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Saturday, April 23, 2011

उनके कमरे की सफाई

पिछले दिन मेरे पिताजी अपने उस कौने की सफाई कर रहे थे जो कभी कभी लगता है जैसे ये कौना उनके घर का हिस्सा नहीं है और कभी लगता है कि ये कौना ही उनका घर है। इन दोनों के बीच मे वे कभी इधर खिसकते हैं तो कभी उधर।

समय जैसे चमक रहा था उसके ढकने में।
समय ज़ंग खाया था ऊपर-नीचे के तलवे में।
समय सूखा था मोहर की पड़ी महरूम सी डब्बी में।
समय उछल रहा था छोटे काग़जो के टुकड़ो में।
समय चिपका था तले से लगे पेपरों में।


उन्हे अपने ही कौने के भीतर से कुछ पाया। कितना अजीब सा लगता है कि जब अपने ही घर मे कुछ अपने से बिछड़ा हुआ मिल जाये तो हम उसे पाया बोल देते हैं। जैसे वो मेरा नहीं था बस, मुझे पा गया है। इस पाने मे शायद कुछ और भी अहसास है। जैसे है मेरा मगर आज लगा है जैसे मुझे पहली बार मिला है। वे अपने हाथों के गिलास को अपने बगल मे छुपाते हुए उस पन्ने को बीनने लगे जो शायद कई सालों से बिखरा पड़ा था। छिदरा सा वे आज अपने पूरे होने का अहसास करने वाला हो जैसे - वे खुश हो रहा हो जैसे। वे उस बिखरे हुए को बीनने कर किसी बच्चे की लग गये उसे मिलाने जैसे उनका ही पौता अपने पज़लगेम के बिखरे हुए टूकड़ों को मिलाता है। फिर बिखेरता है, फिर मिलाता है - यही वे तब तक करता जाता है जब की सही अनुमान न हो जाये की अब हुआ पूरा। वे भी आज इसी रिद्धम में जुट गये।

समय अकड़ा था फाइलों में अड़े काग़जो में।
समय अटका था गुड़मुड़ी पड़े काले कार्बन पेपरों में।
समय रंगा था स्टेम्प की ख़ुरदरी लाइनों में।
समय टिका था टिकट पर पड़े अँगूठाई निशानों में।
समय ठुसा था नीली सी पन्नी में भरी बिलबुको में


कई टूकड़े तो अब भी नही मिले थे -
"आज बिशन ने वो पैसे दे दिये जो उसे लिये थे। पर मुझे लग रहा है कि उसने मुझे ज्यादा पैसे दिये है कल उससे मिलना है। रामा अपनी रकम ले गया है। मैंने सबका कर्जा उतार दिया है।"

कई ऐसी लाइने उसमें बिखरी पड़ी थी। ये खत्म होने वाला सिलसिला नहीं था जैसे। पूरी अटेची को बहुत जोर लगाकर खींचा और उसके एक – एक बिखरे हुए पन्नों को समेटने लगे। एक – एक चीज को ऐसे देखते जैसे कोई सुनार अपनी अलमारी साफ करते हुए चमकीली को भी मीढ़ कर देखता है कि ये क्या है? वे आज किसी बहुत बड़े जौहरी की भांति थे।

समय छन गया था चूहों की कुतरी पनशनी, कागज़ों के छेदो में।
समय सम्भाला था रजिस्टरों और फाइलों के ऊपर बधीं छोटी-छोटी डोरियों में।
समय गूँज रहा था फाइलों और रजिस्टरों में लिखे अलग-अलग नामों में।
समय धूँधलाया था गत्तों के कवरपेज पर लिखे नामों से उड़ती गाढ़ेपन कि चकम में।


एक और पन्ने को पढ़ने की कोशिश हो रही है।
“500 रूपये 3 टका पर लिये हैं - जिसे शादी पर देना है। “........." तारीख में। “......” , “.....” उससे लेने हैं।"

उनका कोई अपना ठिकाना नहीं है और न ही वे किन्ही से दूर जाना चाहते। वे लड़ाका नहीं है, वे रोमांच मे जीना पसंद करते हैं। शायद जहाँ पर रोमांच न हो वे उसे बनाने की कोशिश मे हो। कुछ तलाशना या अपने ही कौने मे कुछ मिल जाने को वो पाना कहकर उसे ऐसे नवाज़ते हैं जैसे वो बरसों से कहीं खोया हुआ था लेकिन अब पाकर उसने खुद को नहीं लौटाया है बल्कि उस अवधि को दिखाने की कोशिश की है जो उससे बना है उसका नहीं है शायद।

समय फैला था बिलबुक से काटी गई पर्चियों में।
समय ख़ुद को दोहराया सा था कुछ सरकारी महकमों के दस्तावेजों में।
समय बेबसा सा था रजिस्टरों से आज़ाद होती बाईडिगों में।
समय जिज्ञासू था अलग-अलग पन्नों पर लिखी अर्जियों में।


उनका अपना लिखा हुआ :
“मैंने खुद से लिया हुआ पैसा किसी को नहीं दिया है। मगर मैं आपकी दी हुई वो अधिकारी छोड़ रहा हूँ जो आप सबने मुझे अपने भरोसे पर दी थी। जितना भी जिसका निकलता है वो मैं दे दूगाँ लेकिन अभी मेरे पास नहीं है।"
अपनी उस जगह से दूर वो चल दिये। अब हर रोज़ जाते हैं, वहाँ नहीं जहाँ शायद उन्हे बुलाया जाता है। बल्कि उस "वहाँ" जिसे वो खुद चुनते हैं। वहाँ की हर चीज़ यहाँ तक की हवा और रोशनी को भी।

समय मान था उधार चुकाते शब्दों में।
समय पाबंद था उनमें पड़ी तारीखों में।
समय भीड़ था कई अलग-अलग पन्नों में छपे हस्ताक्षरों के प्रतिबिम्बों में।
समय ताकत था अन्दर कई नामों के अन्तराल बने रिश्ते में।
समय ज़िद था कई जाने-पहचाने नियमों में।
समय जिम्मेदारी था इसमे समय को महफूज़ रखने में।
समय कल्पना से भरा था उन ख़तों मे लिखे शब्दों में।


“हर बार पैसा चाय की केतली में रखा होता था। जिसके बारे में घर मे सबको पता था। सबके हाथ उसमें जाते थे। लेकिन ये नहीं मालूम था की उन हाथों में हरकत क्या थी।"

वो यहीं है, यहीं रहते हैं, यहीं काम करते हैं, यहीं खाना हैं लेकिन यहाँ पर आराम नहीं करते। यहाँ को सोचते हैं मगर जीते नहीं हैं। "वहाँ" को रचते हैं और "वहाँ" मे खो जाते हैं।

लख्मी

Friday, December 31, 2010

वापसी नज़र



क्या कुछ छूटने का अहसास होना जरूरी होता है? चीज़ें जिस ओर लेकर जाती है उसी ओर को बन्द भी कर देती है। जो चीज़ या जगह हमें सबसे ज़्यादा महफूज़ करती है वही चीज़ हमें किसी दायरें मे भी रख छोड़ती है। एक दम राजधानी ट्रेन की तरह - जिसमें हर चीज़ पैक होकर आती है। लगता नहीं जैसे हम भी किसी पैकिंग में लगातार चले जा रहे हैं।

लख्मी

Wednesday, October 13, 2010

Friday, January 22, 2010

हू-ब-हू बनी तस्वीर

बात - ओहदे या शरीर को नहीं मानती

SMS – किसी ने आपको कोई बात कही वो बात जो आपकी ज़िन्दगी और फैसलों मे बहुत अहमियत रखती है"

अगर बात कहने वाला इंसान समाज मे बुरा यानी ( गेंगस्टर, वैश्या अथवा पागल ) कहलाया जाता है तो उसने जो बात हमसे कही है उसका महत्व हमारे लिए घट जायेगा? मैंने अपने समाजिक रिश्तो और कुछ दोस्तों से बात पूछी सभी के जवाबों में "हाँ" रहा। मगर इस हाँ के अलावा कुछ और नहीं। मैं थोड़ा परेशान हूँ। ये सवाल परेशानी में नहीं डालता बल्कि ये "हाँ" सोचने पर मजबूर कर देता है। तू कुछ कह सकता है?

SMS - मेरे जवाब में ये कतई "हाँ" नहीं है। अगर कोई गोली आपकी जान लेले तो ये नहीं सोचा जाता खासकर की मरने के बाद या घायल होने के बाद मे की ये गली किस जाती की बंदूक से चली है।

एक शख़्स का अदाहरण देता हूँ, “मजनू जी को अपने घर से बाहर यानी अलग रह रहे कई साल हो गए हैं। वो सड़क के किनारे बिना छत के रहते हैं। उन्हे नजदीक से जानने वाले उन्हे दीवाना कहते हैं और दूर से देखने और जानने वाले पागल कहकर उन्हे नवाज़ते हैं। जगह का मर्म और उसकी ऊपरी सतह को वो अपने पल-पल बनते अनुभव से बताते हैं। उनकी ज़ुबान में नज़र आती जगह किसी किताब के अक्स में भी नहीं होती।

अगर कोई दिवाना या पागल आपको अपनी जगह या घटनाओं से रू-ब-रू करवादे तो उस बात में अहमियत की गोटियाँ नहीं फैंकी जाती।

मजनू जी को लोग बुरा इंसान मानते हैं। अपने बच्चों को बहुत कम उम्र में जो अकेला छोड़ आये थे। मोल, अहमियत और कीमत (वैल्यू ) बात की होती है किस ज़ुबान, ओहदा और शरीर से निकली है ये नहीं देखा जाता। ये एक चश्मा है जिसे उतारा जा सकता है।महाभारत के कर्ण के शरीर से चिपटा कवज़ नहीं जिसे चीरा जा सके।

SMS - हम लोगों को जरा दूसरों के देखने और सुन्ने से हटकर अपने खुद नजरिये से सोचकर समझने की जरूरत है। क्योंकि कानों मे पड़ा हर शब्द सम्पूर्ण नहीं होता। मुँह से निकली हर बात सच नहीं होती। समाज में कई संबन्ध होते है जिनके रिश्तों की कसौटी पर हर किसी को खरा उतरना होता है।

हम एक समाज में रहकर भी अपने लिये अपना बनाया वातार्वण चहाते हैं। जिसके लिये मन मुताबिक करने की ठान लेते हैं। मगर समाज में रिश्तों को बनाये रखने और उनको अपने पास रखने के लिये हर मोड पर दूसरों को अपने काबिल और सब में घूले-मिले रहने के लिये अपने इरादों को भूलना पड़ता है।

हर कोई ये कर ही पाता और जो करता है वो रिश्तों के दायरे से बहार हो जाता है। उसकी गिनती आम आदमी नहीं होती हो दूसरों के जैसे सा नहीं मना जाता कहने को तो वो भी इंसान का ही एक हम शक्ल होता है पर सिर्फ हम शक्ल हू-ब-हू नहीं। उसका जीवन उस हू-ब-हू बनी तस्वीर की तरह होता जो सच और झूठ के प्रतिक से अलग होता है। जिसकी कोई पहचान नहीं होती। हाँ, हम सोच सकते हैं कि इंसान की बनाई इस दूनिया में इंसान की ही बनाई बहुत सी पहचान है। जो इंसान को ही विभाजन करती है। इस लिये शायद आज जिस तरह से जीवन को देखा जाता है वो महज एक धूंधली तस्वीर है या फिर कह सकते है की मानवता पे गिरा वो पर्दा है जिसकी आढ़ में मानव का ही अपमान होता है। इस लिये आज जबकी हमारे सामने हमारे ही जैसा शख़्स खड़ा होता है तो हम उसे कैसे नहीं पहचान पाते। ये तो वो ही बता सकते है जो इंसान का बँटवारा करते है। बोल, शब्द और किसी के उपर कही बात क महत्व की तो आप रोज किसी न किसी से कितनी ही बाते करते है कितने ही सवाल और जबाब करते है।

रास्ता पूछने पर अगर कोई सही या गलत बता दे तो आप घर वापस आना तो नही भूलते। फिर किसी के कुछ बोलने या समझने से आप को क्यों फर्क पड़ता है आप का अपना विश्वास तो अटल है वो ढ़गमगा नहीं सकता फिर क्यों दूसरे की गवाही?


राकेश

Saturday, April 4, 2009

मैं बेखौफ़ जीता हूँ

मैं बेखौफ़ जीता हूँ मगर मुझे अनहोनी से लगता है डर
सब कुछ ठीक क्यों नहीं चलता लगी रहती है रोज़ाना कोई फिकर।

मैं लाख कोशिशें करूँ बार-बार भागूं
मगर वो डर मेरी परछाई को भी नहीं छोड़ता
स्वंय को बचाने के लिए किसी स्वंय को मारना पड़ता है।
चला जाता हूँ जिस तरफ आग ही आग नज़र आती है
ये तो कोई अग्निपथ है जिसमें ज़िन्दगी जली जाती है।

घाव इतने बने हैं शरीर पर कि लगाने को दवा कम पड़ती है
मुझे कोई तो हमदर्दी दिखाओ दोस्तों
आज जीने को ज़िन्दगी कम पड़ती है।


मैं बेचैन रहता हूँ ये सोचकर की मैं कौन हूँ
आइना न मुझे दिखाओ दोस्तों
इस में कोई अन्जानी सी शक़्ल दिखती है।

जब शहर में कोई आंधी आती है
धूल, मिट्टी और बहुत से कण ले आती है
ये तो मौसम है इसका क्या भरोसा
कभी-कभी अपनो से भी तकलीफ हो जाती है।

इस तकलीफ को मेरी कमजोरी न समझना दोस्तों
मेरी तबीयत तो बस, यूँ ही बिगड़ जाती है
इसमें किसी का दोष नहीं
मेरी भूख ही ऐसी है जो मुझे
रह-रह कर भटकाती है।

किसी गिद्ध की तरह मेरा मन उडता है
होता कहीं और कहीं और देखता है
मेरा यकिन करना ही मेरी उलझन बन जाती है
जो मुझे सच के विपरीत सपने दिखाती है
अक्सर मुझे कोई नींद अपने पास बुलाती है।

राकेश

Thursday, February 26, 2009

सर्वहारा रातें- किताब

सर्वहारा रातें- किताब

हम अभिनंदन करते हैं ज़ाक राँसिएर का कि वो हमारे बीच आए। उनकी किताब "सर्वहारा रातें" जो अभी प्रकासित हुई है जिसका हिन्दी भाषा में अनूवाद हुआ है। उन्होनें हमारे साथ अपनी किताब "सर्वहारा रातें" को लेकर अपना अनुभव बाँटा। उनसे हुई बातचीत में हमे बौद्धिक ज़िन्दगी के एक दौर की रचनाओं और गुज़रे कल के पहलूओं से मुख़ातिव होना है। उनके और हमारे बीच एक मुलाकात हुई जिसमें इतिहास को नया ढ़ंग से जीना और अपनी रचनाओं को लेकर खुद की क्षमता से अपने आसपास को सींचना था। जो उनसे बातचीत में उभरा जिसमें नया जीवन या अपना जीवन तय करके जीने की आज़ादी है उसे कैसे सोचें?

शरीर और हक़ीकत के बीच जब अपनी रचना को महसूस करते हैं तो उस के बिताए गए क्षणों को एक जगह एकत्रित करके या जमा करके देखें तो प्रतिदिन का एक आकार नज़र आता है। अपने मनमुताबिक सोची गई रचनाओं के समाज की धारणाओं से टकराना होता है लगातार वे दिखता है। समाज के नियम और कानून से बने निर्देशों के तारों में फँसने के बाद भी व्यक़्ति अपने संम्पर्क के नये तार जोड़ता है।

इसी ख़ास तरह में आने वाले शख़्सों के बारे में आपको रू-ब-रू करवा रहा हूँ। जो इतिहास मे जीते 'अतीत' की कई परछाइयों को ज़हन में एकदम से उभारने वाला ख़्याल देते हैं। वो जीवन जो किसी हवा-पानी, समाज, धर्म, रहन-सहन या रिती-रिवाजों से बंधित नहीं है। उस जीने और हर पल बनने की प्रक्रिया को हम दुनिया के किसी भी कोने में देख सकते हैं, सुन सकते हैं। हर शख़्स में अपनी रचना करके और ख़्याली दुनिया बनाकर जीने की गुंजाइश होती है। वो चाहें अपना देश हो या विदेश इंसान कहीं भी हो उसका वज़ूद उसे पल-पल के समावेशों में धकेलता रहता है
जिसमें जीने की साँस लेती क्रियाएँ होती हैं। जो अपने एकान्त को किसी दुनिया में जोड़ देती है और तब अपने अहसासों को खुद से समझने और सोचने कि जिज्ञासा जागती है।

हमारी जगहों में, ज़िन्दगी में, माहौलों में वो सम्भावनाएँ हैं जो एक-दूसरे के बीच के रिश्ते को रचनात्मक ढ़ंग से जीया जाने को कहती है। जो गुज़रे कल को भी आज के दौर से वापस मिलाती है और अपने साथ लेकर चलती है।

19वीं सदी के फ्रांसिसी ताला-मिस्त्रियों, दर्ज़ियों, मोचियों कम्पोज़िटरों के जीवन-संघर्ष, सपनों और बौद्धिकता की दिलचस्प और विचारोत्तेजक कहानी कहने वाली किताब जब 1970 में पहली बार प्रकासित होते ही सर्वहारा वर्ग के इतिहास और विचारधारा की स्थापित समझ के लिए चुनौती बन गए। इस पुस्तक की अहमियत पर समय, स्थान और भाषा के फ़ासलों का कोई असर नहीं पड़ा है। ग़ैर जिंसी उत्पादन सूचना क्रान्ति और ग्लोबल बाज़ार के मौज़ूद ज़माने में भी फ़ांसिसी दार्शनिक ज़ाक राँसिएर की यह रचना प्रासंगिक बनी हुई है।

इसके पन्नों पर श्रमिक जीवन और अनुभव के जिन रूपों को पेश किया गया है वह भारत के संघर्षरत मज़दूरों के ज्य़ादा नज़दीक लगते हैं। जो अपने रोज़मर्रा के संस्मरणों को अपने सपनों में लेकर जीते और वक़्त की कालगुज़ारियों में कविता या कहानियों को गढ़ते। ज़हन में आने वाले ख़्यालों के रचनात्मक ढ़ंग को बनाकर सतह दर सतह जमा करते जातें। किताब ये दावा मोटे पैमाने पर करती है की जो किताब की रचनाओं में उभरता जीवन है वो हर एक शख़्स में मौज़ूद है, बसा हुआ है।
बस, जरूरत है तो खुद में तलाशने की। इतिहास दोहराने का ही नहीं रह गया बल्कि उसे वापस पुर्णस्थापित करके हम जीवन को आलोकिक बना सकते हैं। आज वही सब कुछ घट रहा है जिससे मिलते-जुलते हालात का सामना उन दस्तकार-मज़दूरों ने किया था जिनका ज़िक्र इस किताब में किया है।

उस समय 19वीं सदी का जो समाजिक माहौल रहा जो सामाजिक संर्धभ (ढ़ाचा) रहा वो क्या था और उसमें जीने की क्या-क्या सम्भावनाएँ रही। उस समय फ्रांसिसी मजदूरों में मोचियों, दर्ज़ियों, ताला-मिस्त्रियों कम्पोज़िटरों के यानी उस स्तर के हुनरबाजों की दुनिया रात के अंधेरों को अपने लफ़्जों, ख़्यालगोइयों, कविता और कहानियों से रोशन हो जाती।

उन रातों में जो रंग होता उसे वो अपने अन्दर लेकर जीतें। तब ये लोग अपने से टकराई गई स्थितियों और उनकी रचनात्मकता को चिट्ठियों मे उतार देते। उन चिठ्ठियों की में लिखी गई रचनाएँ समय की ख़ुर्दरी परतों को अपने कोमल और करूणा भरे अहसासों से भर देती।

जिसमें अपने शरीर के टकराव, माहौल, सम्भावनाएँ होती। जिनसे कविताएँ, कहानियाँ, किस्सा, सवाल, बहस अपना मज़ा और फलसफाएँ होते। जिसमें एक दुनिया देखती थी। जो काम के बारे में नहीं थी। किसी कानून या नियम को लेकर लड़ाई नहीं थी। न ही कोई समाजिक मुद्दा जिसके खिलाफ़ नारे या आदोलन हो। बल्कि वो दुनिया होती जिसमें वे अपनी सम्मपन्यता में जीने की इच्छा रखते। अलग-अलग कल्पना लेकर जीते हैं। जैसे वो लोग दिन के ऊजालों को छोड़कर अंधेरों में भी अपने मन की ज़्योती से अपना दायरा देखते।

उनकी अपनी बौद्धिक ज़िन्दगी का समाज उन्हे वो जगह नहीं देता था जो वो चाहते थे। क्योंकि समाज हमे जो पहचान या रूतबा बनाकर देता है हमे उसी में जीना होता है। यानी एक न्यूनतम दायरे में। इस तरह समाज हमारा कई विभाजनों में गठन कर देता है और इस गठन के तहत ही हम जीने को मजबूर हो जाते हैं। सब के साथ न चाहकर भी हमे रिश्तों- नातों, सिमाओ में सहमती में जीने की आदत डालनी पड़ती है। हम इससे कोई विद्रोह नहीं कर सकते न ही उन्होनें किया था।

किताब हमें जिस ज़मीन पर लाकर रखती है उसमें अपने जीवन को नया ढ़ंग से जीने और मानसिकता के संतुलन मिलते हैं जिसमें प्रकृति भी हमें वो जीवन के बीज़ देती है जीन से ज़िन्दगी के कुछ और बगीचें तैयार किये जा सकते हैं।

बिना किसी काम, संघर्ष या विद्रोह की भाषा बनायें हम जीवन को जी सकते हैं जैसे उन्होनें भी जीया। एक नया ज़ुबान जो वो लोगों के मुँह पे डाल गए। अपने पास आती चीज़ों को असहमति मे जीया जो जगह या अपने नैतिक अधिकार की चिन्ता किए बगैर उनसे असहमत होकर जीवन में कल्पना करके जीना चाहा। उस अदा में वो लोग रहते थे।

हमारी बातचीत जब ज़ाक राँसिएर से इस किताब में कि गई रचनाओं और मजदूर वर्ग को लेकर हो रही थी।उनका कहना था की मैने सोचा की 19वीं सदी को कैसे देखे जो आक्राईव है। देखना की उसमें क्या मिलेगा? जब वे आक्राईव मे गए तो मिला की उसमें लिखी चिठ्ठियों में कविताएँ, फलसफाएँ, सवाल, बहस, मज़ा है। जो किसी काम के बारे में नहीं है और इंसान के जीने की कसौटी पर वो आवाज़ है "हम हैं" की लड़ाई थी। तर्ज़ुबे और अपने विश्वास को साथ लेकर चलना जो उन लोगों ने अपने दम पर किया। बिना समाज के प्रोत्साहन के अपने अकेलेपन को रचनात्मक रूप से सोचा और उड़ान भरी कल्पनाएँ दी।

ये अनूभव हमने भी किया की जब हमारे बीच ये आया की हम अपने रचना खुद करते हैं। अपने लिए अपना शरीर खुद बनाते हैं जिसमें समाकर हम बौद्धिक जीवन की आशाओं को सींचते हैं। समाज हमारे शरीर को बहुविभाजनों रख देता है। इसलिये अपना दायरा देखना और समझना कठिन हो जाता है।

हमारे विचार बातचीत के माहौल को अलग-अलग दिशाओं के फाटक खुल रहे थे। जो किताब की रचना को सोचकर समझकर हमारे साथी अपने आसपास फलने वाले लोगों की दिनचर्या को लेकर किसी के अकेलेपन या एकांत में जीने वालो की दुनिया के बारे में अपना गहरा शौध रख रहे थे जिसमें देखने के फ्रेम नज़र आ रहे थे। हमारी बातचीत में कुछ बिन्दू उभरे।

हमारे साथी शमशेर अली ने कहा, "कोई है जो शरीर पाने या बनाने के लिए जद्दोजहद करता है पर दिखता नहीं है।लेकिन उस का होने का अंदेशा लगता है। वो क्या है उसे कैसे सोच सकते हैं। मेरे लिए शरीर क्या मायने हैं और वो कैसे मेरे जीवन में मायने रखता है?

राँसिएर ने कहा, "शरीर में जो आया या शरीर से जो टकराया वो बार-बार होता रहा उस रचना में एक प्रेक्टिस को रखना था। जो उन लोगों का प्रेक्टिस था। "मैं" को कैसे जगह में जीते है? "मैं" कैसे रहूँगा किसी जगह में, किसी का अपने होने की आवाज़ को रखना।"

समाज विभाज को पैदा कैसे करता है? इससे टकराकर शरीर का जीवन, अपनी कल्पनाओ को जीना। उद्देश्य, काम समाज में किसी अधिकार के संर्घष से प्रभावित न होकर एक जंग से असहमति की ज़ुबान बना कर जीना। "सर्वहारा रातों" में जो जीवन है उससे अपनी पहचान की एक अलग ही तस्वीर दिखती है। नज़रिये जो कई कल्पनाएँ हमे सर्मपित करते हैं।

स्टूडियों मे हुई बातचीत में लख्मी ने कहा, "वो जो मुझे चाहिए वो शरीर मेरे सामने हैं पर मैं अपने अन्दर उसे कैसे सोचूँ जिससे मैं अपने से दूसरों के बीच की दूरी को समझ सकूँ। जो मेरे ख़्यालों मे एक दुनिया का गठन करता है। जो मेरे सामने है उससे जो दूरी है वो हमारे बीच क्या रिश्ता बनाती है? हमारे स्टूडियों में एक साथी जिनका नाम महेश है। महेश जी हमे महीने में दो-तीन बार आकर अपनी कि गई रचनाएँ सूना जाते हैं। वो अपने घर, परिवार काम के बीच से जो जगह निकालते हैं उसी में ही हमारे लिए जगह बन जाती। वो शख़्स अपने साथ कौन सा शरीर लेकर आता है जिसके बारे में उनके जैसा ही कोई उस शरीर से रिश्ता समझा पाता है।

मैं कहता हूँ एक शरीर है जो समाज मे मिलता नहीं जिससे हटकर मुझे अपना शरीर बनाना है जो मेरी सम्मपन्यता हो। मैं इस जीवन की सम्मपन्यता से संतूष्ट नहीं हूँ तो मेरे शरीर की क्या, कैसी, कौनसी आज़ादी होगी? जिस समय मे मैं अपनी कल्पना करने लगता हूँ उससे एक आकार उभरता है मेरा आज़ादी उसी शरीर में है। उसी में मैं उड़ान भरता हूँ। बौद्धीक ज़िन्दगी सब जगह है मगर इस में जो खुद से बने ढ़ाँचे हैं। वो ही नया शब्द की नया ज़ुबान नया दायरों की समझ देते हैं। मजदूरों के हमने जो ठिकाने देखे हैं। वो घर काम सामजिक, संर्धभ के ढ़ाँचे के अलावा कुछ नहीं देखा पाते पर इस के बीच में वो दुनिया है जिसमें अपने शरीर को नये सिरे से ऊर्जा प्रात होती है। बौद्धिक ज़िन्दगी लिखना कला ही नहीं है। आप कुछ सोच रहे हैं या आपके पास कुछ हैं जो आप खुद की सच्चाई को लेकर आज़ादी है।

जिसमें अपने आप को बनाने का प्रक्रिया है जो अपने पास ही होता है। जो आपको अच्छा लगता है सूझता है वो ही लिखने की प्रक्रिया है। जीने की आज़ादी है। आप के पास अस्पष्ट कुछ है जो आप किसी दूसरे के पास ले जाते हो। ले जाने की प्रक्रिया ही यात्रा कहलाती हैं।




राकेश

Wednesday, November 19, 2008

ये रात कटना मुश्किल है

आसमान मे सात या आठ ही तारें नज़र आ रहे हैं। अब तो कोई तारा इतनी तेज भी नहीं चमक रहा कि आँख उसपर जम जाये। ना ही कोई तारा किसी दूसरे तारे के साथ मे होता है। तारों के बीच की दूरी बहुत बड़ गई है। एक यहाँ दिखता है तो दूसरा वहाँ। आसमान भी पूरी तरह काला नहीं दिखता बारिश तो नहीं होने वाली फिर ये तारें कहाँ गायब हो गए? पूरा आसमान खाली है कुछ भी नहीं चमक रहा। बेचारा चाँद ही अकेला चमक रहा है कोई साथ देने के लिए ही नहीं है। लग रहा है जैसे मोहल्ले मे एक ही घर मे शादी है बाकि सब सो रहे हैं। मगर ये तारें सारे गए कहाँ? पिछले कुछ सालों मे ही हुआ है ये सारा गज़ब। धीरे-धीरे सारे पता नहीं सारे उड़कर कहाँ गए? कहीं टूटकर तो नहीं गिर गए? शायद बड़ी-बड़ी बिल्डिंगो के पीछे छुप गए होगें। नहीं-नहीं दिल्ली मे ट्रफिक भी तो बहुत बड़ गया है तो छुप गए होगें धूए के पीछे। पहले तो आसमान मे तारें गिनते-गिनते ही नींद आ जाया करती थी। अब तो कितनी भी बार आँखों को ऊपर करलो तारों को ढूंढ-ढूंढकर ही आँख दुखने लगती है।

कितने त्यौहार है हमारे यहाँ पर जिनको पूरा तारों और चाँद को देखकर किया जाता है। अब बताओ कैसे कोई पूरा करेगा? तारें देखने के लिए या तो गली के बाहर जाना पड़ता है नहीं तो जाओ किसी मैदान मे। एक ये पार्क है जहाँ से आसमान देखना तो दुर्लब है ही तो तारें क्या ख़ाक दिखेगें। हटाओ ये सारा, नहीं चाहिये।

रामेश्वर जी पार्क मे खाट बिछाए आसमान की तरफ देखकर अपने मे बड़-बड़ा रहे थे और बीच-बीच मे गाना गुन-गुनाने लगते, “मैं वब की चिड़िया, वन-वन डोलू रे, मैं वन की चिड़िया।"

अपने मे खोए उसके मूह से यही गुन-गुनाहट फड़ककर निकल आती। कभी वो बौखलाहट मे तेजी पकड़ लेती तो कभी मूह मे अटक कर रह जाती। खाट पर पड़े-पड़े मचल रहे थे। आज छ: फिट लम्बी खाट भी उनके लिए छोटी पड़ रही थी। कभी सिर लटकता तो कभी पाँव और कभी मद-मस्ती मे खाट की बेड़ियों मे अपने पाँव को फंसा देते। खाट पर बिछी बिछौनी तो खाट के नीचे लटक रही थी। औढ़ावनी तो सिर के नीचे घुसी थी। अपनी वर्दी भी आज उन्होने उतारी नहीं थी। उन्ही को पहने, “मैं वन की चिड़िया, वन-वन डोलू रे।" गाए जा रहे थे।

ना जाने कौन सी फिल्म का ये गाना उनकी जूंबा पर अटक गया था। गाने की अगली लाइन क्या है वे तो आ ही नहीं रही थी। बार-बार यही बोल आते और झट से खामोशी हो जाती।

दरवाजे से सटे बक्से के ऊपर बिस्तरा करती उनकी बीवी उनकी तरफ देखकर कुछ सुनने की कोशिस करती मगर समझना उनके बस का नहीं था। वे रामेश्वर जी की तरफ आते हुए बोली, “क्या बात है जी बड़े मस्ताये रहे हो। नेक मे क्या दारू मिल गई आज को चड़ा आए।"

रामेश्वर जी उनका हाथ पकड़ते हुए बोले, “अरी तुझे तो दारू ही नज़र आती है। हमें तो अरसा हो गया मस्ताने बने हुए। याद है पिछला, दो गर्मियाँ बीत चुकी है।"

"हाँ-हाँ अच्छी तरह से याद है। आश्रम के पुल के नीचे रहते थे तब हम। वहाँ भी आसमान मे यूहीं नज़र गाड़े थे तुम, पर ये भूल गए थे कि पुल के नीचे पसरे हो। पुल के छेदो के अन्दर से दिखती रोशनी को तारें समझ रहे थे। खूब याद है मुझे।"

रामेश्वर जी अपने हाथों को खाट पर लम्बा फैलाते हुए बोले, “अरी तूने तो मुझे पागल समझ लिया। इतनी नहीं पीता मैं कि मस्तानों की टोली से बाहर हो जाऊं।"

उनकी बीवी रामेश्वर जी के सिरहाने पटले पर बैठते हुए बोली, “आज क्या हुआ है वो बताइये, काहे इतना मस्ताए रहे हो?”

रामेश्वर जी ने अपनी आँखों के ऊपर हाथ रखते हुए कहा, “आज का दिन मेरी 20 सालों के इस बहुरूपिया बनने के टाइम मे पहली बार आया है। इसे नहीं भुला सकता मैं। अरी कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं लोगों के घर मे जाकर करता क्या हूँ? उनके दुख-दर्द के साथ मे कुछ मेल होता है मेरा? अगर किसी के घर मे कुछ हो जाये तो भी मैं बहुरूपिया बना फिरूंगा? बस, इसी खुशी मे चड़ाली मैंने आज। बता कुछ बूरा किया मैंने?”

उनकी बीवी रामेश्वर जी की तरफ़ अपना पूरा ध्यान लगाते हुए बोली, “जी आप तो कभी ऐसा नहीं सोचते थे, आज क्या हुआ है आपको? और मैं जाने ना हूँ क्या आपको, आप तो हमेशा सुख-दुख दोनों को खूब सोचते हैं। बात क्या है जी वे तो बताइये?”

रामेश्वर जी फिर से अपने मे खोते हुए बोले, “आज हम जिसके घर मे गए थे वहाँ पर कुछ भी नहीं था‌। ना तो टेन्ट लगा था और ना ही कुछ पंडाल था। सिर्फ़ घर के लोग थे वो भी खाट बिछा कर घर के बाहर ही बैठे थे। पूरी गली की आँखे उनके ऊपर जमी थी। ना जाने क्या हुआ था? मगर कुछ अलग सा लग रहा था। जैसे ही हमने उनके घर के सामने कदम रखा तो गली वालो की नज़र उनके ऊपर से हटकर हमारी तरफ़ मे आ गई। जैसे हमारे आने से उस घर मे कुछ होगा और उसे होता हुआ देखने के लिए गली के लोग तैयार हो रहे हैं। हम भी सबकी तरफ मे मुस्कुराते हुए वहाँ खाट पर बैठे आदमी के पास गए। वे हमे देखते ही खड़े हो गए। पर हमने कुछ कहा नहीं। बस, रजिस्टर उनके हाथ मे दे दिया। पहले तो हमने ये सोचने मे ही अपना टाइम लगा दिया था कि आखिर मे वो घर कौन सा है जहाँ पर शादी है? पर लोगों को देखकर ही लग रहा था कि यही है। उन्होंने अपनी आँखो के इशारों से ही हमे बता दिया था कि यही घर है।

वो आदमी जो हमें देखकर खड़े हो गए थे वे हमसे कुछ नहीं बोले बस, हमे देखते रहे। बहुत हल्की सी आवाज मे जैसे ही कुछ कहते इतने मे एक औरत ने उनसे कहा, “ये तो आयेगें ही इनको हम तो नहीं रोक सकते। ये तो सहना ही पड़ेगा ही सुखलाल, ये तो झेलना ही पड़ेगा।"

उनकी निगाह झुक गई थी। वो रजिस्टर हमारे हाथों मे ही घूम रहा था। गली मे खड़े सभी के चेहरे उनके घर की ही तरफ़ मे मुड़ गए थे। जैसे तमाशा दिखाने वाले को घेर लिया जाता है। मैं समझ नहीं पा रहा था की ये हो क्या रहा है? पहले तो लगा की यहाँ कुछ तो ऐसा हुआ है जो सहीं नहीं था। लेकिन हमारा भी तो कुछ फर्ज़ और काम है ना यहाँ पर। उसी को दिमाग मे लेते हुए चले जा रहे था उनके घर की तरफ़। चाह कर भी वहाँ से जाने की इच्छा नहीं हो रही थी।

उनके चेहरे को देखते-देखते ही हमने अपने लिए वहाँ पर जगह ढूंढ ली थी। बस, अब इंतजार करना बाकि रह गया था। इतने मे उनकी नज़र गली के एक कोने पर गई। गली के अन्दर कुछ लोगों ने प्रवेश किया। उनके हाथों मे बड़े-बड़े परछे थे। देखने मे तो वो हलवाई से कम नहीं लग रहे थे। वो सीधे उनके ही दरवाजे पर चले आये। फिर लगा की हम किसी गलत पते पर आ गए हैं। यहाँ पर अभी कोई प्रोग्राम शुरू ही नहीं हुआ है। यहाँ पर आज नहीं दो दिन बाद आना होगा। लेकिन फिर दुकान वाले ने हमें समान की लिस्ट क्यों दे दी थी। यहीं दिमाग मे चुभने लगा था। मैं क्या बताऊ कुछ भी खोपड़ी मे घुस ही नहीं रहा था। हम तो वहाँ पर बिना कुछ कहे बस, खामोशी से खड़े रहे। शायद, इसी मे हमारी भलाई थी।"

इतनी लम्बी बात कहकर वो अपने गाने की धुन मे फिर से खोने लगे। उनकी बीवी तो बस, मण्डली को कोसने लगी थी, "सही पता देना चाहिये। कुछ ऊंच-नीच हो जाये किसी के साथ तो क्या होगा?”

मगर उनको यह नहीं पता था कि रामेश्वर जी की ज़ुबान मे क्या अटका हुआ है? जो बाहर निकलने मे इतनी मस्सकत कर रहा है। वे ना चाहते हुए भी उसको कभी बताते तो कभी वो दिल मे ही रह जाता। रामेश्वर जी बोले, “क्या कहूँ, कभी-कभी तो जानकी यहाँ पर सबकी हालत ऐसी हो जाती है जैसे हम लेम्प मे जलती लॉह हैं, जिसे ना तो तेज किया जाता है और उम्मीद भी रखी जाती है कि वो रोशनी ज्यादा दे। क्योंकि उसे तेज कर दिया तो वो लेम्प के शीसे को काला कर देगी और रोशनी नहीं होगी। ये क्यों होता है? कुछ पता नहीं, अरे हटाओ इसे, मैं वन का चिड़िया, वन-वन डोलू रें।"

हल्की-हल्की ऑस उनके मूह पर गिरने लगी थी। पार्क मे जलते खम्बे के बल्ब मे बिलकुल भी जान नहीं थी के वो उस ऑस को नज़र अन्दाज करने मे उनकी मदद कर सकें। बस, वे बिना कुछ ऑढ़े खाट पर करवटें बदल रहे थे। कभी मुस्कुराते तो कभी आसमान मे तारों की जान के पीछे पड़ जाते। आज कमबख्त तारें नज़र भी तो नहीं आ रहे थे। एक-काद नज़र आ जाता तो वो गिनकर सो तो जाते। लेकिन आज तो वे भी नख़रों पर उतर आये थे। अब किया भी क्या जा सकता था। बड़-बड़ाना उनका चालू ही था।

उनकी बीवी ने उनको कुछ भुलवाने के लिए बात को काटते हुए कहा, “अजी परे करों ये सब, खाना लाऊ मैं? भूख नहीं लग रही है क्या तुम्हे आज? या इसी सोतन से ही पेट भर गया तुम्हारा?”

रामेश्वर जी- गाना दोहराते हुए बोले, “मैं वन का चिड़िया, वन-वन डोलू रे, अरी आज तो वो नशा है मुझमे की भूख का ख़्याल लाना ही मेरे लिए अनर्थ होगा। समझी के ना! तू खाले, मैंने आज नहीं खाना-खाना।"

उनकी बीवी ने अब कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की थी। वे बस, उनके साथ मे बैठी रही। सोच रही थी कि क्या पूछें जिससे उनके दिमाग से वहाँ की बातें निकल जाये। लेकिन सब, इन्तजाम बेकार ही थे। अब तो उनके भी दिमाग मे ये घूमने लगा था की वहाँ क्या हुआ होगा और इस तरह से लोगों के उनके घर के आगे जमा होने का क्या कारण हो सकता है? वे अपने दिमाग मे वहाँ की तस्वीरे खींचने लगी। उस आदमी का चेहरा, लोगों की नज़रे, खाट पर बैठे परिवार वाले, बड़े-बड़े पर्छे लाने वाले वे हलवाई और ना जाने कितने तरह के चेहरे उनके दिमाग मे बनने लगे थे। पर किसी का भी वहाँ पर क्या काम है वे नहीं बना पा रही थी। तो खामोश बैठी थी। इस इंतजार मे की ये अभी उठेगें और दोबारा से वहाँ के बारे मे बोलने लगेगें।

रामेश्वर जी आँखों को बन्द किए, खाट पर सीधे लेटे थे। उनके पास कहने को तो बहुत कुछ था लेकिन जो वो कहते उस कहने से उनका कोई रिश्ता नहीं था। तो उस बात के नीचे दबना नहीं चाहते थे। क्यों उस बात को दोहराया जाये जिसके होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था उन्हे। पर क्या सच मे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था! ये उनका वहम था। जो होना था वो तो हो चुका था।

रामेश्वर जी उसी अवस्था मे ही बोले, “जानकी रे, कोई बड़ी बात ना है जो तू इतना खामोश बैठी है। मेरे ना कहने पर दाना भी ना चुग रही। आज तक तो ऐसा हुआ नहीं है। खाले जाके। एक बात कहूँ हूँ मैं तुझे, मैं वहाँ के बारे मे बताना तो चाहता हूँ पर मुझे वहाँ जो माहौल रहा था। उसको बताया नहीं जा रहा। लग रहा है जैसे मैं या तो सब कुछ बता दूंगा या फिर कुछ ऐसा छोड़ दूंगा जिस से उस बात का कोई और ही मतलब बनेगा। जिसमे जो बात को आगे बड़ाता है वो उसको गलत ज़ुबान मे ले जाता है। मैं कहीं वो ना बन जाऊ। इसलिए बता नहीं पा रहा हूँ। वहाँ पर बहुत सारे लोग थे। सबके मूंह पर या तो ताले लगे थे या फिर सभी उस घर के बारे मे बोलने के लिए तैयार थे। बस, थोड़ी हवा की जरूरत थी। पिछली रात शुक्रवार की थी। इस ठंड के मौसम मे लोग जल्दी ही घरों मे घूस जाते हैं तू तो जानती ही है। उस आदमी के घर मे शादी थी। उनकी लड़की की। तो ज्यादा मेहमान तो नहीं थे। लेकिन जितने भी थे वो एक किराये के मकान मे थे। जो कि उस आदमी मे लिया हुआ था। मेहमानो के लिए। रात लगभग साढ़े दस बजे होगें। जिसकी शादी थी वे किसी लड़के के साथ मे भाग गई। गली के कुछ लोगों ने देखा मगर किसी ने रोकने की हिम्मत नहीं जुटाई। सब यूहीं देखते रहे। बस, जब उन आदमी के घर मे हल्ला मचा तो सभी बाहर खड़े हो गए। उसके बाद तो बस, रोना-धोना शुरू हो गया। ना जाने क्या-क्या नहीं हुआ होगा। सब कुछ दिमाग मे आता है तो कलेजा हिल जाता है। बस, एक बात दिमाग मे घूम रही थी कि जो भरी थाली मे लात मार के जाता है वो कभी सुख नहीं भोगता।"

उनकी बीवी ने रामेश्वर जी की तरफ मुस्कुराते हुए देखा और कहा, “अजी तो ये बताइये कि तुम इतना क्यों सोच रहे हो उनकी बातों को? ये अलग-अलग घर के मसले हैं। तुम्हे सोचने की क्या जरूरत है?”

रामेश्वर जी ये बात सुनकर कुछ बौखलाये जरूर थे लेकिन, बोले, “तुझे जो नेक के पैसे लाकर देता हूँ उसपर हमारा क्या हक है बता? वो नेक क्यों देते है बता? या ये बता कि बहुरूपिया खाली पैसे ले और निकल आये उसका कोई धर्म नहीं है? मैं भी विनोद की तरह से आ सकता था दारू पीकर सो सकता था लेकिन मेरे दिमाग से ये बात नहीं निकलती तो मैं क्या करूँ? अरी तू समझती नहीं है। तू जो वहाँ पर होती तो पता चलता। उस वक़्त वहाँ पर क्या हालात थे। नज़रों से बचना और उस मे शामिल होना दोनों ही मुश्किल थे। जैसे मुझे लग रहा था। अगर ये किसी के लिए आसान है तो होगा। लेकिन मेरे लिए नहीं था। पर तू चिंता मत कर मैंने वहाँ किसी को ये महसूस नहीं होने दिया कि मुझे भी किसी किस्म का दुख हुआ है।"

ये बात कहते हुए वे खाट पर दूसरी तरफ़ मे करवट लेते हुए चुप हो गए। उनके बड़-बड़ाने की आवाज धीमी थी। बिना मूह को खोले ही अपना गाना गुन-गुना रहे थे। आवाज, उनकी खाट के पाये तक ही रहती। खाट के नीचे भी नहीं जाती होगी। ये आवाज उनके गले की नहीं पेट की थी। जो घूम रही थी।

लख्मी

Tuesday, November 11, 2008

ये अब पुरानी नहीं लगती

श्याम लाल जी, दक्षिण पुरी के उस समय को दोहराते हैं जब उन्होनें शुरूवात कि थी अपने काम के सफ़र की, शहर मे निकलना व उसके साथ मे समझौते करना। उनके लिए आसान नहीं था। किसी नई जगह में टूटकर आना और फिर उसके बाद मे वहाँ पर अपने लिए जगह बनाना बहुत मुश्किल होता है। उसके साथ मे उस बदलाव को महसूस करना जो धीरे-धीरे उनके अन्दर दाखिल हो रहा है जिसे रोका भी नहीं जा सकता। ये बोल उनके उस वक़्त के हैं जब वे काम की दुनिया से इस्तिफा देने वाले हैं और उस सफ़र को बताने की कोशिस कर रहे हैं जहाँ से वे खाली होकर ही नहीं आए बल्कि उस वक़्त मे रहे हैं।

उनके साथ बातचीत मे वे अक्सर अपने उस दौर का बख़ान करते हैं जिसमे उन्होनें दिल्ली जैसे बड़े शहर को करीब से जानने की कोशिश की। जिसमे उनके साथ मे घटते हर वाक्या उनके घर को दोहराने के कारण बने। अब घर मिट्टी का ढेर नहीं बल्की कई घटनाओं का स्थल लगता है। जिसे वे कभी बताते समय नहीं चूकते। उनके बोलों मे उनके बीते हुए समय की महक बखूबी महसूस होती है। अभी कुछ ही टाइम पहले उनके दिल का ऑपरेश्न हुआ है। जिसमे उनके काम पर बहुत गहरा असर पड़ा। पूरे 12 घण्टे साइकिल चलाने वाला इंसान अब जरा सा भी हॉफ नहीं सकता था। उनको मना थी। नौकरी से तो उनका बहुत पहले ही विश्वास उठ गया था। बस, वे अपने को बताने से पहले एक बात हमेशा कहते, “जब हाथ पैरों मे दर्द होगा तो काम की तलाश शुरू कर दूंगा।" हसंकर अपने को दबा जाते।

ये एक बार की मुलाकात मे नहीं होता था। शायद, उनके अन्दर रम गया था। जो हर बात पर उछल आता था। कभी-कभी लगता था कि ऐसा क्या होता है कि इंसान अपने अतीत को कुरेदने लगता है? कौन सा पल है जो उछट आता है? ये जानना जरूरी होता भी है और शायद नहीं भी। लेकिन उनकी ज़ुबान से ये कुछ गहराई मे चला जाता था।

आज की मुलाकात, खाली उनके ही नाम थी। अक्सर तो बातचीत मे दो आवाजें सुनाई देती थी लेकिन आज सिर्फ़ एक थी वो उनकी, वे कह रहे थे-

25 सितम्बर सन् 1975 मे हम यहाँ दक्षिण पुरी मे आये। हमारे साथ मे कई और परिवार भी थे। यहाँ पर जब कुछ भी नहीं था खाली पड़ा दूर-दूर तक मैदान ही था।

हमें यहाँ शाम के लगभग 5 बजे टैम्पो से उतारा गया था। हांलाकि यहाँ पर कई टैम्पो आये थे मगर हमें हमारी कम्पनी वालों ने टैम्पो करा कर दिये थे, हम उन्हीं मे बैठकर आये थे। जैसे ही हमने यहाँ दक्षिण पुरी मे कदम रखा तो इतनी तेज बारिस शुरू हुई के हम क्या बतायें। बहुत तेज बारिस थी उस वक़्त। पता नहीं क्या सोचकर सरकार ने हम झुग्गी वालो को मकान दिये थे। इतनी तेज बारिश थी के कुछ भी बचाना नामुमकिन था और यहाँ पर कोई जगह अथवा ऐसा कोई ठिकाना भी नहीं था कि हम अपने समान और परिवार वालो को बारिस कि तेज बून्दो से बचा सकें। लगभग तीन या चार टेन्ट से कमरे बना रखे थे उनसे क्या होता है। सिर छुपाने के लिए ले-देकर वही एक सहारा था मगर इतनी तेज बारिस मे समझो वे किसी काम के नहीं थे। अगर पैरों को बचाते तो सिर भीगता, समानो को बचाते तो बच्चे भीगते। बच्चो के सिरो को हमने कढ़ाई और पतीलो से ढ़ाककर बारिस से बचाया था। अगर बिमार पड़ जाते तो दूर तक कोई दवाईखाना भी नहीं था।

खाली यही रात नहीं थी जो हमें काटनी थी। यहाँ का तो हर दिन और रात एक कठिनाई ही बनकर हमारे सामने खड़ी हो जाती। आसपास की जगहों के बारे मे भी नहीं पता था की यहाँ सबसे पास मे कौन सी जगह है जो वहाँ पर चले जाते। बस, यहीं के होकर रह गए थे। हां, बच्चो के लिए अच्छा रहा कि खेलने के लिए बहुत जगह थी। सवेरे छोड़ो तो शाम मे ही अपनी शक़्ल दिखाते थे बच्चे। उस समय एक पैसे के सिक्के बहुत थे मेरे पास, जो चलना बन्द हो गए थे तो सारे बच्चे उसी से अपना खेल खेलते थे, कभी "कल्ली-जोट" तो कभी "खड़ी"।

दक्षिण पुरी मे सारे साधन धीरे-धीरे ही आये, जैसे हर चीज का प्लान पहले से नहीं था। बस, लोगों को डाल दिया उसके बाद मे उनके लिए चीजें मुहाइया करा दी जायेगीं। यही सिलसिला चलता रहा था आने वाले दस सालो तक। सबसे पहले देखा जाये तो यहाँ पर यतायात का साधन डाला गया। मगर, वो भी सन् 1979 मे, उसके दो साल के बाद लगभग 1981 मे यहाँ पर बिजली आई। मुझे याद है जब मेरा दूसरा लड़का हुआ था तो उसी दिन हमारे घर मे बिजली का मीटर लगा था। ले-देकर हमें चार साल तक पैदल ही काम करना होता था। जगह तो मिल गई थी मगर, यहाँ पर भूखा भी तो नहीं रहा जा सकता था ना, पेट के लिए और बच्चे अगर रोटी मांगेगे तो क्या उनसे ये कहेगें कि बेटा इस खुशी मे रोटी मत मांग की हमें हमारा घर मिल गया। ऐसा कहीं नहीं होता। यहाँ से सभी लोग लगभग चार किलोमीटर तक पैदल जाया करते थे काम करने के लिए। यहाँ से देखा जाये तो एक ग्रेटर कैलाश ही सबसे पास मे था जहाँ पर यहाँ की औरतों ने काम करना शुरू किया। घर से निकलते ही जगंल था तो उसी को पार करते और बस, पहुंच जाते और हम लोग तो चिराग दिल्ली तक पैदल जाया करते थे। पूरा तीन किलोमीटर पड़ता है वो, उस समय मे तो कोई गाड़ी नहीं थी। बस, एक बस चलती थी उसका नम्बर मुझे ठीक से याद नहीं है मगर वो विराट सिनेमा जहाँ बना है वहाँ से चलती थी और कालका जी मन्दिर, गोविन्द पुरी, ओखला और बस अड्डे तक जाती थी। फिर उसके बाद मे सन् 1982 मे यहाँ पर 580 और 521 नम्बर की बस चलाई गई। 521 नम्बर की बस यहाँ दक्षिण पुरी से प्लाजा जाती और 580 नम्बर की बस केन्द्रिय सचिवालय तक जाती। वैसे यहाँ पर आप 521 नम्बर की बस जितनी लगा दो उतनी कम है। इतनी सवारी है यहाँ पर कि लोग एक-दूसरे पर लदने के लिए तैयार हो जाते हैं।

मैं कभी नहीं भूल सकता आर.टी.वी बस का सफ़र, जिसमे मैं रोज महज़ तीन किलोमीटर का सफ़र तय करता हूँ। आर.टी.वी छोटी बस है जो महज़ मूलचन्द तक चलती है पर उसमे कोशिस होती है कि पूरी बड़ी बस की सवारी भर दी जाये। उस बस के कन्डैक्टर की ज़ुबान पर हमेशा गाली व अपशब्द रहते हैं जो कभी सवारी को इंसान नहीं समझ सकतें। हां, एक बात जरूर है वे अगर दक्षिण पुरी आने वाले को बीच सड़क पर भी खड़ा देख लेते हैं तो बीच सड़क पर ही गाड़ी रोक देते हैं उस ले आते हैं। लेकिन, गाड़ी मे ये इनका बस नहीं चलता, नहीं तो लोगों को एक के ऊपर दूसरे को तय लगाकर खड़ा कर दें।

मैं सवेरे आठ बजे घर से निकलता हूँ अगर, दो मीनट की भी देरी हो जाती है तो बस मे खड़े रहने की भी जगह नहीं मिलती और दो मीनट की देरी लगभग आधे घण्टे की देरी समझलो। कभी भी अपने टाइम पर काम पर नहीं पंहूच सकते। वैसे देखा जाये तो दो मीनट के अंतराल मे आर.टी.वी चलती है लेकिन फिर भी लोग दरवाजे पर लटके रहते हैं। ड्राइवर की सीट पर दो आदमी बैठे होते हैं और बस का कन्डेक्टर गाड़ी के पीछे वाले शीसे पर लटक कर टिकट बना रहा होता है। ये सब इसलिये नहीं है कि गाड़ी कम है बल्कि इसलिए है कि लोगों को जल्दी है। वापसी मे तो मैं हमेशा ही गेट पर लटक कर आता हूँ। शर्म भी आती है मगर अब पैदल आया-जाया नहीं जाता। एक टाइम था जब मैं बिमार पड़ा था तो मुझे होली फैमिली अस्पताल मे भर्ती कराया गया था। मुझे खून की उलटियाँ हुई थी तो मेरी बीवी और बच्चे काम करके वहाँ आते थे। ना जाने कितना पैदल चलना पड़ता होगा उन्हे। आज के वक़्त मे मेरे कुछ दोस्त कहते हैं, "दिल्ली मे जो आदमी पैदल चल रहा है वो बेवकूफ है, क्योंकि यहाँ पर हर जगह बस जाती है।" मगर उन्हे क्या पता? उस वक़्त को सोचता हूँ तो आज का वक़्त कैसा भी हो सहीं ही लगता है। आने वाला समय तो शायद ऐसा होगा की लोग एक-दूसरे से चिपक कर चलेगें शायद, भीड़ ही इतनी हो जायेगी।

जब मैं बस मे लटक कर आता हूँ तो लोग कहते होगें कि देखो बुढ्ढे को देखो कैसे जवानी छा रही हैं मगर, क्या कंरू मेरी मजबूरी है। बस, यही है दक्षिण पुरी से बस के साथ हमारा रिश्ता।

और फिर अपने आपको दोहराने का पन्ना वो एक मासूम सी हंसी के साथ मे बन्द कर देते। ना जाने कितने ही पन्ने अभी खुलने बाकि हैं। जिनका इंतजार वक़्त नहीं मगर कोई मुलाकात करती है। किसके साथ होगी? कहाँ होगी? और किस वक़्त होगी ये कुछ पता नहीं है।

लख्मी