Friday, August 5, 2011

पहला दिन : ओखला

मैं आज ओखला फेस -2, मे गया शुरुआत एक अंजान जगह से की। सड़क के किनारे वो मैं जगह जिसे वहाँ पर गोल चक्कर के नाम से जाना जाता है। गोल चक्कर जो चारों तरफ के सेंटर पॉइंट में बना है और जिसे 3 फिट ऊंची दीवारों से गोलाकार में बनाया गया है। पैड़ - पौधे और उसमें घांस भी लगी है। वहाँ से मैनें आगे बढ़ना शुरू किया। स्टार्टिंग में एक सीएनजी पम्प है। जिसके साथ में एक बड़ी उँची बिल्डिंग खड़ी है। यहाँ कार, ट्रक, क्रैन, बुलडोज़र और कंटेनर से ट्रक ज़्यादा आते -जाते दिखाई देते हैं

बिजली के बड़े खंबे जो आसमान को चूमते मालूम होते है। उनके साथ मे मोटे तार जो एक खंबे से दूसरे खंबे तक जा मिलते है। चलने के लिए यहाँ फुटपाथ बहुत है। खाली पड़ा रहता है। सड़को पर जाम नाम की कोई चीज़ नही है, ना ही ट्राफ़्फिक का सॉयरन है। यहां का सन्नाटा कानों में चुभ रही थी। मुझे फैक्टरी एरिया में जाना था बिना किसी नाम पाते के कैसे किसी जगह में है। ये तो बहुत मुश्किल लग रहा था।

क्या कारों 15 मिनट पैदल चलने के बाद भी कुछ सूझा नहीं प्यास भी लग आई ना पानी ना कोल्ड ड्रिंक है। कुछ दूर चलने पर एक ट्रक खड़ा दिखा। शायद खराब है, इसके नीचे तो जैक भी लगा है और ट्रक चलाने वाला भी नीचे लेट कर काम कर रहा है पहिया पंचर हो गया है उसका।

इसके पीछे से एक मोड़ दिखा जो इंडस्ट्रियल एरिया की तरफ जाता है। लोहे का गेट गार्ड खड़े हैं। पान का एक मैला सा खोका जहां पानी फैला है और वहाँ लोग पत्थरों को बिछाकर बैठे हैं।

वहाँ एक बड़े से गेट पर बोर्ड पर हिन्दी में लिखा था, श्री दयानंद टक्कर द्वारे। उसके साथ में चाकू तेज करने वाला खड़ा था।

मैं उन्हे थोड़ा देख कर आगे चला। मुझसे बस दो कदम की दूरी पर एक ढाबा दिखा जिसमें खाना पीना चल रहा था। किसी पार्टी की तरह। सब एक दूसरे से बाते शेयर कर रहे थे जैसे सब आपस में एक-दूजे को जानते हो, दो बड़ी टेबल पर लग-भग 25 लोग एक साथ खाना खा रहे थे।

एक छोटा सा चौक जिस के सड़क के किनारे पर एक महिला बोरी बिछा कर नीचे बैठी थी। पान सिगरेट की दूकान लगा रखी थी। मैं उसके करीब से फोटो खींचने के बहाने से उसके पास पड़े पाइप के साथ खड़ा हुआ “यहाँ पानी कहाँ मिलेगा?” उसने मेरी तरफ साधारण तरीके से देखा, “पीछे फैक्टरी है उसके पास है”। इतने में मैनें फोटो ले लिया था, वहाँ से मैं ये सोचता हुआ चल पड़ा की अब कहाँ जाऊंगा? वहाँ एक गली में जो बहुत छोड़ी थी, एक बड़ा सा ट्रक उसमें आ-जा सकता है। उस गली में कागज के गत्ते के बॉक्स बनाए जा रहे थे और उन्हे धूप में सूखने के लिए रखा हुआ था। अभी उनमे गम की बू आ रही थी। मैं वहाँ किसी फैक्टरी में लिखा नाम पता खोज रहा था ताकि कोई पहचान तो बता सकूं की मै यहाँ भी आया, वैसे भी आज-कल का माहौल ऐसा है की किसी अजनबी को देख लोग शक करने लगते है।

डब्ल्यू-35 फैक्टरी नंबर है, जिस के फ्रेंट पर लिखा था की "बाल श्रम अपराध है" और उस जगह से किसी मशीन की तेज आवाज़ आ रही थी ।

मैं थोड़ा उचक कर देखा की अंदर दो लोग प्रिंटिंग की मशीन को हेंडल कर रहे थे एक बड़ा बल्ब मशीन के उपर टंगा हुआ था पर वहाँ कोल्ड ड्रिंक की फैक्टरी थी जिस के बाहर खाली बोतलें क्रैटो में रखी थी। काग़ज़ के बॉक्स, प्रिंटिंग मशीन, पेपर कटिंग्स की मशीन एक्ट।

लोग काम से फ्री हो, यहाँ के हर मोड़ और कॉर्नेर पर बनी चाये की दूकान व ढाबा में जाकर बातचीत कर रहे थे। कुछ काम के लिए आए, लोग अपने किसी ना किसी के बदले पर यहाँ कम करने आए थे, वो बिढ़ियाँ पीते और अख़बाब हाथ में लेकर वो टाइम पास करते। फैक्टरियों से काटने पीटने की आवाज़ आती मगर कोई परेशानी नही होती।

वहाँ शांति से कुछ पढ़ा या बनाया जा सकता था। मंगलू वहां पर टी स्टाल लगता है, ये दुकान गप मारने की दुकान है, एक दूसरे को मजाको में मा-बहने भी करते है। कोई अंजान या मामूली बंदा यहाँ इनकी ये कान फाड़ देने वाले डायलॉग नहीं बर्दाश्त कर सकता। लोगों को यहां पहचाना मुस्किल था, सब आपस में एक ही तरह के अंदाज़ में बोल रहे थे। फैक्टरी में से निकलते ही मजदूर अपने मस्तियां करते गले में हाथ डालते कम मे हाथ डालते। डब्ल्यू-34 के सामने एक बंदा ढेला लेकर खड़ा, सिगरेट और बीड़ी माचिस बेच रहा था मगर किसी से छूपकर। \

राकेश

1 comment:

NEELKAMAL VAISHNAW said...

नमस्कार....
बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें
मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में पलकें बिछाए........
आपका ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"

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