Wednesday, August 24, 2011

कुछ देर का साथ

मैं उस रास्ते से गुजरा आज बरसो के बाद
जो मेरा नहीं था, मेरा कभी हो नहीं सकता था, मेरा होता नहीं था और मेरा उससे कोई वासता ही नहीं था
आज जब वहां से गुजरा तो वो मुझसे कुछ सवाल कर रहा था।
वे सवाल जो मेरे से थे, मेरे लिये थे, मेरे पर थे मगर मैं उनमे अकेला नहीं था।

मैदान के बंद गेट की जाली मे से वो कुछ देखने की कोशिश मे था।
वो क्या देख रहा है, ये नहीं देखा जा सकता था,
बस उसकी कोशिश को देखा जा सकता था।

एक और शख्स उसके पास गया और वही करने लगा
वो दोनों क्या कर रहे हैं को नहीं समझा जा सकता था मगर दोनों के साथ को समझा जा सकता था।

कुछ देर के बाद वो दोनो मुडे और चल दिये
उनके चले जाने को जाना नहीं जा सकता था
मगर उनके साथ चलने को जाना जा सकता था

लख्मी

1 comment:

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

सुन्दर रचना |
कृपया मेरी भी रचना देखें और ब्लॉग अच्छा लगे तो फोलो करें |
सुनो ऐ सरकार !!

और इस नए ब्लॉग पे भी आयें और फोलो करें |
काव्य का संसार