Tuesday, May 15, 2012

आह क्यू की सच्ची कहानी / लेखक - लू शून


आह क्यू की सच्ची कहानी / लेखक - लू शून :
इसमें एक बहस महसूस हुई।
लू शून कहता है - आह क्यू जिसे मैं मिला वे अतीत से दोहराया नहीं जाता। साथ ही भविष्य में अपने निशां लेकर जाने वाले कोई ऐसा किरदार भी नहीं है जिसे उदाहरणता रख उस जगह को बयां किया जाये जिसनें आह क्यू जैसे कईयो से मिलने का मौका दिया।

असल में ये दिलचस्प दिक्कत रही है जैसे - मेरी एक दोस्त है निलोफर - उसका दूसरा घरेलू नाम है नीलम। 

नीलम और निलोफर : नीलम एक कलोनी मे रहने वाली लड़की है और निलोफर शहर मे निकलने वाली। मैं जिससे मिला वो निलोफर है। जो खुद को ऐसा किरदार बनाकर जीती है जिसका कोई कलोनी नहीं। मैं अगर निलोफर को लिखता हूँ तो वो उस जमीन के लिये क्या सवाल उठा पायेगी जिससे वे निकलकर अपनी किसी अभिव्यक़्ति को रच पायी है। आह क्यू को लिखते वक़्त लू शून के दिमाग में जगह और शख़्सियत का आकंड़ा फिट होने मे नहीं था। वे अभिव्यक़्ति को सोचने से पहले उस जगह को सोच रहा था जहां के लिये वे सवाल बन पायेगा। निलोफर को नीलम के नाम से जाना जाता है उसकी उस जगह पर जहां से वो निकलती है। मगर निलोफर ने नीलम को भी निलोफर बनकर ही जिया है। तो सही मायने मे "नीलम" कोई है ही नहीं। मगर आसपास एक हिस्सा सिर्फ नीलम से ताल्लुक रखता है और निलोफर को समझने की कोशिश करता है। मगर वे एक नाम है - जिससे जगह को बयां कर पाना मुमकिन नहीं।

वैसे ही आह क्यू वर्तमान मे जीने वाला एक शख़्स है। जिसे कई नामों से जाना व पूकारा जाता रहा है। लू शून मिला उस आह क्यू से जो कोई भी काम कर खुद को किसी अतीत व भविष्य मे नहीं ढलने देता। लोग उसे दोहराते हैं कि "आह क्यू" कोई भी काम कर सकता है। आज मिले आज करा लो, जो मिले वो करवा लो।

सुनाई जा रही कहानी - जुबानी है और जब वे सुनाई जा रही है तो वो बाहर नहीं रहती वे किसी के अन्दर चली जा रही है। अनेकों स्पष्ट यानि दिखते लोग, इन्ही असपष्ट अनदेखे किरदारों से लाइफ पर गहरे सवाल उठा रहे हैं। देखने वाली निगाह, पूछने वाली जुबान और सामने खड़े होने वाले कदम सभी को उस जमीन से हिला दे रहे हैं जिनका मानना है कि हर वक़्त पुख्ता रहना या तैयार रहना जीवन को आसान बनाता है।

तो फिर "रिडिंग" के खिलाफ हो जाना क्या है? कोई हमें कैसे पढ़ रहा है या कोई हमें कैसे खुद के शब्दों मे ढ़ाल रहा है? मे उभरते इस "कोई" के साथ किस तरह संवाद किया जाये? "ये कोई है कौन?”

"कोई" :

यह "कोई" सतर्कता है, सत्ता है, पारिवारिक है, संस्थाई है, या कोई समुह है जो अपने मे मिलाने से पहले ही हमें हमारे स्वयं से बाहर कर छोड़ता है। बोलता है - तुम्हारे अंदर सब कुछ है। जहां से तुम आये हो वो भी और वहां पर क्या देख पाये हो वो भी। अब वो हमें चाहिये उन सभी मुद्दों के साथ जिनसे तुम टकरा कर आये हो। खुद को लेकर आओ मगर खुद के स्वयं को छोड़कर। इस बहसिया शर्त को कई मौलिक ढांचो और बातचीतों में महसूस किया मैनें। यह किसी परछाई की तरह है मगर कई रूपों में दिखता हो जैसे - यह मेरे जीवन में हमेशा रहा। कभी इससे उठने की ताकत मिली तो कभी इसमें काफी उलझा रहा। लेकिन जीवन की रचना में इस "कोई" का दाव समाजिक और बौद्धिक दोनों के भीतर ही है।

यह कभी थर्ड परसन बना रहा - जिसने मेरे होने को मेरे ना होने के साथ जीने का तर्क दिया, कभी सेकेंड परसन – जिसने दोबारा से तैयार होकर आने का पंच दिया, कभी समाजिक छवि - जो क्या कर रहे हो पूछकर – भविष्य की ओर देखने को कहा, कभी बौद्धिक छवि - क्या कर सकते हो - कहकर अपने सामने खड़े रह पाने का हर बार चैलेंज दिया।



बहस जीवन के सवाल को लेकर होती है मगर वे जीवन किन व्यक़्तित्व के अभिव्यक़्तिय बनेगा के सफर मे होता है।

लख्मी

Saturday, May 5, 2012

किनारो के बीच में नाव

मायनो से बाहर की दुनिया को रचना। जो आदतन छवि को नकार रही है और उसे ना बनाने मे मसरुफ़ है बल्कि दुनिया में किस तरह की रचना को रखना है, जहाँ पर दुनिया वश से बाहर की लगे और सबको इसमें घुसने के अपने साधन बनाने हो। दुनिया को नया बनाना नहीं है और पुराने को तब्दील भी ना करना हो, इसके बीच में बहते जीवन को देखने का फ्रैम क्या है हमारे पास?

दो ठोस किनारो के बीच में बहता पानी (तरलता) अगर दोनों किनारो को आधार ना माने तो फिर दुनिया में अपनी ही सोच का कुछ अंश जोड़ना क्या है?
जोड़,जो कुछ सत्यापित करने के लिए नहीं हैं।
जोड़,जो नियमितता का तोड़ है।
जोड़, जो किसी कोलिज़न से मिलकर अपनी चरम सीमा को बनाती है।
जोड़, जो कभी मिलने के लिए बना ही नहीं है।
जोड़, जो किसी अदृश्य छवि/जादु को दिखाने की चाहत या चैलेंज में है।

कारवां जिसकी संख्या की गिनती अनेकता और विभिन्नता दोनों में आंका जाना मुमकिन नहीं है, वो कारवां हर किसी को अपने साथ लेकर चलने का न्यौता देता है। मगर उसके साथ में न्यौता है,जो दोनो के मिल जाने के मुवमेंट से बनता है। उसकी आगोश में सबका हो जाने का सेन्स देखने को मिलता है। जीवन का रस ही सबका होकर,सबके बीच मिल जाने में है।

कारवां कभी अपना नहीं होता,पराया नहीं होता और इसके साथीदार ना अपने लिए कुछ बनाने में होता है और ना किसी के लिए कुछ रख देने के दम पर। इस झुंड की कल्पना का ख्याल उन नये आयामों और रिश्तो को जन्म देने में खुलता है,जो सामाजिकता और नैतिकता के ख्याल से परे होते हैं। आसामान में उड़ान भरने का ख्याल,हकीकत है या नहीं है,होगा या नहीं होगा के बंधन से परे,साथ को जीकर आगे निकल जाने में है। आगे निकल जाना सिर्फ़ खुद की बोडी को लेकर निकल जाना नहीं है,वो निकल जाना कारवां से छूटकर नये कारवां और काफिले को तैयार करने मे है।

हम अपनी दुनिया को हकीकत है ये मानकर जीते है और ख्याल बनाना और ख्याल आना,ये दोनो ही हकीकत से बहस में रहते है। ये हकीकत बन जाये हम ये भी नहीं चाहते और ये झुठ है,इसमें भी हामी नहीं भरते है। इन दोनो को दुर और पास लाकर,बहस करवा या टकरा,इनके बीच से अपने जीवन का मजा बनाते है। मैं अकेला हूँ, मुझमें भीड़ है..ये एकान्त से विशालता में जाने का सिर्फ़ चिन्ह है। मैं ही सबकुछ हूँ या मुझमें ही सब बसा है,ये दोनो चीज़े मानकर हम स्वंय को गिरावट में ले जाने की क़गार तक आते है। बाहर और अन्दर दोनो के बीच के क्लेश और पल में निर्धारण बनता है,फैसले के लिए नहीं बल्कि बनाने के लिए। दोनो एक दुसरे से होते हुए निकलते है और वापिसी के चिन्ह छोड़ते हुए जाते है। निकल जाना और वापिसी की मुमकिनता पुराने ढांचो को तोड़ देने की ललक से बनती है।

लख्मी

भीड़ के बीच मे गधा

सुनसानियत का अहसास करवाते वर्दीदार सैनिक किसी की नज़र को पकड़ने की कोशिश में शरीर को एकटक बनाये हुये खड़े है। सब कुछ कंट्रोल मे हैं, सब कुछ कंट्रोल मे करने की आंख तेजी से कहीं अटकी हुई है। कुछ तलाशने की कोशिश से बाहर जैसे उसने अपने किसी टारगेट को चुन लिया है। लाइन लम्बी है, दूर तक जाने के अहसास से बनी है, लाइन मे अनगिनत वर्दीदारी खड़े होने के आसार है और अनेकों के सामने खड़े होने के भी। ना जाने कितने चेहरे अपने आपसे से बाहर होकर यहां पर इसी लाइन मे घूसने की कोशिश मे होगे।

उनपर भारी, उनकी लाइन में खड़ा, उनकी स्थिरता से आंख को चुराता हुआ, चेहरे को छुपाने से ज्यादा चेहरे को दिखाने की कोशिश में, ब्लैकवॉल को खुद मे समा ले रहा है। पीछे छुपी और बिछी "ब्लैकवॉल" जहां वर्दीदारी सैनिकों को पूर्ण तरह से देखने का और अपना दाव दिखाने का मौका देती है वहीं पर वे उस इलाके को छुपा लेती हैं जिसके समक्ष इस तैयारी का शामियाना लगाया गया है।

स्थिरता से रची गई कट्रोंल करती गली को डकमगाता एक चेहरा। वे जो महज़ चेहरा ही नहीं है। वे जो चेहरे के जैसा है, वे जो पूरा शरीर है. मगर वे जो शरीर के जैसा है। बदन पर कपड़े इसानी, वे जो इसान जैसा है, दिखता है मगर वो एक गधा। हाथ में एक नोट् फ्लैग पकड़े वे भी इसी स्थिरता का वासी है। पर स्टीकनेश से भरपूर नहीं। वे कभी देखने वाले का हो जाता सा लग रहा है तो कभी किसी सजायेवक्ता जैसा। शरीर की निठाल होती सक्रियेता। उस तरफ पूरी तरह ताला लगा रही है जहां पर तन तक खड़े, हाथों मे हथियार लिये सैनिको को देखकर नज़र बजाकर छुप जाने का खेल होता है। लगता है जैसे सामने खड़े होने की ताकत देता ये 'गधा' पूरे पावर के अभिनय को खुद मे उतार लिया है।

किसी शांत दिखती लकीर की तरह बनते चेहरे /  अनेको अनुमानों को खोल दे रहे हैं। कुछ देर पल जैसे खामोश रहता है। चेहरा अपना रूप ले रहा है। कभी दांय तो कभी बांय होता लगता है जैसे हर पल में एक पाउज़ ले रहा हो। हर बार पाउज़ का विभिन्न रूप और वज़न है।

घंटो अगर यूंही खड़े रहने पर भी दिन गुजर जाये तो दिखने वाली छवि अपने साथ चल देगी। वे जिसमें हर देखने वाला खुद को आसानी से पिरो सकता है। या पिरोये बिना वे जा ही नहीं सकता। जैसे कोई एक सवाल जिसे तलाशा जा रहा है वे – इस रूप मे ढाल देगा। पावर अभिनय है, डर है, स्टिकनेस है, मगर उस स्थिरता में जो तैयारी होने को डरावना करती है। 'गधा' उस तैयारी को उसने स्टेज दे दिया है।

लख्मी

टहलता हुआ पहिया


तीव्र चमक अपने खत्म होते होते किसी स्पार्क की तरह उछल कर टकराने वाले पर पड़ रही है। टकराहट उतनी ही ताकत से चल पड़ती है। झटके के वार से धक्का खाता पहिया, खुद को बेलेंस करता हुआ, लुढ़कता और टहलता हुआ चीजों को धकेलने के तैयार है।

पहले से तैयार जमीन उसके लिये किसी टेस्ट तरह है या बना रही है। तेजी और धीमे के बीच से होता हुआ वे ऊंचाई और निंचाई के साथ खेलता है। जैसे ही वे अपनी रफ्तार को हल्का करता तो सतह का खुर्दरापन उस छलांग मारते पहिये को, भी धक्का मार के आगे की ओर उछाल देता है। उससे वो रूकना नहीं, गिरता नहीं, थमता नहीं पर सतह पर बने रास्ते से टकराकर वे उनसे खुद को बना रहा है। खुद को उल्लास के लिये तैयार करता हुआ। सतह उसकी रफ्तार के साथ मे दूरी और पास का नया रास्ता बनाती चल रही है। राह ने उसके साथ किसी खेल को बनाया है। वे कहां जायेगा का अहसास मिसिंग है मगर कैसे जायेगा का अहसास तय मालुम होता है। सब भागती जाती, अपने वज़न से अपनी रफ्तार बनाती हुई। हल्के पहिये वाला सतह से अपनी रफ्तार बना रहे हैं। गति उस तीव्र चमक को सतह से हवा की ओर ले जा रही है। सतह से हवा तक पहुँचते पहुँचते चमक अपने रंग बदल रही है और साथ ही साथ अपने फोर्स को भी।

आहिस्ता आहिस्ता चमक सतह को छुती हुई किसी अंत की तलाश में मूवमेंट बना रही है। कुछ देर तक चमक लहराती हुई थमी रही है। अपना रंग बदला, आसपास के रंग पर छा गई, और फिर ऊंचाई को चूमने की कोशिश में किसी ना दिखने वाले गर्म अहसास से उड़ चली। कुछ दूरी पर उसके आने के लिये तैयार हो रहा है। एक सुखा गोला, उस गर्म अहसास को अपने मे ले लेने के लिये उत्सुक सा लगता है। उसके ऊंचाई पर खड़े रहने से उसने नीचे गिरना दाव किसी चैलेंज की भांति है। उसने उस गर्म अहसास से एक रंग ले लिया है। रंग ने जैसे उसे उड़ने का मौका दिया। घुमना, घूमना, घूमना जैसे वो नाच रहा है। हवा को अपनी भाप देता हुआ। हवा उसके पीछे पीछे चल रही है। लहराता रंग रोशनी से आसपास के नजारे को चमक तोहफे मे दे रहा है। कुछ जमीन उससे ये रंग चुरा रही है। जैसे कुछ लुटाया जा रहा है और जमीन उसे लूटने के लिये तत्पर है। कुछ देर तक ये डांस चलता रहा। तब वे खुलकर, बिखरकर, पीछे दिखती परछाई से गायब नहीं हो गया। जमीन ने उसके रंग को अपने शरीर पर ले लिया। जमीन भी उस भाप की गर्मी से कुछ देर जल रही है। किसी खतरनाक रूह की भांति वो गोला अपने परर फैलाता हुआ दिखा। जमीन मे कुछ ही देर मे जैसे उस भाप को ट्रांसफर कर दिया। आग लेने वाला कुछ देर तक उसे संभालने का अभिनय करता रहा। जमीन से उसे हिलने नहीं देता। पर जैसे ही परत आग से खुद को खोने लगती है तो हवा का झोंका उसे घुमाकर फैंक दे रहा है। हवा से अपनी जलन को हल्का करता हुआ वे जमीन पर पड़े बिखरे तिनको से मिल गया। तिनको ने उसे ले लिया। तिनको ने अपने को फुलझड़ियों की तरह रंग बिखेरने दिया। कुछ देर सब कुछ उन्ही फुलझड़ियों मे खो गया। उसने आसपास को खुद मे डुबो लिया। आसपास गायब ही हो गया। धीरे धीरे करके जब उन रंगो की ताप ने जोर पकड़ा तो चीज़े दूर होने लगी। उसमे से कुछ लेकर भागने के लिये। जिसको जो चाहिये था उसे मिल गया। मगर अभी उसके लिये वो पूरा नहीं था। एक नाता भाप से तेजी का - बनने मे कुछ कमी थी। समय ने उसे रोके रखा। रोककर उसे भागने का मौके को सोचने के लिये। वो रूका, रूका रहा। किसी गुलेल की तरह उसे तैयार करने के लिये। उसका आसपास पूरी तरह उजाले मे था। रूद्र था। रोशनियों की चकम को संभाले हुये। जिसे भागना है वे तैयार है। उसे गर्मी महसूस नहीं हो रही। रूद्रता उसके पीछे है। उसतक आने के लिये अपना जोर पकड़ रही है। कोई एक लोह उसतक आने के लिये निकल चुकी थी। उसतक पहुँचने मे उसे वक़्त लगा। मगर वो बहुत तेज थी। भड़काव मे थी। उसे भी पीछे से किसी ने तेजी से मारा था। उस तक वो पहुँच चुकी थी। कुछ देर वो उसकी गर्मी की फड़फड़ाहट को झेलता रहा। खुद मे भरता रहा। वो उसे रोक नहीं पाया - खुद को भी नहीं। किसी डर से या किसी उड़ान से या किसी सक्रियेता से वे दौड़ चला। मगर उसे घबराने की कोई जरूरत नहीं थी। उसके डर को अपने अंदर समाने के लिये - फोर्स को थमाने के लिये दीवारें जैसे तनी खड़ी थी। टकराहट की तेजी उसके पार भी निकल सकती थी। उसने उसे जाने नहीं दिया। खुद मे समा लिया। रोक लिया। उसकी चटकने की तेजी को रोक उसने चमक की सक्रियता को उसकी खासियत बना दिया। ना जाने कितनी देर वो उस सक्रियता को संभाले रखेगा!

लख्मी

Tuesday, April 17, 2012

न्यूज़ पेपर



कोई खो गया है
कोई गायब है
कोई दिख नहीं रहा
कोई मिल नहीं रहा
कोई दिखना नहीं चाहता
कोई मिलना नहीं चाहता
कोई भाग गया है
कोई चला गया है
कोई कहीं रूकना नही चाहता
कोई रूकने से डरता है
कोई छुप गया है
कोई गुम है
कोई गुमसुम है

कोई, कोई, कोई, कोई, कोई, कोई, कोई, कोई,
..................

Wednesday, April 4, 2012

सम्मुखत्ता की विरूधत्ता

01

कल्पना की दुनिया में जाने की राह मचलते दृश्य के सामने खड़े होने के समान है। जो उन्माद मे है, उसके सम्मुख खड़े होना - विचारने और ठहराव की प्रत्येक चौहदियों के विरूध हो जाना है। लकीरों के बिना मगर कुछ परछाइयां बनाते हुये। भटके हुए राहगीर की तरह जो रेगिस्तान में कुछ देर खड़ा हो उसके सपाट होने में अपने मन को जीने के ठिकाने बनाने लगा है। जिसका मानना है कि यहीं पर वो है जिसे वे देख सकता है। किसी नई दुनिया की नीव पर सारी धाराएं वापस लौटने को तैयार हो जैसे। उन तरंगो की भांति जिसका किनारा तय है लेकिन उस बीच उसके मचलने की कोई सीमा नहीं।


02

तरंगे किसी जाल की तरह असंख्यता मे हैं, छोटी व अधूरी- एक दूसरे मे गुथी, पानी को लहरिया बनाने मे सक्षम होने को भूखी रहती हो जैसे। असंख्य इनके भीतर है, मगर अंत तक जाने की चेष्ठा के बिना। एकल होना सिमटे हुए से बाहर है। एकांत और असंख्य के बीच खड़े किसी बिम्ब की भांति। ध्वनियां उसके भीतर से निकलती हैं, निरंतर और चीखती हुई - उसे बिखेर देने के लिये।



03

सरफस के नामौजूद होने की बैचेनी हवा के किसी झोंके पर ले जाती हो जैसे। जिसका छोर वहां पहुँच जाने वाले के लिये भी शायद किसी बेतालादर की तरह हो। कौन निकला था घर से, कौन था रास्ते में और कौन पहूँच पाया वहां- ये किसी एक से रूबरू होने जैसा नहीं है शायद। किसी पके पत्ता के उस हिचकोले खाते समय को बोलने जैसा जो इस नामौजूद सरफस पर झूल रहा है।


04

किसी भीड़ के भीतर खड़ा होना, और उसपर अपनी निगाह को बार – बार लाना जो असपष्ट है मगर शायद इसलिये क्योंकि कोई निगाह उस तक नहीं पहुंच सकती। जैसे कोई अपने अनुमान को अपने भ्रम में से जोड़ जीने के लिये निकला हो। किसी तह की गई चीज़ की तरह – जिसकी हर तह के खुलने और बंद होने की चाहत पर एक अस्पष्टता की गहनता का अहसास होता है। स्वयं के दाव पर लगाने के चैलेंज से समय के टूकड़ों को जीवंत्ता में बदल रहा हो। उस शरीर को कैसे पकड़कर पायेगे जो किसी झूले की तरह है, जो हर चक्कर में वापस आता है मगर किसी नई रफ्तार और फोर्स के साथ। स्वयं से समझोता, स्वय के साथ डिमांड़ मे रहने की ज़द्दोज़हाद है। ये कैसे जान पाओगें की बराबर मे चलना और साथ में चलने मे क्या फर्क है?


05

गहराई से आती सांसे कभी जोश मे उठ पड़ रही है तो कभी आसमान से गिरती ओस पानी की सतह पर अपनी छाया की परत से उसे शंक्खिये बना रही है।

उन्होनें आखिरी पन्ने पर लिखा था। जिसे सबने तकरीबन एक बार तो पढ़ा ही होगा। पढ़ने वाला एक बार तो उसे शंक्ख की तरह उसे अपने होठों तक लाया होगा। कई आड़ी तेड़ी लकीरों के बीच में मुड़ी पड़ी ये दुनिया, दास्तान, ज़ज्बात, बात या कल्पना की ये बिखेरी हुई दुनिया का कोई किनारा नहीं। शायद डायरी को पढ़ते रहने वाले इसके आगे के पन्नों को पढ़ने के लिये एक तस्वीर तो बनाई होगी की शायद, इसका किनारा जरूर होगा। शायद, ये बंदा कुछ गा रहा होगा। शायद, इसमे दिल मे कुछ रहा होगा। शायद, इसके पास से कोई होकर गया होगा।


लख्मी