Thursday, November 7, 2013

मेरा रूप

छवियों से निकलते समय को कहाँ से देखूँ? उसके ऊपर जाकर, उसके भीतर से, उसके साथ से या उसको अपने भीतर ही ले लूँ। मेरा उसको वश में करना या मेरे वश में हो जाने की कग़ार एक समतलिये जमीन सी लगती है, और उसी जमीन पर जीने लगी है जैसे - पर ये मेरी नहीं है, मेरे होने से इसका अक़्स बनता है जिससे मेरा रूप तैयार होता है।

ये वे रास्ता है जो कहाँ पर जाकर समाप्त होगा इसका कोई स्टोप नहीं है। छवियों के भीतर से निकलता समय रास्ते के साथ – साथ नहीं तैर सकता। कुछ समय के बाद में अचानक ही रास्ते से अलग हो जाता है और खुद को किसी घेरे में पाता है। फिर जो परत चड़ती है जीवन पर वे है भविष्यहीन दिशाओं की आफटरलाइफ। शहर इस कटघरे से पनपता हुआ अपना रूप ले रहा है।

क्या निकलना, अन्दर जाने के जैसा ही होता है या जगह हमें बाहर धकेलती है? बाहर आना और बाहर धकेलना! दोनों के साथ और दोनों के बाद।

लख्मी

2 comments:

राजेंद्र कुमार said...

71आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (08-11-2013) को "चर्चा मंचः अंक -1423" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
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