Wednesday, September 16, 2009

घुमंतू जादूगर

कहाँ से आये हो कहाँ को जाना
जीवन वहीं जहाँ ठहरे कोई तराना
यही है ज़िन्दगी की नईया
यही है मृत्युशय्या

आज को न कर बर्बाद समझकर
प्रमाणिकृत होगी तेरी छवियाँ
भूलना जरूरी है, याद करना भी जरूरी है
मत चूक इस काल से
तेरे जाने के बाद उभरेगीं तेरी कहानियाँ

केसर की किरणें तेरी झोली में है
क्यों उजालों को खोजता है
भटक जायेगा तो आप ही ढूँढ लेंगी तुझे
संसार की उंगलियाँ

चाँदनी की तुझे क्या परवाह
तेरे सिर पे आसमानी ताज है
जमीं है पैरों तले
यही मिलेगी अभिव्यक्तियाँ

ईश्वर या धर्म ये है तेरी प्रतिमा
जो कथित है विरासतों के पन्नों पर
क्या इनके लिए तेरे जीवन में
होती हैं कभी तबदिलियाँ

ऐतिहासिक आवेग को समझ
जिसमें झिलमिलाती कई ज्योतियाँ
सोच समझले न आज फिर लौटेगा
टकटकी लगाये बैठी कई रणनीतियाँ

राकेश

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