Tuesday, February 10, 2009

सच मे अंधेरा ही था

एक गहरा अंधेरा था वहाँ पर। अन्दर घुसने को कोई मनाही नहीं थी पर कदम अपना साथ दे तो हिम्मत हो। दरवाजे के सामने खड़े होकर ही पूरे कमरे का ज़ायज़ा ले जाते होगें लोग। शायद ही कोई उस कमरे के उस कोने में जाता होगा जहाँ पर ये कमरा ख़त्म होता है मगर दरवाजे के किनारे पर खड़े होकर देखने की नज़र कभी उस कमरे का अन्त देख ही नहीं सकती थी।

कमरा धुँए की परत और छोटे-छोटे रूई जैसे फोहें, मिट्टी और कालस की शक़्ल में पूरे कमरे की दरारियों में हवा से लहरा रहे थे। अगर दिवारों पर उगंलियों को फिराया जाये तो किसी ना किसी ईंट पर अपनी छाप छोड़ने से कम नहीं होगा। लकड़ी के लटके से दरवाजे वाला ये कमरा, पूरे शमशाम घाट में दूर से ही नज़र आता है बिना किसी रंग-रोगन और सजावट के। सजावट हो भी क्यों भला सोने वाले तो उस कमरे में आराम से सो रहे हैं। अपनी उन चीजों के साथ जो अब इस कमरे की रखवाली करती हैं और कमरे में एक बेधड़कपन को ठहराती है।

खौफ़ की चादर ओड़े ये कमरा चीजों से अपने अन्दर आने की हौसला-अफ़ज़ाई देता है। चीजों के अपने नज़रों में भरते हुए अन्दर जाने में कदम नहीं काँपते। चीजें जो ख़ामोश हो जाने के बाद भी कोई ऐसी चमक लिए है कि उसमे नज़रें घुमाने पर एक ही पल में लगता है की कई डरावनी छवियाँ जो अपनी आँखों में रखली जाती हैं वो महज़ अपनी ही आँखों पर लटकी तख़्ती की तरह होती हैं। उसका इन चीजों और कमरे से कोई लेना-देना नहीं होता। चीजें जो अब किसी के काम की नहीं है पर फिर भी वो रखी हैं इस कमरे में लोगों का अहसास कराने के लिए। जो इस कमरे के प्रति बनती कई अवधारणाओं को अपने में समेट लेती हैं।

दिवारों में बनते ईंटो के बीच कि दूरी और दरारियों में से रोशनी अन्दर घुसने का रास्ता खोज़ निकालती है। जो जिसकी अस्थियों की लटकी थैली पर पड़ती है वो थैली कोई रंग लेकर अपने पर गुदी तारीख़ को सामने लाकर खड़ा कर देती है और जो शरीर इस थैली की शक़्ल में यहाँ पर टंगा है उसे भी ऊपरवाले की रोशनी प्राप्त हो जाती।

रोशनी के कई तार धीरे-धीरे दिन चड़ते उस कमरे में खिंच जाते। आमने-सामने की दरारियों में रोशनी के तार किसी चमकती लकीर की भांति उन टंगी थैलियों को नया रंग दे देती। आर-पार होती रोशनी कमरे में जाल की भान्ति पड़ने लगती और रेडियम की लाइट की तरह कमरे को साफ़ करने में कामयाब हो जाती।

रोशनी के तार खिंचने से पूरे कमरे का गहरा अन्धेरा छट जाता और कमरा लगता जैसे बिना दिवारों के जमीन से कोसो ऊपर हो गया है और हवा में झूल रहा है उन लकीरों पर जो उस रोशनी से बनी हैं।

कमरे में दाखिल होने का पहला कदम ही वहाँ रहने वाले अदृश्य लोगों को महसूस करने में मजबूर करता है। ऐसा लगता है की अपने अन्दर बसे डर से कभी भागा ही नहीं जा सकता। राख की महक अन्दर तक भर जाती और नज़र कहीं रूकती ही नहीं। कुछ भी तो ऐसा नहीं था वहाँ पर जो नज़रों को रोकने के लिए मजबूर करे अगर कहीं ठहराव नज़र आता तो वो उन चीजों में जिनमे अब भी वो अहसास छूपा था जो किसी के होने का दम भरता है।

कई चीजों को तो देखकर लगता है कि जैसे कोई तो है जो यहाँ पर रात गुजारता है। जिसमे उन काली पोटलियों में कुछ याद रखने या किसी खास चीज को सम्भाल कर रखने के लिए टांगा हो। कई कपड़े जो थैलियों में बंधे रखे हैं और खाट जो बिछी हुई है मगर वो शायद कोई भ्रम भी हो सकता है।

शमशाम घाट में बैठा लकड़ी वाला भी इस कमरे में कभी नहीं जाता। कितनी बार तो शिवराम जी ही उसे खींचकर लेकर जाते हैं तो अगला अगर एक कदम भी उस कमरे की दहलीज़ पर रख दे तो तुरन्त ही जाकर नहा लेता है और फिर शुरू हो जाती है शिवराम जी के साथ उसकी अनबन। मगर वो भी ज़्यादा देर तक नहीं रहती बस, उसके नहाने तक ही रहती है। ज़्यादा देर तक अनबन का कोई फ़ायदा भी तो नहीं है क्योंकि शमशाम घाट मे दो-चार ही तो लोग होते हैं। एक-दूसरे से बातें करने के लिए और जोर आज़माने के लिए। वहाँ अर्थी को लाने वाले लोग तो आपके साथ मे गप्पे-वप्पे नहीं करेगें। तो दिन कैसे कटेगा ? फिर दोनों का काम भी तो एक ही जैसा है। एक अर्थी के लिए लकड़ियाँ बैकता है और दूसरा उन लकड़ियों के बिना अर्थी का क्रियाक्रम कैसे करेगा तो ये जोर आज़माइस एक-दूसरे के बीच में चलती रहती है।

न जाने कितनी दुआयें और बलायें अपने मे समायें ये कमरा इन चीजों और अस्थियों को सम्भाले रखता है।

अब तो शिवराम जी मन्दिर की मुंडेरी पर बैठे-बैठे बस इन्तजार करते रहते है अर्थियों का। जोर-ज़बरदस्ती करने के लिए वो लकड़ी वाला और कूड़ा बिनने वाले ही रह गए हैं। जिनके कारण मुँह में से आवाज़ निकलती है उनकी। नहीं तो पूरा दिन बिना बोले ही कट जाये तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तो देखा जाये शिवराम जी का तो पूरा हुलिया ही चैन्ज हो गया है। पैन्ट और कमीज़ छोड़कर कुर्ता-पज़ामा पहनने लगे हैं और कांधो पर एक गमछा भी डाले रखते हैं। शरीर में बहुत तेजी आ गई है फौरन इधर से उधर चले जाते हैं। बिलकुल भी टाइम नहीं लगाते वो किसी भी अर्थी को मोक्षस्थल दिखाने में और उसका क्रियाक्रम कराने में। कभी चीजों को देखते रहते है और कभी वहाँ की सफ़ाई करने में लग जाते हैं। अब तो शमशाम घाट मे भी गेट लग गया है। उसका भी मैनगेट बना दिया गया है। सरकार को लगता है की जैसे यहाँ से भी कुछ चोरी होने के चान्स ज़्यादा है। जो लोग रात मे आकर वहाँ आग जला कर सो जाया करते थे उनका आना बन्द हो गया है और शमशाम घाट अब पूरा शमशाम घाट बन गया है।

शिवराम जी दिन में पूरा गेट खुला रखते हैं कहते है कि अगर कोई यहाँ पर कुछ चुनने आया चुन तो सकता है। कुड़ा बिनने वाले भी यहाँ पर रहते है। सारे में घूम कर जब आते हैं तो कोई-कोई खाना भी यहाँ पर खाता है। इन दिनों तो अस्थियाँ ले जाने वालो की भी कतार लगी हुई थी। दिन में लगभग दो परिवार तो आ ही जाते हैं उन अस्थियों को ले जाने के लिए। लोग बेधड़क शमशाम घाट में चले तो आते है मगर उस कमरे मे बिना पंडित जी की इज़ाज़त लिए कोई नहीं जाता। अपने हाथों में मर जाने वाले के नाम का पर्चा लिए वो चले आते और पंडित जी के पास में जाकर उस थैली का ज़ायज़ा लेते की इस तारीख़ वाली थैली कौन सी है और कहाँ पर लटकी है।

आज भी कोई आया अपने किसी रिश्ते की थैली लेने। वो चार लोग थे। पहले वो शमशाम घाट मे बने मन्दिर में आये और पंडित जी के पास गए। अपनी पर्ची दिखाई। पंडित जी ने अपना पत्रा खोला और उसे मरने वाले का नाम बताया उसके बाद उसे तारीख़ बताई और कहा की तुम शिवराम के पास में चले जाओ वो तुम्हे अस्थियों के फूल दे देगा। इतना सुनकर वो चारों शिवराम जी के पास चले गए। शिवराम जी वहीं कमरे के बाहर बनी मुंडेरी के ऊपर बैठे थे। उन चारों में से एक आदमी आया जिसके हाथ मे वो पर्ची थी। उसमे वो पर्ची शिवराम जी को दिखाई।
शिवराम जी ने उन्हैं कहा, "तुम अन्दर जाईये और अन्दर सामने की दिवार पर ये थैली टगीं है। उसे ले लिजिये पर क्या आप कोई समान लाये थे जिसे उनके ऊपर चड़ाया गया था?”
तो उनमे से एक बोला, "नहीं हम कुछ नहीं लाये थे।"
शिवराम जी ने कहा कि आप अन्दर चले जाओ और तारीख़ देखकर अपनी अस्थियाँ ले लो। वहीं सामने वाले दिवार कर टंगी है।

ये सुनकर वो अन्दर जाने लगे और दरवाजे पर खड़े होकर ये देखने लगे की कौन सी सामने वाली दिवार है? चारों ही लोग दरवाजे के सामने खड़े हो गए और पहले जाने वाले के मुँह की तरफ देखने लगे। शिवराम जी ने उनकी तरफ देखा तो वो खुद ही उनके साथ में चले जाने के लिए खड़े हो गए। वो अन्दर गए और सीधा सामने वाली दिवार पर चले गए और वो चारों आये लोग ये देखने लगे की यहाँ तो पहले से ही इतनी अस्थियाँ टंगी है और ये आदमी सीधा सामने वाली दिवार पर चला गया। वैसे देखा जाये तो शिवराम जी को भी नहीं मालूम था की इस तारीख़ की थैली कहाँ पर टंगी है? वो तो महज़ अन्दाजा भरते हुए सामने चले गए थे। तारीख़ थी 2005 की।

शिवराम जी वहाँ पर लटकी सारी थैलियों को अपने हाथों से साफ़ करते और उन्हैं घुमा-घुमाकर देखते कि उनकी तारीख़ कौन सी है। हर थैली को बहुत ही नज़दीक से देखना पड़ता और उस पर पड़ी धूल को साफ़ करना होता। शिवराम जी वहाँ पर सारी थैलियों को देख रहे थे और वो चारों आये लोग वहाँ चुपचाप खड़े थे। बस, चारों दिवारों पर नज़र घुमाते हुए कमरे की बनावट को देख रहे थे। एक कौने मे गड़ी कील पर तीन थैलियाँ टंगी थी तो उन पर शिवराम जी ने अपनी ऊंगलियाँ फैरी और देखा की कौन सी तारीख़,लिंग और किस मोक्षस्थल की ये थैली है। उनमे से एक वही थी जिसे वो ढूँढ रहे थे। काले रंग और धूल की परत ने उसे इतना कठोर बना दिया था कि उसमे किसी के होने का अन्दाजा ख़त्म ही हो गया था समझों। आज पूरे तीन साल जो हो गए थे उन अस्थियों को वहाँ पर टंगे हुए।

शिवराम जी ने उस थैली की गाँठ को खोला और उसे वहाँ से उतारा। अपने हाथों मे लेकर उस पर पड़ी धूल को साफ़ करते हुए उन्होनें वो थैली उन चारों के हाथ में देनी चाही मगर वो चारों में एक आदमी का हाथ आगे बड़ा। उसने अपने दोनों हाथों कि अन्जली बनाई और उस थैली को बड़े प्यार और श्रद्धा से अपने हाथों में ले लिया। उस थैली को वो इस तरह से लेकर आ रहे थे कि जैसे उसमे वो रिश्ता अभी भी जिन्दा है जिसे मुखागनी दे दी गई थी। वो इतने अहिस्ता-अहिस्ता उसे लेकर चले रहे थे के कहीं उस थैली को हिलने से कोई चोट ना लग जाये। एक आदमी के हाथों में वो थी तो दूसरे आदमी ने उसके हाथों के नीचे अपने हाथों को भी रखा हुआ था। लगता था की जैसे वो दोनों का कोई लगता था। अब रिश्ता समझना जरूरी नहीं था। मगर आज कोई विदा हो रहा था इस अन्धेरे और खौफ़नाक कमरे से।

वो चारों लोग अब फिर से पंडित जी के पास में गए और उस थैली को अपने हाथों मे पकड़े पूछने लगे की पंडित जी इसको हम किस तरह से गंगा मे विसर्जन करे और कब करें?

पंडित जी ने उनके आगे सारे पत्रे खोले और कुछ पन्नों पर नक्शे बनाने लगे। थोडी ही देर मे कहने लगे, "इसको गंगा मे विसर्जन करते समय ये देखना की ये किनारे पर ना लगे। इसे बीच में जाकर विसर्जन करना और दोनों हाथों उसे बहाना।"

ये कहकर उन्होनें एक मिट्टी का करवा निकाला और उसमे कुछ फूल और लोंग के दाने डालकर उस थैली मे से अस्थियों को निकाल उस करवे मे डाल दिया। फिर उस ही काले रंग के कपड़े से उस करवे का मुँह बन्द कर दिया और कहा दक्षिंणा दे जाओ और इसे दो दिन से ज़्यादा अपने घर में मत रखना। जल्द से जल्द विसर्जन कर देना। वो चारों लोग उस करवे को लेकर चले गए और शिवराम जी उस काले रंग के कपड़े पर लिखी तारीख़ को मन्दिर में रखे रजिस्टर में से काटने लगे।

अब धीरे-धीर करके कमरा सारी थैलियों से खाली हो जायेगा और डर जैसी चीज वहाँ पर नहीं रहेगी। वो उन लोगों को देखते रहे। कुछ पूजा-पाठ हुआ। उस थैली को लिया और चले गए। एक शख़्स यहाँ इस कमरे से भी विदा हो गया अब पता नहीं कहाँ पर रहेगा?

लख्मी

1 comment:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

मैं यहाँ से अपरचित थे, आज दीवन पर इंडियन डोग बेस्टएक्टर पढने के बाद आया तो जैसे अपनापा लगा.
अब आने जाने का सिलसिला लगा रहेगा.

शुक्रिया