Friday, February 25, 2011

आत्मियता का परिचर्य

एक दानव जैसी भूख उसे निगलने ही वाली थी। कदमों की आहट ने उसके ध्यान को अपनी तरफ केन्द्रित किया। खूबसूरती उसके चेहरे पर चड़ी थी। ऐसा बुख़ार बनकर जिसका चैप्टर(पाठ) समझ नहीं आ रहा था। वो बे-मौत मारा जाता।

किसी को देखों और फिर वो देखते-देखते जरा बदल जाये या थोड़ा रहम खाकर ध्यान देने की कृप्या करने लगे तो जैसे - "हम समाज से नहीं डरते हिम्मत से काम लो" ऐसा कहने लगे तो!

उस रोज वो अपने फ्लेट में पहुंचा। दरवाजा बन्द था। दिवार में लगे बटंन को दबाकर उसने अपने आने का संकेत दिया। रिश्तों को निभाने के लिये आपकी जरूरत होती है। आजकल एक कमरें से दूसरें कमरे मे जाने में जैसे। उसमें सिमट आया हो जैसे मूसाफिरों सा ओघर रूप। जो आजमाईशों का तूफान पैदा कर गया। शहर की मशहूर मार्किटों में निकलता रास्ता वो समय का महत्वपूर्ण नज़ारा था। अब उसे दस्तक देते सुना। जब शहर ने बहकने के अंदाज में टूटना शुरू किया था। बाकी सबके लिये मुलाकात जरूरी थी। मन के भटकते विचारों का जैसे कहीं ठिकाना न था। दिमाग में विचार अनेकों मेंढक की तरह जन्म लेने लगे। इन हठ करने वाली कल्पनाओं में वो जैसे कोई कलम की शाही बन रहा था। जिससे सपनो को जिंदगी के पन्नों पर लिखना जरूरी था। अब उसे याद आया की दो बजे उसे कुछ और पैकेट लेकर होज़खास जाना था। कुछ शक्लें उसके दिलों-दिमाग को खसोटने लगी।

उसने फोन किया टेलीफोन बूथ से, "हैलो सर"
फोन उठाने वाला बोला, "मेरा सिर मतलब खाओ, पहले ये बताओ तुम यहां क्यों नहीं आये। दो बजकर चालिस मिनट हो रहे हैं।"
उसने कहा, "सर बस मैं रास्ते में हूँ।"
वो बोला, "अच्छा कहाँ पर हो?"
उसने कहा, "सर बस पहुंच गया"
वो बोला, "कहाँ पहुँचे?"
उसने कहा, "मार्किट।"

धूप के चूंधिया देने वाले माहौल के बीच दिलकश नज़र ही काफी थी। बात यहीं पर खत्म हुई समझो। ये दिन तो गया, इन्ही झूठ – सच के घेरे में अगले दिन फिर सवेरा होगा। इच्छाएं जो सिर्फ और सिर्फ चाहत में बदल गयी थी नि:सकोच होकर। वो बोलने लगी थी। सुबह के नौ बजे से शाम पाँच बजे तक का सफर रोमांचक रहा। वो व्यवहार में आत्मियता का परिचर्य ढूड़ने लगा। रात ने उसे इतना ध्वनि भरा बना दिया था की अब उन चाहतों को खमोश करना मुश्किल था। काश ये कभी चुप ही ना हो।

राकेश

1 comment:

शिवकुमार ( शिवा) said...

बहुत सुंदर लेख ..