रमेश और गिरधर दुकान के बाहर ही पीपल के पेड़ के पास बैठे थे। वहां एक मिस्त्री आया और बोला।
"भाई, ये चप्पल टूट गई है। जरा दो टाँके मार दो।"
रमेश, "बस दो टाँके?"
मिस्त्री, "और क्या? इसे सिलने के कितने पैसे लोगे?”
रमेश, "पांच रुपये दे देना।"
मिस्त्री, "दो टाँकों के पाच रुपये? एक तो सुबह-सुबह चप्पल टूट गई और ऊपर से तुम पांच का नोट् मांग रहे हो।"
रमेश, "तो क्या कंरु मंहगाई जो हो गई है। तुम भी तो कमाने निकले हो क्या तुम्हे नहीं पता।"
मिस्त्री, "काम तक जाने से पहले चप्पल ने साथ छोड़ दिया।"
गिरधर बोला, "महाश्य जी! एक दिन सब साथ छोड़ देगें। तब क्या करोगें?”
मिस्त्री, "जब की जब देखी जायेगी। अभी तो मौज़ उड़ने दो।"
गिरधर, "अच्छा तो तुम मौज़ उड़ा रह हो। तो तुम्हारी आवाज मे मायूसी क्यों है?”
मिस्त्री, "तुम ये कैसे कह सकते हो की मे मायूस हूँ?”
गिरधर, "बड़ी सीधी सी बात है। आदमी सब कुछ छुपा सकता है, लेकिन जरूरत नहीं छुपा सकता। किसी न किसी तरह उस की जरुरत सामने आ जाती है।"
मिस्त्री, "सही कहते हो। मैं मायूस इसलिये हूँ की जितना कमाता हूँ उस से गुजारा नहीं होता बस, बीवी-बच्चे पल रहे हैं।"
गिरधर, "तो और क्या चाहते हो?”
(बार-बार चौराहों पर पड़ा सन्नाटा बिखर जाता और जिवश्यम की तरह आँखों के आगे धूल के कण लहराने लगते। सड़क के पास से गुजरते वाहनों की आवाजें दोनों की बातों मे शामिल हो जाती।)
मिस्त्री, "ज़िन्दगी को मज़े से जीने के लिए जरुरत की हर चीज होनी चाहिये।"
गिरधर, "लेकिन जितनी जरुरत उतनी ही चीजें, इतनी जगह कहां से लाओगे?”
मिस्त्री थोड़ा सोच कर बोला, "कहीं से तो जुगाड़ होगा।"
गिरधर, जुगाड़ तो अच्छा शब्द है लेकिन?”
(वो रुक गया। मिस्री भी कुछ बोल नहीं पाया।)
"मैं अभी जल्दी मे हूँ" ये कह कर चौक पर बैठे लोगों के पास चला गया।
गिरधर, "इसके पास जवाब हासिल ही नहीं हुआ तो मुंह मोड़ कर चला गया।"
रमेश, "दादाजी मैं तो बस, इतना जानता हूँ की पैसा फैकों और तमाशा देखो।"
गिरधर, "सब एक-दूसरे की होड़ मे हैं। देखा-देखी बदल रहे हैं।"
रमेश, "दादाजी आप कोई रास्ता दिखाना चाहते हैं?”
गिरधर, "नहीं, मैं खुद रास्ता नहीं जानता। रास्ता दिखाना आसान है मगर उस पर चलना बहुत कठीन है। मैं तो तुम्हारी नज़र से ज़िन्दगी को देखने की कोशिश कर रहा हूँ पर कोई ढ़ग नहीं बना पा रहा हूँ।"
रमेश, "तो आप बिना सवाल किए दूसरों मे उतरते क्यों नहीं?”
गिरधर, "कैसे उतरू? कोई उतरने लायक रुप ही नहीं मिलता।"
रमेश, "रूप, कैसा रूप?”
गिरधर, "हमारे आसपास कई रूप हैं जिन्हे हम अपनी वाणी से पुकारते हैं और अपने लिए माहौल की तैयारी करते हैं।"
रमेश, "मतलब, मैं समझा नहीं?”
गिरधर, "अगर रास्ता साफ़ नहीं है तो दूसरा रास्ता ढूंड़ लेते हों। उस रास्ते को साफ़ करना ही तुम्हारे लिए काम का विषय होता है।लेकिन अक्सर इस प्रयास से लोग ड़र जाते हैं। जैसे, सड़क साफ़ करने वाला जमादार। क्योंकि समाज की सड़के बहुत मैली है तो इसे साफ़ करने वालो के हाथ तो मैले होगें ही। कहते है न की कोयले की दलाली मे हाथ तो काले होते ही हैं। इसलिए समाज मे अच्छे और बुरे काम मे ही संजोग बनाता है। कृष्ण भगवान ने धर्म को बचाने के लिए कितने ही छल और कपट किए मगर वो सब धर्म कि विजय के लिए थे। इसलिए उनका कोई ड़न्ड भगवान पर सिद्द नहीं होता। क्योंकि भगवान कृष्ण अपने बनाये सिद्दातों पर चलें।"
रमेश, "जो नहीं चले उनका क्या?”
गिरधर, "उन्हे भगवान ने मोक्ष दिया।"
रमेश, "इस का मतलब की आप भी मुझे मोक्ष दे रहे हैं?”
गिरधर, "नहीं मे मोक्ष पाने की रहा ढूंड़ रहा हूँ।"
रमेश, "क्या मोक्ष किराने कि दुकान पर मिलेगा?”
गिरधर, "नहीं।"
रमेश, "घर मे मिलेगा?”
गिरधर, "नहीं।"
रमेश, "बाजार मे मिलेग?”
गिरधर, "नहीं-नहीं करते ही मोक्ष मिलेगा।"
रमेश, "इस का क्या मतलब है? दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।"
गिरधर, "अगर किसी चीज को पाने के लिए उस से 'नहीं-नहीं' मिली करते हुए जिया जाए तो पता चलेगा की हम बार-बार कितनी बार और क्या पा चुकें हैं। जैसे सूरज एक जगह से निकलता है और चलते-चलते दूसरी दिशा मे छुप जाता है। हम भी उसी तरह से किसी की दुनिया मे जाकर मिल जाते हैं।"
राकेश
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