Thursday, December 5, 2013

लाइलाज़ नज़ारें

बारिश अभी रुकी नहीं थी और लगता था की ये पूरे कनागत बरसने वाला है। चार दिन तो हो गये थे बसरते - बरसते। इन दिनों कहानियाँ का बिखरना थोड़ा कम है। एक – दूसर से मिलना जितना दुर्लभ है उतना ही इन मिठी और खमोश कहानियाँ का एक – दूसरे के मुँहजोरी करना भी।

लेकिन क्या सारी कहानियाँ मुलाकात पर निर्भर होती है?, नहीं - हर कहानी नहीं। कहानियों के पर लगे होते हैं जो खुद ही कहीं से भी कहीं उड़कर पहुँच जाती हैं। फिर उनको देखकर मुस्कुराती हैं जो मुलाकातों के ऊपर आर्क्षित होते हैं। कहानियों का एक खास बिछोना भी होता है जिसपर कोई भी कुछ देर सुस्ताकर जा सकता है और तकीये पर अपनी कोई निशानी छोड़ भी सकता है। क्या वो निशानी महज़ निशानी ही बनकर दम तोड़ देती है?

पूरा नाला पानी से भर गया था। काला - काला पानी किचड़ समेत सड़क पर निकलकर आने की कोशिश मे था। कुछ ही देर के बाद मे यहाँ पर जाम बस, लग ही जायेगा। जाम लगने का सबको पता होता लेकिन सरकार को कोसने और गाली देने के अलावा किसी को जरा सी भी फुरसत नहीं थी कि इससे आगे कुछ किया जाये। सबसे पहले तो नाले के गन्दे पानी की महक पूरे मे अपना नाम करती। उसके बाद मे पानी। नाले के साथ मे लगी दुकानों को चाहे इससे कोई फर्क पड़े या न पड़े लेकिन इन दुकानों से समान खरीदने आये ग्राहको को जरूर दिक्कत होने वाली थी। ऊपर से बारिश का पानी और नीचे से काला पानी दोनों रिस रहे थे। नाला टापना बहुत मुश्किल था तो लोगों ने इस पार से उस पार जाने के लिये कई सरकारी खम्बों का पुल बनाया हुआ था। सुबह और शाम मे यहाँ से पूरा का पूरा हुजूम गुज़रता है। इस नाले की कोई दिनचर्या हो या न हो लेकिन ये अनगिनत दिनचर्याओ का हिस्सेदार जरूर है।

सुबह के आठ बजकर तीस मिनट हो चुके हैं। सड़क पूरी लोगों से भरी है। नाले पर बने सारे पुल लोगों से भरे हुए हैं। नाले मे देखने और झाँकने की जिद्द सबकी तारतार है। ऐसा लगता है जैसे किसी मौत के कुएँ मे कोई खरतनाक शोह चल रहा है। जितने झाँकने वाले ज्यादा है उतने ही दूर से देखने वालों की भीड़ भी कम नहीं है। एक नाला आज कई कहानियाँ का बसेरा लगता है। गर्मागर्म नांद की तरह से हर कहानी पककर निकल रही है। दूर से देखने मे बस, एक यही खामी है तो मज़ा भी है। जो भी वहाँ उस भीड़ से बाहर निकलता है उसी के पास एक कहानी होती। न जाने उसमे क्या था और वो क्या बनकर बाहर आ रहा था।

नाले के एक दम साथ मे दीवार के नीचे एक औरत लम्बा सा घूंघट करके रोये चले जा रही थी। कोई भी उसका चेहरा नहीं देख सकता था। वो शायद अकेली भी थी। उसको रोता देखकर लोग उसे कुछ ऐसी निगाहों से देखते जैसे नाले के अन्दर बहती कहानी उसी से जुड़ी है। बारिश काफी तेज हो चुकी थी। वहाँ पर खड़े सभी तितर-बितर होने की कोशिश मे थे लेकिन उस औरत का रोना और वहाँ उस जगह से उठना तय नहीं था। नाले मे भी कुछ लोग कूद गये। कहीं जिसके कारण ये सब घटा है वो ही कहीं बह न जाये। नाले के पानी का बहाव काफी जोरो से था आज। नहीं तो हमेशा ये रूका रहता है। कुछ न कुछ कूड़ा इसमे अटका रहता है लेकिन आज तो इसकी रफ़्तार देखने लायक थी। न जाने किसका साथ दे रहा था।

नाले के चारों तरफ लोग रैलिंगों पर चड़े खड़े थे। ये देखने की कोशिश मे की आखिर मे उसमे से निकलेगा क्या? वो नाले के अन्दर कूदने वालें लोगों के हाथों मे कुछ था। जो बेहद सफेद था। उन्होनें उसको छुपाया हुआ था अपने कपड़ो से लेकिन कुछ भाग अगर दिख जाता तो लोग ऐसे कहानियाँ बुन लेते जैसे हर चीज़ उनके हाथों से होकर निकली है।

कमीज़ के नीचे से कुछ भाग नजर आ रहा था। दिखने वाला हिस्सा किसी गीली और गली हुई रोटी की भांति था। सफेद रंग मे लिपटा वो हिस्सा कितने वक़्त पानी के चपेट मे रहा होगा उसका अन्दाजा कर रहा था। किसी को कुछ कहने या सुनने की जरूरत भी नहीं थी। लगता था जैसे वो हिस्सा खुद से कुछ बयाँ कर रहा है। उन लोगों ने उसे वहीं पर आईस्क्रीम की रेहड़ी पर रख दिया। कमीज़ मे लपेटा हुआ। लोग उसे देखना चाहते थे लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी की उसको पूर्ण रूप से देखा भी जाये। ये कोई दो या तीन महीने का बच्चा था। जो पानी से फूलकर डबल रोटी की तरह से हो गया था। अगर कोई उसको छूता भी तो भी खाली पाँव की उंगलियों पर ही हाथ लगाते बाकि का हिस्सा तो ऐसा लग रहा था जैसे उंगली लगाते ही वो फूट पड़ेगा।

वहाँ कई सारी आवाज़ों के बीच मे उस औरत के रोने की आवाज़ भी सभी के लिये सुनने का एक हिस्सा बनी हुई थी। नज़रें दोनों की तरफ मे कुछ इस तरह से घूमती जैसे गली मे कोई चिड़ी-बल्ले का खेल खेल रहा हो और देखने वालों की भीड़ लगी हो।
रोने की आवाज़ काफी तेज थी और ताना कसने वालो की भी। कोई उसको पाप का लेबल लगाता तो कोई कुर्क्रमो का ताना देता। कोई पूरी औरत कोम पर गाली देता तो कोई रात को काली कहता। मगर इससे क्या फर्क पड़ने वाला था ये किसी को नहीं पता था। सब कुछ वैसे का वैसे ही चलने वाला था। हाँ, कुछ देर तक लोग उसको ताना देगें। फिर घूरेगें उसके बाद मे उसको छोड़ जायेगे वहीं पर बैठे रहने के लिये। रात होने तक तो ये कहानियाँ ऐसे फैल जायेगी जैसे जगंल मे कोई आग फैलती है।

वो वहीं पर रोती रही, उसका रोना यहाँ पर सभी को खल रहा था। उसको इस पाप का भागीदार मान लिया गया था। उसका चेहरा किसी को देखना हो या न देखना हो लेकिन उसको वो कह दिया गया था जो चेहरा देखने के बाद मे थप्पड़ मारने के समान था। रोते - रोते वो औरत वहीं पर गिर गई। नाले के पानी मे पड़ी वो औरत किसी को कोई अहसास नहीं कर पा रही थी। वहाँ पर खड़े सभी ने उस बच्चे को उस औरत के बगल मे रखा और दूर खड़े हो गये। कुछ देर तक वो वहीं पर पड़ी - पड़ी रोती रही लेकिन कुछ समय के बाद मे आवाज़ें आना बन्द हो गया। फिर कुछ नहीं बचा, खाली पड़ी सड़क और कुछ दो - चार गाड़ियाँ, जिनपर लिखा था आपकी अपनी सहूलियत के लिये हमेशा।

लख्मी

3 comments:

Rajeev Kumar Jha said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : आंसुओं के मोल

Rajeev Kumar Jha said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-12-2013) "याद आती है माँ" “चर्चामंच : चर्चा अंक - 1454” पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

Ek Shehr Hai said...

शुक्रिया राजीव कुमार झा जी और चर्चामंच का भी।