Tuesday, October 6, 2009

एक जगह पड़ा रहकर तो पत्थर भी भारी पड़ जाता है

एक शख़्स रोज़ाना अपने घर से चार रोटियाँ अचार के साथ बाँधकर चलता था। वो लेबर चौक़ पर जाकर 7 बजे ही बैठ जाया करता था। वहाँ उसके जैसे कई आदमी रास्ते के किनारे कतार लगाकर बैठा करते थे। घर में बीवी बच्चे और बूढ़े बाप का ख़र्चा वो ही अकेला उठाया करता था। वो हर दिन चौक़ से किसी के साथ 150 रुपये दिहाड़ी पर चला जाया करता था। उसे कुछ कला या हुनर नहीं आता था। बस, वो पत्थर तोड़ना जानता था। जब कभी पैसों की ज़्यादा ज़रूरत होती तो वो ठेकेदार से बात करके किसी बड़ी जगह या शहर में जहाँ कहीं सड़कों का निर्माण होता वहाँ अपनी बीवी को भी ले जाता था। पत्थरों पर हथौड़े बजाने से बेहतर उसे कोई और काम नहीं आता था। सारा दिन वो इसी तरह व्यतीत करता था। उसके साथ के लोग भी उसी तरह दिन बिता देते थे।


शाम तक उसका शरीर थककर कमजोर पड़ जाता था। कितनी बार उसकी बीवी उससे कहती, "आप इससे अच्छा कोई और काम सीख लो। आधी ज़िन्दगी पत्थरों में बिता दी अब तो कुछ तरक्की करो।"

वो हँसकर कहता, "कोई बात नहीं, मैं इसी में खुश हूँ। कम से कम मैं पत्थरों में रहकर पत्थर तो नहीं बना। ये काम करते-करते समझ गया हूँ कि पत्थर भी टूटते वक़्त दर्द महसूस करता है। उसकी भी आवाज होती है।"

उसकी बीवी कहती, "आप हमारी आवाज़ों को तो इतनी ग़ौर से कभी बयाँ नहीं करते, न कभी ज़िक्र करते?”

इसका उसके पास कोई जवाब नहीं होता पर वो इस वज़ह को लेकर कभी-कभार ज़रूर सोचता रहता, चिंतन-मनन में डूबा रहता। रोज रात को पति-पत्नी इसी तरह की बातों में जीवन के कई अनुभवों को अपने बीच बाँटते रहते।


"एक जगह पड़ा रहकर तो पत्थर भी भारी पड़ जाता है।" दीनू ये कहकर अपनी बीवी को समझा देता। उसकी ये बात ज़िन्दगी के हर हालात
से टकरा जाती, इसलिये वो निराश नहीं होता था। 40 साल की उम्र में वो ज़िंदादिली के साथ अपने काम में लीन रहता और अपने शरीर की थकान दूर करता।


दोस्तों, काम के बारे में हमने पहले भी कई बार सोचा है और नया काम खोला है पर ये शब्द ज़िन्दगी के हर मोड़ और हर समय में मिल जाता है। हम इसे जी तो लेते हैं पर इसको लेकर जूझने से समझौता कर लेते हैं जिससे हमारी रफ़्तार से चलती ज़िन्दगी में कभी कोई ठहराव नहीं आ पाता। इसलिये हम अतीत में जी हुई हर चीज को वर्तमान यानी आज में बदलने या बनाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। दीनू ऐसा नहीं करता। वो अपने आज को खुद बनाता है, अतीत पर रोता या प्रश्चाताप नहीं करता। वो आज के वज़न को जीता है। क्या आज का काम अतीत के लिए है? उसे फिर से सोचने के लिए है, या क्या नहीं हो पाया, क्यों नहीं हो पाया - इससे कुछ सीखने के लिए है, ताकि आगे कोई चूक न हो या फिर एक ज़िन्दगी को सोचकर जो चला गया वो किसी वक़्त की रचना में अपनी मौजूदगी को बनाने का निर्णय है।

दीनू आज़ादी से जीता है। हम युगों से बदलते आए हैं या नये युगों ने हमें बदल दिया है। हर बार क्या मानव की रचना किसी अलग सिरे से होती है या हम सत्ता के नियम या नीतियों से बनी योजनाओं की बनावट का एक हिस्सा हैं जिसमें हमारा समाज हमें ही काटता और संवारता है।

समाज है तो दीनू जैसा शख़्स क्यों पत्थरों मे दिल लगाता है? अपना कोई साथी और जीने का ढ़ंग ढूंढता है? सत्ता समाज को बरकरार या टिके रहने की शक़्ति देता है जिसके राज में सब अपने को सुरक्षित समझते हैं। पर जो शख़्स इससे बाहर है उसका जीवन क्या है, किस
के लिए है - इसका जवाब कौन देगा? कौन बतायेगा कि अपनी स्वतंत्रता और संतुलित जीवन की रचनाओं का मूल्य क्या है? जो किसी निजी संबंध के बंधन में नहीं वो तो अजय और अमर है।


राकेश

2 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत ही विचारोत्तेजक रचना है। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Ek Shehr Hai said...

sokirya
isi tareh hum aap se sampark banate rahenge
or aap ko naye kalpna or anubhavo se mokhtive karvate rahenge
aap isterh hum se jodhe rahiye

rakesh