हमारे नज़दीक से निकलते कुछ ऐसे चित्र जिनमे हम होकर भी गायब होते हैं। एक भीड़ जिसमे खो जाना ही ज़िन्दगी बन जाता है। ये वो राहें हैं जो हम से नहीं हम इन राहों पर चलकर बनते हैं।
एक और राह जो हमें खो देने को तैयार है।
दिनॉक:- 10-02-2009, समय:- दोपहर 2:30 बजे
लख्मी
Tuesday, February 10, 2009
परछाइयाँ जिंदा है
तू मुझे करे ज़िंदा
मैं तूझे ज़िंदा करूं
तू मेरी परवाह करें
मैं तेरी परवाह करूं
मेरी दुनियाँ तेरे जलाये चरागों से रोशन है
फिर क्यों मैं जुगनूओं से दामन भरूं।
हाफ्ते जिस्म की रग-रग में तू शामिल है
तेरी दुनियाँ में मेरी भी कहीं तो वफ़ा शामिल है
तू सोच कि मैं मर गया हूँ
मुझे फिर से ज़िंदा होने की अदा मालूम है।
कत्ल से मैं नहीं डरता
डरते वो हैं जिन्हे कुछ नहीं मिलता
तू तो मेरे साथ है
मैं तो खुद को साथ लिए तेरी तलाश करता हूँ
इसलिए मौत को भी नराज करता हूँ।
मैं बचा लूंगा उस जमीन को जहाँ तेरी परछाइयाँ ज़िंदा है
क्या करूं ये भूमंडल घूम रहा है
ज़मी पर मैं हूँ मगर मेरा मन उड़ रहा है।
राकेश
मैं तूझे ज़िंदा करूं
तू मेरी परवाह करें
मैं तेरी परवाह करूं
मेरी दुनियाँ तेरे जलाये चरागों से रोशन है
फिर क्यों मैं जुगनूओं से दामन भरूं।
हाफ्ते जिस्म की रग-रग में तू शामिल है
तेरी दुनियाँ में मेरी भी कहीं तो वफ़ा शामिल है
तू सोच कि मैं मर गया हूँ
मुझे फिर से ज़िंदा होने की अदा मालूम है।
कत्ल से मैं नहीं डरता
डरते वो हैं जिन्हे कुछ नहीं मिलता
तू तो मेरे साथ है
मैं तो खुद को साथ लिए तेरी तलाश करता हूँ
इसलिए मौत को भी नराज करता हूँ।
मैं बचा लूंगा उस जमीन को जहाँ तेरी परछाइयाँ ज़िंदा है
क्या करूं ये भूमंडल घूम रहा है
ज़मी पर मैं हूँ मगर मेरा मन उड़ रहा है।
राकेश
हम इंसानो की बस्तियों में
गली का कुत्ता करोड़पती बना, ये बोल मैंने जब पहली बार सुने तो बड़ा अजीब सा लगा। जिससे मेरे ख़्यालों में कोई बनावटी चेहरा मुझे मुँह चिढ़ाता हुआ नज़र आ रहा था। मैं जैसे अपने आप से ही दूर भाग रहा था। खुद को पास लाने की मेरी तमाम कोशिशें नाकाम हो रही थी। पर ज़मीन मेरे पैरों तले ही थी। बादलों की गर्जना से भयभीत मन कहीं आसरा पाने की चाह में भटक रहा था, तभी मेरे अन्दर कई सारी आवाज़ें घुस आई। जो मुझे खींच कर वहाँ ले आई जहाँ हक़ीकत के अलावा कुछ न दिखा। मेरे ख़्याल चट्टानों से टकरा कर वापस आने लगे। मैं जाग गया! क्या करूँ? कैसे करूँ? ये मुझे पता लगने लगा। अब मैं वापस उस जगह आ गया था जहाँ से मेरे विचारों ने करवट बदली थी। एक भद्दा प्रसंग सुनकर मुझे कतई भी वो नागवारा था जो जीवन की मार्मिकता को तेज़ाब बनाने की फिराक मे था, जो सच में मेरे ही आसपास से जन्म लेकर अब तक मेरी आस्तिनों में पला वो सर्प नामक शक मुझे डसने वाला था। अभी तक तो वो मेरे ही दिमाग मे बैठा मेरी सारी हरकतों को कंट्रोल कर रहा था। मेरी ज़ुबान के साथ वो अपनी लपलपाती जीभ से मेरे सम्मुख आने वालों पर विष अणु की वर्षा करता। जो मेरे शुभचिंतकों को मुझ से दूर कर रहा था।
किसी के पास उस के नाजायज़ होने का सबूत नहीं था। वो दरिंदा कोई भी रूप बदलकर कुशल-मंगल को हिंसा और पाप में बदल कर रख देता। वो मानवता का दुश्मन सब के मन को भंग कर देता। तब सारा भू-मंडल दूषित हवाओं से भर जाता। चारों तरफ बस चीखती, रोती और बिलखती ज़िंदगानियाँ और विद्रोह कर रही आवाज़ों में तिलमिलाती परछाइयाँ ही नज़र आती। जानवर और मानव इन दोनों में ही एक दुनिया है जिसको सिर्फ भूख से देखा जाता है। स्वार्थ से देखा जाता है। ज़रूरत से देखा जाता है, लेकिन कोई करुणा से देखे। एक-दूजे का बन के देखें तो यकीनन सच के ऊपर पड़ा पर्दा उठ जायेगा।
आज लोग जीवन में बने रिश्तों को लेकर कई बातें बनाते हैं और खुद ही किसी की नींव रख देते हैं और आप ही किसी को उखाड़ देते हैं।
कुत्तों को कई तरह के अभिनय करते हुए सबने देखा पर जब कुत्तों को बहुचर्चित होते देखा तो रहा न गया। शायद इस से बेहतर मेरे पास उदाहरण नहीं हो। लेकिन आजकल इस नस्ल को विभिन्न वर्ग के नुमाइंदों ने अपने शहर से तड़िपार कर दिया है।
इसके सिवा आसपास कुछ भी तो सुनाई नहीं दे रहा था। जिससे यह साबित होता की करोड़पती का ताल्लुक गलियों में घूमते कुत्तों से नहीं है। इस तरह की पंक्तियाँ बहुत सुनाई पड़ रही है जो हमारी रोज़मर्रा में बेइंतिहाँ शामिल है।
वरना जनाब आज के वक़्त में तो ये हालात है की गलियाँ जैसी जगह तरह-तरह के विभाजनों में अपने ही मंथन में फंसी भँवर बन गई है। जिसके शिकंजे में आने वाला शख़्स अपनी भव्यता को खो बैठता है और अपनी ही आलोचनाओं से अपनी मांसपेशियों को खरोचनें लगता है। हम अपने जीने लायक जगह बनाने में लीन रहते हैं, और कोई आता है तो एकदम से सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। जीवन में कई श्रृखलाएं हैं जिनके सहारे हम जीवन बनाते हैं और उसमे परवरिश करते हैं अपने विचारों की धारणाओं की। तब जाकर एक जगह में सैरगाह बनती है जिसमे हर कोई शामिल है।अपनी-अपनी मननशीलता के मुताबिक। मानव और जानवर का रिश्ता इतिहास से चला आ रहा है और इतिहास एक सच्चाई है जिसे नापा या तोला नहीं जा सकता न ही झुठलाया जा सकता है।
लेकिन हम इंसानो की बस्तियों में कुत्तों की सैरगाह नहीं होती बस, उनपर अपनी ममता और प्यार लुटाने का बहाना चाहिए होता है। जो बात मैं आप को कहने जा रहा हूँ वो बात मुझे किसी ने कही कि "कुत्तो का जीवन वैश्याओं से कम नहीं हैं।" जब चाहा अपनी जांघ पर बैठा दिया और जब चाहा उसे थपथपा दिया।
इंसान और जानवर के बीच बने फ़र्क में ही पूरा रहस्य छिपा है। जिस में मानव जीवन शैली की और जानवर के साथ बनी कहानियों की दुनिया दिखती है जो एक-दूसरे को ज़िंदा रखने के लिए जानी पहचानी जाती है।
क्यों कि ज़िंदगी के पैचीदा हालातों को आसपास की संभावनाएँ बड़ी मासूमियत से उभारती है। जैसे एक कहावत को सुनकर मेरे आसपास कुछ अपने दार्शनिक संभावनाओं की घटनायें मंडराने लगती है। जिसके कारण हक़ीकत एक अलग ही ढंग से हमारी ओर बढ़ती हैं।
वो कहावत है ,"धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का" ये मुहावरा दो शख़्सियतों को आपस में टकराव में लाता है। जो दोनों ही के छोर से हटकर अपनी ही उधेड़बुन में जीना है। आजकल मौहल्लो में चर्चा हो रही है कि कुत्ता करोड़पती बन गया पर आम आदमी पीछे छूट गया। जिसने मौहल्ला रचा है। उसके परिकल्पना और अपने लिए जीने वाली शैलियों की तो जैसे दुनिया ही ओझल है।
हाल ही में आई फिल्म के बारे मे लोगों के ख़्यालात कुछ इस तरह के हैं। सब के मुँह पर तरह-तरह के जुमलें हैं तो किसी का चिड़चिड़ा स्वभाव है।
टीवी चैनलों और अखबारों में फिल्म के ऊपर अपने तेज दृष्टिकोण डाले हैं जो किसी शहर को छान कर भी पूरी तरह से एक तरह की जीवन शैलियों की आपस में टकराने की आवाज़ों से बना जाल है
जिसे देखकर कोई भी सिनेमा मे दिलचस्पी रखने वाला शख़्स यह कह सकता है की फिल्म किसी वर्ग से और उसके इर्द-गिर्द भटकती कल्पनाओं को पूरे तौर से शहर की रोज़मर्रा की तय मे संवारा गया है पर कुछ सवाल और अपने सोच के मुताबिक जगह में संभावनाएँ न ला पाने का फिल्म के नाम को लेकर सीधा-सीधा लोगों को क्या ये मनवाना है की वो जिस रूप को देख रहे हैं या जो जंग हमने छेड़ी है जो आप के भीतर ज्वालामुखी की तरह समाज में नकारे गए और काटे गए कोनों की है। जिसे समाज की भाषा मे असामाजिक तत्व कह कर गुज़र जाने वाले पलट कर नहीं देखते।
उस बनाई गई और कानून में गढ़ी गई हकीकत को मोटे पैमानों में कबूल किया जाये। बिना किसी विरोध के बिना बाघी हुए समाज के ही दिए गए अंत को स्वीकार कर के जिया जाए। क्योंकि हम पर सत्ता की आँख रहती है जो समय समय पर हमारे जीवन के नाप लेती रहती है।
जिसको हम ये गवाही भी देते हैं की हम उसके आधीन ही जी रहे हैं। मगर जब कोई इंसान इस आँख से बचकर या ओवरटेक करके निकलता है तो उसकी अपनी ऊर्जा को कोई क्यों भूल जाता है। जिसमे तेरा मेरा या ख़ास का ही जीवन महत्व नहीं रखता बल्कि उस में अपने से बनाई गई कहानियों, कृतियों की रचनात्मकता होती है। उसमे सच्चाई कितनी ख़री है ये परखने की ज़रूरत नहीं है। बस, जो आप के अंदर आया आपने ले लिया। उसका एक करूणायी स्पष्टीकरण है जो समाज के गठनों में फूट-फूट कर भरा है। बस, जरूरत है तो इस संम्पूर्ण ज़मीन को छानने की। जिसमे इतिहास अपने किसी वक़्त को लेकर पाताल के धरातल में समाया हुआ है। जो वो है वो नहीं है असल में जो वो नज़र नहीं आता।
जो एक रास्ता बन जाता है फिल्म की कहानी को पूर्णरूप में देखने का और जीवन की मार्मिकता को क्रूर से क्रूर रूप में दिखाने का पर आम तौर से देखा जाये तो इस फिल्म के आने से एक किस्म की लोगो मे निराशा सी आ गई है।
शायद ये छवि को लेकर सवाल है जो अपने पर भी आक्रामक प्रश्नचिन्ह लगा देता है। पडोस मे जब किसी ने पहली बार सुना तो वो फिल्म के ट्रेलर को देख कर हंसे पर दूसरे क्षण गौर फरमाया तो उनके दिमाग पर जाने पहचाने चेहरे ने दस्तक दी जिसको सामने पा कर वो बौख़ला से गए।
अभी तक लोगों के बीच में ये था कि आम ज़िंदगी को जितना भी सोचो उतना ही अपनी ज़िंदगी में इज़ाफा होगा। आपको जो पब्लिक नकारती है वही पब्लिक स्वीकार भी करती है। आखिर जीवन के सौन्दर्य को और भी नज़रियों से उभारा जा सकता है। हँस के दिखाने में करूणा से देखने में अदा को देखने मे उन तमाम संभावनाओं में जो जहाँ अपने जीवन में कल्पना करके जीने की जिद्द लाती है।
सिनेमा ने ऐसी बहुता ज़िंदगानियों से आवाम को रू-ब-रू करवाया है जिसमें फिल्म के कैरेक्टर, सीन, कहानी वगैरह जीवन की भावनात्मकता और सकरात्मक सोच से सीधे संवाद बनाती है।
ऐसा क्यों होता है कि किसी चीज़ को अद्भुत दिखाने में उसको पहले छीला जाता है, फिर छीलकर उसके रूप को मसालेदार बातों से और तरह-तरह की मिक्स सामग्रियों से बनाया जाता है। मैं इस नज़रिये से असहमत हूँ जिससे लोगो के संग जीने वाली परछाइयों को एनिमेटिड करने के साथ उनके जीवन के संविधानों को कोई बदल देता है, चाहें वो किसी भी तरह क्यों न हो? चाहें तकनीक या मीडिया का बौखलाता इरादा जो मौकों की ताक मे चौकन्ना रहता है और जरा सी आहट पाते ही तपाक से भीड़ में अपने शिकार को धर दबोचता है।
फिर जंगल और शहर का फ़र्क हमें भले ही मालूम हो या न हो। शिकारी अपना काम कर ही देता है।
केला खाने का भी एक तरीका है पर अगर उसे नंगा करके खाया जाये तो ये उस केले के साथ ज़्यादती होगी। उसका छिलका कैसे उतारना है ये तरीका बनाना होगा। वैसे उतारना है तो आँखों पर लगे उन चश्मों को भी उतारा जा सकता है जो भेदभाव, गरीबी, अमीरी, सही गलत के अलावा कुछ नहीं देख नही पाते हैं।
जो शहर को किसी सत्ता की बिखरी विरासत का टुकड़ा बोलकर शहर के ही सम्मुख एक बिलबिलाती तस्वीर रखते हैं पर वो इस शहरनुमा दुनिया को अपने नयेपन में जीने वाली प्रतिभाओ से गहरे तौर से ताहरूफ़ नहीं है। हम कैसे भुला सकते हैं जीवन में कहीं से भी आने वाली एक नई ज़ुबान को जो हमें सोचने और अपनी चाहत से जीने के आयाम देती है।
आज समाज में हर तरह की आँख है। ये पता है कि क्या देखना है? क्या नहीं देखना है? कैसे देखना है? किसी की दुखती रग पर हाथ रखोगें तो चितकारती भरी आवाज़ें तो आयेगी ही। कहते हैं कि अच्छाई और बुराई का तो चोली दामन का साथ है फिर सरेआम समाज में मानवता के कपड़े उतारने में क्या हर्ज़ है? जिसको देखना है देखो जिसको नहीं देखना वो मत देखो।
गांधी जी ने तो बिना "सिर्फ" शब्द को सोकर तीन बंदरो के स्वभाव को जीवन मे उतारा था, "बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो" ये जानवर के अस्तित्व को लेकर इंसान को पाठ पढ़ाने की कक्षा में दाखिला लेने जैसा ही है।
जहाँ से हम कुछ तो सीख कर निकलते हैं और वापस समाज में उतरते हैं। ये अपेक्षा लेकर कि समाज हमें अपने मुताबिक बनें अधिकारों में जीने की अनुमति देता है। बतौर हम ये भी जानते हैं कि समाज के अपने नियम और कानून हैं जिस के बाहर आपको सोचने की ज़रूरत ही नहीं है। क्योंकि ये असंभव है और जहाँ दोमूही तलवार भी है जो काटती है और उकसाती भी है। समाज खुद ही आपके लिए सार्वजनिक जैसी जगहें बना देता है जिसको हम सांझा मान कर जीते हैं। वो सब का ढाँचा होती है जिसमें सब दाखिला पा सकते हैं। हमें उनका पालनकर्ता बनना ही पढ़ता है। नहीं तो सत्ता का संविधान अपने दस्तावेजों से हमारा नाम ख़ारिज़ कर देगा। ये डर हमें अंदर ही अंदर गलाता चला जाता है। फिर माहौल मे अपने को बचाए या अपने अधिकारों की चिंता करें। क्या करें ये फैसला लेना पड़ता है? कभी-कभी हम इस का अंतर्विरोध कर के अपने कोने बना कर जीना शुरू कर देते हैं, और कहीं हम समाज के अधीन हो जाते हैं।
ये दोनों तरीके अमेल हैं पर इसको लेकर सब जीते ज़रूर हैं। लेकिन सब जानते हुए भी हम नियमों में अपनी चाहत से जीने की वज़ह बना ही लेते हैं। जिसमें हमारी अपनी सौगातें होती हैं। इसी समाज मे बने नियम और कानूनो में कहीं न कहीं कोई कल्पना की जा रही होती है। जिससे अपने जीवन का फैलाव सत्ता के बने ढाँचे से अलग होता है। जिसमे खुद का सिद्धाँत बना कर जीवन यात्राओं को बेहद लाचिला और जीवनयापन की कालगुज़ारी के असीमित रास्तों के फाटक खुले तो कभी बंद भी होते हैं।
आश्चर्य की बात तो ये है कि आम ज़िंदगी को तो जैसे गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ कर रखा है जिसमे श्रमिक वर्ग कहीं भटका सा लगता है। जो कि दुनिया के हर निर्माण की नींव में शामिल है। जिसे विकसित जीवन के लिए सोचा जाता है। उसका आधार ही श्रमिक वर्ग के ऊपर टिका है पर अब सवाल यह है कि शहर और बस्तियाँ कैसे अलग हैं? और क्या जो लोग यहाँ से जाकर शहर में शामिल होते हैं वो लोग कौन हैं? जिनसे सामाज काम लेता है या जो समाज की ऊर्जा है। जो अपने जीवन के साथ-साथ ये भी सोचते है कि दूसरों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियाँ और फ़र्ज भी बनता है।
समाज अपने इर्द-गिर्द भी किसी तरह की मलीन वस्तु को बर्दाश्त नहीं कर सकता। किसी भी तरह की वस्तु से 'बू' आने से पहले समाज अपने सिस्टमों को लागू करके अपने से दूरी में जीने वाले वर्ग को आदेशो में ले लेता है। जिससे वो वर्ग सांझी जगह मे फैले अवशेष को नष्ट करने का हुक्म बजाता है।
लेकिन सवाल ये है की जब समाज कोई चीज़ अपनाता है तो उस को भोगने के बाद जो जीवन बचता है उसे कहाँ ले जाया जाये? या फिर दोबारा किसी प्रक्रिया को शुरू करने का तरीका निकाला जाये जिससे वापस शहर में चीज़ों को लाया जाये जिससे सीखने की बिल्डिंग तैयार हो सके। प्रयोग या क्रियाकलापों को सोचा जा सके। ये अनुमति सत्ता दे ही नहीं सकती क्योंकि वो अपने ऊपर किसी तरह का प्रभाव पड़ने ही नहीं देना चाहती। वो समझती है कि जो वो खुद चाहती है वो ही प्रयोग लोगों के बीच होना चाहिए जिसे किए गए प्रयोगों का अगर कुप्रभाव पड़े तो लोगों तक ही रहे उसकी सीमाओं में कोई महामारी या किसी तरह की नाकामयाबी का असर प्रवेश न कर पायें। उसके लिए तो आबादी बची हुई है जो हर तरह के प्रभावों को अपने में समा लेती है और दोबारा से वस्तुओं में जीवन फूंकती है।
जीवन की जटिल से जटिल और ठोस सच्चाई को पिघलाने के बजाये उसे पथरीला और कांटेदार बनाने की कोशिश होती रहती है। आम ज़िंदगी को गुलाम बनाकर उसे कैद में क्यों रख दिया है। बहुत बड़े पैमाने पर शहर की आबो-हवा मे सांस लेता कोई शख़्स ज़िंदगी के सफ़र को दोहराने के बजाये वो उसमे किसी तरह सरहदों को लांघ कर सपनों को कल्पनाएँ लेकर के जीने की जिद रखता है। जो आम जीवन की ज़मीन पर जिज्ञासा भरे बीज बोना है। इस उम्मीद में के एक दिन उसी बीज से फूट कर नई प्रतिभाएँ अंकुरित होगीं। वो कहीं से भी कैसे भी हमारे समक्ष आ जायेगीं। बस, जरूरत है तो उन्हे समझाने की पर क्या करें समाज में ही मानवता के प्रति लगाव और जीवन को नंगा करके दिखाने की प्रथा पुरानी है जिसमें नई ज़ुबान है ही नहीं।
मंच वही है। बस, अंदाज बदला है तेवर बदले हैं। शरीर उतना ही है, कपड़ा छोटा हो गया है। भूख वही है कुछ नये व्यंजन आ गए हैं। जो चखने मात्र ही हैं। उनसे पेट नहीं भरा जा सकता, मन नहीं भरता। समाज वही हैं, लोग भी वही हैं पर और भी कूटनीतियाँ आ गई हैं। कहीं से भी इंसानियत के शरीर पर बने जख़्मो को कुरेद कर उन्हे ताजा किया जाने की फिराक बनी रहती है। जिससे शरीर में दौड़ता खून जब बाहर निकले तो छीटें किसी के चेहरे पर जा गिरे। ज़िंदगी को इससे ज़्यादा क्लाइमेक्स मे और कैसे देख सकते हो?
हमें ज़िंदगी में नई ज़ुबान बनाने की जरूरत है वरना इंसान के ख़त्म होने के डर है। शख़्सियतों को बोझ बना कर जीने से तो अच्छा है कि उनकी आँखों से देखा जाये उनके अहसासों से जिया जाये।तब पता लगेगा की जीवन क्या जैसे ओस की बूंद है जिसे छुने के बजाये उसे महसूस करके अपने में उतारना बेहतर है।
राकेश
किसी के पास उस के नाजायज़ होने का सबूत नहीं था। वो दरिंदा कोई भी रूप बदलकर कुशल-मंगल को हिंसा और पाप में बदल कर रख देता। वो मानवता का दुश्मन सब के मन को भंग कर देता। तब सारा भू-मंडल दूषित हवाओं से भर जाता। चारों तरफ बस चीखती, रोती और बिलखती ज़िंदगानियाँ और विद्रोह कर रही आवाज़ों में तिलमिलाती परछाइयाँ ही नज़र आती। जानवर और मानव इन दोनों में ही एक दुनिया है जिसको सिर्फ भूख से देखा जाता है। स्वार्थ से देखा जाता है। ज़रूरत से देखा जाता है, लेकिन कोई करुणा से देखे। एक-दूजे का बन के देखें तो यकीनन सच के ऊपर पड़ा पर्दा उठ जायेगा।
आज लोग जीवन में बने रिश्तों को लेकर कई बातें बनाते हैं और खुद ही किसी की नींव रख देते हैं और आप ही किसी को उखाड़ देते हैं।
कुत्तों को कई तरह के अभिनय करते हुए सबने देखा पर जब कुत्तों को बहुचर्चित होते देखा तो रहा न गया। शायद इस से बेहतर मेरे पास उदाहरण नहीं हो। लेकिन आजकल इस नस्ल को विभिन्न वर्ग के नुमाइंदों ने अपने शहर से तड़िपार कर दिया है।
इसके सिवा आसपास कुछ भी तो सुनाई नहीं दे रहा था। जिससे यह साबित होता की करोड़पती का ताल्लुक गलियों में घूमते कुत्तों से नहीं है। इस तरह की पंक्तियाँ बहुत सुनाई पड़ रही है जो हमारी रोज़मर्रा में बेइंतिहाँ शामिल है।
वरना जनाब आज के वक़्त में तो ये हालात है की गलियाँ जैसी जगह तरह-तरह के विभाजनों में अपने ही मंथन में फंसी भँवर बन गई है। जिसके शिकंजे में आने वाला शख़्स अपनी भव्यता को खो बैठता है और अपनी ही आलोचनाओं से अपनी मांसपेशियों को खरोचनें लगता है। हम अपने जीने लायक जगह बनाने में लीन रहते हैं, और कोई आता है तो एकदम से सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। जीवन में कई श्रृखलाएं हैं जिनके सहारे हम जीवन बनाते हैं और उसमे परवरिश करते हैं अपने विचारों की धारणाओं की। तब जाकर एक जगह में सैरगाह बनती है जिसमे हर कोई शामिल है।अपनी-अपनी मननशीलता के मुताबिक। मानव और जानवर का रिश्ता इतिहास से चला आ रहा है और इतिहास एक सच्चाई है जिसे नापा या तोला नहीं जा सकता न ही झुठलाया जा सकता है।
लेकिन हम इंसानो की बस्तियों में कुत्तों की सैरगाह नहीं होती बस, उनपर अपनी ममता और प्यार लुटाने का बहाना चाहिए होता है। जो बात मैं आप को कहने जा रहा हूँ वो बात मुझे किसी ने कही कि "कुत्तो का जीवन वैश्याओं से कम नहीं हैं।" जब चाहा अपनी जांघ पर बैठा दिया और जब चाहा उसे थपथपा दिया।
इंसान और जानवर के बीच बने फ़र्क में ही पूरा रहस्य छिपा है। जिस में मानव जीवन शैली की और जानवर के साथ बनी कहानियों की दुनिया दिखती है जो एक-दूसरे को ज़िंदा रखने के लिए जानी पहचानी जाती है।
क्यों कि ज़िंदगी के पैचीदा हालातों को आसपास की संभावनाएँ बड़ी मासूमियत से उभारती है। जैसे एक कहावत को सुनकर मेरे आसपास कुछ अपने दार्शनिक संभावनाओं की घटनायें मंडराने लगती है। जिसके कारण हक़ीकत एक अलग ही ढंग से हमारी ओर बढ़ती हैं।
वो कहावत है ,"धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का" ये मुहावरा दो शख़्सियतों को आपस में टकराव में लाता है। जो दोनों ही के छोर से हटकर अपनी ही उधेड़बुन में जीना है। आजकल मौहल्लो में चर्चा हो रही है कि कुत्ता करोड़पती बन गया पर आम आदमी पीछे छूट गया। जिसने मौहल्ला रचा है। उसके परिकल्पना और अपने लिए जीने वाली शैलियों की तो जैसे दुनिया ही ओझल है।
हाल ही में आई फिल्म के बारे मे लोगों के ख़्यालात कुछ इस तरह के हैं। सब के मुँह पर तरह-तरह के जुमलें हैं तो किसी का चिड़चिड़ा स्वभाव है।
टीवी चैनलों और अखबारों में फिल्म के ऊपर अपने तेज दृष्टिकोण डाले हैं जो किसी शहर को छान कर भी पूरी तरह से एक तरह की जीवन शैलियों की आपस में टकराने की आवाज़ों से बना जाल है
जिसे देखकर कोई भी सिनेमा मे दिलचस्पी रखने वाला शख़्स यह कह सकता है की फिल्म किसी वर्ग से और उसके इर्द-गिर्द भटकती कल्पनाओं को पूरे तौर से शहर की रोज़मर्रा की तय मे संवारा गया है पर कुछ सवाल और अपने सोच के मुताबिक जगह में संभावनाएँ न ला पाने का फिल्म के नाम को लेकर सीधा-सीधा लोगों को क्या ये मनवाना है की वो जिस रूप को देख रहे हैं या जो जंग हमने छेड़ी है जो आप के भीतर ज्वालामुखी की तरह समाज में नकारे गए और काटे गए कोनों की है। जिसे समाज की भाषा मे असामाजिक तत्व कह कर गुज़र जाने वाले पलट कर नहीं देखते।
उस बनाई गई और कानून में गढ़ी गई हकीकत को मोटे पैमानों में कबूल किया जाये। बिना किसी विरोध के बिना बाघी हुए समाज के ही दिए गए अंत को स्वीकार कर के जिया जाए। क्योंकि हम पर सत्ता की आँख रहती है जो समय समय पर हमारे जीवन के नाप लेती रहती है।
जिसको हम ये गवाही भी देते हैं की हम उसके आधीन ही जी रहे हैं। मगर जब कोई इंसान इस आँख से बचकर या ओवरटेक करके निकलता है तो उसकी अपनी ऊर्जा को कोई क्यों भूल जाता है। जिसमे तेरा मेरा या ख़ास का ही जीवन महत्व नहीं रखता बल्कि उस में अपने से बनाई गई कहानियों, कृतियों की रचनात्मकता होती है। उसमे सच्चाई कितनी ख़री है ये परखने की ज़रूरत नहीं है। बस, जो आप के अंदर आया आपने ले लिया। उसका एक करूणायी स्पष्टीकरण है जो समाज के गठनों में फूट-फूट कर भरा है। बस, जरूरत है तो इस संम्पूर्ण ज़मीन को छानने की। जिसमे इतिहास अपने किसी वक़्त को लेकर पाताल के धरातल में समाया हुआ है। जो वो है वो नहीं है असल में जो वो नज़र नहीं आता।
जो एक रास्ता बन जाता है फिल्म की कहानी को पूर्णरूप में देखने का और जीवन की मार्मिकता को क्रूर से क्रूर रूप में दिखाने का पर आम तौर से देखा जाये तो इस फिल्म के आने से एक किस्म की लोगो मे निराशा सी आ गई है।
शायद ये छवि को लेकर सवाल है जो अपने पर भी आक्रामक प्रश्नचिन्ह लगा देता है। पडोस मे जब किसी ने पहली बार सुना तो वो फिल्म के ट्रेलर को देख कर हंसे पर दूसरे क्षण गौर फरमाया तो उनके दिमाग पर जाने पहचाने चेहरे ने दस्तक दी जिसको सामने पा कर वो बौख़ला से गए।
अभी तक लोगों के बीच में ये था कि आम ज़िंदगी को जितना भी सोचो उतना ही अपनी ज़िंदगी में इज़ाफा होगा। आपको जो पब्लिक नकारती है वही पब्लिक स्वीकार भी करती है। आखिर जीवन के सौन्दर्य को और भी नज़रियों से उभारा जा सकता है। हँस के दिखाने में करूणा से देखने में अदा को देखने मे उन तमाम संभावनाओं में जो जहाँ अपने जीवन में कल्पना करके जीने की जिद्द लाती है।
सिनेमा ने ऐसी बहुता ज़िंदगानियों से आवाम को रू-ब-रू करवाया है जिसमें फिल्म के कैरेक्टर, सीन, कहानी वगैरह जीवन की भावनात्मकता और सकरात्मक सोच से सीधे संवाद बनाती है।
ऐसा क्यों होता है कि किसी चीज़ को अद्भुत दिखाने में उसको पहले छीला जाता है, फिर छीलकर उसके रूप को मसालेदार बातों से और तरह-तरह की मिक्स सामग्रियों से बनाया जाता है। मैं इस नज़रिये से असहमत हूँ जिससे लोगो के संग जीने वाली परछाइयों को एनिमेटिड करने के साथ उनके जीवन के संविधानों को कोई बदल देता है, चाहें वो किसी भी तरह क्यों न हो? चाहें तकनीक या मीडिया का बौखलाता इरादा जो मौकों की ताक मे चौकन्ना रहता है और जरा सी आहट पाते ही तपाक से भीड़ में अपने शिकार को धर दबोचता है।
फिर जंगल और शहर का फ़र्क हमें भले ही मालूम हो या न हो। शिकारी अपना काम कर ही देता है।
केला खाने का भी एक तरीका है पर अगर उसे नंगा करके खाया जाये तो ये उस केले के साथ ज़्यादती होगी। उसका छिलका कैसे उतारना है ये तरीका बनाना होगा। वैसे उतारना है तो आँखों पर लगे उन चश्मों को भी उतारा जा सकता है जो भेदभाव, गरीबी, अमीरी, सही गलत के अलावा कुछ नहीं देख नही पाते हैं।
जो शहर को किसी सत्ता की बिखरी विरासत का टुकड़ा बोलकर शहर के ही सम्मुख एक बिलबिलाती तस्वीर रखते हैं पर वो इस शहरनुमा दुनिया को अपने नयेपन में जीने वाली प्रतिभाओ से गहरे तौर से ताहरूफ़ नहीं है। हम कैसे भुला सकते हैं जीवन में कहीं से भी आने वाली एक नई ज़ुबान को जो हमें सोचने और अपनी चाहत से जीने के आयाम देती है।
आज समाज में हर तरह की आँख है। ये पता है कि क्या देखना है? क्या नहीं देखना है? कैसे देखना है? किसी की दुखती रग पर हाथ रखोगें तो चितकारती भरी आवाज़ें तो आयेगी ही। कहते हैं कि अच्छाई और बुराई का तो चोली दामन का साथ है फिर सरेआम समाज में मानवता के कपड़े उतारने में क्या हर्ज़ है? जिसको देखना है देखो जिसको नहीं देखना वो मत देखो।
गांधी जी ने तो बिना "सिर्फ" शब्द को सोकर तीन बंदरो के स्वभाव को जीवन मे उतारा था, "बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो" ये जानवर के अस्तित्व को लेकर इंसान को पाठ पढ़ाने की कक्षा में दाखिला लेने जैसा ही है।
जहाँ से हम कुछ तो सीख कर निकलते हैं और वापस समाज में उतरते हैं। ये अपेक्षा लेकर कि समाज हमें अपने मुताबिक बनें अधिकारों में जीने की अनुमति देता है। बतौर हम ये भी जानते हैं कि समाज के अपने नियम और कानून हैं जिस के बाहर आपको सोचने की ज़रूरत ही नहीं है। क्योंकि ये असंभव है और जहाँ दोमूही तलवार भी है जो काटती है और उकसाती भी है। समाज खुद ही आपके लिए सार्वजनिक जैसी जगहें बना देता है जिसको हम सांझा मान कर जीते हैं। वो सब का ढाँचा होती है जिसमें सब दाखिला पा सकते हैं। हमें उनका पालनकर्ता बनना ही पढ़ता है। नहीं तो सत्ता का संविधान अपने दस्तावेजों से हमारा नाम ख़ारिज़ कर देगा। ये डर हमें अंदर ही अंदर गलाता चला जाता है। फिर माहौल मे अपने को बचाए या अपने अधिकारों की चिंता करें। क्या करें ये फैसला लेना पड़ता है? कभी-कभी हम इस का अंतर्विरोध कर के अपने कोने बना कर जीना शुरू कर देते हैं, और कहीं हम समाज के अधीन हो जाते हैं।
ये दोनों तरीके अमेल हैं पर इसको लेकर सब जीते ज़रूर हैं। लेकिन सब जानते हुए भी हम नियमों में अपनी चाहत से जीने की वज़ह बना ही लेते हैं। जिसमें हमारी अपनी सौगातें होती हैं। इसी समाज मे बने नियम और कानूनो में कहीं न कहीं कोई कल्पना की जा रही होती है। जिससे अपने जीवन का फैलाव सत्ता के बने ढाँचे से अलग होता है। जिसमे खुद का सिद्धाँत बना कर जीवन यात्राओं को बेहद लाचिला और जीवनयापन की कालगुज़ारी के असीमित रास्तों के फाटक खुले तो कभी बंद भी होते हैं।
आश्चर्य की बात तो ये है कि आम ज़िंदगी को तो जैसे गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ कर रखा है जिसमे श्रमिक वर्ग कहीं भटका सा लगता है। जो कि दुनिया के हर निर्माण की नींव में शामिल है। जिसे विकसित जीवन के लिए सोचा जाता है। उसका आधार ही श्रमिक वर्ग के ऊपर टिका है पर अब सवाल यह है कि शहर और बस्तियाँ कैसे अलग हैं? और क्या जो लोग यहाँ से जाकर शहर में शामिल होते हैं वो लोग कौन हैं? जिनसे सामाज काम लेता है या जो समाज की ऊर्जा है। जो अपने जीवन के साथ-साथ ये भी सोचते है कि दूसरों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियाँ और फ़र्ज भी बनता है।
समाज अपने इर्द-गिर्द भी किसी तरह की मलीन वस्तु को बर्दाश्त नहीं कर सकता। किसी भी तरह की वस्तु से 'बू' आने से पहले समाज अपने सिस्टमों को लागू करके अपने से दूरी में जीने वाले वर्ग को आदेशो में ले लेता है। जिससे वो वर्ग सांझी जगह मे फैले अवशेष को नष्ट करने का हुक्म बजाता है।
लेकिन सवाल ये है की जब समाज कोई चीज़ अपनाता है तो उस को भोगने के बाद जो जीवन बचता है उसे कहाँ ले जाया जाये? या फिर दोबारा किसी प्रक्रिया को शुरू करने का तरीका निकाला जाये जिससे वापस शहर में चीज़ों को लाया जाये जिससे सीखने की बिल्डिंग तैयार हो सके। प्रयोग या क्रियाकलापों को सोचा जा सके। ये अनुमति सत्ता दे ही नहीं सकती क्योंकि वो अपने ऊपर किसी तरह का प्रभाव पड़ने ही नहीं देना चाहती। वो समझती है कि जो वो खुद चाहती है वो ही प्रयोग लोगों के बीच होना चाहिए जिसे किए गए प्रयोगों का अगर कुप्रभाव पड़े तो लोगों तक ही रहे उसकी सीमाओं में कोई महामारी या किसी तरह की नाकामयाबी का असर प्रवेश न कर पायें। उसके लिए तो आबादी बची हुई है जो हर तरह के प्रभावों को अपने में समा लेती है और दोबारा से वस्तुओं में जीवन फूंकती है।
जीवन की जटिल से जटिल और ठोस सच्चाई को पिघलाने के बजाये उसे पथरीला और कांटेदार बनाने की कोशिश होती रहती है। आम ज़िंदगी को गुलाम बनाकर उसे कैद में क्यों रख दिया है। बहुत बड़े पैमाने पर शहर की आबो-हवा मे सांस लेता कोई शख़्स ज़िंदगी के सफ़र को दोहराने के बजाये वो उसमे किसी तरह सरहदों को लांघ कर सपनों को कल्पनाएँ लेकर के जीने की जिद रखता है। जो आम जीवन की ज़मीन पर जिज्ञासा भरे बीज बोना है। इस उम्मीद में के एक दिन उसी बीज से फूट कर नई प्रतिभाएँ अंकुरित होगीं। वो कहीं से भी कैसे भी हमारे समक्ष आ जायेगीं। बस, जरूरत है तो उन्हे समझाने की पर क्या करें समाज में ही मानवता के प्रति लगाव और जीवन को नंगा करके दिखाने की प्रथा पुरानी है जिसमें नई ज़ुबान है ही नहीं।
मंच वही है। बस, अंदाज बदला है तेवर बदले हैं। शरीर उतना ही है, कपड़ा छोटा हो गया है। भूख वही है कुछ नये व्यंजन आ गए हैं। जो चखने मात्र ही हैं। उनसे पेट नहीं भरा जा सकता, मन नहीं भरता। समाज वही हैं, लोग भी वही हैं पर और भी कूटनीतियाँ आ गई हैं। कहीं से भी इंसानियत के शरीर पर बने जख़्मो को कुरेद कर उन्हे ताजा किया जाने की फिराक बनी रहती है। जिससे शरीर में दौड़ता खून जब बाहर निकले तो छीटें किसी के चेहरे पर जा गिरे। ज़िंदगी को इससे ज़्यादा क्लाइमेक्स मे और कैसे देख सकते हो?
हमें ज़िंदगी में नई ज़ुबान बनाने की जरूरत है वरना इंसान के ख़त्म होने के डर है। शख़्सियतों को बोझ बना कर जीने से तो अच्छा है कि उनकी आँखों से देखा जाये उनके अहसासों से जिया जाये।तब पता लगेगा की जीवन क्या जैसे ओस की बूंद है जिसे छुने के बजाये उसे महसूस करके अपने में उतारना बेहतर है।
राकेश
सच मे अंधेरा ही था
एक गहरा अंधेरा था वहाँ पर। अन्दर घुसने को कोई मनाही नहीं थी पर कदम अपना साथ दे तो हिम्मत हो। दरवाजे के सामने खड़े होकर ही पूरे कमरे का ज़ायज़ा ले जाते होगें लोग। शायद ही कोई उस कमरे के उस कोने में जाता होगा जहाँ पर ये कमरा ख़त्म होता है मगर दरवाजे के किनारे पर खड़े होकर देखने की नज़र कभी उस कमरे का अन्त देख ही नहीं सकती थी।
कमरा धुँए की परत और छोटे-छोटे रूई जैसे फोहें, मिट्टी और कालस की शक़्ल में पूरे कमरे की दरारियों में हवा से लहरा रहे थे। अगर दिवारों पर उगंलियों को फिराया जाये तो किसी ना किसी ईंट पर अपनी छाप छोड़ने से कम नहीं होगा। लकड़ी के लटके से दरवाजे वाला ये कमरा, पूरे शमशाम घाट में दूर से ही नज़र आता है बिना किसी रंग-रोगन और सजावट के। सजावट हो भी क्यों भला सोने वाले तो उस कमरे में आराम से सो रहे हैं। अपनी उन चीजों के साथ जो अब इस कमरे की रखवाली करती हैं और कमरे में एक बेधड़कपन को ठहराती है।
खौफ़ की चादर ओड़े ये कमरा चीजों से अपने अन्दर आने की हौसला-अफ़ज़ाई देता है। चीजों के अपने नज़रों में भरते हुए अन्दर जाने में कदम नहीं काँपते। चीजें जो ख़ामोश हो जाने के बाद भी कोई ऐसी चमक लिए है कि उसमे नज़रें घुमाने पर एक ही पल में लगता है की कई डरावनी छवियाँ जो अपनी आँखों में रखली जाती हैं वो महज़ अपनी ही आँखों पर लटकी तख़्ती की तरह होती हैं। उसका इन चीजों और कमरे से कोई लेना-देना नहीं होता। चीजें जो अब किसी के काम की नहीं है पर फिर भी वो रखी हैं इस कमरे में लोगों का अहसास कराने के लिए। जो इस कमरे के प्रति बनती कई अवधारणाओं को अपने में समेट लेती हैं।
दिवारों में बनते ईंटो के बीच कि दूरी और दरारियों में से रोशनी अन्दर घुसने का रास्ता खोज़ निकालती है। जो जिसकी अस्थियों की लटकी थैली पर पड़ती है वो थैली कोई रंग लेकर अपने पर गुदी तारीख़ को सामने लाकर खड़ा कर देती है और जो शरीर इस थैली की शक़्ल में यहाँ पर टंगा है उसे भी ऊपरवाले की रोशनी प्राप्त हो जाती।
रोशनी के कई तार धीरे-धीरे दिन चड़ते उस कमरे में खिंच जाते। आमने-सामने की दरारियों में रोशनी के तार किसी चमकती लकीर की भांति उन टंगी थैलियों को नया रंग दे देती। आर-पार होती रोशनी कमरे में जाल की भान्ति पड़ने लगती और रेडियम की लाइट की तरह कमरे को साफ़ करने में कामयाब हो जाती।
रोशनी के तार खिंचने से पूरे कमरे का गहरा अन्धेरा छट जाता और कमरा लगता जैसे बिना दिवारों के जमीन से कोसो ऊपर हो गया है और हवा में झूल रहा है उन लकीरों पर जो उस रोशनी से बनी हैं।
कमरे में दाखिल होने का पहला कदम ही वहाँ रहने वाले अदृश्य लोगों को महसूस करने में मजबूर करता है। ऐसा लगता है की अपने अन्दर बसे डर से कभी भागा ही नहीं जा सकता। राख की महक अन्दर तक भर जाती और नज़र कहीं रूकती ही नहीं। कुछ भी तो ऐसा नहीं था वहाँ पर जो नज़रों को रोकने के लिए मजबूर करे अगर कहीं ठहराव नज़र आता तो वो उन चीजों में जिनमे अब भी वो अहसास छूपा था जो किसी के होने का दम भरता है।
कई चीजों को तो देखकर लगता है कि जैसे कोई तो है जो यहाँ पर रात गुजारता है। जिसमे उन काली पोटलियों में कुछ याद रखने या किसी खास चीज को सम्भाल कर रखने के लिए टांगा हो। कई कपड़े जो थैलियों में बंधे रखे हैं और खाट जो बिछी हुई है मगर वो शायद कोई भ्रम भी हो सकता है।
शमशाम घाट में बैठा लकड़ी वाला भी इस कमरे में कभी नहीं जाता। कितनी बार तो शिवराम जी ही उसे खींचकर लेकर जाते हैं तो अगला अगर एक कदम भी उस कमरे की दहलीज़ पर रख दे तो तुरन्त ही जाकर नहा लेता है और फिर शुरू हो जाती है शिवराम जी के साथ उसकी अनबन। मगर वो भी ज़्यादा देर तक नहीं रहती बस, उसके नहाने तक ही रहती है। ज़्यादा देर तक अनबन का कोई फ़ायदा भी तो नहीं है क्योंकि शमशाम घाट मे दो-चार ही तो लोग होते हैं। एक-दूसरे से बातें करने के लिए और जोर आज़माने के लिए। वहाँ अर्थी को लाने वाले लोग तो आपके साथ मे गप्पे-वप्पे नहीं करेगें। तो दिन कैसे कटेगा ? फिर दोनों का काम भी तो एक ही जैसा है। एक अर्थी के लिए लकड़ियाँ बैकता है और दूसरा उन लकड़ियों के बिना अर्थी का क्रियाक्रम कैसे करेगा तो ये जोर आज़माइस एक-दूसरे के बीच में चलती रहती है।
न जाने कितनी दुआयें और बलायें अपने मे समायें ये कमरा इन चीजों और अस्थियों को सम्भाले रखता है।
अब तो शिवराम जी मन्दिर की मुंडेरी पर बैठे-बैठे बस इन्तजार करते रहते है अर्थियों का। जोर-ज़बरदस्ती करने के लिए वो लकड़ी वाला और कूड़ा बिनने वाले ही रह गए हैं। जिनके कारण मुँह में से आवाज़ निकलती है उनकी। नहीं तो पूरा दिन बिना बोले ही कट जाये तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तो देखा जाये शिवराम जी का तो पूरा हुलिया ही चैन्ज हो गया है। पैन्ट और कमीज़ छोड़कर कुर्ता-पज़ामा पहनने लगे हैं और कांधो पर एक गमछा भी डाले रखते हैं। शरीर में बहुत तेजी आ गई है फौरन इधर से उधर चले जाते हैं। बिलकुल भी टाइम नहीं लगाते वो किसी भी अर्थी को मोक्षस्थल दिखाने में और उसका क्रियाक्रम कराने में। कभी चीजों को देखते रहते है और कभी वहाँ की सफ़ाई करने में लग जाते हैं। अब तो शमशाम घाट मे भी गेट लग गया है। उसका भी मैनगेट बना दिया गया है। सरकार को लगता है की जैसे यहाँ से भी कुछ चोरी होने के चान्स ज़्यादा है। जो लोग रात मे आकर वहाँ आग जला कर सो जाया करते थे उनका आना बन्द हो गया है और शमशाम घाट अब पूरा शमशाम घाट बन गया है।
शिवराम जी दिन में पूरा गेट खुला रखते हैं कहते है कि अगर कोई यहाँ पर कुछ चुनने आया चुन तो सकता है। कुड़ा बिनने वाले भी यहाँ पर रहते है। सारे में घूम कर जब आते हैं तो कोई-कोई खाना भी यहाँ पर खाता है। इन दिनों तो अस्थियाँ ले जाने वालो की भी कतार लगी हुई थी। दिन में लगभग दो परिवार तो आ ही जाते हैं उन अस्थियों को ले जाने के लिए। लोग बेधड़क शमशाम घाट में चले तो आते है मगर उस कमरे मे बिना पंडित जी की इज़ाज़त लिए कोई नहीं जाता। अपने हाथों में मर जाने वाले के नाम का पर्चा लिए वो चले आते और पंडित जी के पास में जाकर उस थैली का ज़ायज़ा लेते की इस तारीख़ वाली थैली कौन सी है और कहाँ पर लटकी है।
आज भी कोई आया अपने किसी रिश्ते की थैली लेने। वो चार लोग थे। पहले वो शमशाम घाट मे बने मन्दिर में आये और पंडित जी के पास गए। अपनी पर्ची दिखाई। पंडित जी ने अपना पत्रा खोला और उसे मरने वाले का नाम बताया उसके बाद उसे तारीख़ बताई और कहा की तुम शिवराम के पास में चले जाओ वो तुम्हे अस्थियों के फूल दे देगा। इतना सुनकर वो चारों शिवराम जी के पास चले गए। शिवराम जी वहीं कमरे के बाहर बनी मुंडेरी के ऊपर बैठे थे। उन चारों में से एक आदमी आया जिसके हाथ मे वो पर्ची थी। उसमे वो पर्ची शिवराम जी को दिखाई।
शिवराम जी ने उन्हैं कहा, "तुम अन्दर जाईये और अन्दर सामने की दिवार पर ये थैली टगीं है। उसे ले लिजिये पर क्या आप कोई समान लाये थे जिसे उनके ऊपर चड़ाया गया था?”
तो उनमे से एक बोला, "नहीं हम कुछ नहीं लाये थे।"
शिवराम जी ने कहा कि आप अन्दर चले जाओ और तारीख़ देखकर अपनी अस्थियाँ ले लो। वहीं सामने वाले दिवार कर टंगी है।
ये सुनकर वो अन्दर जाने लगे और दरवाजे पर खड़े होकर ये देखने लगे की कौन सी सामने वाली दिवार है? चारों ही लोग दरवाजे के सामने खड़े हो गए और पहले जाने वाले के मुँह की तरफ देखने लगे। शिवराम जी ने उनकी तरफ देखा तो वो खुद ही उनके साथ में चले जाने के लिए खड़े हो गए। वो अन्दर गए और सीधा सामने वाली दिवार पर चले गए और वो चारों आये लोग ये देखने लगे की यहाँ तो पहले से ही इतनी अस्थियाँ टंगी है और ये आदमी सीधा सामने वाली दिवार पर चला गया। वैसे देखा जाये तो शिवराम जी को भी नहीं मालूम था की इस तारीख़ की थैली कहाँ पर टंगी है? वो तो महज़ अन्दाजा भरते हुए सामने चले गए थे। तारीख़ थी 2005 की।
शिवराम जी वहाँ पर लटकी सारी थैलियों को अपने हाथों से साफ़ करते और उन्हैं घुमा-घुमाकर देखते कि उनकी तारीख़ कौन सी है। हर थैली को बहुत ही नज़दीक से देखना पड़ता और उस पर पड़ी धूल को साफ़ करना होता। शिवराम जी वहाँ पर सारी थैलियों को देख रहे थे और वो चारों आये लोग वहाँ चुपचाप खड़े थे। बस, चारों दिवारों पर नज़र घुमाते हुए कमरे की बनावट को देख रहे थे। एक कौने मे गड़ी कील पर तीन थैलियाँ टंगी थी तो उन पर शिवराम जी ने अपनी ऊंगलियाँ फैरी और देखा की कौन सी तारीख़,लिंग और किस मोक्षस्थल की ये थैली है। उनमे से एक वही थी जिसे वो ढूँढ रहे थे। काले रंग और धूल की परत ने उसे इतना कठोर बना दिया था कि उसमे किसी के होने का अन्दाजा ख़त्म ही हो गया था समझों। आज पूरे तीन साल जो हो गए थे उन अस्थियों को वहाँ पर टंगे हुए।
शिवराम जी ने उस थैली की गाँठ को खोला और उसे वहाँ से उतारा। अपने हाथों मे लेकर उस पर पड़ी धूल को साफ़ करते हुए उन्होनें वो थैली उन चारों के हाथ में देनी चाही मगर वो चारों में एक आदमी का हाथ आगे बड़ा। उसने अपने दोनों हाथों कि अन्जली बनाई और उस थैली को बड़े प्यार और श्रद्धा से अपने हाथों में ले लिया। उस थैली को वो इस तरह से लेकर आ रहे थे कि जैसे उसमे वो रिश्ता अभी भी जिन्दा है जिसे मुखागनी दे दी गई थी। वो इतने अहिस्ता-अहिस्ता उसे लेकर चले रहे थे के कहीं उस थैली को हिलने से कोई चोट ना लग जाये। एक आदमी के हाथों में वो थी तो दूसरे आदमी ने उसके हाथों के नीचे अपने हाथों को भी रखा हुआ था। लगता था की जैसे वो दोनों का कोई लगता था। अब रिश्ता समझना जरूरी नहीं था। मगर आज कोई विदा हो रहा था इस अन्धेरे और खौफ़नाक कमरे से।
वो चारों लोग अब फिर से पंडित जी के पास में गए और उस थैली को अपने हाथों मे पकड़े पूछने लगे की पंडित जी इसको हम किस तरह से गंगा मे विसर्जन करे और कब करें?
पंडित जी ने उनके आगे सारे पत्रे खोले और कुछ पन्नों पर नक्शे बनाने लगे। थोडी ही देर मे कहने लगे, "इसको गंगा मे विसर्जन करते समय ये देखना की ये किनारे पर ना लगे। इसे बीच में जाकर विसर्जन करना और दोनों हाथों उसे बहाना।"
ये कहकर उन्होनें एक मिट्टी का करवा निकाला और उसमे कुछ फूल और लोंग के दाने डालकर उस थैली मे से अस्थियों को निकाल उस करवे मे डाल दिया। फिर उस ही काले रंग के कपड़े से उस करवे का मुँह बन्द कर दिया और कहा दक्षिंणा दे जाओ और इसे दो दिन से ज़्यादा अपने घर में मत रखना। जल्द से जल्द विसर्जन कर देना। वो चारों लोग उस करवे को लेकर चले गए और शिवराम जी उस काले रंग के कपड़े पर लिखी तारीख़ को मन्दिर में रखे रजिस्टर में से काटने लगे।
अब धीरे-धीर करके कमरा सारी थैलियों से खाली हो जायेगा और डर जैसी चीज वहाँ पर नहीं रहेगी। वो उन लोगों को देखते रहे। कुछ पूजा-पाठ हुआ। उस थैली को लिया और चले गए। एक शख़्स यहाँ इस कमरे से भी विदा हो गया अब पता नहीं कहाँ पर रहेगा?
लख्मी
कमरा धुँए की परत और छोटे-छोटे रूई जैसे फोहें, मिट्टी और कालस की शक़्ल में पूरे कमरे की दरारियों में हवा से लहरा रहे थे। अगर दिवारों पर उगंलियों को फिराया जाये तो किसी ना किसी ईंट पर अपनी छाप छोड़ने से कम नहीं होगा। लकड़ी के लटके से दरवाजे वाला ये कमरा, पूरे शमशाम घाट में दूर से ही नज़र आता है बिना किसी रंग-रोगन और सजावट के। सजावट हो भी क्यों भला सोने वाले तो उस कमरे में आराम से सो रहे हैं। अपनी उन चीजों के साथ जो अब इस कमरे की रखवाली करती हैं और कमरे में एक बेधड़कपन को ठहराती है।
खौफ़ की चादर ओड़े ये कमरा चीजों से अपने अन्दर आने की हौसला-अफ़ज़ाई देता है। चीजों के अपने नज़रों में भरते हुए अन्दर जाने में कदम नहीं काँपते। चीजें जो ख़ामोश हो जाने के बाद भी कोई ऐसी चमक लिए है कि उसमे नज़रें घुमाने पर एक ही पल में लगता है की कई डरावनी छवियाँ जो अपनी आँखों में रखली जाती हैं वो महज़ अपनी ही आँखों पर लटकी तख़्ती की तरह होती हैं। उसका इन चीजों और कमरे से कोई लेना-देना नहीं होता। चीजें जो अब किसी के काम की नहीं है पर फिर भी वो रखी हैं इस कमरे में लोगों का अहसास कराने के लिए। जो इस कमरे के प्रति बनती कई अवधारणाओं को अपने में समेट लेती हैं।
दिवारों में बनते ईंटो के बीच कि दूरी और दरारियों में से रोशनी अन्दर घुसने का रास्ता खोज़ निकालती है। जो जिसकी अस्थियों की लटकी थैली पर पड़ती है वो थैली कोई रंग लेकर अपने पर गुदी तारीख़ को सामने लाकर खड़ा कर देती है और जो शरीर इस थैली की शक़्ल में यहाँ पर टंगा है उसे भी ऊपरवाले की रोशनी प्राप्त हो जाती।
रोशनी के कई तार धीरे-धीरे दिन चड़ते उस कमरे में खिंच जाते। आमने-सामने की दरारियों में रोशनी के तार किसी चमकती लकीर की भांति उन टंगी थैलियों को नया रंग दे देती। आर-पार होती रोशनी कमरे में जाल की भान्ति पड़ने लगती और रेडियम की लाइट की तरह कमरे को साफ़ करने में कामयाब हो जाती।
रोशनी के तार खिंचने से पूरे कमरे का गहरा अन्धेरा छट जाता और कमरा लगता जैसे बिना दिवारों के जमीन से कोसो ऊपर हो गया है और हवा में झूल रहा है उन लकीरों पर जो उस रोशनी से बनी हैं।
कमरे में दाखिल होने का पहला कदम ही वहाँ रहने वाले अदृश्य लोगों को महसूस करने में मजबूर करता है। ऐसा लगता है की अपने अन्दर बसे डर से कभी भागा ही नहीं जा सकता। राख की महक अन्दर तक भर जाती और नज़र कहीं रूकती ही नहीं। कुछ भी तो ऐसा नहीं था वहाँ पर जो नज़रों को रोकने के लिए मजबूर करे अगर कहीं ठहराव नज़र आता तो वो उन चीजों में जिनमे अब भी वो अहसास छूपा था जो किसी के होने का दम भरता है।
कई चीजों को तो देखकर लगता है कि जैसे कोई तो है जो यहाँ पर रात गुजारता है। जिसमे उन काली पोटलियों में कुछ याद रखने या किसी खास चीज को सम्भाल कर रखने के लिए टांगा हो। कई कपड़े जो थैलियों में बंधे रखे हैं और खाट जो बिछी हुई है मगर वो शायद कोई भ्रम भी हो सकता है।
शमशाम घाट में बैठा लकड़ी वाला भी इस कमरे में कभी नहीं जाता। कितनी बार तो शिवराम जी ही उसे खींचकर लेकर जाते हैं तो अगला अगर एक कदम भी उस कमरे की दहलीज़ पर रख दे तो तुरन्त ही जाकर नहा लेता है और फिर शुरू हो जाती है शिवराम जी के साथ उसकी अनबन। मगर वो भी ज़्यादा देर तक नहीं रहती बस, उसके नहाने तक ही रहती है। ज़्यादा देर तक अनबन का कोई फ़ायदा भी तो नहीं है क्योंकि शमशाम घाट मे दो-चार ही तो लोग होते हैं। एक-दूसरे से बातें करने के लिए और जोर आज़माने के लिए। वहाँ अर्थी को लाने वाले लोग तो आपके साथ मे गप्पे-वप्पे नहीं करेगें। तो दिन कैसे कटेगा ? फिर दोनों का काम भी तो एक ही जैसा है। एक अर्थी के लिए लकड़ियाँ बैकता है और दूसरा उन लकड़ियों के बिना अर्थी का क्रियाक्रम कैसे करेगा तो ये जोर आज़माइस एक-दूसरे के बीच में चलती रहती है।
न जाने कितनी दुआयें और बलायें अपने मे समायें ये कमरा इन चीजों और अस्थियों को सम्भाले रखता है।
अब तो शिवराम जी मन्दिर की मुंडेरी पर बैठे-बैठे बस इन्तजार करते रहते है अर्थियों का। जोर-ज़बरदस्ती करने के लिए वो लकड़ी वाला और कूड़ा बिनने वाले ही रह गए हैं। जिनके कारण मुँह में से आवाज़ निकलती है उनकी। नहीं तो पूरा दिन बिना बोले ही कट जाये तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तो देखा जाये शिवराम जी का तो पूरा हुलिया ही चैन्ज हो गया है। पैन्ट और कमीज़ छोड़कर कुर्ता-पज़ामा पहनने लगे हैं और कांधो पर एक गमछा भी डाले रखते हैं। शरीर में बहुत तेजी आ गई है फौरन इधर से उधर चले जाते हैं। बिलकुल भी टाइम नहीं लगाते वो किसी भी अर्थी को मोक्षस्थल दिखाने में और उसका क्रियाक्रम कराने में। कभी चीजों को देखते रहते है और कभी वहाँ की सफ़ाई करने में लग जाते हैं। अब तो शमशाम घाट मे भी गेट लग गया है। उसका भी मैनगेट बना दिया गया है। सरकार को लगता है की जैसे यहाँ से भी कुछ चोरी होने के चान्स ज़्यादा है। जो लोग रात मे आकर वहाँ आग जला कर सो जाया करते थे उनका आना बन्द हो गया है और शमशाम घाट अब पूरा शमशाम घाट बन गया है।
शिवराम जी दिन में पूरा गेट खुला रखते हैं कहते है कि अगर कोई यहाँ पर कुछ चुनने आया चुन तो सकता है। कुड़ा बिनने वाले भी यहाँ पर रहते है। सारे में घूम कर जब आते हैं तो कोई-कोई खाना भी यहाँ पर खाता है। इन दिनों तो अस्थियाँ ले जाने वालो की भी कतार लगी हुई थी। दिन में लगभग दो परिवार तो आ ही जाते हैं उन अस्थियों को ले जाने के लिए। लोग बेधड़क शमशाम घाट में चले तो आते है मगर उस कमरे मे बिना पंडित जी की इज़ाज़त लिए कोई नहीं जाता। अपने हाथों में मर जाने वाले के नाम का पर्चा लिए वो चले आते और पंडित जी के पास में जाकर उस थैली का ज़ायज़ा लेते की इस तारीख़ वाली थैली कौन सी है और कहाँ पर लटकी है।
आज भी कोई आया अपने किसी रिश्ते की थैली लेने। वो चार लोग थे। पहले वो शमशाम घाट मे बने मन्दिर में आये और पंडित जी के पास गए। अपनी पर्ची दिखाई। पंडित जी ने अपना पत्रा खोला और उसे मरने वाले का नाम बताया उसके बाद उसे तारीख़ बताई और कहा की तुम शिवराम के पास में चले जाओ वो तुम्हे अस्थियों के फूल दे देगा। इतना सुनकर वो चारों शिवराम जी के पास चले गए। शिवराम जी वहीं कमरे के बाहर बनी मुंडेरी के ऊपर बैठे थे। उन चारों में से एक आदमी आया जिसके हाथ मे वो पर्ची थी। उसमे वो पर्ची शिवराम जी को दिखाई।
शिवराम जी ने उन्हैं कहा, "तुम अन्दर जाईये और अन्दर सामने की दिवार पर ये थैली टगीं है। उसे ले लिजिये पर क्या आप कोई समान लाये थे जिसे उनके ऊपर चड़ाया गया था?”
तो उनमे से एक बोला, "नहीं हम कुछ नहीं लाये थे।"
शिवराम जी ने कहा कि आप अन्दर चले जाओ और तारीख़ देखकर अपनी अस्थियाँ ले लो। वहीं सामने वाले दिवार कर टंगी है।
ये सुनकर वो अन्दर जाने लगे और दरवाजे पर खड़े होकर ये देखने लगे की कौन सी सामने वाली दिवार है? चारों ही लोग दरवाजे के सामने खड़े हो गए और पहले जाने वाले के मुँह की तरफ देखने लगे। शिवराम जी ने उनकी तरफ देखा तो वो खुद ही उनके साथ में चले जाने के लिए खड़े हो गए। वो अन्दर गए और सीधा सामने वाली दिवार पर चले गए और वो चारों आये लोग ये देखने लगे की यहाँ तो पहले से ही इतनी अस्थियाँ टंगी है और ये आदमी सीधा सामने वाली दिवार पर चला गया। वैसे देखा जाये तो शिवराम जी को भी नहीं मालूम था की इस तारीख़ की थैली कहाँ पर टंगी है? वो तो महज़ अन्दाजा भरते हुए सामने चले गए थे। तारीख़ थी 2005 की।
शिवराम जी वहाँ पर लटकी सारी थैलियों को अपने हाथों से साफ़ करते और उन्हैं घुमा-घुमाकर देखते कि उनकी तारीख़ कौन सी है। हर थैली को बहुत ही नज़दीक से देखना पड़ता और उस पर पड़ी धूल को साफ़ करना होता। शिवराम जी वहाँ पर सारी थैलियों को देख रहे थे और वो चारों आये लोग वहाँ चुपचाप खड़े थे। बस, चारों दिवारों पर नज़र घुमाते हुए कमरे की बनावट को देख रहे थे। एक कौने मे गड़ी कील पर तीन थैलियाँ टंगी थी तो उन पर शिवराम जी ने अपनी ऊंगलियाँ फैरी और देखा की कौन सी तारीख़,लिंग और किस मोक्षस्थल की ये थैली है। उनमे से एक वही थी जिसे वो ढूँढ रहे थे। काले रंग और धूल की परत ने उसे इतना कठोर बना दिया था कि उसमे किसी के होने का अन्दाजा ख़त्म ही हो गया था समझों। आज पूरे तीन साल जो हो गए थे उन अस्थियों को वहाँ पर टंगे हुए।
शिवराम जी ने उस थैली की गाँठ को खोला और उसे वहाँ से उतारा। अपने हाथों मे लेकर उस पर पड़ी धूल को साफ़ करते हुए उन्होनें वो थैली उन चारों के हाथ में देनी चाही मगर वो चारों में एक आदमी का हाथ आगे बड़ा। उसने अपने दोनों हाथों कि अन्जली बनाई और उस थैली को बड़े प्यार और श्रद्धा से अपने हाथों में ले लिया। उस थैली को वो इस तरह से लेकर आ रहे थे कि जैसे उसमे वो रिश्ता अभी भी जिन्दा है जिसे मुखागनी दे दी गई थी। वो इतने अहिस्ता-अहिस्ता उसे लेकर चले रहे थे के कहीं उस थैली को हिलने से कोई चोट ना लग जाये। एक आदमी के हाथों में वो थी तो दूसरे आदमी ने उसके हाथों के नीचे अपने हाथों को भी रखा हुआ था। लगता था की जैसे वो दोनों का कोई लगता था। अब रिश्ता समझना जरूरी नहीं था। मगर आज कोई विदा हो रहा था इस अन्धेरे और खौफ़नाक कमरे से।
वो चारों लोग अब फिर से पंडित जी के पास में गए और उस थैली को अपने हाथों मे पकड़े पूछने लगे की पंडित जी इसको हम किस तरह से गंगा मे विसर्जन करे और कब करें?
पंडित जी ने उनके आगे सारे पत्रे खोले और कुछ पन्नों पर नक्शे बनाने लगे। थोडी ही देर मे कहने लगे, "इसको गंगा मे विसर्जन करते समय ये देखना की ये किनारे पर ना लगे। इसे बीच में जाकर विसर्जन करना और दोनों हाथों उसे बहाना।"
ये कहकर उन्होनें एक मिट्टी का करवा निकाला और उसमे कुछ फूल और लोंग के दाने डालकर उस थैली मे से अस्थियों को निकाल उस करवे मे डाल दिया। फिर उस ही काले रंग के कपड़े से उस करवे का मुँह बन्द कर दिया और कहा दक्षिंणा दे जाओ और इसे दो दिन से ज़्यादा अपने घर में मत रखना। जल्द से जल्द विसर्जन कर देना। वो चारों लोग उस करवे को लेकर चले गए और शिवराम जी उस काले रंग के कपड़े पर लिखी तारीख़ को मन्दिर में रखे रजिस्टर में से काटने लगे।
अब धीरे-धीर करके कमरा सारी थैलियों से खाली हो जायेगा और डर जैसी चीज वहाँ पर नहीं रहेगी। वो उन लोगों को देखते रहे। कुछ पूजा-पाठ हुआ। उस थैली को लिया और चले गए। एक शख़्स यहाँ इस कमरे से भी विदा हो गया अब पता नहीं कहाँ पर रहेगा?
लख्मी
एक ख़त खुद के नाम
सन 2005
दिल्ली, 110062
इस ख़त की शुरूआत सन 2005 में हो चुकी थी मगर इसमे आने वाले हर अल्फ़ाजों को बाहर आने का रास्ता आज मिल पाया था। इसमे मौज़ूद हर अल्फ़ाज मेरी बेबेसी की कहानी कहते हैं जिसे और अब अपने अन्दर रखने की हिम्मत नहीं है मुझमें।
मैं इस ख़त की शुरूआत कर रहा हूँ। अपनी उस ज़िन्दगी से जो मैं कभी अपने से बाहर नहीं निकाल पाया। एक डर रहा और एक आस।
कुछ भी पहले जैसा नहीं है। सब कुछ बदलता जा रहा है। ये जो आज मेरे साथ हुआ वो पहली बार होने वाला वाक्या नहीं है। जैसे-जैसे वक़्त बितता जा रहा है मैं अपने दिमाग मे कई यादें जमा करता जा रहा हूँ। जिनसे भी मैं मिल रहा हूँ या जिससे भी मैं बातें कर रहा हूँ वो किसी न किसी कारण मेरी यादों में जमा होते जा रहे हैं। हर दिन मेरे साथ में कोई न कोई नया रिश्ता अपने कदम बढ़ा लेता रहा है। इस बात का तो बिलकुल भी अफ़सोस नहीं है और न कोई गिला है मुझे। ये तो बहुत ही खुशी की बात है। तन्हाइयों को बाँटने में और अपनी पहचान बनाने में जीवन के कई साल लग जाते हैं पर फिर भी हम कभी रिश्तों में मुक्म्मलित तरह से परिचित नहीं हो पाते। ये उसके लिए मेरे जीवन में बहुत अनमोल था। लेकिन फिर भी मुझे डर क्यों है? एक ऐसा डर जिसके होने या न होने कोई फ़र्क तो नहीं पड़ने वाला था मुझपर या मेरे जीवित शरीर पर मगर फिर भी धड़कन कभी-कभी अपनी रिद्दम से तेज भागने लगती है।
आज जब मैं अपनी ज़िन्दगी को पलट कर देखता हूँ तो कई लोग मुझे अपने आसपास नज़र आते हैं जिनसे मैं अपनी यादें और अतीत बना पाया हूँ। जो सब मुझे साफ़-साफ़ नजर भी आते हैं पर जो नज़र नहीं आते वो कहाँ है? जो दिखता है उसी को मैं अपनी खुशी ज़ाहिर कर लेता हूँ पर जब मैं वापस पलट के देखता हूँ अपने आज के समय में तो भी कोई नहीं दिखता। क्या यहाँ पर मुझे दोबारा से रिश्ते बनाने होगें? क्या हर बार हम दिमाग को साफ़ कर देते हैं?
इसके बारे में मुझे हाल ही में मालूम हुआ। ये तो एक खेल है। इस खेल को रितियों का नाम देकर मजबूरन करना पड़ता है। जिसमे जीवित या मृत्य दोनों ही भागीदार बनते हैं। बाकि तो सब यहाँ पर चूसा हुआ माल है। जिसमे दोबारा रस़ भरने की उम्मीद तो नहीं मगर आस पर उसे छोड़ दिया गया है।
दिन के पोने बारह बज़ रहे थे। आज के दिन धूप बिलकुल नहीं थी। दोस्त की लाश घर के आगे रखी थी। ये कोई पहली बार देखने वाला नज़ारा तो नहीं था। उसकी लाश पर रोने वालों की कमी नहीं थी। उसके पाँव पकड़कर रोने वाले आज उसको छ़ोडना ही नहीं चाहते थे। किसी अपने नज़दीकी की ज़ुदाई बहुत ही बैरन होती है। रह-रहकर खाती है। उसी को आज सभी महसूस कर रहे थे। पहली नज़र में उसी देख भी नहीं पाया था मैं। सोच रहा था की उसके पास जाकर बैठू तो कहाँ? अगर उसके सिरहाने पर बैठूगाँ तो वो मुझे देख नहीं पायेगा और अगर उसके पाँव की तरफ मे बैठूगाँ तो उसको बूरा लेगा। बस, उसी को खड़े-खड़े मैं देखे जा रहा था। वक़्त इस तरह से सुलघ रहा था उसके सिरहाने में रखी अगरबत्ती हो जो धीमे-धीमे मिट रही थी। मुझमे और मेरी यादों में वो खुशबू नहीं थी की आज उसतक पहुँचा सकूँ। मैं रो नहीं रहा और न ही इतनी ताकत थी मुझमे की किसी रोने वाले को चुप भी करा सकूँ।
अब उसे उठाने का वक़्त आ गया था। इस बार मैंने सबसे पहले अपने कदम बड़ा दिए। जब मैं उसे उठा रहा था तो इक पल के लिए भी मेरे हाथ नहीं कांपे थे। उसके सिरहाने वाला डंडा मैंने अपने काँधो पर उठाया हुआ था। हम उसके घर से आधा किलोमीटर दूर चले आये थे। शमशानघाट सामने ही था। मैं चलता जा रहा था और जब सामने वाली सड़क को देखता तो लोग हमें देखकर अपने हाथ जोड़ लेते और दो-दो कदम हमारे साथ में चल पड़ते। शमशानघाट के कुएँ की एक चौकी पर उसे उतार दिया गया। उसके शव को वहाँ पर रखकर सभी उससे तीन-तीन कदम दूर हो गए। उसके नज़दीक अब सिर्फ उसके पिता जी ही रह थे और बाकि तो उसके लिए वहाँ आई किसी भीड़ से कम न थे। उसे अभी भी वैसा का वैसा ही वहाँ रख हुआ था। एक पंडित वहाँ पर कुछ बोलता तो वहाँ आये उसके घर के कुछ बुर्ज़ुग अपना कुछ कहते। इसी बातों में वो वहाँ पर वैसा ही
8लेटा हुआ था जैसे किसी को जानता ही नहीं है।
अब उसको अपने से कहीं दूर भेजने की क्रिया शुरू हो गई थी। उसके पिता जी ने एक मटके में पानी लिया और उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगे। मटके को अपने काँधो पर उठाये वो उसके चक्कर लगाने लगे और थोड़ा-थोड़ा पानी जमीन पर गिराते भी रहे। ये उसको मोक्ष के लिए तैयार किया जा रहा था। ताकि वो अपने साथ मे किसी भी रिश्ते कि महक भी लेकर ना जाये। जो उसने यहाँ पर लिया वो चाहें किसी की खुशबू हो या महक वो सब यहीं पर उसे धो दिया जायेगा। पंडित जी हर चक्कर के नाम का मंत्र पढ़ते और कहते की "जो पाया वो यहीं पर रह जाये। सारे रिश्ते-नाते और सारे नियम वो सभी तुम्हारे लिए छोड़कर जा रहा हूँ मैं।"
ये उसके शब्द थे जो पंडित जी के मुँह से निकल रहे थे। अब उसे उठाकर अन्दर ले जाया जा रहा था। शमशानघाट के नियम के अनुसार उसे मोक्षस्थल पर लिटा दिया गया। लोग अब भी रो रहे थे। लेकिन अब क्यों जब की अपने रिश्तों और नातों को तो वापस लौटा चुका था। अब 'राम नाम सत्य' की आवाज़ें लगनी बन्द हो गई थी। 'राम नाम' का जाप अब बिलकुल बन्द था शायद राम का नाम लेना अब यहाँ किसी के बस का नहीं था। उसके वहाँ पर कदम रख दिया था। मोक्षस्थल को साफ़ किया जा रहा था। उसके पिता जी लकड़ियों का एक बंडल बना रहे थे और उसके भाई वहाँ मोक्षस्थल की जमीन को साफ़ कर रहे थे।
लकड़ियों पर उसे लिटाया हुआ था। घी, कपूर, समाग्री, कलावे, लकड़ियों का चूरा, सिन्दूर व हल्दी सभी निकाल कर रख दी गई थी। धीरे-धीरे करके पंडित जी जैसा-जैसा कहते जाते उसके पिता जी वैसा ही करते। एक थाली में कपूर की ज्योती जलाई गई। थाली में पड़े सिन्दूर और हल्दी को घोल कर टीका बनाया गया जिसे उसकी अर्थी की लकड़ियों पर लगया जा रहा था। उसके पिता जी बिलकुल शान्त से वो सब करते जा रहे थे। थाली को लेकर एक चक्कर लगाते और उस लकड़ियो के बन्डल में आग लगाते। आखिरी सफ़र शुरू था। सभी उसके नज़दीक आ गए थे। सभी को मालूम था की आखिरी में क्या होता है? मैं भी उसी की तरफ़ में बड़ा। पंडित जी एक तसले में काफ़ी सारे लकड़ियों के छोटे-छोटे टुकडे लेकर आए और सभी ने एक-एक लकड़ी का टुकडा अपने हाथों में उठा लिया था। मैं भी उसी के साथ में वो सब करता जा रहा था। अपने हाथों में लकड़ी का टुकडा लिए खड़ा हो गया। अर्थी में मुखागनी देने से पहले सभी उसकी तरफ़ में बढ़ते और उन लकड़ियों को उसकी अर्थी पर डाल देते और हाथ जोड़कर पीछे की तरफ़ में हो जाते। मंत्रो का जाप चालू ही था। जिसमे होता की हम आज भी तुम्हारे अपने है और हमारा ये प्यार रखले। अपने हिस्से का प्यार और रिश्ता सभी उसके ऊपर से वार रहे थे। ये आखिरी था रिश्ते का वारना उसके बाद तुम हमारी ज़िन्दगी में एक याद बनकर ही रहोगे। जो हमेशा ताज़ा रहेगी।
सभी ने अपने हिस्से का प्यार और सौगात उसके सपूत कर दी थी। जैसे किसी मेहमान के विदा होने पर उसके हाथों में कुछ रख दिया जाता है। अपनी याद को ताज़ा रखने के लिए। मगर शायद ये ज़्यादा दिन तक ज़िन्दा नहीं रहता। उसके किसी और दौर में जाने के बाद में वो भूली-बिसरी कहानी हो जाती है। जिनको गढ़े मुर्दे कहा जाता है। बहुत ही दूर चले गए थे सभी। बस, दूर से ही उसके जलते शरीर को देख रहे थे। लकड़ियों से निकलती आग की लपटों में वो नज़र भी नहीं आ रहा था। इतनी तेज भाप थी की आग सभी को पीछे धकेल रही थी। उसके जलने के बाद जैसे सारे नाते अब ख़त्म हो चुके थे। पंडित जी अब भी वहीं पर खड़े थे। वो जिस अर्थी में उसको लाया गया था उसमे से किसी मजबूत डंडे को निकाल रहे थे। थोड़ी देर के बाद में उन्होंने एक लम्बा और बहुत ही मजबूत डंडा निकाला और उस जलती आग में दे दिया। वो शायद कुछ निकाल रहे थे। डंडा मारते और लकड़ियों को खिसकाते हुए उन्होंने उसके सिर को निकाल दिया था। फिर उन्होंने बहुत ही जोर से उसके जलते सिर में उस डंडे को घूसा दिया था। वो सिर टूट गया था उसका एक हिस्सा तो बाहर की तरफ भी निकल आया था तो उन्होंने उसे उसी डंडे से अन्दर की तरफ में खिसका दिया और यहाँ बाकि लोगों के पास में आकर खड़े हो गए।
मेरे साथ मे खड़े लोग उसे देखकर हाथ जोड़ रहे थे। कोई कह रहा था की वैसे तो सिर किसी-किसी का अपने आप ही चटक जाता है मगर इसका नहीं चटका। बहुत प्यार करता था ये अपने परिवार को जो उसकी यादों को अपने साथ मे ले जाना चाहता था। मगर ऐसा हो नहीं सकता इसे जाना तो बिना यादों की है। नहीं तो पिछले जन्म की यादों मे ये ठीक-ठाक दिमाग नहीं ले पायेगा। उसके सिर को टूटते ही सभी उसकी तरफ में आगे बढ़े और अपने हाथों मे एक-एक पत्थर उठाया और उस जलती चिता की तरफ में अपनी पीठ करके उस पत्थर को अपने सिर से पीछे की तरफ में फैंक देते।
ऐसा सभी कर रहे थे। उसके घर वाले भी। मेरे हाथों मे एक नहीं कई पत्थर थे। क्योंकि मेरे साथ उसकी एक याद नहीं थी। काफ़ी सारी यादें तो ऐसी थी जिसे घंटो बैठकर बातों में दोहराया था हमने। पंडित जी ने उसके सिर पर तो डंडा मार कर उसे यादों से और चेहरो से मुक़्त कर दिया था मगर हमारे सिरो में डंडा कौन मारेगा? ये चेहरा जो हमारे दिमाग मे बसा है और यादें जो दिल मे समाई है उसे कौन मुक़्त करेगा? क्या कोई उपाए है हमारे लिए। कितने पत्थर फैंकता मैं? वहाँ पर ऐसा कोई भी नहीं था जिसमे ये रितियाँ न की हो और न ही कोई ऐसा था की जिसने ये पत्थर न फैंका हो। वो अब भी जल रहा था। वो किसी के साथ न आ जाए इसका डर था यहाँ पर हर किसी को। ये क्या नितियाँ थी। मरने के बाद में सभी अच्छे हो जाए है ये उसके घर के सामने गाया जा रहा था। मगर यहाँ पर ये डर था कि कहीं वो पीछे न चले आये।
उसके पिता जी पत्थर फैंक नहीं पा रहे थे। वो पत्थर को उठा नहीं पा रहे थे। अब आकर रोये थे वो। एक ग्राम का वो पत्थर उनके लिए कई किलो के बराबर था। उस पत्थर को अपने ऊपर से वारना आसान नहीं था। उसका भाई बहुत रो रहा था। "पिता जी हमारा भईया गया हमें छोड़कर अब वो नहीं आयेगा" कहता हुआ बहुत जोर से रो रहा था। उसके पिता जी वो पत्थर फैंक नहीं पाये थे। सभी चले गए थे वहाँ से अब तक। खाली पंडित जी उसके पिता जी को समझाने में लगे थे।
मेरे हाथों के पत्थर मेरे पास ही थे। आज कोई भी ऐसा काम नहीं था जो मैं बहुत विश्वास से कर पाया था। ये खेल था जिसमे मैं अकेला ही खेल रहा था। मगर इसमे भी मैं हारा ही था। खूद से।
तुम्हारा...
लख्मी
दिल्ली, 110062
इस ख़त की शुरूआत सन 2005 में हो चुकी थी मगर इसमे आने वाले हर अल्फ़ाजों को बाहर आने का रास्ता आज मिल पाया था। इसमे मौज़ूद हर अल्फ़ाज मेरी बेबेसी की कहानी कहते हैं जिसे और अब अपने अन्दर रखने की हिम्मत नहीं है मुझमें।
मैं इस ख़त की शुरूआत कर रहा हूँ। अपनी उस ज़िन्दगी से जो मैं कभी अपने से बाहर नहीं निकाल पाया। एक डर रहा और एक आस।
कुछ भी पहले जैसा नहीं है। सब कुछ बदलता जा रहा है। ये जो आज मेरे साथ हुआ वो पहली बार होने वाला वाक्या नहीं है। जैसे-जैसे वक़्त बितता जा रहा है मैं अपने दिमाग मे कई यादें जमा करता जा रहा हूँ। जिनसे भी मैं मिल रहा हूँ या जिससे भी मैं बातें कर रहा हूँ वो किसी न किसी कारण मेरी यादों में जमा होते जा रहे हैं। हर दिन मेरे साथ में कोई न कोई नया रिश्ता अपने कदम बढ़ा लेता रहा है। इस बात का तो बिलकुल भी अफ़सोस नहीं है और न कोई गिला है मुझे। ये तो बहुत ही खुशी की बात है। तन्हाइयों को बाँटने में और अपनी पहचान बनाने में जीवन के कई साल लग जाते हैं पर फिर भी हम कभी रिश्तों में मुक्म्मलित तरह से परिचित नहीं हो पाते। ये उसके लिए मेरे जीवन में बहुत अनमोल था। लेकिन फिर भी मुझे डर क्यों है? एक ऐसा डर जिसके होने या न होने कोई फ़र्क तो नहीं पड़ने वाला था मुझपर या मेरे जीवित शरीर पर मगर फिर भी धड़कन कभी-कभी अपनी रिद्दम से तेज भागने लगती है।
आज जब मैं अपनी ज़िन्दगी को पलट कर देखता हूँ तो कई लोग मुझे अपने आसपास नज़र आते हैं जिनसे मैं अपनी यादें और अतीत बना पाया हूँ। जो सब मुझे साफ़-साफ़ नजर भी आते हैं पर जो नज़र नहीं आते वो कहाँ है? जो दिखता है उसी को मैं अपनी खुशी ज़ाहिर कर लेता हूँ पर जब मैं वापस पलट के देखता हूँ अपने आज के समय में तो भी कोई नहीं दिखता। क्या यहाँ पर मुझे दोबारा से रिश्ते बनाने होगें? क्या हर बार हम दिमाग को साफ़ कर देते हैं?
इसके बारे में मुझे हाल ही में मालूम हुआ। ये तो एक खेल है। इस खेल को रितियों का नाम देकर मजबूरन करना पड़ता है। जिसमे जीवित या मृत्य दोनों ही भागीदार बनते हैं। बाकि तो सब यहाँ पर चूसा हुआ माल है। जिसमे दोबारा रस़ भरने की उम्मीद तो नहीं मगर आस पर उसे छोड़ दिया गया है।
दिन के पोने बारह बज़ रहे थे। आज के दिन धूप बिलकुल नहीं थी। दोस्त की लाश घर के आगे रखी थी। ये कोई पहली बार देखने वाला नज़ारा तो नहीं था। उसकी लाश पर रोने वालों की कमी नहीं थी। उसके पाँव पकड़कर रोने वाले आज उसको छ़ोडना ही नहीं चाहते थे। किसी अपने नज़दीकी की ज़ुदाई बहुत ही बैरन होती है। रह-रहकर खाती है। उसी को आज सभी महसूस कर रहे थे। पहली नज़र में उसी देख भी नहीं पाया था मैं। सोच रहा था की उसके पास जाकर बैठू तो कहाँ? अगर उसके सिरहाने पर बैठूगाँ तो वो मुझे देख नहीं पायेगा और अगर उसके पाँव की तरफ मे बैठूगाँ तो उसको बूरा लेगा। बस, उसी को खड़े-खड़े मैं देखे जा रहा था। वक़्त इस तरह से सुलघ रहा था उसके सिरहाने में रखी अगरबत्ती हो जो धीमे-धीमे मिट रही थी। मुझमे और मेरी यादों में वो खुशबू नहीं थी की आज उसतक पहुँचा सकूँ। मैं रो नहीं रहा और न ही इतनी ताकत थी मुझमे की किसी रोने वाले को चुप भी करा सकूँ।
अब उसे उठाने का वक़्त आ गया था। इस बार मैंने सबसे पहले अपने कदम बड़ा दिए। जब मैं उसे उठा रहा था तो इक पल के लिए भी मेरे हाथ नहीं कांपे थे। उसके सिरहाने वाला डंडा मैंने अपने काँधो पर उठाया हुआ था। हम उसके घर से आधा किलोमीटर दूर चले आये थे। शमशानघाट सामने ही था। मैं चलता जा रहा था और जब सामने वाली सड़क को देखता तो लोग हमें देखकर अपने हाथ जोड़ लेते और दो-दो कदम हमारे साथ में चल पड़ते। शमशानघाट के कुएँ की एक चौकी पर उसे उतार दिया गया। उसके शव को वहाँ पर रखकर सभी उससे तीन-तीन कदम दूर हो गए। उसके नज़दीक अब सिर्फ उसके पिता जी ही रह थे और बाकि तो उसके लिए वहाँ आई किसी भीड़ से कम न थे। उसे अभी भी वैसा का वैसा ही वहाँ रख हुआ था। एक पंडित वहाँ पर कुछ बोलता तो वहाँ आये उसके घर के कुछ बुर्ज़ुग अपना कुछ कहते। इसी बातों में वो वहाँ पर वैसा ही
8लेटा हुआ था जैसे किसी को जानता ही नहीं है।
अब उसको अपने से कहीं दूर भेजने की क्रिया शुरू हो गई थी। उसके पिता जी ने एक मटके में पानी लिया और उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगे। मटके को अपने काँधो पर उठाये वो उसके चक्कर लगाने लगे और थोड़ा-थोड़ा पानी जमीन पर गिराते भी रहे। ये उसको मोक्ष के लिए तैयार किया जा रहा था। ताकि वो अपने साथ मे किसी भी रिश्ते कि महक भी लेकर ना जाये। जो उसने यहाँ पर लिया वो चाहें किसी की खुशबू हो या महक वो सब यहीं पर उसे धो दिया जायेगा। पंडित जी हर चक्कर के नाम का मंत्र पढ़ते और कहते की "जो पाया वो यहीं पर रह जाये। सारे रिश्ते-नाते और सारे नियम वो सभी तुम्हारे लिए छोड़कर जा रहा हूँ मैं।"
ये उसके शब्द थे जो पंडित जी के मुँह से निकल रहे थे। अब उसे उठाकर अन्दर ले जाया जा रहा था। शमशानघाट के नियम के अनुसार उसे मोक्षस्थल पर लिटा दिया गया। लोग अब भी रो रहे थे। लेकिन अब क्यों जब की अपने रिश्तों और नातों को तो वापस लौटा चुका था। अब 'राम नाम सत्य' की आवाज़ें लगनी बन्द हो गई थी। 'राम नाम' का जाप अब बिलकुल बन्द था शायद राम का नाम लेना अब यहाँ किसी के बस का नहीं था। उसके वहाँ पर कदम रख दिया था। मोक्षस्थल को साफ़ किया जा रहा था। उसके पिता जी लकड़ियों का एक बंडल बना रहे थे और उसके भाई वहाँ मोक्षस्थल की जमीन को साफ़ कर रहे थे।
लकड़ियों पर उसे लिटाया हुआ था। घी, कपूर, समाग्री, कलावे, लकड़ियों का चूरा, सिन्दूर व हल्दी सभी निकाल कर रख दी गई थी। धीरे-धीरे करके पंडित जी जैसा-जैसा कहते जाते उसके पिता जी वैसा ही करते। एक थाली में कपूर की ज्योती जलाई गई। थाली में पड़े सिन्दूर और हल्दी को घोल कर टीका बनाया गया जिसे उसकी अर्थी की लकड़ियों पर लगया जा रहा था। उसके पिता जी बिलकुल शान्त से वो सब करते जा रहे थे। थाली को लेकर एक चक्कर लगाते और उस लकड़ियो के बन्डल में आग लगाते। आखिरी सफ़र शुरू था। सभी उसके नज़दीक आ गए थे। सभी को मालूम था की आखिरी में क्या होता है? मैं भी उसी की तरफ़ में बड़ा। पंडित जी एक तसले में काफ़ी सारे लकड़ियों के छोटे-छोटे टुकडे लेकर आए और सभी ने एक-एक लकड़ी का टुकडा अपने हाथों में उठा लिया था। मैं भी उसी के साथ में वो सब करता जा रहा था। अपने हाथों में लकड़ी का टुकडा लिए खड़ा हो गया। अर्थी में मुखागनी देने से पहले सभी उसकी तरफ़ में बढ़ते और उन लकड़ियों को उसकी अर्थी पर डाल देते और हाथ जोड़कर पीछे की तरफ़ में हो जाते। मंत्रो का जाप चालू ही था। जिसमे होता की हम आज भी तुम्हारे अपने है और हमारा ये प्यार रखले। अपने हिस्से का प्यार और रिश्ता सभी उसके ऊपर से वार रहे थे। ये आखिरी था रिश्ते का वारना उसके बाद तुम हमारी ज़िन्दगी में एक याद बनकर ही रहोगे। जो हमेशा ताज़ा रहेगी।
सभी ने अपने हिस्से का प्यार और सौगात उसके सपूत कर दी थी। जैसे किसी मेहमान के विदा होने पर उसके हाथों में कुछ रख दिया जाता है। अपनी याद को ताज़ा रखने के लिए। मगर शायद ये ज़्यादा दिन तक ज़िन्दा नहीं रहता। उसके किसी और दौर में जाने के बाद में वो भूली-बिसरी कहानी हो जाती है। जिनको गढ़े मुर्दे कहा जाता है। बहुत ही दूर चले गए थे सभी। बस, दूर से ही उसके जलते शरीर को देख रहे थे। लकड़ियों से निकलती आग की लपटों में वो नज़र भी नहीं आ रहा था। इतनी तेज भाप थी की आग सभी को पीछे धकेल रही थी। उसके जलने के बाद जैसे सारे नाते अब ख़त्म हो चुके थे। पंडित जी अब भी वहीं पर खड़े थे। वो जिस अर्थी में उसको लाया गया था उसमे से किसी मजबूत डंडे को निकाल रहे थे। थोड़ी देर के बाद में उन्होंने एक लम्बा और बहुत ही मजबूत डंडा निकाला और उस जलती आग में दे दिया। वो शायद कुछ निकाल रहे थे। डंडा मारते और लकड़ियों को खिसकाते हुए उन्होंने उसके सिर को निकाल दिया था। फिर उन्होंने बहुत ही जोर से उसके जलते सिर में उस डंडे को घूसा दिया था। वो सिर टूट गया था उसका एक हिस्सा तो बाहर की तरफ भी निकल आया था तो उन्होंने उसे उसी डंडे से अन्दर की तरफ में खिसका दिया और यहाँ बाकि लोगों के पास में आकर खड़े हो गए।
मेरे साथ मे खड़े लोग उसे देखकर हाथ जोड़ रहे थे। कोई कह रहा था की वैसे तो सिर किसी-किसी का अपने आप ही चटक जाता है मगर इसका नहीं चटका। बहुत प्यार करता था ये अपने परिवार को जो उसकी यादों को अपने साथ मे ले जाना चाहता था। मगर ऐसा हो नहीं सकता इसे जाना तो बिना यादों की है। नहीं तो पिछले जन्म की यादों मे ये ठीक-ठाक दिमाग नहीं ले पायेगा। उसके सिर को टूटते ही सभी उसकी तरफ में आगे बढ़े और अपने हाथों मे एक-एक पत्थर उठाया और उस जलती चिता की तरफ में अपनी पीठ करके उस पत्थर को अपने सिर से पीछे की तरफ में फैंक देते।
ऐसा सभी कर रहे थे। उसके घर वाले भी। मेरे हाथों मे एक नहीं कई पत्थर थे। क्योंकि मेरे साथ उसकी एक याद नहीं थी। काफ़ी सारी यादें तो ऐसी थी जिसे घंटो बैठकर बातों में दोहराया था हमने। पंडित जी ने उसके सिर पर तो डंडा मार कर उसे यादों से और चेहरो से मुक़्त कर दिया था मगर हमारे सिरो में डंडा कौन मारेगा? ये चेहरा जो हमारे दिमाग मे बसा है और यादें जो दिल मे समाई है उसे कौन मुक़्त करेगा? क्या कोई उपाए है हमारे लिए। कितने पत्थर फैंकता मैं? वहाँ पर ऐसा कोई भी नहीं था जिसमे ये रितियाँ न की हो और न ही कोई ऐसा था की जिसने ये पत्थर न फैंका हो। वो अब भी जल रहा था। वो किसी के साथ न आ जाए इसका डर था यहाँ पर हर किसी को। ये क्या नितियाँ थी। मरने के बाद में सभी अच्छे हो जाए है ये उसके घर के सामने गाया जा रहा था। मगर यहाँ पर ये डर था कि कहीं वो पीछे न चले आये।
उसके पिता जी पत्थर फैंक नहीं पा रहे थे। वो पत्थर को उठा नहीं पा रहे थे। अब आकर रोये थे वो। एक ग्राम का वो पत्थर उनके लिए कई किलो के बराबर था। उस पत्थर को अपने ऊपर से वारना आसान नहीं था। उसका भाई बहुत रो रहा था। "पिता जी हमारा भईया गया हमें छोड़कर अब वो नहीं आयेगा" कहता हुआ बहुत जोर से रो रहा था। उसके पिता जी वो पत्थर फैंक नहीं पाये थे। सभी चले गए थे वहाँ से अब तक। खाली पंडित जी उसके पिता जी को समझाने में लगे थे।
मेरे हाथों के पत्थर मेरे पास ही थे। आज कोई भी ऐसा काम नहीं था जो मैं बहुत विश्वास से कर पाया था। ये खेल था जिसमे मैं अकेला ही खेल रहा था। मगर इसमे भी मैं हारा ही था। खूद से।
तुम्हारा...
लख्मी
Wednesday, February 4, 2009
सहमति की ज़ुबान
कल मेरी दोस्त बुशरा से फिर मुलाकात हुई, इस बार उसकी ज़ुबान में सहनशीलता थी। कई बातों से सहमति और कई बातों मे आश्चर्यजनक इच्छा भी। उसकी सहमति पूरी तरह से किसी भी बात को मान लेने वाली राह न थी। इस सहमति में कई आशाएँ छुपी थी जिसमे आने वाली संभावनाये विरोध मे भी जा सकती थी और अपनी ज़ुबान मे लौक भी हो सकती थी।
सहमति में चलने वाला दौर, ज़्यादातर बहुत चीज़ों को अपनाकर जीता है। जो अपने अपनाने को खुला छोड़ देता है। जिसमें अपनाने वाली चीज़ कभी भी अपना रूप बदल सकती है। ये न तो संधि होती है, न ही राज़ी होना और न ही कबूल करना। इन शब्दों में नज़र आने वाली छवि बेहद पैक होती है। इसके रूप के साथ बहस और संभावनाये घूम नहीं सकती। ये हम अक्सर मानकर चलते हैं।
सहमति में ऐसा नहीं होता। सहमति कई तरह की आशाएँ और संभावनाये खोले रखती है, बदलती है, बोलती है, ताना कसती है, छेड़ती है, पैक होती है तो कभी अपने ही जीवन के तर्क जोड़ देती है। कबूलना, संधि और राज़ी होना न मानकर भी किया जाने वाला फैसला बनकर उभरकर आता है जिसमे बदलाव की अन्य गुंजाइशे बाकी नहीं होती।
शब्दों के इस खेल में शख़्सियतें नाचती हैं। अपना आशियाना बनाती हैं जो इन शब्दों से रूप पाती हैं।
बुशरा की एक दिक्कत है वो अगर कोई बात छुपाना भी चाहे तो भी नहीं छुपा पाती। उसके शब्दों से उसके चेहरे के भाव मेल नहीं खाते। अकेले हमेशा किसी न किसी चीज़ को खोजती रहती है और शब्द लिखते हुए ज़ुबान का कोई छोर बना लेती है। उसकी आँखों की बैचेनी में ऐसा लगता है जैसे हर वक़्त कोई तलाश चलती रहती है। वो अपने मन में सवालों को रख नहीं पाती। सवालों के साथ रिश्ता कहकर-जवाब पाना नहीं होता। ये आसपास को बनाते हैं और आसपास उसको बनाता है। ये दो अलग तरह के चित्र जुड़ाव रखते हैं।
सवाल, अपने नज़दीक चलते माहौल में उतारने और उससे पार पाने की नइया नहीं है। सवाल उसके नज़दीक और बेहद नज़दीक बनाते माहौल और आसपास को बनाने वाले दौर बनते हैं। जो अपने में सभी कुछ खींचकर कोई आकार बना डालते हैं। कुछ सवाल अपने लिए भी होते हैं पर सवाल कभी बेचित्र नहीं होते। बस, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि उनमें चेहरे बदलते रहते हैं।
ये छुपाना उसके बस का नहीं है। अगर छुपाना भी चाहे तो भी छुपा नहीं सकती। ये उसकी फित्तरत और अंदाज में शामिल नहीं है। भले ही वो जब अपने माहौल या चुने हुए कोनों मे वापस चली जाती होगी तो उसकी छवि का नाता उसकी फित्तरत और अंदाज से कोई जुड़ाव नहीं रखता होगा। मगर ये सोचना अपनी बात की माफी माँगने के समान होगा। फित्तरत और अंदाज में कई भाव बेरंग और बदरंग होते हैं। जिनका जिक्र हमें दूर किनारों मे फैंक देता है। जहाँ से वापस लौटना मुश्किल होता है। क्योंकि उसकी दूरी का अनुमान लगाना बेहद कठीन है।
उसकी ज़ुबान में बैचेनी कुछ तलाश रही थी। वो बोली, “ये छुपाना क्या होता है?, छुपाना हमें क्या बतलाता है?, क्या इसका कोई सही मायना है? क्योंकि मैं जो सोचती हूँ और आसपास में देखती हूँ वो इसे गहराई मे डाल देता है।"
ये कहकर वो चुप हो गई, थोड़ी देर के बाद में फिर से बोली "हमारे यहाँ, बस्ती के बाहर से कई रैलियाँ निकलती हैं। हर बार नई ही भीड़ देखने को मिलती है। कभी रैलियाँ तेजी से निकल जाती हैं तो कभी कहीं पर रूकी सी रह जाती हैं। नया ही शौर बस्ती के बाहर लगा दिखाई देता है। लेकिन इन सब में ये 'छुपाना' शब्द मेरे दिमाग में अटक जाता है। कई बार बाहर बस्ती के सामने से निकलने वाली रैलियों में हमारी बस्ती को छुपा दिया जाता है। सामने से निकलते समय एक बड़ा सा पर्दा लगाकर बस्ती को ढ़क दिया जाता है। क्या मैं इस छुपाने को समझ सकती हूँ? हमारा अस्त्तिव कहाँ है? हम जिस जगह के लिए सारा झगड़ा करते हैं, लड़ते हैं, हक माँगते हैं ये सब किसके लिए है? एक टाइम के बाद मे ये बस्ती भी विस्थापित कर दी जायेगी तो हम किन शब्दों मे बोलेगें कि बस्ती का रूप ये है? खाली काग़जात ही हमारी पहचान है, लेकिन जब हमारे पास काग़जात होते है और घर मे कोई नहीं होता तो? ये सवाल खाली डब्बा बनकर रह जाता हैं। ये सफेद रंग का पर्दा आँखों पर छाया सा लगता है। इसको कैसे सोचूँ? हमारी बस्ती मे रहने वाले लोगों को इस बात से कोई दिक्कत नहीं है। सभी मस्त हैं, जी रहे हैं, उस पर्दे के पीछे से ये भी देख लेते हैं कि रैलियों मे क्या निकाला जा रहा है? और बड़े खुश भी होते हैं। कभी-कभी तो बहुत से लोग इस पर्दे के सामने अपनी दुकानें भी लगा लेते हैं। ये पर्दा हमारी बस्ती की आम दिनचर्रा में जुड़ गया है। वैसे कहने को यहाँ पर सोचने के लायक बहुत सी चीज़ें, बातें, माहौल और अवधारणायें हैं, उनमे ये भी अपनी जगह बना लेती है। मेरे लिए ये कभी आम सी बात नहीं बनी क्यों? क्या मैं इनसे अलग हूँ या मेरे पास वो अंदाज़ नहीं है जीने के जो सब कुछ भूलकर अपने मे खो जाते हैं।"
बुशरा की कही बात कोई उसकी जगह के लिए ही नहीं थी। ये छुपाना हो या छुपा देना। दोनों ही अलग-अलग क्यों न हो लेकिन किसी जगह या उसके जीवन के लिए ये एक ही ज़ुबान का काम करते हैं। कितने मासुम और छोटे से शब्द हैं ये दोनों लेकिन असल ज़िन्दगी में अपनी छाप को बेहद गहरा छोड़ देते हैं। हम इन शब्दों से खेल चुके हैं, अपने जीवन के उन दिनों मे जब हमें शायद इन शब्दों के मायने भी नहीं पता थे। ये खाली उस खेल की तरह से होते जो दोस्तों को आश्चर्यजनक और जमा करने के लिए कोई गुट बनाते। लेकिन ये अब खेल नहीं रहे। इनके मायने कुछ और हो गए हैं, बुशरा के जीवन मे इनके मायने बने-बनाये नहीं है बल्कि बना दिए गए हैं।
मेरे लिए जो सवाल बना वो था, हमें कैसे पता है कि हमारी जगह शहर से जुड़ी हुई है? बिना काग़जात, काम और रिश्तों को अपनी ज़िन्दगी से जोड़े हुए।
कहने को तो हम कह सकते हैं कि हमारी जगह से कई वो जगहें जुड़ी हैं जो हमारी पड़ोस कहलाती है। वो लोग जुड़े हैं जो हमें खोजते हुए आते हैं और वो कार्यक्रम जुड़े हैं जो बाहर सड़कों से गुजरते हैं। लेकिन फिर दूसरा सवाल ये बनता है कि इन सभी का हमारी जगह के होने या न होने से क्या फ़र्क पड़ता है?
हम ये मानकर चलते हैं कि हमारे पड़ोस में बसी जगहें शहर कहलाती हैं। हम भी किसी के लिए शहर हैं, इसमे ये कह देना ही काफी नहीं रहता। वे लोग जो हमें खोजते हुए आते हैं उनके साथ हमारी किसी न किसी छाप का पैमाना जुड़ा होता है। ये छाप या तो हमने छोड़ी है या मुलाकात का कोई असर कहीं ठहरा रह गया है।
छाप छोड़ना क्या होता है? इस छाप मे क्या-क्या शामिल होता है? कहते हैं हर कोई अपनी होने के सबूत छोड़ता है। दोस्तों की महफ़िलों में, रिश्तों में, जगहों में, सफ़र में हर कोई अपनी कोई न कोई छाप छोड़ता हुआ चलता है।
शायद जगहों ने भी अपनी छाप छोड़ी है, वे क्या है? हम अपनी खुद की जगहों को कैसे शहर की कगार, भागदौड़ और ठहराव मे देखते हैं? ये सवाल शायद उन जगहों के लिए नहीं बना जिनके टूटने के कोई आसार नहीं हैं। लेकिन उन जगहों मे बेखौफ़ घुस जाता है जिनके आसार रोज़ाना पनपते हैं और रोज़ाना मर जाते हैं। ये जगहें हैं बस्तियाँ जिसमे में बुशरा रहती है। वे अपनी जगह को कुछ ऐसे सवालों से देखती है। कभी टूटती है तो कभी बन जाती है। लेकिन जीने की आस कभी ख़त्म नहीं होती। यही जीने की आस शहर से उसको जोड़े रखती है। इस आस का असल में रूप क्या है वे न तो उसे पता है और न ही किसी और को। इसी रिद्दम मे तैरते रहना ही इस जगह को अपना रूप बनाने की चेष्टा देता है।
वो पर्दे के पीछे की दुनिया में जीना और पर्दे के सामने आकर अपनी दुनिया बनाना। ये जद्दोजहद चलती रहती है। यही जीवन है।
लख्मी
सहमति में चलने वाला दौर, ज़्यादातर बहुत चीज़ों को अपनाकर जीता है। जो अपने अपनाने को खुला छोड़ देता है। जिसमें अपनाने वाली चीज़ कभी भी अपना रूप बदल सकती है। ये न तो संधि होती है, न ही राज़ी होना और न ही कबूल करना। इन शब्दों में नज़र आने वाली छवि बेहद पैक होती है। इसके रूप के साथ बहस और संभावनाये घूम नहीं सकती। ये हम अक्सर मानकर चलते हैं।
सहमति में ऐसा नहीं होता। सहमति कई तरह की आशाएँ और संभावनाये खोले रखती है, बदलती है, बोलती है, ताना कसती है, छेड़ती है, पैक होती है तो कभी अपने ही जीवन के तर्क जोड़ देती है। कबूलना, संधि और राज़ी होना न मानकर भी किया जाने वाला फैसला बनकर उभरकर आता है जिसमे बदलाव की अन्य गुंजाइशे बाकी नहीं होती।
शब्दों के इस खेल में शख़्सियतें नाचती हैं। अपना आशियाना बनाती हैं जो इन शब्दों से रूप पाती हैं।
बुशरा की एक दिक्कत है वो अगर कोई बात छुपाना भी चाहे तो भी नहीं छुपा पाती। उसके शब्दों से उसके चेहरे के भाव मेल नहीं खाते। अकेले हमेशा किसी न किसी चीज़ को खोजती रहती है और शब्द लिखते हुए ज़ुबान का कोई छोर बना लेती है। उसकी आँखों की बैचेनी में ऐसा लगता है जैसे हर वक़्त कोई तलाश चलती रहती है। वो अपने मन में सवालों को रख नहीं पाती। सवालों के साथ रिश्ता कहकर-जवाब पाना नहीं होता। ये आसपास को बनाते हैं और आसपास उसको बनाता है। ये दो अलग तरह के चित्र जुड़ाव रखते हैं।
सवाल, अपने नज़दीक चलते माहौल में उतारने और उससे पार पाने की नइया नहीं है। सवाल उसके नज़दीक और बेहद नज़दीक बनाते माहौल और आसपास को बनाने वाले दौर बनते हैं। जो अपने में सभी कुछ खींचकर कोई आकार बना डालते हैं। कुछ सवाल अपने लिए भी होते हैं पर सवाल कभी बेचित्र नहीं होते। बस, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि उनमें चेहरे बदलते रहते हैं।
ये छुपाना उसके बस का नहीं है। अगर छुपाना भी चाहे तो भी छुपा नहीं सकती। ये उसकी फित्तरत और अंदाज में शामिल नहीं है। भले ही वो जब अपने माहौल या चुने हुए कोनों मे वापस चली जाती होगी तो उसकी छवि का नाता उसकी फित्तरत और अंदाज से कोई जुड़ाव नहीं रखता होगा। मगर ये सोचना अपनी बात की माफी माँगने के समान होगा। फित्तरत और अंदाज में कई भाव बेरंग और बदरंग होते हैं। जिनका जिक्र हमें दूर किनारों मे फैंक देता है। जहाँ से वापस लौटना मुश्किल होता है। क्योंकि उसकी दूरी का अनुमान लगाना बेहद कठीन है।
उसकी ज़ुबान में बैचेनी कुछ तलाश रही थी। वो बोली, “ये छुपाना क्या होता है?, छुपाना हमें क्या बतलाता है?, क्या इसका कोई सही मायना है? क्योंकि मैं जो सोचती हूँ और आसपास में देखती हूँ वो इसे गहराई मे डाल देता है।"
ये कहकर वो चुप हो गई, थोड़ी देर के बाद में फिर से बोली "हमारे यहाँ, बस्ती के बाहर से कई रैलियाँ निकलती हैं। हर बार नई ही भीड़ देखने को मिलती है। कभी रैलियाँ तेजी से निकल जाती हैं तो कभी कहीं पर रूकी सी रह जाती हैं। नया ही शौर बस्ती के बाहर लगा दिखाई देता है। लेकिन इन सब में ये 'छुपाना' शब्द मेरे दिमाग में अटक जाता है। कई बार बाहर बस्ती के सामने से निकलने वाली रैलियों में हमारी बस्ती को छुपा दिया जाता है। सामने से निकलते समय एक बड़ा सा पर्दा लगाकर बस्ती को ढ़क दिया जाता है। क्या मैं इस छुपाने को समझ सकती हूँ? हमारा अस्त्तिव कहाँ है? हम जिस जगह के लिए सारा झगड़ा करते हैं, लड़ते हैं, हक माँगते हैं ये सब किसके लिए है? एक टाइम के बाद मे ये बस्ती भी विस्थापित कर दी जायेगी तो हम किन शब्दों मे बोलेगें कि बस्ती का रूप ये है? खाली काग़जात ही हमारी पहचान है, लेकिन जब हमारे पास काग़जात होते है और घर मे कोई नहीं होता तो? ये सवाल खाली डब्बा बनकर रह जाता हैं। ये सफेद रंग का पर्दा आँखों पर छाया सा लगता है। इसको कैसे सोचूँ? हमारी बस्ती मे रहने वाले लोगों को इस बात से कोई दिक्कत नहीं है। सभी मस्त हैं, जी रहे हैं, उस पर्दे के पीछे से ये भी देख लेते हैं कि रैलियों मे क्या निकाला जा रहा है? और बड़े खुश भी होते हैं। कभी-कभी तो बहुत से लोग इस पर्दे के सामने अपनी दुकानें भी लगा लेते हैं। ये पर्दा हमारी बस्ती की आम दिनचर्रा में जुड़ गया है। वैसे कहने को यहाँ पर सोचने के लायक बहुत सी चीज़ें, बातें, माहौल और अवधारणायें हैं, उनमे ये भी अपनी जगह बना लेती है। मेरे लिए ये कभी आम सी बात नहीं बनी क्यों? क्या मैं इनसे अलग हूँ या मेरे पास वो अंदाज़ नहीं है जीने के जो सब कुछ भूलकर अपने मे खो जाते हैं।"
बुशरा की कही बात कोई उसकी जगह के लिए ही नहीं थी। ये छुपाना हो या छुपा देना। दोनों ही अलग-अलग क्यों न हो लेकिन किसी जगह या उसके जीवन के लिए ये एक ही ज़ुबान का काम करते हैं। कितने मासुम और छोटे से शब्द हैं ये दोनों लेकिन असल ज़िन्दगी में अपनी छाप को बेहद गहरा छोड़ देते हैं। हम इन शब्दों से खेल चुके हैं, अपने जीवन के उन दिनों मे जब हमें शायद इन शब्दों के मायने भी नहीं पता थे। ये खाली उस खेल की तरह से होते जो दोस्तों को आश्चर्यजनक और जमा करने के लिए कोई गुट बनाते। लेकिन ये अब खेल नहीं रहे। इनके मायने कुछ और हो गए हैं, बुशरा के जीवन मे इनके मायने बने-बनाये नहीं है बल्कि बना दिए गए हैं।
मेरे लिए जो सवाल बना वो था, हमें कैसे पता है कि हमारी जगह शहर से जुड़ी हुई है? बिना काग़जात, काम और रिश्तों को अपनी ज़िन्दगी से जोड़े हुए।
कहने को तो हम कह सकते हैं कि हमारी जगह से कई वो जगहें जुड़ी हैं जो हमारी पड़ोस कहलाती है। वो लोग जुड़े हैं जो हमें खोजते हुए आते हैं और वो कार्यक्रम जुड़े हैं जो बाहर सड़कों से गुजरते हैं। लेकिन फिर दूसरा सवाल ये बनता है कि इन सभी का हमारी जगह के होने या न होने से क्या फ़र्क पड़ता है?
हम ये मानकर चलते हैं कि हमारे पड़ोस में बसी जगहें शहर कहलाती हैं। हम भी किसी के लिए शहर हैं, इसमे ये कह देना ही काफी नहीं रहता। वे लोग जो हमें खोजते हुए आते हैं उनके साथ हमारी किसी न किसी छाप का पैमाना जुड़ा होता है। ये छाप या तो हमने छोड़ी है या मुलाकात का कोई असर कहीं ठहरा रह गया है।
छाप छोड़ना क्या होता है? इस छाप मे क्या-क्या शामिल होता है? कहते हैं हर कोई अपनी होने के सबूत छोड़ता है। दोस्तों की महफ़िलों में, रिश्तों में, जगहों में, सफ़र में हर कोई अपनी कोई न कोई छाप छोड़ता हुआ चलता है।
शायद जगहों ने भी अपनी छाप छोड़ी है, वे क्या है? हम अपनी खुद की जगहों को कैसे शहर की कगार, भागदौड़ और ठहराव मे देखते हैं? ये सवाल शायद उन जगहों के लिए नहीं बना जिनके टूटने के कोई आसार नहीं हैं। लेकिन उन जगहों मे बेखौफ़ घुस जाता है जिनके आसार रोज़ाना पनपते हैं और रोज़ाना मर जाते हैं। ये जगहें हैं बस्तियाँ जिसमे में बुशरा रहती है। वे अपनी जगह को कुछ ऐसे सवालों से देखती है। कभी टूटती है तो कभी बन जाती है। लेकिन जीने की आस कभी ख़त्म नहीं होती। यही जीने की आस शहर से उसको जोड़े रखती है। इस आस का असल में रूप क्या है वे न तो उसे पता है और न ही किसी और को। इसी रिद्दम मे तैरते रहना ही इस जगह को अपना रूप बनाने की चेष्टा देता है।
वो पर्दे के पीछे की दुनिया में जीना और पर्दे के सामने आकर अपनी दुनिया बनाना। ये जद्दोजहद चलती रहती है। यही जीवन है।
लख्मी
Monday, February 2, 2009
इंडियन डोग बेस्टएक्टर
मैंने ये फिल्म देखी, इससे कुछ बीते जमाने की हिन्दी फिल्मों के कुछ क़िरदार उभरने लगे। जैसे- बस्ती यानि हिन्दी फिल्मों के वे हीरो जो किसी चॉल या बस्ती मे रहते थे वे तो कब के करोड़पती या कह सकते हैं की एक ऐसी शख़्सियत बन जाते जो बेहद अमीर है। अगर वो सारे Blank cheque रख लेते जो उन्हे हीरोइन के बाप ने, किसी अमीर ने बस्ती खरीदने के नाम पर, नौकरी से निकल जाने के लिए। दिए थे।
इन सभी में क्या था? ये हीरो का Blank cheque न लेना । ये क्या बतलाता है? शायद वो जो हिन्दी फिल्मों का एक गरीब हीरो कहता था- "मुझमे एक खुद्दारी है।" , "मैं सब कुछ बैच सकता हूँ लेकिन अपना ज़मीर नहीं।" , "पैसे से तुम क्या-क्या खरीदोगे?......."
लेकिन इस फिल्म मे आपको दिखता है कि जैसे वो खुद्दारी गायब हो गई है। वो अपनी ज़ुबान जो खुद से बनाई जाती है, खुद को दोहराने के लिए। अब गरीब हीरो बन गया है किसी और के नज़रिये से बनने वाले शक मे जीने वाला एक ऐसा क़िरदार जो एक दिन गायब भी हो जायेगा तो कुछ फ़र्क नहीं पड़ेगा।
शुरू होता है-
किसी जगह को देखने के नज़रिये क्या होते हैं और उसमे बसते जीवन को दोहराया कैसे जाये?
ये सवाल अब सवाल नहीं, असल में बस फ्रेम और चश्मे बनकर रह गया है जिसमें हम अपनी ही तरह से शहर को, किसी भी जगह को और उसमे बसते हर पल, घटना, रोज़मर्रा, अतीत, भविष्य को देखते हैं। इसमे अपने आपसे कोई सवाल भी नहीं करते कि जो हम देख रहे हैं वो क्या है? और वो हमारे जीवन से क्या रिश्ता रखता है?
किसी 'बस्ती' में बाहर से आने वाला शख़्स और वहीं पर रहने वाले शख़्स के नज़रिये में क्या अंतर होता है? ये अंतर खाली देखने से ताल्लुक ही नहीं रखता, इसमे कुछ और भी है। वो क्या है? क्या आप जानते हैं?
जो वहाँ रहता है उसकी आँखों पर लगे फ्रेम में जगह के नज़रिये में, जीवन के हर बिन्दू, हर पल जिसमे घुलते रिश्ते, आशियाना बनाने की जिद्द, समाज के साथ संधि और शहर के हर बदलाव के साथ जुझना उसके साथ-साथ खुद की जगह को हर वक़्त बनाने की कोशिश शामिल होती है। जो उसने सोचा और वो हो गया, इतना आसान नहीं होता। उसके लिए उसे बहुत सारे कामों अथवा रिश्तों के साथ रोज़ाना बहस में रहना होता है। अपने आसपास होने वाले बदलाव मे रहने वाला शख़्स रोज़ाना सुबह निकलता और जब शाम में वापस लौटता है। वापस आने के बाद वो अपने लिए कुछ कोने बनाता है, जो उसके जीवन में दिल बहलाने के लिए होते हैं, नये रिश्ते बनाने के लिए होते हैं, नई घटनाओ को दोहराने के लिए होते हैं, लोगों के बीच मे घुलने के लिए और ना जाने कितने ऐसे किस्सो का हकदार, साथीदार बनने के लिए होते हैं, जो सुबह निकलते वक़्त उसके नहीं थे और ना ही उसके जीवन के लिए बने थे।
ये अपने लिए कोने बनाने के सिलसिले क्या हैं? इनको देखने के नज़रिये क्या है?]
"सन् 1996 मे मैं काम पर लग गया था। जिसके कारण मैंने अपनी पढ़ाई छोड़ी। काम करते-करते मैं कई स्कूलों मे दाखिला लेने गया तो वहाँ के स्कूलों का जवाब था की दक्षिणपुरी के किसी भी बच्चे का हम दाखिल नहीं ले सकते।"
ये एक गहरी छाप है। इससे कैसे जुझा जाये?
मेरे एक साथी ने बहुत ही प्यार से मुझसे एक बार कुछ कहा था। वो बोल थे, “हमारे किसी नई जगह या किसी माहौल मे जाने के दो रूप होते हैं या तो हम अपना ही कोई रंग लेकर जाते हैं या फिर उस माहौल या जगह में दिखते रंगो से कोई रंग बनाते हैं। जो वहाँ के अलग-अलग रंगो मे से चुना हुआ रंग नहीं होता। बल्कि उन सभी रंगो को मिलाकर क्या रंग बनता है उसे उभारने की कोशिश करते हैं।"
मगर अपनाया क्या जाता है?.....
ये एक बहस है, जो कोई हमसे या हम किसी से नहीं कर सकते। ये बहस खाली हम अपने आपसे कर सकते हैं। जहाँ दोनों तरफ से लड़ने वाले हम अकेले होगें। ये सवाल किसी जगह को समझने, दोहराने, व्याख़ा करने अथवा उसको चित्रित करने के जैसा नहीं है। ये जगह जीवित है, सांस लेती है, मरती है, जागती है, रोती है, हँसती है और अपने जीने को रोज़ बनाती और टूटता हुआ भी देखती है। इसमे अनगिनत रंग है, माहौल है, रूप हैं। ये सब सोचकर हम किसी रूप को बनाने की कोशिश करते हैं।
ये बहस कब शुरू हुई?
ये बहस, सच और सच्चाई के बीच में नाचती है। ये खेल है, जिसको समझने की किसी ने चेष्ठा ही नहीं की। मैं स्लम डोग करोड़पती फ़िल्म की बुराई अथवा स्लम की तारीफ़ नहीं करूगाँ और न ही स्लम की बुराई और स्लम डोग करोड़पती की तारीफ़। ये फिल्म सच और सच्चाई के बीच नाचती है। जिसमे चित्र उस जीवन के आधार को और नाटकिये बना देते हैं।
कहानी से चित्रों को देखना और चित्रों से कहानी को देखना। ये एक सवाल है। इसको कैसे सोचें? किसी के जीवन को लिखना और उसको बताने के लिए चित्रों को बनाना, इनके बीच क्या रिश्ता होता है?
मगर सिर्फ़ इतना कहूँगा की स्लम को दिखाने अथवा उसके साथ रिश्ता बनाने के दौर में अभी बहुत कुछ सोचना पड़ेगा शहर को। ये तस्वीर कब की है? इसकी उम्र क्या है? और ये कहाँ से उपज़ती है?
शहर में पिछले दिनों कई बस्तियाँ विस्थापित की गई और उन्हे कहीं पर जगह भी दी गई। हम विस्थापन को उसके टूटते चित्रों से भी देख सकते हैं और उसमे टूटती उन कल्पनाओ से भी जिन्हे शहर याद भी नहीं रखता। मान लेते हैं कि आपके हाथ मे कैमरा है और आप उस बस्ती मे तस्वीरें खींचने गए हैं जो विस्थापित की जा रही है। तो आपकी आँखों के सामने क्या होगा? और आपके जीवन मे क्या? इन दोनों के बीच में आप कहाँ होगें?
एक चित्र मैं आपको बताता हूँ। चित्र है- एक औरत सड़क पर बैठी है। उसके घर को बुल्डोजर से तोड़ा जा रहा है। उस औरत की आँखों मे आँसू है। आज अपने घर से दस कदम की दूरी पर वो बैठी है। आप उसके सामने कैमरा लेकर खड़े हैं। तो उसके आँसूओं के सामने खड़े रहने का मतलब क्या है? दस मिनट आप उसके सामने खड़े हैं। आप उन दस मिनट को कैसे दोहरायेगें?
समझ में नहीं आया तो एक चित्र और रख सकता हूँ चित्र है- बस्ती की एक गली, जिसमे 20 घर थे। मगर आज उनमे से दो-दो घर की दूरी पर कुछ घरों को तोड़ दिया गया है। उनका मलवा वहीं गली में बिखरा पड़ा है। उस गली में से कैमरा लेकर निकलने का मतलब क्या है?
इन चित्रों को हम ये कहकर भी निकल सकते हैं की उनका स्लम डोग करोड़पती फिल्म से क्या लेना-देना। लेकिन इन चित्रों का लेना-देना आपके और मेरे जीवन से है। क्योंकि हम उस जगह के रहनवाज़ नहीं तो क्या हुआ लेकिन इस फिल्म के जरिये इन चित्रों से एक ख़ास रिश्ता बना लेते हैं।
स्लम डोग करोड़पती फिल्म की बहस बहुत रोमांचक है। जिसकी तरफ रूची बड़ती है। सोच और जिद्द को लेकर। कह सकते हैं की एक करारे जवाब की भांति वो अपनी भाषा को रख पाती है। जब एक छोटी सी बस्ती में रहने वाला लड़का करोड़पती बन जाता है। बहुत बढ़िया। क्या बात हैं! जबरदस्त साहब।
क्या सच में इसी फिल्म को देखने के बाद में पता चला है? ये फिल्म नहीं आती तो क्या पता नहीं चलता?
यहाँ दक्षिणपुरी मे रहने वाले एक शख़्स जो कभी सिनेमा हॉल में काम किया करते थे। वे बोले, “1970 से 1986 तक की फिल्मों में बस्ती और उसमे रहने वाले जीवन को इस तरह बताया और दोहराया जाता था कि लगता था दरवाजे के बाहर निकल कर की ये दुनिया बहुत छोटी है। जिसकी निगाह खाली वो नहीं देखती जो आसानी से देखा जा सकता है। किसी के घर को बताने के लिए उसके घर मे रहना होता है। जैसे "कथा" फिल्म। नसीरूद्दीन शाह और फ़ारूख़ शेख ने क्या अदाकारी थी। जिसमे जगह खिल कर बाहर आती है। जिसमे एक बस्ती में रहने वाला शख़्स कैसे अपने पड़ोसियों से रिश्ता बनाता है और कैसे उनके साथ मे रहने को जीना कहता है। मगर 1990 से आज तक बस्ती को, कालोनी को और उसके जीवन को कुछ इस तरह से कर दिया गया है। जैसे- बस्ती के लड़के अंडरवल्ड के सरगना है, लड़कियाँ बेचारी हैं और बुर्ज़ुग बिखारी है या रो रहे हैं। रोने के अलावा उनके पास कुछ रहा ही नहीं है और देखो तो सही की बॉलीवुड इसे सच भी मानता है। क्या बात है! आज भईयों तस्वीर कुछ और है। इस फिल्म को बनाने से पहले एक बार घूमने ही चले आते। स्लम तो सभी को न्यौते में रखता है। यहाँ की तस्वीर शायद तब कुछ ज़्यादा उभरकर आये।”
दक्षिणपुरी में इस हलचल मे एक ने कहा, “कल न्यूज़ मे शाहरूख ने कहा की इस फिल्म मे सच्चाई है इसे हम नकार नहीं सकते। शहर सड़क से गुजरते हुए इस तरह की लाइने अक्सर स्लम पर मार देता है और अपनी ही बात को सच्चाई मानकर जीता है। ये भ्रम अक्सर शहर लेकर जीता है। एक गाना याद आ रहा है, कभी हाँ, कभी ना- फिल्म का, "वो तो है अलबेला हजारों मे अकेला सदा तुमने ऐब देखा हुनर तो ना देखा।" शायद फिल्म वाले अपने रोल के साथ रिश्ता खाली फिल्म के पेमेन्ट तक ही रखते हैं। उसके बाद दिमाग खाली हो जाता है।"
मैं फिल्म मे ये देखने की कोशिश कर रहा था कि किसी जगह को, जीवन को दोहराने के चित्र क्या होते हैं? शहर कि निगाह और इस फिल्म की निगाह क्या है? जैसे शहर देखता है वही है या कुछ और है? मगर मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ। इस फिल्म मे कहानी पर बेहद नये ठंग से नज़र रखी गई है। नई कहानी का जन्म हुआ है बॉलीवुड में लेकिन जगह, उसके रूप और रोज़मर्रा को देखने के नज़रिये नये नहीं है।
ये फिल्म अभी बहुत गुलखिलायेगी।
वैसे इस फिल्म का नाम बहुत अच्छा है, हाँ भले ही इस नाम के नीचे स्लम मे रहने वाली हजारों ज़िन्दगियाँ दब जाती है, मर जाती हैं। ज़िन्दगी की सारी उलझने, फैसले, जीने के तरीके और प्यार सब कुछ दब जाता है। जैसे कि लाश पर सफेद रंग की चादर डाल दी गई है। इसपर मेरे एक साथी ने कहा, “वैसे इस नाम के आते ही बहुत सारी आने वाली फिल्मो के नामों की लिस्ट भी खुल जाती है। जैसे अगली फिल्मों के नाम होगें- इंडियन डोग बेस्टएक्टर, इंडियन डोग बेस्ट डांसर, इंडियन डोग बेस्ट राइटर। शायद इससे हमारी फिल्मइंडस्ट्रीज़ खुश होकर ये अवॉड के नाम मे तब्दील करदे जैसे- इंडियन डोग बेस्टएक्टर का अवॉड जाता है इसको...
अब इसके लिए भी बॉलीवुड मे क्या जबरदस्त नारे बाज़ियाँ होगी। समय ज़्यादा दूर नहीं है। देखते जाओ।
लख्मी
इन सभी में क्या था? ये हीरो का Blank cheque न लेना । ये क्या बतलाता है? शायद वो जो हिन्दी फिल्मों का एक गरीब हीरो कहता था- "मुझमे एक खुद्दारी है।" , "मैं सब कुछ बैच सकता हूँ लेकिन अपना ज़मीर नहीं।" , "पैसे से तुम क्या-क्या खरीदोगे?......."
लेकिन इस फिल्म मे आपको दिखता है कि जैसे वो खुद्दारी गायब हो गई है। वो अपनी ज़ुबान जो खुद से बनाई जाती है, खुद को दोहराने के लिए। अब गरीब हीरो बन गया है किसी और के नज़रिये से बनने वाले शक मे जीने वाला एक ऐसा क़िरदार जो एक दिन गायब भी हो जायेगा तो कुछ फ़र्क नहीं पड़ेगा।
शुरू होता है-
किसी जगह को देखने के नज़रिये क्या होते हैं और उसमे बसते जीवन को दोहराया कैसे जाये?
ये सवाल अब सवाल नहीं, असल में बस फ्रेम और चश्मे बनकर रह गया है जिसमें हम अपनी ही तरह से शहर को, किसी भी जगह को और उसमे बसते हर पल, घटना, रोज़मर्रा, अतीत, भविष्य को देखते हैं। इसमे अपने आपसे कोई सवाल भी नहीं करते कि जो हम देख रहे हैं वो क्या है? और वो हमारे जीवन से क्या रिश्ता रखता है?
किसी 'बस्ती' में बाहर से आने वाला शख़्स और वहीं पर रहने वाले शख़्स के नज़रिये में क्या अंतर होता है? ये अंतर खाली देखने से ताल्लुक ही नहीं रखता, इसमे कुछ और भी है। वो क्या है? क्या आप जानते हैं?
जो वहाँ रहता है उसकी आँखों पर लगे फ्रेम में जगह के नज़रिये में, जीवन के हर बिन्दू, हर पल जिसमे घुलते रिश्ते, आशियाना बनाने की जिद्द, समाज के साथ संधि और शहर के हर बदलाव के साथ जुझना उसके साथ-साथ खुद की जगह को हर वक़्त बनाने की कोशिश शामिल होती है। जो उसने सोचा और वो हो गया, इतना आसान नहीं होता। उसके लिए उसे बहुत सारे कामों अथवा रिश्तों के साथ रोज़ाना बहस में रहना होता है। अपने आसपास होने वाले बदलाव मे रहने वाला शख़्स रोज़ाना सुबह निकलता और जब शाम में वापस लौटता है। वापस आने के बाद वो अपने लिए कुछ कोने बनाता है, जो उसके जीवन में दिल बहलाने के लिए होते हैं, नये रिश्ते बनाने के लिए होते हैं, नई घटनाओ को दोहराने के लिए होते हैं, लोगों के बीच मे घुलने के लिए और ना जाने कितने ऐसे किस्सो का हकदार, साथीदार बनने के लिए होते हैं, जो सुबह निकलते वक़्त उसके नहीं थे और ना ही उसके जीवन के लिए बने थे।
ये अपने लिए कोने बनाने के सिलसिले क्या हैं? इनको देखने के नज़रिये क्या है?]
"सन् 1996 मे मैं काम पर लग गया था। जिसके कारण मैंने अपनी पढ़ाई छोड़ी। काम करते-करते मैं कई स्कूलों मे दाखिला लेने गया तो वहाँ के स्कूलों का जवाब था की दक्षिणपुरी के किसी भी बच्चे का हम दाखिल नहीं ले सकते।"
ये एक गहरी छाप है। इससे कैसे जुझा जाये?
मेरे एक साथी ने बहुत ही प्यार से मुझसे एक बार कुछ कहा था। वो बोल थे, “हमारे किसी नई जगह या किसी माहौल मे जाने के दो रूप होते हैं या तो हम अपना ही कोई रंग लेकर जाते हैं या फिर उस माहौल या जगह में दिखते रंगो से कोई रंग बनाते हैं। जो वहाँ के अलग-अलग रंगो मे से चुना हुआ रंग नहीं होता। बल्कि उन सभी रंगो को मिलाकर क्या रंग बनता है उसे उभारने की कोशिश करते हैं।"
मगर अपनाया क्या जाता है?.....
ये एक बहस है, जो कोई हमसे या हम किसी से नहीं कर सकते। ये बहस खाली हम अपने आपसे कर सकते हैं। जहाँ दोनों तरफ से लड़ने वाले हम अकेले होगें। ये सवाल किसी जगह को समझने, दोहराने, व्याख़ा करने अथवा उसको चित्रित करने के जैसा नहीं है। ये जगह जीवित है, सांस लेती है, मरती है, जागती है, रोती है, हँसती है और अपने जीने को रोज़ बनाती और टूटता हुआ भी देखती है। इसमे अनगिनत रंग है, माहौल है, रूप हैं। ये सब सोचकर हम किसी रूप को बनाने की कोशिश करते हैं।
ये बहस कब शुरू हुई?
ये बहस, सच और सच्चाई के बीच में नाचती है। ये खेल है, जिसको समझने की किसी ने चेष्ठा ही नहीं की। मैं स्लम डोग करोड़पती फ़िल्म की बुराई अथवा स्लम की तारीफ़ नहीं करूगाँ और न ही स्लम की बुराई और स्लम डोग करोड़पती की तारीफ़। ये फिल्म सच और सच्चाई के बीच नाचती है। जिसमे चित्र उस जीवन के आधार को और नाटकिये बना देते हैं।
कहानी से चित्रों को देखना और चित्रों से कहानी को देखना। ये एक सवाल है। इसको कैसे सोचें? किसी के जीवन को लिखना और उसको बताने के लिए चित्रों को बनाना, इनके बीच क्या रिश्ता होता है?
मगर सिर्फ़ इतना कहूँगा की स्लम को दिखाने अथवा उसके साथ रिश्ता बनाने के दौर में अभी बहुत कुछ सोचना पड़ेगा शहर को। ये तस्वीर कब की है? इसकी उम्र क्या है? और ये कहाँ से उपज़ती है?
शहर में पिछले दिनों कई बस्तियाँ विस्थापित की गई और उन्हे कहीं पर जगह भी दी गई। हम विस्थापन को उसके टूटते चित्रों से भी देख सकते हैं और उसमे टूटती उन कल्पनाओ से भी जिन्हे शहर याद भी नहीं रखता। मान लेते हैं कि आपके हाथ मे कैमरा है और आप उस बस्ती मे तस्वीरें खींचने गए हैं जो विस्थापित की जा रही है। तो आपकी आँखों के सामने क्या होगा? और आपके जीवन मे क्या? इन दोनों के बीच में आप कहाँ होगें?
एक चित्र मैं आपको बताता हूँ। चित्र है- एक औरत सड़क पर बैठी है। उसके घर को बुल्डोजर से तोड़ा जा रहा है। उस औरत की आँखों मे आँसू है। आज अपने घर से दस कदम की दूरी पर वो बैठी है। आप उसके सामने कैमरा लेकर खड़े हैं। तो उसके आँसूओं के सामने खड़े रहने का मतलब क्या है? दस मिनट आप उसके सामने खड़े हैं। आप उन दस मिनट को कैसे दोहरायेगें?
समझ में नहीं आया तो एक चित्र और रख सकता हूँ चित्र है- बस्ती की एक गली, जिसमे 20 घर थे। मगर आज उनमे से दो-दो घर की दूरी पर कुछ घरों को तोड़ दिया गया है। उनका मलवा वहीं गली में बिखरा पड़ा है। उस गली में से कैमरा लेकर निकलने का मतलब क्या है?
इन चित्रों को हम ये कहकर भी निकल सकते हैं की उनका स्लम डोग करोड़पती फिल्म से क्या लेना-देना। लेकिन इन चित्रों का लेना-देना आपके और मेरे जीवन से है। क्योंकि हम उस जगह के रहनवाज़ नहीं तो क्या हुआ लेकिन इस फिल्म के जरिये इन चित्रों से एक ख़ास रिश्ता बना लेते हैं।
स्लम डोग करोड़पती फिल्म की बहस बहुत रोमांचक है। जिसकी तरफ रूची बड़ती है। सोच और जिद्द को लेकर। कह सकते हैं की एक करारे जवाब की भांति वो अपनी भाषा को रख पाती है। जब एक छोटी सी बस्ती में रहने वाला लड़का करोड़पती बन जाता है। बहुत बढ़िया। क्या बात हैं! जबरदस्त साहब।
क्या सच में इसी फिल्म को देखने के बाद में पता चला है? ये फिल्म नहीं आती तो क्या पता नहीं चलता?
यहाँ दक्षिणपुरी मे रहने वाले एक शख़्स जो कभी सिनेमा हॉल में काम किया करते थे। वे बोले, “1970 से 1986 तक की फिल्मों में बस्ती और उसमे रहने वाले जीवन को इस तरह बताया और दोहराया जाता था कि लगता था दरवाजे के बाहर निकल कर की ये दुनिया बहुत छोटी है। जिसकी निगाह खाली वो नहीं देखती जो आसानी से देखा जा सकता है। किसी के घर को बताने के लिए उसके घर मे रहना होता है। जैसे "कथा" फिल्म। नसीरूद्दीन शाह और फ़ारूख़ शेख ने क्या अदाकारी थी। जिसमे जगह खिल कर बाहर आती है। जिसमे एक बस्ती में रहने वाला शख़्स कैसे अपने पड़ोसियों से रिश्ता बनाता है और कैसे उनके साथ मे रहने को जीना कहता है। मगर 1990 से आज तक बस्ती को, कालोनी को और उसके जीवन को कुछ इस तरह से कर दिया गया है। जैसे- बस्ती के लड़के अंडरवल्ड के सरगना है, लड़कियाँ बेचारी हैं और बुर्ज़ुग बिखारी है या रो रहे हैं। रोने के अलावा उनके पास कुछ रहा ही नहीं है और देखो तो सही की बॉलीवुड इसे सच भी मानता है। क्या बात है! आज भईयों तस्वीर कुछ और है। इस फिल्म को बनाने से पहले एक बार घूमने ही चले आते। स्लम तो सभी को न्यौते में रखता है। यहाँ की तस्वीर शायद तब कुछ ज़्यादा उभरकर आये।”
दक्षिणपुरी में इस हलचल मे एक ने कहा, “कल न्यूज़ मे शाहरूख ने कहा की इस फिल्म मे सच्चाई है इसे हम नकार नहीं सकते। शहर सड़क से गुजरते हुए इस तरह की लाइने अक्सर स्लम पर मार देता है और अपनी ही बात को सच्चाई मानकर जीता है। ये भ्रम अक्सर शहर लेकर जीता है। एक गाना याद आ रहा है, कभी हाँ, कभी ना- फिल्म का, "वो तो है अलबेला हजारों मे अकेला सदा तुमने ऐब देखा हुनर तो ना देखा।" शायद फिल्म वाले अपने रोल के साथ रिश्ता खाली फिल्म के पेमेन्ट तक ही रखते हैं। उसके बाद दिमाग खाली हो जाता है।"
मैं फिल्म मे ये देखने की कोशिश कर रहा था कि किसी जगह को, जीवन को दोहराने के चित्र क्या होते हैं? शहर कि निगाह और इस फिल्म की निगाह क्या है? जैसे शहर देखता है वही है या कुछ और है? मगर मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ। इस फिल्म मे कहानी पर बेहद नये ठंग से नज़र रखी गई है। नई कहानी का जन्म हुआ है बॉलीवुड में लेकिन जगह, उसके रूप और रोज़मर्रा को देखने के नज़रिये नये नहीं है।
ये फिल्म अभी बहुत गुलखिलायेगी।
वैसे इस फिल्म का नाम बहुत अच्छा है, हाँ भले ही इस नाम के नीचे स्लम मे रहने वाली हजारों ज़िन्दगियाँ दब जाती है, मर जाती हैं। ज़िन्दगी की सारी उलझने, फैसले, जीने के तरीके और प्यार सब कुछ दब जाता है। जैसे कि लाश पर सफेद रंग की चादर डाल दी गई है। इसपर मेरे एक साथी ने कहा, “वैसे इस नाम के आते ही बहुत सारी आने वाली फिल्मो के नामों की लिस्ट भी खुल जाती है। जैसे अगली फिल्मों के नाम होगें- इंडियन डोग बेस्टएक्टर, इंडियन डोग बेस्ट डांसर, इंडियन डोग बेस्ट राइटर। शायद इससे हमारी फिल्मइंडस्ट्रीज़ खुश होकर ये अवॉड के नाम मे तब्दील करदे जैसे- इंडियन डोग बेस्टएक्टर का अवॉड जाता है इसको...
अब इसके लिए भी बॉलीवुड मे क्या जबरदस्त नारे बाज़ियाँ होगी। समय ज़्यादा दूर नहीं है। देखते जाओ।
लख्मी
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