डीडीए फ़्लैट का रिज़ल्ट दोबारा से निकाला जायेगा, ये ख़बर टीवी पर सुनने के बाद कई उंमगों को जैसे दोबारा से सांस मिल गई हो। सबके चेहरों मे जैसे आशा की कई नई लहरें फिर से लहरा गई हो। ऊपर वाले की तरफ नज़र करके खड़े लोग टीवी के सामने हाथ जोड़े ना जाने कितनी दुआएँ और कलमे पढ़ने लगे। "इस बार तो पक्का अपना भी नाम लिस्ट मे होगा।" यही ज़हन मे गुलाटियाँ मार रहा था। हाँलाकि पिछली लिस्ट मे अपना नाम था भी या नहीं इसको याद ना करते हुए इस बार इरादे काफी पुख़्ता कर दिये थे।
ये ख़बर दिन-रात टीवी पर दिखाई जा रही थी और इस दौरान हर जगह न्यूज़ ख़त्म हो जाने के बाद मे बस, अपनी ही बहस शुरू हो जाती। लोग ये सुनने के लिए टीवी के सामने बैठे रहते की वो तारीख कौन सी होगी जब ये रिज़ल्ट दोबारा से निकाला जायेगा। किसी के लिए दुख के आँसू तो किसी के लिए उमगों भरे आँखू बनकर ये न्यूज़ चल रही थी। ये बिलकुल ऐसा ही था जैसे किसी खिलाड़ी को एक और एक्सट्रा बॉल मिल गई हो। अब उम्मीद होगी उस आखिरी बॉल पर छक्का लगाने की।
कई सौ-सौ रूपये के फ़ार्म भरे इन्तजार करते लोग बस, इसी राह मे थे कि कुछ तो होगा ऐसा दिल्ली जैसे बड़े शहर मे जहाँ हमारे नाम की भी कोई जगह होगी। कोई तो दरवाजा ऐसा बनेगा कभी जिसके आगे हमारे नाम की भी तख़्ती लगेगी। कोई तो ऐसा राशन कार्ड होगा जिसमे मेरा नाम सबसे ऊपर और मुखिया का ऑदा लेगा। पर क्या ये संभव है? वो भी दिल्ली जैसे बड़े शहर मे?
ये सपने हर छोटी कॉलोनियों मे रहने वाले के दिमाग मे हमेशा ताज़ा रहते हैं। जो बस, अवसर तलाशते हैं किसी ऐसे मौके का जिसमे ये कूद सकें और अपनी किश्मत आज़मा सकें। यही इन्तजार इनको हमेशा चौंकन्ना रखता है। ये हमेशा इसी ताड़ मे रहते हैं कि कोई तो फार्म निकले, किसी भी अख़बार मे जिसमे हमारे जैब की मुताबिक घर के प्लान हो। इसलिए हर अख़बार पर इनकी नज़र रहती है। चाहें ये कोई भी अख़बार खरीदे या नहीं मगर नज़र शहर मे किसी भी चाय की दुकान पर रखे अख़बारों मे या फिर राह चलते किसी भी अजनबी से रिश्ता बनाकर उसका अख़बार शेयर करने से नज़र आ ही जाती है। ये खाली अख़बार तक ही सीमित नहीं रहती। ये चाहत टीवी के हर न्यूज़ चैनल पर पँहुच ही जाती है।
अभी कुछ समय पहले ये न्यूज़ काफी जोरो से यहाँ दक्षिण पुरी मे फैली के, प्रगति मैदान मे मीडिल क्लास के लिए घर निकाले गए हैं। तो बस, पँहुच गए सभी अपने-अपने नाम से किश्मत को आज़माने, लेकिन दूसरे ही दिन जब घरों की किमतों पर सरकार ने नज़र डाली तो सब उंमगें जैसे धरी-की धरी रह गई।
नेमसिंह जी एक मात्र आदमी हैं जिनकी हर स्कीम पर निगाह रहती है। वे तो कभी भी कोई भी स्कीम नहीं छोड़ते। बस, जहाँ के बारे मे भी पूछना हो, पूछ सकते हैं। मकान लेने की ऐसी हुड़क किसी मे भी शायद देखी नहीं जा सकती। वे वहाँ प्रगति मैदान से आये और कहने लगे, "बताओ भला, घर निकाले हैं मीडिल क्लास के लिए और किमत 13 लाख से 16 लाख। अब जरा ये भी बता दो की किसी मीडिल क्लास का आदमी इस किमत मे फिट बैठता है? अच्छा ये नहीं तो ये ही बता दो की अगर मेरे जैसा आदमी बैंक से लोन भी लेगा तो उसकी मासिक किश्त कितने की होगी? लगभग देखा जाये तो 7000 रुपये से 8000 रुपये तक। अब जो आदमी महिने मे 6000 रुपये कमाता हो वो किश्त देगा तो खायेगा क्या? वाह! री सरकार, तुझे सलाम।"
ये कहते हुए वो अपने घर के अन्दर चले गए पर बात यहीं पर नहीं ख़त्म हुई थी। वे तो अब उनके बोल से निकल कर कई अलग-अलग दिमाग और ज़ुबानो मे चली गई थी। बातों ही बातों मे घरों की बातें फैल गई। लोग मकान-मकान का नारा लगाने लगे। कोई भरने की कहता तो कोई बात को टालने की। इसलिए तो यहाँ पैसा इनवेस्ट करवाने वालो की भी कमी नहीं है। बस, इच्छाएँ पकड़कर और चेहरा पढ़कर ये घुसे चले आते हैं और सब कुछ जैसे निकालकर रख देते हैं। इनके लिए सोलह या सत्तराह लाख को बॉय हाथ का खेल होता है। बैठे-बैठे कागज़ के एक छोटे से टुकड़े पर ये आपकी ज़िन्दगी का मैप बना डालते हैं और मैप मे बस, पैसा ही पैसा होता है। ये पैसा कहाँ से आयेगा और कैसे आयेगा ये सब पता होता है इन्हे। बस, ये नहीं बताते की ये पैसा मेरे पास रहेगा कब तक?
नेमसिंह जी इन सब के घेरे मे नहीं पड़ते, साफ निकल आते हैं। उन्हे पता है कि उनका पैसा कहाँ से आता है, कैसे आता है और कहाँ चला जायेगा। अपने घर मे कई समानों के साथ-साथ एक कौना ऐसा भी बनाया है जिसमे ना जाने कितने मकानों के फार्म फोटोस्टेट किये हुए रखे हैं और ना जाने कितनी अख़बार की कटींग भी। जिसमे घर के बारे मे कई प्रकार की डीटेल शामिल है। साथ-साथ सरकारी फ़्लैट के बारे मे सारी बातें भी। किसी मे गाज़ियाबाद के फार्म हैं तो किसी मे दिल्ली के। ये हर जगह अपनी किश्मत आज़माने से नहीं चूकते।
"पूरे चार सालों के बाद में निकाले हैं सरकार ये जनता फ़्लैट, और अब देखो वो भी अटक गए। ना जाने क्या होगा हमारा तो?”
दक्षिणपुरी में इन दिनों पहली बार घर लेने और पाने की मारामारी छाई रही। इतनी बातें, इतनी इच्छाएँ और इतना जोश आज से पहले नहीं था। इसके कई कारण हो सकते हैं। पर तमन्ना एक ही होगी। ये क्रैज़ खाली बदलाव के तहत ही नहीं था बल्कि अब दक्षिणपुरी ने अपने आने वाले टाइम को देखना शुरू किया था और ये सब राजीव गांधी विकास के घरों को लेकर तो कुछ ज़्यादा ही था। सबसे पहले तो घर के फार्म खरीदने की मारामारी उसके बाद मे उसको छुपाकर भरने की होंश भी। ये बड़ी मज़ेदार वारदातों से बनती है। कई खेल हैं इनमे। अगर गली में किसी एक को पता चल जाता कि सरकार ने घर निकाले हैं गरीबों के लिए तो वो किसी और को अपने मुँह से नहीं बताता। इनका मानना ये रहता है कि जितना लोगों को पता चलेगा उतने ही उम्मीदवार बड़ जायेगें और हमारे चांस कम हो जायेगें। वैसे देखा जाये तो ये खाली अपने ही मन की बनाई बात रहती। पता यहाँ पर सबको रहता बस, सभी उसको छुपाने के तरीके तलाशते रहते।
यहाँ पर ये खेल हर गली, हर नुक्कड़, हर बसस्टेंड अथवा हर बस मे भी देखा जाता। हर कोई अपनी तरह से उसको नाटने की बात करता और ये समझाने की कोशिश करता की "ये हमारे लिए नहीं है" या ये कहता के "इसमे इतने रूपये भरे जायेगें, हमारे बस का नहीं है" और ज़्यादा से ज़्यादा बताते तो कोई ये कहता कि "ये निकलेगा ही नहीं।" ताकी लोग उस तरफ ना खिंचे।
मगर वो कहते है ना, बहकावे मे ना आओ, बस अपनी अकल लगाओ। यहाँ पर भी लोग कुछ ऐसा ही करते हैं। "हाँ-हूँ" के बाद तो कहानी कुछ अलग ही मोड़ ले लेती और सरकार की झाँसों भरी स्कीम भी पूरी हो जाती। सौ-सौ रुपये लिए दिल्ली की करोंड़ों पगली जनता घर-घर चिल्लाती हुई फार्म की खिड़कियों पर टूट पड़ती। और सरकारी खातों मे वे ही सौ-सौ के नोट जैसे अरबों रुपये की बारिश कर देते। ये सौ के नोट किसी के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन सरकार के लिए बेहद बड़ी बात थी। ये एक भूख की तरह से होती जिसका नशा आदमी को कहीं भी, कभी भी नंगा खड़ा कर देता और क्यों ना हो भला आखिर सरकार भी तो हमारी है।
घर की तरफ मे भागमभाग दक्षिणपुरी मे आखिर क्यों हुआ? ये क्या दौर रहा है जो लोग खिंचे चले जा रहे हैं? ये पहले तो था ही नहीं। इनमे कई कारणों मे एक वज़ह ये भी है कि, नेमसिंह जी कि तरह यहाँ हजारों लोग और हैं जो टीवी, अख़बार और रेडियो पर अपने कान लगाये रखते हैं। खाली इसलिए ही नहीं की आठ फूट के दरवाजे पर हमारे नाम की तख़्ती हो या राशन कार्ड मे अपना भी नाम मुखिया की जगह हो। खाली यही नहीं है। यहाँ पर लोगों के पास मे साढ़े बाइस गज़ के मकान है। जो इंदिरा गांधी विकास से सन् 1975 मे मिले थे और आज की तारीख मे कितनों ने यहाँ खरीदे भी हैं। जिनको ऊँचा तो किया जा सकता है लेकिन फैलाया नहीं जा सकता। इसे दो या तीन, तीन या चार मंजिल बनाया जा सकता है। लेकिन जैसे-जैसे मकान ऊपर चड़ता जाता है उसकी चौड़ाई उतनी ही कम होती जाती है। कमरा एक और रहने वाले चार तो कैसे हो गुजारा? इस बड़ते परिवार की वज़ह से यहाँ पिछले साल कई मकान तो बिक भी गए हैं। मगर कुछ लोगों का कहना है कि जो यहाँ दक्षिणपुरी से बैक कर गया वो दिल्ली जैसे बड़े शहर मे बीस गज़ का भी मकान नहीं खरीद सकता। पर इसके बावज़ूद भी ये मैप अब बड़ा हो चला है। दक्षिणपुरी से दिल्ली की कई जगहें अब नजदीक हो गई हैं। संगम विहार, मीठापुर, जैतपुर, मेरठ, कंझावला तथा बदरपूर जैसी जगहें दक्षिणपुरी के मैप के साथ मे जुड़ गई हैं। बस, यहीं पर जगह मिल सकती है जिसमे चार लोगों के परिवार का गुजारा चल सकता है अथवा नहीं।
ये एक रेस है जो शुरू हो गई है जिसमे सभी भाग रहे हैं। ना जाने कौन जितेगा? पर यहाँ इस दौड़ मे सभी शामिल हैं। हाँ बस, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि यहाँ इस दौड़ मे सभी एक-दूसरे से अंजान बनकर दौड़ रहे हैं।
"उषा देखले भगवान भी कुछ चाहता है तभी तो रिज़ल्ट दोबारा निकलवा रहा है। इस बार हमारा पक्का निकलेगा। हे माता रानी निकलवा दे तो नंगे पाँव तेरे दरवार मे आऊँगा। निकलवा दे।"
उनकी बीवी भी उनके पीछे-पीछे अपने हाथ जोड़ती हुई ऊपर वाले को देखने लगी, “आपको पता है जी विवेक के साथ क्या हुआ था? उसने सरकारी नौकरी का फार्म भरा था। उस सरकारी नौकरी का ड्रा निकाला गया तो उसमे उसका नाम नहीं आया। मगर बड़े अधिकारियों ने कहा की इसमे कुछ घपला किया गया है हम ये रिज़ल्ट दोबारा निकालेगें। बस, उसी मे उसका नाम निकल आया, सरकारी नौकरी लग गई उसकी। किसी को भी रिश्वत मे एक रुपये तक की चाय नहीं पिलाई उसने। आज देखो कितने चाव से नौकरी कर रहा है। हमारे साथ भी ऐसा ही हो तो मज़ा आ जाये। भगवान निकलवा दे।"
कुछ ऐसी ही कहानियाँ यहाँ दक्षिणपुरी की कई जगहों मे चल रही हैं। सभी का इन्तजार दोबारा से शुरू हो गया है। इतना तो शायद पास और फैल करवाने वाले स्कूल के रिज़ल्ट का भी नहीं होता। कोई बेसब्री नहीं है सब धैर्य बाँधे बैठे हैं। लगभग तीन दिन और टीवी के सामने मुँह गढ़ाये बैठे रहना होगा। सभी मनोंरजन की चीजें न्यूज़ चैनल मे तब्दील हो गई हैं। "काश के हमारा निकल आये"
ये नारा दुआओं और मांगो मे बदल गया है। उंमगें जैसे दोबारा से जीवित हो गई हैं।
लख्मी
Wednesday, January 7, 2009
अंजान शख़्स
माहौल ओस के कोहरे से ढका हुआ था। ठन्ड के तापमान को पिघलाता, कहीं से लपलपाती आग का धुंआ आ रहा था। कुड़ेदानों में कल रात का कचरा भरा पड़ा था। केक के डिब्बे, बीयर के पिचके हुए डिब्बे और बोतलें तो कहीं अभी भी खुशबू छोड़ते गैंदे और गुलाब के फूल जिसे गाय अपना चारा समझकर खा रही थी।
रातभर की इस्तमाल की गई चीजों को कूड़ेदान में फैंक दिया गया था। बची हुई खाने की झूठी चीजों को कुत्ते नौंच-नौंचकर खा रहे थे। उनका मुँह कचरे मे धसा हुआ था। इतने मे उस जगह में कोहरे को चीरकर कोई अंजान शख़्स अन्दर आया। बे-आवाज माहौल में जैसे तार से बज उठे। उसने अपने आप को फटे कम्बल से लपेट रखा था। उस के पैरों में मैले जूते थे। जो राख और मिट्टी मे सने हुए थे। चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। बस, हाथ और पाँव ही नज़र आ रहे थे। वो सड़क पर घूमते हुए हाथ मे एक डन्डा लेकर उसमे चुम्बक फँसाकर घसीटता हुआ चला आ रहा था। मिट्टी में शामिल छोटे-छोटे लोहे की चीजों के टुकड़े को उसके डन्डे में लगी चुम्बक खींच लेती।
सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। समय का अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था पर इस मुश्किल मे भी वो अपना काम करने आ गया। कमर पर झोले में उसने काफी सामान रखा हुआ था। वो पहले भी कई बार यहाँ दिखाई दिया था पर अकेला नहीं। आज वो अकेला ही आया था। उसके साथ कोई नहीं था। सड़क से गुजरने वाले स्कूटर, कार वगैहरा। कोई वाहन जब तेजी से वहाँ से निकल जाते तो हवा का झौंका माहौल को और भी ठन्डा कर देता और उसके हाथ-पैर से कपकपी छूटने लगती।
पुराने पार्क के साथ में बना ये कूड़ेदान जो सालो पुराना है। जिसमे ब्लॉक के हर घर का इस्तमाल कि हुई चीजों को फैंका जाता। इस रास्ते पर वो सालो से आता-जाता रहा है। उस का चुम्बकिये औजार उसका साथ देता रहता। जमीन पर उस चुम्बक को वो घसीटता हुआ लेकर चलता और जो भी चीजें उससे चुपकती। वो उन्हे अपने झोले मे रख लेता।
दिन मे अंगिनत बार वो इस तरह करता। न जाने कहाँ-कहाँ जाता। पूरे इलाके में घूमकर वो जमीन पर पड़े कीलों, बोतलों के ढक्कनों अन्य चीजों के बेकार हिस्सों को वो अपने पास इक्कठा करके उन्हे बैच देता और अपने लिए कुछ पैसे बना लेता। दिनभर गली-गली भटकने के बाद वो जैसे धूंध से भरे कोहरे को चीरकर आता। वैसे ही शाम जब जगह मे दस्तक देती तो वो धूंध में ही कहीं छूप जाता।वो कहाँ से आया और कहाँ गया। ये किसी को पता नहीं चलता। दक्षिणपूरी से कहीं दूर उसका बसेरा होगा। कुछ पता नहीं। लेकिन कुछ क्षणों के लिए वो जाना-पहचाना सा लगा। उसके जाते ही आसपास सब नज़र आने लगा।
तब शरीर को गर्मी देते शख़्स आग को चारों तरफ से घेरकर बैठे होते। रात के अंधेरे को खम्बों पर लगे बल्बों की रोशनियाँ मुँह चिड़ाती हुई होती। कहीं परछाई अपना ही समा बनाकर किसी नज़र की फिराक में होती।
राकेश
रातभर की इस्तमाल की गई चीजों को कूड़ेदान में फैंक दिया गया था। बची हुई खाने की झूठी चीजों को कुत्ते नौंच-नौंचकर खा रहे थे। उनका मुँह कचरे मे धसा हुआ था। इतने मे उस जगह में कोहरे को चीरकर कोई अंजान शख़्स अन्दर आया। बे-आवाज माहौल में जैसे तार से बज उठे। उसने अपने आप को फटे कम्बल से लपेट रखा था। उस के पैरों में मैले जूते थे। जो राख और मिट्टी मे सने हुए थे। चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। बस, हाथ और पाँव ही नज़र आ रहे थे। वो सड़क पर घूमते हुए हाथ मे एक डन्डा लेकर उसमे चुम्बक फँसाकर घसीटता हुआ चला आ रहा था। मिट्टी में शामिल छोटे-छोटे लोहे की चीजों के टुकड़े को उसके डन्डे में लगी चुम्बक खींच लेती।
सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। समय का अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था पर इस मुश्किल मे भी वो अपना काम करने आ गया। कमर पर झोले में उसने काफी सामान रखा हुआ था। वो पहले भी कई बार यहाँ दिखाई दिया था पर अकेला नहीं। आज वो अकेला ही आया था। उसके साथ कोई नहीं था। सड़क से गुजरने वाले स्कूटर, कार वगैहरा। कोई वाहन जब तेजी से वहाँ से निकल जाते तो हवा का झौंका माहौल को और भी ठन्डा कर देता और उसके हाथ-पैर से कपकपी छूटने लगती।
पुराने पार्क के साथ में बना ये कूड़ेदान जो सालो पुराना है। जिसमे ब्लॉक के हर घर का इस्तमाल कि हुई चीजों को फैंका जाता। इस रास्ते पर वो सालो से आता-जाता रहा है। उस का चुम्बकिये औजार उसका साथ देता रहता। जमीन पर उस चुम्बक को वो घसीटता हुआ लेकर चलता और जो भी चीजें उससे चुपकती। वो उन्हे अपने झोले मे रख लेता।
दिन मे अंगिनत बार वो इस तरह करता। न जाने कहाँ-कहाँ जाता। पूरे इलाके में घूमकर वो जमीन पर पड़े कीलों, बोतलों के ढक्कनों अन्य चीजों के बेकार हिस्सों को वो अपने पास इक्कठा करके उन्हे बैच देता और अपने लिए कुछ पैसे बना लेता। दिनभर गली-गली भटकने के बाद वो जैसे धूंध से भरे कोहरे को चीरकर आता। वैसे ही शाम जब जगह मे दस्तक देती तो वो धूंध में ही कहीं छूप जाता।वो कहाँ से आया और कहाँ गया। ये किसी को पता नहीं चलता। दक्षिणपूरी से कहीं दूर उसका बसेरा होगा। कुछ पता नहीं। लेकिन कुछ क्षणों के लिए वो जाना-पहचाना सा लगा। उसके जाते ही आसपास सब नज़र आने लगा।
तब शरीर को गर्मी देते शख़्स आग को चारों तरफ से घेरकर बैठे होते। रात के अंधेरे को खम्बों पर लगे बल्बों की रोशनियाँ मुँह चिड़ाती हुई होती। कहीं परछाई अपना ही समा बनाकर किसी नज़र की फिराक में होती।
राकेश
लेखन के तरीके क्या हैं?
इन दिनों मैं कुछ ऐसी रचनाये लिखने की कोशिश कर रहा हूँ जो मेरे पास या नज़दीक की बिलकुल नहीं है और ना ही मैंने कभी सुनी है। लेकिन उस काल्पनिक दुनिया को कभी- किसी और ही तरह के जीवन से समझने की कोशिश की है। यानि के किसी के रहन-सहन के नतीजे से वे कई अनेको चित्र उभरें हैं। जिनको वास्तविक रूप मे देखा भी जा सकता है और उन्हे काल्पनिक करकर टाला भी जा सकता है। ये वे रूप भी है जिन्हे अपने मौज़ूदा रूप से बाँधा भी जा सकता है और उसे दूर भी फैंका जा सकता है। लेकिन इसमे जब मैं किसी ब्यौरे या शख़्स का बख़ान करता हूँ तो उसमे मेरा होना हमेशा मुझे बाधा मे डाल देता हैं मुझे लगता है कि मैं उस जीवन की जितनी भी परेशानियाँ या फैसलों को लिख रहा हूँ वे मेरे होने से क्या आकार लेती हैं या मैं उन्हे क्यों वे रूप दे रहा हूँ जो असल मे किसी रूप की पेशकश ही नहीं रखती।
कभी मैं उस जीवन को उनके घर के अन्दर से लिखता हूँ तो कभी बाहर मे खड़ा होकर, कभी मैं वो बन जाता हूँ तो कभी उससे कोसों की दूरी बना लेता हूँ। जहाँ से उसकी हलचल दिखती है लेकिन उसकी बैचेनी नहीं।
इस स्थिति मे मैं एक बेजान शब्द बनकर रह जाता हूँ जिसको जान उस छवि के हिलने, डुलने, बोलने, चलने, कहने या भाव से मिलेगी। उस जीवन से मेरा रिश्ता किस आधार का है? क्या वो दूर बैठा कोई ऐसा अक्स है जिसे किसी रूप की चेष्टा है या मेरे लिए वे एक ऐसी छवि है जिसका रूप मेरे अस्तित्व से ओझल है। मैं वहाँ पर इतना ताकतवर क्यों हूँ?
मेरा उसके जीवन से कोई या किसी भी प्रकार का नाता नहीं है। ना ही कभी बन सकता लेकिन फिर भी मैं उनके बीच मे खड़ा होकर ये बना पाता हूँ। जिसका आभाष मेरे लिए या मेरी सोच के लिए या फिर मेरे परिवेश के लिए एक चित्र की भांति उभरकर सामने चला आता है पर ये लेखन उस मूरत मे क्या फूँकता है जो मेरे हिस्से से है?
देखकर लिखना, बनकर लिखना, बोलकर लिखना, सुनकर लिखना या पहला केरेक्टर, दूसरा केरेक्टर या फिर तीसरा केरेक्टर बनकर लिखना उस दूर बैठी छवि या ज़िन्दगानी को मेरे समीप लाने की क्या इच्छाए जगाता है? मुझे कभी अपने से बहस जब करनी होती है तो मैं इस तरह के तरीके अपनाता हूँ जो की मेरे जीवन के, मेरे खुद से बनाये पात्रो से बेइन्तहा बहस करता है और टकराता भी है। इसे मैं और आप जुझना भी कह सकते हैं। जो शायद आखिरकार बहुत ऊंची सोच साबित होता है। कई बार किसी दूर बैठी ज़िन्दगी मे घूसने के तरीके हम ऐसे बनाते हैं जैसे किसी लेखन की रचना मे और उसे पेशकश की दुनिया का हिस्सेदार बना लेते हैं। कभी-कभी बीच मे खड़ा होकर दुनिया देखने का मज़ा उस दोनों तरफ़ खड़ी ज़िन्दगियों के लिए रोक या हदें बन जाता है। ये शायद ऐसा भी होता है जैसे-
कोई शख़्स है जो अपने परिवेश से बहस या समझौते करके जीवन व्यतित कर रहा है। जो पूरे दिन या समझौतों मे कुछ टाइम अपने लिए बचा लेता है। बस, तभी वे अपने लिए कुछ कर पाता है। नज़र उस बीच के समय पर चली जाती है। ना जाने हम कौन सा बिन्दू छेड़ देते हैं कि इच्छाए शब्द ले लेती हैं और उस परिवेश के सामने हम सीना ताने खड़े हो जाते हैं। वे दौर हमारे लिए बेहद कठोर, टक्कर, हादसा या सीधे शब्दों मे कहे तो वे हथियार बनकर हमारे सामने अपनी मूरत बना लेता है। हम चाहें तो हर चीज पर सवाल रखकर उसे नंगा कर सकते हैं पर बिना सवाल किए हम उस मूरत मे कैसे शामिल हो सकते हैं वे ही जीवन का आधार हैं।
मैं कभी दूर खड़ा जब किसी शख़्स या उसकी बैचेनी को देखता हूँ तो उसको अपने नजदीक लाना आसान सा लगता है लेकिन जब मैं वो बनकर उसकी बैचेनी को सोचता हूँ तो वे कठीन और जटिल बन जाता है। - जब मैं वही शख़्स बन जाता हूँ तो उसकी बैचेनी को महसूस करके लिखने मे मुझे लगता है कि वे मुझतक बेहद नज़दीकी पा रही है और जब मैं उससे दूरी बनाकर लिखता हूँ तो वे बैचेनी किसी टिप्पणी की भांति रहती है।
जब हम बीच मे रहकर किसी वस्तु को अपने समीप लाते हैं तो वे जान मांगती है। हम उसमे सांस और धड़कन भरने की कोशिश करते हैं और उसे सांस लेने के लिए छोड़ देते हैं। पर जब कोई शख़्स या जीवन को हम अपने समीप लाते हैं तो उसकी मांग हमारी ज़ुबानी मे कहाँ पर आकर रूकती है?
हम कभी-कभी दूरी व नजदीकी मे अपने शब्दों के आकार को समझ नहीं पाते। ये बिलकुल वैसे ही होता है जैसे कोई पेन्टर अपनी पेन्टिग बनाने मे मग़्न है और उसके रंग का भरपूर लुफ़्त ले रहा है। उसे ये तक पता नहीं होता की जब ये कोई रूप ले पायेगी तो क्या चेहरा होगा इसका। वे तो बस, लीन रहता है। कहीं खो जाता है। जब वे मूरत बनकर सामने आती है तो कोई ऐसा रूप लेकर रखती है जिसका अन्दाजा हमें व बनाने वाले को भी पता नहीं होता।
वैसे ही जब हम किसी शख़्स को लिख रहे होते हैं तो उसके जीवन की रचना मे हम अपने शब्दों को कुछ इस तरह से आजाद छोड़ देते हैं कि वे उस नज़र आने वाली छवि से कुछ और ही ताज़ेपन की बुनाई कर देते हैं। जो बनकर आता है वे वो दिखने वाली तस्वीर नहीं होती। वे किसी और ही रंग- लिबास का एक बहुत अच्छा खासा आकार होती है। लेकिन जब ये वापस उस परिवेश मे जाती है तो क्या उस रूप की सम्भावनायें उसे उस जगह का मानने के लिए तैयार होती है? हम उसे किस बहस के लिए तैयार कर पाये होते हैं?
मैंने कुछ किताबें पढ़ी जिसमे लेखन के तरीके व किसी के अन्दर दाखिल होने के तरीके किसी को दोहराने के अन्दाज से कम नहीं थे। वे चाहें कोई बेजान चीज हो या जीवित। जो उस रूप को बताने मे बेहद टाइट रहते हैं। उसके खेल या उससे खेल दोनों को समाज के बलबूते पर मजबूत बनाने के लिए तैयार करते हैं। लेख मे आने के तरीके भी अन्य तरह के होते हैं जो लेखक को खोजने की चेष्टा जगाते हैं। उसके पीछे जाने को कहते हैं। कुछ तलाश्ने को कहते हैं। कभी-कभी कोसते भी हैं कि ये अन्दाज क्या नहीं है तेरे पास।
इससे मगर वे जीवन अपने शरीर मे घुल जायेगा ये तय नहीं होता। या मैं घोलने की क्यों कह रहा हूँ वे भी शायद सवाल ही बन कर रह जाता है। किसी मे दाखिल होने के तरीके को कितना बेइन्तिहाइ बनाया जा सकता है। जो ज़्यादा की मांग ना रखे मगर ज़्यादा को भरपूर खेलने का मौका दे। यानि के ज़्यादा नज़दीक, ज़्यादा रूपक, ज़्यादा परिवेश, ज़्यादा समाजिक-बौद्धिक व ज़्यादा विवरण।
लख्मी
कभी मैं उस जीवन को उनके घर के अन्दर से लिखता हूँ तो कभी बाहर मे खड़ा होकर, कभी मैं वो बन जाता हूँ तो कभी उससे कोसों की दूरी बना लेता हूँ। जहाँ से उसकी हलचल दिखती है लेकिन उसकी बैचेनी नहीं।
इस स्थिति मे मैं एक बेजान शब्द बनकर रह जाता हूँ जिसको जान उस छवि के हिलने, डुलने, बोलने, चलने, कहने या भाव से मिलेगी। उस जीवन से मेरा रिश्ता किस आधार का है? क्या वो दूर बैठा कोई ऐसा अक्स है जिसे किसी रूप की चेष्टा है या मेरे लिए वे एक ऐसी छवि है जिसका रूप मेरे अस्तित्व से ओझल है। मैं वहाँ पर इतना ताकतवर क्यों हूँ?
मेरा उसके जीवन से कोई या किसी भी प्रकार का नाता नहीं है। ना ही कभी बन सकता लेकिन फिर भी मैं उनके बीच मे खड़ा होकर ये बना पाता हूँ। जिसका आभाष मेरे लिए या मेरी सोच के लिए या फिर मेरे परिवेश के लिए एक चित्र की भांति उभरकर सामने चला आता है पर ये लेखन उस मूरत मे क्या फूँकता है जो मेरे हिस्से से है?
देखकर लिखना, बनकर लिखना, बोलकर लिखना, सुनकर लिखना या पहला केरेक्टर, दूसरा केरेक्टर या फिर तीसरा केरेक्टर बनकर लिखना उस दूर बैठी छवि या ज़िन्दगानी को मेरे समीप लाने की क्या इच्छाए जगाता है? मुझे कभी अपने से बहस जब करनी होती है तो मैं इस तरह के तरीके अपनाता हूँ जो की मेरे जीवन के, मेरे खुद से बनाये पात्रो से बेइन्तहा बहस करता है और टकराता भी है। इसे मैं और आप जुझना भी कह सकते हैं। जो शायद आखिरकार बहुत ऊंची सोच साबित होता है। कई बार किसी दूर बैठी ज़िन्दगी मे घूसने के तरीके हम ऐसे बनाते हैं जैसे किसी लेखन की रचना मे और उसे पेशकश की दुनिया का हिस्सेदार बना लेते हैं। कभी-कभी बीच मे खड़ा होकर दुनिया देखने का मज़ा उस दोनों तरफ़ खड़ी ज़िन्दगियों के लिए रोक या हदें बन जाता है। ये शायद ऐसा भी होता है जैसे-
कोई शख़्स है जो अपने परिवेश से बहस या समझौते करके जीवन व्यतित कर रहा है। जो पूरे दिन या समझौतों मे कुछ टाइम अपने लिए बचा लेता है। बस, तभी वे अपने लिए कुछ कर पाता है। नज़र उस बीच के समय पर चली जाती है। ना जाने हम कौन सा बिन्दू छेड़ देते हैं कि इच्छाए शब्द ले लेती हैं और उस परिवेश के सामने हम सीना ताने खड़े हो जाते हैं। वे दौर हमारे लिए बेहद कठोर, टक्कर, हादसा या सीधे शब्दों मे कहे तो वे हथियार बनकर हमारे सामने अपनी मूरत बना लेता है। हम चाहें तो हर चीज पर सवाल रखकर उसे नंगा कर सकते हैं पर बिना सवाल किए हम उस मूरत मे कैसे शामिल हो सकते हैं वे ही जीवन का आधार हैं।
मैं कभी दूर खड़ा जब किसी शख़्स या उसकी बैचेनी को देखता हूँ तो उसको अपने नजदीक लाना आसान सा लगता है लेकिन जब मैं वो बनकर उसकी बैचेनी को सोचता हूँ तो वे कठीन और जटिल बन जाता है। - जब मैं वही शख़्स बन जाता हूँ तो उसकी बैचेनी को महसूस करके लिखने मे मुझे लगता है कि वे मुझतक बेहद नज़दीकी पा रही है और जब मैं उससे दूरी बनाकर लिखता हूँ तो वे बैचेनी किसी टिप्पणी की भांति रहती है।
जब हम बीच मे रहकर किसी वस्तु को अपने समीप लाते हैं तो वे जान मांगती है। हम उसमे सांस और धड़कन भरने की कोशिश करते हैं और उसे सांस लेने के लिए छोड़ देते हैं। पर जब कोई शख़्स या जीवन को हम अपने समीप लाते हैं तो उसकी मांग हमारी ज़ुबानी मे कहाँ पर आकर रूकती है?
हम कभी-कभी दूरी व नजदीकी मे अपने शब्दों के आकार को समझ नहीं पाते। ये बिलकुल वैसे ही होता है जैसे कोई पेन्टर अपनी पेन्टिग बनाने मे मग़्न है और उसके रंग का भरपूर लुफ़्त ले रहा है। उसे ये तक पता नहीं होता की जब ये कोई रूप ले पायेगी तो क्या चेहरा होगा इसका। वे तो बस, लीन रहता है। कहीं खो जाता है। जब वे मूरत बनकर सामने आती है तो कोई ऐसा रूप लेकर रखती है जिसका अन्दाजा हमें व बनाने वाले को भी पता नहीं होता।
वैसे ही जब हम किसी शख़्स को लिख रहे होते हैं तो उसके जीवन की रचना मे हम अपने शब्दों को कुछ इस तरह से आजाद छोड़ देते हैं कि वे उस नज़र आने वाली छवि से कुछ और ही ताज़ेपन की बुनाई कर देते हैं। जो बनकर आता है वे वो दिखने वाली तस्वीर नहीं होती। वे किसी और ही रंग- लिबास का एक बहुत अच्छा खासा आकार होती है। लेकिन जब ये वापस उस परिवेश मे जाती है तो क्या उस रूप की सम्भावनायें उसे उस जगह का मानने के लिए तैयार होती है? हम उसे किस बहस के लिए तैयार कर पाये होते हैं?
मैंने कुछ किताबें पढ़ी जिसमे लेखन के तरीके व किसी के अन्दर दाखिल होने के तरीके किसी को दोहराने के अन्दाज से कम नहीं थे। वे चाहें कोई बेजान चीज हो या जीवित। जो उस रूप को बताने मे बेहद टाइट रहते हैं। उसके खेल या उससे खेल दोनों को समाज के बलबूते पर मजबूत बनाने के लिए तैयार करते हैं। लेख मे आने के तरीके भी अन्य तरह के होते हैं जो लेखक को खोजने की चेष्टा जगाते हैं। उसके पीछे जाने को कहते हैं। कुछ तलाश्ने को कहते हैं। कभी-कभी कोसते भी हैं कि ये अन्दाज क्या नहीं है तेरे पास।
इससे मगर वे जीवन अपने शरीर मे घुल जायेगा ये तय नहीं होता। या मैं घोलने की क्यों कह रहा हूँ वे भी शायद सवाल ही बन कर रह जाता है। किसी मे दाखिल होने के तरीके को कितना बेइन्तिहाइ बनाया जा सकता है। जो ज़्यादा की मांग ना रखे मगर ज़्यादा को भरपूर खेलने का मौका दे। यानि के ज़्यादा नज़दीक, ज़्यादा रूपक, ज़्यादा परिवेश, ज़्यादा समाजिक-बौद्धिक व ज़्यादा विवरण।
लख्मी
Friday, January 2, 2009
ईश्वर को किस ने देखा
ईश्वर को किस ने देखा या किस ने पाया है? ये सवाल अजीब से हालात पैदा करता है। लेकिन इसकी बनावट कैसी है या ये कैसे पैदा हुआ है और इसकी वास्तविकता यानी होने को हम धारण कर के जीते हैं। तो कैसे क्योंकि ये माना गया है कि "ये परम सत्य है।"
आज लोग चाहें कितने भी धर्म बताये, कितने भी समाज बनाये पर उस का एक ही धर्म है। एक ही समाज है जिसके भीतर खुशहाल और अधिकार के साथ जीना है। भले ही धर्म के नाम पर इंसान को बाँट दिया हो लेकिन उसके वज़ूद को उसकी वास्तविकता से अलग नहीं कर सकते और उसकी वास्तविकता ये है की जब किसी को भूख लगती है तो भोजन की आवश्यकता को मानना ही पड़ता है।
इंसान को इंसान की जरूरत का अहसास सिर्फ़ रोटी, कपड़ा और मकान ही नहीं होता बल्कि अपने विचारों से उत्पन्न सम्भावनाओं और जिज्ञासाओं को गहरा करने की शिरकत करना भी जरूरी है। भूख तो जानवर को भी लगती है, नींद तो उसे भी आती है। ठिकाना तो उसे भी चाहिये होता है। इंसान और जानवर के बीच की दूरी शायद कोई तय नहीं कर सकता है। आखिर ये दूरी क्या है? और क्या कल्पना करती है?
जो इंसान और जानवर के लिए प्रेम और वात्शल्लायता बनकर एक माँ की तरह इस विभाजन को समझौता बना देती है जिसे अक्सर हम समझ नहीं पाते लेकिन अपना लेते हैं। नदी जितनी शान्त और निर्मल होती है वो उतनी ही गहरी भी होती है। ये हम मानते आये हैं। हमें हमारे अलग-अलग समाजों मे इसे अपनी-अपनी ज़ुबानों मे समझाने की कोशिस कि है। ये जरूरी नहीं है की इंसान किसी धर्म को अपनाकर समाज मे निर्भय होकर जी लेगा। वो जहाँ जायेगा उसके लिए डर बना रहेगा। क्योंकि कोई भी इंसान अपने मुताबिक नहीं जी सकता। उसे अपनी सीमाओं मे ही रहना होगा। ये तय कर दिया गया है। हम चाहकर भी अपने लिए जगह बनाने की कइ अनेकों कल्पनाए करते हैं, सोचते हैं, कोशिश करते हैं पर ये किसके लिए है?
समाज मे सब कुछ उल्टा ही दिखता है और कभी-कभी सीधा भी लेकिन, ये आप पर निर्भर है की आप किसे और कौन से दृष्टीकोण से माहौल को देखने की कोशिश कर रहे हैं। आप ये भी सोच सकते हैं की आपके पास क्या नज़रिये और फ्रैम हैं? जिससे आप झाँकने कि फ़िराक मे हैं।
समाज मे जीने वाला हर इंसान, हर शख़्स एक तरह का उबाल लिए रहता है जिसका तापमान कभी बड़ जाता है तो कभी गिर जाता है। जो कभी इतनी जोरों से खौलता है की उसके आसपास तैर रही वायु भी उससे प्रभावित हो जाती है। इस उबाल को समझना जरा कठीन है। इससे पैदा होने वाली उष्मा को आप जगह-जगह रूपान्तरण होता पा सकते हैं। ये उष्मा तरह-तरह की है जिसका अवलोकन वायुमण्डल में होता रहता है। विज्ञान ईश्वर को शायद नकरात्मक सोच से देखता है। उसके पास ईश्वर की मौज़ूदगी के ऐसे ही समीकरण हैं जो तत्वों के मिलाप से ही बनते हैं पर असत्य है। इसको एक और विधी से जान सकते है जैसे- पारदर्शी शब्द बना कैसे, इस पर अगर तमाम चीजों पर खोज की जाये तो अधिकतर चीजें पारदर्शी निकल कर आयेगी और कई चट्टान की तरह ठोस।
हम और विज्ञान तीसरी आँख तलाशने के सदियों से शौध बना रहे हैं। बस, माध्यम अलग-अलग हैं। कोई पारिवार मे खोज जारी रखता है तो कोई पारिवार को त्याग कर ऑझाओं और फकीरों की भांती साधना मे लीन होकर दिव्यमान रोशनी को पाने के लिए समाज के सभी योगों से अलग अदभूत योग मे खोए हुए है।
वो अपने पूरक को तलाश्ने के लिए तप करने लग जाता है। क्योंकि वो किसी दिव्य आत्मा के महासागर के मंथन से निकला रत्न है। जो अपने प्रभू के आदेश को पाकर आया है। उस प्रभू ने अपने रूप से ही उसका शरीर बनाया है। उसमे अपनी आत्मा को उसमें बसाया है। जिसने देखने के लिए इंसान को तरह-तरह की इंद्रियाँ दी है। शरीर की हर बनावट को उस प्रभू ने सोच-सोच कर बनाया है।
धर्म तो केवल अपनी तरफ ले जाने वाला झुंड है जिसमें इंसान अपने को पूरा महसूस करता है और अपने को आइने में इतराकर देखता है और भूल जाता है की वो जिसका अंश है उसी का अलोचक बन गया है।
उसे के अस्तित्व को नकार रहा है। जिसने जीवन दिया है। पिता जैसे बच्चे के नामकर्ण और उस की पहचान जन्म से ही बना देता है वैसे ही हमारा जीवन भी उस पर्मपिता की असीम अनूकम्पा की देन है। फिर हम कौन होते है धर्म, जाति और सरहदों को बाँटने वाले।
एक फ़िल्म देखी उसमे फ़िल्म के शुरू मे ही कुछ डायलॉग हैं जो एक भगवान कह रहा है, वे कहता है:- "मैंने ये दुनिया बनाई, हवा बनाई, पानी बनाया, जीवन बनाना और इंसान बनाये, फिर उसके बाद इंसान ने मुझे बनाया, शायद मुझे पाने के लिए नहीं बल्कि मुझे दोश देने के लिए।"
ये लाइने हमारे लिए क्या है? ये एक नाटक है, जो शुरू हुआ और समाप्त हो गया। लोग क्या लेकर गए। या ये क्या सोचकर लिखे गए। सभी कह रहे हैं अपने-अपने लव्ज़ों अपने-अपने शब्द। जो कहीं खींचकर लेक जाने की कशिश मे हैं।
विश्व का हर इंसान हर शख़्स प्रभू के स्वरूपों को स्वीकारता है। ठीक उसी तरह जिस तरह बड़े से वर्गाकार मे अंधेरे में टिम-टिमाते जूगनू अपने से निकली रोशनी में एक-दूसरे से रू-ब-रू होते हैं और हमारे लिए कई देखने के फ़्रैम छोड़ते हैं।
राकेश
आज लोग चाहें कितने भी धर्म बताये, कितने भी समाज बनाये पर उस का एक ही धर्म है। एक ही समाज है जिसके भीतर खुशहाल और अधिकार के साथ जीना है। भले ही धर्म के नाम पर इंसान को बाँट दिया हो लेकिन उसके वज़ूद को उसकी वास्तविकता से अलग नहीं कर सकते और उसकी वास्तविकता ये है की जब किसी को भूख लगती है तो भोजन की आवश्यकता को मानना ही पड़ता है।
इंसान को इंसान की जरूरत का अहसास सिर्फ़ रोटी, कपड़ा और मकान ही नहीं होता बल्कि अपने विचारों से उत्पन्न सम्भावनाओं और जिज्ञासाओं को गहरा करने की शिरकत करना भी जरूरी है। भूख तो जानवर को भी लगती है, नींद तो उसे भी आती है। ठिकाना तो उसे भी चाहिये होता है। इंसान और जानवर के बीच की दूरी शायद कोई तय नहीं कर सकता है। आखिर ये दूरी क्या है? और क्या कल्पना करती है?
जो इंसान और जानवर के लिए प्रेम और वात्शल्लायता बनकर एक माँ की तरह इस विभाजन को समझौता बना देती है जिसे अक्सर हम समझ नहीं पाते लेकिन अपना लेते हैं। नदी जितनी शान्त और निर्मल होती है वो उतनी ही गहरी भी होती है। ये हम मानते आये हैं। हमें हमारे अलग-अलग समाजों मे इसे अपनी-अपनी ज़ुबानों मे समझाने की कोशिस कि है। ये जरूरी नहीं है की इंसान किसी धर्म को अपनाकर समाज मे निर्भय होकर जी लेगा। वो जहाँ जायेगा उसके लिए डर बना रहेगा। क्योंकि कोई भी इंसान अपने मुताबिक नहीं जी सकता। उसे अपनी सीमाओं मे ही रहना होगा। ये तय कर दिया गया है। हम चाहकर भी अपने लिए जगह बनाने की कइ अनेकों कल्पनाए करते हैं, सोचते हैं, कोशिश करते हैं पर ये किसके लिए है?
समाज मे सब कुछ उल्टा ही दिखता है और कभी-कभी सीधा भी लेकिन, ये आप पर निर्भर है की आप किसे और कौन से दृष्टीकोण से माहौल को देखने की कोशिश कर रहे हैं। आप ये भी सोच सकते हैं की आपके पास क्या नज़रिये और फ्रैम हैं? जिससे आप झाँकने कि फ़िराक मे हैं।
समाज मे जीने वाला हर इंसान, हर शख़्स एक तरह का उबाल लिए रहता है जिसका तापमान कभी बड़ जाता है तो कभी गिर जाता है। जो कभी इतनी जोरों से खौलता है की उसके आसपास तैर रही वायु भी उससे प्रभावित हो जाती है। इस उबाल को समझना जरा कठीन है। इससे पैदा होने वाली उष्मा को आप जगह-जगह रूपान्तरण होता पा सकते हैं। ये उष्मा तरह-तरह की है जिसका अवलोकन वायुमण्डल में होता रहता है। विज्ञान ईश्वर को शायद नकरात्मक सोच से देखता है। उसके पास ईश्वर की मौज़ूदगी के ऐसे ही समीकरण हैं जो तत्वों के मिलाप से ही बनते हैं पर असत्य है। इसको एक और विधी से जान सकते है जैसे- पारदर्शी शब्द बना कैसे, इस पर अगर तमाम चीजों पर खोज की जाये तो अधिकतर चीजें पारदर्शी निकल कर आयेगी और कई चट्टान की तरह ठोस।
हम और विज्ञान तीसरी आँख तलाशने के सदियों से शौध बना रहे हैं। बस, माध्यम अलग-अलग हैं। कोई पारिवार मे खोज जारी रखता है तो कोई पारिवार को त्याग कर ऑझाओं और फकीरों की भांती साधना मे लीन होकर दिव्यमान रोशनी को पाने के लिए समाज के सभी योगों से अलग अदभूत योग मे खोए हुए है।
वो अपने पूरक को तलाश्ने के लिए तप करने लग जाता है। क्योंकि वो किसी दिव्य आत्मा के महासागर के मंथन से निकला रत्न है। जो अपने प्रभू के आदेश को पाकर आया है। उस प्रभू ने अपने रूप से ही उसका शरीर बनाया है। उसमे अपनी आत्मा को उसमें बसाया है। जिसने देखने के लिए इंसान को तरह-तरह की इंद्रियाँ दी है। शरीर की हर बनावट को उस प्रभू ने सोच-सोच कर बनाया है।
धर्म तो केवल अपनी तरफ ले जाने वाला झुंड है जिसमें इंसान अपने को पूरा महसूस करता है और अपने को आइने में इतराकर देखता है और भूल जाता है की वो जिसका अंश है उसी का अलोचक बन गया है।
उसे के अस्तित्व को नकार रहा है। जिसने जीवन दिया है। पिता जैसे बच्चे के नामकर्ण और उस की पहचान जन्म से ही बना देता है वैसे ही हमारा जीवन भी उस पर्मपिता की असीम अनूकम्पा की देन है। फिर हम कौन होते है धर्म, जाति और सरहदों को बाँटने वाले।
एक फ़िल्म देखी उसमे फ़िल्म के शुरू मे ही कुछ डायलॉग हैं जो एक भगवान कह रहा है, वे कहता है:- "मैंने ये दुनिया बनाई, हवा बनाई, पानी बनाया, जीवन बनाना और इंसान बनाये, फिर उसके बाद इंसान ने मुझे बनाया, शायद मुझे पाने के लिए नहीं बल्कि मुझे दोश देने के लिए।"
ये लाइने हमारे लिए क्या है? ये एक नाटक है, जो शुरू हुआ और समाप्त हो गया। लोग क्या लेकर गए। या ये क्या सोचकर लिखे गए। सभी कह रहे हैं अपने-अपने लव्ज़ों अपने-अपने शब्द। जो कहीं खींचकर लेक जाने की कशिश मे हैं।
विश्व का हर इंसान हर शख़्स प्रभू के स्वरूपों को स्वीकारता है। ठीक उसी तरह जिस तरह बड़े से वर्गाकार मे अंधेरे में टिम-टिमाते जूगनू अपने से निकली रोशनी में एक-दूसरे से रू-ब-रू होते हैं और हमारे लिए कई देखने के फ़्रैम छोड़ते हैं।
राकेश
चीजों का एकान्त
ऑटो का काम ख़त्म होने के बाद क्या करते कोई काम शायद बचा ही नहीं था। 35-40 की उम्र ऐसी होती है जिसमें शहर में कोई नौकरी नहीं होती तो क्या करते?
शिवराम जी की भी कुछ यही दिक्कत थी। अक्सर अपना ऑटो वो शमशान घाट के नल से आते पानी से धोया करते थे। सुबह 7 बजे से 8 बजे तक उनका यही काम रहता। इस दौरान शमशान घाट में भी बहुत शांती रहती। बहुत कम बार हुआ था कि इस वक़्त में कोई अर्थी आए। जब भी कभी आती तो वो अपनी सफ़ाई छोड़कर दो कदम उनके कदमों से मिला लेते और दूर से ही नमस्कार कर अपने काम मे वापस लग जाते।
शमशान घाट के पंडितजी के साथ में अच्छी जान-पहचान थी इनकी। शाम में काफी बार 4-5 घंटे साथ बिताए थे। अक्सर शाम में वो वापस आकर अपना ऑटो उसी नल के साथ खड़ा करते और ताला चैन के साथ उसी से बाँध देते। कोई भी शाम ऐसी ना थी जिसमें उन्होंने शमशान घाट में आग ना देखी हो। कभी कोई आग सुलघ रही होती तो कभी बहुत तेज़ उठ रही होती। कभी कोई उस आग के सामने खड़ा दिखता तो कभी वो अपने में एकान्त सुलघती रहती और किसी और के चले जाने का ज्ञात हो जाता।
सुबह और शाम का देखना अब बड़ा हो गया था। ऑटो का सी.एन.जी में तब्दील होना शिवराम जी के लिए तो छोटा ना था। चाहते ना चाहते उनको अपने ऑटो का काम बंद ही करना पड़ा। पूरा दिन बिताना अब आसान नहीं था। 35-40 की उम्र थी और शहर की गुंजाइशें ख़त्म पर थी। वो अपना पूरा दिन शमशान घाट में ही बिताने लगे। कुछ दिन तक वहाँ आते चढ़ावे में उनका हिस्सा रहता। वहाँ पर आए आटा, दाल, चावल, चीनी, और कपड़े और कई वो चीजें जो लोग अपने मर जाने वाले के नाम पर दे जाया करते थे उनको पंडितजी अपने घर में इस्तमाल कर लेते। बस, दोपहर का खाना तो शिवराम जी का वहीं से आ जाता। इस दोपहर के खाने के लिए उनको ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता बस, आती हुई अर्थी को खाली जगह दिखाते और शमशान घाट के बनते पर्चे पर पंडितजी के साईन करवाते। यही काम था उनका यहाँ पर जिसकी उन्हे कोई तन्ख्या नहीं मिलती थी।
उनका अभी के दौर में तो घर से मेल-मिलाप नहीं था। वो रात में अक्सर वहीं सो जाया करते। घर के साथ में एक तन्ख्या का रिश्ता था जो अभी टूटा हुआ था। वो वहाँ अगर जाए तो क्या लेकर हाथ तो खाली थे उनके।
बस, अपना दिन बिताने के लिए वहीं मंदिर के पेड़ के नीचे बैठे शमशान घाट में अपनी नज़रे घुमाते रहते। दोपहर में कई लोग वहाँ आकार बैठते और सोते भी थे। अक्सर कूड़ा बिनने वाले बच्चे वहाँ कोनों में लगे रहते और कुछ लोग वहाँ किसी भी समाधी के ऊपर अपने पैर तानकर सो जाते। पेड़ की छाँव के नीचे बहुत शांति मिलती थी यहाँ लोगों को। वैसे यह जगह मशहूर भी शांति के लिए होती है। तो पूरा दिन उन्ही को देखकर उनका टाइम बितता रहा।
काफी टाइम से चल रहा है यह सब। अब तो जिनका कोई मर जाता वो इन्हे जगह दिखाने और चिता जलाने में मदद का कुछ दे भी जाते। वो अपने साथ से अलग से कुछ नहीं लाते हो भले ही पर जो अर्थी पर आता वो तो दिया ही जा सकता था।
एक औरत की अर्थी। बहुत लोग थे। लगता था जैसे कोई जवान और शादीशुदा औरत थी। कई साड़ियाँ चढ़ी थी उसपर। चूड़ियाँ, साड़ियाँ , सैंडिल, मेकप बोक्स, सारी दुल्हन का सामान चढ़ा था उस पर। काफी रोना धोना भी हुआ था। वो लकड़ियाँ अपने साथ ही लाए थे। यहाँ अंदर से कोई नहीं खरीदता और कोई क्यों खरीदे भला इतनी मंहगी जो देता है। मरने वाली औरत बहुत गोरी थी। उसका एक बच्चा भी था वो भी गोद का। एक आदमी जिसके हाथ में बच्चा था वो शायद उसका शोहर था। 9 नम्बर वाले मोक्षस्थल पर जलाने के लिए उसे रखा गया था। उनका अपना क्रियाक्रम का काम चलता रहा और उन्होंने सारे कपड़े और सामान एक तरफ पटक दिया और मृतक को लकड़ियों पर रख दिया गया। अपना सारा काम-वाम निबटाकर वो कुछ देर तो वहीं पर खड़े रहे और थोड़ी देर बाद वहाँ अस्थियों के कमरे के साथ आकर सीटों पर बैठ गए। लगभग दो घंटे वो बैठे रहे फिर एक-एक दो-दो करके वो चले गए मगर वो चिता जलती रही। सब कुछ ठंडा हो जाने की राह देखी जा रही थी जब राख मे से धुआँ और गर्मभाप निकलने लगी तो सारे कपड़े और गहने और सामान उठाने के लिए वहाँ कूड़ा उठाने वाले भागे। शिवराम जी ने उन्हे डाँटा और कहा, "ख़बरदार अगर किसी भी चीज को हाथ लगाया तो ?”
वो उन्हे देखकर पीछे हो गए। पहली बार उनकी आवाज़ निकली थी किसी को रोकने के लिए शायद ये आ गया था उनमे की अब मैं भी इस जगह को सम्भालता हूँ पंडित जी के साथ। शिवराम जी सारा समान उठाकर पंडित जी के घर ले गए। पंडित जी की पत्नी ने देखा और धोती-धोती उठाते हुए कहा, “ये मेरे काम कि है बाकी तू ले जा अपने घर।" हाथों में बाकि सारे कपड़े लेकर वो खड़े रहे और यही सोचते रहे की लेकर जाऊँ या नहीं। कहीं कोई 'हाये' तो साथ मे नहीं चली जायेगी? कोई परेशानी ना बढ़ जाये? नहीं-नहीं क्या करूँ का जाप उनके अन्दर मे घूमने लगा था। फिर भी समानों और चीजों को देखकर सोचा क्यों ना लेकर ही जाया जाये। सारी साड़ियों की तय लगाकर वो एक साफ़ पॉलिथीन में डालकर और मेकपबोक्स अपने हाथों में पकड़े वो अपने घर लेकर चल गए और एक रात के लिए शामशान घाट से गायब हो गए।
अगले दिन पंडिताई ने पहली ही नज़र में उन्हे देख कर कहा, “शिवराम क्या हुआ कैसी लगी साड़ियाँ तेरी औरत को?”
"अरे कहाँ पंडिताई जी सुसरी ने पूरी रात उन साड़ियों को बाहर उसी पॉलिथीन मे दरवाजे के बाहर ही पड़ा रखा कह रही थी की किसी माँगने वाली को दे देगी।"
कहते-कहते वो उसी 9 नम्बर के मोक्षस्थल पर जाकर अस्थियाँ को काले कपड़े मे भरने लगे। ये भरना वैसे हर किसी का नहीं होता पूरे एक दिन तक मरने वाले घरवालों का इन्तजार किया जाता है और जब वो नहीं आते तो खुद ही काले रंग के कपड़े में अस्थियों के फूलों को चूनकर भर लेते हैं और उसपर मोक्षस्थल, टाइम, लिंग लिखकर वहाँ पर अस्थियों के कमरे में टाँग देते हैं। जहाँ पर कई और अस्थियाँ पहले दे ही टगीं हुई हैं थैलियों की शक़्ल में और उनके साथ-साथ में कई कपड़े भी पड़े हैं।
पूरा कमरा काले रंग से भरा हुआ था। बिना पलस्तर के वो ख़ुर्दरी दिवारें बहुत डरावनी लग रही थी। कुछ भी नया नहीं था। कोनों में कई समान भरा और ख़ामोश पड़ा कई आग की भाप निकाल रहा था। लाल चूड़ियाँ, साड़ियाँ, जुतियाँ, मटके, हुक्के के ऊपर का कटोरा, छोटी चारपाइयाँ सभी की सभी कोनों में भरी हुई थी। किसी भी सामान को छूने का मन भी हो तो हाथ नहीं उठते थे। शिवराम जी वहाँ पर कोई खूटीं ढूँढ रहे थे एक और थैली टाँगने के लिए। काले धूँए की आड़ मे गहरा अंधेरा एक जगह की चूप्पी के सन्नाटे को और भी गहरा कर रहा था। कभी तो ये समानों का कमरा लगता तो कभी कई लोगों के शांत रहने का ठिकाना।
सभी सुबह के 11 ही बजे थे तब भी इसका एकान्त कठोर था। जैसे-जैसे रात गहरायेगी तो क्या होगा? शिवराम जी ने वहाँ पर चार और थैलियों के साथ मे उसे टाँगने के लिए जैसे ही डोरी निकाली तो उनकी नज़र उन थैलियों की तारीखों पर गई। चार मे से तीन थैलियाँ 2004 के सितम्बर के महिने की थी और उनके हाथ में लगी थैली 2007 की। वो यही सोचने लगे की यहाँ टाँगने के बाद में भूल गया था तो? यहाँ पर तो धूँए और मिट्टी में सारी थैलियों को सदियों पुराना कर दिया था।
अब वो देखने लगे लगभग सन 2000 और 2007 के मरने वालों की थैलियों को। वो उस कमरे के और अन्दर चले गए। अन्दर कोने की दीवार के साथ मे कई थैलियाँ टँगी थी। ऐसे जैसे किसी ने अपना कोई अनमोल समान याद रखने के लिए टाँगा हो या ऐसे जैसे भूत-प्रेत से बचने के लिए भवूती टाँगी हो।
उन्होंने अंदर की सभी थैलियों को देखा, तारीखें भी छुप गई थी। अपनी उंगलियों से उन्होंने सबकी तारीखें देखी उनपर 1998 , 1999, 1995, 1996, और 2001 लिखा था। देखकर वो वापस आने को हुए और जहाँ तक धूप आ रही थी वहाँ आकर एक लकड़ी ईंटो की दरारी मे फँसाई और अपने हाथ की थैली को वहाँ टाँग दिया। वहाँ खड़े वो पूरे कमरे को देखने लगे उनकी नज़र कमरे में ऐसे घूम रही थी जैसे हर चीज को पढ़ रही हो कोई और रंग ही नहीं था। बस, एक ही या दो ही अंतर थे सभी मे। कोई थैली साड़ी, धोती, या चाकू के साथ टंगी होती तो कोई मोटी या पतली और वो अंदाजा लगाते कि कौन औरत है और कौन मर्द और कौन पतला था और कौन मोटा। पहली बार था कि वो अपने कमरे में।
"कोने में रखी चीजों की कोई ज़रूरत नहीं है वैसे उस कमरे मे। वो तो किसी ना किसी काम भी आ सकती है और इतना तो पता है कि सन 2000 मे कोई नहीं मरा। अगर कोई मरा है तो कोई यहाँ थैलियों में अकेला टंगा नहीं है। अपना मोक्ष पाने के लिए इतना इंतज़ार कैसे सहेगा कोई ? क्या रिवाज और क्या तारीख? मरने के बाद भी यहाँ अकेला होना क्या फायदा?” वो अपने मे बड़बड़ाते रहे।
जल्दी से जल्दी वो उस थैली को वहाँ टाँग कर बाहर आ गए और पंडित जी के पास जाकर बैठ गए। बहुत बार आऐ हैं यहाँ बल्कि यहाँ पर वो रहे भी हैं। कई लोगों के मरने पर वो इन कुर्सियों पर बैठे भी रहे हैं। सामने रखी ये वही कुर्सी है जो रमेश ने अपने पिता रामचरण के नाम पर यहाँ रखवाई थी। वो 1938 मे पैदा हुए थे और 1992 मे मरे थे। उनके नाम की यहाँ पता है सोने की सीढ़ी भी चड़ाई गई थी क्योंकि वो परदादा से भी ऊपर होकर स्वर्ग सिधारे थे। 3 पीढ़ियाँ देख ली थी उन्होंने। क्या बाजे- गाजे के साथ आए थे। यहाँ पर बैठकर उन चीजों को देखकर यही सब याद आ रहा था उन्हे। पर आज उन कमरे मे रखे सामान को देखकर कुछ भी याद नहीं आ रहा था बस, इतना ही दिमाग मे रहता कि मरने की तारीखों में कोई ना कोई टँगा है। वो पैदा कब हुआ कितनी पीढ़ियाँ देखी होंगी उसने वो कुछ नहीं था। आँखों के आगे वो चीजें ख़ामोश पड़ी थी जो रंगीन तो थी पर किसी की अपनी चीज। गठरियों मे बंधे कपड़े वहाँ पड़े थे और एक टूटी सी चारपाई जो शायद उसी की होगी जो मरा था।
दोपहर का खाना भी आ गया था। पंडिताई जी चावल-भात प्लेट में डाल लाई थी। शिवराम जी अपनी पाँचो उंगलियों को उसमे मिलाते हुए एक गस्सा जैसे ही खाते तो उन्हे उन्ही थैलियों की महक अपनी उंगलियों में महसूस होती। ज़रा सी भी हवा चलती तो पूरे शमशान घाट मे राख ही राख उड़ती नज़र आती और वो उंगलियों को घुमाते-घुमाते चावलों के गस्से पर गस्से खा रहे थे।
इतने में आवाज़ों का काफ़िला अंदर आने लगा। राम नाम सत्य है , सत्य बोलो गद्य है। इसी को दोहराते हुए काफी सारे लोग अंदर आते गए। पहले गाड़ियाँ आई और फिर अर्थी एकदम शांत। आवाज़ें लगाने वाले आगे निकल गए थे। वो आते ही बाहर वहीं कोने पर पानी के नाँद पर रुक गए। दो आदमी अंदर आए और जगह की पूछने लगे।
शिवराम जी प्लेट को नीचे रखते हुए बाहर की तरफ आए और 7 नम्बर वाले मोक्ष स्थल पर ले गए। वहाँ सुबह ही सफ़ाई की गई थी। उन्होंने वहीं अपने क्रियाक्रम का काम शुरू कर दिया और मरने वाले को विदाई देने लगे। मगर यहाँ पर कोई रोने की आवाज़ें नहीं थी। उसके साथ आया सामान जिसपर हमेशा पंडिताई की नज़र रहती थी जैसे नई दुल्हन क्या लाई है उसे देखने की चाह हो।
कोई आदमी था शायद। वहीं गठरी मे कपड़े थे, 4 जोड़ी जयपुरी जूतियाँ थी, आँखों के चश्मे थे और एक कुर्सी भी थी। वो अपने साथ ही लाए थे। सभी लोगों की तरह थोड़ा टाइम देना था और सामानों को वहीं छोड़ जाना था। लोग जब तक आग रहती तब तक वहाँ बनी समाधियों के नाम और तारीखें पढ़ने में लगे रहते और अपना टाइम बिताते। यहाँ पंडिताई और कूड़ा बिनने वालों की निगाह सामानों पर रहती और वहाँ खेलते बच्चों की लुटते खील-बताशो और पैसो पर। यहाँ पर खील-बताशे तो नहीं थे पर अर्थी पर गुब्बारे लगे थे और बैंड वाले भी थे। बच्चे तो गुब्बारों में लग गए और कूड़ा बिनने वाले उन गठरों में बंधे कपड़ो में।
शिवराम जी ने सारा काम करवाया अर्थी के बाँस को ज़मीन मे मारा और खेल ख़त्म। आज पहली बार वो अपने लिए यहाँ से चारों जोड़ी जूतियाँ और कुर्सी लेकर गए थे।
लख्मी
शिवराम जी की भी कुछ यही दिक्कत थी। अक्सर अपना ऑटो वो शमशान घाट के नल से आते पानी से धोया करते थे। सुबह 7 बजे से 8 बजे तक उनका यही काम रहता। इस दौरान शमशान घाट में भी बहुत शांती रहती। बहुत कम बार हुआ था कि इस वक़्त में कोई अर्थी आए। जब भी कभी आती तो वो अपनी सफ़ाई छोड़कर दो कदम उनके कदमों से मिला लेते और दूर से ही नमस्कार कर अपने काम मे वापस लग जाते।
शमशान घाट के पंडितजी के साथ में अच्छी जान-पहचान थी इनकी। शाम में काफी बार 4-5 घंटे साथ बिताए थे। अक्सर शाम में वो वापस आकर अपना ऑटो उसी नल के साथ खड़ा करते और ताला चैन के साथ उसी से बाँध देते। कोई भी शाम ऐसी ना थी जिसमें उन्होंने शमशान घाट में आग ना देखी हो। कभी कोई आग सुलघ रही होती तो कभी बहुत तेज़ उठ रही होती। कभी कोई उस आग के सामने खड़ा दिखता तो कभी वो अपने में एकान्त सुलघती रहती और किसी और के चले जाने का ज्ञात हो जाता।
सुबह और शाम का देखना अब बड़ा हो गया था। ऑटो का सी.एन.जी में तब्दील होना शिवराम जी के लिए तो छोटा ना था। चाहते ना चाहते उनको अपने ऑटो का काम बंद ही करना पड़ा। पूरा दिन बिताना अब आसान नहीं था। 35-40 की उम्र थी और शहर की गुंजाइशें ख़त्म पर थी। वो अपना पूरा दिन शमशान घाट में ही बिताने लगे। कुछ दिन तक वहाँ आते चढ़ावे में उनका हिस्सा रहता। वहाँ पर आए आटा, दाल, चावल, चीनी, और कपड़े और कई वो चीजें जो लोग अपने मर जाने वाले के नाम पर दे जाया करते थे उनको पंडितजी अपने घर में इस्तमाल कर लेते। बस, दोपहर का खाना तो शिवराम जी का वहीं से आ जाता। इस दोपहर के खाने के लिए उनको ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता बस, आती हुई अर्थी को खाली जगह दिखाते और शमशान घाट के बनते पर्चे पर पंडितजी के साईन करवाते। यही काम था उनका यहाँ पर जिसकी उन्हे कोई तन्ख्या नहीं मिलती थी।
उनका अभी के दौर में तो घर से मेल-मिलाप नहीं था। वो रात में अक्सर वहीं सो जाया करते। घर के साथ में एक तन्ख्या का रिश्ता था जो अभी टूटा हुआ था। वो वहाँ अगर जाए तो क्या लेकर हाथ तो खाली थे उनके।
बस, अपना दिन बिताने के लिए वहीं मंदिर के पेड़ के नीचे बैठे शमशान घाट में अपनी नज़रे घुमाते रहते। दोपहर में कई लोग वहाँ आकार बैठते और सोते भी थे। अक्सर कूड़ा बिनने वाले बच्चे वहाँ कोनों में लगे रहते और कुछ लोग वहाँ किसी भी समाधी के ऊपर अपने पैर तानकर सो जाते। पेड़ की छाँव के नीचे बहुत शांति मिलती थी यहाँ लोगों को। वैसे यह जगह मशहूर भी शांति के लिए होती है। तो पूरा दिन उन्ही को देखकर उनका टाइम बितता रहा।
काफी टाइम से चल रहा है यह सब। अब तो जिनका कोई मर जाता वो इन्हे जगह दिखाने और चिता जलाने में मदद का कुछ दे भी जाते। वो अपने साथ से अलग से कुछ नहीं लाते हो भले ही पर जो अर्थी पर आता वो तो दिया ही जा सकता था।
एक औरत की अर्थी। बहुत लोग थे। लगता था जैसे कोई जवान और शादीशुदा औरत थी। कई साड़ियाँ चढ़ी थी उसपर। चूड़ियाँ, साड़ियाँ , सैंडिल, मेकप बोक्स, सारी दुल्हन का सामान चढ़ा था उस पर। काफी रोना धोना भी हुआ था। वो लकड़ियाँ अपने साथ ही लाए थे। यहाँ अंदर से कोई नहीं खरीदता और कोई क्यों खरीदे भला इतनी मंहगी जो देता है। मरने वाली औरत बहुत गोरी थी। उसका एक बच्चा भी था वो भी गोद का। एक आदमी जिसके हाथ में बच्चा था वो शायद उसका शोहर था। 9 नम्बर वाले मोक्षस्थल पर जलाने के लिए उसे रखा गया था। उनका अपना क्रियाक्रम का काम चलता रहा और उन्होंने सारे कपड़े और सामान एक तरफ पटक दिया और मृतक को लकड़ियों पर रख दिया गया। अपना सारा काम-वाम निबटाकर वो कुछ देर तो वहीं पर खड़े रहे और थोड़ी देर बाद वहाँ अस्थियों के कमरे के साथ आकर सीटों पर बैठ गए। लगभग दो घंटे वो बैठे रहे फिर एक-एक दो-दो करके वो चले गए मगर वो चिता जलती रही। सब कुछ ठंडा हो जाने की राह देखी जा रही थी जब राख मे से धुआँ और गर्मभाप निकलने लगी तो सारे कपड़े और गहने और सामान उठाने के लिए वहाँ कूड़ा उठाने वाले भागे। शिवराम जी ने उन्हे डाँटा और कहा, "ख़बरदार अगर किसी भी चीज को हाथ लगाया तो ?”
वो उन्हे देखकर पीछे हो गए। पहली बार उनकी आवाज़ निकली थी किसी को रोकने के लिए शायद ये आ गया था उनमे की अब मैं भी इस जगह को सम्भालता हूँ पंडित जी के साथ। शिवराम जी सारा समान उठाकर पंडित जी के घर ले गए। पंडित जी की पत्नी ने देखा और धोती-धोती उठाते हुए कहा, “ये मेरे काम कि है बाकी तू ले जा अपने घर।" हाथों में बाकि सारे कपड़े लेकर वो खड़े रहे और यही सोचते रहे की लेकर जाऊँ या नहीं। कहीं कोई 'हाये' तो साथ मे नहीं चली जायेगी? कोई परेशानी ना बढ़ जाये? नहीं-नहीं क्या करूँ का जाप उनके अन्दर मे घूमने लगा था। फिर भी समानों और चीजों को देखकर सोचा क्यों ना लेकर ही जाया जाये। सारी साड़ियों की तय लगाकर वो एक साफ़ पॉलिथीन में डालकर और मेकपबोक्स अपने हाथों में पकड़े वो अपने घर लेकर चल गए और एक रात के लिए शामशान घाट से गायब हो गए।
अगले दिन पंडिताई ने पहली ही नज़र में उन्हे देख कर कहा, “शिवराम क्या हुआ कैसी लगी साड़ियाँ तेरी औरत को?”
"अरे कहाँ पंडिताई जी सुसरी ने पूरी रात उन साड़ियों को बाहर उसी पॉलिथीन मे दरवाजे के बाहर ही पड़ा रखा कह रही थी की किसी माँगने वाली को दे देगी।"
कहते-कहते वो उसी 9 नम्बर के मोक्षस्थल पर जाकर अस्थियाँ को काले कपड़े मे भरने लगे। ये भरना वैसे हर किसी का नहीं होता पूरे एक दिन तक मरने वाले घरवालों का इन्तजार किया जाता है और जब वो नहीं आते तो खुद ही काले रंग के कपड़े में अस्थियों के फूलों को चूनकर भर लेते हैं और उसपर मोक्षस्थल, टाइम, लिंग लिखकर वहाँ पर अस्थियों के कमरे में टाँग देते हैं। जहाँ पर कई और अस्थियाँ पहले दे ही टगीं हुई हैं थैलियों की शक़्ल में और उनके साथ-साथ में कई कपड़े भी पड़े हैं।
पूरा कमरा काले रंग से भरा हुआ था। बिना पलस्तर के वो ख़ुर्दरी दिवारें बहुत डरावनी लग रही थी। कुछ भी नया नहीं था। कोनों में कई समान भरा और ख़ामोश पड़ा कई आग की भाप निकाल रहा था। लाल चूड़ियाँ, साड़ियाँ, जुतियाँ, मटके, हुक्के के ऊपर का कटोरा, छोटी चारपाइयाँ सभी की सभी कोनों में भरी हुई थी। किसी भी सामान को छूने का मन भी हो तो हाथ नहीं उठते थे। शिवराम जी वहाँ पर कोई खूटीं ढूँढ रहे थे एक और थैली टाँगने के लिए। काले धूँए की आड़ मे गहरा अंधेरा एक जगह की चूप्पी के सन्नाटे को और भी गहरा कर रहा था। कभी तो ये समानों का कमरा लगता तो कभी कई लोगों के शांत रहने का ठिकाना।
सभी सुबह के 11 ही बजे थे तब भी इसका एकान्त कठोर था। जैसे-जैसे रात गहरायेगी तो क्या होगा? शिवराम जी ने वहाँ पर चार और थैलियों के साथ मे उसे टाँगने के लिए जैसे ही डोरी निकाली तो उनकी नज़र उन थैलियों की तारीखों पर गई। चार मे से तीन थैलियाँ 2004 के सितम्बर के महिने की थी और उनके हाथ में लगी थैली 2007 की। वो यही सोचने लगे की यहाँ टाँगने के बाद में भूल गया था तो? यहाँ पर तो धूँए और मिट्टी में सारी थैलियों को सदियों पुराना कर दिया था।
अब वो देखने लगे लगभग सन 2000 और 2007 के मरने वालों की थैलियों को। वो उस कमरे के और अन्दर चले गए। अन्दर कोने की दीवार के साथ मे कई थैलियाँ टँगी थी। ऐसे जैसे किसी ने अपना कोई अनमोल समान याद रखने के लिए टाँगा हो या ऐसे जैसे भूत-प्रेत से बचने के लिए भवूती टाँगी हो।
उन्होंने अंदर की सभी थैलियों को देखा, तारीखें भी छुप गई थी। अपनी उंगलियों से उन्होंने सबकी तारीखें देखी उनपर 1998 , 1999, 1995, 1996, और 2001 लिखा था। देखकर वो वापस आने को हुए और जहाँ तक धूप आ रही थी वहाँ आकर एक लकड़ी ईंटो की दरारी मे फँसाई और अपने हाथ की थैली को वहाँ टाँग दिया। वहाँ खड़े वो पूरे कमरे को देखने लगे उनकी नज़र कमरे में ऐसे घूम रही थी जैसे हर चीज को पढ़ रही हो कोई और रंग ही नहीं था। बस, एक ही या दो ही अंतर थे सभी मे। कोई थैली साड़ी, धोती, या चाकू के साथ टंगी होती तो कोई मोटी या पतली और वो अंदाजा लगाते कि कौन औरत है और कौन मर्द और कौन पतला था और कौन मोटा। पहली बार था कि वो अपने कमरे में।
"कोने में रखी चीजों की कोई ज़रूरत नहीं है वैसे उस कमरे मे। वो तो किसी ना किसी काम भी आ सकती है और इतना तो पता है कि सन 2000 मे कोई नहीं मरा। अगर कोई मरा है तो कोई यहाँ थैलियों में अकेला टंगा नहीं है। अपना मोक्ष पाने के लिए इतना इंतज़ार कैसे सहेगा कोई ? क्या रिवाज और क्या तारीख? मरने के बाद भी यहाँ अकेला होना क्या फायदा?” वो अपने मे बड़बड़ाते रहे।
जल्दी से जल्दी वो उस थैली को वहाँ टाँग कर बाहर आ गए और पंडित जी के पास जाकर बैठ गए। बहुत बार आऐ हैं यहाँ बल्कि यहाँ पर वो रहे भी हैं। कई लोगों के मरने पर वो इन कुर्सियों पर बैठे भी रहे हैं। सामने रखी ये वही कुर्सी है जो रमेश ने अपने पिता रामचरण के नाम पर यहाँ रखवाई थी। वो 1938 मे पैदा हुए थे और 1992 मे मरे थे। उनके नाम की यहाँ पता है सोने की सीढ़ी भी चड़ाई गई थी क्योंकि वो परदादा से भी ऊपर होकर स्वर्ग सिधारे थे। 3 पीढ़ियाँ देख ली थी उन्होंने। क्या बाजे- गाजे के साथ आए थे। यहाँ पर बैठकर उन चीजों को देखकर यही सब याद आ रहा था उन्हे। पर आज उन कमरे मे रखे सामान को देखकर कुछ भी याद नहीं आ रहा था बस, इतना ही दिमाग मे रहता कि मरने की तारीखों में कोई ना कोई टँगा है। वो पैदा कब हुआ कितनी पीढ़ियाँ देखी होंगी उसने वो कुछ नहीं था। आँखों के आगे वो चीजें ख़ामोश पड़ी थी जो रंगीन तो थी पर किसी की अपनी चीज। गठरियों मे बंधे कपड़े वहाँ पड़े थे और एक टूटी सी चारपाई जो शायद उसी की होगी जो मरा था।
दोपहर का खाना भी आ गया था। पंडिताई जी चावल-भात प्लेट में डाल लाई थी। शिवराम जी अपनी पाँचो उंगलियों को उसमे मिलाते हुए एक गस्सा जैसे ही खाते तो उन्हे उन्ही थैलियों की महक अपनी उंगलियों में महसूस होती। ज़रा सी भी हवा चलती तो पूरे शमशान घाट मे राख ही राख उड़ती नज़र आती और वो उंगलियों को घुमाते-घुमाते चावलों के गस्से पर गस्से खा रहे थे।
इतने में आवाज़ों का काफ़िला अंदर आने लगा। राम नाम सत्य है , सत्य बोलो गद्य है। इसी को दोहराते हुए काफी सारे लोग अंदर आते गए। पहले गाड़ियाँ आई और फिर अर्थी एकदम शांत। आवाज़ें लगाने वाले आगे निकल गए थे। वो आते ही बाहर वहीं कोने पर पानी के नाँद पर रुक गए। दो आदमी अंदर आए और जगह की पूछने लगे।
शिवराम जी प्लेट को नीचे रखते हुए बाहर की तरफ आए और 7 नम्बर वाले मोक्ष स्थल पर ले गए। वहाँ सुबह ही सफ़ाई की गई थी। उन्होंने वहीं अपने क्रियाक्रम का काम शुरू कर दिया और मरने वाले को विदाई देने लगे। मगर यहाँ पर कोई रोने की आवाज़ें नहीं थी। उसके साथ आया सामान जिसपर हमेशा पंडिताई की नज़र रहती थी जैसे नई दुल्हन क्या लाई है उसे देखने की चाह हो।
कोई आदमी था शायद। वहीं गठरी मे कपड़े थे, 4 जोड़ी जयपुरी जूतियाँ थी, आँखों के चश्मे थे और एक कुर्सी भी थी। वो अपने साथ ही लाए थे। सभी लोगों की तरह थोड़ा टाइम देना था और सामानों को वहीं छोड़ जाना था। लोग जब तक आग रहती तब तक वहाँ बनी समाधियों के नाम और तारीखें पढ़ने में लगे रहते और अपना टाइम बिताते। यहाँ पंडिताई और कूड़ा बिनने वालों की निगाह सामानों पर रहती और वहाँ खेलते बच्चों की लुटते खील-बताशो और पैसो पर। यहाँ पर खील-बताशे तो नहीं थे पर अर्थी पर गुब्बारे लगे थे और बैंड वाले भी थे। बच्चे तो गुब्बारों में लग गए और कूड़ा बिनने वाले उन गठरों में बंधे कपड़ो में।
शिवराम जी ने सारा काम करवाया अर्थी के बाँस को ज़मीन मे मारा और खेल ख़त्म। आज पहली बार वो अपने लिए यहाँ से चारों जोड़ी जूतियाँ और कुर्सी लेकर गए थे।
लख्मी
नाचती परछाईयाँ
नये साल का पहला कदम, नये साल कि पहली शुभकामनायें
बीते दिनों को न कभी भूलाया जाता है और न कभी उनसे मुँह मोड़ा जा सकता है। जीवन के खालीपन को यानी रिक़्त स्थान को भरने के लिये उन्हें फिर से दोहराने की जरूरत होती है फिर चाहें वो किसी तरह के वाद-विवाद के हादसे हो या मनोरंजन खुशी के अवसरों का माहौल।
हमारी यादें हमें बहुत तरह से जीने को प्रेरित करती हैं। वो कहती है की जो तुम कर चुके हो उससे जीने का कोई एक अंकुर फूटता है। उसे सींचने का ढ़ग बनाओ जिससे आप को वो अंकुर कभी पेड़ बनकर फल और छाया दे। जब आप अपने साथ कुछ करने के बाद चीजों को दोबारा सोचें तो उसमें फ़र्क करके देखे जिससे पता चले की आप कहाँ तक कमजोर रहे। किस तरह की गलतियाँ आपने की, जो भविष्य में दोहराई न जाये।
ये आपको हर कामयाबी के शिख़र तक ले जाने मे सक्षम होगा। मेरा कुछ ऐसा मानना है। आपकी चेतनाशक्तियाँ आपके अन्दर ही निवास करती हैं। उसे जगाने की आवश्यकता है। जब आप जागोगे तो आप को पता चलेगा की तुम कहाँ-किस गड्डे मे जा गिरे हो और कहाँ फँस गए हो? इस तरह आप अपने विचारों को अपनी मन की शीलता से खुद का वास्तविक रूप देख सकते हो। जो आप के जीवन का सच्चा स्वरूप है।
इस बीते वक़्त मे हमने कई काम अधूरे छोड़े हैं और कई बार चालाकी से खुद के लिए आसान रास्ते बनाये हैं। किसी का दिल दुखाया तो किसी को हँसाया है। इसी को तो कहते है,"दर्दे डिस्कों।"
जीवन चक्र में न जाने क्या-क्या न उलझ गया, जिससे हम जीनें का साफ़-सुथरा ढ़ग ही भूल गए। बस, याद रहा तो अपनी खुशी और अपना मज़ा। जहाँ एक तरफ ये सफ़र हादसों और घटनाक्रमों से गुज़रा। वही कहीं हमने अपने लिए अपनी ज़िन्दगी से क्या सीखा। ये समझना भी तो जरूरी है।
भगती-दौड़ती इस शहरी ज़िन्दगानी मे विकास एक मह्तवपूर्ण कड़ी है जिससे बसेरों के निमार्ण और खासी जगहों का निर्माण उसके साथ-साथ व्यवस्थित ढ़ग से जीने की प्रथा तो आई है। मगर भीड़ से भरे स्थानों में वही खीचा-तानी, वही हो-हल्ला मचता दिखाई देता। जिसे आज भी जब बीती हुई ज़िन्दगी याद करती है तो वो बेपरवाह शहर मे ख़ामोशी के बीच डरावना नाच नाचती परछाईयाँ तो शरीर के तमाम तारों को झिंजोड़कर रख देती है। जब रोजाना मे कई तबको के शख़्सों को हम घूमते-फिरते देखते हैं। उनकी हालात को देखकर ही खाया-पिया मुँह को आ जाता है। जीना क्या है? ये सवाल को हम बड़ा आसान बना देते हैं। हमारे दैनिक जीवन मे भी कई वो शख़्स जुड़े होते हैं जो हमें नहीं जानते और जिन्हों से हम भी अंजान हैं। लेकिन शहर की हवा में हम मिलकर सांस लेते हैं। जैसे ठन्ड के मौसम में आग की गर्माहट सब को ही चाहिये ही होती है और उसी मौसम मे एक धुंए की तरह अफ़वाहें उड़ती हैं और शहर के हर चप्पे-चप्पे मे समा जाती हैं। अफ़वाहें हमारी अपनी होती हैं पर वो बनती दूसरों के लिए हैं। रहस्यमय आलम बनाने के लिए। जिसके सम्पर्क मे आने वाला शख़्स अपनी आँखों पर भी भरोसा नहीं करता और वो कहीं किसी घटना का शिकार हो जाता है।
मेरे मन की ये किस्सागोही मेरे लिए बीते दिनों को याद करने की गुंजाइश है। लेकिन मैं अगले कदम पर लेकर क्या जाऊँ? क्या इन्ही को लेकर चलता बनू? या फिर किसी और ही दुनिया की उम्मीद लगाऊँ? ये तो बीते कुछ ऐसे विवरण हैं जिन्हे कब तक मैं अपने मे समाता चलूँ? क्या इससे कुछ नया ले पाऊँगा मैं?
ये तो गया, दर्दे डिस्कों भी हो गया। अब इस बीते कणों मे विदा कैसे किया जाये? क्या कोई नई जगह बनाई जायें या फिर पुरानी को ताज़ा किया जायें?
राकेश
बीते दिनों को न कभी भूलाया जाता है और न कभी उनसे मुँह मोड़ा जा सकता है। जीवन के खालीपन को यानी रिक़्त स्थान को भरने के लिये उन्हें फिर से दोहराने की जरूरत होती है फिर चाहें वो किसी तरह के वाद-विवाद के हादसे हो या मनोरंजन खुशी के अवसरों का माहौल।
हमारी यादें हमें बहुत तरह से जीने को प्रेरित करती हैं। वो कहती है की जो तुम कर चुके हो उससे जीने का कोई एक अंकुर फूटता है। उसे सींचने का ढ़ग बनाओ जिससे आप को वो अंकुर कभी पेड़ बनकर फल और छाया दे। जब आप अपने साथ कुछ करने के बाद चीजों को दोबारा सोचें तो उसमें फ़र्क करके देखे जिससे पता चले की आप कहाँ तक कमजोर रहे। किस तरह की गलतियाँ आपने की, जो भविष्य में दोहराई न जाये।
ये आपको हर कामयाबी के शिख़र तक ले जाने मे सक्षम होगा। मेरा कुछ ऐसा मानना है। आपकी चेतनाशक्तियाँ आपके अन्दर ही निवास करती हैं। उसे जगाने की आवश्यकता है। जब आप जागोगे तो आप को पता चलेगा की तुम कहाँ-किस गड्डे मे जा गिरे हो और कहाँ फँस गए हो? इस तरह आप अपने विचारों को अपनी मन की शीलता से खुद का वास्तविक रूप देख सकते हो। जो आप के जीवन का सच्चा स्वरूप है।
इस बीते वक़्त मे हमने कई काम अधूरे छोड़े हैं और कई बार चालाकी से खुद के लिए आसान रास्ते बनाये हैं। किसी का दिल दुखाया तो किसी को हँसाया है। इसी को तो कहते है,"दर्दे डिस्कों।"
जीवन चक्र में न जाने क्या-क्या न उलझ गया, जिससे हम जीनें का साफ़-सुथरा ढ़ग ही भूल गए। बस, याद रहा तो अपनी खुशी और अपना मज़ा। जहाँ एक तरफ ये सफ़र हादसों और घटनाक्रमों से गुज़रा। वही कहीं हमने अपने लिए अपनी ज़िन्दगी से क्या सीखा। ये समझना भी तो जरूरी है।
भगती-दौड़ती इस शहरी ज़िन्दगानी मे विकास एक मह्तवपूर्ण कड़ी है जिससे बसेरों के निमार्ण और खासी जगहों का निर्माण उसके साथ-साथ व्यवस्थित ढ़ग से जीने की प्रथा तो आई है। मगर भीड़ से भरे स्थानों में वही खीचा-तानी, वही हो-हल्ला मचता दिखाई देता। जिसे आज भी जब बीती हुई ज़िन्दगी याद करती है तो वो बेपरवाह शहर मे ख़ामोशी के बीच डरावना नाच नाचती परछाईयाँ तो शरीर के तमाम तारों को झिंजोड़कर रख देती है। जब रोजाना मे कई तबको के शख़्सों को हम घूमते-फिरते देखते हैं। उनकी हालात को देखकर ही खाया-पिया मुँह को आ जाता है। जीना क्या है? ये सवाल को हम बड़ा आसान बना देते हैं। हमारे दैनिक जीवन मे भी कई वो शख़्स जुड़े होते हैं जो हमें नहीं जानते और जिन्हों से हम भी अंजान हैं। लेकिन शहर की हवा में हम मिलकर सांस लेते हैं। जैसे ठन्ड के मौसम में आग की गर्माहट सब को ही चाहिये ही होती है और उसी मौसम मे एक धुंए की तरह अफ़वाहें उड़ती हैं और शहर के हर चप्पे-चप्पे मे समा जाती हैं। अफ़वाहें हमारी अपनी होती हैं पर वो बनती दूसरों के लिए हैं। रहस्यमय आलम बनाने के लिए। जिसके सम्पर्क मे आने वाला शख़्स अपनी आँखों पर भी भरोसा नहीं करता और वो कहीं किसी घटना का शिकार हो जाता है।
मेरे मन की ये किस्सागोही मेरे लिए बीते दिनों को याद करने की गुंजाइश है। लेकिन मैं अगले कदम पर लेकर क्या जाऊँ? क्या इन्ही को लेकर चलता बनू? या फिर किसी और ही दुनिया की उम्मीद लगाऊँ? ये तो बीते कुछ ऐसे विवरण हैं जिन्हे कब तक मैं अपने मे समाता चलूँ? क्या इससे कुछ नया ले पाऊँगा मैं?
ये तो गया, दर्दे डिस्कों भी हो गया। अब इस बीते कणों मे विदा कैसे किया जाये? क्या कोई नई जगह बनाई जायें या फिर पुरानी को ताज़ा किया जायें?
राकेश
बस, वक़्त मरहम है
कितनी जल्दी चीजें हमसे छूटती जाती हैं और हम उन चीजों को पल भर भी अपने से दूर जाने का वियोग नहीं करते। कुछ वियोग दिल को तस्ल्ली नहीं दे पाते हैं तो उनको ज़ुबान पर लाने का कोई मतलब ही नहीं बनता। शायद यही बात है। वक़्त को हम इस तरह से जीते आए हैं कि वो कोई मरहम है। जो हमारी छूटी गई चीजों या बुनियादों के घावों को भर देगा। बस, कदमों को खिसकाते चलते हैं। आखिरकार कुछ पा ही जायेंगे।
जीवन को जिन कल्पनाओं और रचनाओं से बनाया था। जिस वक़्त की वो रहनवाज़ बनी उसमे वो रचनाओं भरा जीवन कई नये पैमानों का हकदार बनता है। अपने उसी वक़्त को एक खुशी में महसूस किया जाता रहा है। मगर डर रहता है उस खुशी के किनारों से। जिसमे उस खुशी के जाहिर होने की छवि कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा बिलकुल नहीं है की उसका दम नहीं है उसके किनारों पर, बहुत दम है। जो खेल और नाच के कोनों पर खड़े उसे हर पैतरें को या नाच के हर स्टैप को देखकर कोई बात अपने से मुँह से निकालते आए हैं। अगर वो ही कहीं खो जाये तो भी गम नहीं देता। बस, वो वक़्त के चकक्कर मे कहीं ठहर जाता है। क्यों वो कल्पनाये कोई वज़न नहीं ले पाती उस दौर मे जब हम अपने परिवार और पहचान के दस्तावेज़ बना रहे होते हैं? क्यों वो रचनाये कोई आकार नहीं ले पाती उस वक़्त के पन्नों मे? इतना आसान क्यों होता है उनका लुप्त जो जाना और वो एक दम से ही किसी ख़ास दिनचर्या में अपना अक्श क्यों नहीं दिखा पाती?
बस वक़्त मरहम है।
वक़्त जिसमें हमारी पहचान अलग-अलग तरह से ही उभर आई है। कभी वो हमारी अन्दर की कल्पनाओं से अपनी तस्वीर बनाती है तो कभी अपने से जुड़े रिस्तों से। वक़्त जिसमे उभरना, भूलना, पाना और जूझना हर पैमाने में पर चलता है। कभी हमें देखकर हमें दर्शाया गया है तो कभी हमें सुनकर। इन दोनों परिस्थितियों मे हमारी कोई ना कोई छवि तैयार ही हो रही होती है। जो कभी अपनी कल्पनाओं से जाने जाते थे वो आज अपने काम और रिस्तों से अपनी तस्वीरें बनाते हैं।
ये एक बदलाव है - एक गहरा बदलाव।
इसमे परिवर्तित होना किसी आम शख़्स की किस ओर की दुनिया को बनाने की कोशिश में है? क्या घवराहट नहीं होती इस बदलाव को जानकर? उस आम शख़्स को उसकी कल्पनाओं को शहर मे किस छवि के जरिये उतारा जायेगा?
"वक़्त कैसे बदला वो हमें मालूम नहीं मगर इतना मालूम है की लोगों की और परिवार की नज़रों ने हमें बदलने पर मजबूर कर दिया।"
ये कहकर वो अपनी चूप्पी को साध गए। कहीं और के हो गए।
"एक वक़्त था जब झूमकर नाचने पर इतनी वाह-वाही मिलती थी कि उन्हे समेटना मुश्किल होता था और आज वो जो भी समेट पाये थे उसे भी खर्च करने मे डर लगता है।"
उन्हे देखकर कोई ये अन्दाजा भी नहीं लगा सकेगा की ये वो शख़्स हैं जो कभी महफ़िलों की शान हुआ करते थे। जिसके एक गीत की लाइन कई लोगों को गीतों के अन्तरे के शब्द दे दिया करती थी। जिसमें लोग रात-रात भर महफ़िलों में मदहोस होकर अपने मे और धूनों में डूब जाया करते थे। बस, एक ही आलम हुआ करता था नशे का। जिसमे ढोलक पर पहली बार चल रहे हाथ भी ऐसे लगते थे की जैसे कई पैरों में मैखाने का नशा भर देते होगें। कोई ना नाचने वाला भी अपने पैरों को उठाने लगता होगा और जोश ही जोश में झूम भी जाया करता होगा।
आज भी उनके होठों से निकलने वाली बातों मे इन्ही महफ़िलों की चाँदनियों को अपने इर्द-गिर्द महसूस किया जा सकता है। मन मे बस, एक इच्छा सी जाग उठती थी कि काश मैं भी होता उन महफ़िलों में और झूम रहा होता। हर सुनने वाले की ज़ूबान पर ये आ ही जाता था की क्या वो महफ़िलें दोबारा नहीं आ सकती?
तो वो बस, उसकी तरफ में देखकर हँस जाया करते और इस कदर बेगाने हो जाते है उस बात से की वो कोई किसी ख़त्म होती नाटकिये लीला का गिरा हुआ परदा हो। बस, ये ही अदा उनकी उन्हे वो सारी चाँदनियाँ भूल जाने में सहयोग देती थी। जो वो अक्सर वहाँ उन सवालों या बातों से हट जाने में सफ़ल हो जाया करते।
लम्बे-तगड़े और शॉल औड़े वो गली के कोने पर खड़े आती जाती सड़क को ताकते रहते हैं और कोई ना कोई उनकी बातों मे लीन जरूर होता है। ज़्यादातर उनके छोटे भाई पिछली रात मे गाए गए गीत या किसी थाप की कसे होने को लेकर बात कर रहे होते।
ये ही अकेले हैं इनके हमसफ़र जिनके साथ मे कई रातों मे बिताए वो पल याद हैं। जिनको ये आज भी गीतों के ज़रिये दोहराते रहते हैं। बस, शाम चलते ही ये दूनिया अपने इशारे लिए अपनी चाँदनियों भरी दूनिया ने चले जाते। कोई भी रात ऐसी नहीं गुज़रती जिसमें ये फ़नकर अपना फ़न ना दिखाए सोते भी हो। बस, अब जगह तलाश्नी नहीं पड़ती वो तो चुनली गई है। मगर इस चुनी हुई जगह में वो बात कहाँ? वो रस़ कहाँ? जो अंधेरा होते ही आँखों पर छा जाया करता था। जिसके एक-एक घूँट में कई गीतों की मदहोसी बयाँ होती।
अब तो ये दूनिया एक कोने में खिलते उस रात की रानी के उस फूल की तरह हो गई है। जो रात मे खिलता है, महकता है, हवा में झूमता है, चाँदनी को ताकता है और सुबह का सूरज देखते ही अपना दम तोड़ देता है। इसके बावज़ूद भी इसमे जीने की उम्मीद कम नहीं होती। वो और, और, और भी गहरी होती जाती है।
काश की इन महफ़िलों में जीने वालों की उम्र कभी बढ़ती ही नहीं। वो रात की रानी के फूल की ही तरह से हर रात मे खिलते, महकते, हवा में झूमते, चाँदनी को ताकते और सुबह होते ही वापस डूब जाते और दूसरी रात फिर से एक और ताज़ी महक लिए खिलते। काश के ऐसा होता हो कितना मज़ा आता।
ये काश के सपने दिखाती दूनिया अब कब अपनी रोनक दिखायेगी वो तो तय नहीं किया गया है और कौन तय करेगा ये भी जाहिर नहीं हुआ है। इसी दूनिया के है वो "सज्जन जी" जो तैर रहे हैं।
"सज्जन जी" की दूनिया भी इसी काश की ओड़नी ओड़ चूकी है। अपनी जगह भी चून चूकी है। जगह है अपनी ही गली के किनारे के मकान की सातवीं मन्जिल। जहाँ तक किसी की आँख नहीं पँहुचती और फ़नकार के खिलते फूल को कोई भी नज़र नहीं लगा सकता। वहाँ पर "सज्जन जी" अपने अन्दर दबी कला को अपने से बाहर लाते हैं। एक ऐसी दूनिया में खो जाते हैं जहाँ पर सारे रिश्ते-नाते अपनी ज़िन्दगी के सारे पल्लुयों को छोड़ देते हैं। आदमी को कहीं उड़ने के लिए।
"सज्जन जी" के भाई ढोलक की थाप पर थाप पिटते जाते हैं और ये मदहोसी के सारे नियमों को तोड़ जाते हैं। नियमों में पड़ी अपनी उम्र को जो आज पचास से पच्पन साल की सीढ़ी चड़ चूकी है उसे पायदान पर ले आते हैं। अपने नृत्य के हर स्टैप को जीते हैं। जिसमें लगने वाला हर ठुमका आदमी या औरत की पुष्टी नहीं करता बस, किसी भी फ़नकार के शरीर मे थिरकन ले आता है जिससे वो झूमने लगता है।
"सज्जन जी" की ज़िन्दगी मे बदलाव कोई झटके से नहीं आया। ये बदलाव हल्के-हल्के वक़्त मे जमा। आज वो अपनी उम्र को अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा और गहरा बदलाव का ज़रिया मानते हैं। जो अलग-अलग तरह की ज़ुबानों में प्रस्तृत होता आया है। जिसमें उनकी कला और अपनी मदहोसी सब इस बदलाव मे सबसे ज़्यादा शतिग्रहस्त होने वाली दूनिया थी।
कुछ ऐसे नाम थे जो इस शतिग्रहस्त बदलाव मे उभर गए। 'नचकईया, गवईया, मशख़रा जैसे। ये वो पहचान बने जिनको साथ मे लेकर चलना इनके परिवार के बस मे नहीं था। ये नाम ही कलाओं के लिए एक अभिशाप की भांति पैदा हुए। शायद इन अभिशापो से आने वाली दूनिया 'काश' जैसे परदो मे रची जायेगी।
ये कुछ अन्दाजन नहीं था। मगर "सज्जन जी" का अन्दाजा इसी से विरोध मे रहा। जहाँ पर रची जाने वाली दूनिया अपने कोने में ही इतनी गतिशील थी के वो उस सातवीं मन्जिल को हमारे और आपके सामने किन्ही शब्दों में उभार देती है।
ये जगहे हमारे लिए कुछ गहरे सवाल छोड़ती है और उन्ही सवालों में जीती भी है। जहाँ पर गीत और मदहोसी एक-दूसरे को बिना किसी बटन के सर्च करते है और वो सामने हाज़िर हो जाती है। वो सातवीं मन्जिल आज भी तैयार है।
लख्मी
जीवन को जिन कल्पनाओं और रचनाओं से बनाया था। जिस वक़्त की वो रहनवाज़ बनी उसमे वो रचनाओं भरा जीवन कई नये पैमानों का हकदार बनता है। अपने उसी वक़्त को एक खुशी में महसूस किया जाता रहा है। मगर डर रहता है उस खुशी के किनारों से। जिसमे उस खुशी के जाहिर होने की छवि कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा बिलकुल नहीं है की उसका दम नहीं है उसके किनारों पर, बहुत दम है। जो खेल और नाच के कोनों पर खड़े उसे हर पैतरें को या नाच के हर स्टैप को देखकर कोई बात अपने से मुँह से निकालते आए हैं। अगर वो ही कहीं खो जाये तो भी गम नहीं देता। बस, वो वक़्त के चकक्कर मे कहीं ठहर जाता है। क्यों वो कल्पनाये कोई वज़न नहीं ले पाती उस दौर मे जब हम अपने परिवार और पहचान के दस्तावेज़ बना रहे होते हैं? क्यों वो रचनाये कोई आकार नहीं ले पाती उस वक़्त के पन्नों मे? इतना आसान क्यों होता है उनका लुप्त जो जाना और वो एक दम से ही किसी ख़ास दिनचर्या में अपना अक्श क्यों नहीं दिखा पाती?
बस वक़्त मरहम है।
वक़्त जिसमें हमारी पहचान अलग-अलग तरह से ही उभर आई है। कभी वो हमारी अन्दर की कल्पनाओं से अपनी तस्वीर बनाती है तो कभी अपने से जुड़े रिस्तों से। वक़्त जिसमे उभरना, भूलना, पाना और जूझना हर पैमाने में पर चलता है। कभी हमें देखकर हमें दर्शाया गया है तो कभी हमें सुनकर। इन दोनों परिस्थितियों मे हमारी कोई ना कोई छवि तैयार ही हो रही होती है। जो कभी अपनी कल्पनाओं से जाने जाते थे वो आज अपने काम और रिस्तों से अपनी तस्वीरें बनाते हैं।
ये एक बदलाव है - एक गहरा बदलाव।
इसमे परिवर्तित होना किसी आम शख़्स की किस ओर की दुनिया को बनाने की कोशिश में है? क्या घवराहट नहीं होती इस बदलाव को जानकर? उस आम शख़्स को उसकी कल्पनाओं को शहर मे किस छवि के जरिये उतारा जायेगा?
"वक़्त कैसे बदला वो हमें मालूम नहीं मगर इतना मालूम है की लोगों की और परिवार की नज़रों ने हमें बदलने पर मजबूर कर दिया।"
ये कहकर वो अपनी चूप्पी को साध गए। कहीं और के हो गए।
"एक वक़्त था जब झूमकर नाचने पर इतनी वाह-वाही मिलती थी कि उन्हे समेटना मुश्किल होता था और आज वो जो भी समेट पाये थे उसे भी खर्च करने मे डर लगता है।"
उन्हे देखकर कोई ये अन्दाजा भी नहीं लगा सकेगा की ये वो शख़्स हैं जो कभी महफ़िलों की शान हुआ करते थे। जिसके एक गीत की लाइन कई लोगों को गीतों के अन्तरे के शब्द दे दिया करती थी। जिसमें लोग रात-रात भर महफ़िलों में मदहोस होकर अपने मे और धूनों में डूब जाया करते थे। बस, एक ही आलम हुआ करता था नशे का। जिसमे ढोलक पर पहली बार चल रहे हाथ भी ऐसे लगते थे की जैसे कई पैरों में मैखाने का नशा भर देते होगें। कोई ना नाचने वाला भी अपने पैरों को उठाने लगता होगा और जोश ही जोश में झूम भी जाया करता होगा।
आज भी उनके होठों से निकलने वाली बातों मे इन्ही महफ़िलों की चाँदनियों को अपने इर्द-गिर्द महसूस किया जा सकता है। मन मे बस, एक इच्छा सी जाग उठती थी कि काश मैं भी होता उन महफ़िलों में और झूम रहा होता। हर सुनने वाले की ज़ूबान पर ये आ ही जाता था की क्या वो महफ़िलें दोबारा नहीं आ सकती?
तो वो बस, उसकी तरफ में देखकर हँस जाया करते और इस कदर बेगाने हो जाते है उस बात से की वो कोई किसी ख़त्म होती नाटकिये लीला का गिरा हुआ परदा हो। बस, ये ही अदा उनकी उन्हे वो सारी चाँदनियाँ भूल जाने में सहयोग देती थी। जो वो अक्सर वहाँ उन सवालों या बातों से हट जाने में सफ़ल हो जाया करते।
लम्बे-तगड़े और शॉल औड़े वो गली के कोने पर खड़े आती जाती सड़क को ताकते रहते हैं और कोई ना कोई उनकी बातों मे लीन जरूर होता है। ज़्यादातर उनके छोटे भाई पिछली रात मे गाए गए गीत या किसी थाप की कसे होने को लेकर बात कर रहे होते।
ये ही अकेले हैं इनके हमसफ़र जिनके साथ मे कई रातों मे बिताए वो पल याद हैं। जिनको ये आज भी गीतों के ज़रिये दोहराते रहते हैं। बस, शाम चलते ही ये दूनिया अपने इशारे लिए अपनी चाँदनियों भरी दूनिया ने चले जाते। कोई भी रात ऐसी नहीं गुज़रती जिसमें ये फ़नकर अपना फ़न ना दिखाए सोते भी हो। बस, अब जगह तलाश्नी नहीं पड़ती वो तो चुनली गई है। मगर इस चुनी हुई जगह में वो बात कहाँ? वो रस़ कहाँ? जो अंधेरा होते ही आँखों पर छा जाया करता था। जिसके एक-एक घूँट में कई गीतों की मदहोसी बयाँ होती।
अब तो ये दूनिया एक कोने में खिलते उस रात की रानी के उस फूल की तरह हो गई है। जो रात मे खिलता है, महकता है, हवा में झूमता है, चाँदनी को ताकता है और सुबह का सूरज देखते ही अपना दम तोड़ देता है। इसके बावज़ूद भी इसमे जीने की उम्मीद कम नहीं होती। वो और, और, और भी गहरी होती जाती है।
काश की इन महफ़िलों में जीने वालों की उम्र कभी बढ़ती ही नहीं। वो रात की रानी के फूल की ही तरह से हर रात मे खिलते, महकते, हवा में झूमते, चाँदनी को ताकते और सुबह होते ही वापस डूब जाते और दूसरी रात फिर से एक और ताज़ी महक लिए खिलते। काश के ऐसा होता हो कितना मज़ा आता।
ये काश के सपने दिखाती दूनिया अब कब अपनी रोनक दिखायेगी वो तो तय नहीं किया गया है और कौन तय करेगा ये भी जाहिर नहीं हुआ है। इसी दूनिया के है वो "सज्जन जी" जो तैर रहे हैं।
"सज्जन जी" की दूनिया भी इसी काश की ओड़नी ओड़ चूकी है। अपनी जगह भी चून चूकी है। जगह है अपनी ही गली के किनारे के मकान की सातवीं मन्जिल। जहाँ तक किसी की आँख नहीं पँहुचती और फ़नकार के खिलते फूल को कोई भी नज़र नहीं लगा सकता। वहाँ पर "सज्जन जी" अपने अन्दर दबी कला को अपने से बाहर लाते हैं। एक ऐसी दूनिया में खो जाते हैं जहाँ पर सारे रिश्ते-नाते अपनी ज़िन्दगी के सारे पल्लुयों को छोड़ देते हैं। आदमी को कहीं उड़ने के लिए।
"सज्जन जी" के भाई ढोलक की थाप पर थाप पिटते जाते हैं और ये मदहोसी के सारे नियमों को तोड़ जाते हैं। नियमों में पड़ी अपनी उम्र को जो आज पचास से पच्पन साल की सीढ़ी चड़ चूकी है उसे पायदान पर ले आते हैं। अपने नृत्य के हर स्टैप को जीते हैं। जिसमें लगने वाला हर ठुमका आदमी या औरत की पुष्टी नहीं करता बस, किसी भी फ़नकार के शरीर मे थिरकन ले आता है जिससे वो झूमने लगता है।
"सज्जन जी" की ज़िन्दगी मे बदलाव कोई झटके से नहीं आया। ये बदलाव हल्के-हल्के वक़्त मे जमा। आज वो अपनी उम्र को अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा और गहरा बदलाव का ज़रिया मानते हैं। जो अलग-अलग तरह की ज़ुबानों में प्रस्तृत होता आया है। जिसमें उनकी कला और अपनी मदहोसी सब इस बदलाव मे सबसे ज़्यादा शतिग्रहस्त होने वाली दूनिया थी।
कुछ ऐसे नाम थे जो इस शतिग्रहस्त बदलाव मे उभर गए। 'नचकईया, गवईया, मशख़रा जैसे। ये वो पहचान बने जिनको साथ मे लेकर चलना इनके परिवार के बस मे नहीं था। ये नाम ही कलाओं के लिए एक अभिशाप की भांति पैदा हुए। शायद इन अभिशापो से आने वाली दूनिया 'काश' जैसे परदो मे रची जायेगी।
ये कुछ अन्दाजन नहीं था। मगर "सज्जन जी" का अन्दाजा इसी से विरोध मे रहा। जहाँ पर रची जाने वाली दूनिया अपने कोने में ही इतनी गतिशील थी के वो उस सातवीं मन्जिल को हमारे और आपके सामने किन्ही शब्दों में उभार देती है।
ये जगहे हमारे लिए कुछ गहरे सवाल छोड़ती है और उन्ही सवालों में जीती भी है। जहाँ पर गीत और मदहोसी एक-दूसरे को बिना किसी बटन के सर्च करते है और वो सामने हाज़िर हो जाती है। वो सातवीं मन्जिल आज भी तैयार है।
लख्मी
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