Sunday, August 22, 2010

मस्तकलंदर

समय ,11:40 pm
दैनिक सूपर हिरों ,जिन्दगी भी हमें कुछ न कुछ जरूर देती है ।
हम खूद भी अपने लियें कारवां चूनते है। मस्तकलंदर की तरह ।





राकेश

1 comment:

शहरोज़ said...

क्या बात है!! बहुत खूब!!

माओवादी ममता पर तीखा बखान ज़रूर पढ़ें:
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html