Thursday, November 7, 2013

परछाई ( shadow)




शरीर अभिग्य है, कपटी है, दलबदलू है, बहुरूपिया है, सेनिक है, डरपोक है और भूतिया भी है। वे कई छोटे व बड़े अभिग्य दृश्य का जोड़ा बनकर जीने की पूर्ण कोशिश में है। शरीर स्वयं की परछाई के भीतर रहते हुए कई अन्य और बेबाक परछाइयां बनाते हैं, परछाई बनते हैं, परछाई बनकर मिट जाते हैं और परछाई बनाकर भी मिट जाते हैं।

परछाइयां साचें बनी है। लिबास बनी है। मुखोटा बनी है। करावास बनी है। बेरूप है। डरावनी है। बेबाक हैं। तिलिस्मी है। हल्की है मगर घनी है। परछाई बेजोड़ है। शीशाई है। रोचक है। मौत है। यादों के जिन्दा होने की दास्तान है। परछाई खाचों की भांति है। अछूती आकृतियां है। भीड़ है। सत्ताई हैं। आजाद है। परछाई पहचान से बेदखली का आसरा है। जमीनी जंग है। भाग जाने की उमंग है। रोशनी से खिलवाड़ है। परछाई डरा देने वाला मज़ाक है। पावर का ढोंग है। नाटक करने के परमिट है। परछाई अनेकों में होने का अहसास है। खो जाने का चैलेंज है। पकड़ में ना आने की चुनौती है। परछाई ताबूत है। होने ना होने का जादू है। परछाई ट्रांसपेरेंट है। बिना इजाजत के छा जाने का दम लिये है।


मुझ से है, मुझ में है, मुझ पर है मगर सिर्फ मेरी नहीं है।

लख्मी