Saturday, April 17, 2010

रंगो का क्या खेल है?

रात, परछाई और छाया इनके रंग क्या है? क्या रात परछाई से जुदा है? या रात और परछाई के मिलन से छाया बनती है? इनको एक साथ मे सोचना और इनके एक साथ मे चलने को हम किन और शब्दों से सोच पाते हैं?

पिछले दिन कुछ दोस्तों से बात करते हुये ये तीन शब्दों को बहुत नजदीक से देखने और सोचने की कोशिश की। ऐसा नहीं था कि सोचना मेरी खुद की कल्पना से दूर था या ऐसा भी नहीं था की इन शब्दों से ही सोचना और कल्पना मेरी हकीकत और सपनों की दुनिया को एक साथ पिरो रही थी। ये खाली किसी रंग के साथ बहने की कोशिश थी।

परछाई क्या है?

प्रतिबिम्ब, अक्श या फिर कुछ और – इन सभी मे कुछ तलाशने और तराशने की पूरी निपूर्ण कोशिश सभी को अपनी कुछ ऐसी कहानियों के अन्दर ले जा रही थी जिन्हे सुनाना कोई गज़ब अहसास नहीं बनाता हाँ, बस माहौल को बहने का इतना गहरा मौका दे देता है जिससे कई और अन्य ज़िन्दगियों को अपने साथ ले जाया जा सकता है। मगर कहानियाँ सुनाना कोई बड़ा काम नहीं था। यहाँ पर सबके दिमाग था की कैसे इन तीन अलग-अलग स्थितियों और रूपों को एक साथ समझा जा सकें?

परछाई, अपने शरीर के नृत्य से मिलने का एक खास अहसास को बनाती है जिसमें हम हमारे खुद के नृत्य से मिलते हैं और उसके साथ बनाने वाले खुद के नातों हम अपने उस पल भर और क्षणिक अहसासों से भरते जाते हैं। हर परछाई का दूसरा अंग उसके छाया होने को भी जी भरकर जीता है। इसमें किसी दूसरे शख़्स के होने का अहसास होता है। परछाई – इसका जीवन खुद की पहचान को खोकर भी जीवित रखता है। किसी भीड़ मे खड़े इंसान की कोई पहचान जरूर होती है लेकिन परछाइयों की भीड़ मे किसी परछाई की कोई पहचान नहीं होती। वे तो खुद के नृत्य से जानी और सम्भोदित होती है।

पहचान और परिचय से बाहर होकर जीना जहाँ शरीर को फँसाये रखता है वहीं पर परछाई इन दोनों रूटों को तोड़कर कभी भी जी लेती है। जिसमे शरीर खाली एक ऐसे ठोस धातू की भांति बन जाता है जो कभी भी अपने को तोड़ेगा औ कभी भी मोड़ेगा लेकिन परछाई उसको अपने आगोश में लेगी। जिसमें रोशनी का नाता खाली उसके साथ डांस मे साथ देने के अलावा कुछ नहीं रहता।

यहाँ पर रात को भी सोचते समय लगा की किसी बहुत बड़े आकार की ऐसी परछाई है जिसे किसी खास पहचान से जाना और दर्शाया जाता है जिसमें खास जीवन जी उठता है और जीता है।

ये रात और परछाई के अन्दर जीना क्या है? इनको छाया बनने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन जरूरत का होना या न होना खाली मतलबी दुनिया का चेहरा ही नहीं दिखाता बल्कि किन्ही ऐसे अन्य जीवनों और सफ़रों को साथ मे खड़ा करना भी होता है जिन्हे साथ मे उड़ने और चलने की कशक हो गई होती है। इनको अपने जीवन मे किस तरह से सोचा जाता है?

अगर हम परछाई मे शरीर, रात में से समय और छाया मे वस्तू को निकाल देते तो इनको समझने के इशारे क्या है?

बात यहाँ से सफ़र की ओर बड़ती है -

लख्मी

1 comment:

Shekhar kumawat said...

rango se hi jivan rangin he


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com