैं अब तो आंसू, जैसे सावन की झड़ी है,
सपने तो सारे टूटे, आरमां कोई नहीं है॥

दिन को समझ खिलौना, ये खेल तुमने खेला,
दूनिया मे कम नहीं है आशिकों का मेला।
बने क्यों तुम सितमगर, मुझमे क्या कमी है,
सपने तो सारे टूटे, आरमां कोई नहीं है॥


ये नाम उनकी ज़िन्दगी की धुंधली और झिल-मिलाती पेशकशों का चेहरा सामने दिखलाता है। कविताओ और नये-नये गानो की रचनाए करना उन्हे बेहद पसंद है। घर परिवार की जिम्मेदारी सिर पर होने के बाद वो इस तरह अपने ख़ालीपन को शब्दों की चन्द कतार से अहसास की लड़िया बनाकर किसी भटक जाने वाली जगह मे अपना आंगन सजाएं हुए रहते हैं।

शरीर से लम्बे चौड़े और तगड़े हैं। सांवला चेहरा और गाल भरे हुए हैं और आंखे सुरमई है। जब प्रमोद राज कोई गाना या कविता गा कर हमें सुनाकर थोड़ा मुस्कुराते हैं तो उनके दिल की ग़हराई का अहसास पूरे चेहरे पर उतर आता है। बचपन से ही स्कूल पढ़ते-पढ़ते उन्हे इस तरह लिखने की जिज्ञासा कैसे पैदा हुई इसका वो अभी भी वर्णन नहीं कर पाते हैं लेकिन एक शुरुआत होने के बाद जब उन्होने अपने छोटे-छोटे नज़दीकी बदलावो को सुनना शुरु किया तो उनकी लेखिनी ने करवट बदली। अपने को छूते हर अहसास को एक रूप देने की कोशिस करते हुए वो जीवन में आती रुकावटों और आगे बड़ने की सिमाओ के बारे मे, अपनी झुंझती समझ को लिखते गए। ये दौर रुका नहीं बल्कि और ग़हरा और ग़हरा होता गया। अपने जीवन से टकराते पहलुओ से झुंझकर समझने और उनके आकार को ग़हरा करते हुए आज उनकी उम्र 40-45 साल हो गई है। जीवन मे रहन-सहन और काम की ज़रूरत को भली-भांति समझते हुए प्रमोद राज ने कई मंचो पर अपनी प्रतिभाओ को आज़माया है। जैसे, किताबो के दफ़तरो मे, नाटको को लिखने मे, किसी अख़बार या मैग्जीन के लिए और प्रकाशनो के बारे मे पढ़ कर उन से पत्रो द्वारा संवाद किया है। कभी मुलाकातों के इस सिलसिले के दौरान अपनी ज़िन्दगी का बख़ान कर दिया करते हैं। वरना उनकी रचनाओं मे हमेशा खुद के बिना किसी दूसरी छवी का ही दर्शण मिलता है। दूर किसी वक़्त की छलकती बूदों से बनी कम्पन्न की तस्वीर का या टपटपाती बूंदो का चित्रण नज़र मे आता है। वो दूसरे कंहकारो को खुद से ज़्यादा इज्जत बख़्शते है। उनकी लिखी डायरी मे कई नामी कहंकारो की रचनाए लिखी हैं। वो कहते हैं कि दर्द और नर्म अहसासो को बयां करने वाला एक शायर है अताउल्लाह खान है। जो उन्हे बेहद पंसद है।

जहां हमेशा ये सवाल समाजिक ज़िन्दगी से आता था कि घर के माहोल मे वो छुपा रूप है जहां पर बौद्धिक जीवन अपना दम तौड़ देता है वहीं पर उनका रूटीन एक आम दिनचर्या जैसा ही होता है। जिसमे वो लोगों को कहते हैं, "आम ज़िन्दगी मे हमें बहुत सी चीजें रटी-रटाई होती हैं। हर शख़्स जिसे दोहराता है। उसे बड़ा रूप स्थल दिखता है। बाहर की आँखों से देखते हुए वो जीवन मे अपना एक स्थल बनाये हैं। अपने समूचे वातावरण के अनुभव से जार्गित होकर जीवन की घटनाओ व अवसरो और इत्तेफ़ाको को एक वास्तविक रूप देकर अपनी रचना को लिख डालते हैं।

जब हम उनके पास घण्टो बैठे उन्हे सुना करते हैं तो उनकी आँखों मे एक अजीब सी कशिश पैदा हो जाती है। वो उसे मुस्कुराके हम पर जाहिर कर देते हैं। कभी-कभी मुलाकातों के बीच प्रमोद राज के संगी साथी भी आ जाया करते हैं। जो उन की ही तरह महफ़िलो मे मस्गुल होते हैं। उनकी लिखी बातें, इश्क, वैराग्य व दीवाने मस्तकलांदरों पर भी वो खूब रोशनी डालती हैं। अभी हम इस मुलाकत को और ग़हरा करने मे हैं।


इतना मुझे बता दो, क्या ज़िन्दगी यही है,
सपने तो सारे टूटे, आरमां कोई नहीं है।
रब से दुआ है मेरी, हर घड़ी हंसी हो तेरी,
हमारा क्या है संगदिल, अब तनहाई मन्जिल हमारी।
'राज' निकली दुआयें दिल से, बद़्दुआ कुछ नहीं है,
सपने तो सारे टूटे, आरमां कोई नहीं है॥

प्रमोद राज,
दिनॉक- 25/07/2008
समय- रात के 11 बजे

उनकी डायरी से, कुछ शब्द। उनकी कई रचनाओं मे उनसे हुई कई ऐसी मुलाकातों का जिक्र है जो उनकी दुकान, घर, रास्ते या सड़क के किनारों पर मिले कई अन्जान लोगों से हुई है।

राकेश

हवादार मण्डलियां

रामेश्वर जी के घर लौटने का हमेशा इन्तजार किया जाता। जब तक वे घर पर नहीं लौटते उनके घर मे कोई भी काम शुरू नहीं होता। ना तो चूल्हा जलता और ना ही किसी भी किस्म की कुछ बनाने की प्रक्रिया चल रही होती मगर, उनका घर लौटने से पहले एक बार अपनी मण्डली मे हाजरी लगाना जरूरी होता। उसमे सबसे पहले ये देखा जाता की कितना नेक आया है वैसे तो जो जाता था वो नेक उसी का होता लेकिन उसके बावजूद जहां गए थे वहां के मुखिया का नाम व घर का पता लिखा जाता और ये भी देखा जाता की वहां से कितना नेक आया है ताकि कोई दूसरा उस घर ना चला जाए और ये भी कि यहां से इतना मिल गया है तो अगले घर से कितने की उम्मीद रखी जा सकती है।

एक छोटी सी बस्ती के एक पुराने पार्क मे बनी एक तिरपालो की झुग्गी, जिसमे ना जाने कितने तरह के माहौल बनते व बनाये जाते। आज बहुत तेज बारिश है और कहीं से भी पानी का रूकना ना मुमकिन है। रामेश्वर जी कितनी भी कोशिस करें मगर पानी का अन्दर आना तो तय है। उनकी बीवी बेइन्तहा कोशिस करती पर पानी को रोकना उनके बस का नहीं था। पूरा पार्क पानी से बह रहा था। इक्का-दूक्का लोग नज़र आते तो वो भी बौछारों और हवा मे उड़ती मिट्टी की धूंधली परत के पीछे गायब हो जाते। उन्होनें झुग्गी के ऊपर हर तरह से तिरपाल को बिछाने की कोशिस करली थी। बस, वे चाहते थे कि जहां पर खाना बन रहा है वहां पर पानी ना आए बस, उसी को सही करने मे लगे रहे, पूरा नहा चुके थे। उनकी बीवी ने छाता स्टोव के ऊपर खोला हुआ था। स्टोव कि आग मे अब वे गर्मी नहीं थी जो एक ही बार मे रोटी को सेक दे। पानी मे उनकी बीवी पूरी भीग चुकी थी। बस, रह गया था तो खाली वो स्टोव और उसपर सिकती रोटी। कभी-कभी तो पानी की कोई ना कोई बून्द जैसे ही गर्म तवे पर गिरती तो उसकी आवाज उनके छाते मे घूम जाती। बून्दे गर्म तवे के साथ मस्ती कर रही थी। स्टोव के नीचे से अब पानी बहना शुरू हो चुका था। रामेश्वर जी ने अब कुछ भी करना बन्द कर दिया था। उनकी बीवी ने भी छ: रोटियां सेकी और स्टोव को बन्द कर दिया। अब वे भी बाहर आकर बारिस मे नहाने लगी थी।

यहां पर बिना किसी की इजाजत लिए इन्हे इस पार्क मे बसें अभी लगभग तीन साल ही हुए हैं। अभी छ: महिने पहले तो किसी को पता भी नहीं था की ये कौन हैं और कहां से आए हैं? रामेश्वर जी जब लोगों के घर मे नेक मांगने के लिए जाते हैं तो बिलकुल भी पहचानने मे नहीं आते। सभी के दिमाग मे ये रहता है कि ये कहां पर रहते हैं? मगर, इस12 गज़ की झोंपड़ी मे ना जाने कितने मौकों व अवसरों को बातों मे लाया जाता है वो कोई नहीं जानता। यहां दुआयें समेटी जाती हैं।

झोंपड़ी मे और कोई नहीं था। बारिश भी आज रूकेगी नहीं ये मानकर रामेश्वर जी ने अपनी जैब से एक पन्नी निकाली जिसमे पैसे लपेटे हुए थे। उन्होनें वो पन्नी अपनी बीवी के हाथों मे दी और कहा की ये कहीं हिफाजत से रख दे। आजकल नेक की कमी नहीं है शादियां ही शादियां हो रही हैं। कल मुझे दो और घरों मे जाना है कल भी मेरे साथ मे विनोद जायेगा। उनकी बीवी ने स्टोव से छाता उठाया और झोंपड़ी के अन्दर दाखिल हुई और उस पन्नी को कहीं रखकर तुरंत बाहर आ गई। अंधेरा हो चुका था तो बारिश की बून्दो को देखा नहीं जा सकता था मगर, उनकी स्पीड़ को महसूस किया जा सकता था। उनकी बीवी की कपकपाहट से और अब तो रामेशवर जी भी झन्ना रहे थे। लेकिन अन्दर जाकर भी होगा क्या? इससे अच्छा है कि भीग ही लिया जाए। वो वहीं झोंपड़ी के एक किनारे पर बैठ गए। बारिश हल्की होने लगी थी। झोंपड़ी तो पूरी तर हो चुकी थी। पानी की लम्बी-लम्बी धारा उनकी खाट के नीचे से बह रही थी। रोटियों को उनकी बीवी ने कटोरदान मे लपेट कर रख दिया था पर उनकी नज़र उन्ही पर थी। जहां पर वो खड़े थे वहां से पानी बहुत तेजी से निकल रहा था जिससे वे अन्दाजा लगा रहे थे कि बारिश की क्या स्पीड़ है।

उनकी झोंपड़ी के साथ मे ही एक बड़ा सा बरगध का पैड़ है, जहां पर अक्सर बस्ती के बड़े बुज़ुर्ग बैठकर बातें किया करते हैं। उस पैड़ के नीचे एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। जहां से हमेशा तेज आवाज़ो का काफिला आता रहता है। अभी पिछले ही दिन, रामेश्वर जी ने वहां पर एक झूला डालने के लिए जैसे ही रस्सी डाली तो वहां के कुछ लोगों ने मना कर दिया। वो इसलिए कि एक वही जगह है जहां पर वे बुज़ुर्ग बैठ सकते हैं या बैठ जाते हैं नहीं तो हर जगह पर किसी ना किसी का कब़्जा ही रहता है, बस्ती के अन्दर के कई पार्क तो उनके पास रहने वाले लोगों ने ही ज़प्त कर लिए हैं इसलिये बैठने की जगह मिलना बहुत मुश्किल हो गया है। वो पैड़ हवा के बड़े और तेज झौकों से आज खुद ही झूल रहा था। जिसे रोकने वाला आज कोई नहीं था, ना तो कोई आवाज़ थी और ना कोई मानस, वे अकेला ही हवा के मज़े ले रहा था। रामेश्वर जी ने वहीं पर बैठने का इरादा किया। उनकी बीवी ने फटाक से झोंपडी के ऊपर पड़ा एक कपड़े का टुकड़ा नीचे धकेला और उनके साथ मे वहां आकर खड़ी हो गई।
रामेश्वर जी पैड़ के ऊपर देखते हुए बोले, "यहां पर तो बारिश ही नहीं है। मगर, फिर भी चबूतरा पूरा भीगा हुआ है।"

चौगड़ी मार कर उन्होनें वहां पर अपने आप को छोड़ दिया। थकावट से भर शरीर बैठने को जैसे तरस रहा था। बस, दोनों वहां पर बैठे अपने घर को देखने लगे।

अपने मुंह से पानी को पौछते हुए रामेश्वर जी बोले, “आज हम जिसके घर मे गए थे वहां पर लड़की की शादी थी। बाप ने बेटी को विदा किया ही था की हम पंहूच गए। पूरी आँखे लाल हो रखी थी उनकी, ऐसा लग रहा था जैसे बहुत रोये होगें वो। ज़्यादा बड़ा घर नहीं था उनका, छोटा सा ही था। दरवाजे पर एक स्वागतम का पोस्टर लगा था और बहुत सारी चूड़िया टंगी थी। उनका दरवाजा बहुत छोटा था लग रहा था जैसे वो दरवाजा अलग से लगवाया हो, अभी हाल ही में। बहुत कम लोग थे उनके यहां लगता था जैसे सारे जा चुके थे, पता है विनोद ने वहां जाते ही नाटक शुरू कर दिया, पहले तो मुझे लगा कि वो उन्हे डरा देगा मगर, जिस बात का मुझे डर था वही उसने किया। उनको डरा दिया, जैसे ही हमने उन्हे 3000 रूपये का बकाया बताया तो वो वहीं कुर्सी पर बैठ गए, ऐसा लग रहा था कि शायद कुछ हुआ है पर हम पुछ भी नहीं सकते थे। हमने उनके हाथ मे जैसे ही वो बकाया वाला रजिस्टर दिया तो उन्होनें देखा नहीं बस, वो हमारी तरफ़ देखते रहे। उन्होनें हम दोनों को वहीं पर कुर्सी लगाकर बैठने को कहा और अन्दर चले गए। पहले तो विनोद बोला, “देख बेटा कितनी जल्दी हो गया अपना काम" मगर मेरे मन मे कुछ आ नहीं रहा था। फिर सोचा कि चलो अच्छा है हो गया काम तो बस, किसी का मन ना दुखे। वो जल्दी ही बाहर आ गए थे, पता है रेश्मा कि वो क्या लेकर आए थे अपने हाथ मे? दो थालियों मे चावल, दाल, मठ्ठी, मिठाई और कपड़ा। उन्होनें ये सब हमारे हाथ मे देते हुए कहा, “मेरे पास इसके अवाला कुछ भी नहीं है देने के लिए।" जब उन्होनें ये कहा ना रेश्मा तो दिल मे पता नहीं क्या हुआ विनोद खुद मुझसे बोला कि रामेश्वर चल यहां से इससे ज़्यादा और क्या मिल सकता है हमें, एक तरफ़ मे ये हो रहा था और दूसरी तरफ़ मे बड़ी जोरो से डांस चल रहा था, काफी सारी औरतें नाच रही थी, वहां पर एक दम से काफी सारी भीड़ आने लगी। पहले तो लगा की ये कोई और हैं मगर, वो तो इसी घर के लोग थे। उन्होनें हमारे करीब मे आकर ही नाचना शुरू कर दिया। मैं तो उन भाईसाहब के साथ बात करने मे लग गया और विनोद भाई साहब तो वहां नाचने के लिए चले गए। अरे, क्या टॉपक्लास नाचता है विनोद तो, एकदम धांसू। वहां तो सभी उसका डांस देखकर खुश हो गए, वो लगभग दस मीनट तक नाचा होगा। वहां सभी पुछने लगे कि ये कौन है? कोई कहता कि ये लड़की के मामा का दोस्त है, कोई कहता की ये अलीगढ़ वाला है तो कोई कुछ और कहता, मगर हम तो कोई और ही थे।"

उनकी बीवी तो कपकपा रही थी। लेकिन रामेश्वर जी तो आराम से बैठे थे, दिन भर कि गर्मी को पानी देने मे आराम मिल रहा था। उन्होनें अपने पैर ऊपर कर लिए, पानी जमा होने लगा था, बल्ब की कम रोशनी मे पूरा पार्क चमक रहा था। हवा काफी जोरो पर थी और उसके साथ मे काफी ठंड भी। वो अपनी वर्दी की तरफ़ देखते हुए बोले, “क्या ये कल शाम तक सूख जायेगी? कल जाना है मुझे एक और घर और हां वो मशालदानी मे हल्दी और केशर डाल दियो ख़त्म हो गई है। आज टीका बनाने मे कम पड़ गई थी।"

उनकी बीवी ने हां मे गर्दन हिलाई और अपने दोनों हाथो को अपने मे समेटते हुए रामेश्वर जी को देखने लगी। वो उठ कर गए और बाहर रखे छाते को उठाकर ले आए, उसे अपनी बीवी के हाथों मे पकड़ाते हुए कहने लगे, “क्या तू कभी, वो 19 नम्बर की झुग्गियों मे गई है? आज हम वहां पर भी गए थे। अरे, रेश्मा का भीड़ थी वहां पर तो दबाकर, वहां घुसते ही खाली सिर ही सिर नज़र आ रहे थे ऐसा लग रहा था कि उस भीड़ के आगे जरूर कुछ हो रहा है मगर क्या ये पता नहीं चल रहा था। पहले तो लगा कि ये वही घर है जहां से हमे नेक लेना है लेकिन ये वो नहीं था। वहां पर तो कुछ और ही चक्कर था। एक पलते, सूखे से आदमी ने अपने हाथो मे एक बड़ी भारी सी सिल्ली उठाई हुई थी और गालियां बकता हुआ कह रहा था कि "मन्ने यो पूरी जमीन चाहिये, नहीं तो आज मैं यहीं पर ठेर हो जाऊगां।" पता नहीं भाईया क्या माज़रा था और बहुत जोर-जोर से उस सिल्ली को उस पक्की दीवार मे मार रहा था। विनोद ने मुझसे कहा कि बेटा निकलले यहां से नहीं तो खमखमका के चक्कर मे पड़ जायेगें। वो पता नही किस चक्कर मे फंसने की बात कर रहा था। मगर, वो बन्दा निकलने भी तो नहीं दे रहा था, रास्ते मे खड़ा था। बाद मे वहां पर खड़े लोगों से पता चला की जहां पर वो पक्की सी दीवार बनी है वहां पर पहले वो बन्दा रहता था, एक झुग्गी थी उसकी। कुछ टाइम के लिए वो कहीं चला गया होगा तो वहां कि थोड़ी सी जमीन किसी ने ज़प्त करली, अब ये आया तो यहां पर उसका कुछ भी नहीं था तो बस, तभी ये रगड़ा हो रखा था। थोड़ी आगे की तरफ़ मे जब हम उस घर के सामने गए जहां पर शादी थी वहां का तो माहौल ही गज़ब था, काफी भीड़ थी, वहां पर भी खाली सिर ही सिर नज़र आ रहे थे, उस भीड़ के आगे लगभग आठ लोग थे, पांच आदमी और तीन औरतें। दो आदमी जमीन पर लेटकर नाच रहे थे, एक सांप की तरह। कभी नाली मे घुसते तो कभी बाहर ही मचलते रहते। पता है गाना भी तो वो ही चल रहा था। कोई कील सपेरा ले डुगा, ते नाग बाधंले जुल्फा के। बस, सभी वहां पर नाग ही थे। दो औरतें तो लम्बा सा घूंघट करके बस, अपने पेट को निकालकर दबाकर नाच रही थी, बाकि के तीनो आदमी उनसे कभी तो बहस करते तो कभी उनसे दूर हो जाते। मगर वो औरतें जैसे हारने वाली नहीं थी वो तो गाने मे खो चुकी थी, नाचती हुई कभी तो उन लेटकर नाचते आदमियों के ऊपर गिर जाती तो कभी खड़ी होकर अपने मे खो जाती। दो लोग एक छोटे से दरवाजे के अन्दर ही चालू थे। उन्हे बाहर वालो से कोई मतलब नहीं था बस, मग्न थे। मैं और विनोद तो ये देखने मे लगे थे कि यहां का मुखिया कौन है जिससे बात कि जाए पर पता चले तब तो करें बात, अभी तो सभी खोये हुए थे। काफी देर तक हम खड़े रहे। लगभग 15 मीनट खड़े रहने के बाद मे एक आदमी से मुलाकात हुई तब पता चला की यहां का जो मुखिया था वो दूसरे घर गया हुआ है, तो वो कल आयेगा। विनोद तो कह रहा था कि चल यहां से मगर, मैं ही मना कर रहा था। सोच रहा था यहां आए हैं तो कुछ लेकर ही जाए लेकिन वो हो ना सका। उसके बावज़ूद भी मन खुश हो गया वहां लोगों का डांस देखकर। सारे के सारे बावले हो रखे थे।"

इतने मे काफी जोरो से ढोल की आवाजें आने लगी, रामेश्वर जी बोले, “इतनी बारिश मे कौन है जो झुम रहा है? चलो अच्छा है हमारे लिए कोई और भी तैयार हो गया।"
उनकी ये बात सुनकर, उनकी बीवी बोली, “बारिश तो कब की बन्द हो गई, तुम्हे कुछ होश भी है?”

पानी को सकेरना शुरू हो चुका था, उनकी बीवी ने झाडू उठाई और पानी को सकेरने लगी। मिट्टी की महक से पूरी झोंपड़ी महक रही थी। खाट को बाहर करके रामेश्वर जी ने रोटियों को खोलकर रख दिया, बाहर खम्बे से जाते तार पर एक अपना तार डाला और अपने घर मे बल्ब जला दिया, पार्क मे तो स्ट्रीट लेम्प से खूब रोशनी हो रखी थी। बाहर रखे ड्राम से एक बाल्टी पानी निकाला और अपने ऊपर डाल कर तैयार हो गए खाने के लिए।


लख्मी

Monday, October 13, 2008

कुछ बे-सुरे राग

"लोग जैसे दिखते है वैसे होते नहीं"

ये बोल किसी की बनावटों पर अलोचनात्मक छवी दर्शाने के लिए नहीं है। सबका अन्दाज एक अलग तरह का रूप उभारता है। इंसान अपने निश्न्चित जीवन के आगे भी सोचता है। धरती पर पड़ने वाली धूप अपने साथ परछाई लेकर नहीं आती उसे कहीं चीजों का सहारा चाहिये होता है। तभी एक छवि बनती है। हम इसी तरह की खोज़ मे अपने विचारों मे फंसे, माहौल के अनुकूल वातावरण से मुक़्ति पाने की कोशिशो मे लगे रहते हैं। जहां अपने आप को चंद चीजों या जगह से जोड़कर अपने अतीत से अपने आज की भूमिका को काल्पनिक आँख बीच की (आँख) से देखकर सच को उतारने की कोशिश करतें है। ताकी वो कही खो न जाए। उस की रचना मे कुछ भ्रंम की तस्वीरें भी पैदा होने लगती हैं। जो खुली आँखो से दिखता है और बन्द आँखो से भी दिखता है।

जैसे, मोबाईल फोन से हो रही बातों के मुताबिक जो दिशा मे हम चले जाते हैं। जिस मे हमें लगता है की संकेत मिल रहे है और उन के ज़रिये हम जगहों-संभावनाओ को सोच रहे हैं।

ये ही संकेत एक-दूसरे पर मन के भाव प्रकट करते हैं जिससे शायद किसी के होने या आने वाले जीवन की रूपरेखा बनती है। अपने मन के विचारों के मंथनो से समाज मे इंसान साधनो और क्रियाकल्पो के नये और अनंत सुक्षमताओ को सींचता है। इस उम्मीद से की बड़े आकार और परछाईयों में जी सकें। मगर छांव पाने की जिज्ञासाए कहीं दूर ले जाती है।

सामाजिक ढांचा जो जमा या बना हुआ है। जिसमे सब जीवन यापन करते हैं ये कहां से शुरू हुआ? और कहां पर ख़त्म है? इसका कोई पता नहीं है शायद। लेकिन अंकुरित हो रहे जीवन की चमक अधेरों के दरवाजो पर ठक-ठक करती हैं। फिर इन गहरे अन्धेरों मे हाथ पकड़ कर भटकाने वाली लालसाए कहीं और नहीं देखने देती।
ये कौन हैं? जिनके साथ भटकने के बाद अपना पता नहीं मिलता। शायद इसलिये, हम सबसे पहले अपने मन में झाँक कर देखते है। ताकी अपने अन्दर और बाहर का संतुलन बना सकें और मौज़ूदगी से एक सम्पर्क बना सकें।
इसलिये, हम अपने आसपास फैली संसार की नितियों से हट कर किसी को बिना बताये ही अपनी जगह ऐसे स्थान मे बना लेते है जो समाज मे छुपा होता है।

कई रूपो, मुखोटो की अस्लियतों में एक आकार लिए होता है। जिस के पीछे कई समय पुराने निशान मिलते हैं। जीवन के रसो को तरह-तरह से बनाते हैं। लोग जीवन को ठहराव मे जीते कैसे हैं? हम निश्न्चित रहना चाहते हैं लेकिन हम सोचते निश्न्चित नहीं है। हम किसी अनकही को कहना चाह रहे हैं क्या? जिसे लोग पागल कहते हैं उसे गालियों से नवाजते है पर उसे कुछ समझ नहीं आता की आसपास के लोग उसे क्यो, क्या बोल रहे हैं। बस, सब को ख़ामोश होकर देखने और सुनने के मूंड मे पागल होता है। पागल को खाना देना, पागल को पानी देना, पागल से ड़रना, पागल को अपनी बराबरी का न समझना, पागल की आदतों पर हसंना।

ये हमारी दुनिया मे ही होता है फिर भी हम उसे अपने से ज़ुदा करके जीते हैं। अपने को अज़ब से विभाजन मे हम रख लेते हैं जिस का माहौल हम संतुलित चाहते हैं।


राकेश

एकान्त के ओझल रगं

एकान्त बोलना या एकान्त शब्द का आना कोई अंधेरा नहीं होता ऐसा बिलकुल नहीं कि सारा समय अंधेरे मे हो। एकान्त पूरे दिन का बितना और हर काम के भार का एक ठहराव है जो हम अपने से खींचातानी करके निकालते हैं। शरीर जो व्यस्त रहना जानता है, दिमाग जो चुस्त रहना चाहता है और आँख जिसे रोशनी की जरुरत हो गई है। इन्ही से लगता है की हमारे चारों ओर दुनिया का एक फैलाव है कि जिससे हर पल एक जीने का तरीका बनता है। उसी जीने के तरीके को समय का हर पैमाना बनाकर घूंट पर घूंट मारकर उस भार को अपने अन्दर जमा करते जा रहे हैं।

भागती-दौड़ती ज़िन्दगी को अपने से अलग करना या पांव को पकड़कर कर कहीं जमा देना एकान्त नहीं होता। वो उसी चर्मक्रिड़ा मे रहता है बस, गती को कहीं ठहराव मे ला देता है। ऊजाले से रोशनी की तरफ़ नहीं और ना ही रोशनी से अंधेरे की तरफ़। वो डार्कनेश मे एक ग्रेहरगं की तरफ़ आँखो को धकेलता है।

एकान्त एक ऐसा रगं है जो पूरे दिन साथ रहता है।
शान्त बैठना अवाज को बन्द करना नहीं होता।...
घर से दूर जाना रिश्तो से भागना नहीं होता।...

लोग अपने उस वक़्त को रूटीन मे लाना चाहते हैं। जहां पर आकर शरीर एक भार से मुक्त रहता है। उसमे वो समय खुद को इतना सुनने लगता है कि हर अवाज शरीर से दूर लगती है। गाड़ियों की, लोगो की और शहर की हर अवाज लगता है जैसे खुद के कानों से दूर है। उसमे अपनी रिद्धम को पकड़ने की कोशिस होती है।

श्याम लाल जी यहां पर कुछ और ही कहते हैं वो फरमाते हैं, “जिन अवाजो और रोनक मे हम धिरे रहते हैं वो हमें इतना भर देता है की हमारा शरीर एक तेजी पकड़ लेता है। हर कोई आदमी जहां पर तेज ही नज़र आता है पर जैसे ही हमारा शरीर हमें उस तेजी से बाहर धकेलता है तो शरीर और दिमाग एक ऐसी जगह पर आकर खड़े हो जाते हैं की ना तो वो खाली ही होते हैं और ना ही भरे मगर हाथ खाली हो जाते हैं बस, उसी वक़्त मे घबराहट होने लगती है।

कुछ काम नहीं है क्या करे?, किससे बातें करे?, कहां जाए?, किसके पास जाए?, हमें तो सभी के सभी लोग अपने ही जैसी मुद्रा मे दिखने लगते हैं बस, उसी वक़्त मे मन विचलित होने लगता है तो कदम बाहर मे निकल पड़ते हैं। जितना आसान खुली सड़क पर बैठना लगता उससे भी कई ज़्यादा कठिन किसी रिश्तेदार के यहां पर जाने मे लगता है।"

दिन कलैन्डर मे बित रहे उस तारीख की तरह होता है जिसको कोई रेडसर्कल घेर रहा है और वो रेडसर्कल उसे अपने मे इस तरह कस लेगा की वो दिमाग मे छप जायेगा। उसमे खुद को एक तरह की तस्वीर मे हम देखने लगते हैं। दिन खो जायेगा। कल फिर से एक और इसी तरह का रेडसर्कल तैयार होने लगेगा और शाम होते-होते वो इनता कठोर हो जायेगा की दूसरे दिन को उसमे दाखिल होने की इज़ाज़त भी नहीं होगी।

एकान्त के वो डार्कनेश पल उस वक़्त की मागं मे होते हैं। जहां से अंधेरा ख़त्म होता है और ऊजाला शुरु या जहां से ऊजाला ख़त्म होता है और अंधेरा शुरु होने की कगार पर होता है। वो वक़्त ही नहीं वो रगं को देखने की चाह मे जीवन और हर शरीर ठहराव की अपेक्षा रखते हैं।

समाज और शहर के कुछ ऐसे नियमों मे शरीर अपनी ऐसी कुछ आकृतियां बना चुके हैं कि उसकी पॉजीशन मे रहने की ताजपोशी मानी जाती है। जहां पर हिलना, ढुलना और खड़े रहना एक पॉजीशन बन चुका है। अगर उस पॉजीशन से जरा सा भी हिले तो ताजपोशी तो छिनेगी ही बल्कि उसमे आने वाले दिन किसी फटकार के तहत गुजरेंगे।

अपनी पॉजीशन, खुद के फैलने के तरीके, पांव फैलाने के आराम, कुछ कह पाने के जोश, बैठकर सुनने के शौक जैसे वो सब छेड़ने की कोशिस मे ही एकान्त के दिनो कि स्थापना होती है और ख़ास रगं के समय को तलाशा जाता है।

श्याम लाल जी कहते हैं, “जहां पर मै जाकर बैठता हूं अगर वहां पर ऊजाला होगा तो वहां शायद कोई बैठेगा नहीं।"

यहां पर वो ऊजाला क्या करता है? खाली यही नहीं की वो वहां पर बैठे हुए उन लोगो को दिखा देगा या उस जगह को रोनक कर देगा। ऊजाला शायद फिर से वही समाजिक और शहरी नियमो को वहां पर खड़ा कर देगा जिससे हर कोई वहां पर छिटकर आया है। पांव फैलाकर बैठना ही नहीं है। शायद वह जगह किसी ऐसी पॉजीशन की तालाश मे है को अभी तक रोशनी की मागं नहीं करती। वो उस घिराव मे बहती है।

लख्मी

आसपास सवाल ही सवाल हैं

मैंने कुछ सवालों के गहरे और अपने जीवन मे झांकते हुए ये सवाल सोचे है, जो मैं आपके साथ मे जीवन की गहराई मे उतरने के लिए बांटना चाहता हूँ। देखा जाए, तो मुझे दो रातें लगी ये सोचने मे की लोग अपने जीवन के सवालो को अपने तक ही समेटकर क्यों चलते हैं और उन लोगों मे मैं क्यों हूँ? आज बहुत सालो के बाद मे मुझे अच्छा महसूस हुआ के अभी के सभी जवाबो और सवालो पर बारीक समझ जानकर, थोड़ा इन्हे और पढ़ना चाहता हूँ ताकि मैं भी समाज मे बाकि लोगों कि तरह जवाबों को तलाशता हुआ, खाम-खां मे ना भटकूं।

> निरंतर बदलाव के बाहर हमारे साथ क्या जुड़ा है?
> अलग समय के (द्वष्टी कोण ) को हम कहां-कहां लेकर जीते हैं?
> हमारे नज़रिये और समाज के नज़रिये के बीच मे कैसा मेल है?
> समाज की छवी मे हम और आप शामिल है या नहीं?
> वास्तविक ज़िन्दगी से क्या बहस कर रहे हैं?
> अपने से दूर है कुछ, इस दूरी को चिन्हित कैसे कर रहे हैं?
> हमारी अपनी कल्पना दूसरों से विपरित कैसे है?
> स्वीकार करना, इसकी पकड़ है जीवन पर?
> हम किसी अलग शख़्स पर जाहिर कैसे होते हैं?
> हमने समाज को बर्दाश्त कैसे किया?
> कौन सी धारणायें लेकर हम जी रहे हैं?
> आप के अपने समाज से आपकी क्या नई कल्पना है ? या होती कैसे है?
> समाज के अलग ढ़ाचों में कैसे जीते हैं?
> क्या कोई ऐसी न समझ आने वाली स्थिती होती है?
> हम अपने से, दूसरो को विरोद में कैसे कल्पना करते हैं?
> किसी के विरूद्ध कल्पना क्या अलग खोलती है?
> जगह-जगह किन अवधारणाओं से हम टकराते हैं?
> दूसरो के बने कौन-कौन से विभाजन से हम हर वक़्त झुजते हैं?
> किसी जगह में दखिल होने से पहले क्या बैचेनी होती है?
> अगर कोई कल्पना दिमाग मे बनी है तो वो किसके लिए है?, उस कल्पना मे कितने लोग हैं?
> किसी ख़ास स्थिरता से टकराए हो? तब क्या हुआ है?
> जब हम अपने जीवन के रुके हुए फैसलों में जाते हैं तो क्या होता है?
> रुके हुए मे दाखिल होकर क्या परिवर्तन ला पाते हैं हम?
> मान लो, अंनत तरीके हैं आप के पास लेकिन किसके साथ ख़ास तरह से जीते हैं उन तरीको में?
> पहचान के साथ हमारी क्या टेन्शन व लड़ाई रहती है?
> पहचान को न पहचानने की टेन्शन क्या है?
> गुजरे समय के बाद से हमारी भविष्य की कल्पना क्या है?
> ख़ास होने मे और ख़ास बनने मे अंतर क्या है? घर की चीजों का बनना कैसा है?
> क्या अपनाया और क्या लिया है, किसी से?
> क्या पाकर रज़ामन्द हुए?
> क्या पाने की चाहत रही?

इस दौरान कई लोगों से मिले, जिनके जीवन के सवालों ने कई जीवन की अधूरी व पक्की पहचानों को कसोटा है। ये मानकर चलना कभी तय नहीं होता कि जो हम दिन के बितते समय मे नज़र आ रहे हैं उसका प्रभाव हमारे चारों तरफ भी है, शायद नहीं। तभी तो खाली हमें व हमारे काम को देखने के तरीके बना लिए गए हैं। तो फिर हमने क्या बनाया? जीवन के कुछ सवाल है जो हम अपने मे ऐसे संभाल कर चलते हैं जैसे कि वे खाली मेरी ही ज़िन्दगी से जुड़े हैं बाकि लोगों के सवाल दूसरे हैं, मगर शायद ऐसा नहीं हैं। ये वे सवाल हैं जो लोग कहते हैं, दबाते हैं, छुपाते हैं लेकिन कभी पुछते नहीं है तो क्या पुछने वाले सवाल कोई दूसरे है या कुछ और हैं? हम अपनी आपबिती को अपना कौना मानते हैं और उसे अपने अतित की ताकत बना लेते हैं जो हमें भविष्य की तरफ़ मे ताकतवर बनाकर धकेलती है तो उसमे उपजने वाले सवाल क्या है? या किसके लिए हैं?

यही लोगों के साथ मे मैं समझने कि कोशिस कर रहा हूँ।

राकेश