Tuesday, February 12, 2013

अपना हाथ जगननाथ


हम क्या बनना चाहते हैं उसके पीछे ही दौड़ रहे हैं। मगर हम क्या बन सकते थे वही भूले हुए हैं बस। मैं भी जो बनने चला था वो तो नहीं बन पाया मगर क्या बन सकता था वो भी भूलता गया। हमारी याद रखने की क्षमता से ज़्यादा तो हमारी भूलने की ताकत है। आज हम बैठकर बात करते हैं कि "मैं जो ना बन सका" से अपनी मंजिल रचते हैं।


मैं जो ना बन सका...
पहली से पांचवी तक के स्कूल में टाइम से सब कुछ चलता था लेकिन किसी के पास घड़ी नहीं होती थी। ना तो टीचर के पास, ना क्लास में और ना ही किसी बच्चे के पास। बस, घंटियां थी। वे बजती और क्लास शुरू। मगर हमने सोच लिया था कि क्लास में एक टीचर से दूसरे टीचर के बीच की दूरी को किस तरह से जिया जाये। उसमें कभी नये गाने बनने लगते तो कभी कोई नये खेल बुन जाते। धूप पूरी क्लास में उस घड़ी का काम करती जिसने इस दूरी को समझना सिखाया था कि इस दूरी को किस तरह से जिया जा सकता है। क्लास में धूप जहां जहां चलती मैंने वहां पर जमीन से, कुर्सियां, उससे डेस्क और डेस्क से दीवारों पर अपने हाथ से नम्बर लिख डाले थे। टाइम देखकर धूप की घड़ी बना डाली थी। पूरी क्लास दूर से देखने पर लगती थी जैसे हमने उसे प्यानों की तरह बना दिया है। लेकिन वो तो धूप घड़ी थी। पूरी क्लास एक टाइम मशीन की तरह बन गई थी लेकिन मैं, घड़ी बनाने वाला भी ना बन सका।


पढाई दिमाग में घूसी नहीं। अपना हाथ जगननाथ के नारे ने स्कूल भी छुड़वा दिया। हाथ की दस्तकारी पाने को मकैनिक की दुकान का ताला बन गया। उसे टाइम पर खोलना और बंद करना रहा। क्या रबड़ है, क्या टीन, क्या पीतल, क्या सिलवर और क्या लोहा छांटकर चिट्ठे लगाता रहा। गाड़ियों से निकाली गई चीजों को साफ कर उन्हे फिर से नया बनाता रहा। वहीं चीज़ें दोबारा से गाड़ियों में लगा दी जाती और नये के पैसे ले लिये जाते। चमक क्या होती है, नया क्या होता है और कहां से और कितना साफ करना है सब कुछ जैसे अपने आप हाथों में बस गया था। मगर क्या करें मैं इतना करने के बाद भी एक मकैनिक ना बन पाया।


छोटी सी उम्र में गाड़ी चलाना सीख गया। इस दूकान से उस दूकान समान पंहुचाता रहा। एक छोटे से एक्सीडेंट ने पेंटर का शार्गिद बनने पर मजबूर किया। पेंटर भला था कोई भारी काम नहीं करवाता था। ब्रुश साफ कराना, केनवस फिट करना, रंग निकालना और खराब पेंटिग को साफ करना। कुछ दिनों के बाद में एक पेंटिंग को मैंने साफ किया। उस पेंटिग को देखकर लोग रोज हंसते थे। वहां उसे खड़े खड़े देखा भी करते थे। बंद दुकान की वही एक पहचान भी बन गई थी। बस, बनी बनाई पेंटिंग को मैंने और रंगो से साफ कर दिया था या ये कहिये की और रंगों से उसे भर दिया था। अमिताभ बच्चन की पेंटिंग में कई और अमिताभ बच्चन दिखने लगे थे। दुकान पर भीड़ रहने लगी थी। मैंनें फिर कई ऐसी और दस्तकारियां की इतना करते रहने के बावजूद भी मैं एक भी अच्छी पेंटिंग बनाने वाला नहीं बन पाया।

लकड़ी के केनवस बनाने में बहुत पैसा है। ये सुनते ही अपना भविष्य दिखने लगा। लगता था की लकड़ी का काम तरक्की देगा। बैठने की आरामदायक कुर्सियां, लेटने के लिये, चढ़ने के लिये, पढ़ने के लिये, झूला, जीना, कबर, पेटी, लकड़ी के रूप घने थे। कोई ना कोई चीज़ तो मैं बनाना सीख ही जाऊगां। यह सोचकर पुरानी लकड़ी की मार्किट में घूस गया। शुरूआत में रस्सी और पुरानी लकड़ी हाथ में लगी। काफी पुराना माल जो पहले से ही बना हुआ था। सोफा, रेक, ड्रेंसिटेबल, बुकसेल्फ। सबको काटना था। मैं क्या बनाना चाहता हूँ लकड़ी को उसमें से निकालना था। मैं तो बस, बनी हुई चीजों में से कुछ ही हिस्से काटकर उसमें रस्सियां लगा देता। और बना देता झूले वाली कुर्सी, परदेदार कुर्सी, परदे वाली चौखट, घुमने वाली टेबल। बहुत डांट पड़ती। और कभी कभी तो थप्पड़ भी। सुनना पड़ता, 'आरी पकड़ने की तमीज नहीं है और हथोड़ा चलाने का ठेका लेता है।'  डर के मारे वो काम मैनें छोड़ दिया। अगर वहीं पर सुनकर और पिटकर रहता तो एक कारपेंटर तो जरूर बन जाता मगर वो भी रह गया।


सरकार से एक साइकिल नसीब हुई। हाथ से चलाने वाली साइकिल। कई साल हाथ के काम को तलाशता मैं यहां तक पहुँच जाऊगां ये मालुम नहीं था। साइकिल मिली हाथ से चलाने वाली। अब उसी साइकिल को मोटरसाइकिल में बदलता हूँ। ऊपर छतरी लगाता हूँ। उसे दुकान बनाता हूँ। ऐसा स्टॉल बनाता हूँ जिसे बाहर कर दिया जाये तो वो कुछ और बन जाये और बंद कर दिया जाये तो साइकिल। उसमें शीशों के बोर्ड बनाता हूँ। बोर्ड खाली पढ़ने के लिये नहीं होने चाहिये। वो ऐसे हो की लोग उसके सामने खड़े हो पाये। विवश हो जाये खड़े होने के लिये। मैं शीशों के बोर्ड बनाता हूँ। लोग आते जाते उसमे एक झलक खुद को देखते जरूर हैं। मैं कम जगह में मोबाइल शॉप बनाने की कोशिश कर सकता हूँ। बल्कि बना सकता हूँ। स्टॉल, हेंडिकेप साइकिलों से। जिन्हे रिचार्ज काऊंटर बना सकता हूँ। ओपन शॉप और फिर साइकिल।

सोचता हूँ अपना यह डिजाइन और इस कोशिश को दिल्ली विकलांग संस्थान को भेज दूँ। ताकी वो मेरी इस अर्जी को एक नज़र जरूर दें। पर फिर लगता है की अभी बहुत आगे और जाना है। सही कहा था लोगों ने, “अपना हाथ जगननाथ"
  

लख्मी

5 comments:

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (13-02-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

प्रतिभा सक्सेना said...

हिम्मत करे इंसान तो क्या कर नहीं सकता!

Madan Mohan Saxena said...

सुन्दर प्रभाब शाली अभिब्यक्ति .आभार .

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Akhil said...

सत्य और सार्थक रचना ...बहुत बहुत बढ़िया।

Akhil said...

सत्य और सार्थक रचना ...बहुत बहुत बढ़िया।