Tuesday, October 21, 2008

ये बदलाव का टैन्ट है

आज 6 अक्टूबर 2008 है। ये तारीख़ अख़बारों से निकलकर बाहर आ गई है। जो ख़बर पिछले कई दिनों से टीवी व अख़बार मे छाई हुई थी। वे आज लोगों की ज़ूबान पर थी। शाम के पांच बजे हैं और आवाजों का काफ़िला अन्दर आने के लिए मचल रहा है।

"दक्षिणपुरी की तो किस्मत ही ख़राब हैं कोई अच्छी चीज का तो हकदार ही नहीं है।"

ये बोल यहां सभी की ज़ूबान पर थे। किसी चीज के ना मिलने का दर्द बोल रहा था। लेकिन कर भी क्या सकतें हैं, जिसके हाथों मे वो थी उससे मुहंजोरी कोई नहीं कर सकता। हां, भले ही अपने करीब के कार्यकर्ता को तो हर तरह से कोसा जा सकता है, क्योंकि उसे तो आना ही हमारे पास मे, मगर उसे कौन कहे जिसके इन्तजार मे आज लोगों को ख़ाली कुर्सियों पर बैठे-बैठे एक घण्टा हो गया था। बहुत ही शानदार टैन्ट था। कम से कम 200 गज़ का। इतनी बड़ी जगह तो यहां किसी के पास मे नहीं है। हद से हद 150 गज होगी। लेकिन उसमे भी उसने कितने सरकारी आलाअधिकारियों को बहुत सी मिठाई खिलाई होगी और ना जाने कितनी पैप्सियाँ तो पुलिष वाले भाईयों को। तब कहीं जाकर वो अपना मकान बना पाया होगा। खैर, ये तो खेला है जो जीवन भर खेलना है, इसपर बोलने से क्या होगा या इस बात को दोहराने से क्या होगा। जाने दो इस दुनिया को।

विराट का मैदान आज बड़ा खुशनसीब हो गया था। एक तरफ़ मे लगा हुआ था मेला तो दूसरी तरफ़ मे एक ऐसा टैन्ट लगा था जो कि आज किसी शादी का नहीं था। वो आज बहुत ही ख़ास था क्योंकि इसमे वो आने वाले थे जिसने इस जगह के उद़्धार मे सहयोग दिया था। या ये लोग उस परिवार के हैं जिन्होने दक्षिणपुरी जगंल या शमसान घाट को जीने लायक जगह समझा था। उसी के कारण यहां पर बहुत भीड़ थी। कई सफ़ेद पौशाकें आई हुई थी। रामलीला पार्टी वाले, नौजवान पार्टी वाले, नये कदम उठाने वाले, मौहल्लो के मुखिया, महिला उद़्धार वाली औरतें, कमेटी वाले और कई ऐसे लोग जो किसी गिनती मे नहीं आते मगर फिर भी बहुत ख़ास होते हैं। सुनने वाले वे लोग, जिन्हे शायद पता भी नहीं होता की यहां कुछ सालों के बाद मे क्या होने वाला है? बस, सुनने के लिए चले आते हैं। बहुत भीड़ लग चुकी थी। इन्तजार मे नज़रे गेट पर ही लगी थी।

सफ़ेद रंग और गुलाबी रंग का टैन्ट हवा मे झूल रहा था। 200 गमले पूरे पार्क मे लगे थे। बाहर लगे बोर्ड पर गीला कपड़ा मारकर चमका दिया था। मैदान के दोनों ओर मे बड़े-बड़े पोस्टर लगा दिए थे। जिनपर अच्छी ख़ासी पोस्टर राजनीति हो रखी थी। जितने भी लोग उस परिवार के हैं वे सभी अपने-अपने नाम के पोस्टरों को उस कतार मे लगा रहे थे ताकि परिवार के वालदेनों के साथ मे बच्चो का भी कुछ अता-पता रहे। यही तो वक़्त है कि अपनी पॉजिशन को जमाया जाए।

"रविकांत जी वो अप्लीकेशन तो लाए हैं ना?! मैड़म जी को पढ़वाना है। बहुत जरूरी है।"
"अरे हां, यार वो मैं कैसे भूल सकता हूँ। आज तो वो मैं देकर ही छोंडूगा।"


"यहां की पुलिष का पब्लिक के साथ मे व्यवहार को बताना है। वो ख़त लाई हो?”
"हां, लाई हूँ, मैड़म जी को तो आने दो।"
"अरे बस, आती ही होगीं। साढ़े पांच का वक़्त था, छ: बजने को आए हैं। आती ही होगी।"


ना जाने कितनी ही ज़ूबाने यहां पहले से ही तैयार हो चुकी थी। बस, वो कान आने बाकी थे। सभी लोग सामने-सामने वाली सीटों पर जम गए थे। ताकि बहुत ही सरलता से मैड़म जी से मिल लिया जाए। पहले घड़ी कि तरफ़ मे देखते तो कभी गेट की तरफ़। गेट पर चार औरतें जमीन पर बैठे-बैठे झाड़ू लगा रही थी। वे गेट से होते हुए टैन्ट तक आ रही थी, पीछे-पीछे दो आदमी उनकी साफ़ कि हुई जमीन पर लाल बदरपूर बिछा रहे थे। एक आदमी, उस लाल बदरपूर से बने रास्ते के दोनों किनारों पर डी.टी.टी के पाउडर से किनारियां बना रहा था। एक बड़ा ही खूबसूरत सा रास्ता बनता नज़र आने लगा था जैसे की जन्मअस्टमी मे बच्चे अपनी जन्मअस्टमी सजाते हैं। वो औरतें बैठे-बैठे ही झाड़ू लगाती, कभी तो दोनो ही रुक जाती तो कभी बड़ी तेजी से आगे की तरफ़ मे बड़ जाती। मिट्टी के अलावा तो उनकी झाड़ू मे कुछ और निकल ही नहीं रहा था तो वे उस मिट्टी को किनारे पर लगा देती। अब तक साढ़े छ भी बज चुके थे। कोई नहीं आया था। ना तो चौधरी प्रेम चन्द जी ही आए थे और ना ही शिला दिक्षित जी ही आई थीं। सभी के चेहरे पर अब इन्तजार करने की उम्मीद भी नहीं दिख रही थी। इतने मे चार आदमियों ने टैन्ट मे प्रवेश किया। उन्होनें अपने बीच मे कुछ बातें कि और चार आदमियों को टैन्ट के ऊपर चड़ा दिया। वे चारों टैन्ट उखाड़ने लगे। ये देखते ही सभी लोग कुर्सियों को छोड़कर खड़े हो गए। दो टैम्पो ने मैदान मे इन्टर किया। जिसमे मैदान मे गमलो को भरना शुरू किया। बड़ी जोरों पर काम शुरू हो चुका था। अब तो वहां पर आए हुए हर चेहरे मे ये साफ़ देखा जा सकता था कि आज उद़्घाटन नहीं होगा। फिर भी सभी ने उन टैन्ट वाले व गमले वाले ठेकेदारों से पुछा तो उन्होने सिर्फ़ इतना कहा कि "हमें ऑर्डर आए है कि यहां पर कोई काम नहीं है तो समान पैक करलो। तभी हम ये समान पैक कर रहे हैं। अब वो क्यों नहीं आई ये तो वो ही बता सकती हैं। हमें तो मैदान मे से ये समान हटाने को कहा गया है।"

अब लोगों मे अलग-अलग बातें शुरू हो चुकी थी। वे क्यों नहीं आई लोग खुद से बनाने लगे थे। कोई कहता, "मैड़म जी को पता नहीं था की यहां पर मेला लगा हुआ है। पूरी डिटेल नहीं गई होती मैड़म जी के पास मे इसलिए वो नहीं आईं।"
तो कोई अपनी पॉजिशन दिखाने मे जुट गया, “अरे जब तक हमारे सवालों के जवाब नहीं मिलेगें तब तक कैसे हो सकता है। सात साल पहले यहां पर अम्बेडकर जी की मूर्ती की स्थापना होगी ये कहकर इस मैदान को ख़ाली छोड़ा था। तभी ये मैदान मे स्तम्भ भी बनवाया था। इसे अम्बेडर जी के नाम से जाना जायेगा। मगर वे भी नहीं हुआ तो ये कैसे होगा।"

तो कोई बिमारी का बहाना बनाता तो कोई कुछ और कहता। मगर फिर भी लोग रात के सात बजे तक वहीं पर खड़े रहे। धीरे-धीरे करके मैदान मे सभी कुछ हटा दिया गया। ये ख़ाली मैदान ख़ाली ही रह गया। जिन खंर्जो को छुपा दिया गया था वे अब सभी दिखाई देने लगे थे। जिन पहाड़ियों को ढ़क दिया गया था वे अब नंगी पड़ी थी। पर सभी को इतना पता था कि अस्पताल का उद़्घाटन नहीं हुआ लेकिन इतना भी पता था कि ये अब रूकेगा नहीं। नौजवान लोगों की पार्टी के सामने ये सवाल था। उनका कहना था, “हमें तो सिर्फ़ ये पूछना था कि अब हम जब कोई खेल की प्रतियोगिता करवाए तो कहां? दक्षिण पुरी मे अगर खेलों को लेकर आगे बड़ाया जाए तो कहां? बड़े-बड़े स्टेडियम भी मिल सकते हैं मगर उसके लिए पहले छोटे-छोटे जगहों से निकलना पड़ता है। वो कैसे निकला जाएगा?”


इन सभी सवालों के जवाब अभी कुछ और महिनों के लिए रूक गए थे। मगर ये सभी जवाब मिलेंगे जरूर। टैन्ट हटाने वाले और गमले उठाने वाले लोग बोल रहे थे, “आज की तो बोहनी ही ख़राब है। सुबह से दो जगह मे से ख़ाली हाथ ही हटाना पड़ा है। अब दोबारा उसी जगह पर जाना होगा कभी किसी और दिन। पहले मालविया नगर मे किसी स्कूल का उद़्घाटन होना था वहां पर भी मनाही हो गई और अब यहां पर।"

धीरे-धीरे करके यहां की भीड़ तो ख़ाली होने लगी मगर, मेले की भीड़ मे कोई कमी नहीं आई। वे तो बड़ती ही जा रही थी। शायद, उनको पता भी नहीं था कि यहां इस कौने मे क्या हो रहा है। शायद, किसी शादी का टैन्ट होगा ये सोच कर लोग पार्किंग करने भी नहीं आए। लेकिन शोर मे कोई कमी नहीं थीं यहां का खेल रात के सात बज़े तक ख़त्म हुआ और वहां का खेल रात सात बज़े से शुरू हुआ।

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तारीख:- 6 अक्टूबर 2008, समय:- शाम 7:00 बजे

लख्मी

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