Monday, November 9, 2009

सब कुछ तेर रहा था

हाथों में चप्पल पकड़े वो दरवाजे पर ही बैठी थी और दरवाजे के एक कोने में कई कॉकरेज मरे पड़े थे। अक्सर बारिशो में गली के सीवर भर जाते हैं तो सीवरों में सारे कॉकरेज बाहर निकल पड़ते हैं। जो गली में सबसे नीचे वाले घर में घुसने की फिराके में रहते हैं।
राजवती जी को ये बात बिलकुल पसंद नहीं है की बारिश का पानी उनके घर में भरे। कई तरह के वो इन्तजाम करके रखती हैं पर फिर भी वो पानी को रोक नही पाती। कभी पानी बौछारों के जरिये दरवाजे से अन्दर आता है तो कभी छत से टपकने से। दरवाजे पर तो वो छाता खोलकर लगा देती है और टपकने में सारे घर के बर्तन। बाल्टी से लेकर पतीले तक को वो पूरे घर में अलग-अलग जगह पर लगा देती हैं।

अगर दिन मे बारिश पड़े तो भी ठीक है पर रात में पड़ती है तो इनकी हालत ख़राब हो जाती है। तब तो ना नींद आती है और ना ही ध्यान आराम भरता है। वो पूरे घर को पानी से बचाती और बड़-बड़ाती रहत है और अगर लाइट चली जाए तो दुखों में जैसे उनके सोने पर सुहागा हो जाता है।

कल रात भी कुछ ऐसा ही हुआ सारे कॉकरेजो को मार वो पानी रोकने का इन्तजाम करके वहीं नीचे बाराम्दे में लेट गई और बाकी सारे तो पहले से ही नींद में खोये हुए थे। काफी देर तक तो वो दरवाजे पर ही देखती रही। हर हिलती-डुलती चीज उन्हे कॉकरेज ही लगती। यही देखते-देखते उन्हे कब नींद आई होगी उन्हे पता ही नही चला। बिना पंखे के दरवाजे से आती हवा और बाल्टी-पतीलों में टपकते पानी की आवाज किसी लोरी का काम कर रही थी। यूहीं पूरी रात बारिश पड़ती रही। आधी ही रात के बाद में पानी के टपकने की आवाज भारी हो गई थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई हिला रहा है। नींद से भरे शरीर को कोई झूला रहा है। ये कोई सुबह का झूला सावन के गीतों के साथ का अहसास नहीं था। मगर फिर भी चादर ठीक से आ नही रही थी। इतने मे बगल में रखी तेल की कटोरी सिर से टकराई। राजवती जी ने उसे अपने हाथ से पीछे कर दिया। तो वो दोबारा से नीचे की तरफ से टकराई। चाहते ना चाहते उन्हे अपनी नींद तोड़नी पडी। ऑख खुलते ही नज़रें एक जगह पर रुक ही नहीं पाई। सब कुछ तैर रहा था। कटोरियां, एस्ट्रे, झाडू, पतीले, चप्पले, रात के झूठे बर्तन और उनके साथ-साथ बिस्तर भी। वो हडबडाती और बड़बडाती हुई उठी सबके बिस्तर को खीचते हुए चिल्लाई, “किसी की ऑख नहीं खुलती, एक मैं ही हूँ जो मरती रहती हूँ। देखलो आज मैं सो गई तो क्या हुआ।"

ये कहती-कहती वो पानी से बर्तनों को उठाने लगी और बाकी के लोग ये नहीं समझ पा रहे थे की अब करना क्या है? और चुपचाप ऊँचाई वाली जगह पर मुरझाए से बैठ गए।

"कब से कह रही थी की बाहर चबूतरा बनवालों पूरी गली का पानी हमारे ही घर में भरता है। मगर मेरी कोई नहीं सुनता।"

अब तो पूरा घर पानी निकालने में जुट गया था सभी छूपी चीजें बाहर निकल आई थी फ्रिज़, टीवी और टेबल के पीछे का सारा समान बाहर ही तेर निकला था। पैन, पैन्सिल, दवाइयाँ, डिब्बियाँ, पॉलिस की डिब्बी, रिब्बन, बिन्दी के पैकेट इन सब चीजों को देखकर सभी के सभी उन्हे ही चुनने मे लग गए। सभी खोया समान जैसे मिल गया था।

पानी निकालने में तो पूरा बीस मीनट लगा पर नींद आने में चार घण्टे। बारिश रूक जाने की दुआ निकलने के बाद।

"अरे राम जी फट गए हो क्या?”

लख्मी

1 comment:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

जीवन की विसंगतियों को आपने जितनी सहजता से बयां किया है, वह देख कर अच्छा लगता है।
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और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।