Friday, December 31, 2010

वापसी नज़र



क्या कुछ छूटने का अहसास होना जरूरी होता है? चीज़ें जिस ओर लेकर जाती है उसी ओर को बन्द भी कर देती है। जो चीज़ या जगह हमें सबसे ज़्यादा महफूज़ करती है वही चीज़ हमें किसी दायरें मे भी रख छोड़ती है। एक दम राजधानी ट्रेन की तरह - जिसमें हर चीज़ पैक होकर आती है। लगता नहीं जैसे हम भी किसी पैकिंग में लगातार चले जा रहे हैं।

लख्मी

2 comments:

प्रदीप कुमार said...

kripya meri kavita padhe aur upyukt raay den..
www.pradip13m.blospot.com

Ek Shehr Hai said...

Jaroor padege sir..
Is doran hum apni nayi kitab me busy the to blog par thikthak nazar nahi maar paye. aap hume apna add bhejiyga hum apko apni kitab dena chahege.
padte rhege or baate karte rhege.