एक दानव जैसी भूख उसे निगलने ही वाली थी। कदमों की आहट ने उसके ध्यान को अपनी तरफ केन्द्रित किया। खूबसूरती उसके चेहरे पर चड़ी थी। ऐसा बुख़ार बनकर जिसका चैप्टर(पाठ) समझ नहीं आ रहा था। वो बे-मौत मारा जाता।
किसी को देखों और फिर वो देखते-देखते जरा बदल जाये या थोड़ा रहम खाकर ध्यान देने की कृप्या करने लगे तो जैसे - "हम समाज से नहीं डरते हिम्मत से काम लो" ऐसा कहने लगे तो!
उस रोज वो अपने फ्लेट में पहुंचा। दरवाजा बन्द था। दिवार में लगे बटंन को दबाकर उसने अपने आने का संकेत दिया। रिश्तों को निभाने के लिये आपकी जरूरत होती है। आजकल एक कमरें से दूसरें कमरे मे जाने में जैसे। उसमें सिमट आया हो जैसे मूसाफिरों सा ओघर रूप। जो आजमाईशों का तूफान पैदा कर गया। शहर की मशहूर मार्किटों में निकलता रास्ता वो समय का महत्वपूर्ण नज़ारा था। अब उसे दस्तक देते सुना। जब शहर ने बहकने के अंदाज में टूटना शुरू किया था। बाकी सबके लिये मुलाकात जरूरी थी। मन के भटकते विचारों का जैसे कहीं ठिकाना न था। दिमाग में विचार अनेकों मेंढक की तरह जन्म लेने लगे। इन हठ करने वाली कल्पनाओं में वो जैसे कोई कलम की शाही बन रहा था। जिससे सपनो को जिंदगी के पन्नों पर लिखना जरूरी था। अब उसे याद आया की दो बजे उसे कुछ और पैकेट लेकर होज़खास जाना था। कुछ शक्लें उसके दिलों-दिमाग को खसोटने लगी।
उसने फोन किया टेलीफोन बूथ से, "हैलो सर"
फोन उठाने वाला बोला, "मेरा सिर मतलब खाओ, पहले ये बताओ तुम यहां क्यों नहीं आये। दो बजकर चालिस मिनट हो रहे हैं।"
उसने कहा, "सर बस मैं रास्ते में हूँ।"
वो बोला, "अच्छा कहाँ पर हो?"
उसने कहा, "सर बस पहुंच गया"
वो बोला, "कहाँ पहुँचे?"
उसने कहा, "मार्किट।"
धूप के चूंधिया देने वाले माहौल के बीच दिलकश नज़र ही काफी थी। बात यहीं पर खत्म हुई समझो। ये दिन तो गया, इन्ही झूठ – सच के घेरे में अगले दिन फिर सवेरा होगा। इच्छाएं जो सिर्फ और सिर्फ चाहत में बदल गयी थी नि:सकोच होकर। वो बोलने लगी थी। सुबह के नौ बजे से शाम पाँच बजे तक का सफर रोमांचक रहा। वो व्यवहार में आत्मियता का परिचर्य ढूड़ने लगा। रात ने उसे इतना ध्वनि भरा बना दिया था की अब उन चाहतों को खमोश करना मुश्किल था। काश ये कभी चुप ही ना हो।
राकेश
Friday, February 25, 2011
Thursday, February 17, 2011
Thursday, February 10, 2011
इस यात्रा में कोई विलम्ब नहीं है

भीड़ क्या है? - भीड़ के बीच में बनते दृश्य किस ओर ले जाते हैं?, भीड़ को किस तरह से चिंहित किया जा सकता है?, समूह क्या है? "आपसी होना" और "निजी होना" को ये कैसे सोचता है?, समूह की तस्वीर क्या है?, समूह किस ओर ले जाता है?, इंडीव्जूयल होना क्या है?, मांसिकता और शारिरिकता में ये कैसे सोचा जाता है? अकेला होना कटा हुआ होता है या कट पैदा करना?
अगर हम इन तीनों स्थितियों के छोड़ दे तो क्या बचता है? कई लोग महज़ शरीर जो इतनी फोर्स लिये एक साथ बड़ते और निकलते हैं कि इनको अपने एक पल में समझ पाना किसी तीरों के झूंड मे निकलने के समान होगा। हम क्या सोच सकते हैं इस स्थिती में? मैं भीड़ के बीच मे था। भीड़ के सामने था। भीड़ के करीब था। इस "बीच" के दौर में खुद को टकराव मे लाना और भीड़ में महफूज़ियत को सोचने के सम्मूख रखना किसी बहस के समान होता है। मुझे लगा ये न तो "टकराव" में होती है और न ही "महफूज़ियत" में। ये एक भिंड़त हैं।
भीड़ के बीच में हर कोई इस भेदने की क्षमता को लिये चलता है। ऐसा लगता है जैसे हर कोई किसी महीम और अननोन फोर्स से इस दायरे की पकी-पकाई फोर्स के कमडंल को भेद रहा है। ये फोर्स का कमंडल किसी अकेली फोर्स को न्यौता देता है। ये भेदना - चौंकना, झटका, अचानक वाले ऐसे दृश्य उभारता है जिनको याद रखना और भूल जाना दोनों का एक समांतर रूप है। "गेप" जहाँ अपनी परख को पुख्ता करता है वहीं पर "भेदना" किसी न पहचानने वाले मेप बनाते की कोशिश करता है। मान लेते हैं जैसे - एक ही झटके मे कई सारी वॉयव्रेश्न, चेहरे, शरीर और अनेको किस्म की आवाज़ें हमारी ओर आती है। अपनी एक बहुत तेज फोर्स के साथ तो हम किस ओर निकलते हैं?
सफर करते हुए एक सवाल दिमाग मे उभरा : कौनसे ऐसे दृश्य है जो याद मे रह जाते हैं जिनमें समय का वो पल है जो चिंहित नहीं किया जाता? जिसको दोहराया नहीं जाता और जो वापस कभी लौटेगा भी नहीं? इस सवाल को सोचते हुए महसूस हो रहा था की "लौटना" इतना जरूरी क्यों है? याद मे इसलिये नहीं ठहर गया कि वे लौटने का अहसास करवायेगा। बल्कि शायद इसलिये भी हो सकता है कि उस ओर कभी नहीं लेकर जायेगा।
लख्मी
Thursday, February 3, 2011
“पहचान” और “मैं”
पिछले कई समय से मेरे साथी से सुनने को मिलता है, "मैं और हम" के बारे में। वो आसपास, किताब और अतीत को सोचते हुए पहचान और मैं को कभी बहस में ले आता है तो कभी उसे भरने का काम करता है मगर उसके भीतर मैं और हम की बहस खत्म नहीं होती। उसके साथ और बातचीत करते हुए मुझे कुछ शहर में और ज्ञान के बीच में एक खास रिश्ता महसूस होता हुआ लगा। हम कबीर और ओशो को पढ़ते हैं तो इन रिश्तों का एक तरंग के अहसास से समझने को मिलता है।
मैं यहाँ से शुरू करता हूँ -
इसी सोच के बीच में आता है - तन और स्वभाव, इसको किस तरह की तैयारी के तहत उतरा गया है समाज में या दुनिया में? शायद इसी में पलती है और बनती है हमारी पहचान। वो पहचान जिसे समझने की चेष्टा कोई नहीं करता शायद किसी को ये भी नहीं मालूम होता है उसकी वो पहचान क्या है जिसे लेकर वो जी नहीं रहा बल्कि महज़ चल रहा है? और वो पहचान क्या है? जो महज खुद के “मैं ” को बताने की भूमिका निभाती?
अगर हम सब कुछ हटा दें- अपने से समाज को, जेंडर को, जाती को, शहर को, पहचान को, रिश्तो को, वस्त्रों को, आवाज़ों को और अब खड़े हो जाएँ और देखने की कोशिश करें की क्या दिखता है? जो दिख रहा है उस तक जाने की कोशिश करें। उस पहचान तक कैसे पहुचेगें जो “जैसे को तैसा” पहचान है। मतलब उस पहचान तक पहुँचने की क्या राहें (रस्ते और दिशा ) हैं? जिसमें अपने को मिटा दिया जाता है। क्योंकि मेरा शरीर मेरी आकृति का सबूत नहीं है बल्कि वे एक ऐसी आकृति है जो सामुहिक है बस मेरे "मैं" ने उसे अपना कहा है, अपना लिबास पहनाया है और अपना गवाह बनाया है।
कबीर का एक गीत है जिसमें एक लाइन है- “तेरे जो घट में, वही मेरे भी घट में, सब के घट में एक है भाई ”
इसमें “मैं ” की कोई कठोर रूप-रेखा नहीं है। जैसे को तैसा पहचान जब बनती है। वो खुद में होने से बाहर ले जाती है। जो तुम हो वो मैं भी हूँ और जो मैं हूँ, वो सब है तो "मैं" खुलता किसके लिए हूँ?
ओशो अपनी मनहीत मंजूरी किताब में लिखते हैं- परमात्मा तो मिल ही जाता है बशर्ते हमें कुछ कीमत चुकानी होती है। अपने को खोने की .. अगर हम सोचें इस शरीर को तो ये आसन भी लगता है। वैसे हम बहुत सी चीजों को छोड़ने के लिए फ़ौरन तैयार हो जाते हैं। हम कहते हैं की मैं घर छोड़ दूंगा, पत्नी -बच्चे छोड़ दूंगा, काम छोड़ दूंगा, धन -दोलत छोड़ दूंगा, पद -प्रतिष्ठा छोड़ दूँगा और कहते है की पहाड़ पर चला जाऊँगा मगर अपने को छोड़ने को तैयार कभी नहीं होते तो ये सब छोड़ने से क्या होगा? जिसने अपने को नहीं छोड़ा उसने कुछ नहीं छोड़ा। इस चुनोती में एक ही त्याग है वो है “मैं ” का त्याग ।
इसमें भी यही कहा गया है की "मैं" का त्याग ही आपको सभी चीजों या परमात्मा से मिला सकता है। हम अपने जीने और रहने से हमेशा किसी सवाल को अपने कंधो पर उठा लेते हैं और चल पड़ते हैं उसकी खोज में पर वो सवाल है क्या ? क्या कोई जिद्द है?, क्या कोई आत्मा है?, क्या कोई हद्द है? या कोई आपारआधार है?
इन्ही के बीच में चलते-रहते है.. बस सवाल को उठाएँ निकल पड़ते है दुनिया में और करते क्या है उसे तलाशने लगते है। उसके चिन्ह तलाशने की हट पकड़ लेते हैं। जब की उस सवाल और हमारे खुद के “मैं ” में एक सधारण सा गेप होता है उसे नहीं तलाश पाते। मेरा यहाँ पर खुद का मनना है की अगर हम इस गेप को तलाशने निकलें तो हम उस सवाल की गहराई को खोज सकते हैं।
इस गेप को तलाश लिया तो समझों की हर सवाल को तलाश लिया। मुझे वो २ लाइन याद आती है-
"इस दुनिया में सभी एक-दूसरे से मिलने-जुलने में मस्त है,
मगर खुद से मिलने की सभी लाइन व्यस्त हैं।
खुदा हाफिज़ .......
लख्मी
मैं यहाँ से शुरू करता हूँ -
इसी सोच के बीच में आता है - तन और स्वभाव, इसको किस तरह की तैयारी के तहत उतरा गया है समाज में या दुनिया में? शायद इसी में पलती है और बनती है हमारी पहचान। वो पहचान जिसे समझने की चेष्टा कोई नहीं करता शायद किसी को ये भी नहीं मालूम होता है उसकी वो पहचान क्या है जिसे लेकर वो जी नहीं रहा बल्कि महज़ चल रहा है? और वो पहचान क्या है? जो महज खुद के “मैं ” को बताने की भूमिका निभाती?
अगर हम सब कुछ हटा दें- अपने से समाज को, जेंडर को, जाती को, शहर को, पहचान को, रिश्तो को, वस्त्रों को, आवाज़ों को और अब खड़े हो जाएँ और देखने की कोशिश करें की क्या दिखता है? जो दिख रहा है उस तक जाने की कोशिश करें। उस पहचान तक कैसे पहुचेगें जो “जैसे को तैसा” पहचान है। मतलब उस पहचान तक पहुँचने की क्या राहें (रस्ते और दिशा ) हैं? जिसमें अपने को मिटा दिया जाता है। क्योंकि मेरा शरीर मेरी आकृति का सबूत नहीं है बल्कि वे एक ऐसी आकृति है जो सामुहिक है बस मेरे "मैं" ने उसे अपना कहा है, अपना लिबास पहनाया है और अपना गवाह बनाया है।
कबीर का एक गीत है जिसमें एक लाइन है- “तेरे जो घट में, वही मेरे भी घट में, सब के घट में एक है भाई ”
इसमें “मैं ” की कोई कठोर रूप-रेखा नहीं है। जैसे को तैसा पहचान जब बनती है। वो खुद में होने से बाहर ले जाती है। जो तुम हो वो मैं भी हूँ और जो मैं हूँ, वो सब है तो "मैं" खुलता किसके लिए हूँ?
ओशो अपनी मनहीत मंजूरी किताब में लिखते हैं- परमात्मा तो मिल ही जाता है बशर्ते हमें कुछ कीमत चुकानी होती है। अपने को खोने की .. अगर हम सोचें इस शरीर को तो ये आसन भी लगता है। वैसे हम बहुत सी चीजों को छोड़ने के लिए फ़ौरन तैयार हो जाते हैं। हम कहते हैं की मैं घर छोड़ दूंगा, पत्नी -बच्चे छोड़ दूंगा, काम छोड़ दूंगा, धन -दोलत छोड़ दूंगा, पद -प्रतिष्ठा छोड़ दूँगा और कहते है की पहाड़ पर चला जाऊँगा मगर अपने को छोड़ने को तैयार कभी नहीं होते तो ये सब छोड़ने से क्या होगा? जिसने अपने को नहीं छोड़ा उसने कुछ नहीं छोड़ा। इस चुनोती में एक ही त्याग है वो है “मैं ” का त्याग ।
इसमें भी यही कहा गया है की "मैं" का त्याग ही आपको सभी चीजों या परमात्मा से मिला सकता है। हम अपने जीने और रहने से हमेशा किसी सवाल को अपने कंधो पर उठा लेते हैं और चल पड़ते हैं उसकी खोज में पर वो सवाल है क्या ? क्या कोई जिद्द है?, क्या कोई आत्मा है?, क्या कोई हद्द है? या कोई आपारआधार है?
इन्ही के बीच में चलते-रहते है.. बस सवाल को उठाएँ निकल पड़ते है दुनिया में और करते क्या है उसे तलाशने लगते है। उसके चिन्ह तलाशने की हट पकड़ लेते हैं। जब की उस सवाल और हमारे खुद के “मैं ” में एक सधारण सा गेप होता है उसे नहीं तलाश पाते। मेरा यहाँ पर खुद का मनना है की अगर हम इस गेप को तलाशने निकलें तो हम उस सवाल की गहराई को खोज सकते हैं।
इस गेप को तलाश लिया तो समझों की हर सवाल को तलाश लिया। मुझे वो २ लाइन याद आती है-
"इस दुनिया में सभी एक-दूसरे से मिलने-जुलने में मस्त है,
मगर खुद से मिलने की सभी लाइन व्यस्त हैं।
खुदा हाफिज़ .......
लख्मी
Friday, January 28, 2011
जो चीज़ें याद में नहीं जाती
Monday, January 17, 2011
फ्लेश बैक लाइव
मैं बहस करना चाहता हूँ इस सोच से की अनूभवी शख़्स एक लाइब्रेरी की तरह होता है। ये बहस कोई नकारात्मक नहीं है और न ही ये उन शख़्सों के साथ कोई लड़ाई है। जो खुद को ये मानकर जीते हैं या जो ये कहते हैं। सवाल है की अनूभवी क्या है? कोई जमापूंजी है या रूके हुए समय का उदाहरण?
मुझे लगता है जैसे इस बंधन में कई जीवन हैं जो गाड़े होते जाते हैं। एक ठहराव की भाषा लेकर इसे जीवन का स्टॉप बनाने की ओर निकल जा रहे होते हैं। ये स्टॉप कोई भाषाई या चुप्पी में चले जाना नहीं है बल्कि ये शरीर की कल्पना का अंत है। ये खास बँटवारा है और इसमें बाकी का इंसान या समूह का एक हिस्सा लग जाता है इन्हे पिछला याद दिलाने के लिये और ताज़ा करने के लिये और दूसरा हिस्सा लग जाता है इनको उसी ठहराव में चिन्हित करने के लिये। मेरा ये मानना है इन्हे ताज़ा क्यों किया जाये और चिन्हित क्यों? यहाँ पर जीवन का कोनसा सवाल ओपन होता है?
जब कोई शख़्स रोजगारिक पारिवारिक और नैतिकता से भरी ज़िन्दगी से रिटायरमेन्ट ले लेता है तब जीवन के सारे ज्ञान, कहानी, शख़्स और लड़ाइयाँ क्यों फ्लेश होती हैं?
पिछले दिनों अपने पिताजी से बात कर रहा था। उनसे बातें करते हुए लगा की मैं आज उनके सामने नहीं बल्कि किसी काम से बेजान शरीर से मुखातिब हूँ या कह सकते हैं कि किसी और तरह की जान डालने वाले शरीर के सामने बैठा हूँ। अपने जीवन में आने वाले और मौज़ूदा समय का उदाहरण बनाकर जीने वाले इस शरीर से बातचीत आज एक तरफ को ही जोर लगाती ज़्यादा नज़र आई। वे अपने जीवन के सफ़र को अब अपना उदाहरण बना लेते और सामने बैठे शख़्स के आगे परोस देते। लेकिन ये क्या है? यही सवाल मैंने पिछले दिन उनसे पूछ लिया कि आज जब आप अपने शरीर को ठहराव में ले आये हैं तब ये सब उदाहरण, कहानियाँ और ज्ञान क्यों बाहर आ रहा है, इससे पहले ये कहाँ था?
उनका इसके ऊपर एक साधारण और पका हुआ जवाब था। वे बोले, “इससे पहले ये बन रहा था। काम, मेहनत और इमानदारी में ये बनता रहा। आज ठहराव है तो बाहर निकल आता है।"
"आपकी ज़िन्दगी में ठहराव क्या है?” बात में एक और सवाल पूछा मैंने।
वे बोले, “ठहराव तो ठहराव है। एक आराम।"
उनसे कि हुई बातें समाजिक जीवन के वे भीतरी किनारे थे जिनको छूकर ही कोई तस्वीर बनाई जाती है। यानि भाव और काम से बने सारे छोर। बात महज़ ये नहीं थी कि मैं उनके साथ कोई बदलाव या पिछले वक़्त की बात करने में जुटा था। बल्कि ये एक लम्बा बँटवारा है। जो दिखता नहीं है। ठहराव क्या है या आराम क्या है? शरीर और समय के साथ किया हुआ समझौता या कुछ और।
अपने एक दोस्त के साथ कि हुई बातचीत का एक हिस्सा याद आया। उससे एक बार किसी ने पूछा था की अगर आप अपने काम पर जा रहे हैं और आज आपकी ट्रेन आने में 10 मिनट की देरी है तो उस वक़्त में आप कहाँ तक की कल्पना करते हैं? तब वे बोला था की वे जहाँ जा रहा है वहाँ पर क्या हो रहा होगा वे सोचेगा। कल कितने बजे आना है वे सोचेगा और यहाँ-वहाँ देखकर टाइम पास करेगा।
इस बात के बाद में दिमाग गूँजा विनोद कुमार शुक्ल की किताब "दिवार में एक खिड़की रहती थी" का एक किरदार जो काम पर जाने में 2 मिनट की देरी में वहाँ पर खड़ा सोच रहा है कि वे एक पान खा ले। लेकिन अगर वे आज पान खायेगा तो उसे कल भी खाना होगा और कल भी पान खाना पड़े तो उसे लगेगा की मुझे पान खाने की लत है। अगर मैं यूहीं पान खाता रहा तो लत तो लग जायेगी। फिर मैं रोज़ 2 मिनट पहले निकलूंगा उसके हिसाब से सारे कामों का टाइम बदलना होगा।
ये किरदार सोचते हुए अपने काम और रोज़गारिक बंधनों से परे हो जाता है। यहाँ पर आने के बाद में मैं सोच रहा था की क्या ये दस मिनट या कहीं भी दो मिनट क्या हमें उस ठहराव का अंदेशा नहीं देते? हम इस किरदार की भांति क्यों नहीं इस वक़्त को सोच पा रहे हैं? मैं सोचता रहा, तब लगा की हमारे दिमाग की कल्पना बहुत हो सकती है लेकिन हमारे शरीर की कल्पना हमारे दिमाग से ज्यादा नहीं है।
असल में ये ना तो मेरे दोस्त और न ही मेरे पिताजी की कल्पना और सोच पर सवालिया निशान था बल्कि ये जीवन जीने का सिस्टम एक तार की तरह खींचा है। शरीर, दिमाग और काम ये मुख्य धारा दिन को पिरोती हैं। ये धारा दूसरे को कुछ ज्ञान बाँटती हुई जा रही है या तीव्र करने की मुहीम में कुछ मशीनी बना रही है। पहली धारा कहती है, ये मौका है कुछ पा ले। तो दूसरी कुछ पाने की चाहत मे निकल जाती है। फिर पाना-पाना और पाना खुद के झुकाव और खुद को खोना लाज़मी हो जाता है। पाना इतना मुख्य हो जाता है कि उसमें ठहराव एक अंत है। जिसमें जोर की दुनिया अपने पलटने पर होती है। वही जोर जो शहर को अपनी ओर खींचता है।
पिताजी अपने आज को ठहराव का लम्बा आराम मानते हैं और सोचते हैं कि उनके पास जो भी वे बँट जाये। लेकिन इसमें उनका अपने लिये चैलेंज कहाँ है? हमारे अपने लिये किन सवालों और चैलेंज का असर है?
मुझे एक वक़्त में आकर लगा की दिमाग और शरीर इनको पहले से ही तैयार करके समाज मे उतारा जाता है। कहाँ जाना है? कब जाना है?, कैसे जाना है? कहाँ नहीं जाना है क्यों नहीं जाना है? इसमें मिलना और जगह के साथ बहुत कड़ा रिश्ता बना होता है। बहुत बहस में होने के बाद में दिमाग की कल्पना उड़ान पकड़ती नज़र आती है लेकिन शरीर को लेकर कोई कल्पना नहीं होती। अगर शरीर की कल्पना को उड़ान में ले जाया जाये तो वे समाज से एक विरोधाजनक भिड़ंत ले लेता है।
शरीर को हम किन कल्पनाओं में ले जा सकते हैं?
लख्मी
मुझे लगता है जैसे इस बंधन में कई जीवन हैं जो गाड़े होते जाते हैं। एक ठहराव की भाषा लेकर इसे जीवन का स्टॉप बनाने की ओर निकल जा रहे होते हैं। ये स्टॉप कोई भाषाई या चुप्पी में चले जाना नहीं है बल्कि ये शरीर की कल्पना का अंत है। ये खास बँटवारा है और इसमें बाकी का इंसान या समूह का एक हिस्सा लग जाता है इन्हे पिछला याद दिलाने के लिये और ताज़ा करने के लिये और दूसरा हिस्सा लग जाता है इनको उसी ठहराव में चिन्हित करने के लिये। मेरा ये मानना है इन्हे ताज़ा क्यों किया जाये और चिन्हित क्यों? यहाँ पर जीवन का कोनसा सवाल ओपन होता है?
जब कोई शख़्स रोजगारिक पारिवारिक और नैतिकता से भरी ज़िन्दगी से रिटायरमेन्ट ले लेता है तब जीवन के सारे ज्ञान, कहानी, शख़्स और लड़ाइयाँ क्यों फ्लेश होती हैं?
पिछले दिनों अपने पिताजी से बात कर रहा था। उनसे बातें करते हुए लगा की मैं आज उनके सामने नहीं बल्कि किसी काम से बेजान शरीर से मुखातिब हूँ या कह सकते हैं कि किसी और तरह की जान डालने वाले शरीर के सामने बैठा हूँ। अपने जीवन में आने वाले और मौज़ूदा समय का उदाहरण बनाकर जीने वाले इस शरीर से बातचीत आज एक तरफ को ही जोर लगाती ज़्यादा नज़र आई। वे अपने जीवन के सफ़र को अब अपना उदाहरण बना लेते और सामने बैठे शख़्स के आगे परोस देते। लेकिन ये क्या है? यही सवाल मैंने पिछले दिन उनसे पूछ लिया कि आज जब आप अपने शरीर को ठहराव में ले आये हैं तब ये सब उदाहरण, कहानियाँ और ज्ञान क्यों बाहर आ रहा है, इससे पहले ये कहाँ था?
उनका इसके ऊपर एक साधारण और पका हुआ जवाब था। वे बोले, “इससे पहले ये बन रहा था। काम, मेहनत और इमानदारी में ये बनता रहा। आज ठहराव है तो बाहर निकल आता है।"
"आपकी ज़िन्दगी में ठहराव क्या है?” बात में एक और सवाल पूछा मैंने।
वे बोले, “ठहराव तो ठहराव है। एक आराम।"
उनसे कि हुई बातें समाजिक जीवन के वे भीतरी किनारे थे जिनको छूकर ही कोई तस्वीर बनाई जाती है। यानि भाव और काम से बने सारे छोर। बात महज़ ये नहीं थी कि मैं उनके साथ कोई बदलाव या पिछले वक़्त की बात करने में जुटा था। बल्कि ये एक लम्बा बँटवारा है। जो दिखता नहीं है। ठहराव क्या है या आराम क्या है? शरीर और समय के साथ किया हुआ समझौता या कुछ और।
अपने एक दोस्त के साथ कि हुई बातचीत का एक हिस्सा याद आया। उससे एक बार किसी ने पूछा था की अगर आप अपने काम पर जा रहे हैं और आज आपकी ट्रेन आने में 10 मिनट की देरी है तो उस वक़्त में आप कहाँ तक की कल्पना करते हैं? तब वे बोला था की वे जहाँ जा रहा है वहाँ पर क्या हो रहा होगा वे सोचेगा। कल कितने बजे आना है वे सोचेगा और यहाँ-वहाँ देखकर टाइम पास करेगा।
इस बात के बाद में दिमाग गूँजा विनोद कुमार शुक्ल की किताब "दिवार में एक खिड़की रहती थी" का एक किरदार जो काम पर जाने में 2 मिनट की देरी में वहाँ पर खड़ा सोच रहा है कि वे एक पान खा ले। लेकिन अगर वे आज पान खायेगा तो उसे कल भी खाना होगा और कल भी पान खाना पड़े तो उसे लगेगा की मुझे पान खाने की लत है। अगर मैं यूहीं पान खाता रहा तो लत तो लग जायेगी। फिर मैं रोज़ 2 मिनट पहले निकलूंगा उसके हिसाब से सारे कामों का टाइम बदलना होगा।
ये किरदार सोचते हुए अपने काम और रोज़गारिक बंधनों से परे हो जाता है। यहाँ पर आने के बाद में मैं सोच रहा था की क्या ये दस मिनट या कहीं भी दो मिनट क्या हमें उस ठहराव का अंदेशा नहीं देते? हम इस किरदार की भांति क्यों नहीं इस वक़्त को सोच पा रहे हैं? मैं सोचता रहा, तब लगा की हमारे दिमाग की कल्पना बहुत हो सकती है लेकिन हमारे शरीर की कल्पना हमारे दिमाग से ज्यादा नहीं है।
असल में ये ना तो मेरे दोस्त और न ही मेरे पिताजी की कल्पना और सोच पर सवालिया निशान था बल्कि ये जीवन जीने का सिस्टम एक तार की तरह खींचा है। शरीर, दिमाग और काम ये मुख्य धारा दिन को पिरोती हैं। ये धारा दूसरे को कुछ ज्ञान बाँटती हुई जा रही है या तीव्र करने की मुहीम में कुछ मशीनी बना रही है। पहली धारा कहती है, ये मौका है कुछ पा ले। तो दूसरी कुछ पाने की चाहत मे निकल जाती है। फिर पाना-पाना और पाना खुद के झुकाव और खुद को खोना लाज़मी हो जाता है। पाना इतना मुख्य हो जाता है कि उसमें ठहराव एक अंत है। जिसमें जोर की दुनिया अपने पलटने पर होती है। वही जोर जो शहर को अपनी ओर खींचता है।
पिताजी अपने आज को ठहराव का लम्बा आराम मानते हैं और सोचते हैं कि उनके पास जो भी वे बँट जाये। लेकिन इसमें उनका अपने लिये चैलेंज कहाँ है? हमारे अपने लिये किन सवालों और चैलेंज का असर है?
मुझे एक वक़्त में आकर लगा की दिमाग और शरीर इनको पहले से ही तैयार करके समाज मे उतारा जाता है। कहाँ जाना है? कब जाना है?, कैसे जाना है? कहाँ नहीं जाना है क्यों नहीं जाना है? इसमें मिलना और जगह के साथ बहुत कड़ा रिश्ता बना होता है। बहुत बहस में होने के बाद में दिमाग की कल्पना उड़ान पकड़ती नज़र आती है लेकिन शरीर को लेकर कोई कल्पना नहीं होती। अगर शरीर की कल्पना को उड़ान में ले जाया जाये तो वे समाज से एक विरोधाजनक भिड़ंत ले लेता है।
शरीर को हम किन कल्पनाओं में ले जा सकते हैं?
लख्मी
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