Wednesday, December 16, 2009

कुछ बन जाने से निज़ात

आदमी जो बन गया है उससे निज़ात पाना क्यों नहीं चाहता?

अपनी शख़्सियत को हर वक़्त गाढ़ा करके चलने वाला शख़्स हमेशा इस चालाकी में रहता है की कब खुद को नोसिखिया साबित कर और भरोसा पा सके। ये एक खास तरह का सूरतेहाल है, शहर की लगती लाइनों में कहीं जमने का हो या कहीं किसी भीड़ मे घुसने का या फिर काम और रिश्तों की आवाजाही में अपना कौना पकड़ने का।

हर रोज़ सुबह इस दावे के साथ चलने वाला शख़्स शाम होते - होते अपनी शख़्सियत के गाढ़ा हो जाने का दम भरता है। इसी सोच से आगे बड़ता है की जहाँ पर रुकना होगा वहाँ पर अपनी शख़्सियत को थोड़ा नाज़ुक और लचीलेपन में लाकर नये लोगों के बीच में दाखिल हो जायेगा।

एक लड़की ने एक तस्वीर को देखते हुए कहा, “कितना डर भरा है इसमें।"
उसके साथी ने उससे पूछा, “डर क्यों लग रहा है तुम्हे इसमें?”
वे बोली, “मेरी ज़िन्दगी के किसी पल को ये झिंजोर देता है।"

किसी एक वक़्त का पुलींदा बनाने में कई छोटे-छोटे पहलुओं का हाथ होता है। कोई वक़्त कभी अकेले कोई बड़ा और मजबूत रूप तभी ले सकता है। जब उन छोटे-छोटे वक़्त की परतों से न मिला हो। उन परतों की लड़ाई, उनका सहयोग, उनका टकराना और उनका साथ देना। उस पुलींदे को मजबूत बनाता जाता है।

लेकिन वो वक़्त का मजबूत पुलींदा आखिर में आते - आते बन क्या जाता है? क्या तस्वीरों को देखकर उन छोटे - छोटे पहलुओं की परत को चमकाने का काम करता है या टूटने के लिए छोड़ देना होता है?

ये समझना और समझाना थोड़ा मुश्किल हो जायेगा। इसे सिर्फ महसूस किया जा सकेगा।

उस साथी ने दोबारा से उस लड़की से पूछा, “तुम जो बन गई हो उसे गाढ़ा क्यों किये जाती हो?”

वे लड़की बोली, “या तो गाढ़ा करूँगी या फिर तोड़ूंगी मगर तोड़ने के बाद भी कुछ बनता ही है। वे भी तो गाढ़ा होता जाता है।"

लख्मी

2 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बडा अलग सा है आपकी रचना का कथ्य। वाकई सोचने पर मजबूर कर दिया।

--------
छोटी सी गल्ती जो बडे़-बडे़ ब्लॉगर करते हैं।
क्या अंतरिक्ष में झण्डे गाड़ेगा इसरो का यह मिशन?

Ek Shehr Hai said...

Shukeiya Aapke Sabdo ka..

Dainikta ki is chalti chamak me khud ki koi roshni teyaar krte hain..

padte rahiye.